Devleshwar Mahadev Temple Balodi Gagwarsyun Pauri Garhwal Uttrakhand

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Devleshwar Mahadev Temple  Balodi Gagwarsyun Pauri Garhwal Uttrakhand Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Devleshwar Mahadev Temple Balodi Gagwarsyun Pauri Garhwal Uttrakhand, Hindu temple, Devleshwar Mahadev Temple, Gagwarsyun, Balodi, Pauri.

*सिद्धपीठ श्रीदेवलेश्वर महादेव मन्दिर समिति (बलोडी) पोस्ट ऑफिस ल्वाली पट्टी गगवाडस्यूँ जिला पौड़ी गढ़वाल*

*पंजीकरण संख्या* *UK061088202422842*

UGB Lwali Ac/No (76033481103)

*IFSC Cod* (SBIN0RRUTGB)

[ 97207 83837 ]
[ 96907 93247 ]
[ 90683 05419 ]

🕉️ नवनाथ: रहस्य, सिद्धियाँ और उनकी अलौकिक उत्पत्ति की अमर कथाएँ! ✨नाथ संप्रदाय में 'नवनाथों' का सर्वोच्च स्थान है। क्या ...
27/05/2026

🕉️ नवनाथ: रहस्य, सिद्धियाँ और उनकी अलौकिक उत्पत्ति की अमर कथाएँ! ✨
नाथ संप्रदाय में 'नवनाथों' का सर्वोच्च स्थान है। क्या आप जानते हैं इन ९ महान सिद्ध योगियों की उत्पत्ति कैसे हुई थी? आइए जानते हैं:
१. 🔱 मच्छिन्द्रनाथ (मत्स्यनाथ):
इन्हें नाथ प्रथा का संस्थापक और हठयोग का जनक माना जाता है। बौद्ध धर्म के ६४ महासिद्धों में भी ये पूजनीय हैं। महाबली हनुमान जी के साथ इनका युद्ध अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसमें इनकी मन्त्रशक्ति देखकर स्वयं हनुमान जी ने प्रसन्न होकर इन्हें अपना आशीर्वाद दिया था।
२. 🔱 गोरक्षनाथ (गोरखनाथ):
नाथ संप्रदाय के सबसे प्रसिद्ध गुरु! त्रेतायुग में श्रीराम के राज्याभिषेक और द्वापर में श्रीकृष्ण के विवाह में भी ये उपस्थित थे। इनकी उत्पत्ति का रहस्य अद्भुत है—एक स्त्री ने इनकी दी हुई भस्म को डर से गोबर के ढेर पर रख दिया था। १२ वर्ष बाद जब मत्स्यनाथ ने अलख जगाई, तो उसी गोबर के ढेर से गोरखनाथ प्रकट हुए!
३. 🔱 गहिनीनाथ:
जब गोरखनाथ जी एकांत में मृतसंजीवनी विद्या का अभ्यास कर रहे थे, तब बच्चों के आग्रह पर उन्होंने गीली मिट्टी के एक पुतले पर मन्त्र पढ़ा, जिससे वह जीवित हो उठा। बाद में इसी सिद्ध बालक को मधुमय नामक ब्राह्मण को दत्तक पुत्र के रूप में सौंपा गया।
४. 🔱 जालंधरनाथ:
पंजाब का जालंधर शहर इन्हीं के नाम पर है! हस्तिनापुर के राजा सोम के यज्ञ कुंड की अग्नि से इनकी उत्पत्ति हुई थी। अपने शिष्य कृष्णपाद के साथ मिलकर इन्होंने कापालिक संप्रदाय की स्थापना की।
५. 🔱 कानिफनाथ (कृष्णपाद):
इन्हें प्रबुद्ध नारायण के नौ अवतारों ("नवनारायण") में से एक माना जाता है। ब्रह्मा जी के तेज से एक हथिनी के कान में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम कनीफनाथ पड़ा। शरीर का रंग काला होने के कारण इन्हें कृष्णपाद भी कहा गया।
६. 🔱 भर्तृहरिनाथ (भरथरी नाथ):
ये उज्जैन के राजा और सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। पत्नी पिंगला से जुड़े एक अमर फल के रहस्य और वैराग्य के कारण, इन्होंने अपना विशाल राजपाट त्याग दिया और गुरु गोरखनाथ से संन्यास की दीक्षा ली।
७. 🔱 रेवणनाथ:
रेवा नदी के किनारे बालू की प्रतिमा पर ब्रह्मा जी का तेज पड़ने से ये जीवित हो उठे! भगवान दत्तात्रेय ने दर्शन देकर इनकी हर इच्छा पूरी होने का वरदान दिया और बाद में इनके मन में छिपे अज्ञान और अभिमान को दूर कर इन्हें पूर्ण सिद्ध बनाया।
८. 🔱 नागनाथ (वटनाथ):
ब्रह्मा जी के तेज को एक नागिन द्वारा निगलने के बाद एक अंडे से इनका जन्म हुआ। दत्तात्रेय जी की कृपा से इन्हें सभी ६४ विद्याओं का ज्ञान प्राप्त हुआ। एक बार अज्ञानतावश इनका युद्ध अपने ही गुरु भाई मच्छिन्द्रनाथ से हो गया था, जिसके बाद सत्य जानकर इन्होंने क्षमा मांगी।
९. 🔱 चर्पटीनाथ:
शिवजी के तेज का कुछ भाग नदी किनारे उगी घास में फंस गया, जिससे ९ महीने बाद इनका जन्म हुआ। घास या ईख में फंसे होने के कारण इनका नाम चर्पटीनाथ पड़ा। देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में पश्चाताप कर इन्होंने नवें और अंतिम सिद्ध का स्थान ग्रहण किया।
🙏 नवनाथ स्मरण मन्त्र 🙏
आदि-नाथ ओ स्वरुप, उदय-नाथ उमा-महि-रुप।
जल-रुपी ब्रह्मा सत-नाथ, रवि-रुप विष्णु सन्तोष-नाथ।
हस्ती-रुप गनेश भतीजै, ताकु कन्थड-नाथ कही जै।
माया-रुपी मछिन्दर-नाथ, चन्द-रुप चौरङ्गी-नाथ।
शेष-रुप अचम्भे-नाथ, वायु-रुपी गुरु गोरख-नाथ।
घट-घट-व्यापक घट का राव, अमी महा-रस स्त्रवती खाव।
ॐ नमो नव-नाथ-गण, चौरासी गोमेश।
आदि-नाथ आदि-पुरुष, शिव गोरख आदेश।
ॐ श्री नव-नाथाय नमः।।
राधे राधे! 🌸🙏
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.                        "गंगा अवतरण कथा"           गंगा, जाह्नवी और भागीरथी कहलानी वाली ‘गंगा नदी’ भारत की सबसे महत्वपू...
25/05/2026

