25/04/2023
साधकों के लिए एक बात- कभी-कभी भक्तों का आचरण समझ में नहीं आता है, या ये कहना ठीक होगा कि गलत समझ लिया जाता है। पर साधकों को इस विषय में सावधान रहना चाहिए। इसको स्पष्ट करते हुए एक सत्य कथा सुनाते हैं।
एक थे श्रीविपिनबिहारी राय। उनको क्षय रोग हो गया था। उन्हें अपने प्राणों पर संकट नजर आने लगा तो वो श्रीधर और कुछ अन्य गुरुभाइयों के साथ बारदी के ब्रह्मचारी जी के दर्शन करने चले कि उनकी कृपा हो जाये। बारदी के ब्रह्मचारी जी एक सिद्ध योगी थे। श्रीधर ने कहा कि साधु-संतों के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए तो सबने कुछ फल, साग-सब्जी, सीधा-सामग्री आदि ले लिया। विपिन ने अच्छे दाम में चार फजली आम लिये। तभी इनके मन में आया कि श्रीधर इसे खा न जाये इसलिए उनके लिए एक टोकरी अच्छे आम भी ले लिये।
ये लोग नाँव से जा रहे थे। एक बाजार के पास कुछ देर को नाँव रुकी। सब उतर गये, बस श्रीधर बैठे भजन करते रहे। विपिन को आम की चिन्ता सताती थी, जाते-जाते फिर श्रीधर से बोले कि देखो ब्रह्मचारी जी के आम मत खाना, इच्छा हो तो टोकरी में तुम्हारे लिए आम हैं।
विपिन को जिस बात की आशंका थी वही हुई। रास्ते में देखा कि चार बालक वही चार आम लेकर जा रहे हैं। विपिन ने वापस उनसे आम लिये और बाकी लोगों से कहा कि देखो, श्रीधर को जिसके लिए मना किया था वही किया, खुद नहीं खाया तो बाट दिया। तुरन्त वापस आकर श्रीधर को विपिन ने बहुत कुछ सुनाया। श्रीधर खूब तेज-तेज से नाम कीर्तन करने लगे। विपिन को और गुस्सा आया तो और भी बहुत कुछ कहा। श्रीधर बोले कि चिल्लाते क्यों हो, आम तो वापस ले आये। विपिन को इस जवाब से और गुस्सा आया। विपिन ने कहा कि किसके कहने से मेरे आम लुटा दिये तो श्रीधर बोले कि ब्रह्मचारी जी के कहने पर। बहुत विवाद हुआ। सभी की नजर में श्रीधर दोषी और गलती न मानने वाले उद्दंड थे।
रात हुई तो अंधेरा छा गया। उन लोगों के पास बत्ती बनाने के लिए कोई कपड़ा नहीं था। तभी कोई बोला कि श्रीधर के पास मैले-कुचैले चीथड़ों की पोटली है जिसे वो गहनों से भी ज्यादा सम्भाल कर रखता है। विपिन तो पहले ही श्रीधर पर गुस्सा थे, उन्होंने श्रीधर की पोटली से एक पुराने कपड़े का टुकड़ा निकाल लिया। जैसे ही श्रीधर ने यह देखा तो उन्होंने विपिन के जाँघ को दाँतों से काटना शुरू कर दिया। विपिन चिल्लाने लगा। लोग बचाने दौड़े पर श्रीधर छोड़ते नहीं थे। लोगों ने श्रीधर को बहुत पीटा पर श्रीधर ने विपिन को नहीं छोड़ा। जब विपिन के खून निकलने लगा तब श्रीधर 'जय निताई, जय निताई' कहते हुए नदी में कूद गये। श्रीधर को तैरना नहीं आता था तो लोगों ने इन्हें बचाया।
इतना पढ़ने के बाद आपको भी श्रीधर दोषी लगते होंगे। खैर हम चूँकि उनका नाम आदर से ले रहे हैं तो आप ऐसा कुछ नहीं कहेंगे पर यदि आपके साथ कोई भक्त कहलाने वाला ऐसा करता तो आप उसे ढोंगी, दुष्ट और न जाने क्या-क्या कहते।
अब ये लोग बारदी पहुंचे। सब तो ब्रह्मचारी जी के दर्शन के लिए चले गए, श्रीधर बैठे सोचते रहे कि ब्रह्मचारी जी के लिये क्या ले चलें? फिर उठकर अपने वस्त्र में घास बाँध ली और खुद लंगोट में ही चल दिये। इधर ब्रह्मचारी जी ने सबसे पूछा कि मेरा श्रीधर कहाँ है? सबने कहा कि नौका पर ही बैठा है, रास्ते में उसने बहुत उपद्रव किया। तभी श्रीधर सिर पर घास का गट्ठर लेकर आ गये। ब्रह्मचारी तुरन्त उठकर श्रीधर के पास आये। श्रीधर ने ब्रह्मचारी जी के सामने घास पटकते हुए कहा खाओ इसे। सब हँसने लगे। लोगों ने पूछा कि क्या ब्रह्मचारी जी घास खायेंगे तो श्रीधर बोले जिससे गौ संतुष्ट उससे ब्राह्मण संतुष्ट। सबने मान लिया कि श्रीधर पागल हो गये हैं।
विपिन ने ब्रह्मचारी जी से अपना रोग दूर करने के लिए प्रार्थना करी तो ब्रह्मचारी जी बोले कि उसे तो श्रीधर ने खींच कर फेंक दिया। तब ब्रह्मचारी जी ने श्रीधर से सारी बात बताने को कहा। श्रीधर ने कहा कि जब सब लोग बाजार गये थे तब ब्रह्मचारीजी चार बालकों के साथ आये थे और ब्रह्मचारीजी ने उन्हें आम देने को कहा था। ये बालक परम सिद्ध थे। पीछे एक संकीर्तन की मंडली भी थी। श्रीधर उन्हीं के साथ जोर-जोर से कीर्तन कर रहे थे। फिर ब्रह्मचारी जी ने ही कहा था कि श्रीधर, विपिन की जाँघ पर काटकर इसका रोग दूर कर दो। काँटने पर जब लोग मारते थे तब श्रीधर उसी संकीर्तन में डूबे थे। जब काँट चुके तब श्रीधर को श्री श्री महाप्रभुजी, श्रीनित्यानंद प्रभु जी और श्रीअद्वैत प्रभु जी के दर्शन हुए और तभी उन्हीं का नाम लेते हुए ये नदी में कूद पड़े। और जिन्हें सब मैले-कुचैले चीथड़े समझते थे वो हिमालय के सिद्ध योगियों के द्वारा प्रयोग में लाये हुए वस्त्रों के टुकड़े थे जिन्हें श्रीधर ने प्रसाद स्वरूप एकत्र किया था।
सबकुछ जानकर सभी अपनी नासमझी पर लज्जित थे, कहते क्या उनका मौन ही श्रीधर की जय बोल रहा था। हम सदैव भक्तों के सम्बन्ध में सावधान रहें। उनका आचरण अजीब लगे तो धैर्य रखते हुए जानने का प्रयास करें। कहीं ऐसा न हो कि प्रभु कृपा से मिले हुए भक्त को, जो हमारा परम हितैषी हो, अपना परम शत्रु मान बैठें और स्वयं का बहुत बुरा कर लें।
('श्री श्री सद्गुरु संग' से संक्षेप में)