07/10/2026
🌹ॐ नमो नारायणाय🌹
🍂अगुन अदभ्र गिरा गोतीता।सबदरसी अनबद्य अजीता।
निर्मम निराकार निरमोहा।नित्य निरंजन सुख संदोहा।
ईश्वर उस मायाके लक्षणोंसे रहित, महान शब्द और इन्द्रियोंसे अलग सबकुछ देखनेवाला निर्दोष, अविजित, ममतारहित, निराकार, मोहरहित, नित्य, सर्वदा
मायारहित और सुख का भंडार है।
🌿प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी।ब्रह्म निरीह बिरज अविनासी।
इहाॅ मोह कर कारन नाहीं।रवि सन्मुख तम कवहुॅ कि जाही।
प्रकृति से परे ईश्वर सबके हृदयमें बसते हैं। वे इच्छारहित, विकारों से विलग, अविनाशी ब्रह्म हैं। प्रभु किसी मोह के कारण नहीं हैं।अन्धकार समूह क्या कभी सूर्य के समक्ष जा सकता हैं।
🌱सुनु खगेस हरि भगति बिहाईं।जे सुख चाहहिं आन उपाई।
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी।पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।
जो लोग ईश्वर की भक्तिके बिना अन्य उपायों से सुख चाहते हैं वे मूर्ख और अभागे बिना जहाज के तैर कर महासागर के पार जाना चाहते हैं।
🍃जे असि भगति जानि परिहरहीं।केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।
ते जड़ कामधेनु गृॅह त्यागी।खोजत आकु फिरहिं पय लागी।
जो भक्ति की महत्ता जानकर भी उसे नही अपनाते एवं निरा ज्ञानके लिये परिश्रम करते हैं वे मूर्ख घर के कामधेनु को छोड़ दूधके लिये आक के पेड़ को खोजते फिर रहे हैं।
🌸ईश्वर अंस जीव अविनासी।चेतन अमल सहज सुखरासी।
जीव ईश्वर का हीं अंश है। अतएव वह चेतन, अविनाशी, निर्मल एवं स्वभाव से हीं सुख से सम्पन्न है।
भगति करत बिनु जतन प्रयासा।संसृति मूल अविद्या नासा।
🌻ईश्वर-भक्ति संसाररूपी अविद्या को बिना प्रयास, परिश्रम के नष्ट कर देता है।
ब्रम्ह पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं
कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं।
🌾वेद, समुद्र, ज्ञान, मंदराचल पर्वत, संत, देवता हैं जो समुद्र को मथकर कथारूप में अमृत निकालते हैं जिसमें भक्ति की मिठास बसी रहती है।
🥗कमठ पीठ जामहिं बरू बारा।बंध्यासुत बरू काहुहिं मारा।
फूलहिं नभ बरू बहु बिधि फूला।जीवन लह सुख हरि प्रतिकूला।
कछुए की पीठ पर बाल उग सकते है। बाॅझका बेटा भले किसी को मार दे। आकाश में अनेक किस्म के फूल खिल जायें लेकिन प्रभु से विमुख जीव सुख नही पा सकता है।
🌺जे ब्रह्म अजम द्वैतमनु भवगम्य मन पर ध्यावहीं।
ब्रह्म अजन्मा एवं अद्वैत है।वह केवल अनुभव से जाना जाता है। वह मन से परे है।
🌷बैर न विग्रह आस न त्रासा।सुखमय ताहि सदा सब आसा।
अनारंभ अनिकेत अमानी।अनघ अरोस दच्छ विग्यानी।
किसी से भी शत्रुता, लड़ाई, झगड़ा, न आशा, न भय रखना हीं काफी है। उसके लिये सभी तरफ सुख हीं सुख है। कभी भी फल की आशा से कर्म न करे। घर से कोई विशेष मोह ममता न रखे। इज्जत पाने की चिन्ता न रखे। पाप और क्रोध से दूर रहे-वही भक्ति में कुशल और ज्ञानी है।
🍀प्रीति सदा सज्जन संसर्गा।तृन सम विशय स्वर्ग अपवर्गा।
भगति पच्छ हठ नहि सठताई।दुश्ट तर्क सब दूरि बहाई।
संतो की संगति से जिसे हमेशा प्रेम रहे, जिसके मन मे विषय, भोग, स्वर्ग एवं मोक्ष सब घास के तिनके की तरह तुच्छ हो, जो भक्ति के लिये हठी हो, जो दूसरों के विचार का खण्डन करने की मूर्खता नही करता हो, जिसने सभी कुतर्कों को दूर कर दिया हो- वही सच्चा भक्त है।
🥀सोइ सर्वग्य तग्य सोइ पंडित।सोइ गुन गृह विज्ञान अखंडित।
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई।जाकें पद सरोज रति होई।
वह सर्वज्ञ, तत्वज्ञ एवं पंडित है। वह गुणों का घर एवं अखंड ज्ञानी विद्वान है। वह चतुर और सभी अच्छे गुणों से युक्त है जिसे प्रभु के चरणों में प्रेम है।
🍂आस त्रास इरिसादि निवारक।विनय विवेक विरति विस्तारक।
ईश्वर सांसारिक भोगोंकी आशा, भय, ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले तथा विनयशीलता, विवेक, बुद्धि और वैराग्यके बढ़ाने बाले हैं।
🌳कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।जोग न मख जप तप उपवासा।
सरल सुभाव न मन कुटिलाई।जथा लाभ संतोश सदाई।
भक्ति के रास्ते में कोई परिश्रम नही है। इसके लिये न योग, जप, तपस्या या उपवास करने की जरूरत है। केवल स्वभाव की सरलता, मन में कुटिलता का त्याग एवं जितना मिले उसी में संतोष करना हीं पर्याप्त है।
🌷 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌷