हिन्दू हैं हम - गौरवगाथा

हिन्दू हैं हम - गौरवगाथा हिन्दू के गौरव गाथा

27/12/2017

सहेली ने बताया दूल्हे का गहरा राज, सुनते ही दुल्हन ने लौटा दी बारात, जानिए marriage

07/10/2016

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22/01/2016
05/11/2015

पाकिस्तान में हिन्दू होने की सज़ा

पाकिस्तान से भारत आए करीब 450 हिन्दू परिवारों पर एक खास रिपोर्ट, जो इस समय दिल्ली के अंतरराज्यीय बस अड्डे के करीब मजनूं का टीला में शरण लिए हुए हैं। पाकिस्तान में भेदभाव से तंग होकर ये लोग भारत आए हैं, और यहीं रहना चाहते हैं, लेकिन इनके पास न नौकरी है, न रहने-खाने की व्यवस्था। यहां तक कि सिर्फ दिल्ली का वीज़ा है, इसलिए दिल्ली से बाहर भी नहीं जा सकते। वैसे, इन लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मदद की गुहार की है, और इनकी परेशानी के जल्द समाधान के लिए गृहमंत्री राजनाथ सिंह 23 दिसंबर को 10 संगठनों के साथ बैठक करने वाले हैं। यह कहानी सिर्फ इन हिन्दू परिवारों तक ही सीमित नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान से पलायन कर भारत आए हिन्दुओं की संख्या लाखों में है।
वर्ष 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ, लाखों की संख्या में हिन्दू और मुसलमानों ने धर्म के आधार पर मुल्क बदला। फिर भी कुछ मुसलमान ऐसे थे, जो भारत में ही रह गए, और इसी तरह कुछ हिन्दू पाकिस्तान में। भारत ने हिन्दू राष्ट्र बनने की बजाए धर्मनिरपेक्ष राज्य बनना पसंद किया, ताकि भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक खुद को असुरक्षित न समझें, उन्हें समान अधिकार मिलें और इसके लिए भारत ने अपने संविधान में धर्म चुनने की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकारों की सूची में स्थान दिया है। भारत विभाजन से पहले मुसलमानों की संख्या भारत की कुल आबादी का 10 प्रतिशत थी, जो आज बढ़कर लगभग 15 प्रतिशत हो गई है।
लेकिन पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं की किस्मत भारतीय मुसलमानों जैसी न तब थी, न आज है। पाकिस्तान में बसे हिन्दुओं में से लगभग 96 फीसदी सिंध प्रान्त में ही रहते हैं। वर्ष 1956 में पाकिस्तान का संविधान बना और पाकिस्तान प्रगतिशील और उदारवादी विचारधाराओं को त्यागकर इस्लामिक देश बन गया, और तभी से हिन्दुओं का वहां रहना दुश्वार हो गया।

पाकिस्तान जब भी भारत के आगे मुंह की खाता, या भारत में सांप्रदायिक दंगे होते, सभी घटनाओं का दुष्परिणाम पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं को भुगतना पड़ता। चाहे वह भारत-पाक युद्ध रहा हो, या अयोध्या में विवादित ढांचे का विध्वंस, या गुजरात में हुए दंगे, पाकिस्तान के हिन्दुओं को वहां की सरकार और अवाम ने अपने गुस्से का निशाना बनाया। भारत में 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने से पाकिस्तान में हिन्दुओं के खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं। माइनॉरिटी राइट ग्रुप इंटरनेशनल के मुताबिक 2-8 दिसंबर, 1992 के दौरान पाकिस्तान में तकरीबन 120 हिन्दू मंदिरों को गिराया गया।

ज़िया-उल-हक की तानाशाही से लेकर अब तालिबान के अत्याचारों तक पाकिस्तानी हिन्दुओं का जीवन दूभर ही रहा है। आज़ादी के वक्त पाकिस्तान में कुल 428 मंदिर थे, जिनमें से अब सिर्फ 26 ही बचे हैं। पाकिस्तान में ज़्यादातर हिन्दू मंदिर या गिरा दिए गए, या उन्हें होटल बना दिया गया है। पाकिस्तान के नेशनल कमिशन फॉर जस्टिस एंड पीस की वर्ष 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक 74 प्रतिशत हिन्दू महिलाएं यौन शोषण का शिकार होती हैं। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की वर्ष 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में हर महीने 20 से 25 हिन्दू लड़कियों का अपहरण होता है और ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन कराया जाता है।

जब पाकिस्तान में जीने के लिए अनुकूल स्थिति नहीं रही तो मजबूरन हिन्दुओं को बड़ी संख्या में पाकिस्तान छोड़ना पड़ रहा है। पाकिस्तान की जनगणना (1951) के मुताबिक पाकिस्तान की कुल आबादी में 22 फीसदी हिन्दू थे, जो 1998 की जनगणना में घटकर 1.6 फीसदी रह गए हैं। ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1965 से लेकर अब तक तकरीबन सवा लाख पाकिस्तानी हिन्दुओं ने भारत की तरफ पलायन किया है।

वैसे, जब पाकिस्तान में मुस्लिम ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हिन्दुओं के लिए शिकायत कहां करें...? वहां मंदिरों में ही नहीं, मस्जिदों में भी धमाके होते रहते हैं। शियाओं और सुन्नियों के बीच आएदिन दंगे होते हैं, सो, ऐसे में हिन्दुओं के मानवाधिकारों की बात करना मूर्खतापूर्ण लगता है।

भारत आए इन परिवारों को अभी तक किसी राजनैतिक दल से कोई सहारा नहीं मिला है। उनका दोष इतना है कि वे भारत आकर अल्पसंख्यकों के गणित से बाहर हो जाते हैं। किसी पार्टी का वोट बैंक नहीं बन पाते। इन लोगों को पाकिस्तान में अल्पसंख्यक होने का दुष्परिणाम भुगतना पड़ा और भारत में बहुसंख्यक होने की वजह से राजनैतिक दलों की उदासीनता झेलनी पड़ रही है। मोटे तौर पर मीडिया भी उन्हें नज़रअंदाज़ किए हुए हैं। यहां तक कि सारे देश में सभी वर्गों का ध्यान रखने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बंगाल की चुनावी रैली में बांग्लादेशी हिन्दुओं का स्वागत करना तो याद रख पाए, लेकिन पाकिस्तान से आए हिन्दुओं को शायद वह भी भूल गए। सो, अब देखना यह है कि क्या मोदी, या कोई और इनकी मुश्किलों को दूर कर पाएगा...

