Viyakti ,Parivar, Samaaj Nirmaan

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परिवार निर्माण का अध्यात्मिक आधारपरिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि भावनाओं, त्याग, सहकार और आत्मीयता का जीवंत...
20/05/2026

परिवार निर्माण का अध्यात्मिक आधार
परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि भावनाओं, त्याग, सहकार और आत्मीयता का जीवंत विद्यालय है।
जहाँ “मैं” की जगह “हम” का भाव विकसित होता है, वहीं से अध्यात्म प्रारम्भ होता है।
आज परिवारों के टूटने का मुख्य कारण आर्थिक कमी नहीं, बल्कि —
संवाद की कमी,
अहंकार की अधिकता,
सहनशीलता का अभाव,
और आत्मीय प्रेम का क्षय है।
अध्यात्म हमें सिखाता है कि —
परिवार अधिकार से नहीं, अपनत्व से चलता है।
जिस घर में
एक-दूसरे को सुनने की संस्कृति हो,
बड़ों का सम्मान हो,
बच्चों को संस्कार मिलें,
भोजन से पहले कृतज्ञता हो,
और दिन में कुछ समय सामूहिक प्रार्थना, जप, स्वाध्याय या संवाद का हो,
वहाँ परिवार केवल “घर” नहीं रहता, वह देवालय बन जाता है।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा था —
“परिवार मानव जीवन की प्रथम पाठशाला है।”
यदि परिवार में प्रेम, संयम, सेवा और सहयोग के संस्कार जीवित रहेंगे, तो समाज और राष्ट्र स्वतः सुदृढ़ होंगे।
अनुभव आधारित जीवन सूत्र :
🌿 जहाँ तर्क कम और प्रेम अधिक होता है, वहाँ संबंध टिकते हैं।
🌿 परिवार में जीतने से अधिक आवश्यक है — जुड़े रहना।
🌿 कटु वचन वर्षों की तपस्या नष्ट कर देते हैं, जबकि मधुर व्यवहार टूटे मन जोड़ देता है।
🌿 परिवार का वास्तविक धन — विश्वास, समय और संवेदना है।
🌿 प्रतिदिन कुछ समय मोबाइल से नहीं, परिवार से जुड़िए।
परिवार को स्वर्ग बनाने के छोटे अध्यात्मिक उपाय :
🔸 प्रतिदिन सामूहिक दीपयज्ञ या प्रार्थना
🔸 सप्ताह में एक दिन पारिवारिक संवाद
🔸 बड़ों का आशीर्वाद लेना
🔸 भोजन साथ बैठकर करना
🔸 एक-दूसरे की अच्छाइयों की प्रशंसा करना
🔸 बच्चों को सेवा और संस्कार से जोड़ना
जब परिवार प्रेम बाँटना सीख जाता है, तब वही घर ईश्वर की अनुभूति का केन्द्र बन जाता है।
🌸 “परिवार को बचाना है तो संबंधों में अध्यात्म जगाना होगा।” 🌸

https://youtu.be/e9h3sSZK40M?si=pDRsdwKfes246bls *विषय: मोह मुक्त होने पर ही जलेगा प्रज्ञा का दीपक ....*अखिल विश्व गायत्...
18/05/2026

https://youtu.be/e9h3sSZK40M?si=pDRsdwKfes246bls

*विषय: मोह मुक्त होने पर ही जलेगा प्रज्ञा का दीपक ....*

अखिल विश्व गायत्री परिवार (AWGP) के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के विचारों के अनुसार, "मोह मुक्त होने पर ही जलेगा प्रज्ञा का दीपक" एक बहुत ही गहरा आध्यात्मिक और व्यावहारिक सूत्र है।
*इसका अर्थ है कि जब तक मनुष्य सांसारिक बंधनों, लोभ, और मोह में फंसा रहता है, तब तक उसकी विवेक बुद्धि (प्रज्ञा) पर अविद्या का पर्दा पड़ा रहता है। जब व्यक्ति अहंकार और स्वार्थ के मोह जाल से बाहर निकलता है, तभी प्रज्ञा (दिव्य ज्ञान/सही सोच) का प्रकाश जागृत होता है।*
मुख्य विचार (AWGP साहित्य के अनुसार)मोह ही सबसे बड़ा बंधन: मनुष्य का मोह, जायदाद, बच्चों और सांसारिक वस्तुओं में बँध जाना उसकी आत्मा का सबसे बड़ा बंधन है।
*प्रज्ञा (विवेक) का अर्थ: प्रज्ञा का अर्थ है- दूरदर्शी विवेकशीलता, आत्मोत्कर्ष के लिए साहस और उत्कृष्ट आदर्शवादी जीवन।*

गायत्री उपासना का उद्देश्य: गायत्री महाशक्ति प्रज्ञा तत्व का ही दूसरा नाम है। गायत्री साधना का उद्देश्य प्रज्ञा को प्राप्त करना है।

*प्रज्ञा से नवयुग का सृजन: जब व्यक्ति मोह से मुक्त होकर अपनी प्रज्ञा को जाग्रत करता है, तभी वह वास्तव में 'मानव' बनता है और समाज में नव निर्माण का कार्य कर सकता है।*

अहंकार का त्याग: अहंकार का अर्थ संकुचितता है। इससे व्यक्ति दूसरों से मिल नहीं पाता। अहंकार के मोह जाल से बचकर ही आध्यात्मिक उन्नति संभव है। यह विचार गायत्री परिवार की विचारधारा का मूल आधार है, जो 'विचार क्रांति' के माध्यम से मोह (अज्ञान) को मिटाकर प्रज्ञा (ज्ञान) के प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है।

