जालौन जिले में वैसे तो कई सिद्ध स्थल हैं परन्तु शक्ति सिद्ध पीठ के रूप ग्राम सैदनगर में बेत्रवती के तट पर स्थित अक्षरा पीठ का महत्व सर्वश्रेष्ठ है। इस स्थान की प्राचीनता का सही सही अनुमान लगाना तो संभव नहीं है किन्तु उपलब्ध शिलापट्ट के अनुसार इसके एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना होने का पता चलता है।
अंग्रेजों के समय लिखे गए कई शोधग्रंथों के अनुसार यहां ईसा पूर्व चेदिवंश का शासन रहा। पुराने इतिहास
की वजह से यहां जगह-जगह आध्यात्मिक पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहरें बिखरी पड़ी हैं, लेकिन कालचक्र की उथल-पुथल में इनका इतिहास विलुप्त हो चुका है। अक्षरादेवी धाम भी ऐसी ही धरोहरों में एक है। वैसे भी दुर्गमता के कारण जल परिवहन की अहमियत खत्म होने के बाद यह क्षेत्र मुख्य धारा से कट गया था।
यह कानपुर-झांसी रेलमार्ग पर एट जंक्शन से करीब 12 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में कोटरा रोड पर ग्राम कुरकुरू से एक लिंक मार्ग से जुड़ा है। मंदिर तक पक्की सड़क बनी हुई है। यहां किसी भी वाहन से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह जिले का सर्वोत्तम आध्यात्मिक-प्राकृतिक पर्यटन स्थान है। यह स्थान वैदिक काल के बाद जब तांत्रिक काल में जगदम्बा उपासना की सिद्धि पीठ वाले इस स्थान पर त्रिकोण है। इस त्रिकोण के तीनांे स्थान बेतवा तट पर स्थित थे। कालान्तर में नदी का प्रवाह बदला और बहाव एक मील ऊपर पूर्व की ओर बहकर रास्ता बना ले गया। यह आदिपीठ इसी त्रिकोण का हिस्सा माना जाता है। जिसे साधक लोग गायत्री पीठ, त्रिपुर सुन्दरी पीठ एवं महालक्ष्मी पीठ मानते रहे।
यह अक्षरा शब्द उस मां की आराधना की जगह है जहां महाप्रलय होने के बाद ब्रह्म निष्क्रिय होने पर भी ब्रह्मीय शक्ति के संयोग से ही वह एकोऽम बहुम्याम की कल्पना करती है। उसी कल्पना कर्ता को ही वर्णमाला के प्रथम अक्षर ‘अ’ का रूप दिया गया। यही शक्ति अक्षरा है। न क्षरा इति अक्षरा। तात्पर्य यह है कि अक्षरा माता ही संसार का सृजन करतीं हैं इसलिए संसार की समस्त वस्तुएं मां के पुत्रों एवं पुत्रियों के लिए ही रहें। किंवदंतियों के अनुसार ब्रह्माण्ड में सर्वप्रथम लिपि की उद्भव इसी स्थान से माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि मनुष्य की बोली को सर्वप्रथम भगवान शिव ने डमरू के नाद से स्वर के रूप में व्यवस्थित किया, इसके बाद लिपि की शुरुआत हुई। आमतौर पर देवी मंदिरों में मां आदिशक्ति प्रतिमा या पिण्डी रूप में विराजती हैं। परन्तु श्री अक्षरा देवी मंदिर के गर्भगृह में मां किसी प्रतिमा की बजाय प्रस्तर खण्ड पर प्रणवाक्षर की साढ़े तीन मात्राओं के एक यंत्र के रूप में विराजमान हैं। इस कारण यहां केवल बौद्धिक साधना मान्य है। देवी भागवत के परम विद्धान वृन्दावन के आचार्य भागवतानंद जी सरस्वती के अनुसार यंत्र रूप में देवी की पूजा विशेष फल देने वाली होती है। आचार्य श्री के अनुसार श्री अक्षरा देवी उन विरले शक्तिपीठों में से एक है जहां देवी अपने यंत्र स्वरूप में विराजित हैं। यहां किसी प्रकार की सिद्धि करने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। यह स्थान स्वंयसिद्ध है। आचार्य श्री कहते हैं कि श्री दुर्गा सप्तशती के तंत्रोक्त रात्रिसूक्तम् में परमपिता ब्रह्मा जी ने अक्षरा देवी की प्रार्थना की है।
अक्षरादेवी धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें न बलि चढ़ती है और न कोई अन्य वाममार्गी साधना होती है। मां कभी अपनी संतान से बलिदान नहीं चाहतीं। इसलिए उस स्थान पर नारियल, मद्य, तिल, जवा का हवन निषिद्ध है। मंदिर के अंदर तेल का दीपक नहीं जलता और न ही नारियल की बलि दी जाती है। माँ के सामने तिल और जवा का हवन नहीं किया जाता है। हाँ, नारियल को मंदिर के पीछे दूर पहाड़ पर बलि के रूप में तोड़कर प्रसाद ले सकते हैं। इसके साथ ही तिल और जवा का हवन भी पीछे बनी वेदी पर किया जा सकता है। यदि किसी को देवी के सम्मुख हवन करना ही हो तो चन्दन, धूप, आदि लकड़ी की औषधियों को गाय के घृत एवं शक्कर में मिला कर सकते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर तामसी पदार्थ एवं राजसी संकल्प को लेकर देवी की आराधना नहीं की जा सकती। मां अक्षरा प्रत्येक रजोगुणी, तमोगुणी व्यक्ति की भावनाओं को शुद्ध कर देतीं हैं।
