Shri Radha Rani Amritvani

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राम नाम की महिमा🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹*महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा आप किसको प्रणाम ...
05/07/2019

राम नाम की महिमा

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*महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा आप किसको प्रणाम करते रहते हैं?*

शिव जी पार्वती जी से कहते हैं कि हे देवी ! जो व्यक्ति एक बार *राम* कहता है उसे मैं तीन बार प्रणाम करता हूँ।

*पार्वती जी ने एक बार शिव जी से पूछा आप श्मशान में क्यूँ जाते हैं और ये चिता की भस्म शरीर पे क्यूँ लगाते हैं?*

उसी समय शिवजी पार्वती जी को श्मशान ले गए। वहाँ एक शव अंतिम संस्कार के लिए लाया गया। लोग *राम नाम सत्य है* कहते हुए शव को ला रहे थे।

शिव जी ने कहा कि देखो पार्वती ! इस श्मशान की ओर जब लोग आते हैं तो *राम* नाम का स्मरण करते हुए आते हैं। और इस शव के निमित्त से कई लोगों के मुख से मेरा अतिप्रिय दिव्य *राम* नाम निकलता है उसी को सुनने मैं श्मशान में आता हूँ, और इतने लोगों के मुख से *राम* नाम का जप करवाने में निमित्त बनने वाले इस शव का मैं सम्मान करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, और अग्नि में जलने के बाद उसकी भस्म को अपने शरीर पर लगा लेता हूँ।

*राम* नाम बुलवाने वाले के प्रति मुझे अगाध प्रेम रहता है।

एक बार शिवजी कैलाश पर पहुंचे और पार्वती जी से भोजन माँगा। पार्वती जी विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहीं थीं। पार्वती जी ने कहा अभी पाठ पूरा नही हुआ, कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए।

शिव जी ने कहा कि इसमें तो समय और श्रम दोनों लगेंगे। संत लोग जिस तरह से सहस्र नाम को छोटा कर लेते हैं और नित्य जपते हैं वैसा उपाय कर लो।

पार्वती जी ने पूछा वो उपाय कैसे करते हैं? मैं सुनना चाहती हूँ।

शिव जी ने बताया, केवल एक बार *राम* कह लो तुम्हें सहस्र नाम, भगवान के एक हज़ार नाम लेने का फल मिल जाएगा।

एक *राम* नाम हज़ार दिव्य नामों के समान है।

पार्वती जी ने वैसा ही किया।

पार्वत्युवाच –
*केनोपायेन लघुना विष्णोर्नाम सहस्रकं?*
*पठ्यते पण्डितैर्नित्यम् श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो।।*

ईश्वर उवाच-
*श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे।*
*सहस्र नाम तत्तुल्यम राम नाम वरानने।।*

यह *राम* नाम सभी आपदाओं को हरने वाला, सभी सम्पदाओं को देने वाला दाता है, सारे संसार को विश्राम/शान्ति प्रदान करने वाला है। इसीलिए मैं इसे बार बार प्रणाम करता हूँ।

*आपदामपहर्तारम् दातारम् सर्वसंपदाम्।*
*लोकाभिरामम् श्रीरामम् भूयो भूयो नमयहम्।*

भव सागर के सभी समस्याओं और दुःख के बीजों को भूंज के रख देनेवाला/समूल नष्ट कर देने वाला, सुख संपत्तियों को अर्जित करने वाला, यम दूतों को खदेड़ने/भगाने वाला केवल *राम* नाम का गर्जन(जप) है।

*भर्जनम् भव बीजानाम्, अर्जनम् सुख सम्पदाम्।*
*तर्जनम् यम दूतानाम्, राम रामेति गर्जनम्।*

प्रयास पूर्वक स्वयम् भी *राम* नाम जपते रहना चाहिए और दूसरों को भी प्रेरित करके *राम* नाम जपवाना चाहिए। इस से अपना और दूसरों का तुरन्त कल्याण हो जाता है। यही सबसे सुलभ और अचूक उपाय है।

