Bijoy Krishna Bhakta Sangha

Bijoy Krishna Bhakta Sangha Disciples cannot achieve any higher state of spiritual level based on their own individual efforts. # “One should never do charity for their own benefit.

However if one is following all the instructions of their Guru without asking any questions, success comes their way easily..... Charity has to be done selflessly then one can reap its benefits.”
# “Disciples cannot achieve any higher state of spiritual level based on their own individual efforts. However if one is following all the instructions of their Guru without asking any questions, success

comes their way easily”
# “If one wants to spend time with his Guru, one should try to follow all the instructions of the Guru.”
# “If the disciple does anything wrong then Guru has to bear the punishment for it. He gets canned for it.”
# Sadhana is an internal process. One always needs to inculcate pure thoughts and be in the company of saints as much as possible. Whether its happiness or sadness, appreciation or criticism the mind should always be calm and should not react to either.
# God is the only truth, rest is all an illusion.
# One should discuss the topic of God, be in the company of saints and read religious scriptures and books.

05/06/2025

🚩 जय गुरु , जय गोसाईं 🚩 🪷क्या सद्गुरु की प्राप्ति इतनी आसान है? अनेक जन्मों की सिद्धि प्राप्त करके — केवल भगवान की कृपा से ही सच्चे सद्गुरु की प्राप्ति होती है। जब सद्गुरु की प्राप्ति होती है, तब वे फिर कभी किसी भी अवस्था से पतित नहीं होते। हाँ, कर्मों के निवारण हेतु कभी-कभी उनकी स्थिति कुछ समय के लिए ढक दी जाती है, लेकिन वह नष्ट नहीं होती। सद्गुरु की प्राप्ति के बाद, जो भी अवस्था प्राप्त हो — वह पूर्णत: स्थायी होती है। सद्गुरु की प्राप्ति का अर्थ है पूर्ण सुरक्षा। प्रसंगवश किसी ने उनसे प्रश्न किया था — "अगर कोई व्यक्ति सद्गुरु से दीक्षा लेकर फिर कहीं और जाकर दीक्षा ले, सद्गुरु द्वारा दिए गए साधन को त्याग दे — तो क्या सद्गुरु भी उसे त्याग देते हैं?" प्रभुजी ने उत्तर दिया: “क्या ऐसा कभी हो सकता है?” हाँ, कर्मभोग पूरा कराने के लिए वे उसे कुछ समय तक घुमा सकते हैं, **लेकिन तीन जन्म के भीतर वे उसके कर्मों का अंत करा ही देते हैं।”🪷 🥀 (गोसाईं जी )🥀

https://youtu.be/SJ0D3bLyhGU?si=N-SdSYpVdgNaoBaXSadhu Darshan at Maha Kumbh Mela Prayagraj with Srimat Amit Brahmacharij...
19/02/2025

https://youtu.be/SJ0D3bLyhGU?si=N-SdSYpVdgNaoBaX

Sadhu Darshan at Maha Kumbh Mela Prayagraj with Srimat Amit Brahmachariji Maharaj on Shahi Snan ( Makar Sankranti day )

Jaigosai Sadhu darshan on Shahi snan day Makar Sankranti at Maha Kumbh with Srimat Amit Brahmachariji Maharj 14.01.2025

Jai gosaiBahut hi durlab sundar sadhu Bhandara aur Kanya pujan Sri Amarkantak dham mein.
26/07/2024

Jai gosai
Bahut hi durlab sundar sadhu Bhandara aur Kanya pujan Sri Amarkantak dham mein.

Jaigosai Amarkantak Dham mein Vishal Bhandara aur Maa Narmada Swarup Kaniya pujan by Srimat Amit Brahmachariji Maharaj at Sri Ramkrishna Kutir Amarkantak dh...

