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12/01/2025

जीवन की परेशानी और विवेकानंद के उपदेश

स्वामी विवेकानंद को पढ़ते और याद करते हुए कई बातें जेहन में आ रही हैं । जैसे - जीवन को कैसे जिएँ अथवा जीना चाहिए ? अथवा क्या जीवन में केवल समस्याएँ ही समस्याएँ आएँगी ? अथवा जीवन में सुख पाने के कौन -से साधन होंगे ? आज जब कि विज्ञान ने काफी मात्रा में प्रगति कर ली है और ICT के साथ साथ AI से भी हमारा जीवन पूर्णतः परिपूर्ण हो चुका है तब हमें जीवन की समस्याओं से जूझने के क्रम में यह बात चिंता दिला रही है कि हमारे भीतर कहीं न कहीं कोई कमियाँ हैं। किन्तु अगले ही पल जब हम विवेकानंद को पढ़ते हैं तो सारी समस्याएँ निर्मूल सिद्ध होने लगती हैं। क्या हम अपने लिए जी रहे हैं ? क्या हम भारतीय धर्म और संस्कृति को विस्मृत कर बैठे हैं ?
आज आत्म विश्लेषण का दिन है क्योंकि आज हम कम से कम समय में अधिक से अधिक ऊंचाइयां छू लेना चाहते हैं। लेकिन हमारी राह में असफलताएं भी कम नहीं है। दुख भी कम नहीं है। अभाव भी कम नहीं है। गरीबी, लाचारी और बेरोजगारी भी कम नहीं है। जहां देखिए, समस्याएं ही समस्याएं दिखती हैं। लेकिन समस्याएं हैं तो उनका हल भी है। यदि हमारे मन में डर है तो डर को दूर करने का उपाय भी हमारे आसपास है। बस उसे खोजने भर की जरूरी है। हमारे जीवन की जो समस्याएं हैं वह समस्याएं हमने खुद पैदा किए हैं। जीवन नश्वर है यह निश्चित है। लेकिन हमारा प्रयास असीमित है। हम प्रयास कर सकते हैं । हम उद्योग कर सकते हैं। हम अच्छे ज्ञान का अर्जन कर सकते हैं। अच्छी संगति करने से हमें कोई नहीं रोक सकता। गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा हम कर सकते हैं। अपने लिए जीने से ज्यादा जरूरी है दूसरों के लिए जीना। यदि आप दूसरों की चिंता करते हैं तब आपके कष्ट में आप नष्ट हो जाएंगे। लेकिन जहां आप खुद की चिंता करेंगे वहां आपको बहुत सुख नहीं हो सकता क्योंकि आपके चारों ओर दुख ही दुख है। आप अपना सुख कहां ले जा सकते हैं ? विवेकानंद हमें सिखलाते हैं: उठो, जागो और आगे बढ़ो। अपने लिए उठने के लिए नहीं कहते। अपने लिए जागने नहीं कहते। वह हमें दुखी देख रहे हैं इसलिए ऐसा कहते हैं। उनके मन में जो क्लेश है वह भारतवासियों के आलस्य और अकर्मण्यता को देखकर है। हमारे भीतर सुधार आ सकता है। हम किसी भी कार्य में सफल हो सकते हैं। हमारे सामने जो जीवन के लक्ष्य हैं वे अवश्य पूरा हो सकते हैं।हमें यह सोचना होगा ।