. "गंगा अवतरण कथा"

गंगा, जाह्नवी और भागीरथी कहलानी वाली ‘गंगा नदी’ भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है। यह मात्र एक जल स्रोत नहीं है, बल्कि भारतीय मान्यताओं में यह नदी पूजनीय है जिसे ‘गंगा मां’ अथवा ‘गंगा देवी’ के नाम से सम्मानित किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार गंगा पृथ्वी पर आने से पहले देवलोक में रहती थीं।
गंगा नदी के पृथ्वी लोक में आने के पीछे कई सारी लोक कथाएँ प्रचलित हैं, लेकिन इस सबसे अहम एवं रोचक कथा है पुराणों में। एक पौराणिक कथा के अनुसार अति प्राचीन समय में पर्वतराज हिमालय और सुमेरु पर्वत की पुत्री मैना की अत्यंत रूपवती एवं सर्वगुण सम्पन्न दो कन्याएं थीं। दोनों कन्याओं में से बड़ी थी गंगा तथा छोटी पुत्री का नाम था उमा। कहते हैं बड़ी पुत्री गंगा अत्यन्त प्रभावशाली और असाधारण दैवीय गुणों से सम्पन्न थी। लेकिन साथ ही वह किसी बन्धन को स्वीकार न करने के लिए भी जानी जाती थी। हर कार्य में अपनी मनमानी करना उसकी आदत थी। देवलोक में रहने वाले देवताओं की दृष्टि गंगा पर पड़ी। उन्होंने उसकी असाधारण प्रतिभा को सृष्टि के कल्याण के लिए चुना और उसे अपने साथ देवलोक ले गए, तथा भगवान् विष्णु की सेवा में भेज दिया। अब पर्वतराज के पास एक ही कन्या शेष थी, उमा। उमा ने भगवान शिव की तपस्या की और तप पूर्ण होने पर भगवान शंकर को ही वर के रूप में मांग लिया।
गंगा के पृथ्वी पर आने की कथा का आरम्भ होता है भगवान राम की नगरी अयोध्या से। जिसे पुराणों में अयोध्यापुरी के नाम से जाना जाता था। वहाँ सगर नाम के एक राजा थे जिनकी कोई सन्तान नहीं थी। सगर राजा की दो रानियाँ थीं - केशिनी तथा सुमति, किन्तु दोनों से ही राजा को पुत्र की उत्पत्ति नहीं हो रही थी। जिसके फलस्वरूप उन्होंने दोनों पत्नियों को साथ लेकर हिमालय के भृगुप्रस्रवण नामक प्रान्त में तपस्या करने का फैसला किया। ‘श्रीजी की चरण सेवा‘ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ’श्रीजी की चरण सेवा’ के साथ जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
एक लंबी तपस्या के बाद महर्षि भृगु राजा और उनकी पत्नियों से प्रसन्न हुए और वरदान देने के लिए प्रकट हुए। उन्होंने कहा, “हे राजन ! तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ और तुम्हारी दोनों पत्नियों को पुत्र का वरदान देता हूँ। लेकिन दोनों में से एक पत्नी को केवल एक पुत्र की प्राप्ति होगी, जो वंश को आगे बढ़ाने में सहायक साबित होगा। तथा दूसरी पत्नी को 60 हज़ार पुत्रों का वर हासिल होगा। अब तुम यह फैसला कर लो कि किसे कौन सा वरदान चाहिए।“ इस पर राजा की पहली पत्नी केशिनी ने वंश को बढ़ाने वाले एक पुत्र की कामना की और रानी सुमति ने साठ हजार बलवान पुत्रों की। उचित समय पर रानी केशिनी ने असमंजस नामक पुत्र को जन्म दिया। दूसरी ओर रानी सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकला जिसे फोड़ने पर कई सारे छोटे-छोटे पुत्र निकले, जिनकी संख्या साठ हजार थी। उन सबका पालन पोषण घी के घड़ों में रखकर किया गया।
समय बीतने पर सभी पुत्र बड़े हो गए। महाराज सगर का ज्येष्ठ एवं वंश को आगे बढ़ाने वाला पुत्र असमंजस बड़ा दुराचारी था। उसके कहर से सारी प्रजा परेशान थी, इसीलिए परिणामस्वरूप राजा ने उसे नगर से बाहर कर दिया। कुछ समय बाद असमंजस के यहाँ अंशुमान नाम का एक पुत्र हुआ। वह अपने पिता से बिल्कुल विपरीत स्वभाव का था। अंशुमान अत्यंत सदाचारी, पराक्रमी एवं लोगों की सहायता करने वाला था। एक दिन राजा सगर ने महान अश्वमेघ यज्ञ करवाने का फैसला किया जिसके लिए उन्होंने हिमालय एवं विन्ध्याचल के बीच की हरी भरी भूमि को चुना और वहाँ एक विशाल यज्ञ मण्डप का निर्माण करवाया। इसके बाद अश्वमेघ यज्ञ के लिए श्यामकर्ण घोड़ा छोड़कर उसकी रक्षा के लिये पराक्रमी सेना को उसके पीछे-पीछे भेज दिया।
