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🙏🌷 #भातृभोज्य_और_भूतभोज्य_के_बिना🙏🌹             🌹 #इष्टभृति_पूर्ण_नहीं_होती🌹  #प्रश्न :- क्या इष्टभृति के अंग के रूप में...
18/09/2022

🙏🌷 #भातृभोज्य_और_भूतभोज्य_के_बिना🙏🌹
🌹 #इष्टभृति_पूर्ण_नहीं_होती🌹

#प्रश्न :- क्या इष्टभृति के अंग के रूप में इष्ट, इष्टभ्राता और भूतगण के लिए यानी तीन जगहों पर प्रतिदिन अलग-अलग नैवेद्य निवेदन किया जाय तो वह भी इष्टभृति होगी ?।

#श्रीश्रीठाकुर - इष्टप्रीति को लक्ष्य कर ही भातृभोज्य और भूतभोज्य भी उत्सर्ग करना है। सब मिलकर integrated ( संहत) एक ही चीज है। अपने भरण की बातें सोचने के पहले हमें सर्वप्रथम इष्ट, गुरूजन, गुरूभ्राता एवं भूतगण के भरण के बारे में सोचना है, उसके लिए वास्तविक रूप से जितना संभव होगा, उतना करेंगे। इसके जरिये हमारे मस्तिष्क में यह बात बैठी रहेगी कि इष्ट सेवा तथा इष्ट के लिए परिवेश की सेवा ही हमारे जीवन में मुख्य है। ऐसी चिन्ता यदि हमारे मस्तिष्क और हमारे आचरण में आ जाती है तो दरिद्रता, अयोग्यता और अलक्ष्मी वहाँ स्थान नहीं पा सकती है। इसीलिए इष्टभृति है धर्म, अर्थात् जीवन वृद्धि का corner stone (प्रधान भित्तिप्रस्तर) । इष्टभृति के रूप में नित्य भोज्य या नैवेद्य उत्सर्ग करने की विधि है पर उसे रखने एवं महीने के अन्त में इष्टस्थान पर पहुँचाने में वास्तविक असुविधा है। इसीलिए भोज्य के अनुरूप पैसा रख देने से ही काम चल जाता है।
इष्टभृति करने की बेला में इष्टभृति, भूतभोज्य और भातृभोज्य यदि पृथक भाव से तीन डब्बे या टुकड़े में बाँधकर चिन्हित कर रखो तो उसमें कोई दोष नहीं। पूरे माह में जिसके बाबत जितना निवेदित होगा उसी अनुसार महीना पूरा होने पर दोगे। पर यह स्मरण रखना है कि इष्टभरण ही मुख्य है, यही वृक्ष है भूतभोज्य और भातृभोज्य उसकी शाखाएं है। यदि कोई इष्टभृति नहीं करता है तो सिर्फ भूतभोज्य और भातृभोज्य का कोई मूल्य नहीं है। इष्टभृति के अंग के रूप में भूतभोज्य और भातृभोज्य है। "यह बात भी सही है कि इष्टभृति की पूर्णांगता के लिए भूतभोज्य और भातृभोज्य आवश्यक रूप से देना है।" तीनों के पृथक-पृथक उत्सर्ग करने के प्रसंग में ही मैं इतनी बातें कह रहा हूँ। अलग-अलग निवेदन भी किया जा सकता है, यह जानकर कोई यह न सोच बैठे कि तीनों का एक ही मूल्य है। पृथक होकर भी पृथक नहीं है। सबको मिलाकर ही इष्टभृति पूर्ण होती है, यह असली बात है भूतभोज्य और भातृभोज्य, इष्टभृति और इष्टप्रीति को लक्ष्य करके ही हर तीसवाँ दिन पर दक्षिणा और संगठनी के साथ इष्टभृति देने की विधि है। पहले इष्टभृति भेजने के बाद ही भूतभोज्य और भातृभोज्य दान की बात उठनी चाहिए। यदि कोई हर दिन भूतभोज्य और भातृभोज्य नहीं रख सके एवं महीने के अंत में निवेदित इष्टार्थ पूर्ण रूप से इष्टस्थान में भेजकर उसे पृथक भाव से दे तो भी काम चल सकता है। परिवेश की सेवा के मामले में हम मानो concentric (सुकेन्द्रिक) अभ्यास को अक्षुण्ण रखें। उसे ही इष्टप्राण सेवा कहते हैं। उसके माध्यम से ही मनुष्य को सुकेन्द्रिक बनाया जा सकता हैं, उसमें ही मनुष्य तर जाता है। अन्यथा मनुष्य की वृत्तियों में तेल मालिश करते करते जीवन शेष हो जाता है। तुम अपने को उजाड़कर वास्तविक रूप से किसी दूसरे के लिए नहीं कर सकते हो। सभी लोग अपनी अपनी प्रवृत्ति के पोषण के लिए तुम्हें exploit (शोषण) करने लगेंगे। उसमें बुराई के सिवाय न अपनी भलाई कर सकोगे और न दूसरे की। उसमें वे योग्य नहीं बनते हैं शक्तिमान नहीं होते हैं और सुनियंत्रित नहीं होते हैं।

