Kanha kripa

Kanha kripa प्रभु कृष्ण के लिये, उनकी सेवा के लिये, उनकी प्रसन्नता के लिये, उनकी लीलाओं की कीर्तिऔर उनके द्वारा भगवत गीता के उपदेश का उल्लेख कर निमित्त मात्र🙏

🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹🥀दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं राजद्विष्टं पैशुनं पूगवैरम् ।मत्तोन्मत्तैर्दुर्जनैश्चापि वादं यः प्र...
26/08/2026

🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹

🥀दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं राजद्विष्टं पैशुनं पूगवैरम् ।
मत्तोन्मत्तैर्दुर्जनैश्चापि वादं यः प्रज्ञावान्वर्जयेत्स प्रधानः ॥

जो बुद्धिमान् दम्भ, मोह, मात्सर्य, पापकर्म, राजद्रोह, चुगलखोरी, समूह से वैर और मतवाले, पागल तथा दुर्जनों से विवाद छोड़ देता है, वह श्रेष्ठ है।।

🍃दमं शौचं दैवतं मङ्गलानि प्रायश्चित्तं विविधाँल्लोकवादान् ।
एतानि यः कुरुते नैत्यकानि तस्योत्थानं देवता राधयन्ति ॥

जो दान होम, देवपूजन, माङ्गलिक कर्म, प्रायक्चित्त तथा अनेक प्रकार के लौकिक आचार - इन नित्य किये जाने योग्य कर्म को करता है, देवता लोग उसके अभ्युदय की सिद्धि करते हैं।।

🌸समैर्विवाहं कुरुते न हीनैः समैः सख्यं व्यवहारं कथाश्च ।
गुणैर्विशिष्टांश्च पुरो दधाति विपश्चितस्तस्य नयाः सुनीताः ॥

जो अपने बराबर वालों के साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बावचीत करता है, हीन पुरुषों के साथ नहीं, और गुणों में बढ़े-चढ़े पुरुषों को सदा आगे रखता है, उस विद्वान की नीति श्रेष्ठ है॥

💐मितं भुङ्क्ते संविभज्याश्रितेभ्यो मितं स्वपित्यमितं कर्मकृत्वा ।
ददात्यमित्रेष्वपि याचितः सं- स्तमात्मवन्तं प्रजहात्यनर्थाः ॥

जो अपने आश्रितजनों को बाँटकर थोड़ा ही भोजन करता है, बहुत अधिक काम करके भी थोड़ा सोता है तथा माँगने पर जो मित्र नहीं है, उसे भी धन देता है, उस मनस्वी पुरुष को सारे अनर्थ दूर से ही छोड़ देते हैं ॥

☘️चिकीर्षितं विप्रकृतं च यस्य नान्ये जनाः कर्म जानन्ति किं चित् ।
मन्त्रे गुप्ते सम्यगनुष्ठिते च स्वल्पो नास्य व्यथते कश्चिदर्थः ॥

जिसके अपनी इच्छा के अनुकूल और दूसरों की इच्छा के विरुद्ध कार्यको दूसरे लोग कुछ भी नहीं जान पाते, मन्त्र गुप्त रहने और अभीष्ट कार्य का ठीक-ठीक सम्पादन होने के कारण उसका थोड़ा भी काम बिगड़ने नहीं मन्त्रे गुप्ते पाता ॥

🌲यः सर्वभूतप्रशमे निविष्टः सत्यो मृदुर्दानकृच्छुद्ध भावः ।
अतीव सञ्ज्ञायते ज्ञातिमध्ये महामणिर्जात्य इव प्रसन्नः ॥

जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतों को शान्ति प्रदान करने में तत्पर, सत्यवादी, कोमल, दूसरों को आदर देने वाला तथा पवित्र विचार वाला होता है, वह अच्छी: खान से निकले और चमकते हुए श्रेष्ठ रल्न की भाँति अपनी जाति वालो में अधिक प्रसिद्धि पाता है।।

