Vedic Jyotish by Pandit Suresh Kumar Chaturvedi

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Vedic Jyotish by Pandit Suresh Kumar Chaturvedi वैदिक ज्योतिष, दैनिक पंचांग, मुहूर्त, ?

09/07/2025

गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णु गुरुः देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात् परब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः।

गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर परम पूजनीय गुरुदेव भगवान के श्री चरणों में साष्टांग दंडवत।

गुरु भगवान की कृपा मेरे एवं मेरे परिवार व उनके सभी शिष्यों पर हमेशा बनी रहे

मेरे सभी गुरु भाईयों और बहनों को एवं सभी मेरे शिष्यों को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं

29/01/2025

*भीष्म पितामह के सौलह रहस्य*
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पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरु हुए। पुरु के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए।

कुरु के वंश में आगे चलकर राजा प्रतीप हुए जिनके दूसरे पुत्र थे शांतनु। शांतनु का बड़ा भाई बचपन में ही शांत हो गया था। शांतनु के गंगा से देवव्रत (भीष्म) हुए। भीष्म ने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली थी इसलिए यह वंश आगे नहीं चल सका। भीष्म अंतिम कौरव थे।

पहला रहस्य
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यह वह काल था जबकि देवी और देवता धरती पर विचरण किया करते थे। किसी खास मंत्र द्वारा उनका आह्वान करने पर वे प्रकट हो जाया करते थे। देवताओं में इंद्र, वरुण, 2 अश्विनकुमार, 8 वसुगण, 12 आदित्यगण, 11 रुद्र, सूर्य, मित्र, पूषन, विष्णु, ब्रह्मा, शिव, सती, सरस्वती, लक्ष्मी, उषा, अपांनपात, सविता, त्रिप, विंवस्वत, 49 मरुद्गण, पर्जन्य, वायु, मातरिश्वन्, त्रिप्रआप्त्य, अज एकपाद, आप, अहितर्बुध्न्य, यम, पितृ (अर्यमा), मृत्यु, श्रद्धा, शचि, दिति, अदिति, कश्यप, विश्वकर्मा, गायत्री, सावित्री, आत्मा, बृहस्पति, शुक्राचार्य आदि। इन्हीं देवताओं के कुल में से एक मां गंगा भी हैं।

गंगा ने क्यों किया शांतनु से विवाह? पुत्र की कामना से शांतनु के पिता महाराजा प्रतीप ने गंगा के किनारे तपस्या कर रहे थे। उनके तप, रूप और सौन्दर्य पर मोहित होकर गंगा उनकी दाहिनी जंघा पर आकर बैठ गईं और कहने लगीं, 'राजन! मैं आपसे विवाह करना चाहती हूं। मैं जह्नु ऋषि की पुत्री गंगा हूं।'

इस पर राजा प्रतीप ने कहा, 'गंगे! तुम मेरी दाहिनी जंघा पर बैठी हो, जबकि पत्नी को तो वामांगी होना चाहिए, दाहिनी जंघा तो पुत्र का प्रतीक है अतः मैं तुम्हें अपने पुत्रवधू के रूप में स्वीकार कर सकता हूं।' यह सुनकर गंगा वहां से चली गईं।'

जब महाराज प्रतीप को पुत्र की प्राप्ति हुई तो उन्होंने उसका नाम शांतनु रखा और इसी शांतनु से गंगा का विवाह हुआ। गंगा से उन्हें 8 पुत्र मिले जिसमें से 7 को गंगा नदी में बहा दिया गया और 8वें पुत्र को पाला-पोसा। उनके 8वें पुत्र का नाम देवव्रत था। यह देवव्रत ही आगे चलकर भीष्म कहलाया।

दूसरा रहस्य
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शांतनु ने अपने पिता प्रतीप की आज्ञा से गंगा के पास जाकर उनसे विवाह करने के लिए निवेदन किया था। गंगा तो शांतनु के पिता पर आसक्त हुई थी। तब गंगा ने कहा, 'राजन्! मैं आपके साथ विवाह करने के लिए तैयार हूं लेकिन आपको वचन देना होगा कि आप मेरे किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।' शांतनु ने गंगा को वचन देकर विवाह कर लिया।

गंगा के गर्भ से महाराज शांतनु को 8 पुत्र हुए जिनमें से 7 को गंगा ने गंगा नदी में ले जाकर बहा दिया। वचन के बंधे होने के कारण शांतनु कुछ नहीं बोल पाए।

जब गंगा का 8वां पुत्र हुआ और वह उसे भी नदी में बहाने के लिए ले जाने लगी तो राजा शांतनु से रहा नहीं गया और उन्होंने इस कार्य को करने से गंगा को रोक दिया। गंगा ने कहा, 'राजन्! आपने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी है इसलिए अब मैं आपके पास नहीं रह सकती।' इतना कहकर गंगा वहां से अंतर्ध्यान हो गई।

महाराजा शांतनु ने अपने उस पुत्र को पाला-पोसा और उसका नाम देवव्रत रखा। देवव्रत के किशोरावस्था में होने पर उसे हस्तिनापुर का युवराज घोषित कर दिया। यही देवव्रत आगे चलकर भीष्म कहलाए।

तीसरा रहस्य
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एक बार 'द्यु' नामक वसु ने वशिष्ठ ऋषि की कामधेनु का हरण कर लिया। इससे वशिष्ठ ऋषि ने द्यु से कहा कि ऐसा काम तो मनुष्य करते हैं इसलिए तुम आठों वसु मनुष्य हो जाओ। यह सुनकर वसुओं ने घबराकर वशिष्ठजी की प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि अन्य वसु तो वर्ष का अंत होने पर मेरे शाप से छुटकारा पा जाएंगे, लेकिन इस 'द्यु' को अपनी करनी का फल भोगने के लिए एक जन्म तक मनुष्य बनकर पीड़ा भोगना होगी।

यह सुनकर वसुओं ने गंगाजी के पास जाकर उन्हें वशिष्ठजी के शाप को विस्तार से बताया और यह प्रार्थना की कि 'आप मृत्युलोक में अवतार लेकर हमें गर्भ में धारण करें और ज्यों ही हम जन्म लें, हमें पानी में डुबो दें। इस तरह हम जल्दी से सभी मुक्त हो जाएंगे।' गंगा माता ने स्वीकार कर लिया और वे युक्तिपूर्वक शांतनु राजा की पत्नी बन गईं और शांतनु से वचन भी ले लिया। शांतनु से गंगा के गर्भ में पहले जो 7 पुत्र पैदा हुए थे उन्हें उत्पन्न होते ही गंगाजी ने पानी में डुबो दिया जिससे 7 वसु तो मुक्त हो गए लेकिन 8वें में शांतनु ने गंगा को रोककर इसका कारण जानना चाहा।

