Devleshwar Mahadev Temple Balodi Gagwarsyun Pauri Garhwal Uttrakhand

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Devleshwar Mahadev Temple  Balodi Gagwarsyun Pauri Garhwal Uttrakhand Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Devleshwar Mahadev Temple Balodi Gagwarsyun Pauri Garhwal Uttrakhand, Hindu temple, Devleshwar Mahadev Temple, Gagwarsyun, Balodi, Pauri.

*सिद्धपीठ श्रीदेवलेश्वर महादेव मन्दिर समिति (बलोडी) पोस्ट ऑफिस ल्वाली पट्टी गगवाडस्यूँ जिला पौड़ी गढ़वाल*

*पंजीकरण संख्या* *UK061088202422842*

UGB Lwali Ac/No (76033481103)

*IFSC Cod* (SBIN0RRUTGB)

[ 97207 83837 ]
[ 96907 93247 ]
[ 90683 05419 ]

मुंडमाल गल में सोहे, हाथ खड्ग विकराल।भय हरे जन-जन के माँ, काटे काल-कराल॥
28/08/2026

मुंडमाल गल में सोहे, हाथ खड्ग विकराल।
भय हरे जन-जन के माँ, काटे काल-कराल॥

.                रक्षा बंधन–(राखी)          रक्षाबन्धन एक हिन्दू त्यौहार है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन म...
28/08/2026

. रक्षा बंधन–(राखी)

रक्षाबन्धन एक हिन्दू त्यौहार है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। श्रावण (सावन) में मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी (सावनी) या सलूनो भी कहते हैं।
रक्षाबन्धन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्त्व है। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक की हो सकती है।
राखी सामान्यतः बहनें भाई को ही बाँधती हैं परन्तु ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित सम्बन्धियों (जैसे पुत्री द्वारा पिता को) भी बाँधी जाती है।
कभी-कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बाँधी जाती है। आजकल तो प्रकृति संरक्षण हेतु वृक्षों को राखी बाँधने की परम्परा भी प्रारम्भ हो गयी है।
हिन्दू धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय कर्मकाण्डी पण्डित या आचार्य संस्कृत में एक श्लोक का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।
भविष्यपुराण के अनुसार इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बांधते हुए निम्नलिखित स्वस्तिवाचन किया (यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है)–

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है–‘जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना (तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।)’
प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर लड़कियाँ और महिलाएँ पूजा की थाली सजाती हैं। थाली में राखी के साथ रोली या हल्दी, चावल, दीपक, मिठाई और कुछ पैसे भी होते हैं। लड़के और पुरुष तैयार होकर टीका करवाने के लिये पूजा या किसी उपयुक्त स्थान पर बैठते हैं।
पहले अभीष्ट देवता की पूजा की जाती है, इसके बाद रोली या हल्दी से भाई का टीका करके चावल को टीके पर लगाया जाता है और सिर पर छिड़का जाता है, उसकी आरती उतारी जाती है, दाहिनी कलाई पर राखी बाँधी जाती है और पैसों से न्यौछावर करके उन्हें गरीबों में बाँट दिया जाता है।
भारत के अनेक प्रान्तों में भाई के कान के ऊपर भोजली या भुजरियाँ लगाने की प्रथा भी है। भाई बहन को उपहार या धन देता है। इस प्रकार रक्षाबन्धन के अनुष्ठान को पूरा करने के बाद ही भोजन किया जाता है।
प्रत्येक पर्व की तरह उपहारों और खाने-पीने के विशेष पकवानों का महत्त्व रक्षाबन्धन में भी होता है।
आमतौर पर दोपहर का भोजन महत्त्वपूर्ण होता है और रक्षाबन्धन का अनुष्ठान पूरा होने तक बहनों द्वारा व्रत रखने की भी परम्परा है।
पुरोहित तथा आचार्य सुबह-सुबह यजमानों के घर पहुँचकर उन्हें राखी बाँधते हैं और बदले में धन, वस्त्र और भोजन आदि प्राप्त करते हैं।
यह पर्व भारतीय समाज में इतनी व्यापकता और गहराई से समाया हुआ है कि इसका सामाजिक महत्त्व तो है ही, धर्म, पुराण, इतिहास, साहित्य और फ़िल्में भी इससे अछूते नहीं हैं।
स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। कथा कुछ इस प्रकार है–
दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की।
तब भगवान वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी।
भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकनाचूर कर देने के कारण यह त्योहार बलेव नाम से भी प्रसिद्ध है।
कहते हैं एक बार बाली रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया।
भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आयीं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी।
विष्णु पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिये फिर से प्राप्त किया था। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
० ० ०