🌾य आत्मनापत्रपते भृशं नरः स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत ।
अनन्त तेजाः सुमनाः समाहितः स्वतेजसा सूर्य इवावभासते ॥

जो स्वयं ही अधिक लज्जाशील है, वह सब लोगों में श्रेष्ठ समझा जाता वह अपने अनन्त तेज, शुद्ध हृदय एवं एकाग्रता से युक्त होनेके कारण कान्ति में सूर्य के समान शोभा पाता हैं॥

🏵️न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्ममारोहति नास्तमेति ।
न दुर्गतोऽस्मीति करोति मन्युं तमार्य शीलं परमाहुरग्र्यम्॥

जो शान्त हुई वैर की आग को फिर प्रज्वलित नहीं करता, गर्व नहीं करता, हीनता नहीं दिखाता तथा मैं विपत्ति में पड़ा हूँ,' ऐसा सोचकर अनुचित काम नहीं करता, उस उत्तम आचरण वाले पुरुषको आर्यजन सर्वश्रेष्ठ कहते है॥

🌿न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्षं नान्यस्य दुःखे भवति प्रतीतः।
दत्त्वा न पश्चात्कुरुतेऽनुतापं न कत्थते सत्पुरुषार्य शीलः॥

जो अपने सुखमें प्रसन्न नहीं होता, दूसरे के दुःख के समय हर्ष नहीं मानता और दान देवर पश्चात्ताप नहीं करता; वह सजन में सदाचारी कहलाता है ॥

☘️देशाचारान्समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यस्तु परावरज्ञः ।
स तत्र तत्राधिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति ॥

जो मनुष्य देश के व्यवहार, लोकाचार तथा जातियोंके धर्मो को जानने की इच्छा करता है, उसे उत्तम-अधम का विवेक हो जाता है । वह जहाँ कहीं भी जाता है; सदा महान् जनसमूह पर अपनी प्रभुता स्थापित कर लिता है ॥

🌷 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌷

🌿ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌿भगवत गीता  अध्याय 10श्लोक 36 से 42 (अध्याय समाप्त)द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌ ।जयोऽस्मि...
26/08/2026

🌿ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌿

भगवत गीता
अध्याय 10
श्लोक 36 से 42 (अध्याय समाप्त)

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌ ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌ ॥ (३६)

मैं छल करनेवालोंमें जूआ और प्रभावशाली पुरुषोंका प्रभाव हूँ। मैं जीतनेवालोंका विजय हूँ, निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक पुरुषोंका सात्त्विक भाव हूँ॥ ३६॥

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ (३७)

वृष्णिवंशियोंमें' वासुदेव अर्थात्‌ में स्वयं तेरा सखा, पाण्डवोंमें धनझय अर्थात्‌ तू, मुनियोंमें बेदव्यास कवियोंमें शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हँ॥ ३७॥

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्‌ ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्‌ ॥ (३८)

मैं दमन करनेवालोंका दण्ड अर्थात्‌ दमन करनेकी शक्ति हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति हूँ, गुप्त रखनेयोग्य भावोंका रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानोंका तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ॥ ३८॥

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌ ॥ (३९)
और हे अर्जुन | जो सब भूतोंकी उत्पत्तिका कारण है, वह भी मैं ही हूँ; क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो ॥ ३९॥

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ (४०)

हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है, मैंने अपनी विभूतियोंका यह विस्तार तो तेरे लिये एकदेशसे अर्थात्‌ संक्षेप से कहा है॥ ४०॥

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌ ॥ (४१)

जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेजके अंशकी ही अभिव्यक्ति जान॥ ४१॥

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥ (४२)

अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जाननेसे तेरा क्या प्रयोजन है। मैं इस सम्पूर्ण जगत्‌को अपनी योगशक्तिके एक अंशमात्रसे धारण करके स्थित हूँ॥ ४२॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥
🙏

🌹हे मेरे प्यारे गोविंद🌹🌾 प्रकृति का संसर्ग होने से ही पुरुष अपने को अपने वास्तविक स्वरुप के विपरीत लिंगशरीर मान बैठा है ...
25/08/2026

