19/02/2026
बहुत प्राचीन समय की बात है। देवताओं और दैत्यों के बीच युद्ध चल रहा था। अमरत्व प्राप्त करने के लिए सभी ने मिलकर समुद्र मंथन करने का निर्णय लिया। मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। भगवान विष्णु ने कच्छप (कूर्म) अवतार लेकर पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला।
मंथन शुरू हुआ। धीरे-धीरे समुद्र से अनेक रत्न निकले—लक्ष्मी जी, कामधेनु, ऐरावत आदि। लेकिन अचानक समुद्र से एक भयंकर विष निकला, जिसका नाम था हलाहल। वह विष इतना घातक था कि उसकी ज्वाला से पूरा सृष्टि लोक जलने लगा। देवता-दैत्यों में हाहाकार मच गया।
सभी देवता सहायता के लिए भगवान शिव के पास पहुँचे। शिवजी ने संसार की रक्षा के लिए बिना विलंब उस विष को अपने हाथों में लिया और पी लिया।
जैसे ही विष उनके कंठ तक पहुँचा, माता पार्वती ने उनका गला पकड़ लिया ताकि विष शरीर में न फैले। विष उनके कंठ में ही रुक गया और उनका गला नीला हो गया। तभी से शिवजी को नीलकंठ महादेव कहा जाने लगा।
✨ इस कथा से सीख
सच्चा त्याग वही है जो दूसरों की रक्षा के लिए हो।
शिवजी संकट में अपने भक्तों का साथ कभी नहीं छोड़ते।
भक्ति और विश्वास से हर संकट टल सकता है।
🕉️ हर हर महादेव!
#वटनाथ_धाम_नौजलिया