19/12/2018
राधा रानी जी का एक नाम अमृतहस्ता भी है। इसका मतलब है की किशोरी जी के हाथ से बने भोजन को पानेवाला दीर्घायु और सदा विजयी होगा ।
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"श्री दुर्वासा मुनि द्वारा श्रीराधारानी को अमृतहस्ता वरदान प्राप्ति लीला"
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एक बार ऋषि दुर्वासा बरसाने आए.
श्री राधारानी अपनी सखियों संग बाल क्रीड़ा में मग्न थीं.
छोटे छोटे बर्तनों में झूठ मूठ भोजन बनाकर इष्ट भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगा रही थीं |
ऋषि को देखकर राधारानी और सखियाँ संस्कार वश बड़े प्रेम से उनका स्वागत किया. उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया और बैठने को कहा. ऋषि दुर्वासा भोली भाली छोटी छोटी कन्यायों के प्रेम से बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने जो आसन बिछाया था, उसमें बैठ गए |
जिन ऋषि की सेवा में त्रुटि के भय से त्रिलोकी काँपती है, उन्हीं ऋषि दुर्वासा की सेवा राधारानी एवम सखियाँ भोलेपन से, सहजता से कर रहीं हैं। ऋषि केवल उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे |
सखियाँ कहतीं है - "महाराज! आपको पता है हमारी प्यारी राधारानी बहुत ही अच्छे लड्डू बनाती है। हमने भोग अर्पण किया है। अभी आपको प्रसादी देती हैं." यह कहकर, सखियाँ लड्डू प्रसाद ले आती हैं।
लड्डू प्रसाद तो है, पर है ब्रजरज का बना, खेल खेल में बनाया गया.
ऋषि दुर्वासा उनके भोलेपन से अभिभूत हो जाते हैं। हँसकर कहतें हैं-
"लाली! प्रसाद पा लूँ? क्या ये तुमने बनाया है?"
सारी सखियाँ कहतीं हैं- "हाँ हाँ ऋषिवर! ये राधा ने बनाया है। आज तक ऐसा लड्डू आपने नहीं खाया होगा."
"मुंह मे डालते ही परम चकित, शब्द रहित हो जाते हैं."
"एक तो ब्रजरज का स्वाद,
दूजा श्री राधाजी के हाथ का स्पर्श लड्डू!"
"अमृत को फीका करे ऐसा स्वाद लड्डू का."
ऋषि की आंखों में आंसू आ जाते हैं।
अत्यंत प्रसन्न हो वो राधारानी को पास बुलातें हैं। और बड़े प्रेम से उनके सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं- "बेटी आज से तुम अमृतहस्ता हुई। तुम्हारे हाथ के बनाए भोजन को पानेवाला दीर्घायु और सदा विजयी होगा."
दुर्वासा ऋषि बोले – राधा रानी आप जो बनायोगी वो अमृत के भी अधिक स्वादिष्ट हो जायेगा ।
जो भी उस दिव्य प्रसाद को पायेगा उसके यश, आयु में वृद्धि होगी उस पर कोई विपत्ति नहीं आएगी, उसकी कीर्ति त्रिलोकी में होगी ।।
जो जगत की स्वामिनी है श्रीजी, उनको किसी के आशीर्वाद की ज़रूरत नहीं फिर भी देव मर्यादा से आशीर्वाद स्वीकार किया ।
ये बात व्रज में फ़ैल गयी आग की तरह की ऋषि दुर्वासा ने राधा जी को आशीर्वाद दिया ।
जब मैया यशोदा को जब ये पता चला तो वो तुरंत मैया कीर्तिदा के पास गयी और विनती की आप राधा रानी को रोज हमारे घर नन्द भवन में भोजन बनाने के लिए भेज दिया करे ।
वे दुर्वासा ऋषि के आशीर्वाद से अमृतहस्ता हो गयी हैं और कंस मेरे पुत्र कृष्ण के अनिष्ठ के लिए हर रोज अनेक असुर भेजता है।
हमारा मन बहुत चिंतित होता है आपकी बेटी के हाथो से बना हुआ प्रसाद पायेगा तो उनका अनिष्ठ नहीं होगा बल्कि उसकी बल, बुद्धि, आयु में वृद्धि होगी ।
फिर कीर्तिजी मैय्या ने श्री राधा रानी जी से कहा – आप यशोदा मैया की इच्छा पूर्ति के लिए प्रति दिन नन्द गाँव जाकर भोजन बनाया करो ।
राधा जी भगवान श्री कृष्ण की यह सेवा पाकर अति प्रसन्न हुईंं। वे प्रतिदिन अपनी सखियों के साथ नंद भवन में आकर भगवान के लिए रसोई बनातीं।
परमपूज्यपाद श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने एक बार अपने निजि सेवक को बताया कि नंद भवन में राधा जी जब प्रातःकालीन रसोई बनाती हैं, उससे पहले सारे बर्तनों को पानी से धोना तथा कपड़े से सुखाकर ललिता-विशाखा आदि सखियों को देना, यह गोलोक-धाम में उनकी नित्य सेवा है।
ऋषि दुर्वासा धन्य हैं जिनके आशीर्वाद ने श्री श्रीराधाकृष्ण की अत्यंत माधुर्यमयी भावी लीला के लिए मार्ग प्रशस्त किया.
"जय जय जय श्रीराधे." 🙌🏼
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