🌹हे मेरे प्यारे गोविंद🌹

🌾 प्रकृति का संसर्ग होने से ही पुरुष अपने को अपने वास्तविक स्वरुप के विपरीत लिंगशरीर मान बैठा है वह विपर्यय भगवान के भजन से शीघ्र ही दूर हो जाता है🌾

(श्रीमद्भागवत महापुराण)

🍁बोल हरी बोल हरी हरी हरी बोल। केशव माधव गोविंद बोल🍁

🍂ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🍂🌹प्यारे उद्धव! मेरा ऐसा निश्चय है कि सत्संग और भक्तियोग--इन दो साधनोंका एक साथ ही अनुष्ठान करते र...
25/08/2026

🍂ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🍂

🌹प्यारे उद्धव! मेरा ऐसा निश्चय है कि सत्संग और भक्तियोग--इन दो साधनोंका एक साथ ही अनुष्ठान करते रहना चाहिये। प्रायः इन दोनोंके अतिरिक्त संसारसागरसे पार होनेका और कोई उपाय नहीं है।
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

💐बोल हरि बोल हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।💐

🌺ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌺🍁 स्त्रियोंको प्रसन्न करनेके लिये, हास-परिहासमें, विवाहमें, कन्या आदिकी प्रशंसा करते समय, अपनी जी...
25/08/2026

🌺ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌺

🍁 स्त्रियोंको प्रसन्न करनेके लिये, हास-परिहासमें, विवाहमें, कन्या आदिकी प्रशंसा करते समय, अपनी जीविकाकी रक्षाके लिये, प्राणसंकट उपस्थित होनेपर, गौ और ब्राह्मणके हितके लिये तथा किसीको मृत्युसे बचानेके लिये असत्य-भाषण भी उतना निंदनीय नहीं है।
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

🌵(बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।)🌵

🌷ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌷🍀जड़भरत ने उत्तर दिया, 'राजन! मैं न तो कपिल मुनि हूं और न कोई ॠषि हूं। मैं पूर्वजन्म में एक राजा ...
25/08/2026

🌷ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌷

🍀जड़भरत ने उत्तर दिया, 'राजन! मैं न तो कपिल मुनि हूं और न कोई ॠषि हूं। मैं पूर्वजन्म में एक राजा था। मेरा नाम भरत था। मैंने भगवान श्रीहरि के प्रेम और भक्ति में घर-द्वार छोड़ दिया था। मैं हरिहर क्षेत्र में जाकर रहने लगा था। किंतु एक मृग शिशु के मोह में फंसकर मैं भगवान को भी भूल गया। मृगशिशु का ध्यान करते हुए जब शरीर त्याग किया, तो मृग का शरीर प्राप्त हुआ। मृग का शरीर प्राप्त होने पर भी भगवान की अनुकंपा से मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर बड़ा दुखी हुआ कि मैंने कितनी अज्ञानता की थी! एक मृगी के बच्चे के मोह में फंसकर मैंने भगवान श्रीहरि को भुला दिया था। राजन, जब मैंने मृग शरीर का त्याग किया, तो मुझे यह ब्राह्मण शरीर प्राप्त हुआ। ब्राह्मण का शरीर प्राप्त होने पर भी मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर कि मेरा यह जन्म व्यर्थ न चला जाए, अपने को छिपाए हूं। मैं दिन-रात परमात्मारूपी आत्मा में लीन रहता हूं, मुझे शरीर का ध्यान बिलकुल नहीं रहता। राजन, इस जगत् में न कोई राजा है। न प्रजा, न कोई अमीर है, न कोई ग़रीब, न कोई कृषकाय है, न कोई स्थूलकाय, न कोई मनुष्य है, न कोई पशु। सब आत्मा ही आत्मा हैं। ब्रह्म ही ब्रह्म हैं।

