Akhil Bhartiya Sant Samaj

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वट सावित्री व्रत         _______________________प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के अमावस्या को उत्तर भारत की सुहागिनियों द्वारा तथ...
16/05/2026

वट सावित्री व्रत
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प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के अमावस्या को उत्तर भारत की सुहागिनियों द्वारा तथा ज्येष्ठ मास के पूर्णिमा के दिन दक्षिण भारत की सुहागिनियों द्वारा वट सावित्री व्रत का पालन किया जाता है l
हमारे देश का इतिहास नारी शक्ति की बुनियाद पर टिका है l भारत देश में एक से बढ़कर एक पतिव्रता नारी का जन्म हुआ जिन्होंने अपनी मर्यादा, त्याग, तपस्या और पतिव्रत धर्म से काल तो क्या भगवान को भी अपने वश में कर लिया l सती अनसुईया ने अपनी तप और सतीत्व की शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी बालक बना कर अपनी गोद में खिलाया था l
ऐसी ही एक देवी थी सती सावित्री जिसने अपने पति के प्राण को यमराज से भी छीन लिया था l
सावित्री एक तत्वज्ञानी राजऋषि अश्वपति की एकलौती कन्या थी l ऋषि पुत्री होने के कारण बचपन से ही वह आध्यात्मिक माहौल में पली बढ़ी जिससे उसके अन्दर सत्य-धर्म, नेम, आचार, व्रत आदि गुण कूट-कूट कर भरे थे l अपने पिता से उसे आत्मज्ञान भी प्राप्त था l पिता की भाँति सावित्री भी सदा भगवान के ध्यान-भजन में लीन रहती थी l
जब सावित्री यौवन अवस्था को प्राप्त हुई तो पिता को उसके विवाह की चिन्ता सताने लगी l एक दिन सावित्री अपने पिता के साथ योग्य वर की तलाश में किसी वन से गुजर रही थी तो उसने एक सुन्दर, सुशील और धर्मात्मा युवक को देखा जो अपने माता-पिता की सेवा में मग्न था l वह निर्वासित राजा द्युमत्सेन का पुत्र सत्यवान था l
सावित्री मन ही मन सत्यवान को पति रूप में वरण कर लिया l उसी समय नारद मुनि प्रकट हुए और सत्यवान की भाग्य रेखा देख कर कहा कि सत्यवान की उम्र सिर्फ एक वर्ष बची है l पिता ने समझाया कि बेटी सत्यवान को मन से त्याग दे l सावित्री कहती है कि भारतीय नारी पतिव्रता होती है जो एक बार किसी पुरूष को मन में बसा ले तो दूसरे पुरुष का ख्याल सपने में भी नहीं लाती l
सावित्री का विवाह सत्यवान से हो गया l सावित्री पति के साथ वन में ही रहकर अपने अन्धे सास-ससुर और पति की सेवा करने लगी साथ ही प्रभु का ध्यान-भजन भी करती थी l
जब सत्यवान का अन्तिम दिन आया तो सावित्री बहुत चिन्तित थी l उस दिन अपने पति के साथ वह भी लकड़ी लाने गई l जब लकड़ी काटते वक्त सत्यवान का सिर चकराया तो सावित्री उसे एक वट वृक्ष के नीचे ले गई और उसके सिर को गोद में रखकर लिटा दिया l सावित्री नाम का सुमिरण करते हुए ध्यानयोग में चली गई l सावित्री देखती है कि यमराज उसके पति के प्राण को लेकर जा रहे हैं l सावित्री भी ध्यानयोग के द्वारा सूक्ष्म शरीर को लेकर यमराज के पीछे चलने लगी l यमराज कहते हैं बेटी तुम तो ब्रह्मज्ञानी हो, सब जानती हो कि मनुष्य की जितनी आयु रहती है उतने दिन ही धरती पर निवास करता है l तेरा पति का समय पूरा हो गया अब तू लौट जा l सावित्री नहीं मानी तो यमराज उसे तीन वरदान मांगने को कहा l सावित्री ने पहला वरदान में सास-ससुर की आंख माँगी l दूसरा वरदान अपने पति का खोया हुआ राज्य तथा तीसरा वरदान अपने लिए सौ पुत्र माँगे l यमराज ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए बिना विचारे तथास्तु कह दिया l सावित्री फिर भी यमराज के पीछे चलती जा रही थी l भगवान यमराज ने पूछा अब क्या चाहिए ? सावित्री बोली आपने सौ पुत्र देने का वरदान दिया है और मैं एक पतिव्रता स्त्री हूँ l इतना सुनना था कि यमराज लज्जित हो गए और सत्यवान के प्राण लौटा कर दीर्घजीवी होने का आशीर्वाद दिया ll
चूँकि वट वृक्ष के नीचे सत्यवान का मृत शरीर में प्राण वापस आया इसीलिए आज के दिन सावित्री के साथ वट वृक्ष की भी पूजा होती है l वैसे भी हमारे सनातन धर्म की मान्यता है कि वट वृक्ष के जड़ में ब्रह्मा, तना में भगवान विष्णु और पतियों में शंकर का वास है l

