Chitragupta Adi Mandir

Chitragupta Adi Mandir The Shri Chitragupta Adi Mandir, the seat of the black basalt statue, is a fine example of Indian temple architecture.

Its dome rests on 16 columns, arranged in rows of four. From the dome rises a four-walled projection that takes a pyramidical shape at the top. The garbhgriha, literally the womb of the idol, is surrounded by a pathway meant to facilitate its circumvention by the devotees.

चौठ चंद     पूजा क्या है, और कैसे मनाया जाता है जानने के लिए दिए गए   पर   करे
25/01/2021

चौठ चंद पूजा क्या है, और कैसे मनाया जाता है
जानने के लिए दिए गए पर करे

गणेश चतुर्थी , चौठ चन्द्र, चौरचन पूजा का महत्व, कथा पूजा विधि, मिथिलांचल में चौरचन की पूजा, answer point

21/02/2020
14/06/2019

कायस्थों के चार-धाम

यू तो भारतवर्ष में भगवान चित्रगुप्त जी के अनेक मंदिर हैं, परन्तु इनमें से पौराणिक एवं एतिहासिक महत्व के प्रथम चार मंदिर, कायस्थों के चार धामों के समतुल्य महत्व रखते हैं। ये महत्वपूर्ण और प्रसिद्व तो हैं ही, प्रश्न है हमारी आस्था और विश्वास का। ये मंदिर निम्न हैं :-

1 . मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के अंकपात में सिथत शिला मंदिर :- पौराणिक आख्यानों के अनुसार मान्यता है कि कायस्थों के आदि पूर्वज, श्री चित्रगुप्त जी का प्रादुर्भाव, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, पौराणिक अवनितका अथवा उज्जयिनी के अंक-पात क्षेत्र में हुआ था। यहीं पर उन्होंने देव गुरु बृहस्पति तथा दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से सभी शिक्षायें प्राप्त करके, धर्मराज के सहायक का पदभार ग्रहण किया था। पदमपुराण के सृषिट खंड में आख्यान है कि सृषिट की रचना के समय उत्पन्न तमाम जीवधारियों के कर्मानुसार फल देने का दायित्व, विवस्वान पुत्र यम को, जिन्हें धर्मराज की उपाधि से भी विभूषित किया गया था, को दिया गया था। उज्जैन, जहा सिंहस्थ सूर्य के कुम्भ के आयोजन के लिये जाना जाता है, वहीं शिव के चौदह ज्योतिर्लिगों में से एक महाकालेश्वर (महाकाल) के पावन मंदिर के लिये, हिंदू संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान भी रखता है। उत्तर वैदिक और पौराणिक इतिहास में दक्षिणा के पथ पर सिथत होने के कारण उज्जैन एक प्राचीन व्यापारिक केन्द्र के रुप में भी प्रसिद्व था। क्षिप्रा नदी के तट पर सिथत, अवनितका अथवा उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) भारतीय पुराणों में एक पवित्र मोक्षदाता तीर्थ बताया गया है और अंकपात क्षेत्र, जहा चित्रगुप्त जी ने तपस्या करके सर्वज्ञता की थी, उज्जैन नगर से लगभग 12 किमी. उत्तर दिशा में सिथत है।

सन 1985 र्इ. में क्षिप्रा नदी के किनारे, इसी अंकपात के वन क्षेत्र में एक चौकोर शिला स्थापित थी जिसके एक ओर संभवत: धर्मराजजी और दूसरी ओर श्री चित्रगुप्त जी के चित्र उकेरे हुए थे।

डा. रतन चन्द्र जी वर्मा की प्रेरणा से उज्जैन निवासी चित्रांश बंधुओं ने, जिनमें श्री कृष्ण मंगलसिंह जी कुलश्रेष्ठ अग्रणी थे, ने ‘चित्रगुप्त शिला’ पर एक मंदिर का निर्माण कराया था, जो अब ”श्री चित्रगुप्त शिला मंदिर” कहा जाता है । बाद में इस मंदिर के विस्तार और विकास के लिये एक ट्रस्ट की स्थापना की गर्इ। इसके संस्थापक प्रबंध-न्यासी थे श्री कृष्ण मंगल सिंह कुलश्रेष्ठ, एडवोकेट। इस ट्रस्ट की देख-रेख में एक विशाल मंदिर काम्प्लेक्स, धीरे-धीरे आकार ग्रहण कर रहा है। अब यहा कायस्थों के आयोजन होते रहते हैं।

