21/03/2018
महाभारत कथा
2.राजा शांतनु और गंगा
महाभारत की शुरुआत कुरु वंश के राजा शांतनु से प्रारंभ होती है | राजा शांतनु बड़े बुद्धिमता और बहादुरी से हस्तिनापुर का शाषन चलाया | शांतनु को आखेट का बहुत शौक था और राजपाट से समय निकालकर वो आखेट पर जाते थे | एक बार शांतनु को वन में एक हिरण दिखा और उन्होंने हिरण को अपना निशाना बनाने का प्रयास किया | जैसे ही उन्होंने तीर लगाने का सही समयदेखा उन्होंने हिरण की तरफ तीर छोड़ दिया लेकिन अंतिम समय पर हिरण के थोडा सरक जाने से उनका तीर चुक गया |
अब शांतनु वापस घोड़े पर बैठकर वापस हिरण का पीछा करने लगे और घने वन के अंदर पहुच गये | शांतनु उस हिरण के पीछे पीछे वन के अंत तक चले गये लेकिन उनको हिरण नही मिला | वन के अंत में उनको गंगा नदी बहती हुयी दिखी | अब शांतनु अब वहा अपने घोड़े से उतरकर गंगा नदी के नजदीक बैठ गये | उन्होंने नदी के पानी से अपना मुख धोया और फिर से हिरण का पीछा करने के लिए तैयार हुए |
जैसे ही वो घोड़े पर बैठने के लिए उठे शांतनु ने अपने समक्ष एक सुंदर महिला को देखा | उन्होंने ऐसी महिला अपने जीवन में कभी नही देखी और उसे देखकर मंत्रमुग्ध हो गये | शांतनु उस महिला के पास दौरकर गये और उससे नाम पूछा | उस महिला ने शांतनु के प्रश्न का कोई उत्तर नही दिया और चलने लग गयी | शांतनु उसके पीछे भागकर गये और उससे अपना नाम बताने की प्रार्थना की | अब उस महिला ने मुस्कुराते हुए पूछा “राजन , आप मेरा नाम क्यों जानना चाहते है ” |
शांतनु ने अब खुद को संभाला और निर्भीकता से कहा “मै आपसे विवाह करना चाहता हूँ | अब उस महिला ने कहा कि “मैंने तो आपसे ये प्रश्न नही पूछा था मै तो आपसे ये पूछ रही थी कि आप मेरा नाम क्यों जानना चाहते हो “| अब शांतनु ने कहा कि “मै जीवन भर आपको कल्पना में देखता रहा हूँ | अब उस महिला ने कहा “मै आपसे शादी कर सकती हूँ अगर आप मुझसे वादा करे कि ना तो आप मेरा नाम पूछेंगे और ना ही मेरे द्वारा किये जाने वाले किसी कार्य पर प्रश्न करेंगे “| राजा शांतनु ने हामी भर दी | अब शांतनु ने कहा “वचन के अनुसार मै आपका नाम तो नही पूछ सकता हूँ लेकिन आप मुझे गंगा नदी के समीप मिली इसलिए मै आपको गंगा कहकर पुकारूँगा ” | अब वो महिला हसने लगी क्योंकि शांतनु ने अनजाने में उनका असली नाम बता दिया था |
शांतनु गंगा को हस्तिनापुर ले गये और उन्हें अपनी रानी घोषित कर दिया | राजा ने अब गंगा से विवाह किय और सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत करने लगे | गंगा एक अच्छी रानी थी जो प्रजा के साथ साथ शांतनु का भी ध्यान रखती थी | कुछ समय बाद गंगा गर्भवती हुयी तो राजा शांतनु बहुत प्रसन्न हुए | जब उनको ये सुचना मिली की उनको पुत्र हुआ है तो वो दौड़ते हुए रानी के महल में प्रवेश किया तो महल को खाली पाया | राजा शांतनु ने दसियों को गंगा के बारे में पूछा तो दसियों ने झिझकते हुए कहा कि रानी बच्चे को लेकर बाहर गयी है और उन्होंने उनका पीछा नही करने का आदेश दिया है |