गंगाजी ने राजा की बात मानकर वसुओं को वशिष्ठ के शाप का सब हाल कह सुनाया। राजा ने उस 8वें पुत्र को डुबोने नहीं दिया और इस वचनभंगता के काण गंगा 8वें पुत्र को सौंपकर अंतर्ध्यान हो गईं। यहीं बालक 'द्यु' नामक वसु था।

चौथा रहस्य
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एक दिन देवव्रत के पिता शांतनु यमुना के तट पर घूम रहे थे कि उन्हें नदी में नाव चलाते हुए एक सुन्दर कन्या नजर आई। शांतनु उस कन्या पर मुग्ध हो गए। महाराजा ने उसके पास जाकर उससे पूछा, 'हे देवी तुम कौन हो?' उसने कहा, 'महाराजा मेरा नाम सत्यवती है और में निषाद कन्या हूं।' (उस काल में निषाद नाम की एक जाति होती थी)

महाराज उसके रूप-यौवन पर रीझकर उसके पिता के पास पहुंचे और सत्यवती के साथ अपने विवाह का प्रस्ताव किया। इस पर धीवर ने कहा, 'राजन्! मुझे अपनी कन्या का विवाह आपके साथ करने में कोई आपत्ति नहीं है, किंतु मैं चाहता हूं कि मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र को ही आप अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाएं, तो ही यह विवाह संभव हो पाएगा।' निषाद के इन वचनों को सुनकर महाराज शांतनु चुपचाप हस्तिनापुर लौट आए और मन ही मन इस दुख से घुटने लगे। सत्यवती के वियोग में महाराज व्याकुल रहने लगे और उनका शरीर भी दुर्बल होने लगा।

महाराज की इस दशा को देखकर देवव्रत को चिंता हुई। जब उन्हें मंत्रियों द्वारा पिता की इस प्रकार की दशा होने का कारण पता चला तो वे निषाद के घर जा पहुंचे और उन्होंने निषाद से कहा, 'हे निषाद! आप सहर्ष अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह मेरे पिता शांतनु के साथ कर दें। मैं आपको वचन देता हूं कि आपकी पुत्री के गर्भ से जो बालक जन्म लेगा वही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। कालांतर में मेरी कोई संतान आपकी पुत्री के संतान का अधिकार छीन न पाए इस कारण से मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं आजन्म अविवाहित रहूंगा।'

उनकी इस प्रतिज्ञा को सुनकर निषाद ने हाथ जोड़कर कहा, 'हे देवव्रत! आपकी यह प्रतिज्ञा अभूतपूर्व है।' इतना कहकर निषाद ने तत्काल अपनी पुत्री सत्यवती को देवव्रत तथा उनके मंत्रियों के साथ हस्तिनापुर भेज दिया।

पांचवां रहस्य
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देवव्रत जब निषाद कन्या सत्यवती को लाकर अपने पिता शांतनु को सौंपते हैं तो शांतनु की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। शांतनु प्रसन्न होकर देवव्रत से कहते हैं, 'हे पुत्र! तूने पितृभक्ति के वशीभूत होकर ऐसी कठिन प्रतिज्ञा की है, जो न आज तक किसी ने की है और न भविष्य में कोई करेगा। तेरी इस पितृभक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुझे वरदान देता हूं कि तेरी मृत्यु तेरी इच्छा से ही होगी। तेरी इस प्रकार की प्रतिज्ञा करने के कारण तू 'भीष्म' कहलाएगा और तेरी प्रतिज्ञा भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से सदैव प्रख्यात रहेगी।'

छटा रहस्य
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सत्यवती के गर्भ से महाराज शांतनु को चित्रांगद और विचित्रवीर्य नाम के 2 पुत्र हुए। शांतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद राजा बनाए गए, किंतु गंधर्वों के साथ युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई, तब विचित्रवीर्य बालक ही थे। फिर भी भीष्म विचित्रवीर्य को सिंहासन पर बैठाकर खुद राजकार्य देखने लगे। विचित्रवीर्य के युवा होने पर भीष्म ने बलपूर्वक काशीराज की 3 पुत्रियों का हरण कर लिया और वे उसका विवाह विचित्रवीर्य से करना चाहते थे, क्योंकि भीष्म चाहते थे कि किसी भी तरह अपने पिता शांतनु का कुल बढ़े।

लेकिन बाद में बड़ी राजकुमारी अम्बा को छोड़ दिया गया, क्योंकि वह शाल्वराज को चाहती थी। अन्य दोनों (अम्बालिका और अम्बिका) का विवाह विचित्रवीर्य के साथ कर दिया गया। लेकिन विचित्रवीर्य को दोनों से कोई संतानें नहीं हुईं और वह भी चल बसा। एक बार फिर गद्दी खाली हो गई। सत्यवती-शांतनु का वंश तो डूब गया और गंगा-शांतनु के वंश ने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले ली थी। अब हस्तिनापुर की राजगद्दी फिर से खाली हो गई थी।

सातवां रहस्य,परशुराम से युद्ध : - विचित्रवीर्य के युवा होने पर उनके विवाह के लिए भीष्म ने काशीराज की 3 कन्याओं का बलपूर्वक हरण किया था जिसमें से एक को शाल्वराज पर अनुरक्त होने के कारण छोड़ दिया था।

लेकिन शाल्वराज के पास जाने के बाद अम्बा को शाल्वराज ने स्वीकार करने से मना कर दिया। अम्बा के लिए यह दुखदायी स्थिति हो चली थी। अम्बा ने अपनी इस दुर्दशा का कारण भीष्म को समझकर उनकी शिकायत परशुरामजी से की।

परशुरामजी ने अन्याय के खिलाफ लड़ने की ठनी। परशुरामजी ने भीष्म से कहा कि 'तुमने अम्बा का बलपूर्वक अपहरण किया है, अत: अब तुम्हें इससे विवाह करना होगा अन्यथा मुझसे युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।'

भीष्म और परशुरामजी का 21 दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ। अंत में ऋषियों ने परशुराम को सारी व्यथा-कथा सुनाही और भीष्म की स्थिति से भी उनको अवगत कराया तब कहीं परशुरामजी ने ही युद्धविराम किया। इस तरह भीष्म द्वारा लिए गए ब्रह्मचर्य के प्रण पर वे अटल रहे।

आठवां रहस्य
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सत्यवती के शांतनु से उत्पन्न दोनों पुत्र ( चित्रांगद और विचित्रवीर्य ) की मृत्यु हो जाने के बाद सत्यवती भीष्म से बार-बार अनुरोध करती हैं कि पिता के वंश को चलाने के लिए अब तुम्हें विवाह कर पुत्र उत्पन्न करना चाहिए लेकिन भीष्म अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने को तैयार नहीं होते हैं। ऐसे में सत्यवती विचित्रवीर्य की विधवा अम्बालिका और अम्बिका को 'नियोग प्रथा' द्वारा संतान उत्पन्न करने का सोचती है। भीष्म की अनुमति लेकर सत्यवती अपने पुत्र वेदव्यास द्वारा अम्बिका और अम्बालिका के गर्भ से यथाक्रम धृतराष्ट्र और पाण्डु नाम के पुत्रों को उत्पन्न करवाती है।

