Arya Samaj Patna

Arya Samaj Patna आर्य समाज पटना

04/06/2026
02/05/2026

कहीं आप गौतम बुद्ध और भगवान बुद्ध को एक ही तो नहीं मान रहे, दोनों के बीच अंतर जानें

#भगवान_बुद्ध और #गौतम_बुद्ध
कई बार जब हम गौतम बुद्ध के बारे में पढ़ते हैं तो हमें लगता है की बुद्ध एक ही व्यक्ति हैं, यह भ्रम हर उम्र के लोगों को अक्सर रहता है और इसी बात को लेकर विद्यार्थी भी सबसे ज्यादा भ्रम रहते हैं परन्तु भ्रमित हों भी क्यों न क्यूं न क्योंकि दोनों में ही नाम और गोत्र और कार्यों में भी काफी हद तक समानता है, तो दोस्तों बड़ा ही रोचक विषय है, आज हम जानेंगे भगवान बुद्ध और गौतम बुद्ध के बारे में, उनके जन्म और वर्ण, और बाद में उनके समाज में अपने अपने क्या योगदान थें।

विशेष गौतम बुद्ध और भगवान बुद्ध एक नहीं हैं। भगवान विष्णु के प्रमुख दस अवतारों में भगवान बुद्ध, नौवें अवतार हैं। भगवान बुद्ध भगवान क्षीरोदशायी विष्णु के अवतार हैं। बलि प्रथा की अनावश्यक जीव हिंसा को बंद करने के लिए ही इनका अवतार हुआ। इनकी माता का नाम श्रीमती अंजना था और पिता का नाम हेमसदन था जिनका जन्मस्थान भारत के 'गया' (बिहार) में है।

विचार करने वाली बात यह है कि शुद्धोदन व माया के पुत्र, शाक्यसिंह बुद्ध जिनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था और भगवान बुद्ध एक नहीं हैं। श्री शाक्यसिंह बहुत ही ज्ञानी व्यक्ति थे, उन्होंने कठिन तपस्या के बाद तत्त्वानुभूति की प्राप्ति की हुई जिसके बाद वे बुद्ध कहलाए। जबकि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार हैं।

" #श्रीललित_विस्तार ग्रंथ के 21 वें अध्याय के 178 पृष्ठ पर बताया गया है कि संयोगवश गौतम बुद्ध जी ने उसी स्थान पर तपस्या की जिस स्थान पर भगवान बुद्ध ने तपस्या की थी। इसी कारण लोगों ने दोनों को एक ही मान लिया।"

जन्म
जर्मन के वरिष्ट स्कालर श्रीमैक्स मूलर जी (German Scholar Mr.Max Müller) के अनुसार शाक्यसिंह बुद्ध अर्थात गौतम बुद्ध (Gautam Budh), का जन्म कपिलवस्तु के लुम्बिनी के वनों में 477 बी सी में में हुआ था (when was gautama buddha born in which year )। जबकि भगवान बुद्ध (Bhagwan Buddh) आज से 5000 वर्ष पूर्व में वर्तमान में बिहार के 'गया' नामक स्थान में प्रकट हुए थे।

जबकि श्रीमद् भागवत महापुराण (1.3.24) तथा श्रीनरसिंह पुराण (36/29) के अनुसार भगवान बुद्ध आज से लगभग 5000 साल पहले इस धरातल पर आए जबकि के अनुसार गौतम बुद्ध 2491 साल पहले आए। कहने का तात्पर्य यह है कि गौतम बुद्ध और भगवान बुद्ध एक नहीं हैं।

श्रीगोवर्धन मठ पुरी के पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती के अनुसार भगवान बुद्ध और गौतम बुद्ध दोनों अलग-अलग काल में जन्मे अलग-अलग व्यक्ति थे। जिन गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का अंशावतार बताया गया है, उनका जन्म कीकट प्रदेश (मगध) में ब्राह्मण कुल में हुआ था। और उनके जन्म के सैकड़ों वर्षों के बाद कपिलवस्तु में जन्मे गौतम बुद्ध, क्षत्रिय राजकुमार थे।