20/10/2015

हैं साहित्य मनीषी या फिर अपने हित के आदी हैं,
राजघरानो के चमचे हैं,वैचारिक उन्मादी हैं,

दिल्ली दानव सी लगती है,जन्नत लगे कराची है,
जिनकी कलम तवायफ़ बनकर दरबारों में नाची है,

डेढ़ साल में जिनको लगने लगा देश दंगाई है,
पहली बार देश के अंदर नफरत दी दिखलायी है,

पहली बार दिखी हैं लाशें पहली बार बवाल हुए.
पहली बार मरा है मोमिन पहली बार सवाल हुए.

नेहरू से नरसिम्हा तक भारत में शांति अनूठी थी,
पहली बार खुली हैं आँखे,अब तक शायद फूटी थीं,

एक नयनतारा है जिसके नैना आज उदास हुए,
जिसके मामा लाल जवाहर,जिसके रुतबे ख़ास हुए,

पच्चासी में पुरस्कार मिलते ही अम्बर झूल गयी,
रकम दबा सरकारी,चौरासी के दंगे भूल गयी

भुल्लर बड़े भुलक्कड़ निकले,व्यस्त रहे रंगरलियों में,
मरते पंडित नज़र न आये काश्मीर की गलियों में,

अब अशोक जी शोक करे हैं,बिसहाडा के पंगो पर,
आँखे इनकी नही खुली थी भागलपुर के दंगो पर,

आज दादरी की घटना पर सब के सब ही रोये हैं,
जली गोधरा ट्रेन मगर तब चादर ताने सोये हैं,

छाती सारे पीट रहे हैं अखलाकों की चोटों पर,
कायर बनकर मौन रहे जो दाऊद के विस्फोटों पर,

ना तो कवि,ना कथाकार,ना कोई शायर लगते हैं,
मुझको ये आनंद भवन के नौकर चाकर लगते हैं,

दिनकर,प्रेमचंद,भूषण की जो चरणों की धूल नही,
इनको कह दूं कलमकार,कर सकता ऐसी भूल नही,

चाटुकार,मौका परस्त हैं,कलम गहे खलनायक हैं,
सरस्वती के पुत्र नही हैं,साहित्यिक नालायक हैं,
-----कवि गौरव चौहान

14/08/2015

स्वतंत्रता विशेष

"हिमालय के ऑंगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार।"

“जगे हम लगे जगाने विश्व, देश में फिर फैला आलोक,
व्योम तम पुंज हुआ तब नष्ट, अखिल संस्कृति हो उठी अशोक।”

परिवर्तन की जीवंत प्रक्रिया सतत् प्रवहमान है। संहार के बाद सृजन, क्रांति के बाद शांति और संघर्ष के बाद विमर्श का सिलसिला मानव के अन्तर्वाह्य जगत में चलता रहता है। मनुष्य का असन्तोष से भरा जीवन आजन्म संधर्ष की स्थिति को झेलता रहता है, लड़ाइयाँ लड़ता है, नयी व्यवस्था के निर्माण के लिए पुरानी व्यवस्था पर आघात करता है, इसी द्वन्द्व की स्थिति में वह जीता मरता रहता है। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के निर्माण में व्यक्ति की यही संधर्षशील चेतना कार्यरत है। गुलामी के बन्धन को तोड़कर उन्मुक्त होने की कामना ने 1857 में क्रान्ति की नयी जमीन को खोज निकाला। इस क्रान्ति महायज्ञ में प्रथम आहुति देने वाले बलिया जनपद के हलद्वीप गाँव के ब्राह्यण कुलोत्पन्न पंडित मंगल पाण्डेय ने 8 अप्रैल 1857 को अपनी शहादत से स्वतन्त्रता का प्रथम दीप जलाया।

आजादी को लेकर देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिन्दी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वहन किया। स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार एक ओर तो राष्ट्रीय भावों को अपनी कविता का विषय बना रहे थे वही दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना को हवा दे रहे थे। कवि व साहित्यकार अपनी उर्वर प्रज्ञा भूमि के कारण युगीन समस्याओं के प्रति अधिक सावधान व संवेदनशील रहता है। स्वतन्त्रता आंदोलन के आरम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक भिन्न-भिन्न चरणों में राष्ट्रीय भावनाओ से ओत-प्रोत कविताओं की कोख में स्वातन्त्र्य चेतना का विकास होता रहा। 'विप्लव गान' शीर्षक कविता में कवि की क्रान्तिकामना मूर्तिमान हो उठी है।

''कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये
एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर को जाये
नाश ! नाश! हाँ महानाश! ! ! की
प्रलयंकारी आंख खुल जाये।
-नवीन

