Mithila aur Maithili

Mithila aur Maithili Histoty and culture of Mithila and Maithil,Sanskrit Schlok meaning, Suvichar etc.

13/09/2025

प्रचंड सरकार चीफ जस्टिस पद से इन्हें हटाने...

25/03/2018

रामनवमी की शुभकामना

भगवान श्री राम का जन्म चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी को अयोध्या में हुआ। अगस्त्यसंहिता के अनुसार श्री राम का जन्म दिन के 12 बजे हुआ था इस समय पुनर्वसु नक्षत्र व कर्क लग्न था। इस समय ग्रहों की दशा के अनुसार भगवान राम ने मेष राशि में जन्म लिया जिस पर सूर्य एवं अन्य पांच ग्रहों की शुभ दृष्टि पड़ रही थी। माता कौशल्या की कोख से जन्म लेने पर भगवान विष्णु के मानव अवतार लेने पर इस जन्मोत्सव का आनंद देवताओं, ऋषियों, किन्नरों, चारणों सहित अयोध्या नगरी की समस्त जनता ले रही थी।

राम जन्म(बालकाण्ड)

भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ॥

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी ।
भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी ॥

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता ।
माया गुअन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता ॥

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता ।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रकट श्रीकंता ॥

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै ।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ॥

उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा ।
कीजे सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ॥

सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा ।
यह चरित जे गावहि हरिपद पावहि ते न परहिं भवकूपा ॥

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार ।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥

21/03/2018

महाभारत कथा

2.राजा शांतनु और गंगा
महाभारत की शुरुआत कुरु वंश के राजा शांतनु से प्रारंभ होती है | राजा शांतनु बड़े बुद्धिमता और बहादुरी से हस्तिनापुर का शाषन चलाया | शांतनु को आखेट का बहुत शौक था और राजपाट से समय निकालकर वो आखेट पर जाते थे | एक बार शांतनु को वन में एक हिरण दिखा और उन्होंने हिरण को अपना निशाना बनाने का प्रयास किया | जैसे ही उन्होंने तीर लगाने का सही समयदेखा उन्होंने हिरण की तरफ तीर छोड़ दिया लेकिन अंतिम समय पर हिरण के थोडा सरक जाने से उनका तीर चुक गया |

अब शांतनु वापस घोड़े पर बैठकर वापस हिरण का पीछा करने लगे और घने वन के अंदर पहुच गये | शांतनु उस हिरण के पीछे पीछे वन के अंत तक चले गये लेकिन उनको हिरण नही मिला | वन के अंत में उनको गंगा नदी बहती हुयी दिखी | अब शांतनु अब वहा अपने घोड़े से उतरकर गंगा नदी के नजदीक बैठ गये | उन्होंने नदी के पानी से अपना मुख धोया और फिर से हिरण का पीछा करने के लिए तैयार हुए |

जैसे ही वो घोड़े पर बैठने के लिए उठे शांतनु ने अपने समक्ष एक सुंदर महिला को देखा | उन्होंने ऐसी महिला अपने जीवन में कभी नही देखी और उसे देखकर मंत्रमुग्ध हो गये | शांतनु उस महिला के पास दौरकर गये और उससे नाम पूछा | उस महिला ने शांतनु के प्रश्न का कोई उत्तर नही दिया और चलने लग गयी | शांतनु उसके पीछे भागकर गये और उससे अपना नाम बताने की प्रार्थना की | अब उस महिला ने मुस्कुराते हुए पूछा “राजन , आप मेरा नाम क्यों जानना चाहते है ” |