यह स्थान सौम्यता के साथ-साथ मोक्ष की साधना अथवा भक्ति की साधना हेतु सर्वाेपरि है। निर्दोष होने पर भी मुकदमों में मिथ्या फंसे लोगों को लाभ पहुंचते देखा गया है। परन्तु सत्यता नहीं होने पर कोई मनन चिंतन करे तो भी लेश मात्र भी सफलता नहीं मिलती।
श्री अक्षरा पीठ के सामने चट्टान पर गोलाकार प्राकृतिक अक्षय कुण्ड है जिसमें सैदोलक पाया जाता है। सैदोलक एक विशेष प्रकार का शुद्ध जल को कहते हैं जो पहाड़ से क्षण भेदी प्रहर और चैबीस घंटे में यदा-कदा उपयुक्त मुहूर्त में प्रयास करने पर पाया जाता है। आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता आदि में वर्णित जल प्रकरण के अनुसार ‘‘ जो जल धातु को स्वर्ण में तथा लकड़ी को पत्थर में और पत्थर को मणि में बदल दे, वह सैदोलक कहलाता है।’’
शास्त्र मतानुसार जो जल उपर्युक्त वस्तुओं को परिवर्द्धित करता है वह जल ही समर्थ गुरु द्वारा मानव शरीर का कायाकल्प करता है। इसी युग में पहले लोगों को कीमयागिरी या स्वर्ण बनाते देखा गया है, ऐसा फकीरों और महात्माओं द्वारा कहा-सुना जाता है।
शास्त्रों के अनुसार मनुष्य की अधिकतम आयु 120 वर्ष होती है जिसमें अधिकांश समय अज्ञानता में चला जाता है। ज्ञानोदय होने तक शरीर जर्जर हो जाता है। साधक भजन के योग्य नहीं रहता है, नेत्र कमजोर हो जाते हैं। इसलिए सैलोदक का प्रयोग की आवष्यकता अनुभव की जाती है। लोग इस जल को ले जाकर नेत्रों में डालते हैं जिससे उनकी नेत्र व्याधियां ठीक होती देखीं गईं हैं। वे मातायें जिनकी संतानें पैदा होने पर अतिशीघ्र मृत हो जाती हैं जिसे आयुर्वेद की भाषा में मृत्युवत्सा कहते हैं, इस जल को ले जाकर पहले मां के चरणों में पांव पखारती हैं और पुत्र प्राप्ति हेतु आराधना करतीं हैं। प्रसव के कुछ दिन पूर्व इस जल को मंगवा कर नवजात शिशु को जन्मते ही स्नान कराते हैं और कुछ दिन पश्चात मां के दरबार में लाने पर शिशु पूर्णतः स्वस्थ हो जाता है। इस प्रकार मन कर्म वचन से लगे भक्त की अभिलाषा पूरी होती है। नवरात्र पर यहां विशेष आराधना के लिए श्रद्धालु पूरे नौ दिन प्रवास करते हैं। चैत्र नवरात्र के बाद पड़ने वाली एकादशी के दिन यहां विशेष मेला लगता है, जिसमें कई जनपदों के श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
यह स्थान बेतवा नदी के किनारे होने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार बेतवा अथवा वेत्रवती भगवान के शिव के अश्रु का प्रवाह है। दक्ष प्रजापति के यहां यज्ञ में बिना बुलाये पहंुचने पर देवी सती के हवनकुण्ड में भस्तीभूत हो जाने की घटना से अत्यंत क्रोधित होकर भगवान शिव ने तीसरा नेत्र खोला था। इससे पहले उनके दोनों नेत्रों से अश्रुपात हुआ था जो वेत्रवती के रूप में प्रवाहित हुआ। धर्मशास्त्री मानते हैं कि शिव की जटाओं से निकलीं गंगा से वेत्रवती की महिमा कहीं से भी कम नहीं है। वेत्रवती के किनारे दश महाविद्याओं के स्थान हैं जिनमें अक्षरा देवी, रक्तदंता देवी और छिन्नमस्ता देवी भी आतीं हैं। शिव के आवेश का प्रवाह होने के कारण वेत्रवती के किनारे पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि को परम मुक्तिदायक माना जाता है। कई तंत्र साधनाओं के लिये भी बेतवा तट सबसे उपयुक्त बताया गया है। धर्म के जानकारों के अनुसार ‘‘कलोयुग वेत्रवती गंगा ’’ अर्थात् कलयुग में वेत्रवती गंगा हंै। कुछ वर्ष पहले तक वेत्रवती प्रतिवर्ष बरसात में बाढ़ के रूप में आकर अपने जल से मां के चरण पखारने राजमंदिर में प्रवेश करतीं रहीं हैं। किन्तु हाल ही में मौसम की अनियमितता के कारण अब यह क्रम टूट सा गया है