आइए सुनते हैं उपरोक्त vdo में।🙏🏼👆🏼

*!! 18, मई,2026 !!*
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत✨🔱*
*!! ॐ भूर्भुवःस्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात !!*
(भावार्थ-उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपने अंतःकरण में धारण करें, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।)

*!! शुभ दिन !!*
आत्मीय भाईयों और बहिनों समस्त गायत्री परिजनों 🙏🏼
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*अखण्ड दीपक प्राकट्य शताब्दी /वंदनीय माता भगवती देवी शर्मा के प्राकट्य दिवस की जन्म शताब्दी (1926 से 2026 ) महायज्ञ की पूर्व घोषणा शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा दिव्य कलश ज्योति यात्राओं के माध्यम से की जा चुकी है जिसका शुभारंभ गायत्री ज्ञान मंदिर उरई(जालौन) द्वारा चैत्र नवरात्र की नवदुर्गा से किया जा चुका है। लक्ष्य है जन - जन तक युग साहित्य को पहुंचाना ।* *माध्यम हैं6 - दीप यज्ञ/ यज्ञ/बलिवैश्वदेव यज्ञ, गायत्री मंत्र जप ।परिजनों के समस्त संस्कार निःशुल्क संपन्न कराया जाना घर - घर जाकर ( युग साहित्य छोला छाप पुस्तकालय के माध्यम से) साहित्य पढ़ाना ।*
_अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना , प्रज्ञा पाक्षिक, पढ़ने के लिए प्रेरित करना ।_

*यूट्यूब चैनल,व्हाट्सएप/फेसबुक के माध्यम से ज्ञान यज्ञ करना.. एवं वसोधारा का क्रम ज्ञान यज्ञ के मध्यम से अग्नि प्रज्वलित रखने हेतु युग साहित्य के लेखों और पुस्तकों को टाइप कर/vdo बनाकर निरंतर आहुतियां देना ।*
परमपूज्य द्वारा- (वांग्मय01) पृष्ठ 216 में कहा है :-
*दो कदम आप भी बढ़ाएं*
इस विदाई की बेला में हम दो उत्तरदायित्व प्रिय परिजनों को सौंप कर जा रहे हैं --
*1- ज्ञान यज्ञ में निरंतर आहुतियां देते रहने से कोई जी न चुराए ।*
*2- युग- परिवर्तन के लिए अनिवार्य संघर्ष में अपना भाग पूरा करने से मुख न छुपाए ।*
*जो हमें प्यार करते हो ,हमारे प्रति ममता और आत्मीयता सचमुच ही रखते हो, वे उपर्युक्त दोनों ही बातें नोट कर लें । हम हर परिजन की वास्तविकता इसी कसौटी पर कसकर परखते रहेंगे ।*
*✍ युगऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्य🙏🏼*

*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत को जन जन तक पहुंचाने के लिए ज्ञान यज्ञ में गायत्री ज्ञान मंदिर उरई द्वारा अपनी आहुतियां समर्पित की जा रही है। आप भी यही करें।* 😊🪔

ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत, अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2), श्रद्धेय डॉ. प्रणव पंड्या (शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पुस्तक है। यह पुस्तक पातञ्जल योग दर्शन के 'साधनपाद' पर आधारित सरल हिंदी भावार्थ दीपिका है, जो साधकों को मन और चेतना की गहराई में उतरने का मार्ग दिखाती है।,को आपको पढ़कर सुनाते हैं...

*पुस्तक के मुख्य बिंदु* (Antarjagat ki Yatra - Part 2)
*:मूल आधार:*
यह पुस्तक महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों के 'साधनपाद' (साधना के चरण) की व्याख्या करती है।
*अन्तर्जगत का विज्ञान:*
बाहरी दुनिया की यात्रा के विपरीत, यह पुस्तक आंतरिक दुनिया (मन, बुद्धि, चित्त) को व्यवस्थित और उन्नत करने का विज्ञान समझाती है।
*साधना और संयम:* इसमें बताया गया है कि कैसे योग, साधना और संयम के द्वारा मानसिक शक्तियों को जागृत किया जा सकता है।
*भूमिका (डा. प्रणव पंड्या):*
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. पंड्या ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योग की कठिन क्रियाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है, ताकि सामान्य व्यक्ति भी इसे समझ सके।
*प्रकाशक:*
यह पुस्तक श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट, शांतिकुंज, हरिद्वार (AWGP) द्वारा प्रकाशित है।

*:पुस्तक का सार:*
*(अंतर्वाणी - विचार)*
पुस्तक का उद्देश्य पाठक को यह समझाना है कि सच्चा सुख और शक्ति बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। इसके लिए चित्त की शुद्धि और एकाग्रता आवश्यक है। भाग 2 में योग के व्यावहारिक साधनों (साधनपाद) पर विशेष जोर दिया गया है, जो साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं।

संकलन - संपादन
*!! मां तारा कुँज!!*
**प्रज्ञा महिला मंडल/बाल संस्कार शाला,*प्रज्ञा संस्थान,गायत्री ज्ञान मंदिर 3798, पटेल नगर , वी मार्ट के सामने,बद्री सिंह,पूर्व विधायक गली में, जयराम स्कूल के पास,उरई (जालौन),उ.प्र. 285001*
*mb.997191759p5*

"अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2)" डॉ. प्रणव पंड्या जी (AWGP - शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत.....