शांतनु से विवाह करने के पूर्व सत्यवती ने अपनी कुंवारी अवस्था में ऋषि पराशर के साथ सहवास कर लिया था जिससे उनको वेदव्यास नामक एक पुत्र का जन्म हुआ था। वे अपने इसी पुत्र से अम्बिका और अम्बालिका के साथ संयोग करने का कहती है। इस तरह यह कुल ऋषि कुल कहलाता है।

नौवां रहस्य
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भीष्म पितामह ने विवाह नहीं करके ब्रह्मचर्य का पालन किया था। उन्होंने अविवाहित रहकर भी इस व्रत का कठोरता से पालन किया था। इसके लिए वे योगारूढ़ होकर ब्रह्म का ध्यान किया करते थे। उनके समक्ष श्रीकृष्ण बच्चे ही थे लेकिन उन्होंने कृष्ण को भगवान रूप में पहचान लिया था। वे सदा कृष्णभक्ति में लीन रहते थे।

महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने निहत्थे रहकर अर्जुन का रथ हांकने की प्रतिज्ञा की थी, लेकिन भीष्म ने उनसे शस्त्र ग्रहण करने का वचन ले लिया था। कृष्ण के लिए यह धर्म-संकट की स्थिति बन गई थी। अंत में भक्त की लाज रखने को जब श्रीकृष्ण रथ का पहिया लेकर दौड़ पड़े, तब भीष्म ने हथियार रख दिए और श्रीकृष्ण के हाथों मारे जाने में ही अपनी मुक्ति समझने लगे। कृष्ण ने ऐसा करके अपने हथियार न धारण करने की प्रतिज्ञा भी पूरी की और भीष्म के कहने पर हथियार धारण करने का वचन भी पूरा कर दिया।

दसवां रहस्य
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महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की तरफ से सेनापति थे। कुरुक्षेत्र का युद्ध आरंभ होने पर प्रधान सेनापति की हैसियत से भीष्म ने 10 दिन तक घोर युद्ध किया था।

9वें दिन भयंकर युद्ध हुआ जिसके चलते भीष्म ने बहादुरी दिखाते हुए अर्जुन को घायल कर उनके रथ को जर्जर कर दिया। युद्ध में आखिरकार भीष्म के भीषण संहार को रोकने के लिए कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ती है। उनके जर्जर रथ को देखकर श्रीकृष्ण रथ का पहिया लेकर भीष्म पर झपटते हैं, लेकिन वे शांत हो जाते हैं, परंतु इस दिन भीष्म पांडवों की सेना का अधिकांश भाग समाप्त कर देते हैं।

10वें दिन भीष्म द्वारा बड़े पैमाने पर पांडवों की सेना को मार देने से घबराए पांडव पक्ष में भय फैल जाता है, तब श्रीकृष्ण के कहने पर पांडव भीष्म के सामने हाथ जोड़कर उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछते हैं। भीष्म कुछ देर सोचने पर उपाय बता देते हैं।

ग्यारहवां रहस्य
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दसवें ही ही दिन इच्छामृत्यु प्राप्त भीष्म द्वारा अपनी मृत्यु का रहस्य बता देने के बाद भीष्म पांचाल तथा मत्स्य सेना का भयंकर संहार कर देते हैं। फिर पांडव पक्ष युद्ध क्षे‍त्र में भीष्म के सामने शिखंडी को युद्ध करने के लिए लगा देते हैं। युद्ध क्षेत्र में शिखंडी को सामने डटा देखकर भीष्म अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग देत हैं। इस मौके का फायदा उठाकर कृष्ण के इशार पर बड़े ही बेमन से अर्जुन ने अपने बाणों से भीष्म को छेद दिया। भीष्म बाणों की शरशय्या पर लेट जाते हैं।

दरअसल, भीष्म ने अपनी मृत्यु का रहस्य यह बताया था कि वे किसी नपुंसक व्यक्ति के समक्ष हथियार नहीं उठाएंगे। इसी दौरान उन्हें मारा जा सकता है। इस नीति के तरह युद्ध में भीष्म के सामने शिखंडी को उतारा जाता है।

भीष्म को अर्जुन तीरों से छेद देते हैं। वे कराहते हुए नीचे गिर पड़ते हैं। जब भीष्म की गर्दन लटक जाती है तब वे अपने बंधु-बांधवों और वीर सैनिकों से क्या कहते हैं?

बारहवां रहस्य
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भीष्म के शरशय्या पर लेटने की खबर फैलने पर कौरवों की सेना में हाहाकार मच जाता है। दोनों दलों के सैनिक और सेनापति युद्ध करना छोड़कर भीष्म के पास एकत्र हो जाते हैं। दोनों दलों के राजाओं से भीष्म कहते हैं, राजन्यगण। मेरा सिर नीचे लटक रहा है। मुझे उपयुक्त तकिया चाहिए। उनके एक आदेश पर तमाम राजा और योद्धा मूल्यवान और तरह-तरह के तकिए ले आते हैं।

किंतु भीष्म उनमें से एक को भी न लेकर मुस्कुराकर कहते हैं कि ये तकिए इस वीर शय्या के काम में आने योग्य नहीं हैं राजन। फिर वे अर्जुन की ओर देखकर कहते हैं, 'बेटा, तुम तो क्षत्रिय धर्म के विद्वान हो। क्या तुम मुझे उपयुक्त तकिया दे सकते हो?' आज्ञा पाते ही अर्जुन ने आंखों में आंसू लिए उनको अभिवादन कर भीष्म को बड़ी तेजी से ऐसे 3 बाण मारे, जो उनके ललाट को छेदते हुए पृथ्वी में जा लगे। बस, इस तरह सिर को सिरहाना मिल जाता है। इन बाणों का आधार मिल जाने से सिर के लटकते रहने की पीड़ा जाती रही। इतना सब कुछ होने के बावजूद भीष्म क्यों नहीं त्यागते हैं प्राण?

