वृन्दावन

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🙏गिरिराज जी का पृथ्वी पर आगमन🙏🌹जब भगवान पृथ्वी पर अवतार लेने वाले थे तब भगवान ने गौलोक को नीचे पृथ्वी पर उतरा और गोवर्धन...
19/11/2020

🙏गिरिराज जी का पृथ्वी पर आगमन🙏

🌹जब भगवान पृथ्वी पर अवतार लेने वाले थे तब भगवान ने गौलोक को नीचे पृथ्वी पर उतरा और गोवर्धन पर्वत ने भारतवर्ष से पश्चिमी दिशा में शाल्मली द्वीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया.

🌹एक समय मुनि श्रेष्ठ पुलस्त्य जी तीर्थ यात्रा के लिए भूतल पर भ्रमण करने लगे उन्होंने द्रोणाचल के पुत्र श्यामवर्ण वाले पर्वत गोवर्धन को देखा उन्होंने देखा कि उस पर्वत पर बड़ी शान्ति है जब उन्होंने गोवर्धन कि शोभा देखी तो उन्हें लगा कि यह तो मुमुक्षुओ के लिए मोक्ष प्रद प्रतीत हो रहा है.

🌹मुनि उसे प्राप्त करने के लिए द्रोणाचल के समीप गए पुलस्त्य जी ने कहा - द्रोण तुम पर्वतों के स्वामी हो मै काशी का निवासी हूँ तुम अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दो काशी में साक्षात् विश्वनाथ विराजमान है मै तुम्हारे पुत्र को वहाँ स्थापित करना चाहता हूँ उसके ऊपर रहकर मै तपस्या करूँगा.

🌹पुलस्त्य जी की बात सुनकर द्रोणाचल पुत्र स्नेह में रोने लगे और बोले- मै पुत्र स्नेह से आकुल हूँ फिर भी आपके श्राप के भय से मै इसे आपको देता हूँ फिर पुत्र से बोले बेटा तुम मुनि के साथ जाओ.

🌹गोवर्धन ने कहा - मुने मेरा शरीर आठ योजन लंबा ,दो योजन चौड़ा है ऐसी दशा में आप मुझे किस प्रकार ले चलोगे.

🌹पुलस्त्य जी ने कहा - बेटा तुम मेरे हाथ पर बैठकर चलो जब तक काशी नहीं आ जाता तब तक मै तुम्हे ढोए चलूँगा.

🌹गोवर्धन ने कहा - मुनि मेरी एक प्रतिज्ञा है आप जहाँ कहि भी भूमि पर मुझे एक बार रख देगे वहाँ की भूमि से मै पुनः उत्थान नहीं करूँगा.

🌹पुलस्त्य जी बोले - में इस शाल्मलद्वीप से लेकर कोसल देश तक तुम्हे कहीं नहीं रखूँगा यह मेरी प्रतिज्ञा है.

🌹इसके बाद पर्वत पाने पिता को प्रणाम करने मुनि की हथेली पर सवार हो गए.पुलस्त्य मुनि चलने लगे. और व्रज मंडल में आ पहुँचे गोवर्धन पर्वत को अपनी पूर्व जन्म की बातो का स्मरण था व्रज में आते ही वे सोचने लगे की यहाँ साक्षात् श्रीकृष्ण अवतार लेगे और सारी लीलाये करेगे. अतः मुझे यहाँ से अन्यत्र नहीं जाना चाहिये. यह यमुना नदी व्रज भूमि गौलोक से यहाँ आये है. और वे अपना भार बढ़ाने लगे.

🌹उस समय मुनि बहुत थक गए थे, उन्हें पहले कही गई बात याद भी नहीं रही. उन्होंने पर्वत को उतार कर व्रज मंडल में रख दिया.थके हुए थे सो जल में स्नान किया.फिर गोवर्धन से कहा - अब उठो ! अधिक भार से संपन्न होने के कारण जब वह दोनों हाथो से भी नहीं उठा. तब उन्होंने अपने तेज से और बल से उठाने का उपक्रम किया. स्नेह से भी कहते रहे पर वह एक अंगुल भी टस के मस न हुआ.

🌹वे बोले - शीघ्र बताओ ! तुम्हारा क्या प्रयोजन है.