Jai Guru, Jai Gosai. With immense grace of Sadguru Shri Shri Bijoy Krishna Goswami Ji, we have developed a new mobile ap...
30/06/2024

Jai Guru, Jai Gosai. With immense grace of Sadguru Shri Shri Bijoy Krishna Goswami Ji, we have developed a new mobile application which attempts to make available all the bhajans recited by Thakur Swami Asimananda Saraswati Ji Maharaj, Swami Alokananada Saraswati Ji Maharaj, Swami Amalananda Saraswati Ji Maharaj and Srimat Amit Bhramhachariji Maharaj to all Gosai Bhakt gans. It also contains the Shradhanjali Kirtan Book, link to Gosai Ji's youtube page and Gosai Ji's website. We are in process of adding more details like Life sketch & teachings of Gosai Ji, few e-books, more bhajans & videos.

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Jai Guru Jai Gosai

🌹🍁🌹श्री श्री गोसाईं जी के पुत्र श्री श्री योगजीवान गोस्वामी ने जीवन में बहुत ही कम उम्र से धर्मलाभ का विकास हुआ। जिन्हों...
24/05/2023

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श्री श्री गोसाईं जी के पुत्र श्री श्री योगजीवान गोस्वामी ने जीवन में बहुत ही कम उम्र से धर्मलाभ का विकास हुआ। जिन्होंने उनका सत्संग किया उन्होंने कहा कि ये तो देवता हैं। वे संसार का कुछ भी नहीं समझते थे। बहुत ही सरल स्वभाव के थे।
उनके व्यक्तित्व को उक्त घटना से समझा जा सकता है ---------
गोसाईं जी तब कलकत्ता के सीताराम घोष स्ट्रीट में रहा करते थे। एक दिन योगजीवन गोस्वामी ने आकर पिता से कहा - "देखो, आज बहुत मजा आया। श्री कृष्ण को बहुत परेशान किया।"
गोसाईं जी ने पूछा -" क्यों, क्या किया ?"
योगजीवन गोस्वामी ने कहा - "आसन में बैठा था, अनेक ऋषि - मुनियों के साथ श्री कृष्ण का दर्शन मिला। मेरे प्रणाम करते ही उन्होंने मुझे कहा - "मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता, वर प्रार्थना करो।" मैंने कहा - मुझे 50 लाख करोड़ रूपये दो। मेरी बात सुनते ही श्री कृष्ण दौड़कर भाग गए और घूमकर नहीं देखा। "
बात सुनकर गोसाईं जी हँसते हुए कहने लगे - "तू बहुत मूर्ख है, प्रेमभक्ति नहीं मांग सका ?" योगजीवन गोस्वामी ने उत्तर दिया - वह चीज मैं क्यों मांगू ? उसके लिए तो आप हो ही। वह तो मेरी मुट्ठी में है, पर आप तो धन दोगे नहीं, इसी कारण श्रीकृष्ण को मैंने धन देने को कहा।"
गोसाईं जी पुत्र का उत्तर सुनकर जोर जोर से हंसने लगे।
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06/05/2023

गोसाईं जी के उपदेशों का सार यही है कि शरीर - मन स्वस्थ रखकर, कर्तव्य कर्म यथावत् करते हुए यथासंभव साधन पथ पर चलना होगा। गुरु के आदेश पालन ही कर्तव्य है, वही धर्म है, वही लक्ष्य है। भावुकता धर्म नहीं है।

सर्वदा नाम करना ही हम लोगों का कार्य है। ऐसा भी देखा गया है कि अविश्राम दर्शन आदि करने और सिद्धि लाभ करने पर भी कुछ लोग विषय-गामी हो गए हैं। इसलिए नाम की सिद्धि ही वास्तविक सिद्धि है।

- श्री श्री कुलदानंद ब्रह्मचारी

04/05/2023

ठाकुर ने कहा- "भक्ति के द्वारा इस देह से ही एक प्रकार की सुरा उत्पन्न होती है। उसे अमृत कहते हैं; उसे पीने से फिर जन्म नहीं होता।"

मैंने (श्री श्री कुलदानन्दजी ब्रह्मचारी) कहा- भक्ति से देह के भीतर किस प्रकार सुरा उत्पन्न होती है? उसको पीएँगे कैसे?