॥जय जय श्री राधे॥
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दैत्यराज हिरण्याक्ष और 'वराह-शिव' संवाद प्रसंग (शिव पुराण - कोटिरुद्र संहिता)शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता में पृथ्वी का...
28/08/2026

दैत्यराज हिरण्याक्ष और 'वराह-शिव' संवाद प्रसंग (शिव पुराण - कोटिरुद्र संहिता)
शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता में पृथ्वी का हरण करने वाले महाबलशाली दैत्यराज हिरण्याक्ष, भगवान विष्णु के वराह अवतार और साक्षात महादेव के बीच के एक गूढ़ प्रसंग का वर्णन मिलता है।

1. हिरण्याक्ष का अमत्त अहंकार
प्राचीन काल में दिति के पुत्र हिरण्याक्ष ने कठोर तपस्या करके अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। उसने अहंकार में अंधा होकर पृथ्वी को उखाड़कर रसातल (पाताल लोक) में छिपा दिया और देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया।

हिरण्याक्ष को अपनी भुजाओं के बल पर इतना गर्व था कि वह तीनों लोकों में अपने समान योद्धा की खोज कर रहा था।

2. 'वराह' अवतार और शिव-कवच का स्मरण
पृथ्वी का उद्धार करने के लिए श्रीहरि विष्णु ने भगवान वराह का रूप धारण किया और रसातल में पहुँचे। जब वराह देव पृथ्वी को अपनी दाढ़ों (तुषार) पर उठाकर ऊपर ला रहे थे, तब हिरण्याक्ष ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा।

युद्ध भूमि में जाने से पूर्व हिरण्याक्ष ने पूर्वकाल में प्राप्त शिव-कवच का स्मरण किया और कहा:

"महादेव के तेजोमय कवच के रहते हुए मुझे संसार का कोई भी देव या दानव पराजित नहीं कर सकता।"

3. वराह रूप में श्रीहरि द्वारा शिव-आराधन
हिरण्याक्ष के अभेद्य शिव-कवच और उसके तपोबल को देखकर भगवान वराह (विष्णु) ने युद्ध भूमि में ही क्षण भर के लिए अपनी आँखें मूँद लीं और साक्षात भगवान शिव का ध्यान किया।

श्रीहरि ने शिव-सहस्रनाम का स्मरण करते हुए महादेव से प्रार्थना की:

"हे विश्वनाथ! आपका भक्त होने के नाते हिरण्याक्ष का तपोबल अत्यधिक है। जब तक आपकी कृपा का आश्रय मुझे नहीं मिलेगा, धर्म की स्थापना असंभव है।"

4. साक्षात 'लिंग रूप' में प्राकट्य और संहार
भगवान वराह की स्तुति से प्रसन्न होकर युद्ध के मध्य ही एक अलौकिक ज्योतिर्मय शिवलिंग प्रकट हुआ। उस लिंग-तेज ने हिरण्याक्ष के आसुरी अहंकार और उसके शिव-कवच के दुरुपयोग के भाव को निष्प्रभ कर दिया।

भगवान शिव की स्वीकृति प्राप्त होते ही भगवान वराह ने अपनी गदा से हिरण्याक्ष पर अंतिम प्रहार किया और उसका संहार करके पृथ्वी को पुनः उसके स्थान पर स्थापित किया।

💡 कथा का आध्यात्मिक संदेश
यह कथा सिखाती है कि जब कोई व्यक्ति ईश्वर से मिले वरदान या भक्ति-बल का प्रयोग अधर्म (पृथ्वी और जीवों के शोषण) के लिए करता है, तो ईश्वर स्वयं अपनी शक्ति को वापस खींच लेते हैं। धर्म की विजय में श्रीहरि और महादेव की एकरूपता ही समस्त ब्रह्मांड का आधार है।