तेरहवां रहस्य
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सूर्य का उत्तरायण होना : लेकिन शरशय्या पर लेटने के बाद भी भीष्म प्राण क्यों नहीं त्यागते हैं, जबकि उनका पूरा शरीर तीर से छलनी हो जाता है फिर भी वे इच्छामृत्यु के कारण मृत्यु को प्राप्त नहीं होते हैं।

भीष्म यह भलीभांति जानते थे कि सूर्य के उत्तरायण होने पर प्राण त्यागने पर आत्मा को सद्गति मिलती है और वे पुन: अपने लोक जाकर मुक्त हो जाएंगे इसीलिए वे सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते हैं।

भीष्म ने बताया कि वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही शरीर छोड़ेंगे, क्योंकि उन्हें अपने पिता शांतनु से इच्छामृत्यु का वर प्राप्त है और वे तब तक शरीर नहीं छोड़ सकते जब तक कि वे चाहें, लेकिन 10वें दिन का सूर्य डूब चुका था।

चौदहवां रहस्य
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भीष्म को ठीक करने के लिए शल्य चिकित्सक लाए जाते हैं, लेकिन वे उनको लौटा देते हैं और कहते हैं कि अब तो मेरा अंतिम समय आ गया है। यह सब व्यर्थ है। शरशय्या ही मेरी चिता है। अब मैं तो बस सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहा हूं।

पितामह की ये बातें सुनकर राजागण और उनके सभी बंधु-बांधव उनको प्रणाम और प्रदक्षिणा कर-करके अपनी-अपनी छावनियों में लौट जाते हैं। अगले दिन सुबह होने पर फिर से वे सभी भीष्म के पास लौटते हैं। सभी कन्याएं, स्त्रियां और उनके कुल के योद्धा पितामह के पास चुपचाप खड़े हो जाते हैं।

पितामह ने पीने के लिए राजाओं से ठंडा पानी मांगा। सभी उनके लिए पानी ले आए, लेकिन उन्होंने अर्जुन की ओर देखा। अर्जुन समझ गया और उसने अपने गांडीव पर तीर चढ़ाया और पर्जन्यास्त्र का प्रयोग कर वे धरती में छोड़ देते हैं। धरती से अमृततुल्य, सुगंधित, बढ़िया जल की धारा निकलने लगती है। उस पानी को पीकर भीष्म तृप्त हो जाते हैं।

फिर भीष्म दुर्योधन को समझाते हैं कि युद्ध छोड़कर वंश की रक्षा करो। उन्होंने अर्जुन की बहुत प्रशंसा की और दुर्योधन को बार-बार समझाया कि हमारी यह गति देखकर संभल जाओ, लेकिन दुर्योधन उनकी एक भी नहीं मानता है और फिर से युद्ध शुरू हो जाता है।

अगले दिन फिर से सभी उनके पास इकट्ठे होते हैं। वे नए सेनापति कर्ण को समझाते हैं। वे दोनों पक्षों में अपने अंतिम वक्त में भी संधि कराने की चेष्टा करते हैं। भीष्म के शरशय्या पर लेट जाने के बाद युद्ध और 8 दिन चला।

पंद्रहवां रहस्य
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भीष्म यद्यपि शरशय्या पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है।

बाद में सूर्य के उत्तरायण होने पर युधिष्ठिर आदि सगे-संबंधी, पुरोहित और अन्यान्य लोग भीष्म के पास पहुंचते हैं। उन सबसे पितामह ने कहा कि इस शरशय्या पर मुझे 58 दिन हो गए हैं। मेरे भाग्य से माघ महीने का शुक्ल पक्ष आ गया। अब मैं शरीर त्यागना चाहता हूं। इसके पश्चात उन्होंने सब लोगों से प्रेमपूर्वक विदा मांगकर शरीर त्याग दिया।

सभी लोग भीष्म को याद कर रोने लगे। युधिष्ठिर तथा पांडवों ने पितामह के शरविद्ध शव को चंदन की चिता पर रखा तथा दाह-संस्कार किया।

सोलहवां रहस्य
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भीष्म सामान्य व्यक्ति नहीं थे। वे मनुष्य रूप में देवता वसु थे। उन्होंने ब्रह्मचर्य का कड़ा पालन करके योग विद्या द्वारा अपने शरीर को पुष्य कर लिया था। दूसरा उनको इच्छामृत्यु का वरदान भी प्राप्त था।

इस युद्ध के समय अर्जुन 55 वर्ष, कृष्ण 83 वर्ष और भीष्म 150 वर्ष के थे। उस काल में 200 वर्ष की उम्र होना सामान्य बात थी। बौद्धों के काल तक भी भारतीयों की सामान्य उम्र 150 वर्ष हुआ करती थी। इसमें शुद्ध वायु, वातावरण और योग-ध्यान का बड़ा योगदान था। भीष्म जब युवा थे तब कृष्ण और अर्जुन हुए भी नहीं थे।

माना जाता है कि भीष्म ही युद्ध में सबसे अधिक उम्र के थे। उन्हें राजनीति का ज्यादा अनुभव होने के कारण वेदव्यास ने संपूर्ण महाभारत में भीष्म को राजनीति का केंद्र बनाकर राजनीति के बारे में उन्होंने जो भी कहा, उसका प्राथमिकता से उल्लेख किया।

।। जय श्री कृष्ण ।।
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28/01/2025

🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞

🌤️ *दिनांक - 28 जनवरी 2025*
🌤️ *दिन - मंगलवार*
🌤️ *विक्रम संवत - 2081*
🌤️ *शक संवत -1946*
🌤️ *अयन - उत्तरायण*
🌤️ *ऋतु - शिशिर ॠतु*
🌤️ *मास - माघ (गुजरात-महाराष्ट्र पौष)*
🌤️ *पक्ष - कृष्ण*
🌤️ *तिथि - चतुर्दशी शाम 07:35 तक तत्पश्चात अमावस्या*
🌤️ *नक्षत्र - पूर्वाषाढा सुबह 08:58 तक तत्पश्चात उत्तराषाढा*
🌤️ *योग - वज्र रात्रि 11:52 तक तत्पश्चात सिद्धि*
🌤️ *राहुकाल - शाम 03:39 से शाम 05:03 तक*
🌤️ *सूर्योदय 07:18*
🌤️ *सूर्यास्त - 06:25*
👉 *दिशाशूल - उत्तर दिशा मे*
🚩 *व्रत पर्व विवरण -
💥 *विशेष- चतुर्दशी व अमावस्या एवं व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)*
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞

🌷 *व्यतिपात योग* 🌷
➡️ *29 जनवरी 2025 बुधवार को रात्रि 09:22 से 30 जनवरी शाम 06:33 तक व्यतिपात योग है।*
🙏🏻 *व्यतिपात योग की ऐसी महिमा है कि उस समय जप पाठ प्राणायम, माला से जप या मानसिक जप करने से भगवान की और विशेष कर भगवान सूर्यनारायण की प्रसन्नता प्राप्त होती है जप करने वालों को, व्यतिपात योग में जो कुछ भी किया जाता है उसका १ लाख गुना फल मिलता है।*
🙏🏻 *वाराह पुराण में ये बात आती है व्यतिपात योग की।*
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~*
🌷 *माघ-मौनी अमावस्या* 🌷
➡ *29 जनवरी 2025 बुधवार को मौनी अमावस्या है ।*
🙏🏻 *माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहते हैं। इस नामकरण के लिए दो मान्यताएं हैं ।*
🙏🏻 *इस दिन मौन रहना चाहिए। मुनि शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई है। इसलिए इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। इस दिन मौन रहकर प्रयाग संगम अथवा पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए।*
🙏🏻 *ऐसा माना जाता है इस दिन ब्रह्मा जी ने स्वयंभुव मनु को उत्पन्न कर सृष्टि का निर्माण कार्य आरम्भ किया था इसलिए भी इस अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है।*
🙏🏻 *‘पद्म पुराण’ के अनुसार माघ मास के कृष्णपक्ष की अमावस्या को सूर्योदय से पहले जो तिल और जल से पितरों का तर्पण करता है, वह स्वर्ग में अक्षय सुख भोगता है। जो उक्त तिथि को तिल की गौ बनाकर उसे सब सामग्रियों सहित दान करता है, वह सात जन्म के पापों से मुक्त हो स्वर्गलोक में अक्षय सुख का भागी होता है। ब्राह्मण को भोजन के योग्य अन्न देने से भी अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जो उत्तम ब्राह्मण को अनाज, वस्त्र, घर आदि दान करता है, उसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती।*
🙏🏻 *इस दिन पितृ पूजा, श्राद्ध, तर्पण, पिण्ड दान, नारायणी आदि कर सकते है। वैसे तो प्रत्येक अमावस्या पितृ कर्म के लिए विशेष होती है परंतु युगादि तिथि तथा मकरस्थ रवि होने के कारण मौनी अमावस्या का महत्व कहीं ज्यादा है। अगर आप पितृदोष से पीड़ित हैं अथवा आपको लगता है की आपके पिता, माता अथवा गुरु के कुल में किसी को अच्छी गति प्राप्त नहीं हुई है तो आज तर्पण (विशेषतः गंगा किनारे) जरूर करें।*
🙏🏻 *अगर आप सौभाग्यशाली हैं और इस दिन गंगा स्नान के लिए जा रहे हैं तो तर्पण के अलावा भी बहुत कृत्य हैं। स्कंदपुराण में भगवान शिव का कथन है ।*
🙏🏻 *जो पितरों के उद्देश्य से भक्तिपूर्वक गुड़, घी और तिल के साथ मधुयुक्त खीर गंगा में डालते हैं, उसके पितर सौ वर्षों तक तृप्त बने रहते हैं और वे संतुष्ट होकर अपनी संतानों को नाना प्रकार की मनोवाञ्छित वस्तुएं प्रदान करते हैं।*
🙏🏻 *जो पितरों के उद्देश्य से गंगाजल के द्वारा शिवलिंग को स्नान कराते हैं, उनके पितर यदि भारी नरक में पड़े हों तो भी तृप्त हो जाते हैं।*
🙏🏻 *जो एक बार भी ताँबे के पात्र में रखे हुए अष्टद्रव्ययुक्त (जल, दूध, कुश का अग्रभाग, घी, मधु, गाय का दही, लाल कनेर तथा लाल चंदन) गंगाजल से भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं, वे अपने पितरों के साथ सूर्यलोक में जाकर प्रतिष्ठित होते हैं।*
🙏🏻 *जो गंगा के तट पर एक बार भी पिण्डदान करता है, वह तिलमिश्रित जल के द्वारा अपने पितरों का भवसागर से उद्धार कर देता है।*
🙏🏻 *पिता/माता/गुरु/भाई/मित्र/रिश्तेदार किसी के भी कुल में कोई किसी भी तरह, किसी भी अवस्था में मरा हो (चाहे अग्नि से या विष से या आत्मदाह अथवा अन्य प्रकार से मृत्यु) आज सब पितरों का उद्धार संभव है।*
🙏🏻 *माघ कृष्ण पक्ष की अमावस्या युगादि तिथि है। अर्थात इस तिथि को चार युगों में से एक युग का आरम्भ हुआ था। स्कंदपुराण के अनुसार “माघे पञ्चदशी कृष्णा द्वापरादिः स्मृता बुधैः” द्वापर की आदि तिथि हैं जबकि कुछ विद्वान इसको कलियुग की प्रारम्भ तिथि मानते हैं। युगादि तिथियाँ बहुत ही शुभ होती हैं, इस दिन किया गया जप, तप, ध्यान, स्नान, दान, यज्ञ, हवन कई गुना फल देता है l प्रत्येक युग में सौ वर्षों तक दान करने से जो फल होता है, वह युगादि-काल में एक दिन के दान से प्राप्त हो जाता है ।*
🙏🏻 *इस दिन साधु, महात्मा तथा के सेवन के लिए अग्नि प्रज्वलित करनी चाहिए तथा उन्हें रजाई, कम्बल आदि जाड़े के वस्त्र देने चाहिए। इस दिन गुड़ में काले तिल मिलाकर मोदक बनाने चाहिए तथा उन्हें लाल वस्त्र में बांधकर ब्राह्मणों को देना श्रेयस्कर है। इसी पुण्य पर्व पर विभिन्न प्रकार के नैवेद्य मिष्टान्नादि षट्रस व्यंजनों से ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें द्रव्य दक्षिणादि से संतुष्ट कर प्रणामादि कर सादर विदा करना चाहिए।*
🙏🏻 *गौशाला में गायों के निमित्त हरे चारे, खल, चोकर, भूसी, गुड़ आदि पदार्थों का दान देना चाहिए तथा गौ की चरण रज को मस्तक पर धारण कर उसे साष्टांग प्रणाम करना चाहिए।*
🙏🏻 *माघी अमावस्या को प्रात: स्नान के बाद ब्रह्मदेव और गायत्री का पूजन करें। गाय, स्वर्ण, छाता, वस्त्र, पलंग, दर्पण आदि का मंत्रोपचार के साथ ब्राह्मण को दान करें। पवित्र भाव से ब्राह्मण एवं परिजनों के साथ भोजन करें। इस दिन पीपल में आघ्र्य देकर परिक्रमा करें और दीप दान दें। इस दिन जिनके लिए व्रत करना संभव नहीं हो वह मीठा भोजन करें।*
🙏🏻 *मौनी अमावस्या के दिन भूखे प्राणियों को भोजन कराने का भी विशेष महत्व है। इस दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद आटे की गोलियां बनाएं। गोलियां बनाते समय भगवान का नाम लेते रहें। इसके बाद समीप स्थित किसी तालाब या नदी में जाकर यह आटे की गोलियां मछलियों को खिला दें। इस उपाय से आपके जीवन की अनेक परेशानियों का अंत हो सकता है। अमावस्या के दिन चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा खिलाएं। ऐसा करने से आपके पाप कर्मों का क्षय होगा और पुण्य कर्म उदय होंगे। यही पुण्य कर्म आपकी मनोकामना पूर्ति में सहायक होंगे।*
🌷 *दशतीर्थसहस्राणि तिस्रः कोटयस्तथा पराः॥ समागच्छन्ति मध्यां तु प्रयागे भरतर्षभ। माघमासं प्रयागे तु नियतः संशितव्रतः॥ स्नात्वा तु भरतश्रेष्ठ निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात्। (महाभारत, अनुशासन पर्व 25 । 36 -38)*
➡ *अर्थात माघ मास की अमावस्या को प्रयाग राज में तीन करोड़ दस हजार अन्य तीर्थों का समागम होता है। जो नियमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करते हुए माघ मास में प्रयाग में स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाता है।*