🌹गोवर्धन पर्वत बोला - मुनि इसमें मेरा दोष नहीं है मैंने तो आपसे पहले ही कहा था अब में यहाँ से नहीं उठुगा यह उत्तर सुनकर मुनि क्रोध में जलने लगे और उन्होंने गोवर्धन को श्राप दे दिया.

🌹पुलस्त्य जी बोले - तू बड़ा ढीठ है, इसलिए तू प्रतिदिन तिल-तिल क्षीण होता चला जायेगा.

🌹यो कहकर पुलस्त्य जी काशी चले गए और उसी दिन से गोवर्धन पर्वत प्रतिदिन तिल तिल क्षीण होते चले जा रहे है.

🌹जैसे यह गौलोक धाम में उत्सुकता पूर्वक बढने लगे थे उसी तरह यहाँ भी बढे तो वह पृथ्वी को ढक देगे यह सोचकर मुनि ने उन्हें प्रतिदिन क्षीण होने का श्राप दे दिया.

🌹जब तक इस भूतल पर भागीरथी गंगा और गोवर्धन पर्वत है, तब तक कलिकाल का प्रभाव नहीं बढ़ेगा.

🙏गिरिराज धरण हम तेरी शरण🙏

🙌"जय जय श्री राधे"
हे नाथ!हे मेरे गिरिराज!!मैं आपको भूलूँ नहीं!!!

07/10/2018

This is a list of major Hindu temples in India, by state. India has more than 2 million Hindu temples recorded during the 2001 census, whose number has sub

03/09/2017

गोस्वामी तुलसीदास जी के शिक्षाप्रद दोहे

1. तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग।
सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग॥

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, इस संसार में तरह-तरह के लोग रहते हैं. आप सबसे हँस कर मिलो और बोलो जैसे नाव नदी से संयोग कर के पार लगती है वैसे आप भी इस भव सागर को पार कर लो.

2. आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह॥

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, जिस स्थान या जिस घर में आपके जाने से लोग खुश नहीं होते हों और उन लोगों की आँखों में आपके लिए न तो प्रेम और न ही स्नेह हो. वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की हीं वर्षा क्यों न होती हो.

3. तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, विपत्ति में अर्थात मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है. ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, सत्य और राम ( भगवान ) का नाम.

4. काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान।
तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान॥

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, जब तक व्यक्ति के मन में काम की भावना, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं. तब तक एक ज्ञानी व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता है, दोनों एक ही जैसे होते हैं.

5. दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण॥

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, धर्म का मूल भाव ही दया हैं और अहम का भाव ही पाप का मूल (जड़) होता है. इसलिए जब तक शरीर में प्राण है कभी दया को नहीं त्यागना चाहिए.

6. तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर।
बसीकरन इक मंत्र है, परिहरू बचन कठोर॥

अर्थ : तुलसीदासजी कहते हैं, मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं. किसी को भी वश में करने का ये एक मन्त्र है इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोड़कर मीठा बोलने का प्रयास करे.

7. तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए।
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए॥

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, भगवान् राम पर विशवास करके चैन की बांसुरी बजाओ. इस संसार में कुछ भी अनहोनी नहीं होगी और जो होना उसे कोई रोक नहीं सकता. इसलिये आप सभी आशंकाओं के तनाव से मुक्त होकर अपना काम करते रहो.

8. तुलसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन।
अब तो दादुर बोलिहं, हमें पूछिहै कौन॥

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, वर्षा ऋतु में मेंढकों के टर्राने की आवाज इतनी ज्यादा हो जाती है कि, कोयल की मीठी वाणी उनके शोर में दब जाती है. इसलिए कोयल मौन धारण कर लेती है. अर्थात जब धूर्त और मूर्खों का बोलबाला हो जाए तब समझदार व्यक्ति की बात पर कोई ध्यान नहीं देता है, ऐसे समय में उसके चुप रहने में ही भलाई है.

9. सहज सुहृद गुरस्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥

अर्थ : स्वाभाविक ही हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह दिल से बहुत पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है.

10. मुखिया मुखु सो चाहिऐ, खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक॥

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने-पीने को तो अकेला है, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है.

11. तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।
भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण॥

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, समय ही व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ और कमजोर बनता है. अर्जुन का वक्त बदला तो उसी के सामने भीलों ने गोपियों को लूट लिया जिसके गांडीव की टंकार से बड़े बड़े योद्धा घबरा जाते थे.

