Gyani Pandit - Shree Babulnath Mishra

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16/02/2021

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वसंत पंचमी का त्योहार हिंदू धर्म में एक विशेष महत्व रखता है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।यह पू....

क्या होगा कलियुग के अंत में, जानिए...महर्षि व्यासजी के अनुसार कलयुग में मनुष्यों में वर्ण और आश्रम संबंधी प्रवृति नहीं ह...
31/03/2018

क्या होगा कलियुग के अंत में, जानिए...

महर्षि व्यासजी के अनुसार कलयुग में मनुष्यों में वर्ण और आश्रम संबंधी प्रवृति नहीं होगी। वेदों का पालन कोई नहीं करेगा। कलयुग में विवाह को धर्म नहीं माना जाएगा। शिष्य गुरु के अधीन नहीं रहेंगे। पुत्र भी अपने धर्म का पालन नहीं करेंगे। कोई किसी कुल में पैदा ही क्यूं न हुआ जो बलवान होगा वही कलयुग में सबका स्वामी होगा। सभी वर्णों के लोग कन्या बेचकर निर्वाह करेंगे। कलयुग में जो भी किसी का वचन होगा वही शास्त्र माना जाएगा।
कलयुग में थोड़े से धन से मनुष्यों में बड़ा घमंड होगा। स्त्रियों को अपने केशों पर ही रूपवती होने का गर्व होगा। कलयुग में स्त्रियां धनहीन पति को त्याग देंगी उस समय धनवान पुरुष ही स्त्रियों का स्वामी होगा। जो अधिक देगा उसे ही मनुष्य अपना स्वामी मानेंगे। उस समय लोग प्रभुता के ही कारण सम्बन्ध रखेंगे। द्रव्यराशी घर बनाने में ही समाप्त हो जाएगी इससे दान-पुण्य के काम नहीं होंगे और बुद्धि धन के संग्रह में ही लगी रहेगी। सारा धन उपभोग में ही समाप्त हो जाएगा। कलयुग की स्त्रियां अपनी इच्छा के अनुसार आचरण करेंगी हाव-भाव विलास में ही उनका मन लगा रहेगा। अन्याय से धन पैदा करने वाले पुरुषो में उनकी आसक्ति होगी। कलयुग में सब लोग सदा सबके लिए समानता का दावा करेंगे।

कलयुग की प्रजा बाड़ और सूखे के भय से व्याकुल रहेगी। सबके नेत्र आकाश की ओर लगे रहेंगे। वर्षा न होने से मनुष्य तपस्वी लोगो की तरह फल मूल व् पत्ते खाकर और कितने ही आत्मघात कर लेंगे। कलयुग में सदा अकाल ही पड़ता रहेगा। सब लोग हमेशा किसी न किसी कलेशो से घिरे रहेंगे। किसी-किसी तो थोड़ा सुख भी मिल जाएगा। सब लोग बिना स्नान करे ही भोजन करेंगे। देव पूजा अतिथि-सत्कार श्राद्ध और तर्पण की क्रिया कोई नहीं करेगा। कलयुग की स्त्रियां लोभी, नाटी, अधिक खानेवाली और मंद भाग्य वाली होंगी। गुरुजनों और पति की आज्ञा का पालन नहीं करेंगी तथा परदे के भीतर भी नहीं रहेंगी। अपना ही पेट पालेंगी, क्रोध में भरी रहेंगी। देह शुधि की ओर ध्यान नहीं देंगी तथा असत्य और कटु वचन बोलेंगी। इतना ही नहीं, वे दुराचारी पुरुषों से मिलने की अभिलाषा करेंगी।
ब्रह्मचारी लोग वेदों में कहे गए व्रत का पालन किए बिना ही वेदाध्यापन करेंगे। गृहस्थ पुरुष न तो हवन करेंगे न ही सत्पात्र को उचित दान देंगे। वनों में रहने वाले वन के कंद-मूल आदि से निर्वाह न करके ग्रामीण आहार का संग्रह करेंगे और सन्यासी भी मित्र आदि के स्नेह बंधन में बंधे रहेंगे। कलयुग आने पर राजा प्रजा की रक्षा न करके बल्कि कर के बहाने प्रजा के ही धन का अपहरण करेंगे। अधम मनुष्य संस्कारहीन होते हुए भी पाखंड का सहारा लेकर लोगों ठगने का काम करेंगे । उस समय पाखंड की अधिकता और अधर्म की वृद्धि होने से लोगो की आयु कम होती चली जाएगी। उस समय पांच, छह अथवा सात वर्ष की स्त्री और आठ, नौ, या दस वर्ष के पुरुषों से ही संतान होने लगेंगी। घोर कलयुग आने पर मनुष्य बीस वर्ष तक भी जीवित नहीं रहेंगे। उस समत लोग मंदबुद्धि, व्यर्थ के चिन्ह धारण करने वाले बुरी सोच वाले होंगे।

