Kanha kripa

Kanha kripa प्रभु कृष्ण के लिये, उनकी सेवा के लिये, उनकी प्रसन्नता के लिये, उनकी लीलाओं की कीर्तिऔर उनके द्वारा भगवत गीता के उपदेश का उल्लेख कर निमित्त मात्र🙏

🌻ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌻🌲लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैःसत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्...
25/05/2026

🌻ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌻

🌲लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः
सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् ।
सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः।
सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना।।

व्यक्ति का सबसे बड़ा अवगुण लोभ है, चुगलखोरी सबसे बड़ा पाप है। यदि व्यक्ति सदाचारी हो, सत्य बोलने वाला हो तो उसे किसी भी प्रकार के तप की आवश्यकता नहीं है। अर्थात सत्य बोलना व सदाचारी होना ही सबसे बड़ा तप है। यदि मन पवित्र हो तो तीर्थ स्नान की आवश्यकता नहीं होती। व्यक्ति यशस्वी हो तो उसे अन्य आभूषणों की आवश्यकता नहीं होती। यशस्वी होना ही सबसे बड़ा आभूषण है। इसी तरह यदि व्यक्ति श्रेष्ठ विद्या धन से युक्त हो तो अन्य किसी प्रकार के धन की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन अपकीर्ति व निरादर व्यक्ति के लिए मरण समान है।

🍃अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः।
व्याधिष्ठो देवभक्तश्च वृद्धा नारी पतिव्रता ।।

निर्बल व्यक्ति विवश होता है, इसलिए उसका आचरण भी बदल जाता है। जैसे बलहीन व्यक्ति ब्रह्मचारी बन जाता है, धनाभाव के कारण साधु-संन्यासी बन जाता है, बीमारी होने पर ईश्वर भक्त हो जाता है, ठीक इसी प्रकार बुढ़ापे में स्त्री पतिव्रता बन जाती है। लेकिन सामर्थ्य होने पर या बलवान होने पर यदि व्यक्ति ऐसे आचरण करें तो यह उनका महत्त्वपूर्ण गुण माना जाता है। उदाहरणार्थ यदि स्त्री यौवनमयी व सुन्दर होने पर भी पतिव्रत का पालन करती है तो यह उसकी विशिष्टता है।

🌷नाऽन्नोदकसमं दानं न तिथिदशी समा।
न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातुर्दैवतं परम् ।।

अन्न व जल से बढ़कर कोई दान नहीं है। द्वादशी तिथि से बढ़कर कोई तिथि नहीं है। गायत्री मंत्र से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है तथा माता से बढ़कर कोई देवता नहीं है।

🍂तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायास्तु मस्तके।
वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वाङ्गे दुर्जने विषम् ।।

सपं का विष दांतों में, मक्खी का विष उसके मस्तक में, बिच्छू का विष उसकी पूंछ में होता है। लेकिन दुष्ट व्यक्ति का तो समूचा शरीर ही विष वृक्ष होता है। अर्थात उसके नख-शिख में विष ही विष भरा होता है। इसलिए दुष्ट व्यक्ति का कभी संग नहीं करना चाहिए।

🌺पत्युराज्ञां विना नारी झुपोष्य व्रतचारिणी।
आयुष्यं हरते पत्युः सा नारी नरकं व्रजेत् ।।

जो स्त्री पति की अनुमति के बिना व्रत-उपवास करती है तो वह ऐसा करके उसकी आयु का क्षय करती है और स्वयं नरक में जाती है। अर्थात पत्नी का धर्म पति की आज्ञा का पालन करना व पतिव्रत धर्म को निभाना है।

🥀न दानैः शुध्यते नारी नोपवास शतैरपि।
न तीर्थसेवया तद्वद् भर्तुः पादोदकैर्यथा ।।

पत्नी नाना प्रकार के दान, व्रत-उपवास, तीर्थ सेवन करके भी उतनी पवित्र नहीं होती जितनी पति की सेवा करने से होती है।

💐दानेन पाणिर्न तु कंकणेन स्नानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन ।
मानेन तृप्तिर्न तु भोजनेन ज्ञानेन मुक्तिर्न तु मण्डनेन ।।

हाथों की शोभा दानादि कर्म करने से है, न कि कंगन आदि आभूषण धारण करने से। इसी प्रकार शरीर शुद्धि स्नान करने से होती है, न कि केवल चंदन लेपने से। मन को संतुष्टि मान-सम्मान से होती है, न कि भरपेट भोजन करने से । कल्याण अर्थात मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान से होती है, न कि तिलक लगाने, श्रृंगार करने से।
(भाव यह है कि व्यक्ति को बाह्याडंबरों से बचकर अंतः शुद्धि के प्रयत्न करने चाहिए।)

🌿नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गन्थलेपनम् ।
आत्मरूपं जले पश्यन् शक्रस्यापि श्रियं हरेत् ।।

नाई के घर जाकर हजामत बनवाना, पत्थर की मूर्तियों पर चंदन का लेप लगाना, जल में अपना प्रतिबिंब देखना आदि जितने भी कार्य हैं। उनसे व्यक्ति का वैभव नष्ट होता है।

🍓पुस्तकप्रत्ययाधीतं नाधीतं गुरुसन्निधौ।
सभामध्ये न शोभन्ते जारगर्भा इव स्त्रियः ।।

जिसने गुरु के सान्निध्य में नहीं वरन पुस्तकें पढ़-पढ़कर ही ज्ञान प्राप्त किया है, वह व्यक्ति विद्वानों की सभा में वैसे ही तिरस्कृत होता है। जैसे दुराचारिणी स्त्री गर्भधारण करके भी समाज में तिरस्कृत होती है। (आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में गुरु के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए गुरु प्रदत्त ज्ञान को ही श्रेष्ठ बताया है।)

🌴कृते प्रतिकृतं कुर्याद् हिंसने प्रतिहिंसनम् ।
तत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टं समाचरेत् ।।

विज्ञान के एक नियम के अनुसार क्रिया की प्रतिक्रिया निश्चय ही होती है। चाणक्य भी इस मत का समर्थन करते हुए इसी बात को कहते। हैं कि जो जैसा व्यवहार करे, उसके प्रति वैसा ही व्यवहार करने में कोई दोष नहीं है।
(भाव यह है कि जो भला सोचे, उसके प्रति भला ही सोचना चाहिए। इसके विपरीत जो बुरा सोचे उसके प्रति बुरा सोचने में कोई बुराई नहीं है।)

🌳 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌳

🌷ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌷भगवत गीता अध्याय 11श्लोक 36 से 42अर्जुन उवाचस्थाने हृषिकेश तव प्रकीर्त्याजगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते ...
25/05/2026

🌷ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌷

भगवत गीता
अध्याय 11
श्लोक 36 से 42

अर्जुन उवाच
स्थाने हृषिकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः।।36।।

अर्जुन बोलेः हे अन्तर्यामिन् ! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं।(36)

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्।।37।।

हे महात्मन् ! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें, क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! जो संत्, असत्, और उनसे परे अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म हैं, वह आप ही हैं।(37)

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरुप।।38।।

आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं। आप इस जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है।(38)

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांकः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।।39।।

आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिए हजारों बार नमस्कार ! नमस्कार हो ! आपके लिए फिर भी बार-बार नमस्कार ! नमस्कार!!