विचार करने वाली बात यह है कि सावित्री के पास कौन सा ज्ञान था जिसके द्वारा वह ध्यानयोग में जाकर यमराज से बात किया l शरीर के रहते सूक्ष्म शरीर के साथ वह भी यमराज के पीछे पीछे चल पड़ी l जब हम भी तत्वज्ञानी सद्गुरू से उस आत्मज्ञान को जानेंगे तो हम भी प्रभु के नाम की कृपा से ध्यानयोग में जा सकते हैं l
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ावित्री
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ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम |छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ||आप सभी देशवासियों को न्याय के देवता सूर्यप...
16/05/2026

ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम |
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ||

आप सभी देशवासियों को न्याय के देवता सूर्यपुत्र भगवान श्री शनि देव जी की पावन जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं!

श्री शनि देव जी महाराज की कृपा से आप सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मकता का संचार हो, यही मंगलकामना है।।
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वैदिक मंत्रदृष्टा ऋषिकाओं से लेकर आधुनिक भारत की सामर्थ्यवान मातृसत्ता तक परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में नारी का यो...
10/05/2026

वैदिक मंत्रदृष्टा ऋषिकाओं से लेकर आधुनिक भारत की सामर्थ्यवान मातृसत्ता तक परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में नारी का योगदान अतुलनीय, अविस्मरणीय और सनातन संस्कृति का जीवनाधार रहा है। भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति को केवल जैविक जननी के रूप में नहीं देखा गया, अपितु उसे सृष्टि की आधारशक्ति, धर्म की संरक्षिका, संस्कारों की जननी तथा लोकमंगल की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वेदों में जहाँ घोषा, लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी जैसी ऋषिकाएँ ब्रह्मविद्या की परम साधिका बनकर ज्ञान की दिव्य परम्परा को आलोकित करती हैं, वहीं आधुनिक भारत में भी मातृशक्ति अपने धैर्य, तप, त्याग, करुणा और अदम्य संकल्प से राष्ट्रजीवन को दिशा प्रदान कर रही है।

भारतीय दर्शन में परमात्मा के विविध पारमार्थिक अनुप्रयोग- करुणा, कोमलता, वात्सल्य, पवित्रता, क्षमा और औदार्य मातृसत्ता में ही सर्वाधिक मूर्तिमान होकर अभिव्यक्त होते हैं। माँ केवल एक सम्बन्ध नहीं, अपितु वह अनन्त प्रेम का ऐसा दिव्य स्रोत है, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि के लिए स्थान है। वह अपने अस्तित्व का प्रत्येक अंश अपने संतानों के कल्याण में अर्पित कर देती है। इसी कारण भारतीय मनीषा ने माता को देवताओं से भी उच्च स्थान प्रदान करते हुए कहा गया है - “मातृदेवो भव”।

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं, नास्ति मातृसमा प्रिया ।।

अर्थात् माता के समान कोई छाया नहीं, माता के समान कोई आश्रय नहीं, माता के समान कोई रक्षक नहीं और माता के समान कोई प्रिय भी नहीं। यह श्लोक केवल भावनात्मक स्तुति नहीं, बल्कि मानव जीवन के शाश्वत सत्य का उद्घोष है। माँ का वात्सल्य जीवन की प्रथम पाठशाला है। उसके स्नेह में सुरक्षा है, उसकी वाणी में संस्कार हैं और उसके तप में सम्पूर्ण परिवार की मंगलकामना निहित रहती है।