31/10/2024

*ॐ असतो मा सद्गमय,*
*तमसो मा ज्योतिर्गमय,*
*मृत्योर्मामृतं गमय।*
*दीपो ज्योति परं ब्रह्म,*
*दीपो ज्योतिर्जनार्दन:।*
*दीपो हरतु मे पापं,*
*संध्यादीप नमोऽस्तुते।।*
*शुभम करोति कल्याणम,*
*आरोग्यम धन संपदा,*
*शत्रु-बुद्धि विनाशायः,*
*दीपःज्योति नमोस्तुते!*
'तमसो मा ज्योतिर्गमय' के पवित्र भाव का लोक पर्व 'दीपोत्सव' मनुष्यता के प्रति हमारी समेकित आस्था का प्रतीक है।
आप सभी ईष्टमित्रों, शुभचिंतक आत्मीय बंधु भगनियों को सह परिवार
पंच दिवसीय दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं!

*सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।*
*सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।*
सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

आपका शुभेच्छु
सुरेश चतुर्वेदी

आप सभी मित्रों के लिए जीवन में उपयोगी एवं आवश्यक जानकारियां ध्यान से देखें
13/02/2024

आप सभी मित्रों के लिए जीवन में उपयोगी एवं आवश्यक जानकारियां ध्यान से देखें

08/01/2024

आज का पंचांग
तिथिद्वादशी - 24:01:17 तक
नक्षत्रअनुराधा - 22:03:36 तक
करणकौलव - 12:31:07 तक, तैतिल - 24:01:17 तक
पक्ष:कृष्ण
योगगण्ड - 26:54:56 तक
वार:सोमवार
सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ
सूर्योदय:07:15:10
सूर्यास्त:17:40:24
चन्द्र राशि:वृश्चिक
चन्द्रोदय:29:04:59
चन्द्रास्त:14:26:59
ऋतु:शिशिर
हिन्दू मास एवं वर्ष
शक सम्वत:1945 शोभकृत
विक्रम सम्वत:2080
काली सम्वत:5124
प्रविष्टे / गत्ते:24
मास पूर्णिमांत:पौष
मास अमांत:मार्गशीर्ष
दिन काल:10:25:14
अशुभ समय (अशुभ मुहूर्त)
दुष्टमुहूर्त:12:48:38 से 13:30:19 तक, 14:53:41 से 15:35:22 तक
कुलिक:14:53:41 से 15:35:22 तक
कंटक:09:20:13 से 10:01:54 तक
राहु काल:08:33:20 से 09:51:29 तक
कालवेला / अर्द्धयाम:10:43:35 से 11:25:16 तक
यमघण्ट:12:06:57 से 12:48:38 तक
यमगण्ड:11:09:38 से 12:27:47 तक
गुलिक काल:13:45:57 से 15:04:06 तक
शुभ समय (शुभ मुहूर्त)
अभिजीत12:06:57 से 12:48:38 तक
दिशा शूल-पूर्व
चन्द्रबल और ताराबल
ताराबल-अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती
चन्द्रबल-वृषभ, मिथुन, कन्या, वृश्चिक, मकर, कुम्भ
1. आज का पंचांग क्या है?
आज का पंचांग - 8 जनवरी 2024 सोमवार मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि है।

2. आज कौन सा नक्षत्र है?
हिन्दू पंचांग के अनुसार आज अनुराधा नक्षत्र है।

जनवरी 2024 भद्रा दिनांक और समय
जनवरी 2024 भद्रा दिनांक और समय New Delhi, India के लिए
भद्रा(विष्टि करण)आरंभ काल भद्रा(विष्टि करण)समाप्ति काल
मंगलवार, 2 जनवरी 17:13:41 बजे बुधवार, 3 जनवरी 06:33:56 बजे
शनिवार, 6 जनवरी 12:22:29 बजे रविवार, 7 जनवरी 00:44:05 बजे
मंगलवार, 9 जनवरी 22:26:58 बजे बुधवार, 10 जनवरी 09:24:23 बजे
रविवार, 14 जनवरी 18:29:53 बजे सोमवार, 15 जनवरी 05:01:20 बजे
बुधवार, 17 जनवरी 22:08:47 बजे गुरुवार, 18 जनवरी 09:24:10 बजे
रविवार, 21 जनवरी 07:25:55 बजे रविवार, 21 जनवरी 19:29:17 बजे
बुधवार, 24 जनवरी 21:52:46 बजे गुरुवार, 25 जनवरी 10:36:47 बजे
रविवार, 28 जनवरी 16:55:33 बजे सोमवार, 29 जनवरी 06:14:17 बजे
भद्रा
जब भी मुहूर्त की बात करते हैं तो सबसे पहले हमारे मन में भद्रा का नाम आता है। मुहूर्त के अंतर्गत भद्रा का विचार मुख्य रूप से किया जाता है क्योंकि यह वास्तव में स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक तथा पाताल लोक में अपना प्रभाव दिखाती है। इसलिए किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए भद्रा वास का विचार किया जाता है।

हमारे द्वारा दिया गया भद्रा कैलकुलेटर आपको किसी भी दिन के भद्रा काल की जानकारी देने के लिए ही बनाया गया है। इस कैलकुलेटर के द्वारा आप आसानी से जान सकते हैं कि भद्रा का प्रारंभ और समाप्ति किस समय से होगा। इसकी सहायता से आप भद्रा काल का समय छोड़कर कोई भी शुभ कार्य संपन्न कर सकते हैं।

कौन है भद्रा?
आइये अब हम भद्रा के बारे में जानते हैं कि वास्तव में भद्रा कौन हैं और इनका इतना महत्व क्यों माना गया है? यदि हम धार्मिक दृष्टिकोण की बात करें तो इसके अनुसार भद्रा भगवान शनिदेव की बहन और सूर्य देव की पुत्री हैं। यह बहुत सुंदर थी लेकिन इनका स्वभाव काफी कठोर था। उनके उस स्वभाव को सामान्य रूप से नियंत्रित करने हेतु उन्हें पंचांग के एक प्रमुख अंग विष्टि करण के रूप में मान्यता दी गई। जब कभी भी किसी शुभ तथा मांगलिक कार्य के लिए शुभ मुहूर्त देखा जाता है तो उसमें भद्रा का विचार विशेष रूप से किया जाता है और भद्रा का समय त्यागकर अन्य मुहूर्त में ही कोई शुभ कार्य किया जाता है। लेकिन यह देखा गया है कि भद्रा सदैव ही अशुभ नहीं होती बल्कि कुछ विशेष प्रकार के कार्यों में इसका वास अच्छे परिणाम भी देता है।

