Ugna Mahadeo Mandir

Ugna Mahadeo Mandir Ugna Mahadeo Mandir is a Hindu Temple located at Maithil Tola, Purnea (Bihar)

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27/02/2022

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27/02/2022

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25/02/2022

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16/09/2020

बांस की लकड़ी को क्यों नहीं जलाया जाता है।

इसके पीछे धार्मिक कारण है या वैज्ञानिक कारण ?

हम अक्सर शुभ (जैसे हवन अथवा पूजन) और अशुभ (दाह संस्कार) कामों के लिए विभिन्न प्रकार के लकड़ियों को जलाने में प्रयोग करते है लेकिन क्या आपने कभी किसी काम के दौरान बांस की लकड़ी को जलता हुआ देखा है। नहीं ना?

भारतीय संस्कृति, परंपरा और धार्मिक महत्व के अनुसार, 'हमारे शास्त्रों में बांस की लकड़ी को जलाना वर्जित माना गया है। यहां तक की हम अर्थी के लिए बांस की लकड़ी का उपयोग तो करते है लेकिन उसे चिता में जलाते नहीं।' हिन्दू धर्मानुसार बांस जलाने से पितृ दोष लगता है वहीं जन्म के समय जो नाल माता और शिशु को जोड़ के रखती है, उसे भी बांस के वृक्षो के बीच मे गाड़ते है ताकि वंश सदैव बढ़ता रहे।

क्या इसका कोई वैज्ञानिक कारण है?

बांस में लेड व हेवी मेटल प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। लेड जलने पर लेड ऑक्साइड बनाता है जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है हेवी मेटल भी जलने पर ऑक्साइड्स बनाते हैं। लेकिन जिस बांस की लकड़ी को जलाना शास्त्रों में वर्जित है यहां तक कि चिता मे भी नही जला सकते, उस बांस की लकड़ी को हमलोग रोज़ अगरबत्ती में जलाते हैं। अगरबत्ती के जलने से उतपन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केमिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है जो कि श्वांस के साथ शरीर में प्रवेश करता है, इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर मे पहुंचाती है।
इसकी लेश मात्र उपस्थिति केन्सर अथवा मष्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है।

शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नही मिलता सब जगह धूप ही लिखा है, हर स्थान पर धूप,दीप,नैवेद्य का ही वर्णन है।*

अगरबत्ती का प्रयोग भारतवर्ष में इस्लाम के आगमन के साथ ही शुरू हुआ है। मुस्लिम लोग अगरबत्ती मज़ारों में जलाते है, हम हमेशा अंधानुकरण ही करते है, जब कि हमारे धर्म की हर एक बातें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार मानवमात्र के कल्याण के लिए ही बनी है।

🙏🏻अतः कृपया अगरबत्ती की जगह धूप का ही उपयोग करें।

01/09/2020

जितिया जीमुतवाहन पुजा
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संतान दीर्घायुक कामना सौं आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमीक अत्यन्त कठिन आ उच्च फल दैइवला जितिया पावैन मिथिला में अति लोकप्रिय आ महत्वपूर्ण अछि।
अपन मिथिला में इ व्रत केनिहारि एक दिन पूर्व मरूआ रोटी आ माछ खाई छथि, "जिया जीवछ बढई छै"।विधवा लोकनि अरवा-अरवैन खाई छथि।पितरैन के निमंत्रण दय जिनका जते जे उपलब्ध पवित्र सौं भोजन करबै छथि आ तेल सिनूर लगा जैंत-पीच के सेवा सुश्रुखा कय ससम्मान विदा करै छथि , जौं कनियाँ-बहुरिया निमंत्रित रहै छनि त थारी बाटी में साजि पारस पठा दै छथि।
जाहि मैथिल बेटीक एहिसाल विवाह भेल रहै छैन सासुर सौं माछ मरूआ ओठगनक लेल दही-चूड़ा आ श्रृंगारक समान चूड़ी लहठी सारी आदिक भार आबई छनि,सौंसे टोल समाज सोलहो श्रृंगार कय माछ आ मरूआ रोटी अंगने अंगने छमकि छमैक के परसै छथि कहल जाई छै अहिवात सुरक्षित रहै छै।
मिथिला में व्रत सौं पूर्व जौं अष्टमी तिथि नै परल रहै छै त भोरूकवा में चूड़ा दही चीनी अम्मट अचार नून मिरचाई जिनका जतेक स्वाद साजो सामान लय ओठगन करै छथि दू साँझ जाधरि तिथि नहिं बदलल निर्जला उपास रहे परै छनि।धियापुता सब त ओठगनक नाम सुनि आनंदविभोर भय जाई छथि आ माँ के खूब आगू पाछू करै छथि जे भोरूकवा में ओठगन करब किएक नै हुए भोरूकवा में दही चूड़ा खाई वला एकटा येह अद्वितीय पावैन अछि।
पुरूष लोकनि स्त्री के खौंझबै लेल इहो कहै छथि