यज्ञ सफलतापूर्वक बढ़ रहा था जिसे देख इन्द्र देव काफी भयभीत हो गए। तभी उन्होंने एक राक्षस का रूप धारण किया और हिमालय पर पहुँचकर राजा सगर के उस घोड़े को चुरा लिया। घोड़े की चोरी की सूचना पाते ही राजा सगर के होश उड़ गए। उन्होंने शीघ्र ही अपने साठ हजार पुत्रों को आदेश दिया कि घोड़ा चुराने वाले को किसी भी अवस्था (जीवित या मृत) में पकड़कर लेकर आओ। आदेश सुनते ही सभी पुत्र खोजबीन में लग गए। जब पूरी पृथ्वी खोजने पर भी घोड़ा नहीं मिला तो उन्होंने पृथ्वी को खोदना शुरू कर दिया, यह सोच कर कि शायद पाताल लोक में उन्हें घोड़ा मिल जाए। अब पाताल में घोड़े को खोजते खोजते वे सनातन वसुदेव कपिल के आश्रम में पहुँच गए। वहाँ उन्होंने देखा कि कपिलमुनि आँखें बन्द किए बैठे हैं और ठीक उनके पास यज्ञ का वह घोड़ा बंधा हुआ है जिसे वह लंबे समय से खोज रहे थे। इस पर सभी मंदबुद्धि पुत्र क्रोध में कपिल मुनि को घोड़े का चोर समझकर उन्हें अपशब्द कहने लगे। उनके इस कुकृत्यों से कपिल मुनि की समाधि भंग हो गई। आँखें खुलती ही उन्होंने क्रोध में सभी राजकुमारों को अपने तेज से भस्म कर दिया। लेकिन इसकी सूचना राजा सगर को नहीं थी। ‘श्रीजी की चरण सेवा‘ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ’श्रीजी की चरण सेवा’ के साथ जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
जब लंबा समय बीत गया तो राजा फिर से चिंतित हो गए। अब उन्होंने अपने तेजस्वी पौत्र अंशुमान को अपने पुत्रों तथा घोड़े का पता लगाने के लिए आदेश दिया। आज्ञा का पालन करते हुए अंशुमान उस रास्ते पर निकल पड़ा जो रास्ता उसके चाचाओं ने बनाया था। मार्ग में उसे जो भी पूजनीय ऋषि मुनि मिलते वह उनका सम्मानपूर्वक आदर-सत्कार करता। खोजते-खोजते वह कपिल आश्रम में जा पहुँचा। वहाँ का दृश्य देख वह बेहद आश्चर्यचकित हुआ। उसने देखा कि भूमि पर उसके साठ हजार चाचाओं के भस्म हुए शरीरों की राख पड़ी थी और पास ही यज्ञ का घोड़ा चर रहा था। यह देख वह निराश हो गया। अब उसने राख को विधिपूर्वक प्रवाह करने के लिए जलाशय खोजने की कोशिश की लेकिन उसे कुछ ना मिला। तभी उसकी नजर अपने चाचाओं के मामा गरुड़ पर पड़ी। उसने गरुड़ से सहायता माँगी तो उन्होंने उसे बताया कि किस प्रकार से कपिल मुनि द्वारा उसके चाचाओं को भस्म किया गया। वह आगे बोले कि उसके चाचाओं की मृत्यु कोई साधारण नहीं थी इसीलिए उनका तर्पण करने के लिए कोई भी साधारण सरोवर या जलाशय काफी नहीं होगा। इसके लिए तो केवल हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगा के जल से ही तर्पण करना सही माना जाएगा।
गरुड़ द्वारा राय मिलने पर अंशुमान घोड़े को लेकर वापस अयोध्या पहुँचा और राजा सगर को सारा वाकया बताया। राजा काफी दु:खी हुए लेकिन अपने पुत्रों का उद्धार करने के लिए उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने का फैसला किया लेकिन यह सब होगा कैसे, उन्हें समझ नहीं आया। कुछ समय पश्चात् महाराज सगर का देहान्त हो गया जिसके बाद अंशुमान को राजगद्दी पर बैठाया गया। आगे चलकर अंशुमान को दिलीप नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। उसके बड़े होने पर अंशुमान ने उसे राज्य सौंप दिया और स्वयं हिमालय की गोद में जाकर गंगा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने लगे। उनके लगातार परिश्रम के बाद भी उसे सफलता हासिल ना हुई और कुछ समय बाद अंशुमान का देहान्त हो गया। अंशुमान की तरह ही उसके पुत्र दिलीप ने भी राज्य अपने पुत्र भगीरथ को सौंपकर गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या शुरू कर दी। लेकिन उन्हें भी कोई फल हासिल ना हुआ। दिलीप के बाद भगीरथ ने भी गंगा तपस्या का फैसला किया लेकिन उनकी कोई संतान ना होने के कारण उन्होंने राज्य का भार मन्त्रियों को सौंपकर हिमालय जाने का फैसला किया।
भगीरथ की कठोर तपस्या से आखिरकार भगवान ब्रह्मा प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुए और मनोवांछित फल माँगने के लिए कहा। भगीरथ ने ब्रह्मा जी से कहा, “हे प्रभु ! मैं आपके दर्शन से अत्यंत प्रसन्न हूँ। कृपया आप मुझे सगर के पुत्रों का उद्धार करने के लिए गंगा का जल प्रदान कर दीजिए तथा साथ ही मुझे एक सन्तान भी दें ताकि इक्ष्वाकु वंश नष्ट न हो जाए।“ भगीरथ की प्रार्थना सुन ब्रह्मा जी मुस्कुराए और बोले, “हे वत्स ! मेरे आशीर्वाद से जल्द ही तुम्हारे यहाँ एक पुत्र होगा किन्तु तुम्हारी पहली इच्छा, 'गंगा का जल देना' यह मेरे लिए कठिन कार्य है। क्योंकि गंगा भगवान् विष्णु की सेवा में हैं। अतः तुम्हें भगवान् विष्णु को प्रसन्न करके उनसे गंगा को धरती पर लाने की प्रार्थना करनी होगी। ‘श्रीजी की चरण सेवा‘ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ’श्रीजी की चरण सेवा’ के साथ जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
