श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिरजी, कबूल नगर, शाहदरा, दिल्ली

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__🙏🏻 क्षमापना - क्षमावाणी पर्व 🙏🏻__"जीवन की आपाधापी में जाने-अनजाने में शब्दों से, व्यवहार से अथवा किसी भी रूप में यदि ह...
08/09/2025

__🙏🏻 क्षमापना - क्षमावाणी पर्व 🙏🏻__

"जीवन की आपाधापी में जाने-अनजाने में शब्दों से, व्यवहार से अथवा किसी भी रूप में यदि हमारे कारण आपको तनिक भी दुःख पहुँचा हो तो हम हृदय की गहराइयों से क्षमा याचना करते हैं।
मनुष्य होने के नाते भूल होना स्वाभाविक है, परंतु क्षमा माँगना और क्षमा देना ही आत्मा की सच्ची महिमा है।

🙏🏻आज क्षमावाणी पर्व के पावन अवसर पर हम आप सभी से निवेदन करते हैं कि कृपया हमारी सभी त्रुटियों को क्षमा कर दें।🙏🏻
हमारे बीच सदैव मैत्री, प्रेम और सद्भावना बनी रहे, यही हमारी प्रार्थना है।

🙏🏻 निवेदक: सकल जैन समाज, कबूल नगर 🙏🏻

आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी यानी दशलक्षण महापर्व का अंतिम और सर्वोच्च दिवस है *उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म*!‘ब्रह्मचर्य’ का अर्थ...
05/09/2025

आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी यानी दशलक्षण महापर्व का अंतिम और सर्वोच्च दिवस है *उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म*!
‘ब्रह्मचर्य’ का अर्थ है – इंद्रियों का संयम, मन-वचन-काय की पवित्रता और आत्मा में स्थिरता।

ब्रह्मचर्य केवल देह-संयम नहीं है, बल्कि मन को विकारों से मुक्त करना और आत्मा की ओर लगाना ही इसका वास्तविक स्वरूप है।

👉 क्रोध, लोभ, मान, माया – इन सबका शमन करना ही ब्रह्मचर्य है।
👉 इंद्रियों को विषयों से हटाकर आत्मा में केंद्रित करना ही ब्रह्मचर्य है।
👉 संयमित जीवन जीना और आत्मबल को जागृत करना ही ब्रह्मचर्य है।

ब्रह्मचर्य धर्म से व्यक्ति – मन से शांत, वाणी से मधुर और कर्म से पवित्र बनता है।

इंद्रिय-विजय ही सच्चा विजय है। ब्रह्मचर्य के पालन से आत्मा शुद्ध होती है और मोक्ष के मार्ग की प्राप्ति होती है।

आइए, इस अंतिम दिवस पर हम सभी उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म को जीवन का आधार बनाकर इंद्रियों पर संयम रखें, मन को निर्मल बनाएं और आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर करें।

यही ब्रह्मचर्य धर्म का वास्तविक संदेश है।
🙏🏻〽️ ॐ ह्रीं उत्तम ब्रह्मचर्य धर्मांगाय नमः 〽️🙏🏻

आज भाद्रपद शुक्ल त्रियोदशी यानी दशलक्षण महापर्व के नवम दिन की साधना है *उत्तम आकिंचन्य धर्म*।‘आकिंचन्य’ का अर्थ है – किं...
04/09/2025

आज भाद्रपद शुक्ल त्रियोदशी यानी दशलक्षण महापर्व के नवम दिन की साधना है *उत्तम आकिंचन्य धर्म*।
‘आकिंचन्य’ का अर्थ है – किंचित भी (थोड़ा सा भी) अपना न मानना अर्थात् निरासक्ति, निस्संगता और वैराग्य की भावना।

आकिंचन्य हमें यह सिखाता है कि —
👉 संसार की वस्तुएँ नश्वर और क्षणभंगुर हैं।
👉 धन, पद, मान और संबंध स्थायी नहीं हैं।
👉 केवल आत्मा ही शाश्वत और अमर है।

जब मनुष्य वस्तुओं के मोह से मुक्त होकर आत्मा की ओर उन्मुख होता है,
तभी सच्ची स्वतंत्रता और शांति का अनुभव करता है।
संसार का संग्रह जितना बढ़ता है, आत्मा उतनी ही भारी होती जाती है।
लेकिन आकिंचन्य की साधना से आत्मा हल्की होकर मोक्ष-पथ पर अग्रसर होती है।

उत्तम आकिंचन्य धर्म हमें प्रेरित करता है कि —
👉 ‘मेरा’ और ‘तेरा’ का भेद मिटाकर समभाव रखें।
👉 वस्तुओं के बजाय आत्मा के उत्थान में रुचि लें।
👉 मोह का त्याग कर वैराग्य को धारण करें।