#ब्राह्मण_कुल_के_थे_भगवान_बुद्ध
शंकराचार्य जी ने लोगों के पूछने पर बताया जब लोगों ने कहा कि- ब्राह्मणों ने ही बुद्ध को भगवान का अवतार घोषित कर पूजन की शुरुआत की थी , जिसपर उन्होंने कहा कि कर्मकांड में जिस बुद्ध की चर्चा होती है वे अलग हैं। भगवान बुद्ध की चर्चा वेदों (Vedas) में भी हुई है। जो की भगवान के अंशावतार हैं। इनकी चर्चा श्रीमद्भागवत (Shrimad Bhagavatam) में भी है। जो की ब्राह्मण कुल जन्में थे।

किस कारण भ्रम हुआ
शंकराचार्य जी ने कहा की अमरसिंह जो की राजा विक्रमादित्य की राजसभा के नौ रत्नों में से एक थे। उन्होंने जब अमरकोष जो की संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कोष ग्रन्थ है उसकी रचना की थी। तो उस ग्रन्थ में भगवान बुद्ध (Bhagwan Buddha) के 10 और गौतम बुद्ध (Gautam Buddha) के पांच पर्यायवाची नाम को एक ही क्रम में लिख दिया था, जिस कारण यह भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुयी थी. उन्होंने इसकी रचना तीसरी शताब्दी ई॰ पू॰ में की थी।

दोनों का ही गोत्र था ' #गौतम'
शंकराचार्य ने कहा कि दोनों का गोत्र गौतम था। यह भी एक बड़ा कारण था कि इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया। अग्निपुराण में भगवान बुद्ध को लंबकर्ण कहा गया है, जिसका अर्थ है लम्बे कान वाला। जिसके बाद से गौतम बुद्ध के लंबे कान प्रतिमाओं में बनाए जाने लगीं। बौद्ध स्वयं को वैदिक नहीं मानते हैं जो की हैं भी नहीं।
खुद को हिंदू नहीं मानते बौद्ध

उन्होंने कहा कि संविधान की धारा 25 के तहत जैन, बौद्ध और सिख सभी हिंदू परिभाषित किए गए हैं। बौद्ध तो खुद को हिंदू नहीं मानते हैं। अब जैन, सिख भी खुद को हिंदू नहीं बताने लगे हैं।

27/03/2026

आर्य समाज जहानाबाद के तत्वाधान में रामनवमी के शुभ अवसर पर पंच कुण्डीय वैदिक महायज्ञ सह राष्ट्र रक्षा आध्यात्मिक समागम का आयोजन किया गया। #आर्यसमाज_यज्ञ #दैनिक_हवन #वैदिक_विधि_से_यज्ञ #महर्षि_दयानंद_सरस्वती

आर्य समाज जहानाबाद के तत्वाधान में रामनवमी के शुभ अवसर पर पंच कुण्डीय वैदिक महायज्ञ सह राष्ट्र रक्षा आध्यात्मिक समागम का...
27/03/2026

आर्य समाज जहानाबाद के तत्वाधान में रामनवमी के शुभ अवसर पर पंच कुण्डीय वैदिक महायज्ञ सह राष्ट्र रक्षा आध्यात्मिक समागम का आयोजन किया गया।

सभी धर्मप्रेमी आर्य सज्जन सादर आमंत्रित हैं।🙏🙏
19/03/2026

सभी धर्मप्रेमी आर्य सज्जन सादर आमंत्रित हैं।🙏🙏

मनुस्मृति और नारी जाति  #डॉ_विवेक_आर्य भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले स...
11/03/2026