जटाजूट में गंग सोहे, भस्म रमाए अंग।शीतल मन ताके रहे, जो शिव जी के संग॥
28/08/2026

जटाजूट में गंग सोहे, भस्म रमाए अंग।
शीतल मन ताके रहे, जो शिव जी के संग॥

🌸🪷 रक्षाबंधन 2026 — प्रेम, विश्वास और रक्षा का पवित्र पर्व 🪷🌸🙏 जय श्री राधे कृष्ण 🙏भाई-बहन के अटूट प्रेम और पवित्र रिश्त...
28/08/2026

🌸🪷 रक्षाबंधन 2026 — प्रेम, विश्वास और रक्षा का पवित्र पर्व 🪷🌸
🙏 जय श्री राधे कृष्ण 🙏
भाई-बहन के अटूट प्रेम और पवित्र रिश्ते का प्रतीक रक्षाबंधन इस वर्ष शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। यह पर्व केवल कलाई पर राखी बांधने का दिन नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख, सम्मान, स्वास्थ्य और मंगल की कामना करने का पवित्र अवसर है। ❤️
🌕 रक्षाबंधन कब है?
इस वर्ष श्रावण पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त 2026 को सुबह लगभग 9:08 बजे से शुरू होकर 28 अगस्त को सुबह लगभग 9:48 बजे तक रहेगी। इसलिए रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा।
⏰ राखी बांधने का शुभ समय
🌺 28 अगस्त 2026 — सुबह लगभग 6:00 बजे से 9:48 बजे तक
स्थान के अनुसार सूर्योदय के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना उत्तम रहेगा।
🕉️ भद्रा का क्या महत्व है?
हिंदू धर्म में भद्रा काल के दौरान रक्षाबंधन का मुख्य अनुष्ठान करने से बचने की परंपरा है। इस वर्ष भद्रा सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी, इसलिए राखी बांधने के समय भद्रा का कोई बाधक प्रभाव नहीं रहेगा।
🌿 रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है?
रक्षाबंधन का अर्थ है — रक्षा का बंधन।
बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसके सुखी, स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की प्रार्थना करती है। भाई भी अपनी बहन के प्रति प्रेम, सम्मान और हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहने का संकल्प करता है।
यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और अपनापन से भी मजबूत होते हैं। 🌸
📖 श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा
रक्षाबंधन से जुड़ी प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, एक बार श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लगने से रक्त निकल आया। द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया।
द्रौपदी के इस छोटे से प्रेम और स्नेह को श्रीकृष्ण ने बहुत बड़े भाव के रूप में स्वीकार किया। मान्यता है कि बाद में जब द्रौपदी संकट में पड़ीं, तब श्रीकृष्ण ने उनकी लाज की रक्षा की।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे प्रेम से बांधा गया छोटा-सा धागा भी भगवान तक पहुंचने वाला भाव बन सकता है। 🙏
🌺 माता लक्ष्मी और राजा बलि
एक अन्य धार्मिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु राजा बलि को दिए हुए वचन के कारण उनके साथ रहने लगे। माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया और भगवान विष्णु को अपने साथ वैकुंठ ले जाने की इच्छा व्यक्त की।
राजा बलि ने माता लक्ष्मी के इस पवित्र भाव का सम्मान किया और भगवान विष्णु को उनके साथ जाने की अनुमति दी।
इस कथा का संदेश है कि रक्षा सूत्र प्रेम और सम्मान से बने रिश्तों को भी पवित्र बना देता है। 🪷
🪔 रक्षाबंधन की पूजा एवं राखी बांधने की सरल विधि
सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
पूजा की थाली में रखें—
🌸 राखी
🌸 रोली या कुमकुम
🌾 अक्षत
🪔 दीपक
🌺 फूल
🍬 मिठाई
🥥 नारियल
सबसे पहले भगवान का स्मरण करें। भाई को तिलक लगाएं, अक्षत लगाएं और उसकी दाहिनी कलाई पर राखी बांधें। आरती करें और मिठाई खिलाएं।
भाई अपनी बहन को प्रेमपूर्वक उपहार दे और उसके सुख, स्वास्थ्य एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना करे। ❤️
🌹 रक्षाबंधन का सबसे सुंदर संदेश
राखी का धागा भले ही बहुत छोटा हो,
लेकिन उसमें बहन की दुआएं,
भाई का स्नेह,
बचपन की यादें
और जीवनभर साथ निभाने का विश्वास बंधा होता है। 💞
ईश्वर करे हर भाई-बहन के रिश्ते में हमेशा प्रेम बना रहे।
हर बहन के माथे पर मुस्कान रहे और हर भाई का जीवन सुख-समृद्धि से भरा रहे। 🙏
🌺 आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं। 🌺
🙏 श्री राधे कृष्ण 🙏
🪷 हरि नाम ही जीवन का आधार है। 🪷
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🌞 भगवान शिव द्वारा रचित चमत्कारी "श्री सूर्याष्टकम्" 🌞(जीवन के हर अंधकार को दूर करने और नवग्रह शांति का अचूक पाठ)सूर्यदे...
27/08/2026

