26/08/2026
व्यासपीठ, मार्गदर्शन और राष्ट्र-हित-श्रीमज्जगद्गुरु शङ्कराचार्यजी, श्रीगोवर्धनमठ-पुरीपीठ।
https://youtu.be/V0fW6ijSH7s?si=oSxomY9nnRikgOq-
"अब व्यावहारिक धरातल पर मैं एक तथ्य वेदनापूर्वक प्रकट करना चाहता हूँ, सावधान।
अंग्रेजों की कूटनीति यह रही कि व्यासपीठ जो सनातन परंपरा से प्राप्त थी, आचार्य का पद जो सनातन परंपरा से प्राप्त था, उसे विकृत किया जाए, उसकी उपेक्षा की जाए। राजनेता ही व्यासपीठ के दायित्व को भी मानो अपना लें।
यह कूटनीति अंग्रेजों की थी, उस पर ध्यान आपका केंद्रित हो, यह बहुत आवश्यक है। इस कल्प में हमारी गुरु परंपरा श्रीमन्नारायण से लेकर अब तक 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 120 वर्षों की है। भगवत्पाद आद्य शंकराचार्य महाभाग को लेकर ही विचार करें तो उनका प्रादुर्भाव ईस्वी सन से 507 वर्ष पूर्व हुआ।
इस गोवर्धनमठ पूरीपीठ की स्थापना के 2504 वर्ष पूर्ण हो जाते हैं वैशाख शुक्ल दशमी के दिन। इतनी प्राचीन हमारी परंपरा थी। मैं एक संकेत करना उचित समझता हूँ, देवराज इंद्र कोई सामान्य व्यक्ति नहीं होते हैं। दिव्यता की पराकाष्ठा जब किसी व्यक्ति में होती है, तब वह देह त्याग के बाद देवराज इंद्र के पद को प्राप्त करता है।
लेकिन उन देवराज इंद्र को भी बृहस्पति का मार्गदर्शन अपेक्षित रहता है। साथ ही साथ विरोचन आदि को भी शुक्राचार्य का मार्ग अपेक्षित रहता है। कहीं शुक्राचार्य जी विरोचन आदि की उपेक्षा कर दें, तो दैत्य, दानव, असुर अपने अस्तित्व की रक्षा करने में समर्थ नहीं होते। कहीं देवगुरु बृहस्पति का स्वस्थ मार्गदर्शन देवराज इंद्र को सुलभ न हो, तो देवराज इंद्र भी सुरक्षित नहीं रहते।
लेकिन स्वतंत्र भारत में कूटनीति चली गई कि राजनेता ही व्यासपीठ का दायित्व भी संभाल लें। मैंने केवल संकेत किया—एक राजनेता को संत के रूप में उत्कृष्ट महात्मा के रूप में ख्यापित किया गया। उसके बाद में अब तक यह बीमारी चल रही है कि व्यासपीठ को अन्यथा सिद्ध करने के लिए, व्यासपीठ के आचार्यों की उपयोगिता को विलुप्त करने के लिए संतों का उपयोग अपने-अपने दल के प्रचार में किया जा रहा है।
कोई भी स्वस्थ प्रधानमंत्री अब तक नहीं हुए, जिनके हृदय में इस रहस्य को प्रकट करने की भावना हो कि व्यासपीठ को असुरक्षित करके, दिशाहीन करके, व्यासपीठ के सदस्यों को अपना अनुगामी बनाकर राष्ट्र का उत्कर्ष नहीं हो सकता। मैंने संकेत किया।
यह कूटनीति इस समय भी ज्यों की त्यों विद्यमान है। कोई ऐसा संत न हो, कोई ऐसा आचार्य न हो, कोई ऐसा विचारक न हो, जो धर्म और दर्शन के आधार पर विश्व को स्वस्थ मार्गदर्शन देने वाला न रह जाए। जो ऐसा न हो कि राजनीति का जो अभी दिशाहीन प्रकल्प है, उससे उत्कृष्ट सिद्ध हो जाए, वह दिशा देने में समर्थ हो जाए।
छल-बल, डंके की चोट से कितने ही ऊँचे राजनेता हों, उनके मन में यह भीषिका पली है। क्योंकि मनु आदि शास्त्र सम्मत सिद्धांत को जो जानता है, उसके सामने विश्व की कोई शक्ति टिक नहीं सकती। थोड़ा इतिहास को परखिए, मैं स्पष्ट शब्दों में कह देना उचित समझता हूँ..."
#हिन्दूराष्ट्र #गो_हत्या_बंद
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