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तुं ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्व समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।।40।।

हे अनन्त सामर्थ्य वाले ! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार ! हे सर्वात्मन्! आपके लिए सब ओर से नमस्कार हो क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं।(40)

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।41।।

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्।।42।।

आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं, ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण !', 'हे यादव !', 'हे सखे !', इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे समझे हठात् कहा है और हे अच्युत ! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किये गये हैं – वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाववाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।(41,42)

🌸हरि भक्तों की जय🌸☘️दुर्वासाजी ने कहा ;- 'धन्य है! आज मैंने भगवानके प्रेमीभक्तों का महत्त्व देखा। राजन! मैंने आपका अपराध...
24/05/2026

🌸हरि भक्तों की जय🌸

☘️दुर्वासाजी ने कहा ;- 'धन्य है! आज मैंने भगवानके प्रेमीभक्तों का महत्त्व देखा। राजन! मैंने आपका अपराध किया, फिर भी आप मेरे लिये मंगल-कामना ही कर रहे हैं। जिन्होंने भक्तवत्सल भगवान श्रीहरि के चरणकमलों को दृढ़ प्रेमभाव से पकड़ लिया है-उन साधु पुरुषों के लिये कौन-सा कार्य कठिन है? जिनका हृदय उदार है, वे महात्मा भला, किस वस्तु का परित्याग नहीं कर सकते। जिनके मंगलमय नामों के श्रवण मात्र से जीव निर्मल हो जाता है-उन्हीं तीर्थपाद भगवान के चरणकमलों के जो दास हैं, उनके लिये कौन-सा कर्तव्य शेष रह जाता है? महाराज अम्बरीष! आपका हृदय करुणाभाव से परिपूर्ण है। आपने मेरे ऊपर महान् अनुग्रह किया। अहो! आपने मेरे अपराध को भुलाकर मेरे प्राणों की रक्षा की है।'
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

🌳 बोले रहरि बोले हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌳

💐नारायण नारायण💐🌺धर्मवेता पुरुष असावधान, मतवाले, पागल, सोए हुए बालक, स्त्री, विवेकज्ञानशून्य, शरणागत, रथहीन और भयभीत शत्र...
24/05/2026

💐नारायण नारायण💐

🌺धर्मवेता पुरुष असावधान, मतवाले, पागल, सोए हुए बालक, स्त्री, विवेकज्ञानशून्य, शरणागत, रथहीन और भयभीत शत्रु को कभी नहीं मारते💐
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

🌳 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌳

🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹☘️मनुष्य इस लोक में सकाम कर्मों के द्वारा जिस शरीर के लिये भोग प्राप्त करना चाहता है, वह शरीर ही ...
24/05/2026

🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹

☘️मनुष्य इस लोक में सकाम कर्मों के द्वारा जिस शरीर के लिये भोग प्राप्त करना चाहता है, वह शरीर ही पराया-स्यार-कुत्तों का भोजन और नाशवान् है। कभी वह मिल जाता है तो कभी बिछुड़ जाता है। जब शरीर की ही यह दशा है-तब इससे अलग रहने वाले पुत्र, स्त्री, महल, धन, सम्पत्ति, राज्य, खजाने, हाथी-घोड़े, मन्त्री, नौकर-चाकर, गुरुजन और दूसरे अपने कहलाने वालों की तो बात ही क्या है। ये तुच्छ विषय शरीर के साथ ही नष्ट हो जाते हैं। ये जान तो पड़ते हैं पुरुषार्थ के समान, परन्तु हैं वास्तव में अनर्थरूप ही। आत्मा स्वयं ही अनन्त आनन्द का महान् समुद्र है। उसके लिये इन वस्तुओं की क्या आवश्यकता है? भाइयों! तनिक विचार तो करो-जो जीव गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यन्त सभी अवस्थाओं में अपने कर्मों के अधीन होकर क्लेश-ही-क्लेश भोगत है, उसका इस संसार में स्वार्थ ही क्या है। यह जीव सूक्ष्म शरीर को ही अपना आत्मा मानकर उसके द्वारा अनेकों प्रकार के कर्म करता है और कर्मों के कारण ही फिर शरीर ग्रहण करता है। इस प्रकार कर्म से शरीर और शरीर से कर्म की परम्परा चल पड़ती है। और ऐसा होता है अविवेक के कारण। इसलिये निष्कामभाव से निष्क्रिय आत्मस्वरूप भगवान् श्रीहरि का भजन करना चाहिये। अर्थ, धर्म और काम-सब उन्हीं के आश्रित हैं, बिना उनकी इच्छा के नहीं मिल सकते। भगवान् श्रीहरि समस्त प्राणियों के ईश्वर, आत्मा और परम प्रियतम हैं। वे अपने ही बनाये हुए पंचभूत और सूक्ष्मभूत आदि के द्वारा निर्मित शरीरों में जीव के नाम से कहे जाते हैं। देवता, दैत्य, मनुष्य, यक्ष अथवा गन्धर्व- कोई भी क्यों न हो-जो भगवान् के चरणकमलों का सेवन करता है, वह हमारे ही समान कल्याण का भाजन होता है। दैत्यबालको! भगवान् को प्रसन्न करने के लिये ब्राह्मण, देवता या ऋषि होना, सदाचार और विविध ज्ञानों से सम्पन्न होना तथा दान, तप, यज्ञ, शारीरिक और मानसिक शौच और बड़े-बड़े व्रतों का अनुष्ठान पर्याप्त नहीं है। भगवान् केवल निष्काम प्रेम-भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं। और सब तो विडम्बना-मात्र हैं। इसलिये दानव-बन्धुओं! समस्त प्राणियों को अपने समान ही समझकर सर्वत्र विराजमान, सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् भगवान् की भक्ति करो। भगवान् की भक्ति के प्रभाव से दैत्य, यक्ष, राक्षस, स्त्रियाँ, शूद्र, गो पालक अहीर, पक्षी, मृग और बहुत-से पापी जीव भी भगवद्भाव को प्राप्त हो गये हैं। इस संसार में या मनुष्य-शरीर में जीव का सबसे बड़ा स्वार्थ अर्थात् एकमात्र परमार्थ इतना ही है कि वह भगवान् श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति प्राप्त करे। उस भक्ति का स्वरूप है सर्वदा, सर्वत्र जब वस्तुओं में भगवान् का दर्शन।
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

💐बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।💐

🌷लक्ष्मी नारायण जी की जय🌷🍇आढ्यानां मांसपरमं मध्यानां गोरसोत्तरम् ।लवणोत्तरं दरिद्राणां भोजनं भरतर्षभ ॥ भरतश्रेष्ठ ! धनोन...
24/05/2026

🌷लक्ष्मी नारायण जी की जय🌷

🍇आढ्यानां मांसपरमं मध्यानां गोरसोत्तरम् ।
लवणोत्तरं दरिद्राणां भोजनं भरतर्षभ ॥

भरतश्रेष्ठ ! धनोन्मत्त पुरुषों के भोजन में माँस की, मध्यम श्रेणी वालों के भोजन में गोरस की तथा दरिद्रों के भोजन में तेल की प्रधानता होती है॥

☘️सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुञ्जते सदा ।
क्षुत्स्वादुतां जनयति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा॥

दरिद्र पुरुष सदा स्वादिष्ट ही भोजन करते हैं, क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद उत्पन्न कर देती है और वह ( भूख) धनियों के लिये सर्वथा दुर्लभ है॥

🍂प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते ।
दरिद्राणां तु राजेन्द्र अपि काष्ठं हि जीर्यते॥

राजन् ! संसार में धनियों को प्रायः भोजन करने की शक्ति नहीं होती, किन्तु दरिद्रों के पेट में काठ भी पच जाते हैं ।।

🌵अवृत्तिर्भयमन्त्यानां मध्यानां मरणाद्भयम् ।
उत्तमानां तु मर्त्यानामवमानात्परं भयम्॥

अधम पुरुषों को जीविका न होने से भय लगता है, मध्यम श्रेणी के मनुष्योंको मृत्युसे भय होता है, परंतु उत्तम पुरुषों को अपमान से ही महान् भय होता है॥