‘माँ’ शब्द स्वयं परमात्मा की भाँति विराट, व्यापक और अनन्त संवेदना का प्रतीक है। जिस प्रकार परमात्मा समस्त जगत् का पालन करते हुए निरन्तर लोकमंगल में रत रहता है, उसी प्रकार माता भी अपने जीवन का प्रत्येक क्षण दूसरों के सुख, संरक्षण और उत्थान के लिए समर्पित कर देती है। वह स्वयं कष्ट सहकर भी परिवार को सुख देती है, स्वयं तपकर भी संतानों के जीवन में प्रकाश भरती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को “धरणी माता”, गंगा को “गंगा माता”, गौ को “गौ माता” और वेदभूमि भारत 🇮🇳 को “भारत माता” कहकर संबोधित किया गया है। मातृत्व यहाँ केवल सम्बन्ध नहीं, अपितु सम्पूर्ण अस्तित्व का आध्यात्मिक अनुभव है।

वैदिक ऋषियों ने नारी को सृष्टि की मूल चेतना माना है। देवीसूक्त में ऋषिका कहती हैं - “अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्” अर्थात् मैं राष्ट्र को धारण करने वाली शक्ति हूँ। यह उद्घोष दर्शाता है कि राष्ट्र निर्माण का मूल आधार मातृशक्ति ही है। किसी भी समाज की संस्कृति, नैतिकता, संवेदना और आध्यात्मिक चेतना का निर्माण माँ की गोद में ही होता है। यदि मातृशक्ति संस्कारित, जागृत और सशक्त है, तो राष्ट्र स्वतः समृद्ध, सभ्य और प्रकाशमान बन जाता है।

आज के युग में जब भौतिकता, प्रतिस्पर्धा और आत्मकेन्द्रित प्रवृत्तियाँ जीवन-मूल्यों को चुनौती दे रही हैं, तब मातृत्व की करुणा, त्याग और सहिष्णुता सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है। माँ केवल अपने परिवार का पालन नहीं करती, वह समाज में संवेदना, संयम और सहअस्तित्व के संस्कार भी स्थापित करती है। उसका मौन तप ही सभ्यता की निरन्तरता का आधार है।

"अंतर्राष्ट्रीय मातृ दिवस" केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, अपितु समस्त मातृशक्ति के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और वन्दन का पावन अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि हमारे जीवन की प्रत्येक उपलब्धि, प्रत्येक संस्कार और प्रत्येक सफलता के मूल में किसी माँ का मौन त्याग, निस्वार्थ प्रेम और अनन्त आशीर्वाद निहित है।

विधाता को अपने उदर में पोषित करने वाली, प्राणी मात्र के कल्याण हेतु अपना सर्वस्व आहूत कर देने वाली समस्त मातृसत्ता को कोटिशः नमन। मातृत्व मानवता की वह दिव्य धारा है जो इस सृष्टि को करुणा, प्रेम और जीवन से सिंचित करती रहती है।

"अंतर्राष्ट्रीय मातृ दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएँ।


#वन्देमातरम्
#मातृ_दिवस

“न मातु: परदैवतम्” “मातृ देवो भव ..”!माँ ईश्वरीय करुणा की जीवन्त अभिव्यक्ति है। परमात्मा नाना रूपों में विस्तृत अपनी संत...
10/05/2026

“न मातु: परदैवतम्”
“मातृ देवो भव ..”!

माँ ईश्वरीय करुणा की जीवन्त अभिव्यक्ति है। परमात्मा नाना रूपों में विस्तृत अपनी संततियों से वात्सल्य स्नेहन दुलार के लिए माँ के ममत्व अर्थात् मातृ प्रकृति में ही प्रकट होता है।

सृष्टि के सृजन विकास क्रम में मातृ सत्ता की महत्ता एवं उपादेयता को प्रतिपादित करने एवं मातृत्व के त्याग, तप और समर्पण के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के उद्देश्य से मनाए जाने वाले "मातृ दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएँ !

#मातृ_दिवस
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देवी की पूजा में ज्योति क्यों जगायी जाती है ?देवीभागवत पुराण में कहा गया है–‘सृष्टि के आदि में एक देवी ही थी, उसने ही ब्...
08/05/2026

देवी की पूजा में ज्योति क्यों जगायी जाती है ?