#प्रश्न :- शैलेन-दा (भट्टाचार्य) कोई व्यक्ति हो सकता है अन्य कार्यों को बहुत मन से करता है, परन्तु संभवतः इष्टभृति का परिमाण बढ़ाया नहीं है, उसका क्या होगा ?

श्री श्रीठाकुर - इष्टभृति progressive ( वृद्धिशील) नहीं होने पर psychophysical concentration ( मानसिक और शारीरिक एकाग्रता) progress (वृद्धिलाभ) नहीं करता है।

#प्रश्न :- केष्टो दा :- जैसे मैं दैनिक पाँच रूपये इष्टभृति करता हूँ, जिसके चलते मेरे लेखन कार्य का बहुत समय और शक्ति इसमें व्यय करना पड़ता है। कार्य कम हो जा रहा है। कौन अच्छा है?

#श्रीश्रीठाकुर-:- पाँच रूपया इष्टभृति कर रहे हैं, इसका अर्थ है दैनन्दिन जीवन का सब कार्य को निचोड़ने पर ऐसा कर पा रहे हैं। उससे एक intuitive impression ( अन्तर्दृष्टिमूलक छाप पड़ रहा है, उसका फल हरेक कार्य में मिलेगा। पहले जो कार्य जितने समय में करते थे, उससे बहुत कम समय में संभवतः उसे सहज भाव से कर लेते हैं। इसीलिए यह सभी कार्यों के लिए अच्छा होता है।

🌷🙏वंदे पुरुषोत्तम 🌷🙏

.🌷........" #यदि_कर्मी_बनना_चाहते_हो ...।".........🌹"यदि कर्मी बनना चाहते हो तो अपने प्रति तुम्हें कठोर बनना पड़ेगा। तुम...
18/09/2022