2 . श्री धर्महरि चित्रगुप्त मंदिर अयोध्या जिला फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) :- ”श्री धर्महरि चित्रगुप्त मंदिर” वर्तमान में, सरयू नदी के दक्षिण, नयाघाट से फैजाबाद, राजमार्ग पर सिथत तुलसी उधान से लगभग 500 मीटर पूरब दिशा में, डेरा बीबी मोहल्ले में, बेतिया राज्य के मंदिर के निकट है। वैसे नयाघाट से मंदिर की सीधी दूरी लगभग एक किमी. होगी। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, स्वंय भगवान विष्णु ने इस मंदिर की स्थापना की थी और धर्मराज जी को दिये गये वरदान के फलस्वरुप ही धर्मराज जी के साथ इनका नाम जोड़ कर इस मंदिर को ‘श्री धर्म-हरि मंदिर’ का नाम दिया है। श्री अयोध्या महात्मय में भी इसे श्री धर्म हरि मंदिर कहा गया है। किवदंति है कि विवाह के बाद जनकपुर से वापिस आने पर श्रीराम-सीता ने सर्वप्रथम धर्महरि जी के ही दर्शन किये थे। धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उसे इस तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होता। अयोध्या के इतिहास में उल्लेख है कि सरयू के जल प्रलय से अयोध्या नगरी पूर्णतया नष्ट हो गर्इ थी और विक्रमी संवत के प्रवर्तक सम्राट विक्रमादित्य ने जब अयोध्या नगरी की पुनस्र्थापना की तो सर्वप्रथम श्री धर्म हरि जी के मंदिर की स्थापना करार्इ थी।

मंदिर की व्यवस्था के संचालन हेतु, सुल्तानपुर निवासी मुंशी बिन्देश्वरी प्रसाद जी ने, अठारह बीघे भूमि दान की थी, परन्तु ब्राहमण पुजारी ने उस जमीन को अपने नाम करवाकर, खुर्द-बुर्द कर दिया था। सन 1882 र्इ. में एक्सट्रा असिस्टेन्ट कमिश्नर श्री महेश प्रसाद जी के प्रयासों से ”कायस्थ धर्म सभा अयोध्या” की स्थापना हुर्इ थी और फैजाबाद के श्री शिवराज सिंह जी वकील सभा के मंत्री बने थे। अत: पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व का श्री धर्महरि चित्रगुप्त मंदिर कायस्थों के चारों धामों में दूसरे स्थान का महत्व रखता है।

3 . तमिलनाडू के काचीपुरम (पौराणिक-काचीपुरी) का श्री चित्रगुप्त स्वामी मंदिर :- दक्षिण भारत के तमिलग्रन्थ करणीगर पुराणम के साथ ही ”विष्णु धर्मोत्तर पुराण” में भी श्री चित्रगुप्त स्वामी के नाम से ज्ञात श्री चित्रगुप्त वशंज माने गये ”करुणीगर कायस्थों” का उल्लेख मिलता है। इन्हीं श्री चित्रगुप्त स्वामी का एक भव्य मंदिर, मंदिरों की नगरी काचीपुरम में नगर के मध्य में सिथत है। दक्षिण भारत के तमिल क्षेत्र में इन करणीगरों की मान्यता वैसी ही है जैसी उत्तर भारत के बारह चित्रगुप्तवंशी कायस्थों की। परन्तु, ”करुणीगर पुराणम” के अनुसार श्री चित्रगुप्त स्वामी एक नीला देवी से भगवान सूर्य के पुत्र हैं। श्री चित्रगुप्त स्वामी का मंदिर, काचीपुरम नगर के मध्य में, श्री रामकृष्ण आश्रम से लगभग एक फलाग की दूरी पर एक ऊचे चबूतरे पर सिथत है। यह चबूतरा इतना ऊचा है कि कोर्इ भी दर्शनार्थी नीचे खड़े होकर, मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मूर्ति के दर्शन नहीं कर सकता, उसे चबूतरे पर ऊपर चढ़ने के बाद ही श्री चित्रगुप्त स्वामी के दर्शन प्राप्त हो सकते हैं। मंदिर का स्थापत्य बहुत सुन्दर, भव्य और गरिमामय है। मंदिर के गर्भ गृह में, हाथों में कलम दवात लिये हुये भगवान चित्रगुप्त स्वामी के साथ ही देवी कार्नकी की कास्य प्रतिमा स्थापित है।