🌞 भगवान शिव द्वारा रचित चमत्कारी "श्री सूर्याष्टकम्" 🌞
(जीवन के हर अंधकार को दूर करने और नवग्रह शांति का अचूक पाठ)

सूर्यदेव इस सम्पूर्ण जगत में शक्ति और ऊर्जा के साक्षात भंडार हैं। मान्यता है कि रविवार के दिन सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में जल और रोली मिलाकर अर्घ्य देने तथा 'श्री सूर्याष्टकम्' का पाठ करने से जीवन में अद्भुत चमत्कार होते हैं।
✨ नित्य पाठ करने के अद्भुत लाभ:
🔹 कुंडली के सभी ग्रह दोष शांत होते हैं।
🔹 कठिन से कठिन और असाध्य रोगों से शीघ्र मुक्ति मिलती है।
🔹 नौकरी और व्यापार में सफलता के मार्ग खुलते हैं।
🔹 मानसिक विकास होता है और तामसिक विचार नष्ट होते हैं।
🔹 व्यक्ति कुसंगति से बचता है और हमेशा ऊर्जावान (Energetic) बना रहता है।
🙏 पाठ की विधि:
प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। सफेद वस्त्र और सफेद आसन का प्रयोग करना सर्वोत्तम माना गया है।
🌸 ।। श्रीशिव प्रोक्तं- श्रीसूर्याष्टकम् (अर्थ सहित) ।। 🌸
१. आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमौऽस्तु ते।।
👉 अर्थ: हे आदिदेव भास्कर! आपको प्रणाम है, आप मुझ पर प्रसन्न हों। हे दिवाकर! आपको नमस्कार है, हे प्रभाकर! आपको मेरा प्रणाम है।
२. सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।
👉 अर्थ: सात घोड़ों वाले रथ पर आरूढ़, हाथ में श्वेत कमल धारण किये हुए, प्रचण्ड तेजस्वी कश्यप कुमार सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
३. लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।
👉 अर्थ: लाल रंग के रथ पर सवार, सभी लोकों के पितामह और महापापों को हरने वाले सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
४. त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।
👉 अर्थ: जो त्रिगुणमयी (सत्, रज, तम) ब्रह्मा, विष्णु और शिव के स्वरूप हैं, उन महापाप हारी महान शूरवीर सूर्यदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।
५. बृंहितं तेजः पुञ्ज च वायुमाकाशमेव च।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।
👉 अर्थ: जो बढ़े हुए तेज के पुंज हैं, जो वायु और आकाश स्वरूप हैं, उन समस्त लोकों के स्वामी सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
६. बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम्।
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।
👉 अर्थ: जो बन्धूक के पुष्प के समान लाल रंग वाले हैं, जो हार तथा कुण्डलों से सुशोभित हैं, उन एक चक्रधारी सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
७. तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजः प्रदीपनम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।
👉 अर्थ: महान तेज का प्रकाश करने वाले, इस सम्पूर्ण जगत के रचयिता और महापाप हरने वाले उन भगवान सूर्यदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।
८. तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।
👉 अर्थ: जो सम्पूर्ण जगत के नाथ हैं, जो ज्ञान, विज्ञान तथा मोक्ष प्रदान करते हैं और बड़े-बड़े पापों का भी नाश कर देते हैं, उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
।। इति श्रीशिव प्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पूर्णम् ।।