🍃ऐश्वर्यमदपापिष्ठा मदाः पानमदादयः ।
ऐश्वर्यमदमत्तो हि नापतित्वा विबुध्यते॥

यों तो पीने का नशा आदि भी नशा ही है, किंतु ऐश्वर्य का नशा तो बहुत ही बुरा है; क्योंकि ऐश्वर्य के मदसे मतवाला पुरुष श्रष्ट हुए बिना होश में नहीं आता॥

🌹इन्द्रियौरिन्द्रियार्थेषु वर्तमानैरनिग्रहैः ।
तैरयं ताप्यते लोको नक्षत्राणि ग्रहैरिव॥

वशमें न होनेके कारण विषयों में रमनेवाली इन्द्रियों से यह संसार डसी भाँति कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहों से नक्षत्र तिरस्कृत हो जाते हैं॥

🌼यो जितः पञ्चवर्गेण सहजेनात्म कर्शिना ।
आपदस्तस्य वर्धन्ते शुक्लपक्ष इवोडुराड्॥

जो मनुष्य जीवों को वशमें करने वाली सहज पाँच इन्द्रियोंसे जीत लिया गया, उसकी आपत्तियाँ शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ती हैं॥

💐अविजित्य य आत्मानममात्यान्विजिगीषते ।
अमित्रान्वाजितामात्यः सोऽवशः परिहीयते॥

इन्द्रियों सहित मनको जीते बिना ही जो मन्त्रियों को जीतने की इच्छा करता है या मन्त्रियों को अपने अधीन किये बिना शत्रुको जीतना चाहता है, उस अजितेन्द्रिय पुरुष को सब लोग त्याग देते हैं॥

🍒आत्मानमेव प्रथमं देशरूपेण यो जयेत् ।
ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते॥

जो पहले इन्द्रियों सहित मन को ही शत्रु समझकर जीत लेता है, उसके बाद यदि वह मन्त्रियों तथा शत्रुओं को जीतने की इच्छा करे तो उसे सफलता मिलती है॥

🍁वश्येन्द्रियं जितामात्यं धृतदण्डं विकारिषु ।
परीक्ष्य कारिणं धीरमत्यन्तं श्रीर्निषेवते ॥

इन्द्रियों तथा मनको जीतने वाले, अपराधियों को दण्ड देने वाले और जाँच-परखकर काम करने वाले धीर पुरुषकी लक्ष्मी अत्यन्त सेवा करती हैं ॥

🌵रथः शरीरं पुरुषस्य राजन् नात्मा नियन्तेन्द्रियाण्यस्य चाश्वाः ।
तैरप्रमत्तः कुशलः सदश्वैर् दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः॥

राजन् ! मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथि है और इन्द्रियाँ इसके घोड़े हैं। इनको वश में करके सावधान रहनेवाला चतुर एवं धीर पुरुष काबू में किये हुए घोड़ोंसे रथी की भाँति सुखपूर्वक यात्रा करता है।।

🌷एतान्यनिगृहीतानि व्यापादयितुमप्यलम् ।
अविधेया इवादान्ता हयाः पथि कुसारथिम्॥

शिक्षा न पाये हुए तथा काबूमें न आने वाले घोड़े जैसे मूर्ख सारथि को मार्ग में मार गिराते हैं, वैसे ही ये इन्द्रियाँ वश में न रहने पर पुरुष को मार डालने में भी समर्थ होती हैं।।

🌾अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्तं चैवाप्यनर्थतः ।
इन्द्रियैः प्रसृतो बालः सुदुःखं मन्यते सुखम्॥

इन्द्रियाँ बश में न होने के कारण अर्थ को अनर्थ और अनर्थ को अर्थ समझकर अज्ञानी पुरुष बहुत बड़े दुःख को भी सुख मान बैठता है॥

🌹 बोल हरि बोल हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌹

🏵️ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🏵️भगवत गीता अध्याय 11श्लोक 29 से 35यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।तथैव नाशा...
24/05/2026