इसीलिए हमारे देश में प्रणाम–
*राम राम* कहकर किया जाता है।

🌷*जय श्री राम* 🌷

Jai Shri Radhey
29/06/2019

Jai Shri Radhey

जय माता दी
06/04/2019

जय माता दी

राधा रानी के दर्शन, बरसाना से ।
20/01/2019

राधा रानी के दर्शन, बरसाना से ।

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणीजी के पटरानी होने का गर्व हरण किया ।🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺राधा-कृष्ण का प्रेम इतना गहरा था क...
14/01/2019

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणीजी के पटरानी होने का गर्व हरण किया ।

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राधा-कृष्ण का प्रेम इतना गहरा था कि एक को कष्ट होता तो उसकी पीड़ा दूसरे को अनुभव होती।

एक बार सूर्यग्रहण के अवसर पर समस्त व्रजवासी–नन्द, यशोदा, श्रीराधा एवं गोपियां कुरुक्षेत्र में स्नान के लिए गए।
इधर द्वारकाधाम से श्रीकृष्ण भी अपनी समस्त पटरानियों व द्वारकावासियों के साथ कुरुक्षेत्र पहुंचे। रुक्मिणीजी को श्रीराधा के दर्शनों की सदा इच्छा रहती थी।
रुक्मिणीजी आदि पटरानियों ने श्रीराधा का खूब आतिथ्य-सत्कार किया।
रुक्मिणीजी श्रीराधा को रात्रि विश्राम के समय स्वयं अपने हाथों से सोने के कटोरे में मिश्री मिलाया हुआ गरम दूध पिलाया करती थीं।
एक दिन विश्राम करते समय जब रुक्मिणीजी श्रीकृष्ण के चरण दबा रहीं थीं तो उन्हें श्रीकृष्ण के चरणों में छाले दिखे।
वे आश्चर्य में पड़ गयीं और श्रीकृष्ण से छाले पड़ने का कारण बताने का अनुरोध करने लगीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा–’श्रीराधा के हृदयकमल में मेरे चरणारविन्द सदा विराजमान रहते हैं; उनके प्रेमपाश में बंधकर वह निरन्तर वहीं रहते हैं।
वे एक क्षण के लिए भी अलग नहीं होते। रुक्मिणीजी ! आज आपने उन्हें कुछ अधिक गर्म दूध पिला दिया है, वह दूध मेरे चरणों पर पड़ा जिससे मेरे चरणों में ये फफोले पड़ गए।’

श्रीराधिकाया हृदयारविन्दे पादारविन्दहि विराजते मे। (श्रीगर्गसंहिता)

श्रीरुक्मिणी आदि समस्त पटरानियां श्रीराधा की अनन्य कृष्णभक्ति देखकर अत्यन्त प्रभावित हो गयीं और सभी पटरानियां आपस में कहने लगीं–’श्रीराधा की श्रीकृष्ण में प्रीति बहुत ही उच्चकोटि की है। उनकी समानता करने वाली भूतल पर कोई स्त्री नहीं है।’

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इस प्रकार श्रीराधा के हृदय में कृष्ण और कृष्ण के हृदय में श्रीराधा का निवास है।

श्रीराधा का जीवन कृष्णमय था। प्रियतम श्रीकृष्ण के सुख में ही अपना सुख मानना।

श्रीराधा कहती हैं कि कृष्ण विरह में यदि मेरा तन पंचतत्त्वों में विलीन हो जाय तो मेरी इच्छा यह है कि-
मेरे शरीर का जलतत्त्व वृन्दावन के किएं-तलाबों में विलीन हो जाए,
मेरा अग्नितत्त्व उस दर्पण के प्रकाश में मिल जाए जिसमें मेरे प्रियतम कृष्ण अपना स्वरूप निहारते हों।
पृथ्वीतत्व उस मार्ग में मिल जाए, जिस मार्ग से मेरे प्राणाधार कृष्ण आते-जाते हों;
नन्दनन्दन कृष्ण के आंगन में मेरा आकाशतत्त्व समा जाय तथा
वृन्दावन के तमाल के वृक्षों की वायु में मेरा वायुतत्त्व विलीन हो जाए।
मैं विधाता से बार-बार प्रार्थना कर यही वर मांगती हूं।