5 . बिहार के पटना सिटी के दीवान मोहल्ले में, नौजरघाट सिथत ”श्री चित्रगुप्त आदि मंदिर पटना” मगघ की प्राचीन राजधानी पाटलिपुत्र तथा बिहार राज्य के आधुनिक मुख्यालय पटना में, पतित पावनी गंगा के तट पर, दीवान मोहल्ला के नौजरघाट पर सिथत इस ऐतिहासिक चित्रगुप्त मंदिर को पटना के कायस्थों ने श्री चित्रगुप्त आदि की संज्ञा क्यों दी ? यह स्पष्ट नहीं किया गया है। बताया जाता है कि सर्वप्रथम इस मंदिर का निर्माण, नंद वंश के अंतिम मगध सम्राट धनानन्द ने इतिहास प्रसिद्व महामंत्री, चित्रगुप्तवंशी ”राक्षस” ने र्इसा पूर्व कराया था। यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर का पुर्ननिर्माण, मुगल सम्राट के नौरत्नों में से एक और वर्तमान जिला औरंगाबाद के मूल निवासी और इतिहास प्रसिद्व शेरशाह सूरी के भी मत्री रह चुके, राजा टोडरमल तथा उनके नायब रहे कुवर किशोर बहादुर ने करवाकर, कसौटी पत्थर की भगवान चित्रगुप्तजी की मूर्ति, हिजरी सन 980 तदानुसार र्इसवीं सन 1574 में स्थापित करार्इ थी। र्इसवीं सन 1766 में राजा सिताबराय ने मंदिर के चारों ओर की भूमि, मंदिर के नाम करवाकर चारदीवारी बनवार्इ थी। बाद में राजा सिताबराय के पौत्र, महाराज भूपनारायण सिंहं ने, जयपुर से मंगवाये गये, नक्काशीदार पत्थरों से मंदिर को भव्यता प्रदान की थी। परन्तु देख-रेख के अभाव में, मंदिर जीर्ण-शीर्ण ही नहीं हो गया, वरन मंदिर में स्थापित कसौटी पत्थर की मूर्ति तस्करों द्वारा चुरा ली गर्इ थी। तत्पश्चात संवत 2019, तदानुसार र्इसवीं सन 1962 में, पटना सिटी निवासी, चित्रगुप्तवंशी राजा रामनारायण वंशज राय मथुरा प्रसाद जी ने मंदिर में, स्फटिक पत्थर की मूर्ति स्थापित करवाकर, मंदिर को मंदिर की प्रतिष्ठा दिलार्इ थी। यही मूर्ति 11.11.2007 तक इस मंदिर में शोभायमान थी। इस मंदिर में एक शिव मंदिर भी है।

14/06/2019

एचएस.न्यूज/डेस्क/गोविन्द

नई दिल्ली/पटना, 21 दिसम्बर (हि.स.)।दस नवम्बर 2007 को बिहार की राजधानी पटना में एक अद्भुत घटना घटी। राजधानी पटना के पटना सिटी स्थित दीवान मोहल्ला में धर्म राज भगवान श्री चित्रगुप्त लगभग 50 सालों के बाद अपने प्राचीन मंदिर में वापस लौट आए।मंदिर में भगवान चित्रगुप्त के मूर्ति की फिर से स्थापना हुई। इस अद्भुत मंदिर के इतिहास के बारे में जानकार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस मंदिर को देखने पहुंचे और इस मंदिर के विकास में योगदान देने के लिए भाजपा से राज्य सभा सांसद और सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विस (एसआईएस) के संस्थापक तथा हिन्दुस्थान समाचार के अध्यक्ष रवींद्र किशोर सिन्हा के योगदान की सराहना की।