शिव पुराण की रुद्र संहिता (सती खंड) में दक्ष प्रजापति के यज्ञ से ठीक पहले, प्रजापतियों की सभा में नंदीश्वर (भगवान शिव के...
27/08/2026

शिव पुराण की रुद्र संहिता (सती खंड) में दक्ष प्रजापति के यज्ञ से ठीक पहले, प्रजापतियों की सभा में नंदीश्वर (भगवान शिव के वाहन व गण) और महर्षि भृगु के बीच हुए ऐतिहासिक शाप-प्रतिशाप की अत्यंत महत्वपूर्ण कथा आती है।

1. प्रजापति दक्ष का अहंकार और शिव का अनादर
एक समय प्रयाग में एक महान ज्ञान-यज्ञ का आयोजन हुआ था, जिसमें सभी देवता, ऋषि-मुनि और प्रजापति एकत्र थे। जब प्रजापति दक्ष ने सभा में प्रवेश किया, तो उनके सम्मान में सभी खड़े हो गए, किंतु ब्रह्मा जी और भगवान शिव अपने स्थान पर बैठे रहे।

भगवान शिव को अपना दामाद मानते हुए दक्ष ने इसे अपना अपमान समझा। अहंकार में अंधा होकर दक्ष ने भरी सभा में भगवान शिव की भर्त्सना की और शाप दे दिया:

"आज से यज्ञों में हविष्य (हवि का भाग) देवताओं के साथ शिव को प्राप्त नहीं होगा!"

2. नंदीश्वर का भयंकर शाप
दक्ष द्वारा भगवान शिव का यह अनुचित अनादर देखकर शिवजी के परम प्रिय गण नंदीश्वर का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने दक्ष और उनका समर्थन करने वाले ब्राह्मणों-ऋषियों को आड़े हाथों लिया।

नंदीश्वर ने सभा के मध्य खड़े होकर दक्ष को शाप दिया:

"हे दक्ष! तूने निरपराध महादेव का अनादर किया है। तू अति-अहंकारी और तत्वज्ञान से हीन हो गया है। तेरा यह मुख, जिससे तूने शिव की निंदा की है, शीघ्र ही बकरे का हो जाएगा! और जो ब्राह्मण कर्मकांड में लिप्त होकर केवल धन और सांसारिक सुखों के लिए शिव का विरोध कर रहे हैं, वे सदा दरिद्र, भिक्षुक और वेदों को बेचने वाले बने रहेंगे!"

3. महर्षि भृगु का प्रतिशाप
नंदीश्वर का यह विकराल शाप सुनकर ऋषिश्रेष्ठ भृगु अत्यंत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने दक्षिण दिशा की ओर हाथ उठाकर नंदीश्वर और शिव-गणों को प्रतिशाप दे दिया:

"जो लोग शिव-व्रत का पालन करेंगे और वेद-विहित मार्ग का उल्लंघन करेंगे, वे पाखंडी, शास्त्र-विरोधी, जटाधारी और भस्म-धारी होकर सन्मार्ग से भ्रष्ट हो जाएँगे!"

4. भगवान शिव की परम शांति और शिक्षा
सभा में चारों ओर शाप-प्रतिशाप का भयंकर कोलाहल मच गया। किंतु साक्षात भगवान शिव अत्यंत शांत और शांतचित्त बने रहे।

महादेव ने नंदीश्वर का हाथ पकड़ा और मंद मुस्कान के साथ कहा:

"हे नंदी! शांत हो जाओ। भृगु या दक्ष का क्रोध तुम्हें विचलित न करे। जो निंदा या स्तुति से परे है, वही वास्तविक ज्ञान है। यज्ञ या हवि भाग न मिलने से मेरा शिव-तत्त्व कम नहीं हो जाता।"