शांतनु ने अब खुद को संभाला और निर्भीकता से कहा “मै आपसे विवाह करना चाहता हूँ | अब उस महिला ने कहा कि “मैंने तो आपसे ये प्रश्न नही पूछा था मै तो आपसे ये पूछ रही थी कि आप मेरा नाम क्यों जानना चाहते हो “| अब शांतनु ने कहा कि “मै जीवन भर आपको कल्पना में देखता रहा हूँ | अब उस महिला ने कहा “मै आपसे शादी कर सकती हूँ अगर आप मुझसे वादा करे कि ना तो आप मेरा नाम पूछेंगे और ना ही मेरे द्वारा किये जाने वाले किसी कार्य पर प्रश्न करेंगे “| राजा शांतनु ने हामी भर दी | अब शांतनु ने कहा “वचन के अनुसार मै आपका नाम तो नही पूछ सकता हूँ लेकिन आप मुझे गंगा नदी के समीप मिली इसलिए मै आपको गंगा कहकर पुकारूँगा ” | अब वो महिला हसने लगी क्योंकि शांतनु ने अनजाने में उनका असली नाम बता दिया था |
शांतनु गंगा को हस्तिनापुर ले गये और उन्हें अपनी रानी घोषित कर दिया | राजा ने अब गंगा से विवाह किय और सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत करने लगे | गंगा एक अच्छी रानी थी जो प्रजा के साथ साथ शांतनु का भी ध्यान रखती थी | कुछ समय बाद गंगा गर्भवती हुयी तो राजा शांतनु बहुत प्रसन्न हुए | जब उनको ये सुचना मिली की उनको पुत्र हुआ है तो वो दौड़ते हुए रानी के महल में प्रवेश किया तो महल को खाली पाया | राजा शांतनु ने दसियों को गंगा के बारे में पूछा तो दसियों ने झिझकते हुए कहा कि रानी बच्चे को लेकर बाहर गयी है और उन्होंने उनका पीछा नही करने का आदेश दिया है |
शांतनु अब गंगा के बारे में विचार करने लगा तभी गंगा लौटी लेकिन उसके हाथ में कोई बच्चा नही था | शांतनु ने गंगा की तरफ आश्चर्य से देखते हुए कहा “गंगा , मेरा पुत्र कहाँ है “| गंगा ने शांतनु को तुरंत उत्तर दिया “महाराज , आपने मुझसे कोई प्रश्न ना करने का वचन दिया था , आपने मुझसे बिना इस बारे में जाने प्रश्न पूछा….इसलिए इस बार आपको क्षमा कर देती हूँ लेकि कृपा करके आगे कोई प्रश्न मत पूछना ” | शांतनु अब मानकर उदास हो गया लेकिन वो वचनों में बंधे होने के कारण कुछ ना बोल सका |

इस तरह गंगा के 6 पुत्र ओर हुए लेकिन शांतनु को कभी उनके बारे में पता नही चला ।शांतनु गंगा से बहुत नाराज हो गया था | अंत में जब गंगा ने आठवे पुत्र को जन्म दिया तब शांतनु ने बिना उसको बताये गंगा का पीछा किया | उसने देखा कि गंगा , नदी की समीप जा रही थी अब शांतनु से रहा नही गया और दौड़ता हुआ गंगा के पास गया और चिल्लाता हुआ बुला “ये आप क्या कर रही हो और आप कौन हो ?” | गंगा ने बच्चे को अपनी बाहों में लेकर रोते हुए शांतनु से कहा “राजन , आपने मेरा वचनतोड़ा है इसलिए अब हम दोनों को अलग होना होगा ” | उसने बच्चे को शांतनु को दिया और सारे प्रश्नों का उत्तर दिया | अब शांतनु को बहुत पछतावा हुआ |
अब गंगा अदृश्य हो गयी और उसके स्थान पर एक देवी खडी थी तब उन्हें एहसास हुआ कि जिसे उन्होंने गंगा नाम दिया था वो वास्तविकता में वो नदी देवी गंगा ही है | देवी गंगा ने अब कहा “राजन , पिछले जन्म में आप राजा महाभिषेक थे और हम पहली बार इन्द्रदेव के बुलावे पर स्वर्ग में मिले थे और आप मुझे सभा में घुर घुर कर देख रहे थे और इंद्रदेव आपके इस कृत्य को देखकर बहुत नाराज हुए और उन्होंने आपको श्राप दिया था कि आप मनुष्य रूप में जन्म लेकर प्यार और विरह का अनुभव करेंगे उसके परिणामस्वरुप ये सब घटित हुआ | ”