श्रीराधा का भगवान श्रीकृष्ण की आत्मा है जिनमें रमण करने के कारण वे राधारमण और आत्माराम कहे जाते हैं ।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है–’जैसे आभूषण शरीर की शोभा है, उसी प्रकार तुम मेरी शोभा हो।

राधा के बिना मैं नित्य ही शोभाहीन केवल निरा कृष्ण (काला-कलूटा) रहता हूँ, पर राधा का संग मिलते ही सुशोभित होकर ‘श्री’ सहित कृष्ण–श्रीकृष्ण बन जाता हूँ।
राधा के बिना मैं क्रियाहीन और शक्तिशून्य रहता हूँ; पर राधा का संग मिलते ही वह मुझे क्रियाशील (लीलापरायण), परम चंचल और महान शक्तिशाली बना देता है।

जहां भी कृष्ण के साथ श्री का प्रयोग होता है, वहां श्रीराधाजी विद्यमान रहती हैं।

कृष्ण क्यों राधा जी के चरण दबाते थे।🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺ब्रज लीला में मुख्य वस्तु है "प्रेम", ब्रह्म का सार ही प्रेम है. श्री कृष...
29/12/2018

कृष्ण क्यों राधा जी के चरण दबाते थे।

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ब्रज लीला में मुख्य वस्तु है "प्रेम", ब्रह्म का सार ही प्रेम है.

श्री कृष्ण राधा रानी के चरण पकड़ते हैं इसे समझने से पहले एक बात समझना जरुरी है कि राधा रानी कौन हैं ?

बहुत थोड़े में समझ लो कि ‘रा’ धातु के बहुत से अर्थ होते हैं. देवी भागवत में इसके बारे में लिखा है कि जिससे समस्त कामनायें, कृष्ण को पाने की कामना तक भी, सिद्ध होती हैं.

सामरस उपनिषद में वर्णन आया है कि राधा नाम क्यों पड़ा ?

भगवान सत्य संकल्प हैं. उनको युद्ध की इच्छा हुई तो उन्होंने जय विजय को श्राप दिला दिया. तपस्या की इच्छा हुई तो नर-नारायण बन गये. उपदेश देने की इच्छा हुई तो भगवान कपिल बन गये. उस सत्य संकल्प के मन में अनेक इच्छाएं उत्पन्न होती रहती हैं. भगवान के मन में अब इच्छा हुई कि हम भी आराधना करें. हम भी भजन करें.

अब किसका भजन करें ? उनसे बड़ा कौन है ? तो श्रुतियाँ कहती हैं कि स्वयं ही उन्होंने अपनी आराधना की. ऐसा क्यों किया ? क्योंकि वो अकेले ही तो हैं, तो वो किसकी आराधना करेंगे. तो श्रुति कहती हैं कि कृष्ण के मन में आराधना की इच्छा प्रगट हुई तो श्री कृष्ण ही राधा रानी के रूप में अपने वाम भाग से प्रगट हो गये. जैसे की दो भागों में स्वयं को बात लिया हो।

दाहिना भाग श्री कृष्ण ही रहा, बायाँ भाग राधा जी के रूप में प्रकट हुआ ।

इसीलिए ये मान आदि लीला में जो कृष्ण चरण पकड़ते है, एक विशेष प्रेम लीला है. राधा रानी तो उनका ही रूप हैं, उनकी ही आत्मा हैं.