बहुत लम्बे समय तक कठोर तपस्या करने के उपरांत भगवान् विष्णु ने भगीरथ को दर्शन दिये तथा उनसे वरदान माँगने के लिये कहा। भगीरथ ने भगवान् विष्णु से भी अपनी प्रार्थना दोहराई तब भगवान् विष्णु ने कहा- "भगीरथ ! गंगा बहुत चंचल हैं, और जब वे अपने पूर्ण वेग के साथ पृथ्वी पर अवतरित होंगी तो उनके वेग को पृथ्वी संभाल नहीं सकेगी, और वे सीधे पाताल में चली जायँगी। यदि गंगा के वेग को संभालने की किसी में क्षमता है तो वह है केवल महादेवजी में। इसीलिए तुम्हें पहले भगवान शिव को प्रसन्न करना होगा, तभी तुम गंगा को धरती पर ले जा पाओगे।“
भगवान् विष्णु से अनुमति मिलने के बाद भगीरथ ने गंगा का वेग संभालने के लिये एक वर्ष तक पैर के अंगूठे के सहारे खड़े होकर महादेव जी की तपस्या की। इस दौरान उन्होंने वायु के अलावा अन्य किसी भी चीज़ का ग्रहण नहीं किया। उनकी इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव जी ने उन्हें दर्शन दिए और बोले, “हे परम भक्त ! तुम्हारी भक्ति से मैं बेहद प्रसन्न हुआ। मैं अवश्य तुम्हारी मनोकामना को पूरा करूँगा, जिसके लिए मैं अपने मस्तक पर गंगा जी को धारण करूँगा।“ इतना कहकर भगवान शिव वापस अपने लोक चले गए। यह सूचना जब गंगा जी तक पहुँची तो वह चिंतित हो गईं, क्योंकि वह देवलोक छोड़ कहीं जाना नहीं चाहती थीं। वे भगवान् विष्णु से प्रार्थना की। भगवान् विष्णु ने कहा- "मृत्युलोक के कल्याण के लिये तुम्हें धरती पर जाना ही होगा। वहाँ के जीव तुम्हारे जल का स्पर्श पाकर पाप मुक्त होंगे, और उनका उद्धार होगा।" गंगाजी ने कहा- किन्तु इस प्रकार तो सभी जीवों के पाप से तो मेरा पूरा अस्तित्व ही मैला हो जायेगा और सभी पाप मुझमें भर जायेंगे।" भगवान् बोले- "नहीं देवी ! ऐसा नहीं होगा, जब भी किसी सन्त से तुम्हारे जल का स्पर्श होगा तुम पुनः पूर्णतः पाप मुक्त पवित्र हो जाओगी।" भगवान् विष्णु से आश्वस्त हो गंगा श्रीहरि विष्णु चरणों से होकर वहाँ से चल दीं।
अपने चंचल स्वभाव के अनुरूप उन्होंने योजना बनाई कि वह अपने प्रचण्ड वेग से शिवजी को बहा कर पाताल लोक ले जाएंगी। परिणामस्वरूप गंगा जी भयानक वेग से शिवजी के सिर पर अवतरित हुईं, लेकिन शिवजी गंगा की मंशा को समझ चुके थे। गंगा को अपने साथ बाँधे रखने के लिए महादेव जी ने गंगा धाराओं को अपनी जटाओं में धीरे-धीरे बाँधना शुरू कर दिया। अब गंगा जी इन जटाओं से बाहर निकलने में असमर्थ थीं। गंगा जी को इस प्रकार शिवजी की जटाओं में विलीन होते देख भगीरथ ने फिर शंकर जी की तपस्या की। ‘श्रीजी की चरण सेवा‘ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ’श्रीजी की चरण सेवा’ के साथ जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
भगीरथ के इस तपस्या से शिव जी फिर से प्रसन्न हुए और आखिरकार गंगा जी को हिमालय पर्वत पर स्थित बिन्दुसर में छोड़ दिया। छूटते ही गंगा जी सात धाराओं में बंट गईं। इन धाराओं में से पहली तीन धाराएँ ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व की ओर प्रवाहित हुईं। अन्य तीन सुचक्षु, सीता और सिन्धु धाराएँ पश्चिम की ओर बहीं और आखिरी एवं सातवीं धारा महाराज भगीरथ के पीछे-पीछे चल पड़ी। महाराज जहाँ भी जाते वह धारा उनका पीछा करती।
एक दिन गलती से चलते-चलते गंगा जी उस स्थान पर पहुंचीं जहाँ ऋषि जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगा जी बहते हुए अनजाने में उनके यज्ञ की सारी सामग्री को अपने साथ बहाकर ले गईं, जिस पर ऋषि को बहुत क्रोध आया और उन्होंने क्रुद्ध होकर गंगा का सारा जल पी लिया। यह देख कर समस्त ऋषि मुनियों को बड़ा विस्मय हुआ और वे गंगा जी को मुक्त करने के लिये उनकी स्तुति करने लगे। अंत में ऋषि जह्नु ने अपने कानों से गंगा जी को बहा दिया और उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब से गंगा जी का नाम जाह्नवी भी पड़ा। इसके पश्चात् वे भगीरथ के पीछे चलते-चलते उस स्थान पर पहुँचीं, जहाँ उसके चाचाओं की राख पड़ी थी। उस राख का गंगा के पवित्र जल से मिलन होते ही सगर के सभी पुत्रों की आत्मा स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गई।
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॥नमामि गंगे॥
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🔥 अष्ट भैरव – महादेव के आठ भयंकर रूप 🔱भगवान शिव के अष्ट भैरव रूप शक्ति, तंत्र, रक्षा और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं।इन...
25/05/2026