https://youtu.be/WwIX5mqe_JA?si=lNDsO2NMXnXJ2MHP *विषय: कैवल्य का सच्चा अधिकारी ..* अखिल भारतीय गायत्री परिवार (AWGP) के...
16/05/2026

https://youtu.be/WwIX5mqe_JA?si=lNDsO2NMXnXJ2MHP

*विषय: कैवल्य का सच्चा अधिकारी ..*

अखिल भारतीय गायत्री परिवार (AWGP) के अनुसार, कैवल्य (पूर्ण मोक्ष या सर्वोच्च चेतना) का सच्चा अधिकारी वह है जो अविद्या (अज्ञान) का विसर्जन कर, मोह-मुक्त होकर अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है। यह अवस्था भोग-विलास के पूर्ण होने और अंतर्मन में पूर्ण संतुलन के साथ ही प्राप्त होती है, जहाँ आत्मा अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाती है।कैवल्य अधिकारी के प्रमुख लक्षण (AWGP व आध्यात्मिक दृष्टिकोण से):अविद्या का विसर्जन: सच्चा ज्ञान पाकर अज्ञान और मोह को त्यागना।भोगों से पूर्ण तृप्ति: लौकिक कामनाओं का अंत।सत्यं वद, धर्मम् चर: जीवन में धर्म का आचरण करना और संयम विकसित करना।स्वयं पर विश्वास: मोह-माया से ऊपर उठकर एकाकी (निजी आत्मिक यात्रा) होने पर भी अटूट विश्वास के साथ आगे बढ़ना।तप और स्वाध्याय: सुख-दुख में सम रहना (तप) और आत्म-अध्ययन (स्वाध्याय) करना।AWGP साहित्य अक्सर यह बताता है कि कैवल्य कोई बाह्य स्थान नहीं, बल्कि एक चेतना की स्थिति है, जिसे विकारों से मुक्त होकर ही प्राप्त किया जा सकता है। आप इस विषय पर अधिक विस्तार से पढ़ सकते हैं।...
आइए सुनते हैं उपरोक्त vdo में।🙏🏼👆🏼

*!! 16, मई,2026 !!*
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत✨🔱*
*!! ॐ भूर्भुवःस्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात !!*
(भावार्थ-उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपने अंतःकरण में धारण करें, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।)

*!! शुभ दिन !!*
आत्मीय भाईयों और बहिनों समस्त गायत्री परिजनों 🙏🏼
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*अखण्ड दीपक प्राकट्य शताब्दी /वंदनीय माता भगवती देवी शर्मा के प्राकट्य दिवस की जन्म शताब्दी (1926 से 2026 ) महायज्ञ की पूर्व घोषणा शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा दिव्य कलश ज्योति यात्राओं के माध्यम से की जा चुकी है जिसका शुभारंभ गायत्री ज्ञान मंदिर उरई(जालौन) द्वारा चैत्र नवरात्र की नवदुर्गा से किया जा चुका है। लक्ष्य है जन - जन तक युग साहित्य को पहुंचाना ।* *माध्यम हैं6 - दीप यज्ञ/ यज्ञ/बलिवैश्वदेव यज्ञ, गायत्री मंत्र जप ।परिजनों के समस्त संस्कार निःशुल्क संपन्न कराया जाना घर - घर जाकर ( युग साहित्य छोला छाप पुस्तकालय के माध्यम से) साहित्य पढ़ाना ।*
_अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना , प्रज्ञा पाक्षिक, पढ़ने के लिए प्रेरित करना ।_

*यूट्यूब चैनल,व्हाट्सएप/फेसबुक के माध्यम से ज्ञान यज्ञ करना.. एवं वसोधारा का क्रम ज्ञान यज्ञ के मध्यम से अग्नि प्रज्वलित रखने हेतु युग साहित्य के लेखों और पुस्तकों को टाइप कर/vdo बनाकर निरंतर आहुतियां देना ।*
परमपूज्य द्वारा- (वांग्मय01) पृष्ठ 216 में कहा है :-
*दो कदम आप भी बढ़ाएं*
इस विदाई की बेला में हम दो उत्तरदायित्व प्रिय परिजनों को सौंप कर जा रहे हैं --
*1- ज्ञान यज्ञ में निरंतर आहुतियां देते रहने से कोई जी न चुराए ।*
*2- युग- परिवर्तन के लिए अनिवार्य संघर्ष में अपना भाग पूरा करने से मुख न छुपाए ।*
*जो हमें प्यार करते हो ,हमारे प्रति ममता और आत्मीयता सचमुच ही रखते हो, वे उपर्युक्त दोनों ही बातें नोट कर लें । हम हर परिजन की वास्तविकता इसी कसौटी पर कसकर परखते रहेंगे ।*
*✍ युगऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्य🙏🏼*

*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत को जन जन तक पहुंचाने के लिए ज्ञान यज्ञ में गायत्री ज्ञान मंदिर उरई द्वारा अपनी आहुतियां समर्पित की जा रही है। आप भी यही करें।* 😊🪔

ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत, अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2), श्रद्धेय डॉ. प्रणव पंड्या (शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पुस्तक है। यह पुस्तक पातञ्जल योग दर्शन के 'साधनपाद' पर आधारित सरल हिंदी भावार्थ दीपिका है, जो साधकों को मन और चेतना की गहराई में उतरने का मार्ग दिखाती है।,को आपको पढ़कर सुनाते हैं...