भारतेन्दु युग का साहित्य अंग्रेजी शासन के विरूद्ध हिन्दुस्तान की संगठित राष्ट्रभावना का प्रथम आह्वाहन था। यही से राष्ट्रीयता का जयनाद शुरू हुआ। जिसके फलस्वरूप द्विवेदी युग ने अपने प्रौढ़तम स्वरूप के साथ नवीन आयामों और दिशाओं की ओर प्रस्थान किया। भारतेन्दु की'भारत दुर्दशा' प्रेमघन की आनन्द अरूणोदय, देश दशा, राधाकृष्ण दास की भारत बारहमासा के साथ राजनीतिक चेतना की धार तेज हुई। द्विवेदी युग में कविवर 'शंकर' ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अर्न्तगत बलिदान गान में 'प्राणों का बलिदान देष की वेदी पर करना होगा' के द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए क्रान्ति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी। 'बज्रनाद से व्योम जगा दे देव और कुछ लाग लगा दे' के ओजस्वी हुंकार द्वारा भारत भारतीकार मैथिलीषरण गुप्त ने स्वदेश-संगीत व सर्वश्रेष्ठ सशक्त रचना भारत-भारती में ऋषिभूमि भारतवर्ष के अतीत के गौरवगान के साथ में वर्तमान पर क्षोभ प्रकट किया है। छायावादी कवियों ने राष्ट्रीयता के रागात्मक स्वरूप को ही प्रमुखता दी और उसी की परिधि में अतीत के सुन्दर और प्रेरक देशप्रेम सम्बन्धी मधुरगीतों व कविताओं की सृष्टि की । निराला की 'वर दे वीणा वादिनी','भारती जय विजय करे', 'जागो फिर एकबार', 'शिवाजी का पत्र', प्रसाद की 'अरूण यह मधुमय देश हमारा' चन्द्रगुप्त नाटक में आया 'हिमाद्रि तुंगश्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती' आदि कविताओं में कवियों ने हृदय के स्तर पर अपनी प्रशस्त राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति की है।

स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित हिन्दी कवियों की श्रृखला में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, राधाचरण गोस्वामी, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, राधाकृष्ण दास, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माधव प्रसाद शुक्ल, रामनरेश त्रिपाठी, नाथूराम शर्मा शंकर, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही (त्रिशूल), माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, सियाराम शरण गुप्त, सोहन लाल द्विवेदी, श्याम नारायण पाण्डेय, अज्ञेय इत्यादि कवियों ने परम्परागत राष्ट्रीय सांस्कृतिक भित्ति पर ओजपूर्ण स्वरों मे राष्ट्रीयता का संधान किया।

हिन्दी की राष्ट्रीय काव्यधारा के समस्त कवियों ने अपने काव्य में देशप्रेम व स्वतन्त्रता की उत्कट भावना की अभिव्यक्ति दी है। राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रणेता के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी की हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता, युगचरण, समर्पण आदि के काव्यकृतियों के माध्यम से उनकी राष्ट्रीय भावछाया से अवगत हुआ जा सकता है। चतुर्वेदी जी ने भारत को पूर्ण स्वतन्त्र कर जनतन्त्रात्मक पद्धति की स्थापना का आहवाहन किया। गुप्त जी के बाद स्वातन्त्र्य श्रृखला की अगली कड़ी के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी का अविस्मृत नाम न केवल राष्ट्रीय गौरव की याद दिलाता है अपितु संघर्ष की प्रबल प्रेरणा भी देता है। जेल की हथकड़ी आभूषण बन उनके जीवन को अलंकृत करती है।

'क्या? देख न सकती जंजीरो का गहना
हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना'
(कैदी और कोकिला)

पिस्तौल, गीता, आनन्दमठ की जिन्दगी ने इनके भीतर प्रचण्ड विद्रोह को जन्म दे वैष्णवी प्रकृति विद्रोह और स्वाधीनता के प्रति समर्पण भाव ने इनके जीवन को एक राष्ट्रीय सांचे में ढाल दिया। 1912 में उनकी जीवन यात्रा ने बेड़ियों की दुर्गम राह पकड़ ली।

'उनके हृदय में चाह है अपने हृदय में आह है
कुछ भी करें तो शेष बस यह बेड़ियों की राह है।'

1921 में कर्मवीर के सफल सम्पादक चतुर्वेदी जी को जब देशद्रोह के आरोप में जेल हुई तब कानपुर से निकलने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र 'प्रताप' और महात्मा गाँधी के 'यंग इण्डिया' ने उसका कड़ा विरोध किया। 'मुझे तोड़ लेना वन माली देना तुम उस पथ पर फेंक मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पर जाते वीर अनेक ''पुष्प की अभिलाषा'' शीर्षक कविता की यह चिरजीवी पंक्तियाँ उस भारतीय आत्मा की पहचान कराती है जिन्होनें स्वतन्त्रता के दुर्गम पथ में यातनाओं से कभी हार नही मानी।

'' जो कष्टों से घबराऊँ तो मुझमें कायर में भेद कहाँ
बदले में रक्त बहाऊँ तो मुझमें डायर में भेंद कहाँ!"

अनुभूति की तीव्रता की सच्चाई, सत्य, अहिंसा जैसे प्रेरक मूल्यों के प्रति कवि की आस्था, दृढ़ संकल्प, अदम्य उत्साह और उत्कट् अभिलाषा को लेकर चलने वाला यह भारत माँ का सच्चा सपूत साहित्यशास्त्र और कर्मयंत्र से दासता की बेड़ियों को काट डालने का दृढ़व्रत धारण करके जेल के सींखचों के भीतर तीर्थराज का आनन्द उठाते है।

''हो जाने दे गर्क नशे में, मत पड़ने दे फर्क नशे में, के उत्साह व आवेश के साथ स्वतन्त्रता संग्राम श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में आबद्ध एक श्लाघ्य नाम बालकृष्ण शर्मा नवीन का है वह स्वतन्त्रता आन्दोलन के मात्र व्याख्यता ही नहीं अपितु भुक्तभोगी भी रहे। 1920 में गाँधी जी के आह्वाहन पर वह कालेज छोड़कर आन्दोलन में कूद पड़े। फलत: दासता की श्रृंखलाओं के विरोध संघर्ष में इन्हे 10 बार जेल जाना पड़ा। जेल यात्राओं का इतना लम्बा सिलसिला शायद ही किसी कवि के जीवन से जुड़ा हो। उन दिनों जेल ही कवि का घर हुआ करता था।