शांतनु ने अब अपने पुत्र के विषय में गंगा से प्रश्न किया | गंगा ने हँसते हुए कहा “राजन आपको एक श्राप ओर मिला था जिसके बारे में मै आपको बताती हूँ, ऋषि वशिष्ठ के पास नंदिनी नामक गाय थी और उसको वो बहुत प्यार करते थे | उसके बछडी को जन्म दिया था जिसको वो अपनी बेटी की तरह मानते थे | उस समय स्वर्ग के 8 देवो को वासु कहते थे |वासुओ ने जब नंदिनी को देखा तो वो नंदिनी को ले जाना चाहते थे और वासुओ ने अपने भाई प्रभासा को उकसाकर गाय और बछडी को चुरा लिया , ऋषि वशिष्ठ ने क्रोधित होकर वासु को मनुष्य रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया था लेकिन वासु के माफी मांगने पर श्राप में कमी कर दी जिसके अनुसार 7 वासु जन्म लेते ही स्वर्ग में चले जायंगे और आठवा वासु प्रभासा इस धरती पर ही रहेगा जिसने उस गाय और बछडी को चुराया था और उसको पृथ्वी पर लम्बा जीवन व्यतीत करना होगा | मै धरती पर पहले ही आ चुकी थी इसलिए वासुओ ने मुझे उनकी माँ बनने को कहा इसलिए 6 वासुओ को जन्म लेते ही मेंने स्वर्ग में पंहुचा दिया ” |
शांतनु पुरी कहानी सुनकर विलाप करने लग गया और उनको अपने पिछले जन्म की गलतियों पर पछतावा हुआ | अब शांतनु ने गंगा को रोकने का प्रयास किया लेकिन गंगा ने कहा कि अब वो इस जन्म में कभी नही मिल सकते है | अब शांतनु ने अपने पुत्र के लिए रुकने को कहा तो गंगा ने कहा “राजन , हमारा पुत्र अपने माता पिता के साथ सदैव नही रहेगा ” | और शांतनु एक ही दिन में अपने पत्नी और पुत्र को खोकर बहुत दुखी हुआ | इस तरह शांतनु के जीवन से गंगा चली गयी |
क्रमशः

20/03/2018

देवी दुर्गा के दूसरे और तीसरे रूप की स्तुति

देवी ब्रह्मचारिणी ।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥

देवी चन्द्रघण्टेति ।
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥

19/03/2018

महाभारत की कथ।

1.राजा दुष्यंत और शकुंतला

महाभारत की कथा कुरु वंश से शुरू होती है जो राजा भरत के वंशज थे | राजा भरत पुरु वंश के थे जिनके माता का नाम शकुंतला और पिता का नाम राजा दुष्यंत था | पुराणों में बताये अनुसार इस सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी से अत्रि का जन्म हुआ था | इसके बाद अत्रि से चन्द्रमा , चन्द्रदेव से बुध और बुधदेव से इलानंदन पुरुरुवा का जन्म हुआ | पुरुरवा से आयु , उसके बाद आयु से राजा नहुष और उसके बाद राजा नहुष से ययाति का जन्म हुआ | ययाति से पुरु का जन्म हुआ जिनसे पुरु वंश का उदय हुआ था |पुरु के वंश में ही आगे चलकर महान प्रतापी सम्राट राजा भरत का जन्म हुआ था और राजा भरत के वंश में ही आगे चलकर राजा कुरु हुए जो महाभारत कथा की नीव माने जाते है |

पुरु वंश में राजा दुष्यंत नामक एक प्रतापी राजा का जन्म हुआ था जो बहुत शूरवीर और प्रजापालक थे | एक बार की बात है कि राजा दुष्यंत वन में आखेट के लिए गये .जिस वन में वो आखेट खेलने गये थे उसी घने वन में एक महान ऋषि कण्व का भी आश्रम था | राजा दुष्यंत को जब ऋषि कण्व के उस वन में होने का पता चला तो वो ऋषि कण्व के दर्शन करने के लिए उनके आश्रम में पहुच गये | जब उन्होंने आश्रम में ऋषि कण्व को आवाज लगायी तो एक सुंदर कन्या आश्रम से आयी और उसने बताया कि ऋषि तो तीर्थ यात्रा पर गये हुए है | राजा दुष्यंत ने जब उस कन्या का परिचय पूछा तो उसने अपना नाम ऋषि पुत्री शकुंतला बताया |