देवीभागवत पुराण में कहा गया है–‘सृष्टि के आदि में एक देवी ही थी, उसने ही ब्रह्माण्ड उत्पन्न किया; उससे ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र उत्पन्न हुए । अन्य सब कुछ उससे ही उत्पन्न हुआ । वह ऐसी पराशक्ति (महाशक्ति) है ।’

सारा जगत अनादिकाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शक्ति की उपासना में लगा हुआ है । महाशक्ति ही सर्वोपरि है । ब्रह्म भी शक्ति के साथ पूजे जाते हैं । जैसे पुष्प से गंध अलग नहीं की जा सकती है, गंध ही चारों ओर फैल कर पुष्प का परिचय कराती है; उसी तरह शक्ति ही ब्रह्म का बोध कराती है । सभी जगह शक्ति का ही आदर और बोलबाला है क्योंकि शक्तिहीन वस्तु जगत में टिक ही नहीं सकती है ।

देवताओं के अहंकार के नाश के लिए देवी ने धारण किया ज्योति-अवतार!!!!!!!!

देवी (माता) की पूजा में ज्योति जगाने (जलाने) का सम्बन्ध देवी के ज्योति-अवतार से है । देवी के ज्योति-अवतार की कथा इस प्रकार से है—

एक बार देवताओं और दैत्यों में युद्ध छिड़ गया । इस युद्ध में देवता विजयी हुए । इससे देवताओं के मन में अहंकार हो गया । सभी देवता अपने मन में कहते—‘यह विजय मेरे कारण हुई है, यदि मैं न होता तो विजय नहीं हो सकती थी ।’

मां जगदम्बा बड़ी कृपालु हैं । वे देवताओं के अहंकार को समझ गयीं । उनको पता था कि यह अहंकार देवताओं को ‘देवता’ नहीं रहने देगा । अहंकार के कारण ही असुर ‘असुर’ कहलाते हैं । देवताओं में वही अहंकार जड़े जमा रहा है, इसके कारण संसार को फिर कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

देवताओं के अहंकार के नाश के लिए देवी एक ऐसे तेज:पुंज के रूप में उनके सामने प्रकट हो गयीं, वैसा तेज:पुंज आज तक किसी ने देखा न था । उस तेज:पुंज को देखकर सभी देवता हक्के-बक्के रह गये और एक-दूसरे से पूछने लगे—‘यह क्या है ? देवताओं को आश्चर्यचकित करने वाली यह माया किसके द्वारा रची गयी है ?’

भ्रमित हुए देवराज इन्द्र ने वायुदेव को उस तेज:पुंज के बारे में पता लगाने के लिए भेजा । घमण्ड से भरे हुए वायुदेव ने उस तेज:पुंज के पास गए । तेज:पुंज ने पूछा—‘तुम कौन हो ?’

वायुदेव ने कहा—‘मैं वायु हूँ । मातरिश्वा हूँ । सबका प्राणस्वरूप हूँ । मैं ही सम्पूर्ण जगत का संचालन करता हूँ ।’

तेज:पुंज ने वायुदेव के सामने एक तिनका रखकर कहा—‘यदि तुम सब कुछ संचालन कर सकते हो तो इस तिनके को चलाओ ।’

वायुदेव ने अपनी सारी शक्ति लगा दी पर तिनका टस-से-मस न हुआ । वे लज्जित होकर इन्द्रदेव के पास लौट आए और कहने लगे कि ‘यह कोई अद्भुत शक्ति है, इसके सामने तो मैं एक तिनका भी न उड़ा सका ।’

देवराज इन्द्र ने फिर अग्निदेव को बुलाकर कहा—‘अग्निदेव ! चूंकि आप ही हम लोगों के मुख हैं इसलिए वहां जाकर यह मालूम कीजिए कि ये तेज:पुंज कौन है ? ‘

इन्द्र के कहने पर अग्निदेव तेज:पुंज के पास गए । तेज:पुंज ने अग्निदेव से पूछा —‘तुम कौन हो ? तुममें कौन-सा पराक्रम है, मुझे बतलाओ ?’