'राजन, मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए। यही मानव-जीवन की सार्थकता है। यही श्रेष्ठ ज्ञान है, और यही श्रेष्ठ धर्म है।' रहूगण जड़भरत से अमृत ज्ञान पाकर तृप्त हो गए। उन्होंने जड़भरत से निवेदन किया, 'महात्मन! मुझे अपने चरणों में रहने दीजिए, अपना शिष्य बना लीजिए।'
( श्रीमद्भागवत महापुराण)

🌹बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌹

🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹🍁यो ज्ञातिमनुगृह्णाति दरिद्रं दीनमातुरम् ।सपुत्रपशुभिर्वृद्धिं यशश्चाव्ययमश्नुते ॥ जो अपने कुटुम्...
25/08/2026

🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹

🍁यो ज्ञातिमनुगृह्णाति दरिद्रं दीनमातुरम् ।
सपुत्रपशुभिर्वृद्धिं यशश्चाव्ययमश्नुते ॥

जो अपने कुटुम्बी, दरिद्र, दीन तथा रोगी पर अनुगरह करता है, वह पुत्र और पशुओ से समूद्ध होता और अनन्त कल्याण को अनुभव करता है ।

🌳अपनीतं सुनीतेन योऽर्थं प्रत्यानिनीषते ।
मतिमास्थाय सुदृढां तदकापुरुष व्रतम् ॥

जो अन्याय से नष्ट हुए धन को स्थिर बुद्धि का आश्रय ले अच्छी नीति से पुनः लौटा लाने की इच्छा करता है, वह वीर पुरुषों का-सा आचरण करता है ॥

🍂आयत्यां प्रतिकारज्ञस्तदात्वे दृढनिश्चयः ।
अतीते कार्यशेषज्ञो नरोऽर्थैर्न प्रहीयते ॥

जो आने वाले दुःख को रोकने का उपाय जानता है, वर्तमानकालिक कर्तव्य के पालन में दढ़ निश्चय रखने वाला है और अतीत काल में जो कर्तव्य शेष रह गया है, उसे भी जानता है, वह मनुष्य कभी अर्थ से हीन नहीं।

🍃अनिर्वेदः श्रियो मूलं दुःखनाशे सुखस्य च ।
महान्भवत्यनिर्विण्णः सुखं चात्यन्तमश्नुते ॥

उद्योग में लगे रहना उससे बिरक्त न होना धन, लाभ और कल्याण का मूल है। इसलिये उद्योग न छोड़ने वाला मनुष्य महान् हो जाता है और अनन्त सुख का उपभोग करता है॥

🌻नातः श्रीमत्तरं किं चिदन्यत्पथ्यतमं तथा ।
प्रभ विष्णोर्यथा तात क्षमा सर्वत्र सर्वदा ॥

तात । समर्थ पुरुष के लिये सब जगह और सब समय में क्षमा के समान हित कारक और अत्यन्त श्री सम्पन्न बनाने वाला उपाय दूसरा नहीं माना गया

🍃क्षमेदशक्तः सर्वस्य शक्तिमान्धर्मकारणात् ।
अर्थानर्थौ समौ यस्य तस्य नित्यं क्षमा हिता ॥

जो शक्तिहीन है, वह तो सब पर क्षमा करे ही, जो शक्तिमान् है, वह भी धर्म के लिये क्षमा करे तथा जिसकी दृष्टि में अर्थ और अनर्थ दोनों समान हैं, उसके लिये तो क्षमा सदा ही हितकरिणी होती है॥

🍀अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ।
रतिपुत्र फला दारा दत्तभुक्त फलं धनम् ॥ ६५ ॥

वेदों का फल है अमिहोत्र करना, शास्त्राध्ययन को फल है सुशीलता और सदाचार, स्त्री का फल है रति-सुख और पुत्र की प्रापति तथा धन का फल है दान और उपभोग।।

🌼अधर्मोपार्जितैरर्थैर्यः करोत्यौर्ध्व देहिकम् ।
न स तस्य फलं प्रेत्य भुङ्क्तेऽर्थस्य दुरागमात् ॥

