26/08/2026
*ईश्वरीय भेदों का प्रकाश*
परमेश्वर के दास भाई बख्तसिंग के द्वारा लिखित और प्रकाशित की गई पुस्तक में से
*अगस्त २६*
*“अविश्वासियों के साथ असमान जुए में न जुतों, क्योंकि धार्मिकता और अधर्म का क्या मेल-जोल? या ज्योति और अन्धकार की क्या संगति? और मूरतों के साथ परमेश्वर के मन्दिर का क्या संबंध?” (२ कुरिन्थियों ६:१४-१६)*
विश्वासी होने के नाते हमें अलगाव का जीवन जीना ही चाहिये। हम संसार की नकल नहीं कर सकते और अविश्वासीयों के साथ असमान जुए में नहीं जुत सकते। सांसारिक मित्रों, पड़ोसियों और सगे-संबंधियों और आदतों से अशुद्ध न होते हुए खुद को अलग रखना चाहिये। हम निज लोग, स्वर्गीय लोग हैं और सांसारिक लोग नहीं हैं। लोग जब हमारे घर की मुलाकात ले तब उन्हें यह जानना चाहिये कि यह परमेश्वर का घर हैं, सांसारिक घर नहीं। वे आसपास देखते हैं और पहली द्रष्टि में पा लेते हैं कि परमेश्वर यहाँ पर जी रहा है कि नहीं।
‘वरन उस वस्त्र से भी धृणा करो जो शरीर के द्वारा कलंकित हो गया है।’ (यहूदा ८, १२, २०, २१, २३) यह सम्पूर्ण अलगाव का जीवन है। हमारी आदतों में, हमारे वस्त्रों, रीति-रिवाज, आचार और बातचीत में, हमें अलग रहना चाहियें। और हमारी वार्तालाप, पहनावा, अभिरूची, संगीत या किसी भी प्रकार के रस द्वारा हमें इसे दिखाना पडे़गा जिससे प्रभु के नाम को महिमा मिले।
गिनती ३१:१६ और २५: १ में बिलाम ने गलत सम्मति दी, और बहुत चालाकी से कितने ही इस्राएलियों को मिश्रित विवाह के लिये बहकाया। परिणाम स्वरुप लोग मूर्तिपूजा करने लगे और इस्राएलियों ने बालपेओर के साथ एकता बनाई। बिलाम की शिक्षा को हम मिश्रित विवाह की शिक्षा अर्थात् विश्वासियों और अविश्वासियों के साथ विवाह का संबंध कह सकते है। किस लिए अविश्वासीयों के आपस संबंध खतरनाक हैं? ऐसी दलील करनी कि, ‘मेरी मित्रता के द्वारा मैं उसे जीत लेने का प्रयत्न करता हूँ।’ यह गलत है। आत्मिक अंधापन लाने के लिये दुश्मन का यह सबल हथियार हैं; एक विश्वासी एक अविश्वासी के साथ विवाह में या व्यवसाय में किस रीति से सहमत हो सकता हैं? आमोस ३: ३ में हमको जवाब मिलता है, कि ‘यदि दो मनुष्य परस्पर सहमत न हों तो क्या वे एक संग चल सकेंगे?’
एक दिन एक बालक मेरे पास आया। उसने मुझसे पैसे मांगे। मैंने पूछा, ‘तुझको किसलिये पैसे चाहिये?’ उसने कहा, ‘मुझको सिनेमा देखने जाना है।’ मैं ने कहा, ‘ठीक, तो पैसों के लिये प्रार्थना कर’। जब वह प्रार्थना करने लगा तब उसने कहा, ‘मेरी जीभ नहीं खुलती।’ उसके बाद उसने आगे कहा ‘हमारी समझ के अनुसार जो गलत हैं उसके लिये हम प्रार्थना कर नहीं सकते।’ वह केवल छोटा बालक था परन्तु वह जानता था कि यह गलत था। हम पूछ सकते हैं, ‘प्रभु, मेरे जीवन के द्वारा आपको महिमा मिल रही हैं?’ हमारी हँसी हो, मजाक हो और लोग हमारी हँसी उड़ाये तो भी हमको अलगाव का जीवन जीना पड़ेगा क्योंकि हम निज प्रजा हैं और हमारे जीवन के द्वारा हमें परमेश्वर की महिमा प्रकट करनी चाहिये।