अग्निदेव ने कहा—‘ मैं जातवेदा हूँ, अग्नि हूँ । सारे संसार को दग्ध करने की ताकत मुझमें है ।’

तेज:पुंज ने अग्निदेव से उस तिनके को जलाने के लिए कहा । अग्निदेव ने अपनी सारी शक्ति लगा दी पर वे उस तिनके को जला न सके और मुंह लटकाकर इन्द्रदेव के पास लौट आये ।

तब सभी देवता बोले—‘झूठा गर्व और अभिमान करने वाले हम लोग इस तेज:पुंज को जानने में समर्थ नहीं है, यह तो कोई अलौकिक शक्ति ही प्रतीत हो रही है । इन्द्रदेव ! आप हम सब के स्वामी हैं, अत: आप ही इस तेज:पुंज के बारे में पता लगाइए ।’

तब सहस्त्र नेत्रों वाले इन्द्र स्वयं उस तेज:पुंज के पास पहुंचे । इन्द्र के पहुंचते ही वह तेज:पुंज गायब हो गया । यह देखकर इन्द्र बहुत लज्जित हुए । तेज:पुंज के उनसे बात तक न करने के कारण वे अपने-आप को मन में छोटा समझने लगे । वे सोचने लगे कि अब मैं देवताओं को क्या मुंह दिखाऊंगा । मान ही महापुरुषों का धन है, जब मान ही न रहा तो इस शरीर का त्याग करना ही उचित है । इन्द्रदेव का सारा अहंकार नष्ट हो गया ।

तभी गगनमण्डल में आकाशवाणी हुई कि—‘इन्द्रदेव ! तुम पराशक्ति का ध्यान करो और उन्हीं की शरण में जाओ ।’ इन्द्रदेव पराशक्ति की शरण में आकर मायाबीज का जप करते हुए ध्यान करने लगे।

एक दिन चैत्रमास की नवमी तिथि को मां पराम्बा (महाशक्ति) ने अपना स्वरूप प्रकट किया । वे अत्यन्त सुन्दरी थीं, लाल रंग की साड़ी पहने उनके अंग-अंग से नवयौवन फूट रहा था । उनमें करोड़ों चन्द्रमाओं से बढ़कर आह्लादकता थी । करोड़ों कामदेव उनके रूप पर न्यौछावर हो रहे थे । उन्होंने चमेली की माला व वेणी व लाल चंदन धारण किया हुआ था ।

देवी बोलीं—‘मैं ही परब्रह्म हूँ, मैं ही परम ज्योति हूँ, मैं ही प्रणवरूपिणी हूँ । मेरी ही कृपा और शक्ति से तुम लोगों ने असुरों पर विजय पायी है । मेरी ही शक्ति से वायुदेव बहा करते हैं और अग्निदेव जलाया करते हैं । तुम लोग अहंकार छोड़कर सत्य को जानो ।’

देवी के वचन सुनकर देवताओं को अपनी भूल ज्ञात हो गयी और वे अहंकार रूपी असुर से ग्रस्त होने से बच गये । उन्होंने क्षमा मांगकर देवी से प्रसन्न होने की प्रार्थना की और कहा कि आप हम पर ऐसी कृपा करें कि हममें कभी अहंकार न आए ।

तब से देवी की पूजा—अष्टमी, नवरात्र व जागरण आदि में माता के ज्योति अवतार के रूप में ज्योति या अखण्ड ज्योति जगायी जाती है । नवरात्र में प्रतिदिन देवी की ज्योति जगाकर उसमें लोंग का जोड़ा, बताशा, नारियल की गिरी, घी, हलुआ-पूरी आदि का भोग लगाया जाता है ।
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पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।ज्येष्ठ माह के प्रथम बड़े मंगल की हार्दिक बधाई एव...
05/05/2026

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

ज्येष्ठ माह के प्रथम बड़े मंगल की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
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एक बार यशोदा माँ यमुना मे दीप दान कर रही थी, वो पत्ते मे दीप रखकर प्रवाह कर रही थी, उन्होंने देखा कि कोई दीप आगे नहीं जा...
04/05/2026

एक बार यशोदा माँ यमुना मे दीप दान कर रही थी, वो पत्ते मे दीप रखकर प्रवाह कर रही थी, उन्होंने देखा कि कोई दीप आगे नहीं जा रहा, ध्यान से देखा तो कान्हा जी एक लकडी लेकर जल से सारे दीप बाहर निकाल रहे थे तो माँ कहती है "लल्ला तू ये का कर रहो है? कान्हा कहते है "मैया, ये सब डूब रहे थे तो मै इन्हे बचा रहा हूँ। माँ ये सब सुनकर हँसने लगी और बोली लल्ला, तू केको केको बचायेगा? ये सुनकर कान्हा जी ने बहुत सुन्दर जवाब दिया- माँ मैने सबको ठेको थोडी न ले रखो है, जो मेरी ओर आएंगे उनको बचाऊंगा!

