निर्मल बाबा मंदिर, निर्मली

  • Home
  • India
  • Nirmali
  • निर्मल बाबा मंदिर, निर्मली

निर्मल बाबा मंदिर, निर्मली !!卐!! जय निर्मल बाबा !!卐!!

कल्याणकारी मंत्रोउचारण । #संस्कृत    #संस्कृतकाउदय
02/12/2022

कल्याणकारी मंत्रोउचारण ।

#संस्कृत
#संस्कृतकाउदय

!! शुभ धनत्रयोदशी !!क्षीरोदमथनोद्भूतं दिव्यगन्धानुलेपिनम् !सुधाकलशहस्तं तं वन्दे धन्वन्तरिं हरिम् !!जिसका उद्भव समुद्र-म...
22/10/2022

!! शुभ धनत्रयोदशी !!

क्षीरोदमथनोद्भूतं दिव्यगन्धानुलेपिनम् !
सुधाकलशहस्तं तं वन्दे धन्वन्तरिं हरिम् !!

जिसका उद्भव समुद्र-मंथन से हुआ, जो दिव्य गन्धों से लिप्त है, जिसके हाथों में अमृत-कलश है, उस धन्वन्तरि को नमन है !

#शुभधनत्रयोदशी #धनत्रयोदशी
#धन्वन्तरिस्तोत्रम् #धनतेरस #भगवानधन्वन्तरि #राष्ट्रीयआयुर्वेददिवस #आयुर्वेद #वैद्य #आरोग्य #देवता #संस्कृत #संस्कृतकाउदय #त्योहार




वाल्मिकी रामायण में सीता माता द्वारा पिंडदान देकर राजा दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का संदर्भ आता हैवनवास के दौरान भगवान...
10/09/2022

वाल्मिकी रामायण में सीता माता द्वारा पिंडदान देकर राजा दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का संदर्भ आता है
वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता पितृ पक्ष के वक़्त श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे
वहाँ ब्राह्मण द्वारा बताए श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु श्री राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए,

ब्राह्मण देव ने माता सीता को आग्रह किया कि पिंडदान का कुतप समय निकलता जा रहा है
यह सुनकर सीता जी की व्यग्रता भी बढ़ती जा रही थी क्योंकि
श्री राम और लक्ष्मण अभी नहीं लौटे थे
इसी उपरांत दशरथ जी की आत्मा ने उन्हें आभास कराया की पिंड दान का वक़्त बीता जा रहा है
यह जानकर माता सीता असमंजस में पड़ गई
तब माता सीता ने समय के महत्व को समझते हुए यह निर्णय लिया कि वह स्वयं अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान करेंगी,

उन्होंने फल्गू नदी के साथ साथ वहाँ उपसथित वटवृक्ष, कौआ, तुलसी, ब्राह्मण और गाय को साक्षी मानकर स्वर्गीय राजा दशरथ का का पिंडदान पुरी विधि विधान के साथ किया
इस क्रिया के उपरांत जैसे ही उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की तो राजा दशरथ ने माता सीता का पिंड दान स्वीकार किया
माता सीता को इस बात से प्रफुल्लित हुई कि उनकी पूजा दशरथ जी ने स्वीकार कर ली है
पर वह यह भी जानती थी कि प्रभु राम इस बात को नहीं मानेंगे क्योंकि पिंड दान पुत्र के बिना नहीं हो सकता है,

थोड़ी देर बाद भगवान राम और लक्ष्मण सामग्री लेकर आए और पिंड दान के विषय में पूछा
तब माता सीता ने कहा कि समय निकल जाने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया
प्रभु राम को इस बात का विश्वास नहीं हो रहा था कि बिना पुत्र और बिना सामग्री के पिंडदान कैसे संपन्न और स्वीकार हो सकता है
तब सीता जी ने कहा कि वहाँ
उपस्थित फल्गू नदी, तुलसी, कौआ, गाय, वटवृक्ष और ब्राह्मण उनके द्वारा किए गए श्राद्धकर्म की गवाही दे सकते हैं,