12/01/2025

आज स्वामी विवेकानंद की जयंती है।

आज राष्ट्रीय युवा दिवस है। यानी स्वामी विवेकानंद की जयंती है और यह दिवस आत्म चिंतन और आत्म मंथन का दिवस भी है। आत्म परिष्कार और आत्म सुधार का भी दिवस । आज जब माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र के रूप में देखने का कृत संकल्प कर रहे हैं तो इसमें युवाओं और किशोरों का योगदान जरूरी है। भारत तभी विकसित बनेगा जब इस देश के युवा मन और तन से मजबूत बनेंगे । धन तो अपने आप हो जाएगा । इसके लिए स्वामी विवेकानंद के संदेश को ग्रहण करना होगा जिसमें वे कहते हैं -
उठो , जागो और आगे बढ़ो । तुम्हारा मार्ग आगे सुन्दर से सुन्दरतम रूप में तुम्हारा बाट जोह रहा है। आज शिक्षा / रोजी- रोजगार / व्यवसाय / नौकरी पेशा और कृषि से जुड़े लोग परेशान हैं। लेकिन हमें भूलना नहीं चाहिए कि हमारी भारतीय धर्म , संस्कृति , अध्यात्म , दर्शन और साहित्य में कई तरह के समाधान हैं। हमारे पास समस्याएँ आएँगी । अभाव भी आयेंगे । कदम -कदम पर असफलताएँ और धोखे मिलेंगे किंतु हमें घबड़ाना नहीं है। जीवन सीखने / महसूस करने / अनुभव करने का रमणीय स्थल हैं जहाँ शूल भी हैं और फूल भी हैं। आनंद भी है अवसाद भी हैं । जीवन भी है और मृत्यु भी है। प्रश्न यह है कि आप दूसरों को दे क्या रहे हैं ! अथवा आपको अपने परिवार , समाज और राष्ट्र को देना क्या है ? अथवा क्या देना चाहिए ? आज का दिन यही विचार करने का दिन है और एक मनुष्य होने के नाते हमें इसी तथ्य पर विचार करना चाहिए ।

03/11/2024

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हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि छोटा बच्चा जब पहली पहली बार विद्यालय आता है तब वह अपने घरेलू वातावरण से गुजरते हुए यहां आता है वह अपने घर मे अपने माता-पिता , दादा दादी , नाना नानी , चाचा-चाची , भाई बहन आदि विभिन्न लोगों के साथ हंसता खेलता ठिठोलिया भरता हुआ आता है और अपरिचित लोगों से पहली बार मिलता है जिसमें उनके हम उम्र के साथी भी होते हैं ।शिक्षक और शिक्षिकाएं भी होते हैं जहां उसे पारिवारिक शैक्षिक माहौल देने की जरूरत होती है ।इसीलिए बच्चों को खेल-खेल में शिक्षा देने की बात कही जाती है । बच्चों को प्यार भरे माहौल देने की बात कही जाती है और बच्चों को पुस्तकों के बोझ से हटाने की कोशिश की जाती है कि उसे अन्य गतिविधियों के माध्यम से भाषा का ज्ञान कराया जा सके और गणित का ज्ञान कराया जा सके ।

आज बच्चों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास के लिए कथा , कहानी , गीत ,संगीत , कविता , गायन और वादन आदि से जोड़कर सिखाए जाने के प्रयास किये जा रहे हैं ।खेल-खेल में शिक्षा कला के माध्यम से शिक्षा गायन और नृत्य के माध्यम से शिक्षा तथा आसपास के वातावरण को दिखलाकर तथा महसूस करवा कर शिक्षा देने तथा सीखने के लिए प्रेरित कराए जा रहे हैं ।हमारे लिए यह भी जरूरी है कि बच्चों में भी नैतिकता का गुज विकसित हो तथा वह मानवीय जीवन मूल्य से अवगत हो सके और बड़े होकर एक जिम्मेदार तथा कर्तव्य निष्ठ नागरिक बन सके।इसीलिए कहा गया है कि "बाल साहित्य के माध्यम से भी बच्चों को सीखने की क्षमता विकसित की जा सकती है क्योंकि बाल साहित्य शब्द प्रेरणा के लिए दीप स्तंभ का कार्य करता है । (अक्षर वार्ता वही पृष्ठ )