भगवान कहते हैं - कि तुम निरपेक्ष हो जाओ तो मैं तुम्हारे भी चरणों के पीछे घूमुंगा कि जिससे तुम्हारी चरण रज मेरे ऊपर पड़ जाये और मैं पवित्र हो जाऊं. भगवान तो रसिक हैं जो भक्तों के चरणों की रज के लिये उनके पीछे दौड़ते हैं. जब भगवान भक्तों की चरण रज के लिये भक्तों के पीछे दौड़ते हैं तो राधा रानी के चरण पकडें तो इसमें क्या आश्चर्य ?

जब वो श्री जी के चरण छूने जाते हैं तो वो प्रेम से हुंकार करती हैं. तो रसिक श्याम डर जाते हैं कि कहीं ऐसा ना हो लाड़ली जी मना कर दे. इसीलिए भयभीत होकर पीछे हट जाते हैं. उन चरणों से ही जो सरस रस बिखरा उस रस को पाकर के गोपीजन ही नहीं स्वयं श्री कृष्ण भी धन्य हुए.

बांके बिहारी जी के प्रकटकर्ता स्वामी हरिदास जी लिखते हैं कि (ता ठाकुर को ठकुराई -----) .

वो बोले कि ये मत समझना कि बांके बिहारी जी सर्वोच्चपति हैं. सब ठाकुरों के ठाकुर ये बांके बिहारी हैं. लेकिन इनकी भी ठकुराइन हैं श्री राधा रानी ।।

जय जय श्री राधे.....

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राधा रानी जी का एक नाम अमृतहस्ता भी है।  इसका मतलब है की किशोरी जी के हाथ से बने भोजन को पानेवाला दीर्घायु और सदा विजयी ...
19/12/2018

राधा रानी जी का एक नाम अमृतहस्ता भी है। इसका मतलब है की किशोरी जी के हाथ से बने भोजन को पानेवाला दीर्घायु और सदा विजयी होगा ।

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"श्री दुर्वासा मुनि द्वारा श्रीराधारानी को अमृतहस्ता वरदान प्राप्ति लीला"

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एक बार ऋषि दुर्वासा बरसाने आए.

श्री राधारानी अपनी सखियों संग बाल क्रीड़ा में मग्न थीं.
छोटे छोटे बर्तनों में झूठ मूठ भोजन बनाकर इष्ट भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगा रही थीं |

ऋषि को देखकर राधारानी और सखियाँ संस्कार वश बड़े प्रेम से उनका स्वागत किया. उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया और बैठने को कहा. ऋषि दुर्वासा भोली भाली छोटी छोटी कन्यायों के प्रेम से बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने जो आसन बिछाया था, उसमें बैठ गए |

जिन ऋषि की सेवा में त्रुटि के भय से त्रिलोकी काँपती है, उन्हीं ऋषि दुर्वासा की सेवा राधारानी एवम सखियाँ भोलेपन से, सहजता से कर रहीं हैं। ऋषि केवल उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे |

सखियाँ कहतीं है - "महाराज! आपको पता है हमारी प्यारी राधारानी बहुत ही अच्छे लड्डू बनाती है। हमने भोग अर्पण किया है। अभी आपको प्रसादी देती हैं." यह कहकर, सखियाँ लड्डू प्रसाद ले आती हैं।

लड्डू प्रसाद तो है, पर है ब्रजरज का बना, खेल खेल में बनाया गया.
ऋषि दुर्वासा उनके भोलेपन से अभिभूत हो जाते हैं। हँसकर कहतें हैं-
"लाली! प्रसाद पा लूँ? क्या ये तुमने बनाया है?"

सारी सखियाँ कहतीं हैं- "हाँ हाँ ऋषिवर! ये राधा ने बनाया है। आज तक ऐसा लड्डू आपने नहीं खाया होगा."

