12/01/2025
जीवन की परेशानी और विवेकानंद के उपदेश
स्वामी विवेकानंद को पढ़ते और याद करते हुए कई बातें जेहन में आ रही हैं । जैसे - जीवन को कैसे जिएँ अथवा जीना चाहिए ? अथवा क्या जीवन में केवल समस्याएँ ही समस्याएँ आएँगी ? अथवा जीवन में सुख पाने के कौन -से साधन होंगे ? आज जब कि विज्ञान ने काफी मात्रा में प्रगति कर ली है और ICT के साथ साथ AI से भी हमारा जीवन पूर्णतः परिपूर्ण हो चुका है तब हमें जीवन की समस्याओं से जूझने के क्रम में यह बात चिंता दिला रही है कि हमारे भीतर कहीं न कहीं कोई कमियाँ हैं। किन्तु अगले ही पल जब हम विवेकानंद को पढ़ते हैं तो सारी समस्याएँ निर्मूल सिद्ध होने लगती हैं। क्या हम अपने लिए जी रहे हैं ? क्या हम भारतीय धर्म और संस्कृति को विस्मृत कर बैठे हैं ?
आज आत्म विश्लेषण का दिन है क्योंकि आज हम कम से कम समय में अधिक से अधिक ऊंचाइयां छू लेना चाहते हैं। लेकिन हमारी राह में असफलताएं भी कम नहीं है। दुख भी कम नहीं है। अभाव भी कम नहीं है। गरीबी, लाचारी और बेरोजगारी भी कम नहीं है। जहां देखिए, समस्याएं ही समस्याएं दिखती हैं। लेकिन समस्याएं हैं तो उनका हल भी है। यदि हमारे मन में डर है तो डर को दूर करने का उपाय भी हमारे आसपास है। बस उसे खोजने भर की जरूरी है। हमारे जीवन की जो समस्याएं हैं वह समस्याएं हमने खुद पैदा किए हैं। जीवन नश्वर है यह निश्चित है। लेकिन हमारा प्रयास असीमित है। हम प्रयास कर सकते हैं । हम उद्योग कर सकते हैं। हम अच्छे ज्ञान का अर्जन कर सकते हैं। अच्छी संगति करने से हमें कोई नहीं रोक सकता। गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा हम कर सकते हैं। अपने लिए जीने से ज्यादा जरूरी है दूसरों के लिए जीना। यदि आप दूसरों की चिंता करते हैं तब आपके कष्ट में आप नष्ट हो जाएंगे। लेकिन जहां आप खुद की चिंता करेंगे वहां आपको बहुत सुख नहीं हो सकता क्योंकि आपके चारों ओर दुख ही दुख है। आप अपना सुख कहां ले जा सकते हैं ? विवेकानंद हमें सिखलाते हैं: उठो, जागो और आगे बढ़ो। अपने लिए उठने के लिए नहीं कहते। अपने लिए जागने नहीं कहते। वह हमें दुखी देख रहे हैं इसलिए ऐसा कहते हैं। उनके मन में जो क्लेश है वह भारतवासियों के आलस्य और अकर्मण्यता को देखकर है। हमारे भीतर सुधार आ सकता है। हम किसी भी कार्य में सफल हो सकते हैं। हमारे सामने जो जीवन के लक्ष्य हैं वे अवश्य पूरा हो सकते हैं।हमें यह सोचना होगा ।