मंदिर में भगवान के फिर से आगमन से ऐसा लगा जैसे पूरे कायस्थ समाज में खासतौर पर युवाओं में नवचेतना आ गई हो और भगवान चित्रगुप्त अपने वंशजों की आवाज सुनकर पृथ्वी पर एक बार फिर से प्रकट हुए हों। चित्रगुप्त आदि मंदिर, गंगा के दक्षिणी तट पर बने गंगा पुल के गायगाट के दक्षिणी छोर से लगभग एक किलोमीटर पूरब में दीवान मुहल्ला में है। मंदिर के बगल में ही सूफी संत नौजर शाह का मकबरा भी है जिसकी वजह से इस घाट को नौजर गाट या चित्रगुप्त घाट के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर ने उत्थान और पतन के कई कालखंड देखे हैं। ऐसा ही एक समय आया 1950 के दशक में, जब मंदिर की सेवा से जुड़े लोगों की लापरवाही की वजह से भगवान चित्रगुप्त की दुर्लभ प्रतिमा चोरी हो गई।

ऐसा लगा मानो भगवान अपने भक्त के व्यवहार से रुष्ट हो गए हों। वर्ष 2006 में पटना में कायस्थों की केंद्र स्थली सहाय सदन के विशाल प्रांगण में श्री चित्रगुप्त आदि मंदिर के ट्रस्टियों की एक आम सभा हुई। जिसमें देश की अग्रणी सुरक्षा एजेंसी एसआईएस के संस्थापक, हिन्दुस्थान समाचार के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद रवींद्र किशोर सिन्हा सर्वसम्मति से श्री चित्रगुप्त आदि मंदिर प्रबंधक समिति के अध्यक्ष चुने गए। आर के सिन्हा के मंदिर प्रबंधक समिति के अध्यक्ष बनते ही मानो एक चमत्कार हुआ।

आश्चर्यजनक ढंग से गंगा के उत्तरी छोर पर चित्रसेनपुर गांव के एक खेत से भगवान चित्रगुप्त की 442 साल पुरानी दुर्लभ वही प्रतिमा बरामद हुई। कहा गया भगवान अपने भक्तों की पूजा-अर्चना से प्रसन्न होकर लौट आए हैं। फिर क्या था आर के सिन्हा ने इस प्रतिमा को फिर से मंदिर में स्थापित करने का संकल्प लिया। उनके अथक प्रयास और कुशल नेतृत्व में आखिरकार प्रतिमा को मंदिर में फिर से स्थापित किया गया।आर के सिन्हा ने 11 नवम्बर 2007 को श्री चित्रगुप्ता पूजा समारोह के अवसर पर मंदिर को एक प्राचीन ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने की घोषणा की थी। जिसके बाद से चित्रगुप्त आदि मंदिर को ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने के लिए 100 करोड़ रुपये से अधिक की निर्माण योजनओं को पूरा कर मंदिर को भव्य रुप दिए जाने की कोशिश हो रही है।

प्रथम राष्ट्रपति ने की थी मंदिर की स्थापना

मंदिर के भूतल पर ही बने शिव मंदिर का भी जीर्णोद्धार किया गया। शिव मंदिर में नियमित तौर पर पूजा-अर्चना होने लगी है। इस मंदिर की स्थापना भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद ने की थी। मंदिर के प्रथम तल पर चित्रगुप्त और उनकी दोनों रानियों और 12 पुत्रों के साथ स्थापित किया जाएगा। चित्रगुप्त महापरिवार के साथ-साथ प्रथम तल पर ही शिव परिवार, राम दरबार, राधा कृष्ण, नवदुर्गा, नवग्रह, गणपति और हनुमान की प्रतिमाओं की भी स्थापना की जाएगी। मंदिर का पूरा विकास होने पर यह देश के भव्यतम मंदिरों में गिना जाएगा।

