16/05/2026
वट सावित्री व्रत
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प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के अमावस्या को उत्तर भारत की सुहागिनियों द्वारा तथा ज्येष्ठ मास के पूर्णिमा के दिन दक्षिण भारत की सुहागिनियों द्वारा वट सावित्री व्रत का पालन किया जाता है l
हमारे देश का इतिहास नारी शक्ति की बुनियाद पर टिका है l भारत देश में एक से बढ़कर एक पतिव्रता नारी का जन्म हुआ जिन्होंने अपनी मर्यादा, त्याग, तपस्या और पतिव्रत धर्म से काल तो क्या भगवान को भी अपने वश में कर लिया l सती अनसुईया ने अपनी तप और सतीत्व की शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी बालक बना कर अपनी गोद में खिलाया था l
ऐसी ही एक देवी थी सती सावित्री जिसने अपने पति के प्राण को यमराज से भी छीन लिया था l
सावित्री एक तत्वज्ञानी राजऋषि अश्वपति की एकलौती कन्या थी l ऋषि पुत्री होने के कारण बचपन से ही वह आध्यात्मिक माहौल में पली बढ़ी जिससे उसके अन्दर सत्य-धर्म, नेम, आचार, व्रत आदि गुण कूट-कूट कर भरे थे l अपने पिता से उसे आत्मज्ञान भी प्राप्त था l पिता की भाँति सावित्री भी सदा भगवान के ध्यान-भजन में लीन रहती थी l
जब सावित्री यौवन अवस्था को प्राप्त हुई तो पिता को उसके विवाह की चिन्ता सताने लगी l एक दिन सावित्री अपने पिता के साथ योग्य वर की तलाश में किसी वन से गुजर रही थी तो उसने एक सुन्दर, सुशील और धर्मात्मा युवक को देखा जो अपने माता-पिता की सेवा में मग्न था l वह निर्वासित राजा द्युमत्सेन का पुत्र सत्यवान था l
सावित्री मन ही मन सत्यवान को पति रूप में वरण कर लिया l उसी समय नारद मुनि प्रकट हुए और सत्यवान की भाग्य रेखा देख कर कहा कि सत्यवान की उम्र सिर्फ एक वर्ष बची है l पिता ने समझाया कि बेटी सत्यवान को मन से त्याग दे l सावित्री कहती है कि भारतीय नारी पतिव्रता होती है जो एक बार किसी पुरूष को मन में बसा ले तो दूसरे पुरुष का ख्याल सपने में भी नहीं लाती l
सावित्री का विवाह सत्यवान से हो गया l सावित्री पति के साथ वन में ही रहकर अपने अन्धे सास-ससुर और पति की सेवा करने लगी साथ ही प्रभु का ध्यान-भजन भी करती थी l
जब सत्यवान का अन्तिम दिन आया तो सावित्री बहुत चिन्तित थी l उस दिन अपने पति के साथ वह भी लकड़ी लाने गई l जब लकड़ी काटते वक्त सत्यवान का सिर चकराया तो सावित्री उसे एक वट वृक्ष के नीचे ले गई और उसके सिर को गोद में रखकर लिटा दिया l सावित्री नाम का सुमिरण करते हुए ध्यानयोग में चली गई l सावित्री देखती है कि यमराज उसके पति के प्राण को लेकर जा रहे हैं l सावित्री भी ध्यानयोग के द्वारा सूक्ष्म शरीर को लेकर यमराज के पीछे चलने लगी l यमराज कहते हैं बेटी तुम तो ब्रह्मज्ञानी हो, सब जानती हो कि मनुष्य की जितनी आयु रहती है उतने दिन ही धरती पर निवास करता है l तेरा पति का समय पूरा हो गया अब तू लौट जा l सावित्री नहीं मानी तो यमराज उसे तीन वरदान मांगने को कहा l सावित्री ने पहला वरदान में सास-ससुर की आंख माँगी l दूसरा वरदान अपने पति का खोया हुआ राज्य तथा तीसरा वरदान अपने लिए सौ पुत्र माँगे l यमराज ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए बिना विचारे तथास्तु कह दिया l सावित्री फिर भी यमराज के पीछे चलती जा रही थी l भगवान यमराज ने पूछा अब क्या चाहिए ? सावित्री बोली आपने सौ पुत्र देने का वरदान दिया है और मैं एक पतिव्रता स्त्री हूँ l इतना सुनना था कि यमराज लज्जित हो गए और सत्यवान के प्राण लौटा कर दीर्घजीवी होने का आशीर्वाद दिया ll
चूँकि वट वृक्ष के नीचे सत्यवान का मृत शरीर में प्राण वापस आया इसीलिए आज के दिन सावित्री के साथ वट वृक्ष की भी पूजा होती है l वैसे भी हमारे सनातन धर्म की मान्यता है कि वट वृक्ष के जड़ में ब्रह्मा, तना में भगवान विष्णु और पतियों में शंकर का वास है l
विचार करने वाली बात यह है कि सावित्री के पास कौन सा ज्ञान था जिसके द्वारा वह ध्यानयोग में जाकर यमराज से बात किया l शरीर के रहते सूक्ष्म शरीर के साथ वह भी यमराज के पीछे पीछे चल पड़ी l जब हम भी तत्वज्ञानी सद्गुरू से उस आत्मज्ञान को जानेंगे तो हम भी प्रभु के नाम की कृपा से ध्यानयोग में जा सकते हैं l
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