शांतनु अब गंगा के बारे में विचार करने लगा तभी गंगा लौटी लेकिन उसके हाथ में कोई बच्चा नही था | शांतनु ने गंगा की तरफ आश्चर्य से देखते हुए कहा “गंगा , मेरा पुत्र कहाँ है “| गंगा ने शांतनु को तुरंत उत्तर दिया “महाराज , आपने मुझसे कोई प्रश्न ना करने का वचन दिया था , आपने मुझसे बिना इस बारे में जाने प्रश्न पूछा….इसलिए इस बार आपको क्षमा कर देती हूँ लेकि कृपा करके आगे कोई प्रश्न मत पूछना ” | शांतनु अब मानकर उदास हो गया लेकिन वो वचनों में बंधे होने के कारण कुछ ना बोल सका |
इस तरह गंगा के 6 पुत्र ओर हुए लेकिन शांतनु को कभी उनके बारे में पता नही चला ।शांतनु गंगा से बहुत नाराज हो गया था | अंत में जब गंगा ने आठवे पुत्र को जन्म दिया तब शांतनु ने बिना उसको बताये गंगा का पीछा किया | उसने देखा कि गंगा , नदी की समीप जा रही थी अब शांतनु से रहा नही गया और दौड़ता हुआ गंगा के पास गया और चिल्लाता हुआ बुला “ये आप क्या कर रही हो और आप कौन हो ?” | गंगा ने बच्चे को अपनी बाहों में लेकर रोते हुए शांतनु से कहा “राजन , आपने मेरा वचनतोड़ा है इसलिए अब हम दोनों को अलग होना होगा ” | उसने बच्चे को शांतनु को दिया और सारे प्रश्नों का उत्तर दिया | अब शांतनु को बहुत पछतावा हुआ |
अब गंगा अदृश्य हो गयी और उसके स्थान पर एक देवी खडी थी तब उन्हें एहसास हुआ कि जिसे उन्होंने गंगा नाम दिया था वो वास्तविकता में वो नदी देवी गंगा ही है | देवी गंगा ने अब कहा “राजन , पिछले जन्म में आप राजा महाभिषेक थे और हम पहली बार इन्द्रदेव के बुलावे पर स्वर्ग में मिले थे और आप मुझे सभा में घुर घुर कर देख रहे थे और इंद्रदेव आपके इस कृत्य को देखकर बहुत नाराज हुए और उन्होंने आपको श्राप दिया था कि आप मनुष्य रूप में जन्म लेकर प्यार और विरह का अनुभव करेंगे उसके परिणामस्वरुप ये सब घटित हुआ | ”
शांतनु ने अब अपने पुत्र के विषय में गंगा से प्रश्न किया | गंगा ने हँसते हुए कहा “राजन आपको एक श्राप ओर मिला था जिसके बारे में मै आपको बताती हूँ, ऋषि वशिष्ठ के पास नंदिनी नामक गाय थी और उसको वो बहुत प्यार करते थे | उसके बछडी को जन्म दिया था जिसको वो अपनी बेटी की तरह मानते थे | उस समय स्वर्ग के 8 देवो को वासु कहते थे |वासुओ ने जब नंदिनी को देखा तो वो नंदिनी को ले जाना चाहते थे और वासुओ ने अपने भाई प्रभासा को उकसाकर गाय और बछडी को चुरा लिया , ऋषि वशिष्ठ ने क्रोधित होकर वासु को मनुष्य रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया था लेकिन वासु के माफी मांगने पर श्राप में कमी कर दी जिसके अनुसार 7 वासु जन्म लेते ही स्वर्ग में चले जायंगे और आठवा वासु प्रभासा इस धरती पर ही रहेगा जिसने उस गाय और बछडी को चुराया था और उसको पृथ्वी पर लम्बा जीवन व्यतीत करना होगा | मै धरती पर पहले ही आ चुकी थी इसलिए वासुओ ने मुझे उनकी माँ बनने को कहा इसलिए 6 वासुओ को जन्म लेते ही मेंने स्वर्ग में पंहुचा दिया ” |
शांतनु पुरी कहानी सुनकर विलाप करने लग गया और उनको अपने पिछले जन्म की गलतियों पर पछतावा हुआ | अब शांतनु ने गंगा को रोकने का प्रयास किया लेकिन गंगा ने कहा कि अब वो इस जन्म में कभी नही मिल सकते है | अब शांतनु ने अपने पुत्र के लिए रुकने को कहा तो गंगा ने कहा “राजन , हमारा पुत्र अपने माता पिता के साथ सदैव नही रहेगा ” | और शांतनु एक ही दिन में अपने पत्नी और पुत्र को खोकर बहुत दुखी हुआ | इस तरह शांतनु के जीवन से गंगा चली गयी |
क्रमशः