मंदिर के अलावा मंदिर से सटी जमीन पर एक सभागार, एक सामूहिक विवाह मंडप, इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाने वाले कायस्थ विभूतियों की मूर्तियों की एक प्रदर्शनी और तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए एक अतिथि गृह का निर्माण भी प्रस्तावित है। सांसद आर के सिन्हा की हार्दिक इच्छा है कि हरिद्वार के हर की पौड़ी की तर्ज पर मंदिर के पास एक सुंदर घाट का निर्माण कराया जाए। श्री सिन्हा कहते हैं कि यदि सरकार मंदिर से सरकारी जमीन को अतिक्रमणमुक्त कर दे और जमीन पर समिति को उपबल्ध करा दे तो मंदिर समिति यह कार्य पूरा कर लेगी। हिन्दुस्थान समाचार

14/06/2019

आदि श्री चित्रगुप्त मंदिर, पटना सिटी
*****************************
पटना सिटी में 2500 वर्ष प्राचीन मंदिर में भगवान श्री चित्रगुप्त की प्राचीन काली कसौटी की मूर्ति विराजित है। मंदिर के पास हीं सूफी संत नौजर साह का मकबरा है। ये है गंगा किनारे बना 2500 वर्ष प्राचीन चित्रगुप्त मंदिर। इस गंगा तट को सांझी विरासत के तहत नौजर घाट और चित्रगुप्त घाट दोनों ही कहा जाता है। इतिहासकार बताते है कि भगवान श्री राम, लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र ताड़का का वध करके गंगा के किनारे-किनारे बक्सर से पटना की ओर आये थे। यहीं से रूककर राजा जनक के स्वयंवर आमंत्रण पर गंगा के इसी घाट से नाव से जनकपुर गये थे। जबकि सीता को भी लेकर इसी रास्ते लौटे थे। इसका प्रमाण है यहां बना प्राचीन सीता मंदिर। इस मंदिर का ऐतिहासिक आधार यह भी बताया जाता है कि पाटलिपुत्र में नंदवंश के महामंत्री मुद्रा राक्षस चित्रगुप्त घाट पर यमद्वितीया को भगवान चित्रगुप्त की सामूहिक पूजा की थी। मुद्रा राक्षस कायस्थ जाति के थे। इतिहासकारों की मानें तो अकबर के वजीरे खजाना राजा टोडरमल जिन्हें कायस्थ कहा जाता है, ने सन् 1573 में इसी घाट पर पूजा की और वाराणसी से श्याम पासान सिलाखंड और शिल्पी लाकर सन 1574 में पुनः यमद्वितीया के दिन चित्रगुप्त पूजा कर इस मंदिर की स्थापना की गई। पचास के दशक में चित्रगुप्त मंदिर से मूर्ति गायब हो गई थी। जो काफी खोजबीन करने पर वो मूर्ति बरामद हो पायी। भक्तों के मिलने से मंदिर में भगवान चित्रगुप्त के मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई। फिलहाल इस मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य चल रहा है। इस प्रभावी योजना के साथ मंदिर एक भव्य आकार ले सकेगा।
-
अभिषेक श्रीवास्तव....

उभयचर प्राणी क्या है . इसकी विशेषता क्या है , यह कितने वर्गों में पाए जाते है
25/03/2019

उभयचर प्राणी क्या है . इसकी विशेषता क्या है , यह कितने वर्गों में पाए जाते है

what is Amphibia , how many types of Amphibia , उभयचर प्राणी क्या है .. इसकी विशेषता क्या है , यह कितने प्रकार के होते है

19/02/2018

गब्बर : - अरे ओ सांभा कितने आदमी थे?

सांभा : - अकेला ही था

गब्बर : - और तुम

सांभा : - सरदार, हम 10 थे

गब्बर : - वो अकेला और तुम 10 फिर भी मार खाकर आ गए

सांभा : - वो सब से अलग था

गब्बर : - मुझे उसकी पहचान बताओ

सांभा :- सरदार उसके हाथ में कलम,माथे पर केसरिया पगड़ी और केसरियां धोती कुर्ता पहने हुए था।स्वामी विवेकानंद जी की तरह

गब्बर :- ओ तेरी कि,
तुमने मेरा नाम तो नहीं बताया होगा ना

सांभा :- नहीं सरदार, मगर आप इतना चौंक क्यूँ गए

गब्बर :- अरे यहाँ से जल्दी भागो सालो ..😳

सांभा :- मगर क्यूँ सरदार

गब्बर :- अरे भागो .. तुमने कायस्थ को छेड़ दिया है

सांभा :- मगर कायस्थ क्या होते हैं

गब्बर :-
कायस्थ खुद एक काल है , वेद है , शास्त्र है , समय है और एक अमिट अपार शक्ति है ..बह्मा के अंश से पैदा हुई उर्जा का अंश है कायस्थ ..

