Shiv Shakti

Shiv Shakti जहां प्रेम है वहां भक्ति है, जहां शिव है वहां शक्ति है..!!
जय भोलेनाथ, जय मां आदि शक्ति..🕉️🕉️

कोई दरवाज़ा बंद करे तो,उसे एहसास करवा दो कि कुंडी दोनों तरफ से होती है..!!✍🏻✍🏻
15/03/2026

कोई दरवाज़ा बंद करे तो,उसे एहसास करवा दो कि कुंडी दोनों तरफ से होती है..!!✍🏻✍🏻

07/03/2026

महादेव अब आप ही आ के मुझे सम्भाल लो...!!😔😔

यदि किसी मनुष्य की आत्मा में प्रेम की भाषा जागृत है--तो वो सामनेवाले को केवल “उसकी भूल” के रूप में नहीं देखता-- वो उसे उ...
26/02/2026

यदि किसी मनुष्य की आत्मा में प्रेम की भाषा जागृत है--
तो वो सामनेवाले को केवल “उसकी भूल” के रूप में नहीं देखता-- वो उसे उसके संघर्ष, उसके स्वभाव, उसके संस्कार, उसके भीतर की टूटी हुई जगहों और उसकी अच्छाई के साथ देखता है!- प्रेम किसी व्यक्ति की त्रुटियों को नकारता नही पर प्रेम उस त्रुटि के पीछे छुपी “मानवीयता” को समझ लेता है और यही समझ, प्रेम को प्रेम बनाती है!-
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क्युँकि प्रेम का स्वभाव होता है-- गुणों को देखना- अच्छाई को पहचानना और सामनेवाले की कमियों के बीच भी उसकी उत्तमता को बचाए रखना-- प्रेम का मन ये नहीं पूछता कि “तुम में क्या खराब है?”प्रेम का मन ये पूछता है कि “तुम में क्या पवित्र है?” और यही वो दृष्टि है जो रिश्तों को जोड़ती है!-
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पर अहंकार-- अहंकार वो भाषा है जो देखने नहीं देती-- समझने नहीं देती-- अहंकार मनुष्य को इतना कठोर बना देता है कि वो सामनेवाले के भीतर मौजूद हजार अच्छाइयों को छोड़कर-- सिर्फ एक भूल को पकड़ लेता है और फिर उसी भूल को बार-बार दोहराकर उसे व्यक्ति की पहचान बना देता है--अहंकार के लिए इंसान “इंसान” नहीं रहता-- वो केवल “गलतियों का पुतला” बन जाता है!-
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और यही सबसे भयानक सत्य है-- कि प्रेम सामनेवाले को “सुधारने” के लिए होता है लेकिन अहंकार सामनेवाले को “तोड़ने” के लिए--प्रेम में हम किसी को थामते है जबकि अहंकार में हम किसी को गिराकर खुद को ऊँचा मानते है--प्रेम में हम रिश्ते बचाते है-- अहंकार में हम अपने “सही होने” का अहं बचाते है!-
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यदि किसी व्यक्ति की दृष्टि में हर समय सिर्फ दोष, खामी, भूल और त्रुटि ही दिखती रहे-- तो समझ लेना- वो प्रेम की भाषा नहीं बोल रहा बल्कि वो अहंकार की भाषा बोल रहा है क्युँकि प्रेम की आँखें “गुण” ढूँढती है और अहंकार की आँखें “कमज़ोरी” खोजती है!-
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और सबसे अंतिम सत्य तो ये है कि प्रेम में मनुष्य दूसरों की अच्छाई देखकर झुक जाता है लेकिन अहंकार में मनुष्य दूसरों की भूल देखकर अकड़ जाता है!-
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बस इतना ही अंतर होता है - प्रेम और अंहकार के मध्य - प्रेम भुल को स्वीकार कर के प्रयत्नपूर्वक सब ठीक करने कि कोशिश निरंतर करता है जबकि अंहकार अवॉयड करेगा, बाते नहीं सुनेगा, कॉल काट देगा, जवाब मे कभी संतोषपुर्ण जवाब नहीं - उनके आंसर ही होते है :- " मुझे नहीं मालुम, मै नहीं जानता, जो सोचना है सोचो " वगैरह वगैरह!-
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जब इस तरह के जवाब आए तब आप समझ सकते है - रिश्ते ने दम तोड़ दिया है - फिर कोई विकल्प नहीं बचता है "सुलह का!

