Kanha kripa

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Kanha kripa प्रभु कृष्ण के लिये, उनकी सेवा के लिये, उनकी प्रसन्नता के लिये, उनकी लीलाओं की कीर्तिऔर उनके द्वारा भगवत गीता के उपदेश का उल्लेख कर निमित्त मात्र🙏

🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹🌾 प्रकृति का संसर्ग होने से ही पुरुष अपने को अपने वास्तविक स्वरुप के विपरीत लिंगशरीर मान बैठा है ...
07/10/2026

🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹

🌾 प्रकृति का संसर्ग होने से ही पुरुष अपने को अपने वास्तविक स्वरुप के विपरीत लिंगशरीर मान बैठा है वह विपर्यय भगवान के भजन से शीघ्र ही दूर हो जाता है।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)

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🍃ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🍃💐 इसी से ऐसा कहते हैं कि प्रवृत्ति मार्ग में रहकर किए हुए लौकिक और वैदिक दोनों ही प्रकार के कर्म ...
07/10/2026

🍃ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🍃

💐 इसी से ऐसा कहते हैं कि प्रवृत्ति मार्ग में रहकर किए हुए लौकिक और वैदिक दोनों ही प्रकार के कर्म जीव को संसार की ही प्राप्ति कराने वाले हैं💐

(श्रीमद्भागवत महापुराण)

🍁बोल हरी बोल हरी हरी हरी बोल। केशव माधव गोविंद बोल🍁

💐हे वासुदेव श्रीकृष्ण💐🌼राजन्! जबतक मनुष्य ज्ञानोदयके द्वारा इस मायाका तिरस्कार कर, सबकी आसक्ति छोड़कर तथा काम-क्रोधादि छ...
07/10/2026

💐हे वासुदेव श्रीकृष्ण💐

🌼राजन्! जबतक मनुष्य ज्ञानोदयके द्वारा इस मायाका तिरस्कार कर, सबकी आसक्ति छोड़कर तथा काम-क्रोधादि छः शत्रुओंको जीतकर आत्मतत्त्वको नहीं जान लेता और जब तक वह आत्माके उपाधिरूप मनको संसार-दुःखका क्षेत्र नहीं समझता, तबतक वह इस लोकमें यों ही भटकता रहता है, क्योंकि चित्त उसके शोक, मोह, रोग, लोभ और वैर आदिके संस्कार तथा ममता की वृद्धि करता रहता है। यह मन ही तुम्हारा बड़ा बलवान् शत्रु है। तुम्हारी उपेक्षा करनेसे इसकी शक्ति और भी बढ़ गयी है। यह यद्यपि स्वयं तो सर्वथा मिथ्या है, तथापि इसने तुम्हारे आत्मस्वरूपको आच्छादित कर रखा है। इसलिये तुम सावधान होकर श्रीगुरु और हरिके चरणोंकी उपासनाके अस्त्रसे इसे मार डालो।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)

🌺बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌺

🌹ॐ नमो नारायणाय🌹🍂अगुन अदभ्र गिरा गोतीता।सबदरसी अनबद्य अजीता।निर्मम निराकार निरमोहा।नित्य निरंजन सुख संदोहा।ईश्वर उस माया...
07/10/2026

🌹ॐ नमो नारायणाय🌹

🍂अगुन अदभ्र गिरा गोतीता।सबदरसी अनबद्य अजीता।
निर्मम निराकार निरमोहा।नित्य निरंजन सुख संदोहा।

ईश्वर उस मायाके लक्षणोंसे रहित, महान शब्द और इन्द्रियोंसे अलग सबकुछ देखनेवाला निर्दोष, अविजित, ममतारहित, निराकार, मोहरहित, नित्य, सर्वदा
मायारहित और सुख का भंडार है।

🌿प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी।ब्रह्म निरीह बिरज अविनासी।
इहाॅ मोह कर कारन नाहीं।रवि सन्मुख तम कवहुॅ कि जाही।