*पुस्तक के मुख्य बिंदु* (Antarjagat ki Yatra - Part 2)
*:मूल आधार:*
यह पुस्तक महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों के 'साधनपाद' (साधना के चरण) की व्याख्या करती है।
*अन्तर्जगत का विज्ञान:*
बाहरी दुनिया की यात्रा के विपरीत, यह पुस्तक आंतरिक दुनिया (मन, बुद्धि, चित्त) को व्यवस्थित और उन्नत करने का विज्ञान समझाती है।
*साधना और संयम:* इसमें बताया गया है कि कैसे योग, साधना और संयम के द्वारा मानसिक शक्तियों को जागृत किया जा सकता है।
*भूमिका (डा. प्रणव पंड्या):*
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. पंड्या ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योग की कठिन क्रियाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है, ताकि सामान्य व्यक्ति भी इसे समझ सके।
*प्रकाशक:*
यह पुस्तक श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट, शांतिकुंज, हरिद्वार (AWGP) द्वारा प्रकाशित है।

*:पुस्तक का सार:*
*(अंतर्वाणी - विचार)*
पुस्तक का उद्देश्य पाठक को यह समझाना है कि सच्चा सुख और शक्ति बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। इसके लिए चित्त की शुद्धि और एकाग्रता आवश्यक है। भाग 2 में योग के व्यावहारिक साधनों (साधनपाद) पर विशेष जोर दिया गया है, जो साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं।

संकलन - संपादन
*!! मां तारा कुँज!!*
**प्रज्ञा महिला मंडल/बाल संस्कार शाला,*प्रज्ञा संस्थान,गायत्री ज्ञान मंदिर 3798, पटेल नगर , वी मार्ट के सामने,बद्री सिंह,पूर्व विधायक गली में, जयराम स्कूल के पास,उरई (जालौन),उ.प्र. 285001*
*mb.997191759p5*

"अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2)" डॉ. प्रणव पंड्या जी (AWGP - शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत.....

https://youtu.be/emLNYp0Pc5U?si=ZsMCPKqyfh7E85Vy *विषय: जाने दृश्य के गुण कर्म और भेद.* *अखिल विश्व गायत्री परिवार (AWGP...
14/05/2026

https://youtu.be/emLNYp0Pc5U?si=ZsMCPKqyfh7E85Vy

*विषय: जाने दृश्य के गुण कर्म और भेद.*

*अखिल विश्व गायत्री परिवार (AWGP) के अनुसार, दृश्य (Visible/Physical World) और अदृश्य (Invisible/Subtle World) एक ही सत्य के दो पहलू हैं। दृश्य जगत अदृश्य का ही प्रतिफल है।दृश्य के गुण (Characteristics of the Visible World)AWGP साहित्य के अनुसार दृश्य जगत के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं:नश्वरता (Perishability):*
जो कुछ भी आंखों से दिखाई देता है, वह नाशवान है, परिवर्तनशील है।
*प्रतिबिम्ब (Reflection):*
बाह्य जीवन हमारे आंतरिक जीवन (विचारों) का प्रतिबिम्ब मात्र है।
*परिणाम (Result):*
दृश्य कर्म है, जो अदृश्य विचारों का परिणाम है। *त्रिगुणात्मक (Three Qualities):*
यह प्रकृति सत्, रज और तम गुणों से निर्मित है।दृश्य के कर्म (Actions in the Visible World)दृश्य कर्म वह है जो हम शारीरिक रूप से करते हैं, लेकिन इसका आधार आंतरिक होता है!
*संस्कारों का प्रकटीकरण:*
हमारे सूक्ष्म संस्कार (अदृश्य) ही स्थूल जीवन के शुभ-अशुभ घटनाक्रम (दृश्य) के रूप में सामने आते हैं। *विचार-आधारित:*
चोरी, बेईमानी या सत्कर्म यकायक नहीं होते; वे भीतर ही भीतर बहुत दिनों से चल रहे विचारों का दृश्य रूप हैं।
*कर्मफल:*
दृश्य जगत में हम जो कर्म करते हैं, उसका सूक्ष्म लेखा-जोखा आकाशिक बही (अदृश्य) में जमा होता है।दृश्य के भेद (Divisions/Aspects of the Visible World)गायत्री साधना और भारतीय दर्शन के आधार पर इसके प्रमुख भेद हैं:-
*सूक्ष्म प्रकृति (अदृश्य):*
सत्, रज, तम—शक्ति प्रवाह। *स्थूल प्रकृति (दृश्य):*
पंचतत्व—मिट्टी, पानी, हवा, अग्नि, आकाश।
*चेतन (मनुष्य):*
कर्मशील प्राणी, जो अपने विचारों से अदृश्य को प्रभावित करता है।
!!सार!! *(Conclusion)AWGP के अनुसार, जीवन का रहस्य जड़ों (अदृश्य) में है, न कि तनों (दृश्य) में। यदि हम दृश्य जगत को बदलना चाहते हैं, तो हमें अपने अदृश्य (विचारों और संस्कारों) को शुद्ध करना होगा।*

आइए सुनते हैं उपरोक्त vdo में।🙏🏼👆🏼

*!! 14, मई,2026 !!*
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत✨🔱*
*!! ॐ भूर्भुवःस्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात !!*
(भावार्थ-उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपने अंतःकरण में धारण करें, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।)