🔥 अष्ट भैरव – महादेव के आठ भयंकर रूप 🔱
भगवान शिव के अष्ट भैरव रूप शक्ति, तंत्र, रक्षा और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं।
इन आठों भैरवों की पूजा से भय, नकारात्मक ऊर्जा और संकटों का नाश होता है। 🚩

गंगा दशहरा के दिन 10 की संख्या का विशेष महत्व माना गया है. यदि आप अपनी मानसिक शांति और भाग्य को मजबूत करना चाहते हैं, तो...
25/05/2026

गंगा दशहरा के दिन 10 की संख्या का विशेष महत्व माना गया है. यदि आप अपनी मानसिक शांति और भाग्य को मजबूत करना चाहते हैं, तो इस दिन इन 10 चीजों को अपनी दान की लिस्ट में जरूर शामिल करें:

1. जल
गर्मी के इस मौसम में राहगीरों और जरूरतमंदों को शीतल जल पिलाना या पानी से भरा घड़ा (मटका) दान करना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है. इससे कुंडली में चंद्रमा और सूर्य की स्थिति मजबूत होती है.

2. अन्न
किसी भूखे या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न दान (जैसे चावल, गेहूं या सीधा) करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती.

3. फल
मौसम के फल, विशेषकर रसीले फल जैसे आम, तरबूज या खरबूजा दान करना स्वास्थ्य के लिए शुभ माना जाता है. यह दान आपके जीवन में मिठास और खुशहाली लाता है.

4. वस्त्र
सच्चे मन से किसी गरीब या ब्राह्मण को नए और स्वच्छ वस्त्रों का दान करें. वस्त्र दान करने से समाज में मान-सम्मान बढ़ता है.

5. छाता
ज्येष्ठ मास की चिलचिलाती धूप और गर्मी से बचाने के लिए छाते का दान करना बेहद कल्याणकारी माना गया है. इससे जीवन में आने वाले संकटों से रक्षा होती है.

6. पंखा
हाथ का पंखा (बिजना) या कोई भी पंखा दान करने से पितर प्रसन्न होते हैं. मान्यता है कि इससे घर का क्लेश शांत होता है, परिवार में मानसिक शांति आती है.

7. जूता या चप्पल
धूप में नंगे पैर चलने वाले किसी जरूरतमंद को जूते या चप्पल दान करने से राहु-केतु के दोष शांत होते हैं , जीवन की राह आसान होती है.

8. सुहाग सामग्री या घी
पूजा में इस्तेमाल होने वाला शुद्ध देसी घी या सुहागिन महिलाओं को सुहाग की सामग्री दान करने से घर की सुख-समृद्धि और सौभाग्य में वृद्धि होती है.

9. सत्तू
गर्मी के दिनों में सत्तू का दान सेहत और आध्यात्मिकता दोनों के लिहाज से उत्तम माना गया है. इसका दान करने से ग्रह दोष दूर होते हैं.

10. दक्षिणा
ऊपर दी गई किसी भी सामग्री के साथ अपनी श्रद्धा के अनुसार कुछ सिक्के या धन (दक्षिणा) का दान अवश्य करें. बिना दक्षिणा के कोई भी दान अधूरा माना जाता है.

स्कंद पुराण और शास्त्रों के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन पूजा और दान में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की संख्या भी संभव हो तो 10 रखनी चाहिए (जैसे 10 फल, 10 दीपक या 10 ब्राह्मणों को दान). दान हमेशा अपनी क्षमता के अनुसार, शांत मन से और बिना किसी अहंकार के पूरी श्रद्धा के साथ करना चाहिए.

🌺📖 पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 9 सार 📖🌺📜 इस अध्याय में बताया गया है कि जो भक्त पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा, संय...
24/05/2026

🌺📖 पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 9 सार 📖🌺

📜 इस अध्याय में बताया गया है कि जो भक्त पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा, संयम और नियमपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा, जप, व्रत, दान और कथा श्रवण करता है, उसके जीवन के सभी दुख, पाप और बाधाएँ दूर हो जाती हैं। 🌿💛

भगवान श्रीहरि अपने भक्तों को सुख, समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
इस पवित्र मास में किया गया हर पुण्य कार्य अक्षय फल देने वाला माना गया है। 🌸✨

💫 पुरुषोत्तम मास हमें सेवा, सत्संग, दया और भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा रखने की प्रेरणा देता है। 💫

🙏 “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम, राम हरे हरे” 🙏

#पुरुषोत्तममास #अधिकमास #श्रीहरि #विष्णुभक्ति

क्या आप जानते हैं कि माता लक्ष्मी के आंसुओं से उत्पन्न हुआ था बेलपत्र का वृक्ष? 🌿 अश्रु, ईर्ष्या और १००० वर्षों की तपस्य...
24/05/2026