लोग ऋण चुकाए बिना ही हड़प लेंगे तथा जिसका शास्त्र में कहीं विधान नहीं है ऐसे यज्ञों का अनुष्ठान होगा। मनुष्य अपने को ही पंडित समझेंगे और बिना प्रमाण के ही सब कार्य करेंगे। तारों की ज्योति फीकी पड़ जाएगी, दसों दिशाएं विपरीत होंगी। पुत्र पिता को तथा बहुएं सास को काम करने भेजेंगी। कलयुग में समय के साथ-साथ मनुष्य वर्तमान पर विश्वास करने वाले, शास्त्रज्ञान से रहित, दंभी और अज्ञानी होंगे। जब जगत के लोह सर्वभक्षी हो जाएं, स्वंय ही आत्मरक्षा के लिए विवश हो तथा राजा उनकी रक्षा करने में असमर्थ हो जाएंगे तब मनुष्यों में क्रोध-लोभ की अधिकता हो जाएगी।

कलयुग के अंत के समय बड़े-बड़े भयंकर युद्ध होंगे, भारी वर्षा, प्रचंड आंधी और जोरों की गर्मी पड़ेगी। लोग खेती काट लेंगे, कपड़े चुरा लेंगे, पानी पिने का सामान और पेटियां भी चुरा ले जाएंगे। चोर अपने ही जैसे चोरों की संपत्ति चुराने लगेंगे। हत्यारों की भी हत्या होने लगेगी, चोरों से चोरों का नाश हो जाने के कारण जनता का कल्याण होगा। युगान्त्काल में मनुष्यों की आयु अधिक से अधिक तीस वर्ष की होगी। लोग दुर्बल, क्रोध-लोभ, तथा बुड़ापे और शोक से ग्रस्त होंगे। उस समय रोगों के कारण इन्द्रियां क्षीण हो जाएंगी। फिर धीरे-धीरे लोग साधू पुरुषों की सेवा, दान, सत्य एवं प्राणियों की रक्षा में तत्पर होंगे। इससे धर्म के एक चरण की स्थापना होगी। उस धर्म से लोगों को कल्याण की प्राप्ति होगी। लोगों के गुणों में परिवर्तन होगा और धर्म से लाभ होने का अनुमान होने लगेगा। फिर श्रेष्ठ क्या है, इस बात पर विचार करने से धर्म ही श्रेष्ठ दिखाई देगा। जिस प्रकार क्रमशः धर्म की हानि हुई थी, उसी प्रकार धीरे-धीरे प्रजा धर्म की वृद्धि को प्राप्त होगी। इस प्रकार धर्म को पूर्णरूप से अपना लेने पर सब लोग सत्ययुग देखेंगे।

श्री हनुमान चालीसा में गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि – ‘चारो जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा।’इस चौपाई मे...
31/03/2018

श्री हनुमान चालीसा में गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि – ‘चारो जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा।’

इस चौपाई में साफ संकेत है कि हनुमान जी ऐसे देवता है, जो हर युग में किसी न किसी रूप, शक्ति और गुणों के साथ जगत के लिए संकटमोचक बनकर मौजूद रहेंगे। हनुमानजी से जुड़ी यही विलक्षण और अद्भुत बात उनके प्रति आस्था और श्रद्धा गहरी करती है।

यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि।
वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक॥''

