04/07/2017
राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि में सिर्फ वीर ही नहीं, कई ऐसे संतों ने भी जन्म लिया जिन्होंने भक्ति, ईश्वर साधना, आत्मबोध के साथ ही तत्कालीन समाज में फैली बुराइयों को जड़ से समाप्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किये. इन संतों को उनके सुकृत्यों के कारण यहाँ की जनता ने भरपूर आदर दिया व इनकी लोक देवता के रूप में पूजा-अर्चना शुरू की. इन विविध लोक-देवों की उपासना वैसे तो अंध-विश्वास पर आधारित रही है व बुद्धिजीवियों की इन पर कोई श्रद्धा नहीं रही, फिर भी आम जनमानस में इनके प्रति दृढ़ निष्ठा ने सहस्रों साधारण स्तर के नर-नारियों को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया है।
Jambhoji
इनके जीवन-वृत्त पर मनन करने से ऐसा वर्ग इस नतीजे पर पहुँचा है कि जगत् का नियन्ता कोई ऊपरी शक्ति है और चमत्कार से धार्मिक जीवन का घना सम्बन्ध है। इस प्रकार के विश्वास से प्रेरित होकर इन लोक-देवों के अनुयायी बिना किसी छुआछुत, ऊँच-नीच, भेदभाव के एक स्थान पर एकत्रित होते हैं और जातीय व धार्मिक एकसूत्रता का अनुभव कर साम्प्रदायिक सौहार्द व समानता की मिशाल कायम करते हैं। सबसे बड़ा महत्त्व इस प्रकार के स्थानीय लोक देवों में विश्वास का यह है कि अधिकांश जनता ने बिना धर्म सम्बन्धी दर्शन के शास्त्रार्थ में पड़े एकता ध्यान और नैतिक जीवन के तत्त्वों को समझने में सफलता प्राप्त की।
इनके अनुयायियों में आज भी अच्छे सिद्ध-पुरुष दिखायी देते हैं जो एक तरह से निरक्षर हैं परन्तु जिनका आत्मबोध स्तुत्य है और जिनका ईश्वर के प्रति प्रेम प्रगाढ है। राजस्थान के शासक वर्ग क्षत्रिय जाति में रावल मल्लीनाथ, बाबा रामदेव तंवर (Baba Ramdev sa peer), गोगा जी चौहान (Gogaji Chauhan), तेजाजी (Veer Tejoji), हडबू जी सांखला (hadbuji sankhla), पाबूजी राठौड़ (Pabuji Rathore) आदि लोक देवताओं की एक लम्बी श्रंखला रही है, जिन्होंने अपने शासकीय धर्म के निवर्हन के साथ लोक-कल्याणकारी कार्यों में आत्मोसर्ग कर, सादा तथा सदाचारी जीवन जी कर, तत्कालीन समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के उपाय बताकर, आम जन को बिना ऊँच-नीच अपने सीने से लगाकर देवत्व को प्राप्त किया. क्षत्रिय संतों की इसी श्रंखला में विश्नोई समाज के प्रवर्तक जाम्भोजी का नाम बड़े सम्मान के साथ प्रसिद्ध है. उनके सम्बन्ध में बतायी गयी वाणी में परमतत्त्व की विवेचना मिलती है जो अनुभव-प्रधान हो सकती है। संसार के मिथ्या होने पर भी उन्होंने समन्वय की प्रवृत्ति को प्रधानता दी। दान, तीर्थ आदि के सम्बन्ध में उन्होंने उपेक्षा करते हुए ‘शील-स्नान" को उत्तम बताया। पाखण्ड को अधर्म और पवित्र जीवन को धार्मिक बताया । विष्णु की भक्ति में अर्चन करने पर बल देते हुए कुरीतियों से बचने के उपाय भी उन्होंने सुझाये। समाज-सुधारक की भाँति जाम्भोजी ने विधवा विवाह पर बल दिया। मुसलमानों के अनुरूप मुर्दो को गाढ़ना उन्होंने ठीक बताया।
उनके ये सभी अनुभव 29 शिक्षा के नाम से जाने जाते हैं और इनका पालन करने वाले "विष्णोई' (विश्नोई) नाम से सम्बोधित किये जाते हैं। इन मतावलम्बियों का अपने जीवन और विचारों का एक तरीका है जिससे वे स्वतः एक समाज बनाते हैं। इनको एक सूत्र में गठित करने का श्रेय जाम्भोजी (Jambhoji) को है। आज भी विष्णोई समाज, जिसमें अधिकांश में जाट हैं, अपने ढंग से स्वतन्त्र विचारों का है और उसकी अपनी इकाई है।