"मुंह मे डालते ही परम चकित, शब्द रहित हो जाते हैं."
"एक तो ब्रजरज का स्वाद,
दूजा श्री राधाजी के हाथ का स्पर्श लड्डू!"
"अमृत को फीका करे ऐसा स्वाद लड्डू का."
ऋषि की आंखों में आंसू आ जाते हैं।

अत्यंत प्रसन्न हो वो राधारानी को पास बुलातें हैं। और बड़े प्रेम से उनके सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं- "बेटी आज से तुम अमृतहस्ता हुई। तुम्हारे हाथ के बनाए भोजन को पानेवाला दीर्घायु और सदा विजयी होगा."

दुर्वासा ऋषि बोले – राधा रानी आप जो बनायोगी वो अमृत के भी अधिक स्वादिष्ट हो जायेगा ।

जो भी उस दिव्य प्रसाद को पायेगा उसके यश, आयु में वृद्धि होगी उस पर कोई विपत्ति नहीं आएगी, उसकी कीर्ति त्रिलोकी में होगी ।।

जो जगत की स्वामिनी है श्रीजी, उनको किसी के आशीर्वाद की ज़रूरत नहीं फिर भी देव मर्यादा से आशीर्वाद स्वीकार किया ।

ये बात व्रज में फ़ैल गयी आग की तरह की ऋषि दुर्वासा ने राधा जी को आशीर्वाद दिया ।

जब मैया यशोदा को जब ये पता चला तो वो तुरंत मैया कीर्तिदा के पास गयी और विनती की आप राधा रानी को रोज हमारे घर नन्द भवन में भोजन बनाने के लिए भेज दिया करे ।

वे दुर्वासा ऋषि के आशीर्वाद से अमृतहस्ता हो गयी हैं और कंस मेरे पुत्र कृष्ण के अनिष्ठ के लिए हर रोज अनेक असुर भेजता है।

हमारा मन बहुत चिंतित होता है आपकी बेटी के हाथो से बना हुआ प्रसाद पायेगा तो उनका अनिष्ठ नहीं होगा बल्कि उसकी बल, बुद्धि, आयु में वृद्धि होगी ।

फिर कीर्तिजी मैय्या ने श्री राधा रानी जी से कहा – आप यशोदा मैया की इच्छा पूर्ति के लिए प्रति दिन नन्द गाँव जाकर भोजन बनाया करो ।

राधा जी भगवान श्री कृष्ण की यह सेवा पाकर अति प्रसन्न हुईंं। वे प्रतिदिन अपनी सखियों के साथ नंद भवन में आकर भगवान के लिए रसोई बनातीं।

परमपूज्यपाद श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने एक बार अपने निजि सेवक को बताया कि नंद भवन में राधा जी जब प्रातःकालीन रसोई बनाती हैं, उससे पहले सारे बर्तनों को पानी से धोना तथा कपड़े से सुखाकर ललिता-विशाखा आदि सखियों को देना, यह गोलोक-धाम में उनकी नित्य सेवा है।

ऋषि दुर्वासा धन्य हैं जिनके आशीर्वाद ने श्री श्रीराधाकृष्ण की अत्यंत माधुर्यमयी भावी लीला के लिए मार्ग प्रशस्त किया.

"जय जय जय श्रीराधे." 🙌🏼

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श्री राधा का वर्णन - ऋग्वेदीय राधोपनिषद्🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺ऋग्वेदीय परम्परा के इस उपनिषद में सनकादि ऋषियों ने ब्रह्माजी से 'परम शक्...
16/12/2018

श्री राधा का वर्णन - ऋग्वेदीय राधोपनिषद्

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ऋग्वेदीय परम्परा के इस उपनिषद में सनकादि ऋषियों ने ब्रह्माजी से 'परम शक्ति' के विषय में प्रश्न किया है। ब्रह्मा जी ने वसुदेव कृष्ण को सर्वप्रथम देवता स्वीकार करके उनकी प्रिय शक्ति श्रीराधा को सर्वश्रेष्ठ शक्ति कहा है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आराधित होने के कारण उनका नाम 'राधिका' पड़ा। इस उपनिषद में उसी राधा की महिमामयी शक्तियों को उल्लेख है। उसके चिन्तन-मनन से मोक्ष-प्राप्ति की बात कही गयी है।

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एक बार हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी की प्रार्थना करके सनकादि ऋषियों ने उनसे प्रश्न किया कि - "हे भगवान् ! परमदेव कौन हैं ? कौन-२ सी उनकी शक्तियाँ हैं ? सभी शक्तियों में कौन सी शक्ति सबसे उत्तम एवं स्रष्टि का आदि कारण है ?"