अर्थात: कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं। सीताजी के वचनों के अनुसार- अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ॥

तुलसीदास जी द्वारा रचित राम चरित्र मानस में लिखते हैं कलियुग में भी हनुमान जी जीवंत रहेंगे और उनकी कृपा से ही उन्हें श्रीराम और लक्ष्मण जी के साक्षात दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। इन्हें सीताराम जी से आशीर्वाद स्वरूप अजर अमर होने का वर भी प्राप्त है।

हिंदु शास्त्रों के में भी आता है कि “अश्वत्थामा बलिर व्यासः हनुमंथरः विभीषणः। कृबा परशुराम च सप्तैतेय चिरंजीविनः।।“

अर्थात सात ऐसे चिरंजीवी महापुरूष हैं जो सदा के लिए अजर-अमर हैं और इनके नाम को सच्चे दिल से याद करने मात्र से भाग्य और आयु में वृद्धि होती है।

जब श्रीराम भूलोक से बैकुण्ठ को चले गए तो हनुमान जी ने अपना निवास पवित्र और ईश्वरीय कृपा से युक्त स्थान गंधमादन पर्वत को बनाया और आज भी वह वहीं निवास करते हैं। इस बात की पुष्टि श्रीमद् भगावत् पुराण में भी की गई है। भगवान हनुमान जी ने इसी पवित्र स्थल को अपना निवास बनाया और कहते हैं कि समय-समय पर हनुमान जी यहाँ से नीचे भी आते हैं और अपने प्यारे भक्तों को दर्शन भी देते हैं।

हनुमान चालीसा में तुलसीदास जी बताते हैं कि “तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै”,

अर्थात जो भी व्यक्ति भगवान श्री हनुमान को याद करता है, इनका भजन करता है वह भगवान श्री राम को तो प्राप्त करता ही है साथ में उस व्यक्ति के जन्म-जन्म के दुःख भी खत्म हो जाते हैं।

पुराणों के अनुसार गंधमादन पर्वत भगवान शिव के निवास कैलाश पर्वत के उत्तर में अवस्थित है। इस पर्वत पर महर्षि कश्यप ने तप किया था। हनुमान जी के अतिरिक्त यहां गंधर्व, किन्नरों, अप्सराओं और सिद्घ ऋषियों का भी निवास है। माना जाता है की इस पहाड़ की चोटी पर किसी वाहन द्वारा जाना असंभव है। सदियों पूर्व यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था लेकिन वर्तमान में यह क्षेत्र तिब्बत की सीमा में है।

कहाँ है गंधमादन पर्वत?
हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है। पुराणों में जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था।

भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी गरुड़ पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए।द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर खुद शिव से मिलने अंदरचले गए। तब कै...
22/03/2018

भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी गरुड़ पर बैठ कर
कैलाश पर्वत पर गए।
द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर खुद शिव से मिलने अंदर
चले गए। तब कैलाश की अपूर्व प्राकृतिक शोभा
को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे।
कि तभी उनकी नजर
एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी।
चिड़िया कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारे
विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे।
उसी समय कैलाश पर यम देव पधारे और अंदर जाने से
पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की
द्रष्टि से देखा।
गरुड़ समझ गए उस चिड़िया का अंत
निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने
साथ यमलोक ले जाएँगे।

गरूड़ को दया आ गई। इतनी छोटी और सुंदर
चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे।
उसे अपने पंजों में दबाया और कैलाश से हजारो कोश
दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया,
और खुद बापिस कैलाश पर आ गये ।

आखिर जब यमराज बाहर आए तो गरुड़ ने पूछ ही लिया
कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी
नजर से क्यों देखा था। यम देव बोले "गरुड़ जब मैंने
उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो
चिड़िया कुछ ही पल बाद यहाँ से हजारों कोस दूर
एक नाग द्वारा खा ली जाएगी। मैं सोच रहा था
कि वो इतनी जलदी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर अब
जब वो यहाँ नहीं है तो निश्चित ही वो मर चुकी
होगी।"

गरुड़ समझ गये "मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी
भी चतुराई की जाए।"

