25/05/2026
🌻ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌻
🌲लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः
सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् ।
सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः।
सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना।।
व्यक्ति का सबसे बड़ा अवगुण लोभ है, चुगलखोरी सबसे बड़ा पाप है। यदि व्यक्ति सदाचारी हो, सत्य बोलने वाला हो तो उसे किसी भी प्रकार के तप की आवश्यकता नहीं है। अर्थात सत्य बोलना व सदाचारी होना ही सबसे बड़ा तप है। यदि मन पवित्र हो तो तीर्थ स्नान की आवश्यकता नहीं होती। व्यक्ति यशस्वी हो तो उसे अन्य आभूषणों की आवश्यकता नहीं होती। यशस्वी होना ही सबसे बड़ा आभूषण है। इसी तरह यदि व्यक्ति श्रेष्ठ विद्या धन से युक्त हो तो अन्य किसी प्रकार के धन की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन अपकीर्ति व निरादर व्यक्ति के लिए मरण समान है।
🍃अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः।
व्याधिष्ठो देवभक्तश्च वृद्धा नारी पतिव्रता ।।
निर्बल व्यक्ति विवश होता है, इसलिए उसका आचरण भी बदल जाता है। जैसे बलहीन व्यक्ति ब्रह्मचारी बन जाता है, धनाभाव के कारण साधु-संन्यासी बन जाता है, बीमारी होने पर ईश्वर भक्त हो जाता है, ठीक इसी प्रकार बुढ़ापे में स्त्री पतिव्रता बन जाती है। लेकिन सामर्थ्य होने पर या बलवान होने पर यदि व्यक्ति ऐसे आचरण करें तो यह उनका महत्त्वपूर्ण गुण माना जाता है। उदाहरणार्थ यदि स्त्री यौवनमयी व सुन्दर होने पर भी पतिव्रत का पालन करती है तो यह उसकी विशिष्टता है।
🌷नाऽन्नोदकसमं दानं न तिथिदशी समा।
न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातुर्दैवतं परम् ।।
अन्न व जल से बढ़कर कोई दान नहीं है। द्वादशी तिथि से बढ़कर कोई तिथि नहीं है। गायत्री मंत्र से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है तथा माता से बढ़कर कोई देवता नहीं है।
🍂तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायास्तु मस्तके।
वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वाङ्गे दुर्जने विषम् ।।
सपं का विष दांतों में, मक्खी का विष उसके मस्तक में, बिच्छू का विष उसकी पूंछ में होता है। लेकिन दुष्ट व्यक्ति का तो समूचा शरीर ही विष वृक्ष होता है। अर्थात उसके नख-शिख में विष ही विष भरा होता है। इसलिए दुष्ट व्यक्ति का कभी संग नहीं करना चाहिए।
🌺पत्युराज्ञां विना नारी झुपोष्य व्रतचारिणी।
आयुष्यं हरते पत्युः सा नारी नरकं व्रजेत् ।।
जो स्त्री पति की अनुमति के बिना व्रत-उपवास करती है तो वह ऐसा करके उसकी आयु का क्षय करती है और स्वयं नरक में जाती है। अर्थात पत्नी का धर्म पति की आज्ञा का पालन करना व पतिव्रत धर्म को निभाना है।
🥀न दानैः शुध्यते नारी नोपवास शतैरपि।
न तीर्थसेवया तद्वद् भर्तुः पादोदकैर्यथा ।।
पत्नी नाना प्रकार के दान, व्रत-उपवास, तीर्थ सेवन करके भी उतनी पवित्र नहीं होती जितनी पति की सेवा करने से होती है।
💐दानेन पाणिर्न तु कंकणेन स्नानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन ।
मानेन तृप्तिर्न तु भोजनेन ज्ञानेन मुक्तिर्न तु मण्डनेन ।।
हाथों की शोभा दानादि कर्म करने से है, न कि कंगन आदि आभूषण धारण करने से। इसी प्रकार शरीर शुद्धि स्नान करने से होती है, न कि केवल चंदन लेपने से। मन को संतुष्टि मान-सम्मान से होती है, न कि भरपेट भोजन करने से । कल्याण अर्थात मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान से होती है, न कि तिलक लगाने, श्रृंगार करने से।
(भाव यह है कि व्यक्ति को बाह्याडंबरों से बचकर अंतः शुद्धि के प्रयत्न करने चाहिए।)
🌿नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गन्थलेपनम् ।
आत्मरूपं जले पश्यन् शक्रस्यापि श्रियं हरेत् ।।
नाई के घर जाकर हजामत बनवाना, पत्थर की मूर्तियों पर चंदन का लेप लगाना, जल में अपना प्रतिबिंब देखना आदि जितने भी कार्य हैं। उनसे व्यक्ति का वैभव नष्ट होता है।
🍓पुस्तकप्रत्ययाधीतं नाधीतं गुरुसन्निधौ।
सभामध्ये न शोभन्ते जारगर्भा इव स्त्रियः ।।
जिसने गुरु के सान्निध्य में नहीं वरन पुस्तकें पढ़-पढ़कर ही ज्ञान प्राप्त किया है, वह व्यक्ति विद्वानों की सभा में वैसे ही तिरस्कृत होता है। जैसे दुराचारिणी स्त्री गर्भधारण करके भी समाज में तिरस्कृत होती है। (आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में गुरु के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए गुरु प्रदत्त ज्ञान को ही श्रेष्ठ बताया है।)
🌴कृते प्रतिकृतं कुर्याद् हिंसने प्रतिहिंसनम् ।
तत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टं समाचरेत् ।।
विज्ञान के एक नियम के अनुसार क्रिया की प्रतिक्रिया निश्चय ही होती है। चाणक्य भी इस मत का समर्थन करते हुए इसी बात को कहते। हैं कि जो जैसा व्यवहार करे, उसके प्रति वैसा ही व्यवहार करने में कोई दोष नहीं है।
(भाव यह है कि जो भला सोचे, उसके प्रति भला ही सोचना चाहिए। इसके विपरीत जो बुरा सोचे उसके प्रति बुरा सोचने में कोई बुराई नहीं है।)
🌳 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🌳