शाश्वत सनातन

शाश्वत सनातन शाश्वत सनातन में आपका स्वागत है! यहाँ, हम शास्त्रीय साक्ष्यों तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से सनातन धर्म को समझाने का प्रयास करते हैं।

06/04/2026

Dhruv Rathee Debunked

In recent days, several claims about the Ramayana and Mahabharata have gone viral, especially after a video by Dhruv Rathee. But are these claims fully accurate, or are they based on selective interpretation?

आप सभी को शाश्वत सनातन की तरफ से महाराणा प्रताप जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ।     🚩
28/05/2025

आप सभी को शाश्वत सनातन की तरफ से महाराणा प्रताप जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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ओंकारप्रभवादेवा ओंकारप्रभवाः स्वराः। ओंकारप्रभवं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरं।। १६।। सभी देवताओं की उत्पत्ति ओंकार से ही होत...
27/05/2025

ओंकारप्रभवादेवा ओंकारप्रभवाः स्वराः।
ओंकारप्रभवं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरं।। १६।।

सभी देवताओं की उत्पत्ति ओंकार से ही होती है, समस्त स्वरों का उदय भी ओंकार से ही है। दूसरे शब्दों में तीनों लोकों में चर-अचर समस्त विश्व ओंकार से ही उत्पन्न होता है।

____ ध्यानबिन्दू उपनिषद्

Photo Credit: Blogspot

जनिता चोपनेता च यश्च विद्यां प्रयच्छति ।अन्नदाता भयत्राता पंचैते पितरः स्मृताः ॥जन्म देने वाला, दीक्षा अथवा सनातन धर्म क...
26/05/2025

जनिता चोपनेता च यश्च विद्यां प्रयच्छति ।
अन्नदाता भयत्राता पंचैते पितरः स्मृताः ॥

जन्म देने वाला, दीक्षा अथवा सनातन धर्म की दीक्षा देने वाला, विद्या देने वाला, अन्नदाता और भयत्राता अर्थात जो भय से हमारी रक्षा करते हैं - शास्त्रों में इन सबको पिता अथवा पिता के सामान कहा गया है।

_____ चाणक्यनीतिदर्पणं, अध्याय ४, श्लोक १९

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः।।सभी जीवों के प्रति कर्म, मन और वाणी द्वारा अद्व...
26/05/2025

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः।।

सभी जीवों के प्रति कर्म, मन और वाणी द्वारा अद्वेष, दया और दानशीलता ही सनातन धर्म है।

___संस्कृत सुभाषितं

अन्नं न निन्द्यात्‌। तद् व्रतम्‌।प्राणो वा अन्नम्‌।शरीरमन्नादम्‌।प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्‌।शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः।तदे...
25/05/2025

अन्नं न निन्द्यात्‌। तद् व्रतम्‌।
प्राणो वा अन्नम्‌।शरीरमन्नादम्‌।
प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्‌।
शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः।
तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्‌।
स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति।
अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान्‌ कीर्त्या॥

अन्न की निंदा ना करें; वही व्रत है। प्राण ही अन्न है और शरीर उस प्राणरूप अन्न से जीने के कारन अन्न का भोक्ता है; शरीर प्राण के आधार पर स्थित हो रहा है और शरीर के आधार पर प्राण स्थित हो रहे है। इस तरह यह अन्न में ही अन्न स्तिथ हो रहा है। जो मनुष्य इस रहस्य को जनता है की अन्न ही अन्न में स्थित हो रहा है वह उसमे प्रतिष्ठित हो जाता है; प्रजा से, पशुओं से और ब्रह्मतेज से संपन्न होकर महान बन जाता है तथा कीर्ति से संपन्न होकर भी महान हो जाता है।

______ तैत्तिरीयोपनिषद् । भृगुवल्ली । सप्तमोऽनुवाकः । श्लोक १

मा कुरु धनजनयौवनगर्वंहरति निमेषात्कालः सर्वम् ।मायामयमिदमखिलं हित्वा।ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥धन, शक्ति, और यौवन ...
23/05/2025

मा कुरु धनजनयौवनगर्वं
हरति निमेषात्कालः सर्वम् ।
मायामयमिदमखिलं हित्वा।
ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥

धन, शक्ति, और यौवन पर घमण्ड मत करो; काल इन्हें पल भर में छीन लेता है। इस विश्व को माया से घिरा जानकार ब्रह्मपद में प्रवेश करो।

___संस्कृत धारा

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे॥जो महागिरि हि...
22/05/2025

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे॥

जो महागिरि हिमालय के पास केदारशृंग के तट पर सदा निवास करते हुए मुनीश्वरों द्वारा पूजित होते है तथा देवता, असुर, यक्ष और महान् सर्प आदि भी जिनकी पूजा करते हैं, उन एक कल्याणकारक भगवान् केदारनाथ का मैं स्तवन करता हूँ॥

ॐ असतो मा सद्गमय ।तमसो मा ज्योतिर्गमय ।मृत्योर्मा अमृतं गमय ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥हे ईश्वर! मुझे असत्य से सत्य की ...
21/05/2025

ॐ असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हे ईश्वर! मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो॥
हे परमेश्वर! त्रिविध तापों की शांति हो।

___संस्कृत सुभाषितम्

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस...
20/05/2025

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।

मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही (उनका) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा) कोई अन्य मित्र नहीं है।

_____संस्कृत सुभाषितम्

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