03/11/2024

(3 )क्योंकि अपने घर या बाहर में बोले जानेवाले शब्दों को जब हम जवाब देने के लिए या कुछ कहने के लिए प्रेरित करते हैं तो उनमें भाषण क्षमता का विकास होता है । उनके भीतर जो झिझक है वह दूर होती है और वह अपने विषय के प्रति उत्सुक और जागृत हो जाते हैं ।
भारतवर्ष के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे । उन्होंने आजाद भारत में सबसे पहले बच्चों के सर्वांगीण विकास तथा उनके सुनहरे भविष्य के बारे में सोचते हुए कहा था कि मैं हैरत में पड़ जाता हूं कि किसी व्यक्ति या राष्ट्र का भविष्य जानने के लिए लोग तारों को देखते हैं । मैं ज्योतिष की गिनती में दिलचस्पी नहीं रखता मुझे जब हिंदुस्तान का भविष्य देखने की इच्छा होती है तो बच्चों की आंखों और चेहरे को देखने की कोशिश करता हूं । बच्चों के भाव मुझे भावी भारत की झलक दे जाते हैं । (अक्षर वार्ता , मासिक, अंतरराष्ट्रीय बियर रिव्यू एवं रिफ्रेड जनरल अक्टूबर 2024 पृष्ठ संख्या 68 वॉल्यूम 20 इशू नंबर 12 )

कहना नहीं होगा कि ऐसा उन्होंने इसीलिए कहा होगा कि एक शिक्षक ही नहीं बल्कि एक प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए उनकी समस्त शैक्षिक गतिविधियों को उनके क्रियाकलाप को उनकी विभिन्न गतिविधियों को सीखने की क्षमता को उनकी रुचि रुझान को तथा उनकी आदतों को गहराई के साथ देखने और महसूस करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि यही कुछ ऐसे कारक हैं जिनके माध्यम से हम बच्चों का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं।

किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है कि बच्चे गीली मिट्टी के समान होते हैं उन्हें जो आकार में ढाला जाए उस जाकर में ही वे शीघ्र ढल जाते हैं । उनका मन मानस कोमल होता है । (अक्षर वार्ता पत्रिका उपर्युक्त पृष्ठ )

03/11/2024

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प्रायः दोनों ही विषयों में बच्चों के मां का जुड़ाव उनकी भावना का जुड़ाव होना चाहिए ।आज समय आ गया है कि हम उन बातों को समझ सकें और अपनी शिक्षा में उसे जगह दे सकें ताकि आगे आने वाली पीढ़ी शिक्षा से भली भांति जुड़ सके ।
बच्चे प्रकृति के अनमोल रत्न और उनका चिंतन और विचार पूरी तरह से मुक्त रहता है । सांसारिक भेदभाव से रहित और दुर्गुणों से भी पूर्णतः असम्पृक्त !

सच तो यह है कि छोटे-छोटे बच्चे नैतिक दृष्टि से और सांसारिक दृष्टि से विभिन्न प्रकार के कानूनी बंधनों से मुक्त रहते हैं उनके लिए ना तो कोई महान होता है ना कोई छोटा होता है ना कोई बड़ा होता है वह सभी को अपने मापदंड से ही नापते हैं । ( सरोजिनी पांडे बाल साहित्य समीक्षा के प्रतिमान और इतिहास लेखन (पुस्तक )प्रकाशक :आशीष प्रकाशन कानपुर , प्रथम संस्करण .2011 , पृष्ठ संख्या - 27 )