आइए, इस पावन अवसर पर हम उत्तम आकिंचन्य धर्म की साधना करें और भौतिकता के मोह के स्थान पर आत्मिक शांति, संग्रह के स्थान पर वैराग्य और आसक्ति के स्थान पर मोक्ष का मार्ग चुनें।

यही आकिंचन्य धर्म का वास्तविक संदेश है।
🙏🏻〽️ ॐ ह्रीं उत्तम आकिंचन्य धर्मांगाय नमः 〽️🙏🏻

आज भाद्रपद शुक्ल द्वादशी यानी दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन की साधना है *उत्तम त्याग धर्म*।‘त्याग’ का अर्थ है — आसक्ति, म...
03/09/2025

आज भाद्रपद शुक्ल द्वादशी यानी दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन की साधना है *उत्तम त्याग धर्म*।
‘त्याग’ का अर्थ है — आसक्ति, मोह और स्वार्थ का परित्याग।

त्याग केवल वस्तुओं का छोड़ना नहीं है,
बल्कि अंतरात्मा से आसक्ति का त्याग करना ही सच्चा त्याग है।
जिस मनुष्य ने त्याग की भावना अपनाई, वही जीवन के असली सुख और शांति को प्राप्त करता है।

👉 धन का त्याग दान है।
👉 अहंकार का त्याग विनम्रता है।
👉 क्रोध का त्याग शांति है।
👉 और मोह का त्याग ही मुक्ति का मार्ग है।

त्याग धर्म हमें सिखाता है कि —
👉 अधिक संग्रह और लोभ हमें बंधन में डालते हैं,
👉 जबकि त्याग हमें हल्का, स्वतंत्र और आनंदमय बनाता है।

संसार की वस्तुएँ नश्वर हैं, परंतु त्याग से आत्मा अमरत्व की ओर अग्रसर होती है।
त्याग वह पुल है जो भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर ले जाता है।

आइए, इस पावन अवसर पर हम उत्तम त्याग धर्म की भावना अपनाएँ और स्वार्थ के स्थान पर परोपकार, आसक्ति के स्थान पर आत्मबल और मोह के स्थान पर मोक्ष का मार्ग चुनें।

यही त्याग धर्म का वास्तविक संदेश है।
🙏🏻〽️ ॐ ह्रीं उत्तम त्याग धर्मांगाय नमः 〽️🙏🏻

आज भाद्रपद शुक्ल एकादशी यानी दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन की साधना है *उत्तम तप धर्म*।‘तप’ का अर्थ है – आत्मा को निर्मल...
02/09/2025

आज भाद्रपद शुक्ल एकादशी यानी दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन की साधना है *उत्तम तप धर्म*।
‘तप’ का अर्थ है – आत्मा को निर्मल बनाने के लिए कषायों पर विजय प्राप्त करना और त्याग व साधना का मार्ग अपनाना।

तप दो प्रकार का होता है –
👉 बाह्य तप – उपवास, एकासन, आयम्बिल, अल्पभोजन आदि के द्वारा शरीर को साधना।
👉 आभ्यंतर तप – क्षमा, विनय, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान और संयम के द्वारा आत्मा का परिष्कार।

सिर्फ बाह्य उपवास करना ही तप नहीं है,
बल्कि वास्तविक तप वह है जिसमें मन, वचन और कर्म की शुद्धि हो।
भोजन का त्याग आसान है, लेकिन क्रोध, लोभ और मोह का त्याग ही सच्चा तप है।

उत्तम तप धर्म हमें यह सिखाता है कि —
👉 तप से आत्मा का तेज प्रकट होता है।
👉 तप से इंद्रियों पर नियंत्रण आता है।
👉 और तप से आत्मा के भीतर छिपा दिव्य प्रकाश प्रकट होता है।

आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी उत्तम तप धर्म को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर
भोग-विलास से दूर होकर संयम और साधना का मार्ग चुनें,
आत्मा की शक्ति को जागृत करें,
और सच्चे धर्म की अनुभूति प्राप्त करें।

यही तप धर्म का वास्तविक संदेश है।
🙏🏻〽️ ॐ ह्रीं उत्तम तप धर्मांगाय नमः 〽️🙏🏻

आज भाद्रपद शुक्ल दशमी यानी दशलक्षण महापर्व के छठे दिन की साधना है *उत्तम संयम धर्म*।‘संयम’ का अर्थ है — इंद्रियों और मन ...
01/09/2025