प्रकृति से परे ईश्वर सबके हृदयमें बसते हैं। वे इच्छारहित, विकारों से विलग, अविनाशी ब्रह्म हैं। प्रभु किसी मोह के कारण नहीं हैं।अन्धकार समूह क्या कभी सूर्य के समक्ष जा सकता हैं।

🌱सुनु खगेस हरि भगति बिहाईं।जे सुख चाहहिं आन उपाई।
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी।पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।

जो लोग ईश्वर की भक्तिके बिना अन्य उपायों से सुख चाहते हैं वे मूर्ख और अभागे बिना जहाज के तैर कर महासागर के पार जाना चाहते हैं।

🍃जे असि भगति जानि परिहरहीं।केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।
ते जड़ कामधेनु गृॅह त्यागी।खोजत आकु फिरहिं पय लागी।

जो भक्ति की महत्ता जानकर भी उसे नही अपनाते एवं निरा ज्ञानके लिये परिश्रम करते हैं वे मूर्ख घर के कामधेनु को छोड़ दूधके लिये आक के पेड़ को खोजते फिर रहे हैं।

🌸ईश्वर अंस जीव अविनासी।चेतन अमल सहज सुखरासी।

जीव ईश्वर का हीं अंश है। अतएव वह चेतन, अविनाशी, निर्मल एवं स्वभाव से हीं सुख से सम्पन्न है।

भगति करत बिनु जतन प्रयासा।संसृति मूल अविद्या नासा।

🌻ईश्वर-भक्ति संसाररूपी अविद्या को बिना प्रयास, परिश्रम के नष्ट कर देता है।

ब्रम्ह पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं
कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं।

🌾वेद, समुद्र, ज्ञान, मंदराचल पर्वत, संत, देवता हैं जो समुद्र को मथकर कथारूप में अमृत निकालते हैं जिसमें भक्ति की मिठास बसी रहती है।

🥗कमठ पीठ जामहिं बरू बारा।बंध्यासुत बरू काहुहिं मारा।
फूलहिं नभ बरू बहु बिधि फूला।जीवन लह सुख हरि प्रतिकूला।

कछुए की पीठ पर बाल उग सकते है। बाॅझका बेटा भले किसी को मार दे। आकाश में अनेक किस्म के फूल खिल जायें लेकिन प्रभु से विमुख जीव सुख नही पा सकता है।

🌺जे ब्रह्म अजम द्वैतमनु भवगम्य मन पर ध्यावहीं।

ब्रह्म अजन्मा एवं अद्वैत है।वह केवल अनुभव से जाना जाता है। वह मन से परे है।

🌷बैर न विग्रह आस न त्रासा।सुखमय ताहि सदा सब आसा।
अनारंभ अनिकेत अमानी।अनघ अरोस दच्छ विग्यानी।

किसी से भी शत्रुता, लड़ाई, झगड़ा, न आशा, न भय रखना हीं काफी है। उसके लिये सभी तरफ सुख हीं सुख है। कभी भी फल की आशा से कर्म न करे। घर से कोई विशेष मोह ममता न रखे। इज्जत पाने की चिन्ता न रखे। पाप और क्रोध से दूर रहे-वही भक्ति में कुशल और ज्ञानी है।

🍀प्रीति सदा सज्जन संसर्गा।तृन सम विशय स्वर्ग अपवर्गा।
भगति पच्छ हठ नहि सठताई।दुश्ट तर्क सब दूरि बहाई।

संतो की संगति से जिसे हमेशा प्रेम रहे, जिसके मन मे विषय, भोग, स्वर्ग एवं मोक्ष सब घास के तिनके की तरह तुच्छ हो, जो भक्ति के लिये हठी हो, जो दूसरों के विचार का खण्डन करने की मूर्खता नही करता हो, जिसने सभी कुतर्कों को दूर कर दिया हो- वही सच्चा भक्त है।

🥀सोइ सर्वग्य तग्य सोइ पंडित।सोइ गुन गृह विज्ञान अखंडित।
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई।जाकें पद सरोज रति होई।