इस लिए कृष्ण कहते है।
करता तू वह है
जो तू चाहता है
परन्तु होता वह है
जो में चाहता हूँ
कर तू वह
जो में चाहता हूँ
फिर होगा वो
जो तू चाहेगा ।

जीवन के 6 सत्य:-
1. कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने खूबसूरत हैं ?
क्योंकि..लँगूर और गोरिल्ला भी अपनी ओर लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं..
2. कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका शरीर कितना विशाल और मज़बूत है ?
क्योंकि...श्मशान तक आप अपने आपको नहीं ले जा सकते....
3. आप कितने भी लम्बे क्यों न हों , मगर आने वाले कल को आप नहीं देख सकते....
4. कोई फर्क नहीं पड़ता कि , आपकी त्वचा कितनी गोरी और चमकदार है
क्योंकि...अँधेरे में रोशनी की जरूरत पड़ती ही है...
5 . कोई फर्क नहीं पड़ता कि " आप " नहीं हँसेंगे तो सभ्य कहलायेंगे ?
क्यूंकि ..." आप " पर हंसने के लिए दुनिया खड़ी है ?
6. कोई फर्क नहीं पड़ता कि ,आप कितने अमीर हैं ? और दर्जनों गाड़ियाँ आपके पास हैं ?
क्योंकि...घर के बाथरूम तक आपको चल के ही जाना पड़ेगा...
इसलिए संभल के चलिए ... ज़िन्दगी का सफर छोटा है , हँसते हँसते काटिये , आनंद आएगा ।

।। जय श्री कृष्णा ।।

शनिदेव सिर नीचा करके क्यों रहते हैं?शनिदेव भगवान सूर्य के पुत्र हैं। छाया (सवर्णा) इनकी माता हैं। ये क्रूर ग्रह माने जात...
10/03/2018

शनिदेव सिर नीचा करके क्यों रहते हैं?

शनिदेव भगवान सूर्य के पुत्र हैं। छाया (सवर्णा) इनकी माता हैं। ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। ब्रह्मवैवर्तपुराण की कथा के अनुसार–

बचपन से ही शनि भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम में निमग्न रहते थे। वयस्क होने पर इनके पिता ने इनका विवाह चित्ररथ की कन्या से कर दिया। इनकी पत्नी बड़ी तेजस्विनी और साध्वी थी। एक रात ऋतु-स्नानकर पुत्रप्राप्ति की कामना से वह पति के पास पहुंची। शनिदेव ध्यान में बैठे थे। उन्हें बाह्यजगत का कुछ ज्ञान न था। पत्नी प्रतीक्षा कर थक गयी पर शनिदेव का ध्यान न टूटा। इस उपेक्षा से क्रुद्ध होकर पत्नी ने शनिदेव को शाप दे दिया कि जिसे तुम देख लोगे वह नष्ट हो जाएगा। ध्यान टूटने पर शनिदेव ने पत्नी को मनाया। पत्नी को स्वयं पश्चात्ताप हो रहा था, किन्तु शाप को वापिस लेने की शक्ति उसमें नहीं थी।

तब से शनिदेव सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे किसी का अहित नहीं चाहते हैं। उनकी दृष्टि पड़ते ही कोई भी नष्ट हो सकता है।

होली क्यों मनाते हैं?
01/03/2018

होली क्यों मनाते हैं?

होली को ‘रंगों का त्यौहार’ कहा जाता है. हिंदू धर्म के अनुसार होली फाल्गुन महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। ....

*कर्मों से डरिये ईश्वर से नहीं... ईश्वर माफ कर देता हैं कर्म नहीं ।* *अटल सत्य है कि जैसे बछड़ा सौ गायों में अपनी मां को...
27/02/2018

*कर्मों से डरिये ईश्वर से नहीं... ईश्वर माफ कर देता हैं कर्म नहीं ।*
*अटल सत्य है कि जैसे बछड़ा सौ गायों में अपनी मां को ढूंढ लेता है... उसी प्रकार कर्म अपने कर्ता को ढूंढ ही लेता है... आज नहीं तो कल ।।*