एक विद्वान शिक्षक को बच्चों को पढ़ने - पढ़ाने के दौरान उनकी व्यक्तिगत प्रवृत्तियों रुचियों गुणों स्वभावों आदि का भी अध्ययन करना चाहिए । यदि आप कक्षा में जाने से पूर्व बच्चों की व्यक्तिगत विभिन्न व्यक्तित्व संबंधी विशेषताएं उनका सामाजिक पारिवारिक परिवेश और वातावरण तथा माता-पिता एवं अन्य सगे संबंधियों की शिक्षा तथा साक्षरता के स्तर को जान लेते हैं तो बच्चों के सर्वांगीण विकास में आपको आगे बढ़ाने में और उन्हें कक्षा में भली प्रकार पढ़ने -लिखने में मदद मिल सकती है । इसीलिए आज विभिन्न तरह की गतिविधियों तथा खेल-खेल में शिक्षा देने का प्रचलन आ गया है ।आज जो कौशल पूर्ण शिक्षा की बात की जा रही है । उसके मूल में यही बात है कि हम बच्चों में कला के माध्यम से , खेल के माध्यम से एवं अन्य रोचक तरीके से बच्चों को पढ़ने - लिखने में मदद कर सके । राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस बात पर जोर देती है कि बच्चों को उनको क्षेत्रीय भाषा में ही शिक्षा दी जानी चाहिए । चाहे बच्चे जिस क्षेत्र के हैं मगही , मैथिली ,भोजपुरी ,अंगिका, बज्जिका आदि क्षेत्र के रहने वाले बच्चे हैं उन बच्चों को उनकी ही क्षेत्रीय भाषा में पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए क्योंकि उनके द्वारा सुनना बोलना पढ़ना और लिखना यह चारों कौशलों के विकास के लिए उनके घरेलू और सामाजिक वातावरण का होना जरूरी है । ... .

03/11/2024

बच्चों के सर्वांगीण विकास में शैक्षिक गतिविधियों की महत्वपूर्ण भूमिका

हमें यह कहने में संकोच नहीं है कि आज बिहार में ही नहीं बल्कि भारत वर्ष में बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए जो कुछ प्रयास किया जाना बच्चों के सर्वांगीण विकास में शैक्षिक गतिविधियों की महत्वपूर्ण भूमिका

हमें यह कहने में संकोच नहीं है कि आज बिहार में ही नहीं बल्कि भारत वर्ष में बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए जो कुछ प्रयास किया जाना चाहिए वह प्रयास पूरी तरह पर्याप्त नहीं है और उस प्रयास में और भी कुछ जोड़ा जाना चाहिए । राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बच्चों के सर्वांगीण विकास पर बल देती है । यद्यपि महत्वपूर्ण शिक्षा वह है जो बच्चों में चरित्र निर्माण में सहयोग प्रदान कर सके । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा था कि असली शिक्षा वह है जो बच्चों में चरित्र निर्माण पर बल देती है और उसके साथ उसके रोजी रोजगार में सहायता पहुंचाती है । सच तो यह है कि बच्चों का संसार एक अलग और अंगूठा संसार होता है । बच्चों की दुनिया एक अलग तरह की दुनिया मानी जा सकती है जहां बच्चे अपने अनुभव से खेलते हैं छोटे-छोटे बच्चे जो मिट्टी में घरौंदे बनाते हैं वे छोटे-छोटे बच्चे जो जमीन पर रेखाएं खींचते हैं वे छोटे-छोटे बच्चे जो दीवारों पर मिट्टी के ढेले से कुछ न कुछ चित्रकारी कर रहे होते हैं और वह बच्चे जो अपने से बड़े भाई - बहनों की पुस्तक या उनकी कॉपी को लेकर उसमें आड़ी - तिरछी रेखाएं खींच रहे होते हैं । उनमें भी उनका अनुभव है । उनमें भी उनकी कोई ना कोई कहानी होती है कोई न कोई दुख - सुख है उसमें भी उनका घृणा और प्रेम बसा हुआ है । उन दीवारों पर अंकित रेखाओं में भी उनके मन के भाव इस रूप में गूँथे हुए हैं कि हमें समझने की जरूरत है ।
आज समय बदल गया है और हमारी शिक्षा पद्धति बाल केंद्रित बन गई है । हम जो कुछ भी बच्चों को पढ़ाते हैं सिखाते हैं । उसमें पहली शर्त यही है कि उस से बच्चों का मनोरंजन हो बच्चों को संबंधित विषय अथवा पाठ में दिलचस्पी रहे और वह अपनी कक्षा में पढ़ाये जाने वाले पाठ को एकाग्रतापूर्वक सुन सकें , सीख सकें और समझ सकें । यह इसलिए भी जरूरी है कि हमें बच्चों के मन के अनुसार उन्हें सही रास्ते पर लाना है चाहे हम बच्चों में भाषा संबंधी विकास की बात करें अथवा गणित संबंधी उनके ज्ञान की बात करें ।