"जितिया पावैन बड़ भारी
धियापुता के ठोकि सुतेलनि
अपने लेलैन भरि थारी"

किन्तु जे माँ ओहि संतानक लेल एतेक कठिन व्रत रखै छथि ओ कहूँ ओहि संतान के ओठगन काल नहिं उठबथिन जाहि बेर ओठगनक समय अष्टमी परियो जाई छै त अपने त नहिंये खाई छथि धियापुता के अवश्य ओठगन करबै छथि किएक त मैथिल स्त्री पति संतान परिवारक लेल सदा अपन बलिदान बलिवेदी पर रखने रहै छथि।
अष्टमी जाहि दिन परै छै मैथिल व्रती स्त्री जाहि ठाम स्नान करै छथि इनार पोखैर नदी वा कल पर पूब मुँहे ठार भय आँजुर में जल लय सूर्यदेव के इ मंत्र पढैत अर्घ्य दै छथि-
"नम: एषोर्घ: सूर्यनारायणाय नम:"
एहि तिथि में विशेष योग भेला सौं "षडजितिया" सेहो लगै छै अहिदिन सौं नवका व्रती व्रतक आरंभ सूर्यदेव के अर्घ्य दऽ हथ में तेकुशा तील जल लऽ इ मंत्र पढि संकल्पित होई छथि-

"नमो अद्य आरभ्य षोडष वर्षाणि यावत् प्रतिवर्षिया आश्विन कृष्णाष्टम्यां प्रदोषे जीमूतवाहनस्य व्रत-पूजा संकल्प अहं करिष्यामि"
इ व्रत खंडित नै हेबाक चाही।

अर्घ्योपरांत दिनभरि निर्जला रहि साँझखन पवित्र से गायक गोबर सौं अंगना नीपी एकटा छोटे खाधि खुनि पोखरीक निर्माण कय ओकरा महार पर एकटा पाकडिक ठारि गाडि गोबर-माटिक चिल्ह आ गिदरनीक आकृति बना डारि पर चिल्हौर आ निचा में गिदरनीक के राखि कलश में कुशक जीमूतवाहनक मूर्तिक स्थापन कय बाँसक पात रंग विरंगक साग पान सुपारी सिनूर टिकली सम सामयिक फल फूल अक्षत मखानादि सौं डाली सजा नैवेद्य ओंकरी सोंहाँस सबचीजक बारीकी सौं व्यवस्था कय श्रद्धा पूर्वक संतान रक्षित शालिवाहन राजाक पुत्र जीमूतवाहनक पूजा करै छथि।महादेव द्वारा पार्वतीक संतान रक्षार्थ इ व्रत कथा करलेल कहने छथि। चिल्ह आ सियार पर आधारित कथा मनोयोग सौं सुनि आरती विसर्जन करै छथि।
प्रात भेने तिथि बदलला के बाद स्नान ध्यान कय जीतवाहन के नैवेद्य दय पारण करै छथि।
**नोट-जे ओरियान नै हुए मानसिक क ली।
माँक संतानक लेल कठिन तपस्या।
हे माँ! हे जननी! आहाँ के शत् शत् नमन।
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#पुजा विधि- जल लय निम्न मंत्र पढैत सब सामग्री संग स्वयं पर सिक्त करि-

नमो! अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोपिवा!
य: स्मरेत पुण्डरीकाक्षं सवाह्याभ्यंतर:सुचि:सुचि:! नमो पुण्डरीकाक्ष:पुनातु!!