ठाकुर ने कहा- "देखो, जब हम लोगों को क्रोध आता है, तब मस्तिष्क के किसी एक विशेष स्थान पर एक प्रकार के प्रभाव से उस स्थान के रक्त में कुछ अन्य प्रकार का परिवर्तन होता है। वह रक्त तब गरम होकर अस्वाभाविक रूप से पूरे शरीर में फैल जाता है। इस प्रकार सत्-असत् सभी भाव मस्तिष्क के विशेष-विशेष स्थान पर एक-एक प्रकार की अनुभूति से रक्तादि में परिवर्तन लाते हैं। वही शिरा-धमनी से होकर पूरी देह में फैल जाता है। भाव, भक्ति, आनन्द से भी रक्त में इस प्रकार का परिवर्तन होता है। भक्ति से मस्तिष्क के रक्त की जो अवस्था होती है, बहुत अधिक होने से वह क्रमशः भाव के द्वारा गरम होकर एक प्रकार का रस बन जाता है। वह रस धीरे-धीरे तालू से चूकर जीभ पर गिरता है, वही रस अमृत है। उसकी दो-तीन बूँद ही पीने से इतना नशा होता है कि पाँच-सात दिन सहज में बिता दिया जाता है, भोजन की भी आवश्यकता नहीं होती।"

मैंने कहा- जिस अमृत की बात आपने कही, वह पीने में कैसा लगता है?

ठाकुर ने कहा- "प्रत्येक बार उसका स्वाद भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। भक्ति के सब भावों के साथ उसका योग है। भक्ति का जब जैसा भाव, उस समय वैसा ही स्वाद। उसको पीने से शरीर भी स्वस्थ रहता है। उसको पीने से दीर्घकाल भोजन न करने पर भी कोई दुर्बलता नहीं आती; शरीर खूब बलिष्ठ और स्वस्थ हो जाता है। उससे शरीर का बड़ा कल्याण साधित होने के कारण ही शास्त्र में उसको 'अमृत' कहा गया है। वह यथार्थ में अमृत है।"

मैंने कहा- जिस भक्ति से वह अमृत उत्पन्न होता है, वह भक्ति कैसे प्राप्त होती है?

ठाकुर ने कहा- "इस अमृत को प्राप्त करने के लिए श्वास-प्रश्वास में खूब नाम-जप करो। श्वास-प्रश्वास में नाम-जप कर पाने से ही देखना धीरे-धीरे सभी प्राप्त होगा। श्वास-प्रश्वास में नाम-जप करना ही सबसे श्रेष्ठ उपाय है।"

Jaigosai Adhivas Live Kirtan By Srimat Amit Brahmachari ji Maharaj from Raghunathpur Ashram n the occasion of Guru Mata ...
30/04/2023

Jaigosai Adhivas Live Kirtan By Srimat Amit Brahmachari ji Maharaj from Raghunathpur Ashram n the occasion of Guru Mata Sailabala Devi Tirodhan Utsav

एक समय की बात है कि श्री कुलदानन्दजी ब्रह्मचारी के मन में आया कि यदि सब कुछ गुरुकृपा से सम्भव है तो वो सारे अभावों को मि...
30/04/2023

एक समय की बात है कि श्री कुलदानन्दजी ब्रह्मचारी के मन में आया कि यदि सब कुछ गुरुकृपा से सम्भव है तो वो सारे अभावों को मिटा क्यों नहीं देते हैं? यदि वे समर्थ हैं तो मुझे कष्ट-क्लेश झेलते हुए देखकर भी तटस्थ क्यों हैं? श्रीब्रह्मचारी जी मन में इन बातों को रखे हुए थे कि अवसर आने पर अपने गुरुदेव श्री श्री विजय कृष्ण गोस्वामीजी से पूछेंगे। श्रीगोस्वामीजी उस समय श्रीवृन्दावन धाम में श्रीदाऊजी के मंदिर में थे।