.🌷........" #यदि_कर्मी_बनना_चाहते_हो ...।".........🌹

"यदि कर्मी बनना चाहते हो तो अपने प्रति तुम्हें कठोर बनना पड़ेगा। तुम संभवतः कष्ट झेलकर चल रहे हो, पर तुम्हारा एक सहायक कर्मी संभवत: पच्चीस रूपये भाड़ा देकर टैक्सी करके सेंट लगाकर तुम्हारे सामने घूमता-फिरता है। उससे तुम्हें थोड़ा भी क्षोभ नहीं होता है। तुम्हें संभवत: एक जगह जाने की जरूरत है, पैदल 'जाने की ही व्यवस्था करोगे। तुम खाये बगैर हो। और तुम्हारे सामने दूसरा व्यक्ति संभवत: राजसी खान-पान पाकर आराम फरमा रहा है। वह देखकर तुम थोड़ा भी दुःखित नहीं होंगे, वरन् खुश होगे। यदि दूसरा कोई खाए बगैर रहता है तो उसके लिए कुछ माँग सकते हो। कहोगे, यदि तुम्हें कोई दिक्कत नहीं हो तो अमुक को दो पुरियाँ दे दो। अपने लिए माँगने मत जाओ। कहीं दूसरी जगह से जुटा लो। उदाहरणार्थ, चुनी और तुम कलकत्ता गए हो। चुनी ने किसी प्रकार एक फटा-चिटा बिछावन जुटाया, उस पर ही सोकर संतुष्ट रहोगे। तुम अगर अच्छी चीज कुछ नहीं पाओ तो उसके लिए तुम्हें तो कोई दुःख होना ही नहीं चाहिए, प्रत्युत चुनी के लिए वैसी सुव्यवस्था यदि हुई है, उसके लिए तुम खुश होओगे, और यह सोचोगे कि मुझे ही उसके लिए ऐसी व्यवस्था करना उचित था। परमपिता की दया से ऐसा हो गया है, यह मेरा सौभाग्य है। ऐसा जो वह उपभोग कर पा रहा है, वह मेरा ही उपभोग है। अवश्य ऐसा करने जो कहा रहा हूँ, सब समय लक्ष्य रखना होगा जो भी क्यों न करो, स्वास्थ्य को बनाए रखना है। सबसे कम खर्च में मैं ऐसी व्यवस्था करूँगा, जिससे अस्वस्थ नहीं होऊँ। एक समय मेरा दैनिक आहार था मात्र तीन पैसे का, उसके द्वारा सूखा नारियल और चम्पा केला खरीदकर खाता था। कभी-कभी उस पैसे से मूढ़ी भी खरीदता था। किसी तरह स्वास्थ्य को बनाए रखता था। इस तरह यदि तुम सभी अवस्थाओं में खुश रहो, तो अपने दुःख-दारिद्रय के बीच भी दूसरे के ऐश्वर्य एवं उपभोग को देखकर ईष्यान्वित होने के बजाय सुखी होओगे, उस समय लक्ष्मी तुम्हारे प्रति प्रसन्न होकर तुम्हें भरपूर कर देगी। वह देखेगी-उसके साथ तो पार पाना मुश्किल है। किसी प्रकार भी वह दुःख नहीं पाता है, सब अवस्था में ही राजी है, और मनुष्य के प्रति इसका आत्मबोध, शुभेच्छा एवं सम्प्रीति का कोई अंत नहीं है। इसे व्यर्थ में कष्ट देने से क्या लाभ है? सुख-ऐश्वर्य ही इसका प्राप्य है। उसके योग्य भी है। उनकी दया से तुम जब फिर पाओगे, उसे फिर दस लोगों को दोगे, जिन्हें जरूरत है यानि जो पीड़ित लोग हैं उनके बीच बाँटोगे तरबूज, लीची, रूपये-पैसे, खान-पान, कपड़े-लत्ते, कितने क्या जुट जायेंगे। सब देते रहोगे। उससे तुम्हारी प्राप्ति का पथ और खुल जाएगा। लक्ष्मी कहेगी, इसने तो मुझे पागल बना दिया, इसके गुणों का कोई अंत नहीं। इसे सबकुछ देकर भी मन की साध नहीं मिटती है। "

(आलोचना प्रसंग/भाग-२० /दिनांक- १३-०५-१९५१' से)

- श्री श्रीठाकुर

17/09/2022
17/09/2022

🙏🙏🙏

 #বিপদে পড়লে মানুষ ঘাবড়ে যায়। আমি বিপদে পড়লে কাজে যুক্ত হই। তাই সবাইকে বলি কর্মে যুক্ত থাকো, ঠাকুরের প্রতি বিশ্বাস র...
16/09/2022

#বিপদে পড়লে মানুষ ঘাবড়ে যায়। আমি বিপদে পড়লে কাজে যুক্ত হই। তাই সবাইকে বলি কর্মে যুক্ত থাকো, ঠাকুরের প্রতি বিশ্বাস রাখো।

কর্মহীন প্রার্থনা ভালো নয়।

- বিধি পালন করলে বিধাতার আশীর্বাদ পাওয়া যায়, লক্ষ্যে অবিচল থাকতে হবে।

তিনি শুধুই দেবালয়ে থাকেন না, ভক্তরা যেখানে তাঁর গুণকীর্তন করেন সেখানেই তিনি থাকেন।

- তিনি চরাচরে ব্যপ্ত হয়েছেন।

প্রদীপের তলায় অন্ধকার সেটা প্রদীপের আগুনের নয়।

অন্যান্য ব্যবহারকেও নিয়ন্ত্রিত করতে হয়।

– ঠাকুরকে যে ভালোবাসে সে পথ খুঁজে পায় । আগে নিজের বিশ্বাসকে পোক্ত করেন।

যাজন শর্তসাপেক্ষে হয় না। চারপাশে ঠাকুরের মানুষ তৈরী করেন।"

~পরমপুজ্যপাদ শ্রীশ্রীআচার্য্যদেব।।
(একশো দিনের পরিক্রমা)

" ତୁମର ଠାକୁରତ୍ବ ଜାଗ୍ରତ ନ ହେଲେ କେହି ତୁମର କେନ୍ଦ୍ରବି ନୁହଁନ୍ତି, ଠାକୁର ବି ନୁହଁନ୍ତି— ଫାଙ୍କି ଦେଲେ ତାହାହିଁ ପିଇବ "     ଶ୍ରୀଶ୍ରୀପି...
16/09/2022