क्या आप जानते हैं कि माता लक्ष्मी के आंसुओं से उत्पन्न हुआ था बेलपत्र का वृक्ष? 🌿 अश्रु, ईर्ष्या और १००० वर्षों की तपस्या—पढ़िए भगवान शिव और बेलपत्र से जुड़ी यह अनदेखी और अद्भुत कथा! 👇
🌿 भगवान शिव को आखिर 'बिल्वपत्र' (बेलपत्र) इतना प्रिय क्यों है? जानिए इसके पीछे की अद्भुत कथा! 🔱✨
एक बार देवर्षि नारद कैलाश पहुँचे और महादेव से पूछा— "हे प्रभु! कलियुग में मनुष्य अत्यंत दुखी है। मानव जाति के कल्याण के लिए कोई ऐसा सरल उपाय बताएं जिससे आप शीघ्र प्रसन्न हो जाएं।"
महादेव ने मुस्कुराकर उत्तर दिया— "देवर्षि! मुझे प्रसन्न करने के लिए किसी विशेष पूजा विधि की आवश्यकता नहीं है। जो भक्त मुझे केवल एक लोटा जल और बिल्वपत्र (बेलपत्र) अर्पित कर देता है, मैं उसी से प्रसन्न हो जाता हूँ।"
पास ही बैठीं माता पार्वती को यह सुनकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा— "स्वामी! आखिर आपको यह बिल्वपत्र इतना प्रिय क्यों है?"
तब महादेव ने एक अत्यंत रोचक कथा सुनाई...👇
🌸 जब माता लक्ष्मी को हुई देवी सरस्वती से ईर्ष्या!
महादेव ने बताया— "हे देवी! एक बार ब्रह्मा जी, श्रीहरि विष्णु और अन्य देवताओं ने मेरे रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की पूजा की। उस समय वाग्देवी (माता सरस्वती) ने मेरी इतनी मधुर स्तुति की कि स्वयं भगवान विष्णु भी मंत्रमुग्ध हो गए। सम्मान और श्रद्धा में श्रीहरि ने देवी सरस्वती के लिए कई छंदों की रचना कर दी।"
💧 आंसुओं से हुई बिल्व वृक्ष की उत्पत्ति
श्रीहरि को सरस्वती जी के प्रति इतना मुग्ध देखकर, माता लक्ष्मी को ईर्ष्या होने लगी। वे रूठकर बैकुंठ से पृथ्वी लोक पर आ गईं। विरह के दुख में उनके नेत्रों से जो अश्रु गिरे, उन्हीं अश्रुओं से बिल्व (बेल) के वृक्ष की उत्पत्ति हुई।
उसी स्थान पर माता लक्ष्मी ने १००० वर्षों तक उसी वृक्ष के पत्तों (बिल्वपत्रों) से मेरी घोर तपस्या की।
✨ महादेव का वरदान और शिव-कृपा
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब मैंने उन्हें दर्शन दिए, तो उन्होंने वरदान माँगा— "हे प्रभु! मेरे स्वामी का मन वाग्देवी से हटकर पुनः मुझमें लग जाए।"
यह सुनकर मैं हँसा और मैंने उन्हें समझाया— "देवी! नारायण के मन में वाग्देवी के लिए केवल श्रद्धा का भाव है, अनुराग नहीं। श्रीहरि के हृदय में आपके अतिरिक्त किसी और का वास हो ही नहीं सकता।"
महादेव के मुख से यह सत्य जानकर माता लक्ष्मी संतुष्ट हुईं और प्रसन्नता पूर्वक अपने स्वामी के पास बैकुंठ लौट गईं।
🌿 चूंकि माता लक्ष्मी ने सहस्त्रों वर्षों तक बिल्वपत्रों से मेरी आराधना की थी, और बिल्वपत्र स्वयं उनके ही अश्रुओं (तपस्या) का परिणाम है, इसीलिए यह मुझे अत्यंत प्रिय है।
सीख: भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र का चढ़ना केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि यह माता लक्ष्मी की तपस्या और शिव-कृपा का साक्षात प्रतीक है! 🙏
ॐ नमः शिवाय! 🔱 यदि आपको यह कथा ज्ञानवर्धक लगी हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य शेयर करें।

🌺📖 पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 7 सार 📖🌺पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के सातवें अध्याय में भगवान श्रीहरि की भक्त...
23/05/2026

🌺📖 पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 7 सार 📖🌺

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के सातवें अध्याय में भगवान श्रीहरि की भक्ति, सत्य और धर्म के पालन की महिमा का वर्णन किया गया है। 🙏✨

📜 इस अध्याय में बताया गया है कि जो मनुष्य पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा, संयम और नियमपूर्वक भगवान विष्णु का पूजन, जप, व्रत और कथा श्रवण करता है, उसके जीवन के सभी पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं। 🌿💛

💫 पुरुषोत्तम मास हमें भक्ति, सेवा, दया और धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा देता है। 💫

🙏 “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” 🙏

#पुरुषोत्तममास #अधिकमास #श्रीहरि #विष्णुभक्ति

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के आठवें अध्याय में भगवान श्रीहरि की भक्ति, सत्संग और पुण्य कर्मों की महिमा का सुंदर वर्णन ...
23/05/2026

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के आठवें अध्याय में भगवान श्रीहरि की भक्ति, सत्संग और पुण्य कर्मों की महिमा का सुंदर वर्णन किया गया है। 🙏✨

📜 इस अध्याय में बताया गया है कि जो भक्त पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान विष्णु का स्मरण, व्रत, जप, दान और कथा श्रवण करता है, उसके सभी पाप नष्ट होकर जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। 🌿💛

💫 पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि, सेवा, भक्ति और भगवान के निकट आने का दिव्य अवसर है। 💫

🙏 “श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे,
हे नाथ नारायण वासुदेव” 🙏

#पुरुषोत्तममास #अधिकमास #श्रीहरि #विष्णुभक्ति

🟡 जब रोते हुए मलमास को लेकर गोलोक पहुंचे भगवान श्री विष्णु           ✨॥ श्री पुरुषोत्तम मास माहात्म्य ॥✨                ...
22/05/2026

🟡 जब रोते हुए मलमास को लेकर गोलोक पहुंचे भगवान श्री विष्णु

✨॥ श्री पुरुषोत्तम मास माहात्म्य ॥✨
✨॥ अध्याय ६ ॥✨

​नारद जी बोले— "भगवान गोलोक में जाकर क्या करते हैं? हे पापरहित! मुझ श्रोता के ऊपर कृपा करके यह कथा कहिए।"

​श्रीनारायण बोले— "हे नारद! पापरहित अधिमास को लेकर भगवान विष्णु के गोलोक जाने पर जो घटना हुई, वह हम कहते हैं, सुनो।

​उस गोलोक के भीतर मणियों के खंभों से सुशोभित, सुंदर पुरुषोत्तम के धाम को भगवान विष्णु दूर से देखते हैं। उस धाम के तेज से चौंधियाए (बंद हुए) नेत्रों वाले विष्णु जी धीरे-धीरे नेत्र खोलकर और अधिमास को अपने पीछे करके मंद-मंद गति से धाम की ओर जाते हैं। अधिमास के साथ भगवान के मंदिर के पास पहुंचकर विष्णु जी अत्यंत प्रसन्न हुए। वहां उठकर खड़े हुए द्वारपालों द्वारा वंदित (अभिनंदित) भगवान विष्णु, पुरुषोत्तम भगवान की शोभा से आनंदित होकर धीरे-धीरे मंदिर में गए और भीतर जाकर शीघ्र ही श्रीपुरुषोत्तम कृष्ण को नमस्कार करते हैं।