जो अधर्म के द्वारा कमाये हुए धन से परलोक साधक यज्ञादि कर्म करता है, वह मरने के पश्चात् उसके फल का नहीं पाता, क्योकि उसका धन बुरे रास्ते से आया होता है॥

🌸कानार वनदुर्गेषु कृच्छ्रास्वापत्सु सम्भ्रमे ।
उद्यतेषु च शस्त्रेषु नास्ति शेषवतां भयम् ॥

घोर जंगल में, दुर्गम मार्ग मे, कठिन आपत्ति के समय, घबराहट में और प्रहार के लिये शत्रु उठे रहने पर भी सत्त्व (मनोबल) सम्पन्न पुरुषों को भय नहीं होता ॥

🍒उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः ।
समीक्ष्य च समारम्भो विद्धि मूलं भवस्य तत् ॥

उद्मोग, संयम, दुक्षता, सावधानी, धैर्य, स्मृति और सौच-विचारकर इन्हें उन्नति का मूलमन्त्र समझिये ॥

🌸 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌸

🏵️ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🏵️भगवत गीता  अध्याय 10श्लोक 29 से 35अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌ ।पितॄणामर्यमा चास्मि य...
25/08/2026

🏵️ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🏵️

भगवत गीता
अध्याय 10
श्लोक 29 से 35

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌ ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌ ॥ (२९)

में नागोंमें' शेषनगाग और जलचरोंका अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरोंमें अर्यमा नामक पितर तथा शासन करनेवालोंमें यमराज मैं हँ॥ २९॥

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌ ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌ ॥ (३०)

मैं देत्योंमें प्रह्दाद और गणना करनेवालोंका समय'* हूँ तथा पशुओंमें मृगराज सिंह और पक्षियोंमें मैं गरुड़ हूँ॥ ३०॥

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌ ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ (३१)

मैं पवित्र करनेवालोंमें वायु और शस्त्रधारियोंमें श्रीराम हूँ तथा मछलियोंमें मगर हूँ और नदियोंमें श्रीभागीरथी गंगाजी हूँ॥ ३१॥

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌ ॥ (३२)

हे अर्जुन! सृष्टियोंका आदि और अन्त तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओंमें अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करनेवालोंका तत्त्व-निर्णयके लिये किया जानेवाला वाद हूँ॥ ३२॥

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ (३३)

मैं अक्षरोंमें अकार हूँ और समासोंमें द्वन्द्द नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात्‌ कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँ॥ ३३॥

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌ ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ (३४)

मैं सबका नाश करनेवाला मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंका उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियोंमें कीर्ति', श्री, वाकू, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ॥ ३४॥

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्‌ ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ (३५)

तथा गायन करनेयोग्य श्रुतियोंमें में बृहत्साम और छन्‍्दोंमें गायत्री छन्द हूँ तथा महीनोंमें मार्गशीर्ष और ऋतुओंमें वसन्‍्त मैं हूँ॥ ३५॥

🌿ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌿महाभारत: शान्ति पर्व: त्र्यधिकद्विशततम अध्याय: शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धि से अतिरिक्‍त आत्‍मा की...
24/08/2026

🌿ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌿

महाभारत: शान्ति पर्व:
त्र्यधिकद्विशततम अध्याय:

शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धि से अतिरिक्‍त आत्‍मा की नित्‍य सत्ता का प्रतिपादन