'हम संक्रान्ति काल के प्राणी बदा नही सुख भोग
घर उजाड़ कर जेल बसाने का हमको है रोग'
नवीन

अपनी प्रथम काव्य संग्रह 'कुंकुम' की जाने पर प्राणार्पण, आत्मोत्सर्ग तथा प्रलयंकर कविता संग्रह में क्रान्ति गीतों की ओजस्विता व प्रखरता है।

'यहाँ बनी हथकड़िया राखी, साखी है संसार
यहाँ कई बहनों के भैया, बैठे है मनमार।'

राष्ट्रीय काव्यधारा को विकसित करने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान का 'त्रिधारा' और 'मुकुल' की 'राखी' 'झासी की रानी' 'वीरों का कैसा हो बसंत'आदि कविताओं में तीखे भावों की पूर्ण भावना मुखरित है। उन्होने असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभायी। आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। 'जलियावाला बाग में बसंत' कविता में इस नृशंस हत्याकाण्ड पर कवयित्री के करूण क्रन्दन से उसकी मूक वेदना मूर्तिमान हो उठी है।

''आओ प्रिय ऋतुराज, किन्तु धीरे से आना
यह है शोक स्थान, यहाँ मत शोर मचाना
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खा कर
कलियाँ उनके लिए चढ़ाना थोड़ी सी लाकर।"

दिनकर की हुँकार, रेणुका, विपथगा में कवि ने साम्राज्यवादी सभ्यता और ब्रिटिश राज्य के प्रति अपनी प्रखर ध्वंसात्मक दृष्टि का परिचय देते हुए क्रान्ति के स्वरों का आह्वाहन किया है। पराधीनता के प्रति प्रबल विद्रोह के साथ इसमें पौरूष अपनी भीषणता और भंयकरता के साथ गरजा है। कुरूक्षेत्र महाकाब्य पूर्णरूपेण राष्ट्रीय है।

'उठो- उठो कुरीतियों की राह तुम रोक दो
बढो-बढो कि आग में गुलामियों को झोंक दो '।
दिनकर

स्वतन्त्रता की प्रथम शर्त कुर्बानी व समर्पण को काव्य का विषय बना क्रान्ति व ध्वंस के स्वर से मुखरित दिनकर की कवितायें नौंजवानों के शरीर में उत्साह भर उष्ण रक्त का संचार करती है ।

जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त, सीमापति! तूने की पुकार
पददलित उसे करना पीछे, पहले ले मेरा सीस उतार।

सोहनलाल द्विवेदी की भैरवी राणाप्रताप के प्रति, आजादी के फूलों पर जय-जय, तैयार रहो, बढ़े चलो बढ़े चलो, विप्लव गीत कवितायें, पूजा गीत संग्रह की मातृपूजा, युग की पुकार, देश के जागरण गान कवितायें तथा वासवदत्ता, कुणाल, युगधारा काब्य संग्रहों में स्वतन्त्रता के आह्वान व देशप्रेम साधना के बीच आशा और निराशा के जो स्वर फूटे है उन सबके तल में प्रेम की अविरल का स्रोत बहाता कवि वन्दनी माँ को नहीं भूल सका है ।

'कब तक क्रूर प्रहार सहोगे ?
कब तक अत्याचार सहोगे ?
कब तक हाहाकार सहोगे ?
उठो राष्ट्र के हे अभिमानी
सावधान मेरे सेनानी।'

सियाराम शरण गुप्त की बापू कविता में गाँधीवाद के प्रति अटूट आस्था व अहिंसा, सत्य, करूणा, विश्व-बधुत्व, शान्ति आदि मूल्यों का गहरा प्रभाव है। राजस्थानी छटा लिये श्यामनारायण पाण्डेय की कविताओं में कहीं उद्बोधन और क्रान्ति का स्वर तथा कहीं सत्य, अहिंसा जैसे अचूक अस्त्रों का सफल संधान हुआ है। इनकी 'हल्दीघाटी' व 'जौहर' काव्यों में हिन्दू राष्ट्रीयता का जयघोष है । देशप्रेम के पुण्य क्षेत्र पर प्राण न्यौछावर के लिए प्रेरित करने वाले रामनरेश त्रिपाठी की कविता कौमुदी, मानसी, पथिक, स्वप्न आदि काव्य संग्रह देश के उद्धार के लिए आत्मोत्सर्ग की भावना उत्पन्न करते है । देश की स्वतन्त्रता को लक्ष्य करके श्री गया प्रसाद शुक्ल सनेही ने कर्मयोग कविता में भारतवासियों को जागृत कर साम्राज्यवादी नीति को आमूल से नष्ट करने का तीव्र आह्वाहन किया । श्रीधर पाठक ने भारतगीत में साम्राज्यवादियों के चंगुल में फंसे भारत की मुक्ति का प्रयास किया। प्रयोगवादी कवि अज्ञेय भी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए कई बार जेल गये। जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द की कवितायें भी इस दिशा मे सक्रिय हैं।