आज भाद्रपद शुक्ल दशमी यानी दशलक्षण महापर्व के छठे दिन की साधना है *उत्तम संयम धर्म*।
‘संयम’ का अर्थ है — इंद्रियों और मन पर नियंत्रण।
संयम ही वह शक्ति है जो आत्मा को मोह, आसक्ति और कषायों के बंधन से मुक्त करती है।

👉 इंद्रियों की इच्छाओं में बहना ही बंधन है,
👉 और उन पर विजय पाना ही सच्चा संयम है।

संयम हमें यह सिखाता है कि —
👉 भोग-विलास का आकर्षण क्षणिक है,
👉 लेकिन आत्मानंद और शांति स्थायी है।

उत्तम संयम धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति —

अपनी वाणी पर संयम रखता है,

अपने भोजन में मर्यादा रखता है,

अपने आचरण में मर्यादा और पवित्रता धारण करता है।

संयम के बिना जीवन असंतुलित है और आत्मा अशांत।
संयम ही वह दीपक है जो जीवन को संतुलन, शांति और आत्मबल से प्रकाशित करता है।

आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी उत्तम संयम धर्म को अपने जीवन में अपनाएँ और वासनाओं के स्थान पर विवेक, असंयम के स्थान पर आत्मबल, और भोग के स्थान पर आत्मानंद का चयन करें।

यही संयम धर्म का वास्तविक संदेश है।
🙏🏻〽️ ॐ ह्रीं उत्तम संयम धर्मांगाय नमः 〽️🙏🏻

आज भाद्रपद शुक्ल नवमी यानी दशलक्षण महापर्व के पाँचवें दिन की साधना है 'उत्तम सत्य धर्म'।‘सत्य’ केवल वचन की सच्चाई नहीं, ...
31/08/2025

आज भाद्रपद शुक्ल नवमी यानी दशलक्षण महापर्व के पाँचवें दिन की साधना है 'उत्तम सत्य धर्म'।
‘सत्य’ केवल वचन की सच्चाई नहीं, बल्कि विचारों, भावों और कर्मों की शुद्धता भी है।

सत्य धर्म हमें यह सिखाता है कि —
👉 झूठ और मिथ्या से आत्मा बोझिल होती है,
👉 जबकि सत्य से आत्मा प्रकाशमान और निर्भय बनती है।

सत्य बोलना केवल शब्दों का कार्य नहीं, यह तो आत्मा की पवित्रता का प्रतिबिंब है।
सत्य के बिना धर्म अधूरा है और जीवन का कोई वास्तविक मूल्य नहीं।
महापुरुषों का तेज, साधु-साध्वियों की आभा और धर्म का गौरव – सभी का मूल आधार सत्य ही है।

उत्तम सत्य का अर्थ है —
👉 ऐसा सत्य जो किसी के लिए अहितकारी न हो,
👉 ऐसा सत्य जो करुणा और संयम से युक्त हो,
👉 ऐसा सत्य जो आत्मा को उन्नत करे।

आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी उत्तम सत्य धर्म का पालन करें और
अपने विचारों में सच्चाई,
अपने वचनों में मधुरता,
और अपने कर्मों में निष्कपटता लाएँ।

यही सत्य धर्म का वास्तविक संदेश है।
🙏〽️ॐ ह्रीं उत्तम सत्य धर्मांगाय नमः〽️🙏

31/08/2025

आज भाद्रपद शुक्ल अष्टमी यानी दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन की साधना है 'उत्तम शौच धर्म'।
‘शौच’ का अर्थ केवल बाह्य स्वच्छता नहीं, बल्कि आंतरिक पवित्रता भी है।

👉 बाह्य शौच – शरीर, वेशभूषा और परिवेश की स्वच्छता।
👉 आंतरिक शौच – मन, विचार और भावनाओं की निर्मलता।

सच्चा शौच तब है जब हम अपने भीतर से लोभ, द्वेष, ईर्ष्या, छल और क्रोध जैसे कषायों को धो डालें।
बाह्य स्नान शरीर को शुद्ध करता है, लेकिन अंतरात्मा का स्नान तभी होता है जब हम शुभ भाव, संयम और सदाचार धारण करें।

उत्तम शौच धर्म हमें सिखाता है कि –
👉 वस्त्र से नहीं, विचारों से पवित्र बनो।
👉 अलंकार से नहीं, आचरण से शोभित बनो।
👉 बाह्य सौंदर्य से नहीं, आंतरिक निर्मलता से श्रेष्ठ बनो।

आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी उत्तम शौच धर्म को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर
मन को सद्भावना से,
वाणी को सत्य और मधुरता से,
कर्म को पवित्रता से शुद्ध करें।