30/08/2024

मन की चंचलता को रोकने के लिए क्या करें ?
अक्सर स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र- छात्राएँ यह जानना चाहती हैं कि मन की चंचलता को कैसे रोका जाए ? क्योंकि मन की चंचलता की वजह से ही बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता है। यह ठीक है कि बच्चों या बड़े बच्चों को खेलने का भरपूर मौका दिया जाए लेकिन उन्हें यह एहसास कराया जाना चाहिए कि वह अपना मन पढ़ाई में अधिक से अधिक लगाना सीखें। इस संदर्भ में मेरा अभिमत यह है कि बच्चों की दिनचर्या यदि ठीक रखी जाती है तब बहुत कुछ उन्हें पढ़ने में मन लग सकता है और उनका काफी समय बच सकता है ।दूसरी बात यह है कि हमें बच्चों को रूटिंग के हिसाब से पढ़ने के लिए प्रेरित करनी चाहिए। खेलने के समय में खेलना और पढ़ने के समय में पढ़ना तथा भोजन के समय भोजन करना यह तीनों कार्य ही जरूरी है। यदि हम अपने इस कार्य को ठीक से करते हैं तो बच्चों का चतुर्दिक विकास संभव है। इसके अलावा हमें बच्चों की मन ही स्थिति को भी समझना चाहिए। आप बच्चे को किस तरह और कितनी देर तक गाइड करते हैं यह अधिक महत्व रखता है। हमें बच्चों के लिए समय निकालनी चाहिए बच्चों से बात करनी चाहिए बच्चों के साथ खेलना चाहिए बच्चों के साथ घूमना चाहिए और बच्चों का दोस्त बनकर उनके सुख-दुख की बातें भी जानी चाहिए । साथ ही साथ उनके मन में जो कुछ बातें उठ रही हैं अथवा वे कुछ चाहना करते हैं अथवा कुछ कहना चाहते हैं तो हमें उनकी बातों को सुनना चाहिए। विचार करना चाहिए तथा एक ठोस निर्णय लेना चाहिए कि हमें अपने बच्चों के लिए किस तरह दिए गए रूटिंग के मुताबिक विद्यालय पढ़ने भेजें और इसके साथ ही उनकी हर गतिविधि पर नजर भी रखनी चाहिए।
आज जब भी समय बदल गया है। हमारी सुविधा भी बदल गई हैं लेकिन इस अनुपात में हमारी चुनौतियां भी हमारे आसपास दिख रही है । इस स्थिति में सावधान रहने की जरूरत है। हमें बच्चों की दुनिया के आसपास गुजरना चाहिए। बच्चों की हर एक गतिविधि पर नजर रखनी चाहिए । उनकी इच्छाएं क्या है अथवा उनकी इच्छाएं किताबें पढ़ने की क्यों नहीं होती ? कक्षा में जब शिक्षक पढ़ा रहे होते हैं तब उन्हें पढ़ने में मन क्यों नहीं लगता ? उन्हें कोई शारीरिक या मानसिक व्याधि तो नहीं है ! इसी तरह की कई और बातें हैं! यदि हम जान और समझ लेंगे तो बच्चे की चंचलता दूर हो जाएगी और वे एक मेधावी बच्चों के रूप में हमारे समक्ष पेश होंगे।

30/08/2024

अच्छी आदतों का विकास
जीवन को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है कि हम अच्छी आदतों का विकास करें। यह अच्छी आदतें हमारी रोजमर्रे के जीवन से जुड़ी रह सकती हैं और इसके लिए हम यदि निरंतर प्रयास करते हैं तो कोई कारण नहीं कि हमारे भीतर अच्छी आदतों का विकास नहीं होगा। हम किसी भी पद पर कार्य कर रहे हैं या किसी भी पेशे से जुड़े हुए हैं। हमें अपने बारे में सोचना होगा। हमें अपनी आदतों के बारे में सोचना होगा। हमें और भी बहुत कुछ सोचना होगा जिससे हमारी विचारधारा में बदलाव आ सके। हमें यह भी सोचना होगा कि हमारे पास जो कार्य हैं हम उन्हें नियत समय पर पूरा करते रहें। क्योंकि हमारे कार्य ही हमारी पहचान बनाते हैं। यदि हम अपना कार्य निर्धारित समय पर पूरी ईमानदारी और तत्परता के साथ करेंगे तो न केवल हमारा कार्य बेहतर होगा बल्कि हमारी आदतें भी सुधरेंगी।