​गोपियों के मंडल के मध्य में रत्नमय सिंहासन पर बैठे हुए श्रीकृष्ण को नमस्कार कर, पास में खड़े होकर विष्णु जी बोले।

​श्रीविष्णु बोले— "जो गुणों से अतीत हैं, गोविन्द हैं, अद्वितीय, अविनाशी, सूक्ष्म, विकाररहित और दिव्य विग्रहवान हैं; जो गोपों का वेष धारण करने वाले, किशोर अवस्था वाले, शांत स्वरूप, गोपियों के स्वामी और अत्यंत सुंदर हैं; जो नवीन मेघ के समान श्यामवर्ण हैं, करोड़ों कामदेवों के समान लावण्यमय हैं, और वृंदावन के भीतर रासमंडल में विराजमान हैं; जो पीले रंग के पीतांबर से शोभित हैं, सौम्य हैं, और भौंहें चढ़ाने पर मस्तक में तीन रेखाएं पड़ने से सुंदर आकृति वाले प्रतीत होते हैं; जो रासलीला के स्वामी हैं, रासलीला में ही निवास करने वाले और रासलीला करने में सदा उत्सुक रहते हैं; उन दो भुजाओं वाले, मुरलीधर, पीतवस्त्रधारी अच्युत भगवान श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ।"

​इस प्रकार स्तुति करके भगवान श्रीकृष्ण को नमस्कार कर, पार्षदों द्वारा सत्कार पाने के बाद विष्णु जी श्रीकृष्ण की आज्ञा से एक रत्नजड़ित सिंहासन पर बैठ गए।

​श्रीनारायण बोले— "विष्णु जी द्वारा किए गए इस स्तोत्र का जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। बुरे स्वप्न भी अच्छा फल देने लगते हैं और श्रीगोविन्द के चरणों में पुत्र-पौत्रादि को बढ़ाने वाली भक्ति प्राप्त होती है; अपकीर्ति का नाश होकर सत्कीर्ति की वृद्धि होती है।

​इसके बाद भगवान विष्णु बैठ गए और अपने आगे कांपते हुए अधिमास को श्रीकृष्ण के चरण-कमलों में नमन कराया।

​तब श्रीकृष्ण ने विष्णु जी से पूछा— 'यह कौन है? कहां से यहां आया है और क्यों रो रहा है? इस गोलोक में तो कोई भी दुःख का भागी नहीं होता। इस गोलोक में रहने वाले तो सर्वदा आनंद में मग्न रहते हैं; ये लोग तो स्वप्न में भी दुष्ट वार्ता या दुःखभरा समाचार नहीं सुनते। अतः हे विष्णो! यह क्यों कांप रहा है और आंखों से आंसू बहाता हुआ अत्यंत दुःखी होकर हमारे सम्मुख किसलिए खड़ा है?'"

​श्रीनारायण बोले— "नवीन मेघ के समान श्यामसुंदर, गोलोक के नाथ के ऐसे वचन सुनकर, सिंहासन से उठकर महाविष्णु मलमास की संपूर्ण दुःख-गाथा कहते हुए बोले।"

​श्रीविष्णु बोले— "हे वृंदावन की शोभा के स्वामी! हे श्रीकृष्ण! हे मुरलीधर! इस अधिमास के दुःख को मैं आपके सामने कहता हूँ, आप सुनें। इसके अत्यंत दुःखी होने के कारण ही इस स्वामीविहीन अधिमास को लेकर मैं आपके पास आया हूँ, आप इसकी उग्र दुःखरूपी अग्नि को शांत करें। यह अधिमास सूर्य की संक्रांति से रहित है, इसलिए मलिन माना जाता है और शुभ कार्यों में सर्वदा वर्जित है। 'स्वामी रहित इस मास में स्नान-दानादि नहीं करना चाहिए'— ऐसा कहकर वनस्पति आदि सभी ने इसका निरादर किया है।

​बारह महीनों, कला, क्षण, अयन और संवत्सर आदि के स्वामियों ने अपने-अपने स्वामियों के गर्व में आकर इसका अत्यंत तिरस्कार किया। इसी दुःखाग्नि से जलकर जब यह मरने के लिए उद्यत हुआ, तब अन्य दयालु व्यक्तियों द्वारा प्रेरित होकर, हे हृषीकेश! यह शरण पाने की इच्छा से मेरे पास आया और कांपते-कांपते तथा घड़ी-घड़ी रोते-रोते इसने अपना सब दुःखजाल मुझसे कहा। इसका यह भारी दुःख आपके बिना कोई दूर नहीं कर सकता, इसीलिए इस निराश्रय का हाथ पकड़कर मैं इसे आपकी शरण में लाया हूँ।

​'आप दूसरों का दुःख सहन नहीं कर सकते'— ऐसा वेदवेत्ता (वेद जानने वाले) लोग कहते हैं। अतः इस दुःखी पर कृपा करके इसे सुख प्रदान कीजिए। हे जगत्पते! 'आपके चरणकमलों को प्राप्त हुआ प्राणी कभी शोक का भागी नहीं होता'— ऐसा वेदवेत्ताओं का कहना भला कैसे मिथ्या हो सकता है? मेरे ऊपर कृपा करके भी इसका दुःख दूर करना आपका कर्तव्य है, क्योंकि मैं अपने सारे काम छोड़कर इसे लेकर आया हूँ, मेरा आना सफल कीजिए। 'बार-बार स्वामी के सामने कभी भी एक ही विषय को नहीं दोहराना चाहिए'— ऐसी नीति जानने वाले बड़े-बड़े पंडित सर्वदा कहा करते हैं।"

​इस प्रकार अधिमास का सारा दुःख भगवान कृष्ण से कहकर, श्रीहरि कृष्ण के मुखकमल की ओर देखते हुए उनके पास ही हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