इनको तो पूछने का अवसर नहीं मिला पर एक दिन अचानक ही श्रीगोस्वामीजी इनके मन की दुविधा जानकर कहने लगे कि समय आने पर ही सबकुछ होता है। साधन-भजन करते जाओ। पेड़ में फल आने के लिए भी परिश्रम के साथ-साथ प्रतीक्षा करनी पड़ती है। मुख्य बात है कि फसल तैयार होने तक खूब मेहनत करनी पड़ती है, खूब सावधानी रखनी होती है, और समय पर ही फसल होगी। इसलिए खूब नाम जाप करो, सावधान रहो कि निन्दा आदि में मत पड़ो। बहुत कम बोलो, कम सोओ। रात रहते ही उठ जाओ और नाम जपो। करते जाओ तब ही समय पर कुछ होगा।

तब श्रीब्रह्मचारी जी ने गुरुदेव से पूछा कि यदि सबकुछ समय आने पर ही होगा तब 'कृपा' का क्या महत्त्व है? सद्गुरु आश्रय की क्या महिमा है?

श्रीगुरुदेव ने कहा कि जो कुछ भी होगा (जो समय आने पर होगा) वो गुरुकृपा से ही होगा, और गुरुकृपा से वो तुरन्त भी हो सकता है। पर यदि तुरन्त हो गया, और साधक ने उसके लिये प्रयास ही नहीं किया तो वो टिकेगा नहीं क्योंकि साधक आसानी से मिली वस्तु का आदर नहीं कर पायेगा। जब कोई किसी वस्तु को पाने के लिए अथक प्रयास करता है तब ही उसका मूल्य समझ पाता है और तब ही प्राप्त होने पर उसको सम्भाल कर रख पाता है। अगर कोई आध्यात्मिक उपलब्धि बिना प्रयास किये हो गई तो साधक उसका मूल्य नहीं समझ पायेगा, और चूक जायेगा। कोई भी आध्यात्मिक उपलब्धि होती तो 'कृपा' से ही है पर प्रयास मूल्य समझने के लिए आवश्यक है, स्वयं की दीनता और गुरु की कृपालुता जानने के लिए, अहंकार के विसर्जन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।

फिर श्रीब्रह्मचारी जी ने कहा कि मुझे वो वस्तु नहीं चाहिये जिसका मूल्य मैं न समझूँ और वो छूट जाये। मेरे दुर्गुणों को दूर कीजिए जिससे मुझसे ऐसी भूल न हो।

गुरुदेव यह सुनकर कुछ देर मौन रहे, फिर बहुत महत्त्वपूर्ण बात बोले-

"जो कहा है, वही करते जाओ। श्वास-प्रश्वास में नाम जपने की खूब चेष्टा करो। नाम-साधना के जैसा श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। अपने स्वयं के जीवन में मैंने नाम-साधना का फल पाया है। एक बार उस प्रकार से नाम-साधना करके तो देखो, फल कैसे नहीं मिलता! पहले-पहले नाम-जप करने में बहुत विरक्ति लगती है; किन्तु उस कारण से उसे छोड़ते नहीं। विरक्ति लगती है, तो क्या हुआ? उससे तो कोई हानि नहीं है? खूब नाम-जप करते जाओ। श्वास-प्रश्वास में नाम-जप करने से बहुत लाभ है; श्वास-प्रश्वास में नाम जपने से प्रारब्ध धीरे-धीरे कट जाते हैं। तब अच्छी-अच्छी अवस्थाएँ भी प्राप्त हुआ करती हैं। प्रारब्ध क्षय का ऐसा उत्तम उपाय और नहीं है।" ('सद्गुरुदेव की कृपा के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तर', 'श्री श्री सद्गुरु संग, भाग १)

