14/05/2026
https://youtu.be/emLNYp0Pc5U?si=ZsMCPKqyfh7E85Vy
*विषय: जाने दृश्य के गुण कर्म और भेद.*
*अखिल विश्व गायत्री परिवार (AWGP) के अनुसार, दृश्य (Visible/Physical World) और अदृश्य (Invisible/Subtle World) एक ही सत्य के दो पहलू हैं। दृश्य जगत अदृश्य का ही प्रतिफल है।दृश्य के गुण (Characteristics of the Visible World)AWGP साहित्य के अनुसार दृश्य जगत के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं:नश्वरता (Perishability):*
जो कुछ भी आंखों से दिखाई देता है, वह नाशवान है, परिवर्तनशील है।
*प्रतिबिम्ब (Reflection):*
बाह्य जीवन हमारे आंतरिक जीवन (विचारों) का प्रतिबिम्ब मात्र है।
*परिणाम (Result):*
दृश्य कर्म है, जो अदृश्य विचारों का परिणाम है। *त्रिगुणात्मक (Three Qualities):*
यह प्रकृति सत्, रज और तम गुणों से निर्मित है।दृश्य के कर्म (Actions in the Visible World)दृश्य कर्म वह है जो हम शारीरिक रूप से करते हैं, लेकिन इसका आधार आंतरिक होता है!
*संस्कारों का प्रकटीकरण:*
हमारे सूक्ष्म संस्कार (अदृश्य) ही स्थूल जीवन के शुभ-अशुभ घटनाक्रम (दृश्य) के रूप में सामने आते हैं। *विचार-आधारित:*
चोरी, बेईमानी या सत्कर्म यकायक नहीं होते; वे भीतर ही भीतर बहुत दिनों से चल रहे विचारों का दृश्य रूप हैं।
*कर्मफल:*
दृश्य जगत में हम जो कर्म करते हैं, उसका सूक्ष्म लेखा-जोखा आकाशिक बही (अदृश्य) में जमा होता है।दृश्य के भेद (Divisions/Aspects of the Visible World)गायत्री साधना और भारतीय दर्शन के आधार पर इसके प्रमुख भेद हैं:-
*सूक्ष्म प्रकृति (अदृश्य):*
सत्, रज, तम—शक्ति प्रवाह। *स्थूल प्रकृति (दृश्य):*
पंचतत्व—मिट्टी, पानी, हवा, अग्नि, आकाश।
*चेतन (मनुष्य):*
कर्मशील प्राणी, जो अपने विचारों से अदृश्य को प्रभावित करता है।
!!सार!! *(Conclusion)AWGP के अनुसार, जीवन का रहस्य जड़ों (अदृश्य) में है, न कि तनों (दृश्य) में। यदि हम दृश्य जगत को बदलना चाहते हैं, तो हमें अपने अदृश्य (विचारों और संस्कारों) को शुद्ध करना होगा।*
आइए सुनते हैं उपरोक्त vdo में।🙏🏼👆🏼
*!! 14, मई,2026 !!*
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत✨🔱*
*!! ॐ भूर्भुवःस्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात !!*
(भावार्थ-उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपने अंतःकरण में धारण करें, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।)
*!! शुभ दिन !!*
आत्मीय भाईयों और बहिनों समस्त गायत्री परिजनों 🙏🏼
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*अखण्ड दीपक प्राकट्य शताब्दी /वंदनीय माता भगवती देवी शर्मा के प्राकट्य दिवस की जन्म शताब्दी (1926 से 2026 ) महायज्ञ की पूर्व घोषणा शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा दिव्य कलश ज्योति यात्राओं के माध्यम से की जा चुकी है जिसका शुभारंभ गायत्री ज्ञान मंदिर उरई(जालौन) द्वारा चैत्र नवरात्र की नवदुर्गा से किया जा चुका है। लक्ष्य है जन - जन तक युग साहित्य को पहुंचाना ।* *माध्यम हैं6 - दीप यज्ञ/ यज्ञ/बलिवैश्वदेव यज्ञ, गायत्री मंत्र जप ।परिजनों के समस्त संस्कार निःशुल्क संपन्न कराया जाना घर - घर जाकर ( युग साहित्य छोला छाप पुस्तकालय के माध्यम से) साहित्य पढ़ाना ।*
_अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना , प्रज्ञा पाक्षिक, पढ़ने के लिए प्रेरित करना ।_