🏵️ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🏵️

भगवत गीता
अध्याय 11
श्लोक 29 से 35

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः।।29।।

जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं। (29)

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता-
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो।।30।।

आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्जवलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो ! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।(30)

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।।31।।

मुझे बतलाइये कि आप उग्र रूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइये। हे आदिपुरुष ! आपको मैं विशेषरूप से जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।(31)

श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।।32।।

श्री भगवान बोलेः मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग है वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करने पर भी इन सब का नाश हो जाएगा।(32)

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।33।।

अतएव तू उठ। यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन! तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।(33)

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत् नान्।।34।।

द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत-से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार। भय मत कर। निःसन्देह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा। इसलिए युद्ध कर।(34)

संजय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताजलिर्वेपमानः किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद् गदं भीतभीतः प्रणम्य।।35।।

संजय बोलेः केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपता हुआ नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गदगद वाणी से बोलेः।(35)

🌹ॐ नमो नारायणाय🌹🌻 देवताओंकी जड़ है विष्णु और वह वहाँ रहता है जहाँ सनातनधर्म है। सनातनधर्मकी जड़ है- वेद, गौ, ब्राह्मण, त...
23/05/2026

🌹ॐ नमो नारायणाय🌹

🌻 देवताओंकी जड़ है विष्णु और वह वहाँ रहता है जहाँ सनातनधर्म है। सनातनधर्मकी जड़ है- वेद, गौ, ब्राह्मण, तपस्या और वे यज्ञ जिनमे दक्षिणा दी जाती है।
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

🌷बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌷

💐ॐ नमो भगवते वासुदेवाय💐🌹 परीक्षित! भगवानने राजा खटवांगकी बुद्धिको पहलेसे ही अपनी ओर आकर्षित कर रखा था। इसीसे वह अन्त समय...
23/05/2026

💐ॐ नमो भगवते वासुदेवाय💐

🌹 परीक्षित! भगवानने राजा खटवांगकी बुद्धिको पहलेसे ही अपनी ओर आकर्षित कर रखा था। इसीसे वह अन्त समयमें ऐसा निश्चय कर सके। अब उन्होंने शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमें जो अज्ञानमूलक आत्मभाव था, उसका परित्याग कर दिया और अपने वास्तविक आत्मस्वरूपमें स्थित हो गये। वह स्वरुप साक्षात् परब्रह्म है। वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, शून्यके समान ही है। परंतु वह शून्य नही, परम सत्य है। भक्तजन उसी वस्तुको 'भगवान वासुदेव' इस नामसे वर्णन करते हैं।
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

🌲 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌲

🍂ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🍂 राजन! यह मनुष्य-शरीर जीवको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-- चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करने वाला है।...
23/05/2026

🍂ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🍂

राजन! यह मनुष्य-शरीर जीवको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-- चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करने वाला है। इसलिये वीर! इस शरीरको नष्ट कर देना सभी पुरुषार्थोंकी हत्या कही जाती है।
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

🌺 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌺

🌳ॐ नमो नारायणाय🌳🌷यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौ तथा क्षये ।कोशे जनपदे दण्डे न स राज्यावतिष्ठते ॥ जो राजा स्थिति, लाभ,...
23/05/2026

🌳ॐ नमो नारायणाय🌳

🌷यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौ तथा क्षये ।
कोशे जनपदे दण्डे न स राज्यावतिष्ठते ॥

जो राजा स्थिति, लाभ, हानि, खजाना, देश तथा दण्ड आदि की मात्रा को नहीं जानता, वह राज्य पर स्थित नहीं रह सकता॥

🍇पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत मूलच्छेदं न कारयेत् ।
मालाकार इवारामे न यथाङ्गारकारकः ॥

जैसे माली बगीचे में एक-एक फूल तोड़ता है, उसकी जड़ नहीं काटता, उसी प्रकार राजा प्रजा की रक्षा-पूर्वक उनसे कर ले । कोयला बनाने वाले की तरह जड़ नहीं काटनी चाहिये॥