साधकों के लिए एक बात- कभी-कभी भक्तों का आचरण समझ में नहीं आता है, या ये कहना ठीक होगा कि गलत समझ लिया जाता है। पर साधकों...
25/04/2023

साधकों के लिए एक बात- कभी-कभी भक्तों का आचरण समझ में नहीं आता है, या ये कहना ठीक होगा कि गलत समझ लिया जाता है। पर साधकों को इस विषय में सावधान रहना चाहिए। इसको स्पष्ट करते हुए एक सत्य कथा सुनाते हैं।

एक थे श्रीविपिनबिहारी राय। उनको क्षय रोग हो गया था। उन्हें अपने प्राणों पर संकट नजर आने लगा तो वो श्रीधर और कुछ अन्य गुरुभाइयों के साथ बारदी के ब्रह्मचारी जी के दर्शन करने चले कि उनकी कृपा हो जाये। बारदी के ब्रह्मचारी जी एक सिद्ध योगी थे। श्रीधर ने कहा कि साधु-संतों के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए तो सबने कुछ फल, साग-सब्जी, सीधा-सामग्री आदि ले लिया। विपिन ने अच्छे दाम में चार फजली आम लिये। तभी इनके मन में आया कि श्रीधर इसे खा न जाये इसलिए उनके लिए एक टोकरी अच्छे आम भी ले लिये।

ये लोग नाँव से जा रहे थे। एक बाजार के पास कुछ देर को नाँव रुकी। सब उतर गये, बस श्रीधर बैठे भजन करते रहे। विपिन को आम की चिन्ता सताती थी, जाते-जाते फिर श्रीधर से बोले कि देखो ब्रह्मचारी जी के आम मत खाना, इच्छा हो तो टोकरी में तुम्हारे लिए आम हैं।

विपिन को जिस बात की आशंका थी वही हुई। रास्ते में देखा कि चार बालक वही चार आम लेकर जा रहे हैं। विपिन ने वापस उनसे आम लिये और बाकी लोगों से कहा कि देखो, श्रीधर को जिसके लिए मना किया था वही किया, खुद नहीं खाया तो बाट दिया। तुरन्त वापस आकर श्रीधर को विपिन ने बहुत कुछ सुनाया। श्रीधर खूब तेज-तेज से नाम कीर्तन करने लगे। विपिन को और गुस्सा आया तो और भी बहुत कुछ कहा। श्रीधर बोले कि चिल्लाते क्यों हो, आम तो वापस ले आये। विपिन को इस जवाब से और गुस्सा आया। विपिन ने कहा कि किसके कहने से मेरे आम लुटा दिये तो श्रीधर बोले कि ब्रह्मचारी जी के कहने पर। बहुत विवाद हुआ। सभी की नजर में श्रीधर दोषी और गलती न मानने वाले उद्दंड थे।

रात हुई तो अंधेरा छा गया। उन लोगों के पास बत्ती बनाने के लिए कोई कपड़ा नहीं था। तभी कोई बोला कि श्रीधर के पास मैले-कुचैले चीथड़ों की पोटली है जिसे वो गहनों से भी ज्यादा सम्भाल कर रखता है। विपिन तो पहले ही श्रीधर पर गुस्सा थे, उन्होंने श्रीधर की पोटली से एक पुराने कपड़े का टुकड़ा निकाल लिया। जैसे ही श्रीधर ने यह देखा तो उन्होंने विपिन के जाँघ को दाँतों से काटना शुरू कर दिया। विपिन चिल्लाने लगा। लोग बचाने दौड़े पर श्रीधर छोड़ते नहीं थे। लोगों ने श्रीधर को बहुत पीटा पर श्रीधर ने विपिन को नहीं छोड़ा। जब विपिन के खून निकलने लगा तब श्रीधर 'जय निताई, जय निताई' कहते हुए नदी में कूद गये। श्रीधर को तैरना नहीं आता था तो लोगों ने इन्हें बचाया।