मोक्ष रात्रि पुराणों में बताया गया है क‌ि फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी साल की सभी रातों में खास है। इस रात को...
12/02/2018

मोक्ष रात्रि पुराणों में बताया गया है क‌ि फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी साल की सभी रातों में खास है। इस रात को कालरात्र‌ि और स‌िद्ध‌ि की रात भी कहते हैं क्योंक‌ि सृष्ट‌ि में इस द‌िन एक बड़ी घटना हुई थी ज‌िसका इंतजार सभी देवी-देवता और ऋष‌ि मुन‌ि कर रहे थे। महाश‌िवरात्र‌ि की रात में भगवान श‌िव और देवी पार्वती का व‌िवाह हुआ था इसल‌िए इस रात का सृष्ट‌ि में बड़ा महत्व है। भगवान श‌िव और देवी पार्वती सृष्ट‌ि में भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले माने गए हैं। इसल‌िए महाश‌िवरात्र‌ि को मोक्ष की रात्र‌ि और मुक्त‌ि की रात्र‌ि भी कहा गया है।
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मृत्यु एवम् मोक्ष में क्या अंतर है????"साँसे पूरी हो जाय और तमन्नायें बाक़ी रहे ...... वह मृत्यु है।साँसें बाक़ी रहें और त...
05/02/2018

मृत्यु एवम् मोक्ष में क्या अंतर है????

"साँसे पूरी हो जाय और तमन्नायें बाक़ी रहे ...... वह मृत्यु है।
साँसें बाक़ी रहें और तमन्नायें पुरी हो जाय ...... वह मोक्ष है!"

💥💥|| भगवत्प्राप्ति सरल है ||💥 आप ध्यान दें
शरीर , इंद्रियाँ , मन , बुद्धि , सब बदलते है , पर अपना होनापन निरन्तर ज्यों का त्यों रहता है | शरीर तथा संसार बदलते है , स्वयं तथा परमात्मा नहीं बदलते | बदलने वाला बदलने वाले के साथ एक है , नहीं बदलने वाला नहीं बदलने वाले के साथ एक है | हम मै आप सर्व अविनाशी जीव न बदलने वाले अपने होनेपन में ईश्वरमें द्रढ रहो | अनुभव में न आये तो भी द्रढता से मान लो | बाद में ये मानना मानना नहीं रहेगा, अनुभव हो जायेगा ! केवल इस बात का आदर करो | ये बातें मिलती नहीं ! !
शरीर संसार से अलग नहीं हो सकता और हम परमात्मा से अलग नहीं हो सकते | शरीर के साथ हमारी एकता परमात्मा अनुभूतिं है | शरीर हमारे से बहुत दूर है | हमारी एकता परमात्मा के साथ है | परमात्मा हमें मिले हुये ही हैं |
यही तत्वज्ञान है , यही स्वाधीनता है |
मृत्यु होने पर शरीर छूटेगा | मै तो परमात्मा है | फिर मनुष्य में यह सामर्थ्य नहीं कि परमात्मासे अलग हो जायँ , दूर हो जायँ क्योंके आत्म अनुभूति पर मनुष्य स्वयं मिटकर परमात्मा हि रह जाते है।
"हूँ" " है" से अलग कैसे होगा ? शरीर मेरे काम तब आता है, जब मै परमात्माहि रह जाते है |
शरीर हरदम मौत में रहता है , मैं हरदम परमात्मा में रहता है | यह बात जीवन भर कभी मिट सकती है क्या ?
अब करना , पाना , जानना क्या बाकी रहा .............
स्वंय विचार कीजिऐ !!!!!!!!!!

