मुक्तिधाम श्री श्री श्री गुम्मट जी का मंदिर
इस मंदिर का निर्माण अनन्त श्री महामति श्री प्राणनाथ जी के समकाल सन् 1688 सम्वत 1745 में महामति श्री प्राणनाथ जी के परम शिष्य शिरोमणि साकुण्डल सखी महाराज श्री छत्रसाल जी एवं समस्त ब्रम्हमुनि श्री 3 सुंदरसाथ जी के श्रमदान से ब्रम्हमुनि श्री बद्रीदास जी के नेतृत्व में हुआ महामति श्री प्राणनाथस जी में पंच शक्तियों का समावेष था
1. श्री राज जी का जोष
2. श्री श
्यामा जी की आत्मा
3. श्री तारतम तेज प्रकाष
4. आज्ञा शक्ति
5. श्री अक्षर ब्रम्ह की बुद्धी
इन्हीं पंच शक्तियों का प्रतीक पंजा मंदिर के मुख्य पाठ के ऊपर प्रतिष्ठित किया गया। मंदिर में महामति श्री प्राणनाथ जी की श्री मुखवाणी (श्री कुलजम स्वरूप साहब) जो स्वयं अक्षरातीत पूर्णब्रम्ह परमात्मा अनादी श्री कृष्ण के जोश से अवतरित हुई है उस पर मुरल मुकट वस्त्रदि धारण कराकर अष्ट प्रहर पूजा होती है अस्तु इस मंदिर का मुक्ति धाम के रूप में विशेष महत्व है।
इस पन्ना नगर की स्थपना महामति अक्षरातीत परब्रम्ह परमात्मा श्री प्राणनाथ जी के यहां आगमन के पश्चात हुई इस नगर में सर्वप्रथम निर्मित यह पुरातन मंदिर है विश्व में अद्वितीय और प्रणामी धर्म का प्रमुख केन्द्र है।
श्री श्री श्री बंगला जी मंदिर
विकम सम्वत 1740 में जब अनंत श्री अक्षरातीत पूर्णब्रम्ह परमात्मा श्री प्राणनाथ जी जब पन्ना जिसका प्राचीन नाम परना था जिसे पदमावतीपुरी धाम भी कहते है आए तब महाराजा श्री छत्रशाल जी ने ज्ञान से प्रभावित होकर उनसे अपना स्थायी निवास स्थल इसी विन्धय भूमि में बनाने की प्रार्थना की तथा सर्वप्रथम श्री बंगला जी मंदिर की नींव महामति श्री प्राणनाथ जी ने अपने हांथ से डाली अतः लकडी फूस का यह स्थल तैयार हुआ जिसमें सुंदरसाथ जी और महाराजा श्री छत्रशाल जी के सहयोग से यह मंदिर स्थापित हुआ जहां बैठकर श्री महामति जी सबको कुरान पुरान वेद शास्त्र के ज्ञान का उपदेश देने लगे। श्री मुखवाणी श्री कुलजम स्वरूप साहब की अधिकांश किताबों का अवतरण आवेश शक्ति द्वारा यही हुआ और रात-दिनप ज्ञान चर्चा की गंगा बहने लगी समस्त सुन्दरसाथ जी परमधाम पच्चीसपक्ष के ज्ञान से लाभविन्त हुए ‘जगह-जगह थोन हुये मेला हुआ मध्यदेश‘ और वर्तमान श्री बंगला जी मंदिर का जीर्णोद्धार महाराजा श्री छत्रशाल जी के पुत्र एवं श्री छत्रशाल जी के पोता महाराजा श्री सभासिंह जू देव में किया।
श्री निजानंद सतगुरू श्री श्री श्री देवचन्द्र जी का मंदिर
अनंत श्री महामति श्री प्राणनाथ जी अपने धर्म अभियान में श्री निजानन्दाचार्य सतगुरू धनी श्री देवचन्द्र जी महाराज (सन् 1581 – 1659) की गादी लेकर श्री 5 पदमावतीपुरी आए थे। जिसकी सेवा का भार रामनगर में ब्रम्हमुनि श्री जयन्ती काका को सौंपा था वह भावना पूर्वक पूजा करते थे उसी मूल गादी की सेवा इस मंदिर में होती है। कालान्तर में मंदिर का भव्य रूप से निर्माण ब्रम्हमुनि सेठ श्री भूषणदास जी धामी द्वारा किया गया इसके पश्चात मुम्बई निवासी सेठ श्री लालजी यादव जी डूगरसी ने उद्धार करवाया सन श्री दाना भाई भाटापारा वालों ने हाल बाकुडा निवासी श्री लाल जी राजा प्रभारी श्री चिमनलाल जी को प्रेरित कर विस्तृत रूप देकर नवीन मठ का निर्माण कराया सदगुरू धनी श्री देवचन्द्र जी महाराज को पूर्णब्रम्ह परमात्मा अनादी अक्षरातीत श्री कृष्ण जी ने साक्षात दर्शन देकर निजनाम मंत्र प्रदान किया।
यही मूल मंत्र जिसे निजनाम कहते है प्रणामी धर्म का दीक्षा मंत्र है।
श्री श्री श्री बाईजूराज महारानी जी का मंदिर
इस मंदिर की प्रतिष्ठा सन 1693 सम्वत 1750 में श्री बाईजूराज श्यामा जी स्वरूप महामति श्री प्राणनाथ जी की अर्द्धगिनी थी प्रणामी जगत में श्री बाईजूराज की राधिका स्वरूप है अतः भादौं शुक्ल अष्टमीं को इस मंदिर में आपका जन्मोत्सव वृहद रूप से मनाया जाता है।
लघु मंदिर का वृहदाकार निर्माण श्री ब्रम्हमुनि वंशातवंश सेठ श्री भूषणदास जी धामी ने अपना धन एवं सुनियोजित तरीके से निर्माण कराया था। आज भी प्रणामी अनुयायी एवं अन्य लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए यहां मानता करते हैं व मन वांछित फल प्राप्त करते हैं। इनकी महिमा अपरम्पार है। यह जागरूक स्थल है।
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