भगवान शिव नंदीश्वर को साथ लेकर चुपचाप सभा से कैलाश की ओर लौट गए। (इसी घटना के बाद दक्ष ने वह प्रसिद्ध यज्ञ रचा था, जिसमें सती ने देह-त्याग किया था।)

💡 कथा का आध्यात्मिक संदेश
यह प्रसंग सिखाता है कि सच्ची भक्ति और ज्ञान में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं होता। जब व्यक्ति अपने पद या विद्या के मद में ईश्वर का अनादर करता है, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है। वहीं दूसरी ओर, महादेव का यह शांत व्यवहार सिखाता है कि निंदा और अपमान के समय भी धीर पुरुष को शांत रहना चाहिए।

🔱 आखिर महादेव ने कामदेव को क्यों किया भस्म? और कैसे हुआ उनका पुनर्जन्म? 🔥(लिंग पुराण पर आधारित एक अद्भुत कथा)भगवान शिव व...
27/08/2026

🔱 आखिर महादेव ने कामदेव को क्यों किया भस्म? और कैसे हुआ उनका पुनर्जन्म? 🔥
(लिंग पुराण पर आधारित एक अद्भुत कथा)
भगवान शिव वैराग्य और समाधि के प्रतीक हैं, तो वहीं कामदेव संसार में प्रेम और सृष्टि-वृद्धि के परिचायक हैं। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि महादेव को अपना तीसरा नेत्र खोलना पड़ा? आइए जानते हैं... 👇
🌸 देवताओं की विवशता और कामदेव का त्याग
जब तारकासुर के अत्याचारों से तीनों लोक त्राहि-त्राहि कर रहे थे, तब ब्रह्मा जी ने बताया कि इस असुर का वध केवल शिव-पुत्र ही कर सकता है। समस्या यह थी कि महादेव गहन समाधि में लीन थे। तब सृष्टि की रक्षा के लिए देवताओं ने कामदेव से महादेव की समाधि भंग करने का अत्यंत जोखिम भरा अनुरोध किया।
🏹 जब कैलाश पर चला प्रेम का पुष्पबाण
लोककल्याण हेतु कामदेव अपनी पत्नी रति और मित्र वसंत के साथ कैलाश पहुँचे। वसंत के प्रभाव से वीरान कैलाश पर भी फूल खिल उठे और वातावरण प्रेममय हो गया। अवसर देखकर कामदेव ने अपने धनुष से शिव जी पर ५ पुष्पबाण (अशोक, आम्र-मंजरी, नवमल्लिका, नीलकमल और चम्पक) चला दिए।
🔥 महादेव का क्रोध और तीसरा नेत्र
बाण लगते ही क्षण भर के लिए महादेव का ध्यान माता पार्वती की ओर गया। किंतु अगले ही पल अपनी योगदृष्टि से उन्होंने सत्य जान लिया। क्रोधित होकर महादेव ने अपना दिव्य तीसरा नेत्र खोल दिया। उस नेत्र से निकली योगाग्नि ने देखते ही देखते कामदेव के स्थूल शरीर को भस्म कर दिया!
💧 रति का विलाप और 'अनंग' होने का वरदान
अपने पति को भस्म होता देख देवी रति विलाप करने लगीं और महादेव से क्षमा माँगी। तब करुणासिंधु शिव शांत हुए और उन्होंने वरदान दिया— "तुम्हारा पति नष्ट नहीं हुआ है, वह अब बिना शरीर के (अनंग रूप में) पूरे संसार के मनों में निवास करेगा।" इसी कारण कामदेव को 'अनंग' भी कहा जाता है।
💫 शिव-पार्वती विवाह और कामदेव का पुनर्जन्म
इसके बाद माता पार्वती की कठोर तपस्या सफल हुई और शिव-पार्वती का दिव्य विवाह हुआ। इन्हीं के पुत्र भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया।
समय आने पर, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के पुत्र 'प्रद्युम्न' के रूप में कामदेव ने पुनर्जन्म लिया और शम्बरासुर का वध कर पुनः अपनी पत्नी रति (मायावती) को प्राप्त किया।
✨ कथा का गहरा आध्यात्मिक रहस्य:
कामदेव का दहन किसी देवता का विनाश नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की अनियंत्रित वासनाओं पर 'आत्मसंयम और ज्ञान' की विजय का प्रतीक है। जब इच्छाएं (काम) धर्म और मर्यादा के अधीन होती हैं, तभी वह प्रेम और सृष्टि के कल्याण का कारण बनती हैं।
🙏🏻 ।। जय भोलेनाथ ।। ॐ नमः शिवाय ।। 🙏🏻
क्या आपको कामदेव के 'प्रद्युम्न अवतार' के बारे में पता था? कमेंट्स में 'हर हर महादेव' जरूर लिखें! 👇