भद्रा की गणना
तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण मुहूर्त के अंतर्गत पंचांग के मुख्य भाग हैं। इनमें करण एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। कुल मिलाकर 11 करण होते हैं, जिनमें से चार करण शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न अचर होते हैं और शेष सात करण बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि चर होते हैं। इनमें से विष्टि करण को ही भद्रा कहा जाता है। चर होने के कारण ये सदैव गतिशील होती है। जब भी पंचांग की शुद्धि की जाती है तो उस समय भद्रा को विशेष महत्व दिया जाता है।

ऐसे जानें भद्रा वास
अब आइये जानते हैं कि भद्रा का वास कैसे ज्ञात किया जाता है।

कुम्भ कर्क द्वये मर्त्ये स्वर्गेऽब्जेऽजात्त्रयेऽलिंगे।
स्त्री धनुर्जूकनक्रेऽधो भद्रा तत्रैव तत्फलं।।

जब चंद्रमा मेष, वृषभ, मिथुन और वृश्चिक राशि में होता है तो भद्रा स्वर्ग लोक में मानी जाती है और उर्ध्वमुखी होती है। जब चंद्रमा कन्या, तुला, धनु और मकर राशि में होता है तो भद्रा का वास पाताल में माना जाता है और ऐसे में भद्रा अधोमुखी होती है। वहीं जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि में स्थित होता है तो भद्रा का निवास भूलोक अर्थात पृथ्वी लोक पर माना जाता है और ऐसे में भद्रा सम्मुख होती है। उर्ध्वमुखी होने के कारण भद्रा का मुंह ऊपर की ओर होगा तथा अधोमुखी होने के कारण नीचे की तरफ। लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में भद्रा शुभ प्रभाव लेगी। इसके साथ ही सम्मुख होने पर भद्रा पूर्ण रूप से प्रभाव दिखाएगी।

पौराणिक ग्रथ मुहुर्त्त चिन्तामणि के अनुसार भद्रा का वास जिस लोक में भी होता है वहां भद्रा का विशेष रूप से प्रभाव माना जाता है। ऐसी स्थिति में जब चंद्रमा कर्क राशि, सिंह राशि, कुंभ राशि और मीन राशि में होगा तो भद्रा का वास भूलोक में होने से भद्रा सम्मुख होगी और पूर्ण रूप से पृथ्वी लोक पर अपना प्रभाव दिखाएगी। यही अवधि पृथ्वी लोक पर किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए वर्जित मानी जाती है, क्योंकि ऐसे में किए गए कार्य या तो पूर्ण नहीं होते या उनके पूर्ण होने में बहुत अधिक विलंब और रुकावटें आती हैं।

स्वर्गे भद्रा शुभं कुर्यात पाताले च धनागम।
मृत्युलोक स्थिता भद्रा सर्व कार्य विनाशनी ।।

संस्कृत ग्रंथ पियूष धारा के अनुसार जब भद्रा का वास स्वर्ग लोक पाताल लोक में होगा तब वह पृथ्वी लोक पर शुभ फल प्रदान करने में सक्षम होगी।

स्थिताभूर्लोस्था भद्रा सदात्याज्या स्वर्गपातालगा शुभा।
मुहूर्त मार्तण्ड के अनुसार जब भी भद्रा भूलोक में होगी तो उसका सदैव त्याग करना चाहिए और जब वह स्वर्ग तथा पाताल लोक में हो तो शुभ फल प्रदान करने वाली होगी।

अर्थात जब भी चंद्रमा का गोचर कर्क राशि, सिंह, कुंभ राशि तथा मीन राशि में होगा तो भद्रा पृथ्वी लोक पर होगी और कष्टकारी होगी। ऐसी भद्रा का त्याग करना श्रेयस्कर होगा।

भद्रा मुख तथा भद्रा पुच्छ
भद्रा के वास्तु के अनुसार ही उसका फल मिलता है। इस संबंध में निम्नलिखित मुक्ति पठनीय है:

भद्रा यत्र तिष्ठति तत्रैव तत्फलं भवति।

अर्थात भद्रा जिस समय जहां स्थित होती है उसी प्रकार वहां पर फल देती है। तो आइये अब जानते हैं कि कैसे होता है भद्रा मुख और भद्रा पुच्छ का ज्ञान?

शुक्ल पूर्वार्धेऽष्टमीपञ्चदशयो भद्रैकादश्यांचतुर्थ्या परार्द्धे।
कृष्णेऽन्त्यार्द्धेस्या तृतीयादशम्योः पूर्वे भागे सप्तमीशंभुतिथ्योः।।

अर्थात शुक्ल पक्ष की अष्टमी तथा पूर्णिमा के पूर्वार्ध में और एकादशी कथा चतुर्थी के उत्तरार्ध में भद्रा होती है। कृष्ण पक्ष की तृतीया तथा दशमी के उत्तरार्ध में और सप्तमी तथा चतुर्थी के पूर्वार्ध में भद्रा होती है।

विशेष नोट: यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक पहर 3 घंटे का होता है। जिसके अनुसार एक दिन और एक रात में कुल मिलाकर आठ पहर होते हैं यानी कि 24 घंटे। उपरोक्त तालिका में बताए हुए पहर के पहले 2 घंटे अर्थात 5 घड़ी भद्रा का मुख होता है तथा उसे शुभ माना जाता है। दूसरी ओर ऊपरी तालिका में ही बताए हुए पहर के अंत का एक घंटा 15 मिनट यानि कि तीन घड़ी भद्रा की पुच्छ होती है।

दूसरे शब्दों में कहें तो मुहूर्त चिंतामणि ग्रंथ के अनुसार चंद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की पांचवें प्रहर की 5 घड़ियों में भद्रा मुख होता है, अष्टमी तिथि के दूसरे प्रहर के कुल मान आदि की 5 घटियाँ, एकादशी के सातवें प्रहर की प्रथम 5 घड़ियाँ तथा पूर्णिमा के चौथे प्रहर के शुरुआत की 5 घड़ियों में भद्रा का मुख होता है। इसी प्रकार चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया के 8वें प्रहर आदि की 5 घड़ियाँ भद्रा मुख होती है, कृष्ण पक्ष की सप्तमी के तीसरे प्रहर में आरंभ की 5 घड़ी में भद्रा मुख होता है। इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि का 6 प्रहर और चतुर्दशी तिथि का प्रथम प्रहर की 5 घड़ी में भद्रा मुख व्याप्त रहता है।

भद्रा की पुच्छ शुभ होने के कारण इसमें किसी भी प्रकार का शुभ कार्य कर सकते हैं। तिथि के उत्तरार्ध में होने वाली भद्रा यदि दिन में हो और किसी के पूर्वार्ध में होने वाली भद्रा यदि रात में हो तो शुभ मानी जाती है।

भद्रा के दौरान न किये जाने वाले कार्य
भद्रा को प्राय सभी शुभ और मांगलिक कार्यों में त्याज्य माना जाता है और जब भी भद्रा लग रही होती है तो उस समय शुभ कार्य संपादित नहीं किए जाते।

