16/01/2026
🙏🌼 स्वयम् में स्वयम् ज्योति समाई 🌼🙏
परम पूजनीय संत शिरोमणि सतगुरु चिरंजी पारख जी का जीवन समर्पण, सेवा और मानव कल्याण की मूल भावना का प्रतिरूप रहा। उनका जन्म 15 फरवरी, 1940 को भठिंडा (पंजाब) में पिता चंद्रजी और माता चंपा के घर हुआ था, और उन्होंने जीवन की शुरुआत से ही परमात्मा की ओर झुकाव और साधना में गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने पाया कि जीव जन सामान्य अपने जीवन का सही लक्ष्य नहीं जानते, तथा वे अंधविश्वासों, कुरीतियों और झूठे धार्मिक आडम्बरों में फँसे हुए थे। सतगुरु जी ने जीवन का सच्चा लक्ष्य यह बताया कि मनुष्य को “स्वयम् मालिक” अर्थात जगत पालनहार, जो इस संसार का सिरजनहार और पालनहार है, के नाम से जोड़ा जाना चाहिए, न कि प्रथाओं और अंध-रीति-रिवाज़ों में उलझा रहना चाहिए।
1989 में, 12 मई को, उन्होंने अपने जीवन के महान कार्य की रूपरेखा के रूप में “संत चिरंजी पारख धर्म सभा (रजि०)” की स्थापना परमधाम पाटन उदयपुरी से की। सतगुरु जी का जीवन साधारण सत्संगों से लेकर गाँव, कस्बे और शहरों तक जीवित आत्माओं को धर्म की सच्ची धारणा प्रदान करने, कर्म और सत्कर्म का महत्व समझाने और सबको नाम सुमिरन और सच्चे जीवन के उद्देश्य की शिक्षा देने में लगा रहा। उन्होंने न केवल आदिवासी समाज की सामाजिक चुनौतियों—जैसे भूत पूजा, मूर्ति पूजा, नशाखोरी, दहेज प्रथा और अन्य अंधविश्वासों—का विरोध किया, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और आत्म-शुद्धि के मार्ग पर सबको प्रेरित किया।
सतगुरु चिरंजी पारख जी ने अपने उपदेशों में यह सिखाया कि जीवन का उच्चतम लक्ष्य केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि स्वयम् मालिक के प्रति अटूट विश्वास, धर्म की सच्ची धारणा, कर्मशील जीवन और सत्कर्मों द्वारा आत्मा की उन्नति है। वे सदैव यह समझाते थे कि दान देना, मेहनत की कमाई का सर्वोच्च मान और सदा नाम का सुमिरन जीवन को अर्थपूर्ण बनाते हैं, न कि आडम्बर और कुरीतियाँ। उनकी स्वयम् ज्योति 16 जनवरी, 2016 को ईच्छा अनुसार स्वयम् ज्योत में समा गई, परंतु उनके उपदेश और वाणी आज भी अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक प्रकाश की तरह जीवित हैं।
-- द्वारा --
वीर सिंह पारखी
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
संत चिरंजी पारख धर्म सभा(रजि०)
मुख्यालय: परम धाम पाटन उदयपुरी।
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