14/01/2016
(((((लोहड़ी पर विशेष )))))
लोहड़ी पर बात करने से पहले कुछ बातों पर चर्चा जरुरी है।
पंजाब से सम्बन्ध कारन हम सभी पंजाबी कहलाते हैं, वहां किसी भी सम्प्रदाय से सम्बन्धी को पंजाबी ही कहा जायेगा। पर सिख या खालसा कहलवाने वालों को पंजाबी कहा जाना पंजाब की मूल भावना से उसकी मिटटी से रूबरू होने जैसा है।
जब खालसा पंथ की बात करते हैं तो यह याद रखना चाहिए कि यह एक पंथक और धार्मिक भावना है। पर जब हम सांस्कृति की बात करेंगे तो पंजाब की सांस्कृतिक विरासत भी जो की बहुरंगी है पंथ से अलग होते हुए भी अलग नहीं कही जा सकती। क्यूँ ?
हमारा पंजाब एक कृषि प्रधान प्रदेश है और १६९९ खालसे के प्रगट होने के पहले से ही पंजाब में अनेकों सांस्कृतिक त्यौहार वहां के किसानों द्वारा मनाये जाते रहे हैं। इनमें से लोहड़ी और वैसाखी मुख्य हैं।भारत में लोहड़ी और वैसाखी से जुडी अनेकों अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं, पर गुरु का खालसा वैसाखी सिर्जना दिवस के रूप में खालसा प्रगट होने के बाद से मनाते आ रहा है। और इसी कड़ी में मेला माघी (मुकत्सर) भी हमारी शूरवीरता को प्रदर्शित करता लोहड़ी पर्व के साथ ही आता है।
लोहड़ी हमारे भारत की सांस्कृतिक धरोहर के साथ साथ कई अन्य देशों में भी अपना अलग स्थान रखती है •जैसे Makara Sankranti: Chhattisgarh, Goa, Odisha, Haryana, Jharkhand, Andhra Pradesh, Karnataka, Kerala, Madhya Pradesh, Maharashtra, Manipur, Rajasthan, Sikkim, Uttar Pradesh, Uttarakhand, Bihar, telangana and West Bengal…
• Pongal: Tamil Nadu
• Uttarayan: Gujarat
• Maghi: Haryana, Himachal Pradesh and Punjab. The day before, people of Punjab celebrate Lohri.
• Bhogali Bihu: Assam
• Shishur Saenkraat: Kashmir Valley
• Khichdi: Uttar Pradesh and western Bihar
• Makara Sankramana: Karnataka
अन्य देशों में
• Nepal: Maghe Sankranti
• Thailand:Songkran
• Laos: Pi Ma Lao
• Myanmar: Thingyan
• Cambodia: Moha Sangkran
• Sri Lanka: Pongal, Uzhavar Thirunal
धार्मिकता और संस्कृति ये दोनों अलग-अलग बातें हैं , बहस का मुद्दा ही नहीं है , बस यही कहना मुनासिब होगा की सांस्कृतिक विरासत भी देश की धरोहर होती है और इसको संभाल कर रखना हम सभी का कर्त्तव्य भी है, पर हाँ बहुत जरुरी है की हम अपनी खालसा की पहचान पर लगातार पहरा भी दें।क्यूंकि हमारा न्यारापन ही हमारे होने का एहसास करवाता है। हाँ एक बात और भांगड़ा के बारे में भी बात होनी चाहिए , गुरबानी में दर्ज है "नाच रे मन गुर के आगे" अर्थात हम उस परमेश्वर के हुकम के गुलाम होकर रहें।हमने दुनियावी नाच को समझकर उस गुरु के ताल पर नाचना है। दूसरी और भांगड़ा की वेशभूषा है जो की सिखों के बिना अधूरी है। चूँकि भांगड़ा धार्मिक न होते हुए एक संस्कृति से सम्बन्ध रखता है , इसलिए पंजाब की पंजाबियत में १४६९ के बाद सिखों की आमद से पंजाब की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को एक नया आयाम मिला।
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असल में लोहड़ी के त्यौहार के साथ कोई धार्मिक कहानी तो नहीं जुडी हाँ बेटी बचाओ की कहानी जरूर जुडी है ।
एक ब्राह्मण की दो बेटी थी सुन्द्रिये और मुंदरिये दोनों का रिश्ता उसने बरादरी में ही किया था लेकिन वहा का मुग़ल नबाव उन दोनों लड़कियो से शादी करना चाहता था । ब्राह्मण बहुत दुखी था भावी दूल्हे के घर वाले भी डरे हुए थे । वही गांव का एक शख्श दुल्ला भट्टी बहुत योद्धा था जब उसे मामले का पता चला तो उसने दोनों बेटियो की शादी वही जंगल में आग जला कर करा दी और दोनों परिवारो की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली और उपहार स्वरूप शक्कर भी दी ।
लेकिन बेटियो से जुडी लोहड़ी तो हम लोग भूल गए और बेटो की लोहड़ी मनाने लग गए ।। आओ सब मिल कर बेटियो की भी लोहड़ी मनाये ।।।।।
हो सकता है में अपनी भावना को सही तरीके से न रख पाया हूँ , पर आप मेरी मदद कर सकते हैं।अपने विचार मुझ तक जरूर पहुंचाएं।