23/05/2026
कंकरियां
आला हज़रत क़िब्ला फरमाते हैं; 10 वीं को सुबह मुज़दल्फा से मीना जाते हैं तो आज वहां एक जमरा पर कनकरियां मारेंगे इसके लिए मुस्तहब कि 7 संगरेज़े यहां से उठा ले और धोना तो हर तरह मुस्तहब है कहीं से उठायें इससे ये भी मालूम हुआ कि संगरेज़े हर जगह से लेने जायज हैं हाँ जमरात के पास से ना उठाये कि फ़ेंकी हुई कनकरियां होती हैं और हदीस मे है "जिसकी क़ुबूल होती हैं फ़रिश्ते उठा ले जाते हैं वरना तुम्हें पहाड़ नज़र आते इससे मालूम हुआ कि जो पड़ी रहती हैं वो मआज़ अल्लाह मरदूद होती हैं तो उन्हें अपने हज मे क्यों इस्तेमाल कीजियेगा गौर करो ये भी हमारे नबी अलैहिस्सलाम का खुला मोजिज़ा है इस्लाम मे हज होते 1300 बरस के करीब गुज़रे हर साल लाखों बंदगान ए खुदा होते हैं एक रिवायत मे 6 लाख एक रिवायत मे 8 लाख हज़रत हसन बसरी के दौर मे 15 लाख इनसे कम होते हैं तो फ़रिश्ते अदद पूरा करते हैं और क़ायदा है कि ऐसी जगह अदद ज़ाईद माखुज होता है कि कम उसका मुनाफी नहीं फ़क़ीर जिस साल हाजिर हुआ यानी 1295 हिजरी हाज़ीयों की मरदुम शुमारी 18 लाख सुनी गयी फिर हर शख्स 49 या 70 कंकरिया मारता है 49 ही रखिये तो 15 लाख मे ज़र्ब देने से (1500000×49=73500000) सात करोड़ 35 लाख कंकरिया जमा हुई जमा कीजिये तो हर साल पहाड़ बनता है फिर जब देखिये तो जमरे खाली होते हैं मीना मे कुछ गिनती कनकरिया नज़र आती हैं ये खुदा कि शान है और हकीकत ए इस्लाम कि बुरहान।
📚 (फतावा रज़विया जिल्द 10, सफहा 802)