26/08/2024

समग्र मानसिक शक्तियों के सारस्वत विकास के लिए श्री कृष्ण हमें उपदेश देते हैं।उनके महत्वपूर्ण उपदेश उनके जीवन संघर्षों से प्राप्त हैं। वे जो कुछ कार्य करते हैं अपने लिए नहीं करते। दूसरों के लिए करते हैं।एक ओर कृष्ण जीवन की नश्वरता की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं तो दूसरी ओर यह भी कहते हैं कि हमें अपने कर्म करना चाहिए और उसमें यदि हमारी मृत्यु भी हो जाती है तो कोई बात नहीं। क्योंकि जीवन और मृत्यु निश्चित है। व्यक्ति भले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है किंतु उसकी आत्मा कभी नहीं मरती। श्री कृष्ण सुख- दुख, लाभ -हानि , जीत- हार से न तो घबड़ाने कहते हैं और ना चिंतित होने को। श्री कृष्ण जीवन को सम बनाने पर बल देते हैं। लेकिन उनका ध्यान हमारी जीवन- पद्धति, हमारा आचरण और आचार- व्यवहार पर ज्यादा रहता है और वह व्यक्ति को मानसिक और आत्मिक परिष्कार पर ही विशेष बल देते हैं। गीता का उपदेश एक ओर हमें कर्म करने का उपदेश देता है तो दूसरी ओर हमें मानसिक रूप से स्वस्थ और प्रसन्न बनाए रखने पर भी बल देता है। गीता का उपदेश हमें जीवन से हारने नहीं देता। श्री कृष्ण गीता के माध्यम से हमें यह बतलाते हैं कि हम अपने जीवन को महत्वपूर्ण समझें और अपने किए गए कार्यों से दूसरों के जीवन में खुशियां बिखेरें। भूलना नहीं चाहिए कि हमारे जीवन में भी प्रति पल संघर्ष चलता रहता है। हानि - लाभ का संघर्ष , सफलता - असफलता का संघर्ष, आशा -निराशा का संघर्ष, ईर्ष्या - द्वेष का संघर्ष , घृणा और प्रेम का संघर्ष ; हर पल चलता रहता है। बहुत बार हम जीवन से हार जाते हैं। बहुत बार हम किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में होते हैं और अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। जीवन में लक्ष्य से भटकाव सबसे बड़ी असफलता की निशानी है। दूसरे शब्दों में गीता हमें कई अवगुणों से बचाती है। महात्मा गांधी ने गीता को गीता माता की संज्ञा दी थी। सचमुच एक मां की तरह गीता हमें पल-पल गिरने से बचाती है। गीता हमारे मनोबल को मजबूत करता है। यह हमारे भीतर एक तार्किक शक्ति पैदा करती है। यह हमारी बुद्धि को स्थितप्रज्ञ बना देती है। मानव जीवन का जो उद्देश्य है अपने कर्मों में संलग्न रहना। फल की आशा नहीं करना। व्यर्थ की चिंता नहीं करना। असफलता में कभी ना घबराना और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर संकल्पशील होकर आगे बढ़ते जाना; गीता हमें बार-बार कहती है।