इसलिये हमेशा दास्य भाव से भगवान के साथ रहे!🙏🏼
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 #बुद्ध_का_जीवन_दर्शन    यह संसार दुःखों की खान है, इससे बचने के लिए सिद्धार्थ ने अपने जीवन में मन को ऊर्ध्वगामी बनाकर आ...
01/05/2026

#बुद्ध_का_जीवन_दर्शन
यह संसार दुःखों की खान है, इससे बचने के लिए सिद्धार्थ ने अपने जीवन में मन को ऊर्ध्वगामी बनाकर आत्मा में स्थिर होकर उस चैतन्य शक्ति की आराधना की, जिसके जरिये वे सिद्धार्थ से बुद्ध कहलाए। बुद्ध ने अपने जीवन में बहुत सारे संघर्षों से युद्ध करते हुए अपने मानव चोले को सार्थक किया तथा दूसरों को भी यह संदेश दिया कि हे मानव ! उठो, अपनी आत्मा की आवाज को पहचानो कि तुम कौन हो? आत्मा में स्थिर होकर ही जीव शब्द- ब्रह्म से जुड़ सकता है। शब्द ब्रह्म से जुड़ने के लिए हमें मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ती है। बुद्ध ने भी अपने जीवन में अनेक लोगों को अपना गुरु बनाया। अंत में जब उन्होंने बुद्धत्व की प्राप्ति की, तब कहा कि जीवन में वही व्यक्ति आनंद को प्राप्त कर सकता है जो अपनी इंद्रियों को संयमित कर आत्मतत्त्व में तद्रूप होकर स्वाध्याय करेगा तो निश्चित रूप से उस साधक
का जीवन सुखमय बनेगा।

"उम्र बढ़े हों शिथिल अंग रोगी शरीर है कांपा ।
शिशु से किशोर युवा वृद्ध हो तन में लगा बुढ़ापा ।।
राम के नाम का सत्य न जाना कैसी हुई कुमत ।
श्वास निकल गई जिस दिन बोले राम नाम सत।।
जगत् के इसी सत्य को देखा सिद्धार्थ हुए वैरागी।
निकल पड़े तज महल को सच की जिज्ञासा लागी ।
हम भी जागें तृष्णा छोड़ें दुख हो सब अवरुद्ध।
महारोग जग का सब छूटा सिद्धार्थ हुए बुद्ध।।
आपस में चल रही लड़ाई विश्व शांति के लिए युद्ध।
मैत्री होगी सत्पुरुष को पहचानो जो हैं मैत्रेय बुद्ध।।
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ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥समस्त देशवासियों को भगवान विष...
30/04/2026

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥

समस्त देशवासियों को भगवान विष्णु के अवतार, भगवान नरसिंह जी की पावन जयंती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं!

भगवान नरसिंह जी की कृपा से सभी के जीवन में साहस, धर्मनिष्ठा और विजय का संचार हो, यही प्रार्थना है।
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सीया राम मय सब जग जानी करऊ प्रणाम ज़ोरी जुग पानी ॥ त्याग, तपस्या, प्रेम, और पवित्रता की प्रतिमूर्ति जनक नंदनी माता सीता ...
25/04/2026

सीया राम मय सब जग जानी
करऊ प्रणाम ज़ोरी जुग पानी ॥

त्याग, तपस्या, प्रेम, और पवित्रता की प्रतिमूर्ति जनक नंदनी माता सीता जी के प्राकटयोत्सव जानकी नवमी की सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
#जानकी_नवमी

सदा सूँघती आपनो, जिय को जीवन प्रान।सो तू बिसर्यो सहज ही, हरि ईश्वर भगवान्॥-संत सूरदास जीभगवान श्रीकृष्ण जी के अनन्य उपास...
21/04/2026

सदा सूँघती आपनो, जिय को जीवन प्रान।
सो तू बिसर्यो सहज ही, हरि ईश्वर भगवान्॥
-संत सूरदास जी

भगवान श्रीकृष्ण जी के अनन्य उपासक, ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि एवं महान संत सूरदास जी की जयंती पर उन्हें शत शत नमन!

उनकी भक्ति और संवेदना से ओतप्रोत रचनाएं भारतीय भक्ति साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं, जो आज भी हम सभी को श्रद्धा, प्रेम और भक्ति भाव से प्रेरित करती हैं।
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