इस प्रकार हम देखते है कि स्वतन्त्रता आंदोलन के उत्तरोत्तर विकास के साथ हिन्दी कविता और कवियों के राष्ट्रीय रिश्ते मजबूत हुए। राजनीतिक घटनाक्रम में कवियों के तेवर बदलते रहे और कविता की धार भी तेज होती गई। आंदोलन के प्रारम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक हिन्दी काव्य संघर्षो से जूझता रहा। स्वाधीनता के पश्चात राष्ट्रीय कविता के इतिहास का एक नया युग प्रारम्भ हुआ। नये निर्माण के स्वर और भविष्य के प्रति मंगलमय कल्पना उनके काव्य का विषय बन गया। फिर भी स्वतन्त्रता यज्ञ में उनके इस अवदान और बलिदान को विस्मृत नही किया जा सकता । भारत का ऐतिहासिक क्षितिज उनकी कीर्ति किरण से सदा आलोकित रहेगा और उनकी कविताए राष्ट्रीय आस्मिता की धरोहर बनकर नयी पीढ़ी को अपने गौरव गीत के ओजस्वी स्वर सुनाती रहेगीं।

जन्म से पहले शमशान होता है
शान्ति के पहले तूफान होता है
वक्त के साथ बदलती है तस्वीर देश की
क्रान्ति के बाद ही तो नवनिर्माण होता है।
शलभ

13/08/2015

सावन के महीने में पड़ने वाले हर सोमवार का विशेष महत्व होता है। इस साल सावन के महीने में चार सोमवार पड़ रहे हैं। वैसे तो इस पूरे मास में शिवालयों में पंचामृत से भगवान का अभिषेक, रुद्धाभिषेक होता है। भगवान शंकर को फूल, बेलपत्र, धतूरा आदि चढ़ाकर श्रद्धालु पूजा अर्चना करते हैं। सावन सोमवार का अपना अलग महत्व होता है। इस दिन भगवान का पूजन अर्चन करने से विशेष फल मिलता है।

वैसे तो पूरे महीने में शिवजी की विशेष पूजा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति शिवजी की कृपा प्राप्त करना चाहता है तो उसे प्रतिदिन शिवलिंग पर जल अर्पित करना चाहिए। विशेष रूप से सावन के हर सोमवार शिवजी का पूजन करें। इस नियम से शिवजी की कृपा प्राप्त की जा सकती है। भगवान की प्रसन्नता से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और परेशानियां दूर सकती हैं।

वैसे तो सावन का पूरा महीना भगवान शिव को अर्पित होता है, पर सावन के पहले सोमवार को भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल मिलता है। आदिकाल से ही इस दिन का विशेष महत्व रहा है। कहा जाता है सावन के सोमवार का व्रत करने से मनचाहा जीवनसाथी मिलता है और दूध की धार के साथ भगवान शिव से जो मांगों वह पूरा होता है।

इस बार श्रावण मास 29 दिन का है और पहला सोमवार 3 अगस्त को है। ज्योतिर्विदों के अनुसार, इस बार आने वाले सभी चार सोमवार खास होंगे। इन पर विशेष संयोग बनेंगे और शिवालयों में आस्था का उल्लास उमड़ेगा। आज पहले सोमवार पर शिवालयों में महादेव का आकर्षक श्रृंगार किया गया। जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक के लिए भक्तों की कतारें लगी। हर-हर महादेव के जयघोष गूंजें। पहले श्रावण सोमवार पर गणेश चतुर्थी और शतभिषा नक्षत्र रहेगा। इसके चलते पिता शिव और पुत्र गणेश के साथ पूजन का कल्याणकारी अवसर रहेगा। 10 अगस्त को दूसरे सोमवार पर एकादशी का व्रत शुभता प्रदान करेगा। तीसरे सोमवार 17 अगस्त पर हरियाली तीज होने के साथ स्वर्ण गौरी पूजन का विधान भी है। अंतिम सोमवार को 24 अगस्त पर श्रावण शुक्ल नवमी और ज्येष्ठ नक्षत्र का संयोग बनेगा।

श्रावण माह का पहला सोमवार गजकेशरी महासंयोग में होगा। इस बार श्रावण के पहले सोमवार (3 अगस्त 2015 )के दिन गुरु सिंह राशि में व चन्द्रमा कुंभ राशि में दोनों ठीक आमने-सामने होंगे। इस कारण गजकेशरी महासंयोग बनेगा। गुरु धर्म व सिद्धि साधना को देते हैं वहीं चन्द्रमा मन को स्थिरता देने वाला होता है जिसे भगवान शंकर अपने मस्तक पर धारण करते हैं। ज्योतिष के अनुसार चंद्रमा से केंद्र में अर्थात पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में बृहस्पति स्थित हो, तो गजकेशरी योग होता है। बहुत सी टीकाओं में बृहस्पति की लग्न से केंद्र स्थिति योगकारक मानी है लेकिन मूल योग चंद्रमा से ही समझना चाहिए। पुराणों में बताया गया है कि यह एक प्रकार का राज योग है। जातक नेता, व्यापारी, विधानसभा का सदस्य, संसद, संस्था का मुखिया या राजपत्रित अधिकारी होता है।

सोमवार चंद्रमा का दिन होता है। चंद्रमा का निवास शिव के सिर पर होता है। इससे चंद्रमा की पूजा भी शिव भक्तों को स्वत: प्राप्त हो जाती है। इस बार तो चारों सोमवारी को विशेष योग बन रहा है। श्रवण नक्षत्र तथा सोमवार से भगवान शिव शंकर का गहरा संबंध है। हिंदू पंचाग के अनुसार सभी मासों को किसी न किसी देवता के साथ संबंधित देखा जा सकता है, उसी प्रकार श्रवण मास को भगवान शिव जी के साथ देखा जाता है इस समय शिव आराधना का विशेष महत्व होता है। यह माह मनोकामना, आकांक्षाओं और मनवांछित फल की पूर्ति का समय होता है।

13/08/2015

भारत के सभी शिवालयों में श्रावण सोमवार पर हर-हर महादेव और बोल बम बोल की गूँज सुनाई देगी। श्रावण मास में शिव-पार्वत‍ी का पूजन बहुत फलदायी होता है। इसलिए सावन मास का बहुत मह‍त्व है।

क्यों है सावन की विशेषता? :- हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन महीने को देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना माना जाता है। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था।

अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया।

सावन में शिवशंकर की पूजा :- सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।

महादेव का अभिषेक :- महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्च्छित हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।

बेलपत्र और समीपत्र :- भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 89 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है।

बेलपत्र ने दिलाया वरदान : बेलपत्र महादेव को प्रसन्न करने का सुलभ माध्यम है। बेलपत्र के महत्व में एक पौराणिक कथा के अनुसार एक भील डाकू परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटा करता था। सावन महीने में एक दिन डाकू जंगल में राहगीरों को लूटने के इरादे से गया। एक पूरा दिन-रात बीत जाने के बाद भी कोई शिकार नहीं मिलने से डाकू काफी परेशान हो गया।

इस दौरान डाकू जिस पेड़ पर छुपकर बैठा था, वह बेल का पेड़ था और परेशान डाकू पेड़ से पत्तों को तोड़कर नीचे फेंक रहा था। डाकू के सामने अचानक महादेव प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा। अचानक हुई शिव कृपा जानने पर डाकू को पता चला कि जहाँ वह बेलपत्र फेंक रहा था उसके नीचे शिवलिंग स्थापित है। इसके बाद से बेलपत्र का महत्व और बढ़ गया।

विशेष सजावट : सावन मास में शिव मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। शिवभक्त अनेक धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। साथ ही महादेव को प्रसन्न करने के लिए किसी ने नंगे पाँव चलने की ठानी, तो कोई पूरे सावन भर अपने केश नहीं कटाएगा। वहीं कितनों ने माँस और मदिरा का त्याग कर दिया है।

काँवरिए चले शिव के धाम : सावन का महीना शिवभक्तों के लिए खास होता है। शिवभक्त काँवरियों में जल लेकर शिवधाम की ओर निकल पड़ते हैं। शिवालयों में जल चढ़ाने के लिए लोग बोल बम के नारे लगाते घरों से निकलते हैं। भक्त भगवा वस्त्र धारण कर शिवालयों की ओर कूच करते हैं।

13/08/2015

सावन का महीना और भगवान शंकर यानी भक्ति की ऐसी अविरल धारा जहां हर हर महादेव और बम बम भोल की गूंज से कष्टों का निवारण होता है, मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यूं तो भगवान शंकर की पूजा के लिए सोमवार का दिन पुराणों में निर्धारित किया गया है। लेकिन पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन महाशिवरात्रि, उसके बाद सावन के महीने में आनेवाला प्रत्येक सोमवार, फिर हर महीने आनेवाली शिवरात्रि और सोमवार का महत्व है। लेकिन भगवान को सावन यानी श्रावण का महीना बेहद प्रिय है जिसमें वह अपने भक्तों पर अतिशय कृपा बरसाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस महीने में खासकर सोमवार के दिन व्रत-उपवास और पूजा पाठ (रुद्राभिषेक,कवच पाठ,जाप इत्यादि) का विशेष लाभ होता है। सनातन धर्म में यह महीना बेहद पवित्र माना जाता है यही वजह है कि मांसाहार करने वाले लोग भी इस मास में मांस का परित्याग कर देते है।

सावन के महीने में सोमवार महत्वपूर्ण होता है। सोमवार का अंक 2 (पहला रविवार और दूसरा सोमवार) होता है जो चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। चन्द्रमा मन का संकेतक है और वह भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। चंद्रमा मनसो जात: यानी चंद्रमा मन का मालिक है और उसके नियंत्रण और नियमण में उसका (चंद्रमा का) अहम योगदान है। यानी भगवान शंकर शिव के मस्तक पर चंद्रमा को नियंत्रित कर उक्त साधक या भक्त के मन को एकाग्रचित कर उसे अविद्या रुपी माया के मोहपाश से मुक्त कर देते हैं। भगवान शंकर की कृपा से भक्त त्रिगुणातीत (सत, रज और तम गुण) भाव को प्राप्त करता है और यही उसके जन्म-मरण से मुक्ति का आधार बनता है।

सावन के महीने में सबसे अधिक बारिश होती है जो शिव के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करती है। भगवान शंकर ने स्वयं सनतकुमारों को सावन महीने की महिमा बताई है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, बांये चन्द्र और अग्नि मध्य नेत्र है। जब सूर्य कर्क राशि में गोचर करता है, तब सावन महीने की शुरुआत होती है। सूर्य गर्म है जो उष्मा देता है जबकि चंद्रमा ठंडा है जो शीतलता प्रदान करता है। इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिस होती है। जिससे लोक कल्याण के लिए विष को पीने वाले भोले को ठंडक व सुकून मिलता है। इसलिए शिव का सावन से इतना गहरा लगाव है।

सावन और साधना के बीच चंचल और अति चलायमान मन की एकाग्रता एक अहम कड़ी है जिसके बिना परम तत्व की प्राप्ति असंभव है। साधक की साधना जब शुरू होती है तब मन एक विकराल बाधा बनकर खड़ा हो जाता है। उसे नियंत्रित करना सहज नहीं होता। लिहाजा मन को ही साधने में साधक को लंबा और धैर्य का सफर तय करना होता है। इसलिए कहा गया है कि मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। यानी मन से ही मुक्ति है और हम ही बंधन का कारण है। भगवान शंकर ने मस्तक में ही चंद्रमा को दृढ कर रखा है लिहाजा साधक की साधना निर्विघ्न संपन्न होती चली जाती है।

यजुर्वेद के एक मंत्र में मन को बड़ा ही प्रबल और चंचल कहा गया है। मन जड़ होते हुए भी सोते-जागते कभी भी चैन नहीं लेता। जितनी देर हम जागते रहते हैं, उतनी देर यह कुछ न कुछ सोचता हुआ भटकता रहता है। मन की इसी अस्थिर गति को थामने और दृढ करने के लिए भगवान शंकर हमें सावन जैसा मास प्रदान करते हैं। इसी सावन में साधना हर बाधाओं को पार कर आगे बढ़ती है। सावन,सोमवार और भगवान शंकर की अराधना सर्वथा कल्याणकारी है जिसमें भक्त मनोवांछित फर प्राप्त करते हैं।