सांभा :- सरदार वो शुरूआत में तो हाथ जोड़ रहा था मगर जब हमने जबरदस्ती लूटने की कोशिश कि तो उसने हमारा ये हाल कर दिया ..
वो शक्ल से बहुत ही शांत और साधारण लग रहा था

गब्बर :- अरे क्रांति हमेशा वो ही लाते हैं जो शांति प्रिय होते हैं..
यूँ धूल तो झूंड भी उठाते हैं
😳😳😳😳😳

ये वो मानव जाति है जो युद्ध में चलते हुए रथ का पहिया बदल देते हैं ..
इनके पास जन्म से ही ज्ञान का योग होता है जो पृथ्वी पर और किसी भी मानव जाति में नहीं होता..
इनके बिना तो देवालय भी अशुद्ध माने जाते हैं ..
इनके अंदर त्रिदेव शक्ति विद्यमान है ..

1. ब्रह्मा जी का ब्रह्म ज्ञान
2. विष्णु जी का स्तुतीकरण
3. शिव जी का अमिट प्रभान

देवों का भी सबसेप्रिय मानव कायस्थ ही है
क्योंकि ये हर क्षेत्र में निपुण हैं;
वो चाहे विज्ञान हो,
काल वैदिक शास्त्र हो
या भौतिक जगत ज्ञान हो



इस पृथ्वी पर वर्तमान में लगभग 5 करोड़ 63 लाख कायस्थ हैं;
अगर पृथ्वी के एक कोने पर मिलकर खड़े हो गए तो पृथ्वी को एक तरफ झुका सकते हैं ...

* *

सबसे ज्यादा कायस्थ की जनसंख्या वाला देश ....
हिन्दुस्तान,
लगभग2करोड़ 79 लाख*

सबसे ज्यादा प्रतिशत कायस्थ जनसंख्या वाला राज्य ..उत्तरप्रदेश,
60% कायस्थ हैं

कायस्थ के देश;
हिन्दुस्तान , नेपाल , अमरीका, लंदन,शिफान,आस्ट्रेलिया,श्री लंका , भूटान , तिब्बत , मयंमार , चीन , अफगानिस्तान , तुर्किस्तान
और....अन्य

कायस्थ के संस्कार सबसे अहम हैं,
कायस्थ की शक्ति सबसे अमिट है,
कायस्थ का सम्मान सबसे बड़ा सम्मान है

कायस्थ ना राज के भूखे हैं,
कायस्थ ना ताज के भूखे हैं,
कायस्थ एक अमिट शक्ति है,
कायस्थ सम्मान और संस्कार के भूखे होते हैं

विश्व कायस्थ मंच
जय चित्रगुप्त
जय कायस्थ संस्कार,
जय कायस्थ ,
जय हिन्दुत्व राज

अगर कायस्थ * का अपमान किया तो समझ लो _खुद*_ का अपमान किया,
अगर कायस्थ को खुश रखोगे तो दूनिया भी खुश रहेंगी।

अगर कायस्थ वंश से हैं तो शेयर करें;
इग्नोर तो जलने वाले भी कर देंगे😇😇😁😁😁😁

⛳ जय श्री चित्रगुप्त महाराज ⛳

23/12/2017

कायस्थों के अस्तित्व और स्वाभिमान को झकझोरने वाली कविता-
रचनाकार- कवि 'चेतन' नितिन खरे
महोबा, बुन्देलखण्ड, मो.- +91 9582184195

सूर्य रश्मियाँ जब भी बोझिल हुईं अंधेरी रातों से,
सदा मिली है ताकत इनको कागज कलम दवातों से,

तुम वंशज हो चित्रगुप्त के जग में शान तुम्हारी है,
कागज कलम दवात सदा से ही पहचान तुम्हारी है,

सकल श्रृष्टि के निर्माता तुम ब्रम्हा जी के प्यारे हो,
प्रखर प्रवर्तक बुद्धि लिए माँ शक्ति के भी दुलारे हो,