मनुस्मृति और नारी जाति

#डॉ_विवेक_आर्य

भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया में अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी के रूप में दर्शाते है। सत्य यह है कि वे होते है कॉपी पेस्टिया शूरवीर। अब एक ऐसी ही शूरवीर ने कल लिख दिया मनु ने नारी जाति का अपमान किया है। मनुस्मृति में नारी के विषय में बहुत सारी अनर्गल बातें लिखी है। मैंने पूछा आपने कभी मनुस्मृति पुस्तक रूप में देखी है। वह इस प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर एक नया कॉपी पेस्ट उठा लाया। उसने लिखा-

"ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।"

मेरी जोर के हंसी निकल गई। मुझे मालूम था कॉपी पेस्टिया शूरवीर ने कभी मनुस्मृति को देखा तक नहीं है। मैंने उससे पूछा अच्छा यह बताओ। मनुस्मृति कौनसी भाषा में है? वह बोला ब्राह्मणों की मृत भाषा संस्कृत। मैंने पूछा अच्छा अब यह बताओ कि यह जो आपने लिखा यह किस भाषा में है। वह फिर चुप हो गया। फिर मैंने लिखा यह तुलसीदास की चौपाई है। जो संस्कृत भाषा में नहीं अपितु अवधी भाषा में है। इसका मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। मगर कॉपी पेस्टिया शूरवीर मानने को तैयार नहीं था। फिर मैंने मनुस्मृति में नारी जाति के सम्बन्ध में जो प्रमाण दिए गए है, उन्हें लिखा। पाठकों के लिए वही प्रमाण लिख रहा हूँ। आपको भी कोई कॉपी पेस्टिया शूरवीर मिले तो उसका आप ज्ञान वर्धन अवश्य करना।
मनुस्मृति में नारी जाति
यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56
अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।
पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55

जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57

जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। - मनुस्मृति 3/62

पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96

ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति

पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है। मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।

पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है। मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।
आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है। मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति 8/323,9/232,8/342

नारियों के जीवन में आने वाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।

पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें। मनुस्मृति 4/180 इन पर मिथ्या दोषारोपण करने वालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागने वालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है। मनुस्मृति 8/274, 389,9/4
मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।

उपर्युक्त विश्लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपात रहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो। इस विश्लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपात रहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।


11/03/2026

#आर्य समाज जहानाबाद में साप्ताहिक यज्ञ-सह-सत्संग #वैदिक_विधि_से_यज्ञ #आर्यसमाज_यज्ञ #दैनिक_हवन #आर्यसमाज_यज्ञ #महर्षि_दयानंद_सरस्वती #हवन #यज्ञ #ऋषि_दयानंद

11/03/2026

एक नास्तिक ने लिखा कि ईसाई मत के प्रवर्तक ईसा मसीह है, इस्लाम के मुहम्मद, बौद्ध मत के महात्मा बुद्ध हैं। वैदिक धर्म का प्रवर्तक कोई नहीं क्योंकि यह कल्पना है?

इसका उत्तर मैंने अपने शब्दों में न देकर मोनियर विलियमस के शब्दों में देता हूँ। वे लिखते है-

'इसाई धर्म ईसा के बिना कुछ नहीं, मुस्लिम धर्म हजरत मुहम्मद के बिना कुछ नहीं, बौद्ध धर्म महात्मा बुद्ध के बिना कुछ नहीं, यही पुरुष उनके ध्येय अथवा प्राण हैं, परन्तु मुझे सत्य कहने में संकोच नहीं, यद्यपि मैं ईसाई हूँ। हिन्दुओं का ध्येय मंत्र गायत्री है, जो बिना किसी ऋषि, मुनि या महान पुरुष के जीवित रह सकता है, हिन्दू धर्म का आधार किसी विशेष मनुष्य पर नहीं है। इस मन्त्र के द्वारा सीधा परमेश्वर से हर एक मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर सकता है।'

प्रेषक #डॉ_विवेक_आर्य

(संदर्भ- डॉ शिवपूजन सिंह कुशवाहा रचित गायत्री मीमांसा, पृ. 58-59)

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