भगवान राम ने जब इन सब से पिंडदान किये जाने की बात सच है या नहीं यह पूछा,
तब फल्गू नदी, गाय, कौआ, तुलसी और ब्राह्मण पांचों ने प्रभु राम का क्रोध देखकर झूठ बोल दिया कि माता सीता ने कोई पिंडदान नहीं किया
सिर्फ वटवृक्ष ने सत्य कहा कि माता सीता ने सबको साक्षी रखकर विधि पूर्वक राजा दशरथ का पिंड दान किया
पांचों साक्षी द्वारा झूठ बोलने पर माता सीता ने क्रोधित होकर उन्हें आजीवन श्राप दिया,

फल्गू नदी को श्राप दिया कि वोह सिर्फ नाम की नदी रहेगी,
उसमें पानी नहीं रहेगा
इसी कारण फल्गू नदी आज भी गया में सूखी है
गाय को श्राप दिया कि गाय पूजनीय होकर भी सिर्फ उसके पिछले हिस्से की पूजा की जाएगी और गाय को खाने के लिए दर बदर भटकना पड़ेगा
आज भी हिन्दू धर्म में गाय के सिर्फ पिछले हिस्से की पूजा की जाती है,

माता सीता ने ब्राह्मण को कभी भी संतुष्ट न होने और कितना भी मिले उसकी दरिद्रता हमेशा बनी रहेगी का श्राप दिया
इसी कारण ब्राह्मण कभी दान दक्षिणा के बाद भी संतुष्ट नहीं होते हैं सीताजी ने तुलसी को श्राप दिया कि वह कभी भी गया कि मिट्टी में नहीं उगेगी
यह आज तक सत्य है कि गया कि मिट्टी में तुलसी नहीं फलती
और कौवे को हमेशा लड़ झगड कर खाने का श्राप दिया था
अतः कौआ आज भी खाना अकेले नहीं खाता है,

सीता माता द्वारा दिए गए इन श्रापों का प्रभाव आज भी इन पांचों में देखा जा सकता है,
जहाँ इन पांचों को श्राप मिला वहीं सच बोलने पर माता सीता ने
वट वृक्ष को आशीर्वाद दिया कि उसे लंबी आयु प्राप्त होगी
और वह दूसरों को छाया प्रदान करेगा तथा पतिव्रता स्त्री उनका स्मरण करके अपने पति की दीर्घायु की कामना करेगी
जय सियाराम 🙏🙏
#संस्कृत_का_उदय

जय बजरंग बली हनुमान ।।
09/08/2022

जय बजरंग बली हनुमान ।।

03/08/2022

आटा गूंथने के बाद गृहणियां उस पर उँगलियों से निशान क्यूँ बनाती हैं!!

सनातन परम्परा में अगर ऐसा नहीं किया जाए तो आटे को पिंड का रूप मानते हैं जो कि हिंदू धर्म में अशुभ होता है

हिंदू धर्म में पूर्वजों एवं मृत आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए पिंड दान की विधि बताई गई है।

पिंडदान के लिए जब आटे की लोई (जिसे पिंड कहते हैं ) बनाई जाती है तो वह बिल्कुल गोल होती है। इसका आशय होता है कि यह गूंथा हुआ आटा पूर्वजों के लिए है।

मान्यता है कि इस तरह का आटा देखकर पूर्वज किसी भी रूप में आते हैं और उसे ग्रहण करते हैं।

यही कारण है कि जब मनुष्यों के ग्रहण करने के लिए आटा गूंथा जाता है तो उसमें उंगलियों के निशान बना दिए जाते हैं।

ताकि वह पिंड न रहे, यह निशान इस बात का प्रतीक होते हैं कि रखा हुआ आटा या लोई पूर्वजों के लिए पिंड नहीं, बल्कि परिजनो के लिए है।

इस कारण से आटे पे उंगलियों से निशान बनाए जाने की प्रथा प्रचलित है।

।। ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं  यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव       बन्धनान्  मृत्योर्मुक्षीय ...
01/08/2022

।। ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं
यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव
बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॐ स्वः भुवः भूः
ॐ सः जूं हौं ॐ ।।

जनेऊ क्या है और इसकी क्या महत्वता है?भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा क...
11/07/2022

जनेऊ क्या है और इसकी क्या महत्वता है?

भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥

जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है।

यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है।यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं।

पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

वैदिक धर्म में प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। प्रत्येक आर्य को जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए।

चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

जनेऊ के नियम :
1.यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।

2.यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित यज्ञोपवीत शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।

4.यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित करें ।

5.मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।

वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।

कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है।

जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।

जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर रहने लगता है।

14 वे शतक मे लिखे गए गुरुचरित्र ग्रंथ मे इस  तीर्थ का वर्णन आया  है काशी यात्रा का
17/05/2022

14 वे शतक मे लिखे गए गुरुचरित्र ग्रंथ मे इस तीर्थ का वर्णन आया है काशी यात्रा का

🚩 आप सभी परिजनों को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के प्रकटोत्सव की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ💐💐🌹🌹🚩
10/04/2022

🚩 आप सभी परिजनों को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के प्रकटोत्सव की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ💐💐🌹🌹🚩

कभी शुभ्र तुम, कभी यामिनीकभी उग्र तुम, कभी दामिनी!तुम चन्द्रिका,तुम चंचला,तुम चंडिका तुम स्वामिनी!कभी मुग्ध तुम, कभी क्र...
02/04/2022

कभी शुभ्र तुम, कभी यामिनी
कभी उग्र तुम, कभी दामिनी!
तुम चन्द्रिका,तुम चंचला,तुम चंडिका तुम स्वामिनी!
कभी मुग्ध तुम, कभी क्रुद्ध तुम!
कभी हो दया,कभी शुभ्र तुम!
कभी निर्झरा कात्यायनी,हर रूप में अति शुद्ध तुम!
अति रौद्र हो हे शिव प्रिया, नारायणी चित्रा जया!
हे पाटला भवमोचनी,हे महाबला हे बलप्रदा!
अति भव्य यति माहेश्वरी,हे वैष्णवी शुरू सुन्दरी!
हर रूप में हर नाम में,हे मात तुम सर्वोपरि!
(नत शीश उर स्वीकार हो,अबलम्ब हो आधार हो)-2
(तेरी कृपा की याचना,हे शाम्भवी साकार हो)-2
हिन्दू नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा,विक्रम संवत २०७९ और चैत्र नवरात्रा की सभी सनातनी हिन्दू भाइयों को हार्दिक शुभकामनाएं।। जगदम्बा दया करे......🚩🚩🚩🌺🌺🌺

18/03/2022

माधविका-परिमल-ललिते
नवमालिकयातिसुगन्धौ।
मुनिमनसामपि मोहनकारिणी
तरुणाकारणबन्धौ।।
(गीतगोविन्द - १/३३)

अर्थात् - यह वसन्त काल माधविका पुष्प की सुगन्धि से ललित और नई मालती की सुगंध से परिपूर्ण है, मुनियों के मन को भी मोहित करनेवाला है और तरूणों का सहज बन्धु है।

🙏💐🌻मङ्गलं सुप्रभातम्🌻💐🙏
वसन्तोत्सव एवम रंगोत्सव की ढेर सारी शुभकामनाएं🌾🥀🌺🌸🌷🌴🪴🌼🌞🌈

20/02/2022

🚩⚫ 🚩ॐ शं शनैश्चराय नम:🚩 ⚫🚩
🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️
ॐ नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्‌।छाया मार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्‌।।
🚩⚫ 🚩ॐ शं शनैश्चराय नम:🚩 ⚫🚩
#ॐनमोभगवतेबासुदेवाय
#ॐनमोभगवतेबासुदेवाय

Address

Nirmali, Supaul
Nirmali
847452

Telephone

+918969798743

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when निर्मल बाबा मंदिर, निर्मली posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to निर्मल बाबा मंदिर, निर्मली:

Share

Category