#संकल्प- तेकुशा तील जल लय निम्न मंत्र पढि पात पर एककात त्यागि दी

नमोऽस्यां रात्रौ आश्वीनमासीय कृष्ण पक्षीयाऽष्टम्यां तिथौ अमुक गोत्राया: मम अमुकी देव्या: सकल पुत्रपौत्रादि चिरंजीवीत्व सकल सुख सौभाग्या अवैधव्य गोधन धान्यादि समृद्धि कामनाया श्री जीमुतवाहन पूजन अहं करिष्ये।

#गणपत्यादि_पंचदेवता पूजन-

*अक्षत- नमो गणपत्यादि पंचदेवता: इहागच्छत इह तिष्ठत।कहि पात पर एककात राखि दी।

*अर्घा में जल- एतानि पाद्यादीनि एषोर्घ: नमो गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।

*फूल में चानन लगाके- इदमनुलेपनं गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नमः ।

*अक्षत- इदमक्षतं गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।

*फूल- इदं पूष्प गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।

*बेलपात- इदं विल्वपत्रं गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।

*दूबि-क्षइदं दुर्वादलम् गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।
जल लय-एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बुलयथाभाग नानाविध नैवेद्यानि गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।नैवेद्य पर।

*जल- इदमाचीनीयं नमो गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।

**विधवा स्त्री तील लय-

*नमो भागवत् भगवान श्रीविष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ। पूजा के बगल में पात पर राखू।

*जल लय-एतानि पाद्यादीनि एषोर्घ: नमोभगवते श्रीविष्णवे नम:।पूजा पात पर चढादी।

*तिल- एते तिला: श्री विष्णवे नमः।

*फुल- एतानि पुष्पाणि श्री विष्णवे नमः।

*तुलसी- एतानि तुलसीपत्राणि श्री विष्णवे नमः।

*जल- एतानि गंधपुष्प धूपदीप ताम्बुल यथाभाग नाना विधि नैवेद्यानि नमः श्री विष्णवे नमः।

*जल- इदमाचमनीय भगवन् श्री विष्णवे नमः।

*एकटा फुल- एष पुष्पांजलि श्री विष्णवे नमः।

**सधवा स्त्री गौरी पूजा करथि-

*अक्षत- नमो गौरि इहागच्छ इह तिष्ठ।

*जल- एतानि पाद्यादीनि नमो गौर्ये नम:।

*चानन- इदमनुलेपनं नमो गौर्ये नम:।

*सिंदुर- इदं सिन्दूरमनमो गौर्ये नम:।

*अक्षत- इदमक्षतं नमो गौर्ये नम:।

*फूल- इदं पुष्पं नमो गौर्ये नम:।

*दुबि- इदं दुर्वादलम नमो गौर्ये नम:।

*बेलपात- इदं विल्वपत्रं नमो गौर्ये नम:।

*जल- एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बुलयथायदिभाग नानाविध नैवेद्यानि नमो गौर्ये नम:।नैवेद्य पर उत्सर्ग करी।

*जल- इदमाचीनीयं नमो गौर्ये नम:।

***कुश के जे जितवाहन कलश में अछि हुनक पुजा प्रतिषठा निम्न-

*अक्षत- श्रीजीमूतवाहन इहागच्छ इह सुप्रतिष्ठितो भव।

#आवाहन_कल जोरि - नमो देवेश भक्ति सुलभ सर्वावरण संयुत। यावत्वां पूजयिष्यामि तावत्त्वं सुस्थिरो भव।।

#पुष्पासन- कार्तस्वरमयं दिव्यं नानागुण समन्वितम्।
अनेक शक्ति संयुक्तमासनं प्रतिगृह्यताम्।। इदं पुष्पासऩ श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#पाद्यम_ यद्भक्तिलेशसम्पर्कात् परमानन्द संभव:‌ तस्मै तें चरणाब्याय पाद्यं देवा कल्पये।। इदं पाद्यम् श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#अर्घ्यं- तापमत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम्। तापत्रयविनिर्मुक्त्यै तवार्घ्य कल्पमाम्यहम्।। इदंमर्घ्यम् श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#आचमन- कर्पुर वासितं तोयं मन्दाकिन्या : समाहृतम्। आचम्यातां दयानाथ मया दत्तं हि भक्तित:।। इदमानीयम् श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#स्नान- गंङ्गा च यमुना चैव नर्मदा च सरस्वती। कृष्णा च गोमती वेणी क्षिप्रा सिन्धुस्थैव च।तापीपयोष्णी रेवा च ताभ्य: स्नानार्थमाहृतम्।तैयमेतत् सुखस्पर्शं स्नानीय प्रतिगृह्यताम्।।इदं स्नानीयं जलम् श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#पञ्चामृत- पयो दधिघृतं चैव मधुशर्करयाऽन्वितम्। पञ्चामृतं मयानीतं स्नानार्थ प्रतिगृह्यताम्। इदं पञ्चामृतम् श्रीजीमूतवाहनाय नम:।