*यूट्यूब चैनल,व्हाट्सएप/फेसबुक के माध्यम से ज्ञान यज्ञ करना.. एवं वसोधारा का क्रम ज्ञान यज्ञ के मध्यम से अग्नि प्रज्वलित रखने हेतु युग साहित्य के लेखों और पुस्तकों को टाइप कर/vdo बनाकर निरंतर आहुतियां देना ।*
परमपूज्य द्वारा- (वांग्मय01) पृष्ठ 216 में कहा है :-
*दो कदम आप भी बढ़ाएं*
इस विदाई की बेला में हम दो उत्तरदायित्व प्रिय परिजनों को सौंप कर जा रहे हैं --
*1- ज्ञान यज्ञ में निरंतर आहुतियां देते रहने से कोई जी न चुराए ।*
*2- युग- परिवर्तन के लिए अनिवार्य संघर्ष में अपना भाग पूरा करने से मुख न छुपाए ।*
*जो हमें प्यार करते हो ,हमारे प्रति ममता और आत्मीयता सचमुच ही रखते हो, वे उपर्युक्त दोनों ही बातें नोट कर लें । हम हर परिजन की वास्तविकता इसी कसौटी पर कसकर परखते रहेंगे ।*
*✍ युगऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्य🙏🏼*
*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत को जन जन तक पहुंचाने के लिए ज्ञान यज्ञ में गायत्री ज्ञान मंदिर उरई द्वारा अपनी आहुतियां समर्पित की जा रही है। आप भी यही करें।* 😊🪔
ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत, अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2), श्रद्धेय डॉ. प्रणव पंड्या (शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पुस्तक है। यह पुस्तक पातञ्जल योग दर्शन के 'साधनपाद' पर आधारित सरल हिंदी भावार्थ दीपिका है, जो साधकों को मन और चेतना की गहराई में उतरने का मार्ग दिखाती है।,को आपको पढ़कर सुनाते हैं...
*पुस्तक के मुख्य बिंदु* (Antarjagat ki Yatra - Part 2)
*:मूल आधार:*
यह पुस्तक महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों के 'साधनपाद' (साधना के चरण) की व्याख्या करती है।
*अन्तर्जगत का विज्ञान:*
बाहरी दुनिया की यात्रा के विपरीत, यह पुस्तक आंतरिक दुनिया (मन, बुद्धि, चित्त) को व्यवस्थित और उन्नत करने का विज्ञान समझाती है।
*साधना और संयम:* इसमें बताया गया है कि कैसे योग, साधना और संयम के द्वारा मानसिक शक्तियों को जागृत किया जा सकता है।
*भूमिका (डा. प्रणव पंड्या):*
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. पंड्या ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योग की कठिन क्रियाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है, ताकि सामान्य व्यक्ति भी इसे समझ सके।
*प्रकाशक:*
यह पुस्तक श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट, शांतिकुंज, हरिद्वार (AWGP) द्वारा प्रकाशित है।
*:पुस्तक का सार:*
*(अंतर्वाणी - विचार)*
पुस्तक का उद्देश्य पाठक को यह समझाना है कि सच्चा सुख और शक्ति बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। इसके लिए चित्त की शुद्धि और एकाग्रता आवश्यक है। भाग 2 में योग के व्यावहारिक साधनों (साधनपाद) पर विशेष जोर दिया गया है, जो साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं।
संकलन - संपादन
*!! मां तारा कुँज!!*
**प्रज्ञा महिला मंडल/बाल संस्कार शाला,*प्रज्ञा संस्थान,गायत्री ज्ञान मंदिर 3798, पटेल नगर , वी मार्ट के सामने,बद्री सिंह,पूर्व विधायक गली में, जयराम स्कूल के पास,उरई (जालौन),उ.प्र. 285001*
*mb.997191759p5*
"अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2)" डॉ. प्रणव पंड्या जी (AWGP - शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत.....