शिव (शि-व) मंत्र में एक अंश उसे ऊर्जा देता है और दूसरा उसे संतुलित करता है। इसलिए जब हम ‘शिव’ कहते हैं, तो हम ऊर्जा को एक खास तरीके से, एक खास दिशा में निर्देशित करने की बात करते हैं। 'शिवम' में यह ऊर्जा अनंत स्वरुप का रुप धारण करती है। 'ऊं नम: शिवाय' का महामंत्र भगवान शंकर की उस उर्जा को नमन है जहां शक्ति अपने सर्वोच्च रूप में आध्यात्मिक किरणों से भक्तों के मन-मस्तिष्क को संचालित करती है। जीवन के भव-ताप से दूर कर भक्ति को प्रगाढ़ करते हुए सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से मुक्त कर मानसिक और शारीरिक रूप में विकार रहित स्वरूप प्रदान करती है। यह स्वरूप निर्विकार होता है जो परमब्रह्म से साक्षात्कार का रास्ता तय कराता है।

'शिव' शब्द की उत्पत्ति वश कान्तौ धातु से हुई हैं। जिसका मतलब जिसको सब चाहें वही शिव। जीवन में सभी आनंद की इच्छा करते हैं यानी शिव का एक अर्थ आंनद भी है। 'शिव' का एक अर्थ - 'कल्याणकारी' भी है। शिव यानी जो सबको प्यारा।

भगवान शंकर यूं तो अराधना से प्रसन्न होते हैं लेकिन सावन मास में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक का बड़ा महत्व है। वेद मंत्रों के साथ भगवान शंकर को जलधारा अर्पित करना साधक के आध्यात्मिक जीवन के लिए महाऔषधि के सामान है। पांच तत्व में जल तत्व बहुत महत्वपूर्ण है। पुराणों ने शिव के अभिषेक को बहुत पवित्र महत्व बताया गया है।

जल में भगवान विष्णु का वास है, जल का एक नाम 'नार' भी है। इसीलिए भगवान विष्णु को नारायण कहते हैं। जल से ही धरती का ताप दूर होता है। जो भक्त, श्रद्धालु भगवान शिव को जल चढ़ाते हैं उनके रोग-शोक, दुःख दरिद्र सभी नष्ट हो जाते हैं। भगवान शंकर को महादेव इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह देव, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, मनुष्य, सभी द्वारा पूजे जाते हैं।

सावन मास में शिव भक्ति का पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो विष निकला उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसीसे उनका नाम नीलकंठ महादेव पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का खास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। शिवपुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रुप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है जिसमें कोई संशय नहीं है।

संजीवनं समस्तस्य जगतः सलिलात्मकम्‌।
भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मनः ॥

अर्थात्‌ जो जल समस्त जगत्‌ के प्राणियों में जीवन का संचार करता है वह जल स्वयं उस परमात्मा शिव का रूप है। इसीलिए जल का अपव्यय नहीं वरन्‌ उसका महत्व समझकर उसकी पूजा करना चाहिए। पुराणों में यह भी कहा गया है कि सावन के महीने में सोमवार के दिन शिवजी को एक बिल्व पत्र चढ़ाने से तीन जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। इसलिए इन दिनों शिव की उपासना का बहुत महत्व है।

25/06/2015

॥ सियाराम मय सब जग जानी ,करहु प्रणाम जोरि जग पानी ॥

भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है की " तीनो लोको में किसी भी जीव,निर्जीव , गन्धर्व,किन्नर को किया गया प्रणाम मेरी ओर ही आता है , इसीलिए वासुदेव कुटुंबकम की परम्परा है हमारे हिन्दू धर्म में ,और हम हिन्दू , सूर्य ,चन्द्र , पृथ्वी, माता,पिता,गुरु ,बुजुर्ग, नदियों ,पहाड़ो,पेड़ पौधों, तालाबो ,जल ,वायु , अग्नि, और पत्थरो को प्रणाम करते है,पूजा करते है बिना हिन्दू , सूर्य ,चन्द्र , पृथ्वी, माता,पिता,गुरु ,बुजुर्ग, नदियों ,पहाड़ो,पेड़ पौधों, तालाबो ,जल ,वायु , अग्नि, और पत्थरो की जाती या धर्म देखे । हिन्दू आस्था और विश्वास में वह शक्ति है की वह जिसमे चाहे भगवान को प्रगट कर सकती है ।

24/06/2015

कबीर के राम तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। कबीर के राम इस्लाम के एकेश्वरवादी, एकसत्तावादी खुदा भी नहीं हैं। इस्लाम में खुदा या अल्लाह को समस्त जगत एवं जीवों से भिन्न एवं परम समर्थ माना जाता है। पर कबीर के राम परम समर्थ भले हों, लेकिन समस्त जीवों और जगत से भिन्न तो कदापि नहीं हैं। बल्कि इसके विपरीत वे तो सबमें व्याप्त रहने वाले रमता राम हैं। वह कहते हैं

व्यापक ब्रह्म सबनिमैं एकै, को पंडित को जोगी। रावण-राव कवनसूं कवन वेद को रोगी।

कबीर राम की किसी खास रूपाकृति की कल्पना नहीं करते, क्योंकि रूपाकृति की कल्पना करते ही राम किसी खास ढाँचे (फ्रेम) में बँध जाते, जो कबीर को किसी भी हालत में मंजूर नहीं। कबीर राम की अवधारणा को एक भिन्न और व्यापक स्वरूप देना चाहते थे। इसके कुछ विशेष कारण थे, जिनकी चर्चा हम इस लेख में आगे करेंगे। किन्तु इसके बावजूद कबीर राम के साथ एक व्यक्तिगत पारिवारिक किस्म का संबंध जरूर स्थापित करते हैं। राम के साथ उनका प्रेम उनकी अलौकिक और महिमाशाली सत्ता को एक क्षण भी भुलाए बगैर सहज प्रेमपरक मानवीय संबंधों के धरातल पर प्रतिष्ठित है।