" ତୁମର ଠାକୁରତ୍ବ ଜାଗ୍ରତ ନ ହେଲେ କେହି ତୁମର କେନ୍ଦ୍ରବି ନୁହଁନ୍ତି, ଠାକୁର ବି ନୁହଁନ୍ତି— ଫାଙ୍କି ଦେଲେ ତାହାହିଁ ପିଇବ "


ଶ୍ରୀଶ୍ରୀପିତୃଦେବ ପ୍ରଶ୍ନ କରିଲେ— ତୁମର ଠାକୁରତ୍ବ ନ ଜାଗିଲେ କେହି ତୁମର କେନ୍ଦ୍ର ବି ନହଁନ୍ତି, ଠାକୁରବି ନୁହଁନ୍ତି— ଏକଥାକର ଅର୍ଥ କ'ଣ ?

(ଶ୍ରୀଶ୍ରୀ ପିତୃଦେବ ନିଜେହିଁ ଉତ୍ତର ଦେଲେ)
— ତା'ର ମାନେ ମୁଁ ତାଙ୍କର (ଶ୍ରୀଶ୍ରୀଠାକୁର) ଅନୁଶାସନବାଦ ଯଦି ନ ମାନି ଚଳେ ତା' ହେଲେ ତାଙ୍କୁ ଫାଙ୍କି ଦେଲି । ଫାଙ୍କି ଦେଇ ଯଦି ତାଙ୍କୁ ଠାକୁର କହେ ତା' ହେଲେ ତାଙ୍କୁ ମାନିବା ହେଲା ନାହିଁ । ଫାଙ୍କି ଦେଲେ, ତାଙ୍କୁ ମାନି ଚଳିଲିନି, ଏହା ଫଳରେ ମୋ ମଧ୍ୟରେ ଠାକୁରତ୍ବଜାଗିଲା ନାହିଁ । ଯେଉଁ ଯେଉଁ ଗୁଣ ନେଇ ସିଏ ଠାକୁର ମୋ ମଧ୍ୟରେ ସେ ସବୁର କୈାଣସି ପ୍ରକାଶ ଘଟିଲାନି । ଫଳରେ ଠାକୁରଙ୍କୁ ଧରି ଚାଲିବାର ଯେଉଁ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ପରିପୂରିତ ହେଲା ନାହିଁ । ଆମମାନେ ସମସ୍ତେ ସେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ପରିପୂରିତ ହେଲା ନାହିଁ । ଆମେମାନେ ସମସ୍ତେ ଠାକୁରଙ୍କ ଦୀକ୍ଷା ନେଇଛୁ, ଠାକୁରଙ୍କୁ ଧରି ଚାଲିବାର ଚେଷ୍ଟା କରୁଛୁ । ଏହିଭାବେ ଚାଲିବାର ଗୋଟେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ଅଛି ତ? ଆମେମାନେ କ'ଣ ପାଇଁ ଠାକୁରଙ୍କୁ ଧରି ଚାଲିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛୁ ?
କୃତିଦୀପା— ଠାକୁରଙ୍କ ମନ ଭଳି ହେବୁ ବୋଲି ।
ଶ୍ରୀଶ୍ରୀପିତୃଦେବ— ହଁ, ଠାକୁରଙ୍କୁ ଧରି ତାଙ୍କ ମନ ଭଳି ହୋଇଉଠିବା ହିଁ ଆମମାନଙ୍କର ସାଧନା । ଆମେମାନେ ଠାକୁରଙ୍କ ଦୀକ୍ଷା ନେଇଛୁ । ଦୀକ୍ଷା ନେଇ ଯଦି ତାଙ୍କ ଅନୁଶାସନବାଦ ଠିକ୍ ଠିକ୍ ନ ମାନି ଚାଲୁ ତା' ହେଲେ ବୁଝିବାକୁ ହେବ ମୁଁ ଫାଙ୍କି ଦେଲି ଏବଂ ତା'ର ଫଳ ବି ମତେ ପାଇବାକୁ ହେବ । ଠାକୁରତ୍ବ ଜଗାଇବାକୁ ହେଲେ ତାଙ୍କୁ ଜୀବନର କେନ୍ଦ୍ର କରି ରଖିବାକୁ ହେବ— ତାଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଦେଶ ଅନୁଯାୟୀ ଜୀବନ ପରିଚାଳନା କରିବାକୁ ହେବ ।