भगवान का पेट कब भरता है? छप्पन भोग से या केवल एक लोटे दूध के सच्चे भाव से? 🌸✨"भाव का भूखा हूँ मैं और भाव ही एक सार है।भा...
27/08/2026

भगवान का पेट कब भरता है? छप्पन भोग से या केवल एक लोटे दूध के सच्चे भाव से? 🌸✨
"भाव का भूखा हूँ मैं और भाव ही एक सार है।
भाव से मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार है।।"
एक बार एक शिवभक्त राजा ने अपने आराध्य के मंदिर का विशाल हौद दूध से भरने के लिए पूरे नगर का दूध जबरन मंगवा लिया। बच्चों और बछड़ों को भूखा रखकर हज़ारों लीटर दूध शिवलिंग पर चढ़ाया गया, किंतु हौद खाली का खाली ही रहा।
तभी एक निर्धन बुढ़िया आई। उसने अपने घर के बच्चों और बछड़ों को भरपेट दूध पिलाने के बाद, बचे हुए में से केवल एक लुटिया दूध सच्चे प्रेम और श्रद्धा से चढ़ाया—और देखते ही देखते पूरा हौद लबालब भर गया!
जब राजा ने इसका रहस्य पूछा, तो बुढ़िया ने सहज उत्तर दिया:
"राजन! तुम प्रजा और मासूम बच्चों का पेट काटकर, उन्हें रुलाकर दूध लाए थे। भगवान किसी की आह से चढ़ाई गई भेंट स्वीकार नहीं करते। मैंने सबको तृप्त करने के बाद जो प्रेम से अर्पित किया, प्रभु ने उसी भाव को स्वीकार कर लिया।"
ईश्वर की सच्ची भक्ति का मूल मंत्र:
🙏 प्राणी मात्र की सेवा: दूसरों को कष्ट देकर की गई पूजा कभी फलदायी नहीं होती।
💖 सच्चा समर्पण: भगवान वस्तु या वैभव के नहीं, केवल आपके निर्मल भाव और प्रेम के भूखे हैं (जैसे शबरी के बेर और विदुर की भाजी)।
🌿 निमित्त मात्र भाव: जो कुछ हमारे पास है, वह सब ईश्वर की ही देन है।
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।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।। 🚩

स्कंद पुराण के 'कौमारिका खंड' और 'माहेश्वर खंड' में भगवान कार्तिकेय (स्कंद) द्वारा क्रौंच पर्वत के भेदन की अत्यंत ओजस्वी...
26/08/2026

स्कंद पुराण के 'कौमारिका खंड' और 'माहेश्वर खंड' में भगवान कार्तिकेय (स्कंद) द्वारा क्रौंच पर्वत के भेदन की अत्यंत ओजस्वी और चमत्कारिक कथा मिलती है। यह घटना कार्तिकेय जी के शौर्य, दिव्य अस्त्र 'शक्ति' (वेल) की महिमा और देवताओं पर उनके अनुग्रह को दर्शाती है।

1. क्रौंच पर्वत और बाणासुर का छलावा
तारकासुर का वध करने के बाद भी उसके कुछ अनुचर और दैत्य छिपकर देवताओं को कष्ट दे रहे थे। उन्हीं में से एक था महापराक्रमी दैत्य बाणासुर (तारकासुर का पुत्र)।