वह सर्वज्ञ, तत्वज्ञ एवं पंडित है। वह गुणों का घर एवं अखंड ज्ञानी विद्वान है। वह चतुर और सभी अच्छे गुणों से युक्त है जिसे प्रभु के चरणों में प्रेम है।

🍂आस त्रास इरिसादि निवारक।विनय विवेक विरति विस्तारक।

ईश्वर सांसारिक भोगोंकी आशा, भय, ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले तथा विनयशीलता, विवेक, बुद्धि और वैराग्यके बढ़ाने बाले हैं।

🌳कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।जोग न मख जप तप उपवासा।
सरल सुभाव न मन कुटिलाई।जथा लाभ संतोश सदाई।

भक्ति के रास्ते में कोई परिश्रम नही है। इसके लिये न योग, जप, तपस्या या उपवास करने की जरूरत है। केवल स्वभाव की सरलता, मन में कुटिलता का त्याग एवं जितना मिले उसी में संतोष करना हीं पर्याप्त है।

🌷 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌷

🌼ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🌼भगवत गीताअध्याय 18श्लोक 71 से 78 (अध्याय समाप्त)श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।सोऽपि मुक्त...
07/10/2026

🌼ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🌼

भगवत गीता
अध्याय 18
श्लोक 71 से 78 (अध्याय समाप्त)

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तःशुर्भौल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।।71।।

जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र को श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।(71)

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय।।72।।

हे पार्थ ! क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनंजय ! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?(72)

अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रासादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।73।।

अर्जुन बोलेः हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है। अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।(73)

संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।।74।।

संजय बोलेः इस प्रकार मैंने श्रीवासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अदभुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना।(74)

व्यासप्रासादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्।।75।।

श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना है।(75)

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद् भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।।76।।

हे राजन ! भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त कल्याणकारक और अदभुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।(76)

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः।।77।।

हे राजन ! श्री हरि के उस अत्यन्त विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।(77)

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।78।।

हे राजन ! जहाँ योगेवश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है – ऐसा मेरा मत है।(78)

ॐ तत्सदिति श्रीमद् भगवद् गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ।।18।।

भगवत गीता सम्पूर्ण हुई।🙏

🌳ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌳🍂 जो अन्न प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सांयकाल तक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रस से पुष्ट हुए शरीरकी ...
06/10/2026

🌳ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌳

🍂 जो अन्न प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सांयकाल तक बिगड़ जाता है; फिर उसीके रस से पुष्ट हुए शरीरकी नित्यता कैसी।
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

🌸बोल हरि बोल हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌸

🌺ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌺🏵️ यदि आपको परमगतिकी इच्छा है तो अपने मुख से ही श्रीमद्भागवतके आधे अथवा चौथाई श्लोकका भी नित्य नि...
06/10/2026

🌺ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌺

🏵️ यदि आपको परमगतिकी इच्छा है तो अपने मुख से ही श्रीमद्भागवतके आधे अथवा चौथाई श्लोकका भी नित्य नियमपूर्वक पाठ कीजिये। ॐकार, गायत्री, पुरुषसूक्त, तीनों वेद श्रीमद्भागवत, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'-- यह द्वादशाक्षर मंत्र, बारह मूर्तियोंवाले सूर्य भगवान, प्रयाग, संवत्सररूप काल, ब्राह्मण, अग्निहोत्र, गौ, द्वादशी तिथि, तुलसी, वसंत ऋतु और भगवान पुरुषोत्तम-- इन सबमें बुद्धिमान लोग वस्तुतः कोई अंतर नहीं मानते। जो पुरुष अहर्निशअर्थ सहित श्रीमद्भागवतशास्त्रका पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है-- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो पुरुष नित्यप्रति भागवतका आधा या चौथाई श्लोक भी पढता है, उसे राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका फल मिलता है। नित्य भागवतका पाठ करना, भगवानका चिंतन करना, तुलसीको सींचना और गौ की सेवा करना--ये चारों समान है। जो पुरुष अंतसमयमें श्रीमद्भागवतका वाक्य सुन लेता है, उसपर प्रसन्न होकर भगवान उसे बैकुंठधाम देते हैं। जो पुरुष इसे सोनेके सिंहासन पर रखकर विष्णुभक्तको दान करता है वह अवश्य ही भगवानका सायुज्य प्राप्त करता है।
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

🍃बोल हरि बोल हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🍃

🌺जय सियाराम जय श्रीराम🌺🌿पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान्स्वेन तेजसा ।वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थितः ॥ अन्याय में स्...
06/10/2026

🌺जय सियाराम जय श्रीराम🌺

🌿पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान्स्वेन तेजसा ।
वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थितः ॥

अन्याय में स्थित हुआ राजा बाप-दादों का राज्य पाकर भी अपने ही कर्मो से उसे इस तरह भ्रष्ट कर देता है, जैसे हवा बादल को छिन्न-भिन्न कर देती है ॥

🍁धर्ममाचरतो राज्ञः सद्भिश्चरितमादितः ।
वसुधा वसुसम्पूर्णा वर्धते भूतिवर्धनी ॥

परम्परा से सज्जन पुरुषों द्वारा किये हुए धर्म का आचरण करनेवाले राजा के राज्य की पृथ्वी धन-धान्य से पूर्ण होकर उन्नति को प्राप्त होती है और उसके ऐश्वर्य को बढ़ाती है॥

🍇अथ सन्त्यजतो धर्ममधर्मं चानुतिष्ठतः ।
प्रतिसंवेष्टते भूमिरग्नौ चर्माहितं यथा॥

जो राजा धर्म को छोड़ता और अधर्म का अनुष्ठान करता है, उसकी राज्यभूमि आग पर रखे हुए चमड़े की भाँति संकुचित हो जाती है॥

🌼य एव यत्नः क्रियते प्रर राष्ट्रावमर्दने ।
स एव यत्नः कर्तव्यः स्वराष्ट्र परिपालने ॥

जो यत्न दूसरे राष्ट्रों का नाश करने के लिये किया जाता है, वही अपने राज्य की रक्षाके लिये करना उचित है ।

☘️धर्मेण राज्यं विन्देत धर्मेण परिपालयेत् ।
धर्ममूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते ॥

धर्म से ही राज्य प्राप्त करे और धर्म से ही उसकी रक्षा करे; क्योंकि धर्ममूलक राज्यलक्ष्मी को पाकर न तो राजा उसे छोड़ता है और न वहीं राजा को छोड़ती है॥

🌳अप्युन्मत्तात्प्रलपतो बालाच्च परिसर्पतः ।
सर्वतः सारमादद्यादश्मभ्य इव काञ्चनम् ॥

निरर्थक बोलने वाले, पागल तथा बकवाद करनेवाले बच्चे से भी सब ओरसे उसी भाँति तत्वकी बात ग्रहण करनी चाहिये, जैसे पत्थरों में से सोना ले लिया जाता है॥

🍒सुव्याहृतानि सुधियां सुकृतानि ततस्ततः ।
सञ्चिन्वन्धीर आसीत शिला हारी शिलं यथा ॥

जैसे उष्छवति से जीविका चलाने वाला एक-एक दानों चुगता रहता है, उसी प्रकार धोर पुरुष को सत्कर्मो का संग्रह करते रहना चाहिये ॥

🌵गन्धेन गावः पश्यन्ति वेदैः पश्यन्ति ब्राह्मणाः ।
चारैः पश्यन्ति राजानश्चक्षुर्भ्यामितरे जनाः ॥

गोएँ गन्धसे, ब्राह्मण लोग वेदों से, राजा जासूसों से और अन्य साधारण लोग आँखों से देखा करते हैं ॥

🌸भूयांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा ।
अथ या सुदुहा राजन्नैव तां विनयन्त्यपि ॥

राजन ! जो गाय बड़ी कठिनाई से दुने देती हैं, वह बहुत क्लेश उठाती हैं; किंतु जो आसानी से दुध देती है, उसे लोग कष्ट नहीं देते।।

