24/03/2022
अभी एक पोस्ट मुझे किसी ने भेजी उसमे लिखा था की " ठाकुर तो शराब ,शबाब और कबाब के चक्कर में बर्बाद हो गए". राजपूत ऐसी बातो को पढ़ डिफेंसिव हो जाते हैं और लिखने ,बोलने लगते हैं की हां भाई हां बिल्कुल सही बोल रहे आप ।
कितने राजपूतों को शराब पीकर बर्बाद होते देखा है आज तक ? आपके चाचा , ताऊ बर्बाद हो भी गए हों तो इसका मतलब यह नहीं होता की सारे राजपूत शराब की वजह से बर्बाद हो गए। आप डाटा से क्रॉस वेरिफाई करिए और उसके लिए आप बताइए की आपके आस पास हजार राजपूत परिवार में कितने परिवार शराब से बर्बाद हो गए ? नशा को जायज नहीं ठहराया जा रहा है लेकिन मिथ्या बातो पर हामी भर देते हैं हम लोग बिना सोचे समझे । मेरे तीन पुस्त में कोई नही पीता।मेरे पूरे गांव में जिसकी आबादी हजार से ज्यादा है वहां आज भी गिनती के पांच , सात लोग पीते हैं । आप अपने आस पास नजर घुमा कर देखिए कि क्या हालत है ?होता यह है की एक ,दो की बर्बादी शराब की वजह से हुई तो पूरे समाज पर ही थोप दिया जाने लगा की ठाकुर तो दारू पीकर बर्बाद हो गए। हम अपने गांव,समाज को पूरी तरह समझने की कोशिश नही करते और चंद लोगो के कृत्य को देख धारना बना लेते हैं या कोई और कुछ लिख ,बोल देता है तो उसे बिना सोचे ,समझे स्वीकार कर लेते हैं।
दूसरी बात कही जाती है की ठाकुर तो कबाब के चक्कर में बर्बाद हो गए ।मतलब हद है ,भोजन या कहिए मांसाहारी भोजन के चक्कर में ठाकुर निपट गए ? कितनो को देखा है भाई जमीन बेच कर भोजन करते हुए? अपने आस पास ही देखिए ।शायद एक ,दो होंगे पर क्या वो पूरे समाज का ही चरित्र है ?
तीसरी बात तो और भी बुरी है ।लिखा है की ठाकुर तो शबाब यानी लड़की के चक्कर में बर्बाद हो गए।लड़की के चक्कर में कैसे बर्बाद हुए? क्या जमीन बेच किसी को उपहार देते रहे हैं ? यदि ऐसे लोग हैं भी तो कितने हैं ?हमे बिना अपने समाज को पूर्ण रूप से समझे किसी बात को स्वीकार नही करना चाहिए।
कुछ लोग यदि इन बातो पर खड़े उतरते हैं तो वो अपवाद ही हैं ।
अब बात करते हैं की क्या राजपूतों की जमीन बिकी या उनकी आर्थिक हालत खराब हुई तो यह सच है ।उसकी वजह यह है की समय के साथ सभी चीजे महगी होती चली गई और खेती से उतनी आय नही रह गई और ठाकुर क्यूंकि शिक्षा और नौकरी से दूर रहते थे तो उनके हांथ में कैश भी नही होता था। अब राजपूतों के साथ दिक्कत थी की उन्हे गांव में पुरखों वाली स्टेटस भी बना के रखनी थी तो उसमे खर्च तो होगा ही।दादा ने बेटी की शादी में हजार लोगो को खिलाया तो पोते को भी उसी परंपरा को निभाते हुए हजार लोगो को खाना खिलाना पड़ा ।दादा ने आधा किलो चांदी दिया ,दो सौ ग्राम सोना दिया था तो पोते को भी वो निभाना पड़ा।दादा के समय सुबह ,शाम पचास लोग दरवाजे पर बैठे रहते और उनके चाय ,नाश्ते का प्रबंध होता था ।यही परंपरा पोते ने भी निभाई ।
परंपरा निभाने में खर्च होता है ।दादा के समय से पोते का समय बदल चुका है ।अब उसी परंपरा को निभाने में जितना पैसा चाहिए वो जमीन पर निर्भर पोते के पास नही है ।इसी में ज्यादातर जमीन बिकी ।बेटी की शादी ,गांव में अपने स्टेटस को बचाए रखने में ही आर्थिक रूप से कमर टूटी ।ऊपर से शुरू में ना शिक्षित थे ना ही नौकरी थी और ना ही व्यापार में थे तो कैश आमदनी के श्रोत तो बंद ही थे ।अनाज बेच जितना आया उतना पैसा ही पास में होता था।
ठाकुर " शराब ,शबाब ,कबाब में बर्बाद नही हुआ बल्कि परंपरा जो घर की थी उसे निभाने में कमर टूटी ,अशिक्षा और नौकरी एवम व्यापार से दूर रहने की वजह से कमर टूटी ". अब धीरे धीरे वक्त बदल रहा है ।राजपूत अब पढ़ने लगे हैं ,जहां नौकरी मिलती है वहां जाने लगे हैं ,व्यापार भी करते हैं।अब कई को देखा है की जितना खो दिया था उतना मेहनत से पुनः पा चुके हैं।
आखिरी बात यह याद रखिएगा की ज्यादातर राजपूत सैनिक या छोटे किसान थे ।उनके पास खोने को कुछ बीघे की जमीन और इज्जत के अलावे रही ही कब क्या?
तो यह शराब ,शबाब ,कबाब वाली बातो पर आंख मूंद कर सर ना हिलाइए ।ये बाते ज्यादातर गिल्ट फीलिंग डालने के लिए लिखी जाती है ।आपको सत्य से विमुख कर ,आपके समाज को भ्रष्ट दिखाने के लिए लिखी जाती है।
जिनकी हालत खराब हुई उनमें कुछ को छोड़ वजह सिर्फ यह रही की जमीन से उतनी आय नही रह गई , जितने खर्च थे और वो खर्च के साथ समझौता नहीं कर पाएं।शिक्षित कम लोग थे ,सिविल की नौकरी में जाना पसंद नही था ,व्यापार नही करना चाहते थे ।बस यही वजह रही जो झटका लगा।
यदि मेरी बाते गलत हैं तो बताइए ।जो मैने देखा है वो लिखा है यहां पर ।