मनु जी कहते हैं- बृहस्‍पते! बुद्धि के साथ तद्रूप हुआ जो जीव नामक चेतनतत्त्व हैं, वह इन्द्रियों द्वारा दीर्घकाल तक पहले के भोगे हुए विषयों का कालान्‍तर में स्‍मरण करता है। यद्यपि उस समय उन विषयों का इन्द्रियों से संबंध नहीं है, उनका संबंध-विच्‍छेद हो गया हैं तो भी वे बुद्धि में संस्‍कार रूप से अंकित हैं; इसलिये उनका स्‍मरण होता है। (इससे बुद्धि के अतिरिक्‍त उसके प्रकाशक चेतन की सत्‍ता स्‍वत: सिद्ध हो जाती है) वह एक समय अथवा अनेक समयों में भूत और भविष्‍य के सम्‍पूर्ण पदार्थों की, जो इस जन्‍म में या दूसरे जन्‍मों में देखे गये हैं, सामान्‍य रूप से उपेक्षा नहीं करता अर्थात उन्‍हें प्रकाशित ही करता हैं तथा परस्‍पर विलग न होने वाली तीनों अवस्‍थाओं में विचरता रहता है; अत: वह सबको जानने वाला साक्षी सर्वोत्‍कृष्ट देह का स्‍वामी आत्मा एक है। बुद्धि के जो स्‍थान-जागरित आदि अवस्‍थाएँ हैं, वे सभी सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणों से विभक्‍त हैं। इन अवस्‍थाओं से संबंधित जो सुख-दु:ख आदि गुण हैं, वे परस्‍पर विलक्षण हैं। उन सबको वह आत्‍मा बुद्धि के संबंध से अनुभव करता है। इन्द्रियों में भी उस जीवात्‍मा आवेश उसी प्रकार होता है जैसे काठ में लगी हुई आग में वायु का अर्थात् वायु जैसे अग्नि में प्रविष्ट होकर अग्नि को उदीप्‍त कर देती है, इसी प्रकार आत्‍मा इन्द्रियों को चेतना प्रदान करता है। मनुष्‍य नेत्रों द्वारा आत्‍मा के रूप का दर्शन नहीं कर सकता। त्वचा नामक इन्द्रिय उसका स्‍पर्श नहीं कर सकती; क्‍योंकि वह इन्द्रियों को भी इन्द्रिय अर्थात उनका प्रकाशक है। उस आत्‍मा के स्‍वरूप का श्रवणेन्द्रिय के द्वारा श्रवण नहीं हो सकता; क्‍योंकि वह शब्‍दरहित है।