🌾यदतप्तं प्रणमति न तत्सन्तापयन्त्यपि ।
यच्च स्वयं नतं दारु न तत्संनामयन्त्यपि ॥

जो धातु बिना गरम किये मुड़ जाते हैं, उन्हें आगमें नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे लोग झुकाने का प्रयल्न नहीं करते।।

💐एतयोपमया धीरः संनमेत बलीयसे ।
इन्द्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे॥

इस दृष्टान्त के अनुसार बुद्धिमान् पुरुष को अधिक बलवान के सामने झुक जाना चाहिये; जो अधिक बलवान के सामने झुकता है, वह मानो इन्द्रदेवता को प्रणाम करता है॥

पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मित्र बान्धवाः ।
पतयो बान्धवाः स्त्रीणां ब्राह्मणा वेद बान्धवाः॥

पशुओं के रक्षक या स्वामी हैं बादल, राजाओं के सहायक हैं मन्त्री, ख्तरियों के बन्धु (रक्षक) हैं पति और ब्राह्मणों के बान्धव हैं वेद ॥

🌺 भजमन नारायण नारायण लक्ष्मी नारायण नारायण नारायण।🌺

🌺ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🌺भगवत गीताअध्याय 18श्लोक 64 से 70सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्...
06/10/2026

🌺ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🌺

भगवत गीता
अध्याय 18
श्लोक 64 से 70

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।64।।

सम्पूर्ण गोपनियों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा।(64)

मन्मना भव मद् भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।65।।

हे अर्जुन ! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करनेवाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।(65)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।66।।

सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।(66)

इदं ते नातपस्काय नाभाक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।67।।

तुझे यह गीता रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति रहित से और न बिना सुनने की इच्छावाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है उससे तो कभीनहीं कहना चाहिए।(67)

य इमं परमं गुह्यं मद् भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय़ः।।68।।

जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों से कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा – इसमें कोई सन्देह नहीं।(68)

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।।69।।

उससे बढ़कर मेरा कोई प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं।(69)

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।70।।

जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवादरूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा – ऐसा मेरा मत है।(70)

🌼ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌼🌹 इस संसार मार्ग में चलने वाला यह जीव अनेक प्रकार के क्लेश और विघ्न बाधाओंसे बाधित होने पर भी मार...
05/10/2026

🌼ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌼

🌹 इस संसार मार्ग में चलने वाला यह जीव अनेक प्रकार के क्लेश और विघ्न बाधाओंसे बाधित होने पर भी मार्गमें जिस पर जहां आपत्ति आती है अथवा जो कोई मर जाता है; उसे जहाँ-का-तहाँ छोड़ देता है तथा नये जन्मे हुओंको साथ लगाता है। कभी किसी के लिये शोक करता है, किसी का दुख देखकर मूर्छित हो जाता है, किसी के वियोग होने की आशंकासे भयभीत हो उठता है, किसी से झगड़ने लगता है, कोई आपत्ति आती है तो रोने-चिल्लाने लगता है, कहीं कोई मनके अनुकूल बात हो गई तो प्रसन्नताके मारे फुले नहीं समाता, कभी गाने लगता है और कभी उन्हींके लिये बंधनेमें भी नहीं हिचकता। साधुजन इसके पास कभी नहीं आते। यह साधुसंगसे सदा वंचित रहता है। इस प्रकार यह निरंतर आगे ही बढ़ रहा है। जहाँसे इसकी यात्रा आरंभ हुई है और जिसे इस मार्ग की अंतिम अवधि कहते हैं, उस परमात्माके पास यह अभी तक नहीं लौटा है।
परमात्मातक तो योगशास्त्रकी भी गति नहीं है; जिन्होंने सब प्रकारके दण्ड (शासन)-का त्याग कर दिया है, वे निवृत्तिपराण संयतात्मा मुनिजन ही उसे प्राप्त कर पाते हैं।
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

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