धर्मराज बन स्वयं न्याय की रेखा रखने वाले हो,
सारे जग के ही कर्मों का लेखा रखने वाले हो,

सम्मानित हो पूज्यनीय हो थाह दिखाने वाले हो,
अन्धकार में भी प्रकाश की राह दिखाने वाले हो,

दुनिया भर में निज संस्कृति का गान कराने वाले हो,
बुद्धिमान को बुद्धिमता का भान कराने वाले हो,

तुम भारत के गौरव हो तुम राष्ट्र के खातिर डटे रहे,
जातिवाद में नहीं पटे पर राष्ट्रवाद पर अटे रहे,

श्वेत चन्द्र आभास तुम्हीं हो सूरज का प्रकाश तुम्हीं हो,
धरती व आकाश तुम्हीं हो गौरवमयी इतिहास तुम्हीं हो,

खड्गों की टंकार तुम्हीं हो पावन गंगा धार तुम्हीं हो,
जलता इक अंगार तुम्हीं हो ठाकरे की हुँकार तुम्ही हो,

पुष्पों के मकरंद तुम्हीं हो कवि चेतन के छंद तुम्हीं हो,
ये भगवा स्वछन्द तुम्हीं हो स्वामी विवेकानन्द तुम्हीं हो,

स्वतंत्रता की आस तुम्हीं थे दुनिया भर में ख़ास तुम्हीं थे,
आज़ाद हिन्द करवाने वाले नेता वीर सुभाष तुम्हीं थे,

मोहक चन्दन बाग़ तुम्हीं थे होली वाली फाग तुम्हीं थे,
हास्य और अनुराग तुम्हीं थे तानसेन का राग तुम्हीं थे,

राष्ट्रपति के भी सुर तुम थे, संविधान के भी उर तुम थे,
धूल चटा दे जो दुश्मन को, शाश्त्री लाल बहादुर तुम थे,

प्रेमचन्द गोदान तुम्हीं थे महादेवी पहचान तुम्हीं थे,
वृन्दावन सी शान तुम्हीं थे संपूर्णानंद की जान तुम्हीं थे,

ऊँच नीच पे कहर तुम्हीं थे गीत गजल की बहर तुम्हीं थे,
सोई सरकार जगाने वाली जयप्रकाश की लहर तुम्हीं थे,

अपना अतीत अपना गौरव कहीं और ना खो जाए,
बुद्धिजीवियों की बिसात बिल्कुल बौनी ना हो जाए,

आपस की बस खींचतान में हम पिछड़े ना रह जायें,
औरों के घर को सीच सींच न मकाँ हमारे ढह जायें,

कुशाग्र बुद्धि वालों के कलमें कहीं सुप्त न हो जायें,
बदले बदले इस मिजाज में हम विलुप्त न हो जायें,

इसीलिये हे कायस्थ बन्धुओं शक्ति की पहचान करो,
तुम वंशज हो चित्रगुप्त के मिलकर के आह्वान करो,

एक सूत्र में बंधो कलम की धारें आज मिला दो तुम,
सागर की गहराई में पतवारें आज मिला दो तुम,

स्वयं तरक्की करो साथ में सबका ही उत्थान करो,
जितना भी हो सके देश के लोगों का कल्याण करो,

अपने हित के लिए लड़ो पर धर्म एक है ध्यान रहे,
हिन्दू हिन्दू भाई भाई हिन्दू अपनी पहचान रहे,

अपना गौरव नहीं रहा है केवल बस तलवारों से,
आर्याव्रत था विश्वगुरु कृपाण कलम की धारों से,

कलम चलाओं धर्म सनातन की तुम पूर्ण सुरक्षा में,
वक्त पड़े तो शीश कटा देना भारत की रक्षा में,

रचनाकार- कवि 'चेतन' नितिन खरे
महोबा, बुन्देलखण्ड, मो.- +91 9582184195
(नोट- पसंद आने पर देश और दुनिया भर के अन्य कायस्थ बंधुओं तक पहुंचायें )

Address

Nauzar Ghat
Patna
800008

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Chitragupta Adi Mandir posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to Chitragupta Adi Mandir:

Share

Category