#शुद्धोदकम- नदी नां चैव सरसां मयानीतं जलं शुभम्।
अनेन त्वं कुरु स्नानं मन्त्रैर्वारूणकै: शुभे:। इद़ं शुद्धोदकम् श्रीजीमूतवाहनाय नमः। स्नानाङ्गमाचमनीयम्।

#वस्त्र- तन्तुसन्तान संयुक्तं कलाकौशेय कल्पितम्।पीतवस्त्रयुगं युग़ देव कृपया प्रतिगृह्यताम्। इदं पीतवस्त्रं
वृहस्पति दैवतम् श्रीजीमूतवाहनाय नमः। वस्त्राङ्गमाचमनीयम्।

#यज्ञोपवीत- यस्य शक्तित्रयेणेदं सम्प्रोक्तं से चराचरम्। यज्ञरुपाय तस्मै ते यक्षसूत्रं प्रकल्पयेत।। इदं यज्ञोपवितं श्रीजीमूतवाहनाय नमः। यज्ञोपविताङ्गमाचमनीयम्।

#चंदन- श्रीखणडचन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। आघ्रेय: सर्वदेवानां प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्। इदं श्रीखण्डचनदनम् श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#अक्षत- अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ता: सुशोभना:।
मया निदिता भक्त्या तान् गृहाण सुरेश्वर।। इसमें अक्षता: श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#फुल- सुगनधीनी सुपुष्पाणि देशकालोद्भवानि च। मयानीतानिपूजार्थ प्रीत्या स्वीकुरू यानि में।। एतानि पुष्पाणि श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#फुलमाला- कानापुष्पाविचित्राढ्यां पुषपमालां सुशोभनाम्। प्रयच्छामिच हे देव गृहाण पुरूषोत्तम्। इद़ं पुष्पमाल्यं श्रीजीमूतवखहनाय नमः।

#तुलसी- तुलसीं हेमरुपा च रत्नरूपां च मञ्जरीम्। भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि हरिप्रियाम्। एतानि तुलसीपत्राणि श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

*दुवि- एतानि दुर्वादलानि श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#धूप- वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्य: सुमनैहर:। आध्रेय सर्व देवतानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्।। एष धूप श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#दीप- आज्यं सवर्तिसंयुक्तं वह्नीना योजितं मया‌दीपं गृहाण हे देव त्रेलोक्यतिमिरापह।। एष दीप: श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

#नैवेद्य- अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसै: षड्भि: समन्वितम्।मया निवेदितं देव नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।।एतानि नानाविधफलशष्कु लिपैलिकातलफल युतपीत वस्त्राच्छादित सप्तडल्लकानि नमो जीमूतवाहनाय नमः।‌

**आचमन- सर्वपापहारं दिव्यं गाङ्गयं निर्मलं जलम्। आचमनीयं मया दत्तं गृहाण पुरूषोत्तम। इदमाचमनीयं श्री जीमूतवाहनाय नमः।

**ताम्बुल- पूगीफलं महाद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्।कपूरादिसमायुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्‌। इदं ताम्बूलम् श्रीजीमूतवाहनाय नमः।

**द्रव्याभूषण- काञ्चऩं रजतोपेतं नाना रत्न समन्वितम्। भूषणार्थ मया दत्तं गृहाण लैकपुजित।। इदं भुषणार्थ द्रव्यम् श्रीजीमूतवाहनाय नमः।
पुष्पांजलि- अभीष्टसिद्धिद़ं में देहि शरणागतवत्सल। भक्त्या समर्पये तुभ्यं सर्वमावरणार्चनम्।एष पुष्पांजलि: नमो जीमूतवाहनाय नमः।