शुभ विचार द्रष्टिकोण बदल तो दीखे सारे जीव ईश्वरमें परमेश्वरमेहि है। मेरा स्वरुप प्राण है। मै अत्मा हुं। आत्मा सुखका स्वरुप है और परमें आत्मा का मतलब परमात्मा जो मैहि स्वयं हि हुं।

ॐ हंश शोहम् परमात्माचिन्नमयंम् सत्तचिद्दानंद स्वरुपं शोहम् ब्रह्म।

ॐ शोहम् सकल श्यामम् तत्व निरंजन तारक रामम् काशी क्षेत्र अविनाशी धामम् गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरु देवनका देव चेला तो मुक्ति पामे जो करे गुरु की सेव।

⚛ मन को जीतना ही सबसे बड़ा तप है ⚛--------------------------------------------एक ऋषि यति-मुनि एक समय घूमते-घूमते नदी के त...
29/01/2018

⚛ मन को जीतना ही सबसे बड़ा तप है ⚛
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एक ऋषि यति-मुनि एक समय घूमते-घूमते नदी के तट पर चल रहे थे। मुनि को मौज आई। हम भी आज नाव पर बैठकर नदी की सैर करें और प्रभु की प्रकृति के दृश्यों को देखें। चढ़ बैठे नाव को देखने के विचार से । मुनिवर नीचे के खाने में गये, जहां नाविक का सामान और निवास होता है । जाते ही उनकी दृष्टि एक कुमारी कन्या पर पड़ी, जो नाविक की पुत्री थी। कुमारी इतनी रुपवती थी कि मुनिवर विवश हो गये, उन्हें मूर्च्छा सी आ गई।.देवी ने उनके मुख में पानी डाला तो होश आया।

कुमारी ने पूछा ―"मुनिवर ! क्या हो गया ?"

मुनि बोला― "देवी ! मैं तुम्हारे सौन्दर्य पर इतना मोहित हो गया कि मैं अपनी सुध-बुध भूल गया अब मेरा मन तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। मेरी जीवन मृत्यु तुम्हारे आधीन है।"

कुमारी बोली ― "आपका कथन सत्य है, परन्तु मैं तो नीच जाति की मछानी हूं।"

मुनि― "मुझमें यह सामर्थ्य है कि मेरे स्पर्श से तुम शुद्ध हो जाओगी।"

कुमारी ― "पर अब तो दिन है।"

मुनि― "मैं अभी रात कर दिखा सकता हूं।"

कुमारी ― "फिर भी यह जल (नदी) है।"

मुनि― "मैं आन की आन में इसे स्थल (रेत) बना सकता हूं।"

कुमारी ― "मैं तो अपने माता-पिता के आधीन हूं। उनकी सम्मति तो नहीं होगी।"

मुनि― "मैं उनको शाप देकर अभी भस्म कर सकता हूं।"

कुमारी ― "भगवन् ! जब परमात्मा ने आपको आपके जप, तप के प्रताप से इतनी सामर्थ्य और सिद्धि वरदान दीये है तो कितनी मूर्खता की बात है कि आप अपने जन्म जन्मान्तरों के तप को एक नीच काम करने और क्षणिक आनन्द में विनष्ट करने के लिए तैयार हो। शोक ! आपमें इतनी सामर्थ्य है कि जल को थल, दिन को रात बना सको पर यह सामर्थ्य नहीं कि मन को रोक सको।"

मुनि ने इतना सुना ही था कि उसके ज्ञाननेत्र खुल गए। तत्काल देवी के चरणों में गिर पड़ा कि तुम मेरी गुरु हो, सम्भवतः यही न्यूनता थी जो मुझे नाव की सैर का बहाना बनाकर खींच लाई।

दृष्टान्त―

(१) रुप और काम बड़े-बड़े तपस्वियों को गिरा देता है।

(२) तपी-जती स्त्री रुप से बचें।

(३) कच्चे पक्के की परीक्षा तो संसार में होती है, जंगल में नहीं।

(४) जब अपनी भूल का भान हो जावे, तब हठ मत करो।

(५) जिन पर प्रभु की दया होती है, उनका साधन वे आप बनाते हैं।

इसी सन्देश को मनुस्मृति में बताया गया है-

इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु | संयमे यतनमातिष्ठेविद्वान यत्नेव वाजिनाम ||
[ मनु - 2 / 88 ]

जिस प्रकार से विद्वान सारथि घोड़ों को नियम में रखता है , उसी प्रकार हमको अपने मन तथा आत्मा को खोटे कामों में खींचने वाले विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों को सब प्रकार से खींचने का प्रयत्न करना चाहिए।

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