ज्ञानविषयक विचार से जब आत्‍मा का साक्षात्‍कार किया जाता है, तब उसके साधनों का बाध हो जाता है। श्रोत्र आदि इन्द्रियां स्‍वयं अपने द्वारा आपको नहीं जान सकती। आत्‍मा सर्वज्ञ और सबका साक्षी है। सर्वज्ञ होने के कारण ही वह उन सबको जानता है। जैसे मनुष्‍यों द्वारा हिमालय पर्वत का दूसरा पार्श्‍व तथा चन्‍द्रमा का पृष्‍ठ भाग देखा हुआ नहीं है तो भी इसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उनके पार्श्‍व और पृष्‍ठ भाग का अस्तित्व ही नहीं है। उसी प्रकार सम्‍पूर्ण भूतों के भीतर रहने वाला उनका अन्‍तर्यामी ज्ञानस्‍वरूप आत्‍मा अत्‍यन्‍त सूक्ष्‍म होने के कारण कभी नेत्रों द्वारा नहीं देखा गया है; अत: उतने से ही यह नहीं कहा जा सकता कि आत्‍मा है ही नहीं। जैसे चन्‍द्रमा में जो कलंक है, वह जगत का अर्थात तद्गगत पृथ्‍वी का चिन्‍ह है; परंतु उसको देखकर भी मनुष्‍य ऐसा नही समझता कि वह जगत का अर्थात पृथ्‍वी का चिन्‍ह है। इसी प्रकार सबको 'मैं हूँ' इस रूप में आत्‍मा का ज्ञान है; परंतु यर्थाथ ज्ञान नहीं है; इस कारण मनुष्‍य उसके परायण आश्रित नहीं है। रूपवान पदार्थ अपनी उत्‍पत्ति से पूर्व और नष्ट हो जाने के बाद रूपहीन ही रहते हैं, इस नियम से जैसे बुद्धिमान लोग उनकी अरूपता का निश्‍चय करते हैं तथा सूर्य के उदय और अस्‍त के द्वारा विद्वान पुरुष बुद्धि से जिस प्रकार न दिखायी देनेवाली सूर्य की गति का अनुमान कर लेते हैं, उसी प्रकार विवेकी मनुष्‍य बुद्धिरूप दीपक के द्वारा इन्द्रियातीत ब्रह्मा का साक्षात्‍कार कर लेते हैं और इस निकटवर्ती दृश्‍य-प्रपंच को उस ज्ञानस्‍वरूप परमात्‍मा में विलीन कर देना चाहते हैं।
उचित उपाय किये बिना कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है, जैसे जल में रहने वाले प्राणियों से जीविका चलाने वाले सूत के जाल बनाकर उनके द्वारा मछलियों को बाँध लेते हैं, जैसे मृगों के द्वारा मृगों को, पक्षियों द्वारा पक्षियों को और हाथियों द्वारा हाथियों को पकड़ा जाता है, उसी प्रकार ज्ञेय वस्‍तु का ज्ञान के द्वारा ग्रहण होता है। हमने सुना है कि सर्प के पैरों से सर्प ही पहचानता हैं, उसी प्रकार मनुष्‍य समस्‍त शरीरों में शरीरस्‍थ ज्ञेयस्‍वरूप आत्‍मा को ज्ञान के द्वारा ही जान सकता है। जैसे इन्द्रियाँ भी इन्द्रियों द्वारा किसी ज्ञेय को नहीं जान सकतीं, उसी प्रकार यहाँ परा बुद्धि भी उस परम बोध्‍य तत्त्व को स्‍वयं नहीं देख पाती है; किंतु ज्ञाता पुरुष ही बुद्धि के द्वारा उसका साक्षात करता है। जैसे चन्‍द्रमा अमावस्‍या को प्रकाशहीन हो जाने के कारण दिखायी नहीं देता है; किंतु उस समय उसका नाश नहीं होता। उसी प्रकार शरीरधारी आत्‍मा के विषय में भी समझना चाहिये अर्थात आत्‍मा अदृश्‍य होने पर भी उसका अभाव नहीं है, ऐसा समझना चाहिये। जैसे चन्‍द्रमा अमावस्‍या को अपने प्रकाश्‍य स्‍थान से वियुक्‍त हो जाने के कारण दिखायी नहीं देता है, उसी प्रकार देहधारी आत्‍मा शरीर से वियुक्‍त होने पर दृष्टिगोचर नहीं होता है। फिर वही चन्‍द्रमा जैसे अन्‍यत्र आकाश में स्‍थान पाकर पुन: प्रकाशित होने लगता हैं, उसी प्रकार जीवात्‍मा दूसरा शरीर धारण करके पुन: प्रकट जाता है। जन्‍म, वृद्धि और क्षय का जो प्रत्‍यक्ष दर्शन होता है, वह चन्‍द्रमण्‍डल में प्रतीत होने वाली वृत्ति चन्‍द्रमा की नहीं है। उसी प्रकार शरीर का जन्‍म आदि होता है, उस शरीरधारी आत्‍मा का नहीं। जैसे किसी व्‍यक्ति का जन्‍म होता है, वह बढ़ता है और किशोर, यौवन आदि भिन्‍न-भिन्‍न अवस्‍थाओं में पहुँच जाता है तो भी यही समझा जाता है कि यह वही व्‍यक्ति है तथा अमावास्‍या के बाद जब चन्‍द्रमा पुन: मूर्तिमान होकर प्रकट होता है तो यही माना जाता है कि यह वही चन्‍द्रमा है (उसी प्रकार दूसरे शरीर में प्रवेश करने पर भी वह देहधारी आत्‍मा वही है ऐसा समझना चाहिये) जैसे अन्‍धकाररूप राहु चन्‍द्रमा की ओर आता और उसे छोड़कर जाता हुआ नहीं दिखायी देता है, उसी प्रकार जीवात्‍मा भी शरीर में आता है और उसे छोड़कर जाता हुआ नहीं दीख पड़ता है ऐसा समझो। जैसे सूर्यग्रहण काल में चन्‍द्रमा सूर्य से संयुक्‍त होने पर सूर्य में छायारूपी राहु का दर्शन होता है, उसी प्रकार शरीर से संयुक्‍त होने पर शरीरधारी आत्‍मा की उपलब्धि होती है। जैसे चन्‍द्रमा-सूर्य से अलग होने पर सूर्य में राहु की उपलब्धि नहीं होती, उसी प्रकार शरीर से विलग होने पर शरीरधारी आत्‍मा का दर्शन नहीं होता। जैसे अमावास्‍या का अतिक्रमण करने पर चन्‍द्रमा नक्षत्रों से संयुक्‍त होता है, उसी प्रकार जीवात्‍मा एक शरीर का त्‍याग करने पर कर्मों के फलस्‍वरूप दूसरे शरीर से युक्‍त होता है।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्व के अन्‍तर्गत मोक्षधर्म पर्व मे मनु और बृहस्‍पति का संवादरूप दो सौ तीनवॉ अध्‍याय पूरा हुआ।