26/02/2026

हर हर महादेव....!!🔱🔱

अघोर दर्शन...अघोर कोई रहस्यमयी पोशाक नहीं है,न श्मशान में बैठने की मजबूरी है,न समाज के विरुद्ध खड़े होने का नाम है। अघोर...
25/02/2026

अघोर दर्शन...

अघोर कोई रहस्यमयी पोशाक नहीं है,न श्मशान में बैठने की मजबूरी है,न समाज के विरुद्ध खड़े होने का नाम है। अघोर मूलतः चेतना की एक अवस्था है। “घोर” का अर्थ है भय, द्वेष, घृणा, अलगाव, मानसिक अंधकार। “अघोर” का अर्थ है जहाँ यह सब गल चुका हो।
जब मन किसी चीज़ को देखकर सिकुड़ता नहीं, जब भीतर विरोध नहीं उठता, जब हम जीवन के कठोर सत्य से भागते नहीं वहाँ अघोर की शुरुआत होती है।
अघोर दर्शन यह कहता है कि जो कुछ है, वही चेतना की अभिव्यक्ति है। इस समझ की झलक हमे कश्मीर शैव परंपरा के ग्रंथों जैसे विज्ञान भैरव तंत्र और शिवसूत्र में मिलती है। वहाँ बार-बार एक ही बात कही गई है हर अनुभव में प्रवेश करो, उससे भागो मत। भय हो, क्रोध हो, कामना हो उसे दबाओ मत, देखो। देखने वाला स्थिर हो जाए तो अनुभव अपना विष खो देता है।
अघोर का श्मशान बाहरी स्थान से अधिक आंतरिक अवस्था है। श्मशान वह जगह है जहाँ सब नाम, पहचान और अहंकार अंततः मिट जाते हैं। अघोरी श्मशान इसलिए जाता है कि उसे यह स्मरण बना रहे जो मैं “मैं” मान रहा हूँ, वह भी नश्वर है। जब यह बोध स्थिर हो जाता है तो घर और श्मशान में कोई अंतर नहीं रह जाता। अघोर सामाजिक विद्रोह नहीं है। सच्चा अघोर व्यक्ति समाज में रहकर भी भीतर से मुक्त होता है। वह नियम तोड़ने के लिए नियम नहीं तोड़ता,वह केवल भीतर के भेद को तोड़ता है ऊँच-नीच का भेद, शुद्ध-अशुद्ध का भेद, अपना-पराया का भेद।
अघोर का सबसे कठिन अभ्यास अपमान में होता है। जब कोई तुम्हें छोटा दिखाए और भीतर प्रतिक्रिया उठे, वहीं तुम अपने अहंकार को देख सकते हो। अगर तुम उस क्षण रुक सको, भीतर उठती आग को देख सको, और प्रतिक्रिया देने से पहले स्वयं को पहचान सको तो वही अघोर की साधना है। बाहरी भस्म से अधिक महत्वपूर्ण है भीतर का दर्प गलना।
अघोर बनने की इच्छा भी सूक्ष्म अहंकार हो सकती है। इसलिए अघोर बनने का प्रयास मत करो। बस अपने भीतर के “घोर” को पहचानो जहाँ तुम डरते हो, जहाँ तुम चिढ़ते हो, जहाँ तुम चिपके हो। उसे देखना ही साधना है। धीरे-धीरे वही घोर पिघलता है, और जो बचता है वह सरल, शांत और निर्भय उपस्थिति है।