*!! शुभ दिन !!*
आत्मीय भाईयों और बहिनों समस्त गायत्री परिजनों 🙏🏼
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*अखण्ड दीपक प्राकट्य शताब्दी /वंदनीय माता भगवती देवी शर्मा के प्राकट्य दिवस की जन्म शताब्दी (1926 से 2026 ) महायज्ञ की पूर्व घोषणा शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा दिव्य कलश ज्योति यात्राओं के माध्यम से की जा चुकी है जिसका शुभारंभ गायत्री ज्ञान मंदिर उरई(जालौन) द्वारा चैत्र नवरात्र की नवदुर्गा से किया जा चुका है। लक्ष्य है जन - जन तक युग साहित्य को पहुंचाना ।* *माध्यम हैं6 - दीप यज्ञ/ यज्ञ/बलिवैश्वदेव यज्ञ, गायत्री मंत्र जप ।परिजनों के समस्त संस्कार निःशुल्क संपन्न कराया जाना घर - घर जाकर ( युग साहित्य छोला छाप पुस्तकालय के माध्यम से) साहित्य पढ़ाना ।*
_अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना , प्रज्ञा पाक्षिक, पढ़ने के लिए प्रेरित करना ।_

*यूट्यूब चैनल,व्हाट्सएप/फेसबुक के माध्यम से ज्ञान यज्ञ करना.. एवं वसोधारा का क्रम ज्ञान यज्ञ के मध्यम से अग्नि प्रज्वलित रखने हेतु युग साहित्य के लेखों और पुस्तकों को टाइप कर/vdo बनाकर निरंतर आहुतियां देना ।*
परमपूज्य द्वारा- (वांग्मय01) पृष्ठ 216 में कहा है :-
*दो कदम आप भी बढ़ाएं*
इस विदाई की बेला में हम दो उत्तरदायित्व प्रिय परिजनों को सौंप कर जा रहे हैं --
*1- ज्ञान यज्ञ में निरंतर आहुतियां देते रहने से कोई जी न चुराए ।*
*2- युग- परिवर्तन के लिए अनिवार्य संघर्ष में अपना भाग पूरा करने से मुख न छुपाए ।*
*जो हमें प्यार करते हो ,हमारे प्रति ममता और आत्मीयता सचमुच ही रखते हो, वे उपर्युक्त दोनों ही बातें नोट कर लें । हम हर परिजन की वास्तविकता इसी कसौटी पर कसकर परखते रहेंगे ।*
*✍ युगऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्य🙏🏼*

*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत को जन जन तक पहुंचाने के लिए ज्ञान यज्ञ में गायत्री ज्ञान मंदिर उरई द्वारा अपनी आहुतियां समर्पित की जा रही है। आप भी यही करें।* 😊🪔

ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत, अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2), श्रद्धेय डॉ. प्रणव पंड्या (शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पुस्तक है। यह पुस्तक पातञ्जल योग दर्शन के 'साधनपाद' पर आधारित सरल हिंदी भावार्थ दीपिका है, जो साधकों को मन और चेतना की गहराई में उतरने का मार्ग दिखाती है।,को आपको पढ़कर सुनाते हैं...

*पुस्तक के मुख्य बिंदु* (Antarjagat ki Yatra - Part 2)
*:मूल आधार:*
यह पुस्तक महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों के 'साधनपाद' (साधना के चरण) की व्याख्या करती है।
*अन्तर्जगत का विज्ञान:*
बाहरी दुनिया की यात्रा के विपरीत, यह पुस्तक आंतरिक दुनिया (मन, बुद्धि, चित्त) को व्यवस्थित और उन्नत करने का विज्ञान समझाती है।
*साधना और संयम:* इसमें बताया गया है कि कैसे योग, साधना और संयम के द्वारा मानसिक शक्तियों को जागृत किया जा सकता है।
*भूमिका (डा. प्रणव पंड्या):*
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. पंड्या ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योग की कठिन क्रियाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है, ताकि सामान्य व्यक्ति भी इसे समझ सके।
*प्रकाशक:*
यह पुस्तक श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट, शांतिकुंज, हरिद्वार (AWGP) द्वारा प्रकाशित है।

*:पुस्तक का सार:*
*(अंतर्वाणी - विचार)*
पुस्तक का उद्देश्य पाठक को यह समझाना है कि सच्चा सुख और शक्ति बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। इसके लिए चित्त की शुद्धि और एकाग्रता आवश्यक है। भाग 2 में योग के व्यावहारिक साधनों (साधनपाद) पर विशेष जोर दिया गया है, जो साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं।

संकलन - संपादन
*!! मां तारा कुँज!!*
**प्रज्ञा महिला मंडल/बाल संस्कार शाला,*प्रज्ञा संस्थान,गायत्री ज्ञान मंदिर 3798, पटेल नगर , वी मार्ट के सामने,बद्री सिंह,पूर्व विधायक गली में, जयराम स्कूल के पास,उरई (जालौन),उ.प्र. 285001*
*mb.997191759p5*

"अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2)" डॉ. प्रणव पंड्या जी (AWGP - शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत.....

With Vijay Lale – I just got recognized as one of their top fans! 🎉
13/05/2026

With Vijay Lale – I just got recognized as one of their top fans! 🎉

https://youtu.be/ZCkYi9m-mFY?si=rBie6EzrzjeprjU0 *विषय: प्रकृति में जीवन का क्या प्रयोजन है ?.*पंडित श्रीराम शर्मा आचार्...
13/05/2026

