Tirumala Tirupati

Tirumala Tirupati There is ample literary and epigraphic testimony to the antiquity of the temple of Lord Sri Venkatesw

Shri Ranchodji Darshan, Ahmedabad, Gujarat.
25/06/2025

Shri Ranchodji Darshan, Ahmedabad, Gujarat.

05/06/2025

"उद्धव गीता" एक बार जरूर पढें..।
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उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।
जब कृष्ण अपने अवतार काल को पूर्ण कर गौलोक जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-

"प्रिय उद्धव मेरे इस 'अवतार काल' में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ। तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी। उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- "भगवन #महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया! आपके 'उपदेश' अलग रहे, जबकि 'व्यक्तिगत जीवन' कुछ अलग तरह का दिखता रहा! क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?"

श्री कृष्ण बोले- “उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह "भगवद्गीता" थी। आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह "उद्धव-गीता" के रूप में जानी जाएगी। इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है। तुम बेझिझक पूछो।

उद्धव ने पूछना शुरू किया- "हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?"

कृष्ण ने कहा- "सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।"

उद्धव- "कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आजाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया। कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।

किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया? आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं? चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा! आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे! आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!

उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे! अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे! इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया! लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं? उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है! एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया? अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?
बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा? क्या यही धर्म है?"

इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं! उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले- "प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है। उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं। यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।"

उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- "दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा। जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता? पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार? चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की! और वह यह- उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए! क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं! इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी! इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!

अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही! तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा! उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!

जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर- 'हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम' की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला। जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया। अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?"

उद्धव बोले- "कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई! क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?" कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा "इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?"

कृष्ण मुस्कुराए- "उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है। न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ। मैं केवल एक 'साक्षी' हूँ। मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ। यही ईश्वर का धर्म है।"

"वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण! तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे? हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे? आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?" उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!

तब कृष्ण बोले "उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो। जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे? तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे। जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है! अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?"

भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले - प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। 'प्रार्थना' और 'पूजा-पाठ' से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी 'पर-भावना' है। मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि 'ईश्वर' के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है। गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।

सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है। सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।

अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे। वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास हुआ, वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया! यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!

तत-त्वम-असि! अर्थात... वह तुम ही हो।।
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🎉 Just completed level 3 and am so excited to continue growing as a creator on Facebook!Jai Shree Govinda 🙏🙏🙏
22/05/2025

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Jai Shree Govinda 🙏🙏🙏

लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥I take refuge in the ...
17/04/2024

लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥

I take refuge in the feet of Sri Ramachandra, who is the delight of the world, who is courageous on the battlefield,
whose eyes are like blue lotuses, who is the Lord of the Raghu Dynasty, who is an embodiment of kindness and the treasure house of compassion.

मैं श्री रामचन्द्र के चरणों में शरण लेता हूँ, जो संसार का आनंद है, जो युद्ध के मैदान में साहसी हैं,
जिनकी आँखे नीले कमल के समान हैं, जो रघु वंश के स्वामी हैं और जो दया की मूर्ति तथा करुणा का भण्डार है।

Wishing you all a Blissful Ram Navami, Shri Ram Jai Ram Jai Jai Ram 🙏🙏🙏🙏🙏🙏

सभी भारतीयों को रामलला के प्राणप्रतिष्ठा की हार्दिक शुभकामनाएं,श्री राम राम रामेती रमे रामे मनोरमे, सहस्त्र नाम ततुल्यम ...
22/01/2024

सभी भारतीयों को रामलला के प्राणप्रतिष्ठा की हार्दिक शुभकामनाएं,

श्री राम राम रामेती रमे रामे मनोरमे, सहस्त्र नाम ततुल्यम श्रीराम वरानने,

जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम

14/01/2024

🌞
*उत्तरायण सूर्य* आप के स्वप्नों को नई ऊष्मा प्रदान करे, यश एवं कीर्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि हो, परिजनों सहित स्वस्थ , प्रसन्न एवं दीर्घायु हों।
*मकर संक्रांति* पर्व जीवन में ढेरों खुशियां लेकर आए...
*हार्दिक शुभकामनाएँ।*

*उत्तरायण सूर्य* तुमच्या स्वप्नांना नवी ऊब देईल, तुमची कीर्ती आणि वैभव हळूहळू वाढत जावो, तुम्ही आणि तुमच्या कुटुंबातील सदस्यांना निरोगी, आनंदी आणि दीर्घायुष्य लाभो.

*मकर संक्रांत* हा सण आयुष्यात खूप आनंद घेऊन येवो...
*हार्दिक शुभेच्छा.*

तिळगुळ घ्या गोडगोड बोला 🙏🙏

🌞
May *Uttarayan Sun* provide new warmth to your dreams, may your fame and glory gradually increase, may you along with your family members be healthy, happy and long lived.

May the festival of *Makar Sankranti* bring lots of happiness in life...
*Heartiest wishes.*

Jai Govinda, Shree Govinda 🙏🙏🙏🌄🌄🌄

रूप चौदस के इस शुभ दिवस परप्रभु आपको शारीरिक ,वैचारिक एवं आध्यात्मिक सुंदरता का वरदान देवें !🌹🌹🌹राम राम जी🙏On this auspi...
11/11/2023

रूप चौदस के इस शुभ दिवस पर
प्रभु आपको शारीरिक ,वैचारिक एवं आध्यात्मिक सुंदरता का वरदान देवें !
🌹🌹🌹राम राम जी🙏

On this auspicious day of Roop Chaudas
Lord gives you the blessing of physical, ideological and spiritual beauty!
🌹🌹🌹Ram Ram ji🙏

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