जो लोग दिन-रात श्मशान में बैठकर “भूत-प्रेत सिद्धि” की बात करते हैं,वे सामान्यतः तीन प्रकार के होते हैं और इन तीनों को अघोर से अलग समझना ज़रूरी है।
पहला होता है तांत्रिक साधक, कुछ लोग सच में तंत्रमार्ग पर चलते हैं। श्मशान उनके लिए एक प्रयोगशाला जैसा स्थान होता है, क्योंकि वहाँ भय कमज़ोर पड़ता है और मन जल्दी खुलता है। तंत्रग्रंथों जैसे रुद्र यामल तंत्र या कुलार्णव तंत्र में श्मशान साधना का उल्लेख मिलता है। लेकिन इन साधनाओं का उद्देश्य “भूत पकड़ना” नहीं, बल्कि भय, मृत्यु और आसक्ति पर विजय पाना होता है। सिद्धियाँ अगर आती भी हैं तो वे उपउत्पाद मानी जाती हैं, लक्ष्य नहीं।
दूसरे सिद्धि-लोलुप साधक होते है।ये लोग शक्ति चाहते हैं नियंत्रण,प्रभाव, चमत्कार। वे भूत-प्रेत, बाधा, वशीकरण जैसी बातों में उलझ जाते हैं। समस्या यह है कि इस मार्ग में मन बहुत जल्दी विकृत हो सकता है। भय और कल्पना मिलकर अनुभव गढ़ने लगते हैं। ऐसे लोग अक्सर भीतर से अस्थिर होते हैं, पर बाहर से रहस्यमय दिखते हैं।
तीसरा प्रकार दिखावा करने वाले का है,समाज में रहस्य का आकर्षण है। श्मशान, खोपड़ी, भस्म ये प्रतीक लोगों को प्रभावित करते हैं। कुछ लोग इन्हें साधना से अधिक छवि के लिए अपनाते हैं। यह अघोर नहीं, भूमिका है।
अब असली बात सुनो, सच्चे अघोरी, जैसे परंपरा में बाबा कीनाराम का उदाहरण दिया जाता है, उन्होंने कभी भूत-प्रेत को लक्ष्य नहीं बनाया। उनका केंद्र था भेद का अंत, भय का अंत, अद्वैत की अनुभूति।भूत-प्रेत सिद्धि अघोर का सार नहीं है।
अघोर का सार है मन के अंधकार पर विजय।
श्मशान में बैठकर अगर किसी का अहंकार बढ़ रहा है “मैं सिद्ध हूँ, मैं तांत्रिक हूँ” तो वह अघोर नहीं और अगर कोई घर में रहकर भी निर्भय, समभाव और करुणा में स्थिर है वह अघोर के अधिक निकट है।
एक और बात स्पष्ट कर दूँ मानव मन जब लगातार मृत्यु, एकांत और अंधेरे में रहता है, तो कल्पना और अवचेतन बहुत तीव्र हो जाते हैं। बहुत-सी “भूत सिद्धि” की कथाएँ मनोवैज्ञानिक अनुभव भी हो सकती हैं। इसलिए इस मार्ग में बिना स्थिरता और गुरु के जाना खतरनाक हो सकता है।

हर हर महादेव 🔱🔱🔱🔱🔱🔱

18/02/2026

छल, कपट, ईर्ष्या,द्वेष का त्याग करो, भोजन त्यागने से शिव नहीं मिलते...!!🔱🔱👍🏻👍🏻

एक गाँव में एक पंडित जी रहते थे। रोज़ घर–घर जाकर भगवद्गीता का पाठ करते, लोगों को धर्म की बातें सुनाते और अपना गुज़ारा चल...
18/02/2026