#चिल्हौर पुजा-

*अक्षत - नमः चिल्हि इहागच्छ इह तिष्ठ।

*जल- एतानी पाद्यादिनी एषोऽर्घ्य: चिल्हयै नमः।

*चानन- इदमनु लेपनम् चिल्हयै नमः।

*सिन्दुर- इदं सिन्दूराभरणम् चिल्हयै नमः।

*अक्षत- इदमक्षतम् चिल्हयै नमः।

*फुल- इदं पुष्पम् चिल्हयै नमः।

*जल- एतानी गंधपुष्प धूपदीप ताम्बूल यथाभाग नानाविध नैवेद्यादीनी चिल्हयै नमः।

*एकटाफुल- एष पुष्पांजलि चिल्हयै नमः।

#सियार पुजा-

*अक्षत-श्रृगालि इहागच्छ इह तिष्ठ।

*जल- एतानी पाद्यादिनी एषोऽर्घ्य: श्रृगाल्यै नमः।

*चानन- इदमनु लेपनम् श्रृगाल्यै नमः।

*सिंदुर- इदं सिन्दूराभरणम् श्रृगाल्यै नमः।

*फुल- इदं पुष्पम् श्रृगाल्यै नमः।

*अक्षत- इदमक्षतं श्रृगाल्यै नमः।

*जल- एतानी गंधपुष्प धूपदीप ताम्बूल यथाभाग नाना विधि नैवेद्यादीनि श्रृगाल्यै नमः।

*एकटा फुल - एष पुष्पांजलि श्रृगाल्यै नमः।

#पाकड़ि गाछक पुजा-

*अक्षत- नमः पर्कटीवृक्ष इहागच्छ इह तिष्ठ।

*जल- एतानी पाद्यादिनी एषोऽर्घ्य पर्कटीवृक्षाय नमः।

*चानन- इदमनु लेपनम् पर्कटीवृक्षाय नमः।

*अक्षत- इदमक्षतं पर्कटीवृक्षाय नमः।

*फुल- इदं पुष्पम् पर्कटीवृक्षाय नमः।

*जल- एतानी गंधपुष्प धूपदीप ताम्बूल यथाभाग नानाविध नैवेद्यादीनी पर्कटीवृक्षाय नमः।

*एकटा फुल- एष पुष्पांजलि पर्कटीवृक्षाय नमः।

#बाहुट्टार पुजा-

*अक्षत- नमः बाहूट्टार इहागच्छ इह तिष्ठ।

*जल- एतानी पाद्यादिनी एषोऽर्घ्य बाहूट्टाराय नमः।

*चानन-: इदमनु लेपनम् बाहूट्टाय नमः।

*अक्षत- इदमक्षतं बाहूट्टराय नमः।

*फुल- इदं पुष्पम् बाहूट्टराय नमः।

*जल- एतानी गंधपुष्प धूपदीप ताम्बूल यथाभाग

*नानाविध नैवेद्यादीनी बाहूट्टराय नमः।

*एकटा फुल - एष पुष्पांजलि बाहुट्टराय नमः।
#मरूस्थल पुजा-

*अक्षत- नमो मरूस्थल इहागच्छ इह तिष्ठ।

*जल- एतानी पाद्यादिनी एषोऽर्घ्य मरूस्थलाय नमः।

*चानन- इदमनु लेपनम् मरास्थलाय नमः।

*फुल- इदं पुष्पम् मरूस्थलाय नमः।

*जल- एतानी गंधपुष्प धूपदीप ताम्बूल यथाभाग नानाविध नैवेद्यादीनी मरूस्थलाय नमः।

*एकटा फुल- एष पुष्पांजलि मरुस्थलाय नमः।
प्रणाम कय कथा श्रवण करी।

#आरती- जल से इ मंत्र पढि उत्सर्ग करी-
चन्द्रादित्यौ च विद्युदग्निस्तथैव च। त्वमेव सर्वज्योतिषी आरार्तिक्यं प्रतिगृह्यताम्।।इदमार्तीक्यं श्री जीमूतवाहनादि सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।
प्रार्थना कलजोरी- देवदेव जगन्नाथ भक्तानां कार्यकारक। त्वतप्रसादमहंयाचे शीघ्रं कार्य प्रदो भव।। यद्भक्त्या देव देवेश मयाव्रतमिदं कृतम्। न्यूनं वाऽथ क्रियाहीनं परिपूर्ण तदस्तु मे।।

#प्रदक्षिण- यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्या समानि च तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे।। चारिबेर प्रदक्षिण करी।

#विसर्जन- उसयान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय मामकीम्।इष्टकामप्रसिद्ध्यर्थं पुनरागमणाय च।। नमः श्रीजीमूतवाहनदिपूजितदेवता: पूजिता: स्थ क्षमध्वं स्वस्थानं गच्छत।

#दक्षिणा उत्सर्ग‌‌‌- तूकुशा तील जल लय-
नमोऽद्य कृतैतत् श्रीजीमूतवाहनपूजन तत्कथा श्रवण कर्मप्रतिष्ठार्थमेतावद् द्रव्यमूल्यक हिरण्णमग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणा महं ददे।। तेकुशा जल तील दक्षिणा पर चढ़ा ब्राह्मण के द स्वस्ति ली।
इति।।

Durga Puja & Chhath Puja
29/08/2020

Durga Puja & Chhath Puja

29/08/2020

🔔क्या शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं?🙏🏻*

हाँ १००% सच है!!

भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लें, हैरान हो जायेंगे! भारत सरकार के न्युक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है।

▪️ शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वो शांत रहें।

▪️ महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्युक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।

▪️ क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता।

▪️ भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।

▪️ शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।

▪️ तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी।

▪️ ध्यान दें कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है।

▪️ जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है।
*_●विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।●_*
▪️ आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में ऐसे महत्वपूर्ण शिव मंदिर हैं जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक ही सीधी रेखा में बनाये गये हैं। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये? उत्तराखंड का केदारनाथ, तेलंगाना का कालेश्वरम, आंध्रप्रदेश का कालहस्ती, तमिलनाडु का एकंबरेश्वर, चिदंबरम और अंततः रामेश्वरम मंदिरों को 79°E 41’54” Longitude की भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है।

▪️ यह सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे हम आम भाषा में पंचभूत कहते हैं। पंचभूत यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष। इन्हीं पांच तत्वों के आधार पर इन पांच शिवलिंगों को प्रतिष्टापित किया गया है।

जल का प्रतिनिधित्व तिरुवनैकवल मंदिर में है,
आग का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नमलई में है,
हवा का प्रतिनिधित्व कालाहस्ती में है,
पृथ्वी का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम् में है और अतं में
अंतरिक्ष या आकाश का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में है!

वास्तु-विज्ञान-वेद का अद्भुत समागम को दर्शाते हैं ये पांच मंदिर।

▪️ भौगोलिक रूप से भी इन मंदिरों में विशेषता पायी जाती है। इन पांच मंदिरों को योग विज्ञान के अनुसार बनाया गया था, और एक दूसरे के साथ एक निश्चित भौगोलिक संरेखण में रखा गया है। इस के पीछे निश्चित ही कोई विज्ञान होगा जो मनुष्य के शरीर पर प्रभाव करता होगा।

▪️ इन मंदिरों का करीब पाँच हज़ार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांतर को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक उपलब्ध ही नहीं थी। तो फिर कैसे इतने सटीक रूप से पांच मंदिरों को प्रतिष्टापित किया गया था? उत्तर भगवान ही जानें।

▪️ केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 किमी की दूरी है। लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पड़ते हैं। _आखिर हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयोग कर इन मंदिरों को समानांतर रेखा में बनाया गया है, यह आज तक रहस्य ही है।_

श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायु लिंग है।
तिरुवनिक्का मंदिर के अंदरूनी पठार में जल वसंत से पता चलता है कि यह जल लिंग है।
अन्नामलाई पहाड़ी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि वह अग्नि लिंग है।
कंचिपुरम् के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वह पृथ्वी लिंग है और
चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान की निराकारता यानी आकाश तत्व का पता लगता है।

▪️ अब यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कि ब्रह्मांड के पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले पांच लिंगों को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिष्टापित किया गया है। _हमें हमारे पूर्वजों के ज्ञान और बुद्दिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसी विज्ञान और तकनीकी थी जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है।_ माना जाता है कि केवल यह पांच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होंगे जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में पड़ते हैं। *इस रेखा को “शिव शक्ति अक्श रेखा” भी कहा जाता है।* संभवतया यह सारे मंदिर कैलाश को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हों जो 81.3119° E में पड़ता है!? उत्तर शिवजी ही जाने।

*_कमाल की बात है "महाकाल" उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों के बीच का सम्बन्ध (दूरी )देखिये_*

▪️ उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी

▪️ उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी

▪️ उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी

▪️ उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी

▪️ उज्जैन से मल्लिकार्जुन- 999 किमी

▪️ उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी

▪️ उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी

▪️ उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी

▪️ उज्जैन से रामेश्वरम्- 1999 किमी

▪️ उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी

हिन्दू धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता था ।

उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, जो सनातन धर्म में हजारों सालों से मानते आ रहे हैं। इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले ।

और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला। आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये।

🙏 हर हर महादेव 🙏

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