कबीर नाम में विश्वास रखते हैं, रूप में नहीं। हालाँकि भक्ति-संवेदना के सिद्धांतों में यह बात सामान्य रूप से प्रतिष्ठित है कि ‘नाम रूप से बढ़कर है’, लेकिन कबीर ने इस सामान्य सिद्धांत का क्रांतिधर्मी उपयोग किया। कबीर ने राम-नाम के साथ लोकमानस में शताब्दियों से रचे-बसे संश्लिष्ट भावों को उदात्त एवं व्यापक स्वरूप देकर उसे पुराण-प्रतिपादित ब्राह्मणवादी विचारधारा के खाँचे में बाँधे जाने से रोकने की कोशिश की।

कबीर के राम निर्गुण-सगुण के भेद से परे हैं। दरअसल उन्होंने अपने राम को शास्त्र-प्रतिपादित अवतारी, सगुण, वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षक राम से अलग करने के लिए ही ‘निर्गुण राम’ शब्द का प्रयोग किया–‘निर्गुण राम जपहु रे भाई।’ इस ‘निर्गुण’ शब्द को लेकर भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं। कबीर का आशय इस शब्द से सिर्फ इतना है कि ईश्वर को किसी नाम, रूप, गुण, काल आदि की सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता। जो सारी सीमाओं से परे हैं और फिर भी सर्वत्र हैं, वही कबीर के निर्गुण राम हैं। इसे उन्होंने ‘रमता राम’ नाम दिया है। अपने राम को निर्गुण विशेषण देने के बावजूद कबीर उनके साथ मानवीय प्रेम संबंधों की तरह के रिश्ते की बात करते हैं। कभी वह राम को माधुर्य भाव से अपना प्रेमी या पति मान लेते हैं तो कभी दास्य भाव से स्वामी। कभी-कभी वह राम को वात्सल्य मूर्ति के रूप में माँ मान लेते हैं और खुद को उनका पुत्र। निर्गुण-निराकार ब्रह्म के साथ भी इस तरह का सरस, सहज, मानवीय प्रेम कबीर की भक्ति की विलक्षणता है। यह दुविधा और समस्या दूसरों को भले हो सकती है कि जिस राम के साथ कबीर इतने अनन्य, मानवीय संबंधपरक प्रेम करते हों, वह भला निर्गुण कैसे हो सकते हैं, पर खुद कबीर के लिए यह समस्या नहीं है।

वह कहते भी हैं
“संतौ, धोखा कासूं कहिये। गुनमैं निरगुन, निरगुनमैं गुन, बाट छांड़ि क्यूं बहिसे!” नहीं है।

प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने कबीर के राम एवं कबीर की साधना के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है : " कबीर का सारा जीवन सत्‍य की खोज तथा असत्‍य के खंडन में व्‍यतीत हुआ। कबीर की साधना ‘‘मानने से नहीं, ‘‘जानने से आरम्‍भ होती है। वे किसी के शिष्‍य नहीं, रामानन्‍द द्वारा चेताये हुए चेला हैं। उनके लिए राम रूप नहीं है, दशरथी राम नहीं है, उनके राम तो नाम साधना के प्रतीक हैं। उनके राम किसी सम्‍प्रदाय, जाति या देश की सीमाओं में कैद नहीं है। प्रकृति के कण-कण में, अंग-अंग में रमण करने पर भी जिसे अनंग स्‍पर्श नहीं कर सकता, वे अलख, अविनाशी, परम तत्‍व ही राम हैं। उनके राम मनुष्‍य और मनुष्‍य के बीच किसी भेद-भाव के कारक नहीं हैं। वे तो प्रेम तत्‍व के प्रतीक हैं। भाव से ऊपर उठकर महाभाव या प्रेम के आराध्‍य हैं ः-

‘प्रेम जगावै विरह को, विरह जगावै पीउ, पीउ जगावै जीव को, जोइ पीउ सोई जीउ' - जो पीउ है, वही जीव है। इसी कारण उनकी पूरी साधना ‘‘हंस उबारन आए की साधना है। इस हंस का उबारना पोथियों के पढ़ने से नहीं हो सकता, ढाई आखर प्रेम के आचरण से ही हो सकता है। धर्म ओढ़ने की चीज नहीं है, जीवन में आचरण करने की सतत सत्‍य साधना है। उनकी साधना प्रेम से आरम्‍भ होती है। इतना गहरा प्रेम करो कि वही तुम्‍हारे लिए परमात्‍मा हो जाए। उसको पाने की इतनी उत्‍कण्‍ठा हो जाए कि सबसे वैराग्‍य हो जाए, विरह भाव हो जाए तभी उस ध्‍यान समाधि में पीउ जाग्रत हो सकता है। वही पीउ तुम्‍हारे अर्न्‍तमन में बैठे जीव को जगा सकता है। जोई पीउ है सोई जीउ है। तब तुम पूरे संसार से प्रेम करोगे, तब संसार का प्रत्‍येक जीव तुम्‍हारे प्रेम का पात्र बन जाएगा। सारा अहंकार, सारा द्वेष दूर हो जाएगा। फिर महाभाव जगेगा। इसी महाभाव से पूरा संसार पिउ का घर हो जाता है।

सूरज चन्‍द्र का एक ही उजियारा, सब यहि पसरा ब्रह्म पसारा।

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