23/06/2017

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राधाकुण्डश्री कृष्ण ने जिस दिन अरिष्टासुर का वध किया, उसी दिन रात्रिकाल में इसी स्थल पर श्रीकृष्ण के साथ श्री राधिका आदि...
12/10/2015

राधाकुण्ड

श्री कृष्ण ने जिस दिन अरिष्टासुर का वध किया, उसी दिन रात्रिकाल में इसी स्थल पर श्रीकृष्ण के साथ श्री राधिका आदि प्रियाओं का मिलन हुआ। श्रीकृष्ण ने बड़े आतुर होकर राधिका का आलिंगन करने के लिए अपने कर पल्लवों को बढ़ाया, उस समय राधिका परिहास करती हुई पीछे हट गयी और बोलीं– आज तुमने एक वृष (गोवंश) की हत्या की है। इसलिए तुम्हें गो हत्या का पाप लगा है, अत: मरे पवित्र अंगों का स्पर्श मत करो। किन्तु कृष्ण ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। –प्रियतमे! मैंने एक असुर का वध किया है। उसने छलकर साँड का वेश बना लिया था। अत: मुझे पाप कैसे स्पर्श कर सकता है? राधिका ने कहा- जैसा भी हो तुमने साँड के रूप में ही उसे मारा हैं। अत: गो हत्या का पाप अवश्य ही तुम्हें स्पर्श कर रहा है। सखियों ने भी इसका अनुमोदन किया। प्रायश्चित्त का उपाय पूछने पर राधिकाजी ने मुस्कराते हुए भूमण्डल के समस्त तीर्थों में स्नान को ही प्रायश्चित्त बतलाया।

ऐसा सुनकर श्रीकृष्ण ने अपनी एड़ी की चोट से एक विशाल कुण्ड का निर्माण कर उसमें भूमण्डल के सारे तीर्थों को आह्वान किया। साथ ही साथ असंख्य तीर्थ रूप धारण कर वहाँ उपस्थित हुए। कृष्ण ने उन्हें जलरूप से उस कुण्ड में प्रवेश करने को कहा। कुण्ड तत्क्षणात परम पवित्र एवं निर्मल जल से परिपूर्ण हो गया। श्रीकृष्ण उस कुण्ड में स्नान कर राधिकाजी को पुन: स्पर्श करने के लिए अग्रसर हुए: किन्तु राधिका स्वयं उससे भी सुन्दर जलपूर्ण वृहद कुण्ड को प्रकाश कर प्रियतम के आस्फालन का उत्तर देना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने तुनक-कर पास में ही सखियों के साथ अपने कंकण के द्वारा एक परम मनोहर कुण्ड का निर्माण किया। किन्तु उसमें एक बूँद भी जल नहीं निकला। कृष्ण ने परिहास करते हुए गोपी|गोपियों को अपने कुण्ड से जल लेने के लिए कहा, किन्तु राधिकाजी अपनी अगणित सखियों के साथ घड़े लेकर मानसी गंगा से पानी भर लाने के लिए प्रस्तुत हुई, किन्तु श्रीकृष्ण ने तीर्थों को मार्ग में सत्याग्रह करने के लिए इंगित किया। तीर्थों ने रूप धारणकर सखियों सहित राधिकाजी की बहुत सी स्तुतियाँ कीं, राधिकाजी ने प्रसन्न होकर अपने कुण्ड में उन्हें प्रवेश करने की अनुमति दी। साथ ही साथ तीर्थों के जल प्रवाह ने कृष्णकुण्ड से राधाकुण्ड को भी परिपूर्ण कर दिया। श्रीकृष्ण ने राधिका एवं सखियों के साथ इस प्रिय कुण्ड में उल्लासपूर्वक स्नान एवं जल विहार किया। अर्धरात्रि के समय दोनों कुण्डों का प्रकाश हुआ था। उस दिन कार्तिक माह की कृष्णाष्टमी थी, अत: उस बहुलाष्टमी की अर्द्धरात्रि में लाखों लोग यहाँ स्नान करते हैं।

21/09/2015
17/09/2015

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10/08/2015

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किसी समय श्रीभागुरी ऋषि गोविन्द कुण्ड के तट पर भगवत् प्रीति के लिए यज्ञ कर रहे थे। दूर–दूर से गोप-गोपियाँ यज्ञ के लिए द्...
12/06/2015

