Lalasar sathri dham

Lalasar sathri dham जाम्भोजी का जन्म सन् 1451 ई० में नागौर जि?

BISHNOI: AN ECO-THEOLOGICAL “NEW RELIGIOUS MOVEMENT” INTHE INDIAN DESERT(Published in the Journal of Vaishnava Studies, 19.1, August 2010)ABSTRACT:
Although Rajasthan is the “desert” state in the North West of India, it has been a fertile ground for interreligious interactions for last several centuries, welcoming or battling the new groups entering South Asia. In this article I present my fieldw

ork done with theBishnois, a Rajasthani community that transcends the boundaries of Hinduism and Islam.Although Bishnois are now considered a caste-group within the Hindu community, they wereclassified with Muslims in 1891 Census of Marwar. I also note that despite the several commonelements of Hindu and Muslim practices and ideas in this community, at present the Bishnoisreject any connection with Islam. I conclude that this “Hinduization” can be contextualized withsimilar process taking place with several other “liminal” communities.

01/01/2018

NAVAN PARNAM MERE PYARE FRIENDS KO !!!
HAPPY NEW YEAR KI BAHUT BAHUT SHUBHKAMNAYE 2018

17/12/2017

Hello frindes
Navan Parnam 👏👏

23/09/2017

Navan parnam 🙏🙏🙏🙏🙏

31/08/2017

Hello Frindes
My Page Like 500 + PEOPLE
I'am Very Happy Today

जाम्भोजी का जन्म सन् 1451 ई० में नागौर जि?

13/08/2017

Radha ki bhakti,
murli ki mithas,
Makhan ka swaad aur gopiyo ka raas,
Sab milke banta hai janmastmi ka din khaas..
Happy Krishna Janmastmi!!

04/07/2017

राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि में सिर्फ वीर ही नहीं, कई ऐसे संतों ने भी जन्म लिया जिन्होंने भक्ति, ईश्वर साधना, आत्मबोध के साथ ही तत्कालीन समाज में फैली बुराइयों को जड़ से समाप्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किये. इन संतों को उनके सुकृत्यों के कारण यहाँ की जनता ने भरपूर आदर दिया व इनकी लोक देवता के रूप में पूजा-अर्चना शुरू की. इन विविध लोक-देवों की उपासना वैसे तो अंध-विश्वास पर आधारित रही है व बुद्धिजीवियों की इन पर कोई श्रद्धा नहीं रही, फिर भी आम जनमानस में इनके प्रति दृढ़ निष्ठा ने सहस्रों साधारण स्तर के नर-नारियों को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया है।

Jambhoji
इनके जीवन-वृत्त पर मनन करने से ऐसा वर्ग इस नतीजे पर पहुँचा है कि जगत् का नियन्ता कोई ऊपरी शक्ति है और चमत्कार से धार्मिक जीवन का घना सम्बन्ध है। इस प्रकार के विश्वास से प्रेरित होकर इन लोक-देवों के अनुयायी बिना किसी छुआछुत, ऊँच-नीच, भेदभाव के एक स्थान पर एकत्रित होते हैं और जातीय व धार्मिक एकसूत्रता का अनुभव कर साम्प्रदायिक सौहार्द व समानता की मिशाल कायम करते हैं। सबसे बड़ा महत्त्व इस प्रकार के स्थानीय लोक देवों में विश्वास का यह है कि अधिकांश जनता ने बिना धर्म सम्बन्धी दर्शन के शास्त्रार्थ में पड़े एकता ध्यान और नैतिक जीवन के तत्त्वों को समझने में सफलता प्राप्त की।

इनके अनुयायियों में आज भी अच्छे सिद्ध-पुरुष दिखायी देते हैं जो एक तरह से निरक्षर हैं परन्तु जिनका आत्मबोध स्तुत्य है और जिनका ईश्वर के प्रति प्रेम प्रगाढ है। राजस्थान के शासक वर्ग क्षत्रिय जाति में रावल मल्लीनाथ, बाबा रामदेव तंवर (Baba Ramdev sa peer), गोगा जी चौहान (Gogaji Chauhan), तेजाजी (Veer Tejoji), हडबू जी सांखला (hadbuji sankhla), पाबूजी राठौड़ (Pabuji Rathore) आदि लोक देवताओं की एक लम्बी श्रंखला रही है, जिन्होंने अपने शासकीय धर्म के निवर्हन के साथ लोक-कल्याणकारी कार्यों में आत्मोसर्ग कर, सादा तथा सदाचारी जीवन जी कर, तत्कालीन समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के उपाय बताकर, आम जन को बिना ऊँच-नीच अपने सीने से लगाकर देवत्व को प्राप्त किया. क्षत्रिय संतों की इसी श्रंखला में विश्नोई समाज के प्रवर्तक जाम्भोजी का नाम बड़े सम्मान के साथ प्रसिद्ध है. उनके सम्बन्ध में बतायी गयी वाणी में परमतत्त्व की विवेचना मिलती है जो अनुभव-प्रधान हो सकती है। संसार के मिथ्या होने पर भी उन्होंने समन्वय की प्रवृत्ति को प्रधानता दी। दान, तीर्थ आदि के सम्बन्ध में उन्होंने उपेक्षा करते हुए ‘शील-स्नान" को उत्तम बताया। पाखण्ड को अधर्म और पवित्र जीवन को धार्मिक बताया । विष्णु की भक्ति में अर्चन करने पर बल देते हुए कुरीतियों से बचने के उपाय भी उन्होंने सुझाये। समाज-सुधारक की भाँति जाम्भोजी ने विधवा विवाह पर बल दिया। मुसलमानों के अनुरूप मुर्दो को गाढ़ना उन्होंने ठीक बताया।
उनके ये सभी अनुभव 29 शिक्षा के नाम से जाने जाते हैं और इनका पालन करने वाले "विष्णोई' (विश्नोई) नाम से सम्बोधित किये जाते हैं। इन मतावलम्बियों का अपने जीवन और विचारों का एक तरीका है जिससे वे स्वतः एक समाज बनाते हैं। इनको एक सूत्र में गठित करने का श्रेय जाम्भोजी (Jambhoji) को है। आज भी विष्णोई समाज, जिसमें अधिकांश में जाट हैं, अपने ढंग से स्वतन्त्र विचारों का है और उसकी अपनी इकाई है।

👍 Shri Guru Jambheshwar Bhagwan 👏👏
04/07/2017

👍 Shri Guru Jambheshwar Bhagwan 👏👏

23/06/2017

HELLO! Like me Page..!!

जाम्भोजी का जन्म सन् 1451 ई० में नागौर जि?

Navan parnam..!!
23/06/2017

Navan parnam..!!

Hello navan parnam ji
23/05/2017

Hello navan parnam ji

12/03/2017

भूमि के लिए प्यारे देश के लिए, हँस के प्राण तज दिए , बिन कहे बिन सुने माँ भारती के लाल की महान् आत्मा चली है । शहीद जगदीश बिश्नोई को बारम्बार प्रणाम ।।

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