ब्रह्मा जी बोले कि - "हे पुत्रों ! सुनों, अब मै अति गोपनीय रहस्य को तुमसे कहता हूँ, भगवान् श्रीकृष्ण ही सर्वप्रधान देवता हैं...उन सर्वेश्वर श्री कृष्ण की आह्वादिनी, संधिनी, ज्ञान, इच्छा, क्रिया, आदि अनेक शक्तियाँ हैं..इनमें आह्वादिनी सबसे मुख्यशक्ति है..यही कृष्ण की सबसे अधिक अन्तरंगभूता 'श्रीराधा ' कहीं जाती हैं...

भगवान् कृष्ण के द्वारा की आराधित होने के कारण इन्हें राधिका भी कहते हैं ! कृष्ण इनके आराध्यदेव हैं..इनको गान्धर्व भी कहते हैं..ब्रज की समस्त गोपियाँ श्री कृष्ण की सभी पटरानियाँ और श्रीलक्ष्मी जी, श्रीराधिका जी की अंशभूता हैं...

श्रीराधिका जी सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की सर्वेश्वरी शक्ति एवं उमकी समस्त विद्याओं में सनातनी विद्या एवं प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं...एकांतभाव से चारों वेद उनकी प्रार्थना करते हैं..श्रीराधाजी की कृपा जिस पर होती है उसे सहज ही परमधाम प्राप्त हो जाता है...

श्रीराधाजी को जाने बिना जो भगवान् श्रीकृष्ण की उपासना करता हैं, वह महामूढो में भी मूढ है..श्रीराधाजी के नामों का गुणगान तो श्रुतियाँ भी करती रहती हैं -

१. राधा
२. रासेश्वरी
३. रम्या
४. कृष्णमंत्राधिदेवता
५. सर्वाघा
६. सर्ववन्घा
७. वृन्दावनविहारिणी
८. वृन्दाराध्या
९. रमा
१०. अशेषगोपिमंडलपूजिता
११. सत्या
१२. सत्यपरा
१३. सत्यभामा
१४. श्रीकृष्णवल्लभा
१५. वृषभानुसुता
१६. गोपी
१७. मूलप्रकृति
१८. ईश्वरी
१९. गान्धर्वा
२०. राधिका
२१. रुक्मणि
२२. परमेश्वरी
२३. परात्परतरा
२४. पूर्णा
२५. पूर्णचन्द्रनिभानना
२६. भुक्तिमुक्तिप्रदा
२७. भवव्याधिविनाशिनी

ब्रह्माजी कहते हैं कि जो इन नामों का पाठ करता हैं, वह जीवन्मुक्त हो जाता है..यह शक्ति ही भगवान के अवतारों का कारण कही जाती है..यह शक्ति जगत की कारणभूता सत, रज, तम के रूप में बहिरंग होने के कारण जड़ कही जाती है...

अविद्या के रूप में जीव को बन्धन में डालने के कारण माया कही जाती गई है..इसलिए भगवान की इस क्रियाशक्ति को ही लीलाशक्ति कहते है..जो इस उपनिषद का पाठ करते है वे अव्रती व्रती हो जाते है, वायु के समान पवित्र हो जाते है एवं सर्वत्र पवित्रता का संचार करने में समर्थ हो जाते है..श्रीकृष्ण और श्रीराधा के परम प्रिय हो जाते है..वे जहाँ भी जाते एव दृष्टिपात करते है, वह क्षेत्र पवित्र हो जाता है.........

" जय जय श्रीराधे !!!!!!!!!!!!"

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