https://youtu.be/ZCkYi9m-mFY?si=rBie6EzrzjeprjU0

*विषय: प्रकृति में जीवन का क्या प्रयोजन है ?.*

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (AWGP) के दर्शन के अनुसार, प्रकृति में जीवन का मुख्य प्रयोजन आत्म-विकास, पूर्णता (Perfection) की प्राप्ति और ईश्वर के दिव्य नियमों को समझकर स्वयं को उन्नत बनाना है।
*प्रकृति के अनुसार जीवन जीने से जुडी मुख्य बातें:*
पुरुषार्थ और विकास:
*प्रकृति का अस्तित्व ही इसलिए है कि वह जीवात्मा को कर्म (परिश्रम) करने के लिए प्रेरित करे। जीवन का उद्देश्य अपनी कमियों को दूर कर, पुरुषार्थ के माध्यम से पूर्ण योग्य बनना है।*
स्वास्थ्य और आरोग्य:
*प्रकृति हमारा पालन-पोषण एक माता की तरह करती है। जीवन का प्रयोजन प्राकृतिक नियमों (पेड़-पौधों, वायु, जल के साथ सामंजस्य) का पालन करते हुए मृत्युपर्यन्त स्वस्थ और बलिष्ठ बने रहना है, जो अपने जीवन में प्रकृति को प्रवेश होने दीजिये के अनुसार 100 वर्ष तक की आयु प्रदान कर सकती है।*

दिव्य शक्तियों का जागरण:

*प्रकृति के सान्निध्य में रहकर मनुष्य अपने भीतर छिपे देवत्व (Divinity) को विकसित कर सकता है और अच्छाइयों को अपनाकर अपने अस्तित्व को सार्थक बना सकता है।*
निस्स्वार्थ सेवा:

*प्रकृति निस्स्वार्थ भाव से सभी की सेवा करती है। मनुष्य को भी इसी प्रकार सेवाभाव अपनाना चाहिए, जैसा कि प्रकृति के सिंचन से जीवन होता है अभिसिंचित में बताया गया है।*

चेतना की जागृति:

*जीवन का स्वरूप और अर्थ के अनुसार, जीवन सिर्फ सांस लेने का नाम नहीं है, बल्कि आशा, उत्साह और गति के साथ सत्कर्मों में प्रवृत्त रहने का नाम है, जो दूसरों के सुख में वृद्धि करे।संक्षेप में, प्रकृति एक पाठशाला है, जहाँ जीवन का प्रयोजन संघर्षों के बीच भी संतुलन बनाए रखते हुए स्वयं को सँवारना और 'नर से नारायण' बनना है।....*

आइए सुनते हैं उपरोक्त vdo में।🙏🏼👆🏼

*!! 13, मई,2026 !!*
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत✨🔱*
*!! ॐ भूर्भुवःस्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात !!*
(भावार्थ-उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपने अंतःकरण में धारण करें, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।)

*!! शुभ दिन !!*
आत्मीय भाईयों और बहिनों समस्त गायत्री परिजनों 🙏🏼
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*अखण्ड दीपक प्राकट्य शताब्दी /वंदनीय माता भगवती देवी शर्मा के प्राकट्य दिवस की जन्म शताब्दी (1926 से 2026 ) महायज्ञ की पूर्व घोषणा शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा दिव्य कलश ज्योति यात्राओं के माध्यम से की जा चुकी है जिसका शुभारंभ गायत्री ज्ञान मंदिर उरई(जालौन) द्वारा चैत्र नवरात्र की नवदुर्गा से किया जा चुका है। लक्ष्य है जन - जन तक युग साहित्य को पहुंचाना ।* *माध्यम हैं6 - दीप यज्ञ/ यज्ञ/बलिवैश्वदेव यज्ञ, गायत्री मंत्र जप ।परिजनों के समस्त संस्कार निःशुल्क संपन्न कराया जाना घर - घर जाकर ( युग साहित्य छोला छाप पुस्तकालय के माध्यम से) साहित्य पढ़ाना ।*
_अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना , प्रज्ञा पाक्षिक, पढ़ने के लिए प्रेरित करना ।_

*यूट्यूब चैनल,व्हाट्सएप/फेसबुक के माध्यम से ज्ञान यज्ञ करना.. एवं वसोधारा का क्रम ज्ञान यज्ञ के मध्यम से अग्नि प्रज्वलित रखने हेतु युग साहित्य के लेखों और पुस्तकों को टाइप कर/vdo बनाकर निरंतर आहुतियां देना ।*
परमपूज्य द्वारा- (वांग्मय01) पृष्ठ 216 में कहा है :-
*दो कदम आप भी बढ़ाएं*
इस विदाई की बेला में हम दो उत्तरदायित्व प्रिय परिजनों को सौंप कर जा रहे हैं --
*1- ज्ञान यज्ञ में निरंतर आहुतियां देते रहने से कोई जी न चुराए ।*
*2- युग- परिवर्तन के लिए अनिवार्य संघर्ष में अपना भाग पूरा करने से मुख न छुपाए ।*
*जो हमें प्यार करते हो ,हमारे प्रति ममता और आत्मीयता सचमुच ही रखते हो, वे उपर्युक्त दोनों ही बातें नोट कर लें । हम हर परिजन की वास्तविकता इसी कसौटी पर कसकर परखते रहेंगे ।*
*✍ युगऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्य🙏🏼*

*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत को जन जन तक पहुंचाने के लिए ज्ञान यज्ञ में गायत्री ज्ञान मंदिर उरई द्वारा अपनी आहुतियां समर्पित की जा रही है। आप भी यही करें।* 😊🪔

ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत, अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2), श्रद्धेय डॉ. प्रणव पंड्या (शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पुस्तक है। यह पुस्तक पातञ्जल योग दर्शन के 'साधनपाद' पर आधारित सरल हिंदी भावार्थ दीपिका है, जो साधकों को मन और चेतना की गहराई में उतरने का मार्ग दिखाती है।,को आपको पढ़कर सुनाते हैं...