राजा दुष्यंत को ये सुनकर आश्चर्य हुआ कि ऋषि कण्व तो ब्रह्मचारी है तो शकुंतला का जन्म कैसे हुआ तो शकुंतला ने बताया कि “मेरे माता पिता तो मेनका-विश्वामित्र है जो मेरे जन्म होते ही उन्हें जंगल में छोड़ आये तब एक शकुन्त नाम के पक्षी ने मेरी रक्षा की ,इसलिए मेरा नाम शकुंतला है जब जंगल से गुजरते हुए कण्व ऋषि ने मुझे देखा तो वो मुझे अपने आश्रम में ले आये और पुत्री की तरह मेरा पालन पोषण किया ” | शकुंतला की सुन्दरता और बातो पर मोहित होकर राजा दुष्यंत ने उससे विवाह करने का प्रस्ताव रखा |शकुंतला भी राजी हो गयी और उन दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया और वन में ही रहने लग गये |

एक दिन उन्होंने शकुंतला से अपने राज्य को सम्भलने के लिए वापस अपने राज्य जाने की इज्जात मागी और निशानी के रूप में अंगूठी देकर चले गये | एक दिन शकुंतला के आश्रम में ऋषि दुर्वासा आये जिस समय शकुंतला रजा दुष्यंत के ख्यालो में खोई हुयी थी जिससे ऋषि का उचित आदर सत्कार नही कर पायी जिससे क्रोधित होकर ऋषि दुर्वासा ने श्राप दिया कि वो जिसे भी याद कर रही है वो उसे भूल जाएगा | शकुंतला ने ऋषि से अपने किये की माफी माँगी जिससे ऋषि का दिल पिघल गया और उन्होंने उपाय में प्रेम की निशानी बताने पर याददाश्त वापस आने का आशीर्वाद दिया |

उस समय तक शकुंतला गर्भवती हो चुकी थी | जब ऋषि कण्व वापस तीर्थ यात्रा से लौटे तो उनको पुरी कहानी शकुंतला ने बताई | ऋषि ने शकुंतला को अपने पति के पास जाने को कहा क्योंकि विवाहित कन्या को पिता के घर रहना वो उचित नही मानते थे | शकुंतला सफर के लिए निकल पड़ी लेकिन मार्ग में एक सरोवर में पानी पीते वक्त उनकी अंगूठी तालाब में गिर गयी जिसे एक मछली ने निगल लिया | शकुंतला जब राजा दुष्यंत के पास पहुचे तो ऋषि कण्व के शिष्यों ने शकुंतला का परिचय दिया तो राजा दुष्यंत ने शकुंतला को पत्नी मानने से अस्वीकार कर दिया क्योंकि वो ऋषि के श्राप से सब भूल चुके थे | राजा दुष्यंत के द्वारा शकुंतला के अपमान के कारण आकाश में बिजली चमकी और शकुंतला की माँ मेनका उन्हें ले गयी |
उधर वो मछली एक मछुवारे के जाल में आ गयी जिसके पेट से वो अंगूठी निकली | मछुवारे ने वो अंगूठी राजा दुष्यंत को भेंट दे दी तब राजा दुष्यंत को शकुंतला के बारे में सब याद आ गया | महाराज ने तुरंत शकुंतला की खोज करने के लिए सैनिको को भेजा लेकिन कही पता नही चला | कुछ समय बाद इंद्रदेव के निमन्त्रण पर देवो के साथ युद्ध करने के लिए राजा दुष्यंत इंद्र नगरी अमरावती गये | संग्राम में विजय के बाद जब आकाश मार्ग से वापस लौट रहे थे तब उन्हें रास्ते में कश्यप ऋषि के आश्रम में एक सुंदर बालक को खेलते देखा | मेनका ने शकुंतला को कश्यप ऋषि के आश्रम में छोड़ा हुआ था |वो बालक शकुंतला का पुत्र ही था