06/07/2024

हमारा धर्म
यह कितनी बड़ी विडंबना की बात है कि हम ज्ञानी होकर भी अज्ञानी बने रहते हैं। विवेकी होकर भी अविवेकी का रूप धारण किए रहते हैं। हमें सही गलत सब कुछ का पता रहता है फिर भी हम अपनी आंखें बंद किए रहते हैं। हमें दिखता सब कुछ है लेकिन हम सब कुछ देख कर भी अंजान बने रहते हैं और अपने लिए जीना चाहते हैं। सच तो यह है कि अपने लिए तो पशु भी जी लेते हैं लेकिन जो व्यक्ति दूसरे के लिए जीता है वही असली मनुष्य कहलाते हैं। आज समय बदल गया है और परिस्थितियां बदल गई हैं। हमें अपने जीवन को बेहतर तरीके से जीने के लिए सोचना चाहिए । विचार करना चाहिए और उसे अपने अध्ययन का विषय भी बनाना चाहिए। आज हमारी शिक्षा जिस रूप में दी जा रही है उसमें कई खामियां हैं लेकिन इसकी और किसी का ध्यान नहीं है। प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेज तक केवल पढ़ाई और समय को लेकर कड़ाई दिखलाई पड़ती है। लेकिन सुधार की बात कहां की जाती है ? चरित्र निर्माण का पाठ कहां पर पढ़ाया जाता है ? सुख-दुख में सहभागी बनने का संदेश कहां मिलता है? परोपकार करना एक दूसरे की मदद करना दूसरों को महत्व देना दूसरों की बातों को सुनना कहां हो पाता है ? बच्चों के सर्वांगीण विकास का एक हिस्सा संवेगात्मक विकास भी होता है जिसमें अपने मन के भावों को समझना उनका परिष्कार करना भी जरूरी होता है लेकिन विद्यालयों में इसकी व्यवस्था कहां हो पाती है ? क्या एक मनुष्य होने के नाते हमें एक दूसरे की मदद नहीं करनी चाहिए ? जब ईश्वर प्रकृति के कान-कान में विराजमान हैं और हर एक मनुष्य या जीव जंतुओं में ईश्वर का निवास है तो फिर हमें एक दूसरे के बारे में सोचने की फुर्सत अथवा जरूरत क्यों नहीं होती है ? हम स्वार्थ में कहां आगे बढ़ रहे हैं ? वैसी शिक्षा से क्या फायदा होगा जो मनुष्य को मनुष्य बनना ही नहीं सिखला सके ? इसका जवाब किसके पास है? शिक्षा अधिकारी के पास या शिक्षक के पास या छात्र के पास या सरकार के पास ? इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा और कोई शख्स लेना क्यों नहीं चाहता है ? ऐसी स्थिति में हम अपने देश को कहां ले जा रहे हैं ? हर एक बच्चे को कहां ले जा रहे हैं? हर एक मनुष्य को कहां ले जा रहे हैं और अपने समाज और देश के भीतर किस विचारधारा अथवा वाद को लाने की ख्वाहिश रखते हैं ? इस तरह के न जाने कितने सवाल अनुत्तरित हैं! इन सवालों के जवाब चाहिए।