मायावी क्रौंच पर्वत: बाणासुर ने अपनी आसुरी माया से क्रौंच पर्वत को अपना सुदृढ़ दुर्ग (किला) बना लिया था। क्रौंच पर्वत स्वयं भी मायावी शक्तियों से युक्त था।

यात्रियों का बंदी बनना: जो भी देवता, सिद्ध, गंधर्व या ऋषि उस पर्वत के मार्ग से गुजरते, क्रौंच पर्वत अपनी मायावी गुफाओं, शिलाओं और घने अंधकार से उन्हें अपने भीतर खींचकर बंदी बना लेता था।

2. महर्षि अगस्त्य और ऋषियों की प्रार्थना
जब क्रौंच पर्वत के इस मायावी आचरण से दण्डकारण्य और आसपास के ऋषियों के आश्रमों पर संकट छा गया, तब महर्षि अगस्त्य और अन्य देवगण सेनापति कार्तिकेय की शरण में पहुँचे।

ऋषियों ने कार्तिकेय से प्रार्थना की— "हे देवसेनापति! क्रौंच पर्वत अपनी माया से धर्म और ज्ञान का मार्ग अवरुद्ध कर रहा है। इसमें छिपे दैत्य देवताओं और ऋषियों को प्रताड़ित कर रहे हैं। आप कृपा करके इस मायावी पर्वत का दमन करें।"

3. कार्तिकेय का शंखनाद और अस्त्र 'शक्ति' का प्रहार
अपने भक्तों और ऋषियों की रक्षा के लिए बाल-रूप कार्तिकेय अपने वाहन मयूर (मोर) पर सवार होकर क्रौंच पर्वत के समीप पहुँचे।

अस्त्र 'शक्ति' का संधान: कार्तिकेय जी ने अपनी माता पार्वती द्वारा प्रदत्त परम अलौकिक अस्त्र 'शक्ति' (दिव्य भाला/वेल) को हाथ में लिया और मंत्रोच्चार के साथ क्रौंच पर्वत की ओर छोड़ दिया।

पर्वत का विदीर्ण होना: वह दिव्य 'शक्ति' अत्यंत तीव्र प्रकाश और वज्र के समान गर्जना करती हुई सीधे क्रौंच पर्वत के वक्षस्थल (मध्य भाग) में जा घुसी।

माया का अंत: अस्त्र के प्रहार से वह विशालकाय पर्वत एक ही क्षण में छिन्न-भिन्न हो गया। क्रौंच पर्वत के दो टुकड़े हो गए और उसके भीतर छिपा बाणासुर तथा उसकी आसुरी सेना परास्त होकर भाग खड़ी हुई।

4. 'क्रौंच-रंध्र' और हंसों का मार्ग
स्कंद पुराण में वर्णन आता है कि जब कार्तिकेय जी की 'शक्ति' ने पर्वत को भेदा, तो उसके बीचोबीच एक विशाल और दिव्य मार्ग बन गया, जिसे 'क्रौंच-रंध्र' कहा गया।

हंसों की यात्रा: शीतकाल में जब मानसरोवर की ओर हंस और अन्य पक्षी उड़ान भरते थे, तो इस ऊँचे पर्वत को लाँघना कठिन होता था। कार्तिकेय जी द्वारा बनाए गए इस मार्ग ('क्रौंच-रंध्र') से पक्षी आसानी से पर्वत के आर-पार जाने लगे।

'क्रौंचारि' नाम: इस अलौकिक घटना के बाद भगवान कार्तिकेय का एक प्रसिद्ध नाम 'क्रौंचारि' (क्रौंच पर्वत के शत्रु/विजेता) पड़ा।

कथा का आध्यात्मिक महात्म्य
स्कंद पुराण के अनुसार, क्रौंच पर्वत अज्ञान, मोह और अहंकार का प्रतीक है, जो मनुष्य के भक्ति-मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है।

भगवान कार्तिकेय की 'शक्ति' (जो ज्ञान और विवेक का प्रतीक है) जब इस अज्ञान रूपी पर्वत पर प्रहार करती है, तो अज्ञान के सभी आवरण नष्ट हो जाते हैं और जीव के लिए परम ज्ञान और मोक्ष का द्वार खुल जाता है।

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