*पुस्तक के मुख्य बिंदु* (Antarjagat ki Yatra - Part 2)
*:मूल आधार:*
यह पुस्तक महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों के 'साधनपाद' (साधना के चरण) की व्याख्या करती है।
*अन्तर्जगत का विज्ञान:*
बाहरी दुनिया की यात्रा के विपरीत, यह पुस्तक आंतरिक दुनिया (मन, बुद्धि, चित्त) को व्यवस्थित और उन्नत करने का विज्ञान समझाती है।
*साधना और संयम:* इसमें बताया गया है कि कैसे योग, साधना और संयम के द्वारा मानसिक शक्तियों को जागृत किया जा सकता है।
*भूमिका (डा. प्रणव पंड्या):*
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. पंड्या ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योग की कठिन क्रियाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है, ताकि सामान्य व्यक्ति भी इसे समझ सके।
*प्रकाशक:*
यह पुस्तक श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट, शांतिकुंज, हरिद्वार (AWGP) द्वारा प्रकाशित है।

*:पुस्तक का सार:*
*(अंतर्वाणी - विचार)*
पुस्तक का उद्देश्य पाठक को यह समझाना है कि सच्चा सुख और शक्ति बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। इसके लिए चित्त की शुद्धि और एकाग्रता आवश्यक है। भाग 2 में योग के व्यावहारिक साधनों (साधनपाद) पर विशेष जोर दिया गया है, जो साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं।

संकलन - संपादन
*!! मां तारा कुँज!!*
**प्रज्ञा महिला मंडल/बाल संस्कार शाला,*प्रज्ञा संस्थान,गायत्री ज्ञान मंदिर 3798, पटेल नगर , वी मार्ट के सामने,बद्री सिंह,पूर्व विधायक गली में, जयराम स्कूल के पास,उरई (जालौन),उ.प्र. 285001*
*mb.997191759p5*

"अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2)" डॉ. प्रणव पंड्या जी (AWGP - शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत.....

https://youtu.be/mvhqTNCvSyo?si=_o1vCBun6qFKaHYr *विषय: कैसे मिटे दृश्य ?कैसे मिले ईष्ट?.*AWGP (अखिल विश्व गायत्री परिवा...
12/05/2026

https://youtu.be/mvhqTNCvSyo?si=_o1vCBun6qFKaHYr

*विषय: कैसे मिटे दृश्य ?कैसे मिले ईष्ट?.*

AWGP (अखिल विश्व गायत्री परिवार) के विचार दर्शन के अनुसार, *'दृश्य' (सांसारिक आकर्षण, विकार) को मिटाने और 'इष्ट' (परमात्मा) से मिलने का मार्ग आत्म-साधना, तप और ज्ञान द्वारा संभव है।*
यह प्रक्रिया अंतर्जगत की यात्रा से संबंधित है।AWGP साहित्य और मार्गदर्शन के अनुसार इसके मुख्य सूत्र निम्नलिखित हैं:
*1. दृश्य (विकार/सांसारिक मोह) कैसे मिटें?* पंचक्लेशों का नाश: *अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश (पंचक्लेश) ही दृश्य जगत के बंधन हैं। तप की प्रखरता द्वारा इन्हें नष्ट किया जा सकता है।*
अविद्या का विसर्जन:
*ज्ञान और आत्म-निरीक्षण द्वारा अविद्या (अज्ञान) को मिटाना ही दृश्य को नष्ट करना है।*
देहासक्ति का त्याग:
*मृत्यु के भय का मूल कारण देहासक्ति है। जब साधक यह समझता है कि वह शरीर नहीं, चेतना है, तब दृश्य बंधन कमजोर पड़ते हैं।*

स्वाध्याय (ज्ञानयोग):

*स्वाध्याय द्वारा बुद्धि की पवित्रता होती है और मानसिक मल दूर होता है, जिससे सांसारिक दृश्यों की ओर झुकाव कम होता है।*

2. इष्ट से संबंध कैसे जुड़ें (मिलें)?
*ध्यान-साधना द्वारा: इष्ट के साथ श्रद्धा-शक्ति को जोड़कर एकाकार हुआ जा सकता है। यह शब्दभेदी बाण की तरह काम करता है, जहाँ ध्यान से चेतना परिष्कृत होती है।*

भक्ति की प्रखरता:

*सभी साधनाओं का सुफल भक्ति है। इष्ट की भावना को अंतःकरण में दृढ़ता से बसाना।*

ईश्वर को सर्वव्यापी मानना:

*यह विश्वास दृढ़ करना कि परमात्मा हर जगह, हर क्षण (हजार आँखों से) हमारे विचारों और कार्यों को देख रहे हैं।*

गायत्री जप और तप:

*गायत्री उपासना और ज्ञान की उपासना (स्वाध्याय) के द्वारा चित्त शुद्ध होता है और इष्ट का साक्षात्कार संभव होता है।*

निराकार व साकार का समन्वय:
*निराकार को सृष्टा मानते हुए उनके साकार रूप (मंत्र/ध्यान) में डूबना।मुख्य सार (AWGP दृष्टिकोण)दृश्य और इष्ट के बीच का अंतर 'राग' (Attachment) है। जब साधक 'भोग' से हटकर 'योग' और 'तप' (Self-discipline) की ओर बढ़ता है, तब दृश्य स्वत: मिटने लगते हैं और इष्ट से मिलन का मार्ग प्रशस्त होता है।*

अधिक जानकारी के लिए AWGP की साहित्य वेबसाइट पर "कैसे मिटें दृश्य, कैसे मिलें इष्ट" विषयक पुस्तकें या अखंड ज्योति पत्रिका पढ़ें।