कार्येत्वाश्यके विष्टेरमुख, कण्ठहृदि मात्रं परित्येत।

अर्थात बहुत अधिक आवश्यक होने पर पृथ्वीलोक की भद्रा, कंठ, ह्रदय और भद्रा मुख को त्याग कर भद्रा पुच्छ में शुभ एवं मांगलिक कार्य संपन्न किये जा सकते हैं।

ईयं भद्रा शुभ-कार्येषु अशुभा भवति।

अर्थात किसी भी शुभ कार्य में भद्रा अशुभ मानी जाती है। हमारे ऋषि मुनियों ने भी भद्रा काल को अशुभ तथा दुखदायी बताया है:—

न कुर्यात मंगलं विष्ट्या जीवितार्थी कदाचन।
कुर्वन अज्ञस्तदा क्षिप्रं तत्सर्वं नाशतां व्रजेत।। ---महर्षि कश्यप

महर्षि कश्यप के अनुसार जो कोई भी प्राणी अपना जीवन सुखी बनाना चाहता है और आनंद पूर्वक जीवन बिताना चाहता है उसे भद्रा काल के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। यदि भूलवश कोई ऐसा कार्य हो जाए तो उसका शुभ फल नष्ट हो जाता है।

भद्रा काल के दौरान मुख्य रूप से मुंडन संस्कार, विवाह संस्कार, गृहारंभ, कोई नया व्यवसाय आरंभ करना, गृह प्रवेश, शुभ यात्रा, शुभ उदेश्य से किए जाने वाले सभी कार्य तथा रक्षाबंधन आदि मांगलिक कार्यों को नहीं करना चाहिए।

भद्रा के दौरान किये जाने वाले कार्य
लगभग सभी शुभ कार्यों के लिए भद्रा का निषेध माना गया है। लेकिन कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिनकी प्रकृति अशुभ होती है, ऐसे कार्य भद्रा काल के दौरान किए जा सकते हैं। इनमें मुख्य रूप से शत्रु पर आक्रमण करना, अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग करना, ऑपरेशन करना, किसी पर मुकदमा आरंभ करना, आग जलाना, भैंस, घोड़ा, ऊँट आदि से संबंधित कार्य तथा किसी वस्तु को काटना, यज्ञ करना तथा स्त्री प्रसंग करना आदि कार्य इसमें सम्मिलित हैं। यदि इन कार्यों को भद्र काल के दौरान किया जाए तो इनमें मनोवांछित सफलता मिल सकता हैं।

भद्रा का परिहार करने का तरीका
हमारे ज्योतिष शास्त्र की मुख्य विशेषता यह है कि आम जीवन में आने वाली समस्याओं को दूर करने की दिशा में कुछ ऐसे उपाय सुझाए जाते हैं जो मानव जीवन को पुष्पित और पल्लवित कर सकें। इसी क्रम में भद्रा के परिहार के उपाय बताए गए हैं।

सर्वप्रथम यह ज्ञात किया जाता है कि भद्रा का वास कहां है। यदि भद्रा स्वर्ग लोक अथवा पाताल लोक में है तो परिहार की आवश्यकता नहीं होती केवल मृत्यु लोक में अर्थात पृथ्वी लोक पर भद्रा का वास होने पर विशेष रूप से हानिकारक माना जाता है और इसीलिए इसका परिहार किया जाता है। साथ ही साथ भद्रा के मुख और पुच्छ का विचार भी किया जाता है। भद्रा के परिहार के लिए सबसे अधिक प्रभावी भगवान शिव की आराधना करना माना जाता है। इसलिए यदि अत्यंत आवश्यक कोई कार्य आपको भद्रा वास के दौरान करना हो तो भगवान शिव की अराधना अवश्य करें।

इस संबंध में निम्नलिखित तथ्यों पर विचार किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में पीयूष धारा तथा मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार: —

दिवा भद्रा रात्रौ रात्रि भद्रा यदा दिवा।
न तत्र भद्रा दोषः स्यात सा भद्रा भद्रदायिनी।।

इसका तात्पर्य यह है कि यदि दिन के समय की भद्रा रात्रि में और रात्रि के समय की भद्रा दिन में आ जाए, तो ऐसी स्थिति में भद्रा का दोष नहीं लगता है। विशेष रुप से हंसी भद्रा का दोष पृथ्वी लोक पर नहीं माना जाता है। इस प्रकार की भद्रा को भद्रदायिनी अर्थात शुभ फल देने वाली भद्रा माना जाता है।

इसके अतिरिक्त निम्नलिखित बात भी विचारणीय है:

रात्रि भद्रा यदा अहनि स्यात दिवा दिवा भद्रा निशि।
न तत्र भद्रा दोषः स्यात सा भद्रा भद्रदायिनी।।

इस संबंध में एक और बात भी विचारणीय मानी जाती है -

तिथे पूर्वार्धजा रात्रौ दिन भद्रा परार्धजा।
भद्रा दोषो न तत्र स्यात कार्येsत्यावश्यके सति।।

अर्थात यदि आपको कोई अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करना है तो ऐसी स्थिति में उत्तरार्ध के समय की भद्रा दिन में तथा पूर्वार्ध के समय की भद्रा रात्रि में हो तब इसे शुभ ही माना गया है। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि यदि कभी भी आपको भद्रा के दौरान कोई शुभ कार्य करना आवश्यक हो जाए तो पृथ्वी लोक की भद्रा तथा भद्रा मुख-काल को छोड़कर तथा स्वर्ग व पाताल की भद्रा के पुच्छ काल में शुभ तथा मांगलिक कार्य संपन्न किए जा सकते हैं क्योंकि ऐसी स्थिति में भद्रा का परिणाम शुभ फलदायी होता है।

एक अन्य मत के अनुसार यदि आप भद्रा के दुष्प्रभावों से बचना चाहते हैं, तो आपको प्रातः काल उठकर भद्रा के निम्नलिखित 12 नामों का स्मरण तथा जाप करना चाहिए:

भद्रा के यह बारह नाम इस प्रकार हैं

● धन्या
● दधिमुखी
● भद्रा
● महामारी
● खरानना
● कालरात्रि
● महारुद्रा
● विष्टि
● कुलपुत्रिका
● भैरवी
● महाकाली
● असुरक्षयकारी

यदि आप पूरी निष्ठा तथा विधि पूर्वक भद्रा का पूजन करते हैं और भद्रा के उपरोक्त 12 नामों का स्मरण कर उनकी पूजा करते हैं तो भद्रा का कष्ट आपको नहीं लगता और आपके सभी कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं। हमारा मानना है कि आपको किसी भी कार्य करने से पूर्व उचित एवं शुभ मुहूर्त का ही चुनाव करना चाहिए तथा उनसे संबंधित हर उन उपायों को अवश्य करना चाहिए जिससे आपका कार्य निर्विघ्न संपन्न हो

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