(କିଛି ବିଷୟକୁ ସଂଗୃହିତ କରାଯାଇ ଅଛି)
•ଇଷ୍ଟ ପ୍ରସଙ୍ଗ,ତା-୦୩·୦୪·୭୯ଖ•

***  ବିଶ୍ରାମର   ପ୍ରୟୋଜନ  ସମ୍ବନ୍ଧରେ,  ଶ୍ରୀଶ୍ରୀ ଠାକୁର  ***  ସୁବୋଧ  ଭାଇ  =   ଯେକୌଣସି   ପ୍ରକାର   କର୍ମ  ମଣିଷ   କରୁ  ନା  କାହିଁ...
14/09/2022

*** ବିଶ୍ରାମର ପ୍ରୟୋଜନ ସମ୍ବନ୍ଧରେ, ଶ୍ରୀଶ୍ରୀ ଠାକୁର ***

ସୁବୋଧ ଭାଇ = ଯେକୌଣସି ପ୍ରକାର କର୍ମ ମଣିଷ କରୁ ନା କାହିଁକି, Fatigue ( ଶ୍ରାନ୍ତ ) ହୋଇପଡ଼ିଲେ ତ ବିଶ୍ରାମର ପ୍ରୟୋଜନ, ନଚେତ୍ କ୍ଷତି ପୂରଣ କିପରି ହେବ ?

ଶ୍ରୀଶ୍ରୀ ଠାକୁର = Fatigue layer ( ଶ୍ରାନ୍ତିର ସ୍ତର ) ପାର ହୋଇଗଲେ ପୁଣି ନୂତନ ଶକ୍ତି ସଞ୍ଚାରିତ ହୋଇଥାଏ, ଏହା ମଧ୍ୟ ଠିକ୍ । ଜେମସଙ୍କର psychology ( ମନୋବିଜ୍ଞାନ ) ପଢ଼ି ଦେଖିବୁ, ଶୁଣିଛି ସେଥିରେ ମଧ୍ୟ ଏଇକଥା ଅଛି । ପୁଣି ନିଜକୁ କାମରେ ଲଗାଇ, ନିଜେ ମଧ୍ୟ ଏହା ଲକ୍ଷ କରି ଦେଖିପାରୁ । କୌଣସି ଗୋଟିଏ କାମ କରୁକରୁ ହୁଏତ ମନେହେଲା, ଆଉ ପାରୁନାହୁଁ, ଶରୀର ଆଉ କୁଳାଉ ନାହିଁ, ସେତେବେଳେ ଯଦି ଥକାମାରି ନ ଯାଉ, ଲାଗିରହୁ ତାହେଲେ ହୁଏତ କିଛି ସମୟପରେ ଦେଖିବୁ ତୋର ସେଇ ଅବସାଦ କଟି ଯାଉଛି, ଏବଂ ନୂତନ ଗୋଟିଏ ସ୍ଫୂର୍ତ୍ତି ଓ ଉତ୍ସାହର ଜୁଆର ମାଡ଼ିଆସୁଛି ସର୍ବାଙ୍ଗରେ । ଏଇପରି ହେଲେ ଆଉ ସେ କାମ ଛାଡ଼ିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରିବନାହିଁ, ଇଚ୍ଛା ହେବ ଆହୁରି କରେ ।
ତା' ବୋଲି ବିଶ୍ରାମର ଯେ ପ୍ରୟୋଜନ ନାହିଁ ସେ କଥା କହୁନାହିଁ । ଖୁବ୍ କମ୍ ବିଶ୍ରାମ କରି ମଧ୍ୟ ଚଳିହୁଏ, ସେ ବିଷୟରେ କୌଣସି ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ । ଆଉ, ମନର ଖୋରାକ ଯଦି ପୁରାପୁରି ଠିକ୍ ଥାଏ, ତେବେ ଅତି ସାଧାରଣ ଖାଦ୍ୟ ଖାଇ ମଧ୍ୟ ମଣିଷର ଶରୀର ସୁସ୍ଥ ଓ କର୍ମଠ ରହିପାରେ । ମନର ଖୋରାକ ପ୍ରତି ନଜର ନଦେଇ ଆମେ ଶରୀରର ଖୋରାକ କଥାହିଁ ବେଶିକରି ଭାବିଥାଉ । ସେଥିପାଇଁ ଶରୀରକୁ ଯେତେ ଖୋରାକି ଦେଲେ ମଧ୍ୟ ଶରୀର ଆଉ କର୍ମକ୍ଷମ ହୋଇ ରହେନାହିଁ ।

( ଆଲୋଚନା-ପ୍ରସଙ୍ଗେ = ଖଣ୍ଡ - 3 , ଇଂ 04, 04, 1942 )
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