एक गाँव में एक पंडित जी रहते थे। रोज़ घर–घर जाकर भगवद्गीता का पाठ करते, लोगों को धर्म की बातें सुनाते और अपना गुज़ारा चलाते।
एक दिन रास्ते में अचानक एक चोर ने उन्हें पकड़ लिया और बोला,
“जो भी है, सब निकाल दो!”
पंडित जी शांत रहे। बोले,
“बेटा, मेरे पास कुछ नहीं है। अगर कुछ चाहिए हो तो एक उपाय बताता हूँ—मैं रोज़ पड़ोस के बड़े घर में कथा सुनाने जाता हूँ। वे लोग दान–पुण्य करने वाले हैं। तुम चाहो तो जब मैं कथा सुनाऊँ, वहाँ जाकर चोरी कर लेना।”
चोर को बात ठीक लगी। वह मान गया।
अगले दिन जब पंडित जी कथा सुना रहे थे, चोर भी धीरे से वहाँ आ पहुँचा। कथा के बीच पंडित जी बोले—
“मीलों दूर एक जगह है वृन्दावन। वहाँ एक नन्हा बालक आता है—कान्हा। वह गहनों से लदा होता है। अगर किसी को लूटना हो, तो उसे लूटो। हर रात वह पीपल के पेड़ के नीचे आता है, आसपास झाड़ियाँ रहती हैं।”
चोर ने यह सुना और उसके मन में उम्मीद भर गई। वह बोला, “आज तो हाथ बड़ा माल लगेगा!”
घर जाकर उसने अपनी पत्नी से कहा,
“मैं आज कान्हा नाम के बच्चे को लूटने जा रहा हूँ। रास्ते के लिए कुछ खाने को दे दो।”
बेचारी पत्नी ने जितना था—थोड़ा सा सत्तू—बांधकर दे दिया।
चोर ने मन में ठान लिया—
“अब तो आज उस कान्हा को लूटकर ही लौटूँगा।”
टूटे चप्पल, खाली जेब और उम्मीद से भरा दिल लिए वह पैदल ही चल पड़ा। रास्ते भर वह “कान्हा… कान्हा…” नाम जपता रहा। अगले दिन शाम को वह उस जगह पहुँच गया जिसे पंडित जी ने बताया था।
सोचने लगा—
“सामने खड़ा रहूँगा तो बच्चा डरकर भाग जाएगा। मुझे झाड़ियों में छुपना चाहिए।”
वह जैसे ही झाड़ियों में गया, काँटे चुभने लगे। दर्द हुआ, पर उसके होंठों से बस एक ही शब्द निकला—
“कान्हा… कान्हा…!”
दुख, थकान और चोटों के बीच भी उसका मन उसी बालक की प्रतीक्षा करता रहा।
उधर, अपने भक्त की यह दशा देखकर भगवान कान्हा चल पड़े।
रुक्मणी जी ने कहा—
“प्रभु, वह आपको लूट लेगा!”
कान्हा मुस्कुराए—
“अगर कोई मेरे प्रेम में मुझे पाना चाहता है, तो मैं लुट जाऊँगा… मिट भी जाऊँ तो भी चलेगा।”
और वे बालरूप धारण करके आधी रात को वहाँ पहुँचे।
जैसे ही वह पेड़ के पास आए, चोर झाड़ियों से निकलकर कूद पड़ा—
“कान्हा! तूने मुझे बहुत भटकाया है। अब चुपचाप अपने गहने दे दे, वरना…”
कान्हा हँसकर बोले, “ले लो।”
और अपने सारे आभूषण उसकी हथेली में रख दिए।
चोर ख़ुश होकर अगले दिन गाँव लौटा और सबसे पहले वहीं पहुँचा जहाँ पंडित जी कथा सुना रहे थे। आधा हिस्सा उनके चरणों में रख दिया और बोला—
“ये आपका हिस्सा है! आप ही ने कान्हा का पता बताया था।”
पंडित जी चौंक गए—
“मैं इतने वर्षों से कथा करता हूँ, मुझे तो आज तक दर्शन नहीं हुए… तुझ जैसे पापी को भला कान्हा कैसे मिल गए?”
चोर ने बार-बार कहा, तो पंडित बोले,
“चल, मुझे भी दिखा दे।”
दोनों उसी स्थान पर पहुँचे। झाड़ियों में छुपकर दोनों नाम जपने लगे—
“कान्हा… कान्हा…!”
और ठीक मध्यरात्रि वही बालक पुनः उनके सामने प्रकट हो गया।
पंडित जी की आँखों से आँसू बहने लगे। वे गिर पड़े चोर के चरणों में—
“हम तो आज तक तरसते रह गए… और तूने तो उसे लूट लिया! तू धन्य है! तेरी वजह से आज मुझे कान्हा के दर्शन हुए!”
इतना निष्कपट प्रेम, इतनी सच्ची पुकार—
कान्हा अपने भक्तों के लिए दौड़ पड़ते हैं।
जो उन्हें दिल से पुकारता है, वे उसे खाली हाथ नहीं लौटाते।
मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
#कृष्णा

🔥 कर्म का हिसाब: जब भीष्म जैसे महायोद्धा भी नहीं बच पाए…क्या आप जानते हैं?महाभारत में बाणों की शय्या पर लेटना केवल युद्ध...
17/02/2026

🔥 कर्म का हिसाब: जब भीष्म जैसे महायोद्धा भी नहीं बच पाए…

क्या आप जानते हैं?
महाभारत में बाणों की शय्या पर लेटना केवल युद्ध का परिणाम नहीं था, बल्कि 101 जन्म पुराने एक कर्म का लौटकर आया हुआ फल था।

कहानी सिर्फ युद्ध की नहीं, कर्म और न्याय की है…

✨ 101 जन्म पुराना कर्म
एक पूर्व जन्म में भीष्म (तब एक राजकुमार) शिकार से लौट रहे थे। रास्ते में एक सर्प/गिरगिट आया। अहंकारवश उन्होंने उसे बाण से उठाकर कंटीली झाड़ियों में फेंक दिया।
वह जीव 18 दिनों तक कांटों में फंसकर तड़पता रहा… और अंततः प्राण त्याग दिए।