🌲प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः ।
न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रियः ॥

जिसकी प्रसन्नता का कोई फल नहीं और क्रोध भी व्यर्थ है, उसको प्रजा स्वामी बनाना नहीं चाहती-जैसे स्त्री नपुंसक को पति नहीं बनाना चाहती ॥

☘️अप्युन्मत्तात्प्रलपतो बालाच्च परिसर्पतः ।
सर्वतः सारमादद्यादश्मभ्य इव काञ्चनम् ॥

निरर्थक बोलने वाले, पागल तथा बकवाद करनेवाले बच्चे से भी सब ओरसे उसी भाँति तत्वकी बात ग्रहण करनी चाहिये, जैसे पत्थरों में से सोना ले लिया जाता है॥

🏵️गन्धेन गावः पश्यन्ति वेदैः पश्यन्ति ब्राह्मणाः ।
चारैः पश्यन्ति राजानश्चक्षुर्भ्यामितरे जनाः ॥

गोएँ गन्धसे, ब्राह्मण लोग वेदों से, राजा जासूसों से और अन्य साधारण लोग आँखों से देखा करते हैं ॥

🌿भूयांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा ।
अथ या सुदुहा राजन्नैव तां विनयन्त्यपि ॥

राजन ! जो गाय बड़ी कठिनाई से दुने देती हैं, वह बहुत हेश उठाती हैं; किंतु जो आसानी से दुध देती है, उसे लोग कष्ट नहीं देते॥

🌹यदतप्तं प्रणमति न तत्सन्तापयन्त्यपि ।
यच्च स्वयं नतं दारु न तत्संनामयन्त्यपि ॥

जो धातु बिना गरम किये मुड़ जाते हैं, उन्हें आगमें नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे लोग झुकाने का प्रयल्न नहीं करते।।

💐एतयोपमया धीरः संनमेत बलीयसे ।
इन्द्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे ॥

इस दृष्टान्त के अनुसार बुद्धिमान् पुरुष को अधिक बलवान के सामने झुक जाना चाहिये; जो अधिक बलवान के सामने झुकता है, वह मानो इन्द्रदेवता को प्रणाम करता है।॥

🌺सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते ।
मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ॥

सत्य से धर्म की रक्षा होती है, योग से विद्या सुरक्षित होती है, सफाई से रूप की रक्षा होती है और सदाचार से कुल की रक्षा होती है।।

🌾मानेन रक्ष्यते धान्यमश्वान्रक्ष्यत्यनुक्रमः ।
अभीक्ष्णदर्शनाद्गावः स्त्रियो रक्ष्याः कुचेलतः ॥

तौलने से नाज की रक्षा होती है, फेरनेसे घोड़े सुरक्षित रहते हैं, बारम्बार देखभाल करने से गौओं की तथा मैले वस्त्र से स्त्रियों की रक्षा होती है ॥

🌷गतिरात्मवतां सन्तः सन्त एव सतां गतिः ।
असतां च गतिः सन्तो न त्वसन्तः सतां गतिः ॥

मनस्वी पुरुषों को सहारा देने वाले सन्त हैं, सन्तों के भी सहारे सन्त ही हैं; दुष्टों को भी सहारा देने वाले सन्त हैं, पर दुष्टलोग सन्तों को सहारा नहीं । देते ॥

🌸जिता सभा वस्त्रवता समाशा गोमता जिता ।
अध्वा जितो यानवता सर्वं शीलवता जितम् ॥

अच्छे वस्त्र वाला सभा को जीतता (अपना प्रभाव जमा लेता) है, जिसके पास गौ है, वह मीठे स्वाद की आकाङ्क्षाको जीत लेता है; सबारी से चलने वाला मार्ग को जीत लेता (तय कर लेता) है और शीलवान् पुरुष सब पर विजय पा लेता है।॥

🌼 बोल हरि बोल हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌼

Address

New Delhi

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Kanha kripa posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Category