🌱 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल। केशव माधव गोविंद बोल🌱

🌺ॐ नमो नारायणाय🌺🌴यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घषणच्छेदन तापताडनैः।तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन...
24/08/2026

🌺ॐ नमो नारायणाय🌺

🌴यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घषणच्छेदन तापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।

जिस प्रकार सोने का परिक्षण घिसने, काटने, तापने और पीटने जैसे चार प्रकारों से होता है। ठीक उसी प्रकार पुरूष की परीक्षा त्याग, शील, गुण और कर्मों से होती है।

🥀प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं।
तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।।

जिसने पहले आश्रम अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या को अर्जित नहीं की, द्वितीय आश्रम (ग्रहस्थ) में धन को अर्जित नहीं किया हो, तीसरे आश्रम (वानप्रस्थ) में कीर्ति अर्जित नहीं की तो वह चतुर्थ (सन्यास) आश्रम में क्या करेगा?

🌳षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।

नींद, तन्द्रा (ऊँघना), डर, क्रोध, आलस्य और दीर्घ शत्रुता इन 6 दोषों को वैभव और उन्नति प्राप्त करने के लिए पुरूष को त्याग करना चाहिए।

💐सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भाग्भवेत्।।

संसार में सभी सुखी हो, निरोगी हो, शुभ दर्शन हो और कोई भी ग्रसित ना हो।

🍂यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षनति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।।

जो पुरूष न कभी हर्षित होता है, न कभी द्वेष करता है, न कभी शोक करता है, न कामना करता हैं और जो शुभ और अशुभ सभी कर्मों का त्यागी हो, वह भक्तियुक्त मनुष्य मेरे को प्रिय है।

🌲न कश्चित कस्यचित मित्रं न कश्चित कस्यचित रिपु:।
व्यवहारेण जायन्ते, मित्राणि रिप्वस्तथा।।

अर्थ – न कोई किसी का मित्र होता है। न कोई किसी का शत्रु। व्यवहार से ही मित्र या शत्रु बनते हैं।

🍀भूमे:गरीयसी माता,स्वर्गात उच्चतर:पिता।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात अपि गरीयसी।।

अर्थ – भूमि से श्रेष्ठ माता है, स्वर्ग से ऊंचे पिता हैं। माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।

🍀काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमतां।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।

अर्थ – बुद्धिमान लोग काव्य-शास्त्र का अध्ययन करने में अपना समय व्यतीत करते हैं। जबकि मूर्ख लोग निद्रा, कलह और बुरी आदतों में अपना समय बिताते हैं।

🌼सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यं प्रियम।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात एष धर्म: सनातन:।।

अर्थ – सत्य बोलो, प्रिय बोलो,अप्रिय लगने वाला सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय लगने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिए।

🌿पृथ्वियां त्रीणि रत्नानि जलमन्नम सुभाषितं।
मूढ़े: पाधानखंडेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।

अर्थ – पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- जल,अन्न और शुभ वाणी। पर मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न की संज्ञा देते हैं।

🌺 मेरे प्रभु राम जय जय राम जय सियाराम जय जय सियाराम।🌺

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