किसी समय श्रीभागुरी ऋषि गोविन्द कुण्ड के तट पर भगवत् प्रीति के लिए यज्ञ कर रहे थे। दूर–दूर से गोप-गोपियाँ यज्ञ के लिए द्रव्य ला रही थीं। राधिका एवं उनकी सखियाँ भी दानघाटी के उस पार से दधि, दुग्ध, मक्खन तथा दूध से बने हुए विविध प्रकार के रबडी आदि द्रव्य ला रही थीं। इसी स्थान पर सुबल, मधुमंगल आदि सखाओं के साथ श्रीकृष्ण अपने लाठियों को अड़ाकर बलपूर्वक दान (टोलटैक्स) माँग रहे थे। गोपियों के साथ उन लोगों की बहुत नोक–झोंक हुई। कृष्ण ने त्रिभंग ललित रूप में खड़े होकर भंगि से कहा- क्या ले जा रही हो ?

गोपियाँ– भागुरी ऋषि के यज्ञ के लिए दूध, दही, मक्खन ले जा रही हैं।

मक्खन का नाम सुनते ही मधुमंगल के मुख में पानी भर आया। वह जल्दी से बोल उठा, शीघ्र ही यहाँ का दान देकर आगे बढ़ो।

ललिता– तेवर भरकर बोली– कैसा दान ? हमने कभी दान नहीं दिया।

श्रीकृष्ण– यहाँ का दान चुकाकर ही जाना होगा।

श्रीमती जी– आप यहाँ दानी कब से बने ? क्या यह आपका बपौती राज्य है ?

श्रीकृष्ण– टेढ़ी बातें मत करो ? मैं वृन्दावन राज्य का राजा वृन्दावनेश्वर हूँ।

श्रीमतीजी– सो, कैसे ?

श्रीकृष्ण– वृन्दा मेरी विवाहिता पत्नी है। पत्नी की सम्पत्ति भी पति की होती है। वृन्दावन वृन्दादेवी का राज्य है, अत: यह मेरा ही राज्य है।

ललिता– अच्छा, हमने कभी भी ऐसा नहीं सुना। अभी वृन्दाजी से पूछ लेते हैं।

तुरन्त ही सखी ने वृन्दा की ओर मुड़कर मुस्कराते हुए पूछा– वृन्दे ! क्या यह 'काला' तुम्हारा पति है ?

वृन्दा– (तुनककर) कदापि नहीं। इस झूठे लम्पट से मेरा कोई सम्पर्क नहीं है। हाँ यह राज्य मेरा था, किन्तु मैंने इसे वृन्दवनेश्वरी राधिकाजी को अर्पण कर दिया है। सभी सखियाँ ठहाका मारकर हँसने लगी। श्रीकृष्ण कुछ झेंप से गये किन्तु फिर भी दान लेने के लिए डटे रहे। फिर गोपियों ने प्रेमकलह के पश्चात कुछ दूर भीतर दान–निवर्तन कुण्ड पर प्रेम का दान दिया। और लिया भी।

जतीपुरा गोवर्धनयहाँ पर प्रसिद्ध 'सिंदूरी शिला' है, जिसके विषय में कहा जाता है कि यहाँ राधा रानी ने सिंदूर लगाया था।'सिंद...
12/01/2015

जतीपुरा गोवर्धन

यहाँ पर प्रसिद्ध 'सिंदूरी शिला' है, जिसके विषय में कहा जाता है कि यहाँ राधा रानी ने सिंदूर लगाया था।

'सिंदूरी शिला' से थोड़ी ही दूरी पर कनुआ की उंगलियों के निशान हैं। इसके बारे में ऐसा कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने माखन खाकर अपने हाथ इसी स्थान पर पोंछ दिए थे, जिससे उनकी पाँचों उंगलियाँ यहाँ छप गईं।

श्रीनाथजी के मंदिर से नीचे उतर कर 'दंडौती शिला' है, जिसे महाप्रभु का तेजपुंज प्रकाश भी कहा जाता है। माना जाता है कि यहाँ सात परिक्रमा करने से सात कोश की परिक्रमा के समान फल प्राप्त होता है। यह भी माना जाता है कि महाप्रभु बल्लभाचार्य का शरीर इसी शिला में समाहित हुआ था।

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