यही शौच धर्म का वास्तविक संदेश है।
🙏〽️ॐ ह्रीं उत्तम शौच धर्मांगाय नमः〽️🙏

आज भाद्रपद शुक्ल सप्तमी यानी दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन की साधना है उत्तम आर्जव धर्म।‘आर्जव’ का अर्थ है – सीधापन, सरलत...
30/08/2025

आज भाद्रपद शुक्ल सप्तमी यानी दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन की साधना है उत्तम आर्जव धर्म।
‘आर्जव’ का अर्थ है – सीधापन, सरलता और निष्कपटता।

मनुष्य के भीतर की सबसे बड़ी दुर्बलता है कपट और छल।
जब हमारे मन, वचन और काय (कर्म) – तीनों एक समान होते हैं, तब हमारा जीवन सत्य और धर्ममय बनता है।
आर्जव धर्म यही सिखाता है कि हमारे विचार, शब्द और कर्म में कोई विरोधाभास न हो।

आर्जव से व्यक्ति –
👉 समाज में विश्वास और आदर पाता है।
👉 आत्मा का कल्याण करता है।
👉 और धर्म की सच्ची साधना करता है।

छल, कपट और धूर्तता से आत्मा बोझिल होती है, जबकि आर्जव से आत्मा हल्की और पवित्र होती है।
सरल और निष्कपट जीवन ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है।

आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी उत्तम आर्जव धर्म का पालन करें और मन में सच्चाई, वाणी में मधुरता, कर्मों में पवित्रता लाएँ।

यही आर्जव धर्म का सच्चा संदेश है।

🙏🏻〽️ ॐ ह्रीं उत्तम आर्जव धर्मांगाय नमः 〽️🙏🏻

आज भाद्रपद शुक्ल छठ यानी दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन की साधना है उत्तम मार्दव धर्म।‘मार्दव’ का अर्थ है – हृदय में नम्रत...
29/08/2025

आज भाद्रपद शुक्ल छठ यानी दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन की साधना है उत्तम मार्दव धर्म।
‘मार्दव’ का अर्थ है – हृदय में नम्रता, कोमलता और अहंकार का पूर्ण त्याग।

अहंकार वह दीवार है जो आत्मा को बंधन में रखती है और सच्चे सुख से दूर कर देती है।
जब हम अहंकार को छोड़कर नम्र बनते हैं, तभी जीवन में सच्चा सौंदर्य और शांति आती है।

मार्दव हमें सिखाता है –
👉 अपने ज्ञान पर घमंड न करें,
👉 अपने धन पर अहंकार न करें,
👉 अपने पद या शक्ति का अभिमान न करें।

विनम्रता से ही सच्चा धर्म पुष्पित-पल्लवित होता है।
नम्र हृदय में ही करुणा, क्षमा और प्रेम के भाव स्थायी रहते हैं।

आइए, इस पावन अवसर पर हम उत्तम मार्दव धर्म को जीवन में उतारें और अहंकार के स्थान पर सरलता और नम्रता का वरण करें।
यही मार्दव धर्म का वास्तविक संदेश है।

🙏🏻〽️ ॐ ह्रीं उत्तम मार्दव धर्मांगाय नमः 〽️🙏🏻

आज भाद्रपद शुक्ल पंचमी यानी दशलक्षण महापर्व के प्रथम दिवस 'उत्तम क्षमा धर्म' की साधना का अवसर है।क्षमा ही वह महान गुण है...
28/08/2025

आज भाद्रपद शुक्ल पंचमी यानी दशलक्षण महापर्व के प्रथम दिवस 'उत्तम क्षमा धर्म' की साधना का अवसर है।

क्षमा ही वह महान गुण है जो हृदय की कठोरता को मिटाकर आत्मा को निर्मल और शांत बनाता है।
क्षमा का अर्थ केवल दूसरों को क्षमा करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर की कटुता, क्रोध, द्वेष और अहंकार को समाप्त करना भी है।

उत्तम क्षमा से मनुष्य अहिंसा, करुणा और समभाव के मार्ग पर अग्रसर होता है।
जब हम हृदय से ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहते हैं, तब हम न केवल दूसरों को क्षमा करते हैं, बल्कि स्वयं को भी मुक्त करते हैं।

आइए, इस पावन अवसर पर हम सब क्षमा धर्म को जीवन का आधार बनाकर 'द्वेष के स्थान पर प्रेम', 'क्रोध के स्थान पर शांति' और 'अहंकार के स्थान पर विनम्रता: को धारण करें, यही उत्तम क्षमा का सच्चा संदेश है।

🙏🏻〽️ ॐ ह्रीं उत्तम क्षमा धर्मांगाय नमः 〽️🙏🏻

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