आइए सुनते हैं उपरोक्त vdo में।🙏🏼👆🏼

*!! 12, मई,2026 !!*
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत✨🔱*
*!! ॐ भूर्भुवःस्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात !!*
(भावार्थ-उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपने अंतःकरण में धारण करें, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।)

*!! शुभ संध्या !!*
आत्मीय भाईयों और बहिनों समस्त गायत्री परिजनों 🙏🏼
*महाशताब्दी वर्ष 2026*
*अखण्ड दीपक प्राकट्य शताब्दी /वंदनीय माता भगवती देवी शर्मा के प्राकट्य दिवस की जन्म शताब्दी (1926 से 2026 ) महायज्ञ की पूर्व घोषणा शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा दिव्य कलश ज्योति यात्राओं के माध्यम से की जा चुकी है जिसका शुभारंभ गायत्री ज्ञान मंदिर उरई(जालौन) द्वारा चैत्र नवरात्र की नवदुर्गा से किया जा चुका है। लक्ष्य है जन - जन तक युग साहित्य को पहुंचाना ।* *माध्यम हैं6 - दीप यज्ञ/ यज्ञ/बलिवैश्वदेव यज्ञ, गायत्री मंत्र जप ।परिजनों के समस्त संस्कार निःशुल्क संपन्न कराया जाना घर - घर जाकर ( युग साहित्य छोला छाप पुस्तकालय के माध्यम से) साहित्य पढ़ाना ।*
_अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना , प्रज्ञा पाक्षिक, पढ़ने के लिए प्रेरित करना ।_

*यूट्यूब चैनल,व्हाट्सएप/फेसबुक के माध्यम से ज्ञान यज्ञ करना.. एवं वसोधारा का क्रम ज्ञान यज्ञ के मध्यम से अग्नि प्रज्वलित रखने हेतु युग साहित्य के लेखों और पुस्तकों को टाइप कर/vdo बनाकर निरंतर आहुतियां देना ।*
परमपूज्य द्वारा- (वांग्मय01) पृष्ठ 216 में कहा है :-
*दो कदम आप भी बढ़ाएं*
इस विदाई की बेला में हम दो उत्तरदायित्व प्रिय परिजनों को सौंप कर जा रहे हैं --
*1- ज्ञान यज्ञ में निरंतर आहुतियां देते रहने से कोई जी न चुराए ।*
*2- युग- परिवर्तन के लिए अनिवार्य संघर्ष में अपना भाग पूरा करने से मुख न छुपाए ।*
*जो हमें प्यार करते हो ,हमारे प्रति ममता और आत्मीयता सचमुच ही रखते हो, वे उपर्युक्त दोनों ही बातें नोट कर लें । हम हर परिजन की वास्तविकता इसी कसौटी पर कसकर परखते रहेंगे ।*
*✍ युगऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्य🙏🏼*

*दिव्य ज्योति कलश ज्ञानामृत को जन जन तक पहुंचाने के लिए ज्ञान यज्ञ में गायत्री ज्ञान मंदिर उरई द्वारा अपनी आहुतियां समर्पित की जा रही है। आप भी यही करें।* 😊🪔

ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत, अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2), श्रद्धेय डॉ. प्रणव पंड्या (शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पुस्तक है। यह पुस्तक पातञ्जल योग दर्शन के 'साधनपाद' पर आधारित सरल हिंदी भावार्थ दीपिका है, जो साधकों को मन और चेतना की गहराई में उतरने का मार्ग दिखाती है।,को आपको पढ़कर सुनाते हैं...

*पुस्तक के मुख्य बिंदु* (Antarjagat ki Yatra - Part 2)
*:मूल आधार:*
यह पुस्तक महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों के 'साधनपाद' (साधना के चरण) की व्याख्या करती है।
*अन्तर्जगत का विज्ञान:*
बाहरी दुनिया की यात्रा के विपरीत, यह पुस्तक आंतरिक दुनिया (मन, बुद्धि, चित्त) को व्यवस्थित और उन्नत करने का विज्ञान समझाती है।
*साधना और संयम:* इसमें बताया गया है कि कैसे योग, साधना और संयम के द्वारा मानसिक शक्तियों को जागृत किया जा सकता है।
*भूमिका (डा. प्रणव पंड्या):*
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. पंड्या ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योग की कठिन क्रियाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है, ताकि सामान्य व्यक्ति भी इसे समझ सके।
*प्रकाशक:*
यह पुस्तक श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट, शांतिकुंज, हरिद्वार (AWGP) द्वारा प्रकाशित है।

*:पुस्तक का सार:*
*(अंतर्वाणी - विचार)*
पुस्तक का उद्देश्य पाठक को यह समझाना है कि सच्चा सुख और शक्ति बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। इसके लिए चित्त की शुद्धि और एकाग्रता आवश्यक है। भाग 2 में योग के व्यावहारिक साधनों (साधनपाद) पर विशेष जोर दिया गया है, जो साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं।

संकलन - संपादन
*!! मां तारा कुँज!!*
**प्रज्ञा महिला मंडल/बाल संस्कार शाला,*प्रज्ञा संस्थान,गायत्री ज्ञान मंदिर 3798, पटेल नगर , वी मार्ट के सामने,बद्री सिंह,पूर्व विधायक गली में, जयराम स्कूल के पास,उरई (जालौन),उ.प्र. 285001*
*mb.997191759p5*

"अन्तर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग 2)" डॉ. प्रणव पंड्या जी (AWGP - शांतिकुंज, हरिद्वार) द्वारा लिखित एक अत्यंत महत.....

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