उस समय किया गया छोटा सा क्रूर कर्म, ब्रह्मांड की किताब में दर्ज हो गया।

⏳ फल मिलने में 101 जन्म की देरी क्यों?
भीष्म के पुण्य इतने विशाल थे कि वह पाप कई जन्मों तक दबा रहा।
लेकिन कर्म कभी मिटता नहीं… वह सही समय की प्रतीक्षा करता है।

⚖️ turning point – द्रौपदी चीरहरण
जब सभा में द्रौपदी का अपमान हुआ, तब धर्मज्ञ भीष्म मौन रहे।
यही मौन उनके पुण्य कवच को कमजोर कर गया…
और 101 जन्म पुराना कर्म सक्रिय हो गया।

🏹 बाणों की शय्या – वही पीड़ा, वही समय
कुरुक्षेत्र में अर्जुन के बाणों ने उनके शरीर को उसी तरह छलनी किया,
जैसे उस जीव को कांटों ने किया था।
और संयोग देखिए… भीष्म भी 18 दिनों तक शर-शय्या पर पड़े रहे।

🌞 इच्छा मृत्यु और उत्तरायण
पिता शांतनु के वरदान से उन्होंने अपनी मृत्यु का समय स्वयं चुना।
उत्तरायण आने तक प्रतीक्षा की, क्योंकि मान्यता है कि इस काल में देह त्यागने से मोक्ष का मार्ग खुलता है।

🏹 अर्जुन का वीर-योग्य तकिया
रेशमी तकिए ठुकराकर उन्होंने अर्जुन से बाणों का तकिया मांगा…
अर्जुन ने तीन बाणों से उनका सिर सहारा दिया — एक योद्धा के लिए सबसे सम्मानजनक शैय्या।

🔱 कर्म का शाश्वत सत्य
यह कथा बताती है —
कर्म कभी नष्ट नहीं होता, वह केवल समय लेता है।
चाहे आप कितने भी शक्तिशाली, ज्ञानी या धर्मात्मा क्यों न हों…
प्रकृति का न्याय अटल है।

🌱 जीवन संदेश
अहंकार में किया गया छोटा सा अन्याय भी भविष्य में विशाल परिणाम बनकर लौटता है।
इसलिए शक्ति का नहीं, करुणा का प्रयोग करें…
क्योंकि कर्म बीज है — और समय उसका वृक्ष।

🙏 जय श्री कृष्ण

15/02/2026

जय श्री महाकाल 🌼🌼🌼🌼🌼

"वो श्मशान में बसने वाले 'वैरागी',वो महलों की 'राजकुमारी'... 🔱🌺प्रेम, रंग-रूप या स्टेटस नहीं, बल्कि 'समर्पण' और 'त्याग' ...
15/02/2026

"वो श्मशान में बसने वाले 'वैरागी',
वो महलों की 'राजकुमारी'... 🔱🌺

प्रेम, रंग-रूप या स्टेटस नहीं, बल्कि 'समर्पण' और 'त्याग' मांगता है।

शिव-शक्ति का मिलन यही सिखाता है कि दो विपरीत स्वभाव मिलकर ही संसार को 'पूर्ण' करते हैं.....🕉️💕🕉️
🔱🔱🌼🌼

हिमालय की गोदी में छाई है अजब लाली..आज सज कर बैठी है, गौरा भोली-भाली..कंठ में मुंडमाल नहीं फूलों का हार है..कैलाश के स्व...
15/02/2026

हिमालय की गोदी में छाई है अजब लाली..
आज सज कर बैठी है, गौरा भोली-भाली..
कंठ में मुंडमाल नहीं फूलों का हार है..
कैलाश के स्वामी का अनूठा श्रृंगार है..
हाथों में हाथ लिए फेरे वो लेते हैं..
ब्रह्मा और देवगण आशीष देते हैं..
अग्नि की साक्षी में हुआ यह गठबंधन..
झूम उठा सारा जग हुआ मंगल अभिनंदन..
नीलकंठ के चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान है..
पार्वती के नैनों में शिव ही प्राण-समान हैं..
अघोरी बन गया दूल्हा त्याग कर वैराग्य को..
प्रेम ने जीत लिया देखो महादेव के त्याग को..
सौभाग्य की मूरत माता शक्ति का आधार हैं..
शिव ही जीवन शिव ही मुक्ति शिव ही सार हैं..
गौरा-शंकर की यह जोड़ी सदा अमर कहलाएगी..
युगों-युगों तक दुनिया इनका पावन गुण गाएगी..🔱🖤

जय श्री महाकाल, जय आदिशक्ति... 🔱🔱
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