06/07/2024

हमारा धर्म
हमारा धर्म हमें बार-बार कई चीजें सिखलाता है। हमारा धर्म हमें शांति आपसी प्रेम भाईचारा और कर्तव्य पालन का पाठ सिखलाता है। हमारा धर्म हमें आपस में जोड़ता भी है बल्कि जोड़ना सिखलाता है । हमारा धर्म कई रूपों में हमारी मदद करता है और वह हमें कई तरह से बनता भी है बिगाड़ता नहीं है। आज धर्म के नाम पर मतभेद है ।कई तरह के लड़ाई झगड़ा हैं आपसी विवाद है और धर्म के नाम पर वोट की राजनीति है और स्वार्थ सिद्धि भी है जो व्यक्ति के मन को प्रभावित करता है। हमारी शिक्षा चाहे जितनी भी हो हम चाहे कितनी भी प्रगति कर लें हम चाहे कितना भी धन जमा कर लें हमें धर्म की जरूरत पड़ेगी हमें धर्म की जरूरत पड़ेगी जीवन जीने के लिए आपस में सुख और शांति की प्राप्ति करने के लिए और जीवन को बेहतर तरीके से यापन करने के लिए भी क्योंकि यदि हम धर्म को ठीक से नहीं समझ पाए तो हमारा जीना निरर्थक साबित हो सकता है हमें अपने मन अपने विचार अपनी बुद्धि को बेहतर बनाए रखने के लिए धर्म की जरूरत पड़ेगी यदि हम धर्म को ठीक तरह से अपने भीतर जीते हैं। अपने धर्म को स्वीकार करते हैं। अपने धर्म को मानते हैं तो कोई कारण नहीं कि हमें जीवन में सुख और शांति की प्राप्ति नहीं होगी। सच्चे अर्थों में धर्म हमें सावधान करता है। धर्म हमें जीना सिखाता है। जीवन के विकास में धर्म हमारी मदद करता है और एक छोटे बच्चों के लिए तो धर्म उसका सच्चा साथी है। यदि हमारे भीतर धर्म का ठीक से पालन हो रहा है तो हम गलत राह नहीं चल सकते। धर्म हमें कई रोगों से मुक्ति दिलाता है मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाता है मानसिक अशांति से मुक्ति दिलाता है। लेकिन सच्ची बात तो यह है कि हम धर्म को ठीक से नहीं समझ पाते और न धर्म का हम ठीक से पालन कर पाते हैं। आज स्कूलों कॉलेजों में जो शिक्षा व्यवस्था है वह भी हमें धर्म से नहीं जोड़ता है और ना जोड़ना सिखलाता है। धर्म में पौराणिकता की ओर ले जाता है परंपरा की ओर ले जाता है। हमारी आंखें खोलता है लेकिन हम ठीक से नहीं देख पाते हैं ठीक से नहीं समझ पाते हैं और ठीक से नहीं विचार कर पाते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। गीता शास्त्र हमें बार-बार बताता है कि हमें अपने जीवन में क्या करना है?
हमें तो अपने मार्ग का पता ही नहीं चलता है कि हमें किस दिशा में गमन करना चाहिए। धर्म हमें बार-बार सही राह दिखलाता है।

13/06/2024

आधुनिक कबीर के रूप में नागार्जुन
हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में बाबा नागार्जुन का नाम नया नहीं है। इनका एक अन्य नाम ठक्कन मिसिर भी था । इनकी रचनाएँ कबीर से प्रभावित है बल्कि कबीर का गुण गौरव हासिल है। जिस तरह कबीर ने अपनी बातें डंके की चोट पर कहीं थी नागार्जुन भी उसी राह चलते दिखाई देते हैं। नागार्जुन कबीर की तरह आक्रमक है। अपनी बातें बिना लाग-लपेट के कहते हैं और सामाजिक विसंगतियों के प्रति विरोध करते हैं।
कबीर का स्वभाव जिस तरह मस्त मौला तथा अक्खड़ और फक्कड़ था नागार्जुन भी उनसे कत्तई कम नहीं। किन्तु सच्चाई यह भी है कि वे तुलसीदास के गुण गौरव से भी मेल खाते हैं। नागार्जुन में तुलसीदास की तरह ही लोक जीवन की गहरी समझ है। नागार्जुन अंधविश्वासी नहीं है। वे व्यक्ति स्वातंत्र्य की वकालत करने वाले कवि हैं। छल कपट से दूर रहकर काव्य सर्जना में लीन रहने वाले कवि अपने लिए नहीं जीते। तुलसीदास की तरह ही " मांगि के खैवो मसीद में सोइबो न लेइबौ को न लेइबौ न देइबौ को न देइबौ " की भांति अपनी बातें रखते हैं। नागार्जुन में भी समन्वय है। ईश्वर एवं प्राणि मात्र के प्रति भक्ति है। उनकी नजर में राजा,रंक , फकीर एक जैसे हैं।वे अपनी अनेक
कविताओं में सीख भी देते हैं और विरोध भी प्रकट करते हैं। सच्चे अर्थों में वे जनता के कवि हैं बल्कि सभी वर्गों के कवि हैं और वे सबका भला चाहते हैं।

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