इतना पढ़ने के बाद आपको भी श्रीधर दोषी लगते होंगे। खैर हम चूँकि उनका नाम आदर से ले रहे हैं तो आप ऐसा कुछ नहीं कहेंगे पर यदि आपके साथ कोई भक्त कहलाने वाला ऐसा करता तो आप उसे ढोंगी, दुष्ट और न जाने क्या-क्या कहते।

अब ये लोग बारदी पहुंचे। सब तो ब्रह्मचारी जी के दर्शन के लिए चले गए, श्रीधर बैठे सोचते रहे कि ब्रह्मचारी जी के लिये क्या ले चलें? फिर उठकर अपने वस्त्र में घास बाँध ली और खुद लंगोट में ही चल दिये। इधर ब्रह्मचारी जी ने सबसे पूछा कि मेरा श्रीधर कहाँ है? सबने कहा कि नौका पर ही बैठा है, रास्ते में उसने बहुत उपद्रव किया। तभी श्रीधर सिर पर घास का गट्ठर लेकर आ गये। ब्रह्मचारी तुरन्त उठकर श्रीधर के पास आये। श्रीधर ने ब्रह्मचारी जी के सामने घास पटकते हुए कहा खाओ इसे। सब हँसने लगे। लोगों ने पूछा कि क्या ब्रह्मचारी जी घास खायेंगे तो श्रीधर बोले जिससे गौ संतुष्ट उससे ब्राह्मण संतुष्ट। सबने मान लिया कि श्रीधर पागल हो गये हैं।

विपिन ने ब्रह्मचारी जी से अपना रोग दूर करने के लिए प्रार्थना करी तो ब्रह्मचारी जी बोले कि उसे तो श्रीधर ने खींच कर फेंक दिया। तब ब्रह्मचारी जी ने श्रीधर से सारी बात बताने को कहा। श्रीधर ने कहा कि जब सब लोग बाजार गये थे तब ब्रह्मचारीजी चार बालकों के साथ आये थे और ब्रह्मचारीजी ने उन्हें आम देने को कहा था। ये बालक परम सिद्ध थे। पीछे एक संकीर्तन की मंडली भी थी। श्रीधर उन्हीं के साथ जोर-जोर से कीर्तन कर रहे थे। फिर ब्रह्मचारी जी ने ही कहा था कि श्रीधर, विपिन की जाँघ पर काटकर इसका रोग दूर कर दो। काँटने पर जब लोग मारते थे तब श्रीधर उसी संकीर्तन में डूबे थे। जब काँट चुके तब श्रीधर को श्री श्री महाप्रभुजी, श्रीनित्यानंद प्रभु जी और श्रीअद्वैत प्रभु जी के दर्शन हुए और तभी उन्हीं का नाम लेते हुए ये नदी में कूद पड़े। और जिन्हें सब मैले-कुचैले चीथड़े समझते थे वो हिमालय के सिद्ध योगियों के द्वारा प्रयोग में लाये हुए वस्त्रों के टुकड़े थे जिन्हें श्रीधर ने प्रसाद स्वरूप एकत्र किया था।

सबकुछ जानकर सभी अपनी नासमझी पर लज्जित थे, कहते क्या उनका मौन ही श्रीधर की जय बोल रहा था। हम सदैव भक्तों के सम्बन्ध में सावधान रहें। उनका आचरण अजीब लगे तो धैर्य रखते हुए जानने का प्रयास करें। कहीं ऐसा न हो कि प्रभु कृपा से मिले हुए भक्त को, जो हमारा परम हितैषी हो, अपना परम शत्रु मान बैठें और स्वयं का बहुत बुरा कर लें।
('श्री श्री सद्गुरु संग' से संक्षेप में)

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Raghunathpur

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http://jaigosai.blogspot.com/, http://gosaiji.blog.com/, http://www.sadgurubijoykrishna.com/

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