​ऋषि लोग बोले— "हे सूत जी! आप दाताओं में श्रेष्ठ हैं, आपकी आयु दीर्घ हो, जिससे हम लोग आपके मुख से भगवान की लीला कथारूपी अमृत का निरंतर पान करते रहें। हे सूत जी! गोलोकवासी भगवान कृष्ण ने इसके बाद विष्णु जी से क्या कहा? और फिर क्या किया? लोकोपकार करने वाला विष्णु-कृष्ण का यह अद्भुत संवाद आप हमसे कहिए।

​परम भगवद्भक्त नारद जी ने नारायण से आगे क्या पूछा? हे सूत जी! इस समय वह सब आप हमें सुनाइए। नारद जी के प्रति कहे गए भगवान के वचन तपस्वियों के लिए परम औषधि के समान हैं।"

​इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

​🌸 ॥ जय श्री पुरुषोत्तम भगवान की जय ॥ 🌸

​ #सनातनपंचांग #पुरुषोत्तम_मास #अधिकमास #मलमास #पुरुषोत्तममासमहात्म्य #श्रीकृष्ण #भगवानविष्णु #गोलोक #हरिशरणम् #जयश्रीराधे #धार्मिककथा #सनातन_धर्म #हिंदूधर्म #व्रतकथा

🔱 केदारनाथ और पशुपतिनाथ का वह रहस्य, जो सीधे महाभारत और पांडवों से जुड़ा है! 🔱महाभारत के युद्ध के बाद कुरुक्षेत्र की भूमि...
22/05/2026

🔱 केदारनाथ और पशुपतिनाथ का वह रहस्य, जो सीधे महाभारत और पांडवों से जुड़ा है! 🔱
महाभारत के युद्ध के बाद कुरुक्षेत्र की भूमि तो शांत हो गई, लेकिन पांडवों का अंतर्मन अशांत था। अपने ही गुरुओं और बंधु-बांधवों के वध के कारण उन पर 'गोत्र-हत्या' और 'ब्रह्म-हत्या' का महापाप लग गया था। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें एक ही मार्ग सुझाया— "महादेव की शरण।"
किन्तु भगवान शिव पांडवों से रुष्ट थे और उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे। जब पांडव उन्हें खोजते हुए काशी पहुँचे, तो महादेव अंतर्ध्यान होकर केदारखंड (उत्तराखंड) की पहाड़ियों में चले गए। पांडव भी कहाँ हार मानने वाले थे! वे महादेव को खोजते हुए गुप्तकाशी पहुँच गए।
पांडवों को आता देख महादेव ने एक बैल (वृषभ) का रूप धारण किया और पशुओं के झुंड में छिप गए। तब महाबली भीम ने एक अद्भुत युक्ति निकाली:
👉 उन्होंने अपना शरीर विशाल किया और दो पर्वतों पर अपने पैर फैला दिए।
👉 सारे पशु उनके पैरों के नीचे से निकल गए, लेकिन शिव रूपी वृषभ ने किसी के चरणों के नीचे से निकलना स्वीकार नहीं किया!
जैसे ही भीम ने उस बैल को पकड़ने का प्रयास किया, वह भूमि में समाने लगा। तभी भीम ने अपनी पूरी शक्ति से बैल की कूबड़ (पीठ) कसकर पकड़ ली। पांडवों की इस अडिग श्रद्धा और भक्ति को देखकर अंततः भोलेनाथ का हृदय पिघल गया और उन्होंने अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर पांडवों को पापमुक्त किया। 🌸
जब महादेव बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके शरीर के अंग पाँच अलग-अलग स्थानों पर ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हुए, जिन्हें आज हम 'पंच केदार' कहते हैं:
१. केदारनाथ: यहाँ महादेव के बैल रूपी 'कूबड़' (पीठ) की पूजा होती है।
२. तुंगनाथ: यहाँ शिवजी की 'भुजाओं' की पूजा होती है (यह विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर है)।
३. रुद्रनाथ: यहाँ महादेव के 'नीलकंठ मुख' के दर्शन होते हैं।
४. मध्यमहेश्वर: यहाँ भगवान शिव के 'मध्य भाग' (नाभि) की पूजा होती है।
५. कल्पेश्वर: यहाँ महादेव की जटाओं की पूजा होती है।
✨ क्या आप जानते हैं?
कहा जाता है कि जब शिव जी बैल रूप में धरती में समाए, तो उनका ऊपरी भाग (सिर) नेपाल की राजधानी काठमांडू में प्रकट हुआ, जिसे आज हम 'पशुपतिनाथ' के नाम से पूजते हैं! केदारनाथ और पशुपतिनाथ को एक ही स्वरूप माना जाता है।
मान्यता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन के बाद अन्य चार केदारों की यात्रा करता है, उसके पितर तृप्त हो जाते हैं और उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है।
अगर आपको यह पौराणिक जानकारी अद्भुत लगी हो, तो कमेंट में पूरे भाव से लिखें— हर हर महादेव! 🙏🌺

🌺📖 पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 5 सार 📖🌺पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के पाँचवें अध्याय में भगवान श्रीहरि की असी...
21/05/2026

🌺📖 पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा : अध्याय 5 सार 📖🌺

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के पाँचवें अध्याय में भगवान श्रीहरि की असीम कृपा, व्रत की महिमा और सच्ची भक्ति के प्रभाव का वर्णन किया गया है। 🙏✨

📜 इस अध्याय में बताया गया है कि जो भक्त पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान विष्णु की आराधना, उपवास, जप, दान और कथा श्रवण करता है, उसके जीवन के पाप और कष्ट धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। 🌿💛

भगवान श्रीहरि अपने भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण कर उन्हें सुख, शांति और आध्यात्मिक बल प्रदान करते हैं।

💫 पुरुषोत्तम मास हमें भक्ति, सेवा, संयम और धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा देता है। 💫

🙏 “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” 🙏

#पुरुषोत्तममास #अधिकमास #विष्णुभक्ति #श्रीहरि

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