जब उस बालक को राजा दुष्यंत ने देखा तो उसे देखकर उनके मन में प्रेम उमड़ आया वो जैसे ही उस बालक को गोद में उठाने के लिए खड़े हुए तो शकुंतला की सहली ने बताया कि अगर वो इस बालक को छुएंगे तो इसके भुजा में बंधा काला डोर साँप बनकर आपको डंस लेगा | राजा दुश्न्त ने उस बात का ध्यान नही दिया और बालक को गोद में उठा लिया जिससे उस बालक के भुजा में बँधा साँप दुष्यंत को काट लिया।
क्रमशः

18/03/2018

देवी शैलपुत्री ।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम् ॥

04/03/2018

THOUGHT OF THE DAY
It’s very easy to convince an uneducated person. It's even more easy to convince a person who has complete knowledge. But a person who develops a false pride on basis of half-knowledge gained, cannot be convinced even by God.

03/03/2018

सुभाषित

आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्र्चद्यौर्भूमिरापो हॄदयं यमश्र्च |
अहश्र्च रात्रिश्र्च उभे च संध्ये धर्माेऽपि जानाति नरस्य वॄत्तम् ||
महाभारत
Aditya (The Sun), Chandra (The Moon), Vayu (The wind), Agni (The fire), Akash (The Space), Prithvi ( The Earth), Jala (The Water), Hridaya (Heart), Yama (The death), both Sandhikalas (Dawn and Dusk) and Dharma, witness what man does.

03/03/2018

नास्तिक काअर्थ

भारतीय दर्शन में नास्तिक शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।

(1) जो लोग वेद को परम प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार बौद्ध, जैन और लोकायत मतों के अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं और ये तीनों दर्शन ईश्वर या वेदों पर विश्वास नहीं करते इसलिए वे नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं।

(2) जो लोग परलोक और मृत्युपश्चात् जीवन में विश्वास नहीं करते; इस परिभाषा के अनुसार केवल चार्वाक दर्शन जिसे लोकायत दर्शन भी कहते हैं, भारत में नास्तिक दर्शन कहलाता है और उसके अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं।

(3) जो लोग ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते। ईश्वर में विश्वास न करनेवाले नास्तिक कई प्रकार के होते हैं। घोर नास्तिक वे हैं जो ईश्वर को किसी रूप में नहीं मानते। चार्वाक मतवाले भारत में और रैंक एथीस्ट लोग पाश्चात्य देशें में ईश्वर का अस्तित्व किसी रूप में स्वीकार नहीं करते; अर्धनास्ति उनका कह सकते हैं जो ईश्वर का सृष्टि, पालन और संहारकर्ता के रूप में नहीं मानते। इस परिभाषा के अनुसार भारत के बहुत से दर्शन नास्तिक की कोटि में आ जाते हैं।

वास्तव में न्याय और वेदांत दर्शनों को छोड़कर भारत के अन्य दर्शन सांख्य, योग, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध और जैन नास्तिक दर्शन कहे जा सकते हैं क्योंकि इनमें ईश्वर को सर्जक, पालक और विनाशक नहीं माना गया है। ऐसे नास्तिकों को ही अनीश्वरवादी कहते हैं।

03/03/2018

चाणक्य नीति

माता यस्य गृहे नास्ति भार्या चाप्रियवादिनी।
अरण्यं तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम् ॥
भावार्थ :
जिसके घर में न माता हो और न स्त्री प्रियवादिनी हो , उसे वन में चले जाना चाहिए क्योंकि उसके लिए घर और वन दोनों समान ही हैं ।

आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥
भावार्थ :
विपत्ति के समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए । धन से अधिक रक्षा पत्नी की करनी चाहिए । किन्तु अपनी रक्षा का प्रसन सम्मुख आने पर धन और पत्नी का बलिदान भी करना पड़े तो नहीं चूकना चाहिए ।

लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संगतिम् ॥
भावार्थ :
जिस स्थान पर आजीविका न मिले, लोगों में भय, और लज्जा, उदारता तथा दान देने की प्रवृत्ति न हो, ऐसी पांच जगहों को भी मनुष्य को अपने निवास के लिए नहीं चुनना चाहिए ।

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