Shreenathji-Nathdwara

Shreenathji-Nathdwara Unique details of Bhog, Raag, Shringaar and festivals in Shreenathji Temple, Nathdwara
इसका

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व्रज – भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदाગુજરાતી - શ્રાવણ વદ એકમSaturday, 29 August 2026 स्वर्णयुगदाता नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री गोव...
29/08/2026

व्रज – भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा
ગુજરાતી - શ્રાવણ વદ એકમ
Saturday, 29 August 2026

स्वर्णयुगदाता नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी महाराज का उत्सव
*हेम हिंडोलना*

🙏🏼
जय श्री कृष्ण

श्री नवनीतप्रियाजी भी आज प्रातः सोने के पलना में झूलते हैं, राजभोग में सोने के बंगले में विराजित हो दर्शन देते हैं और संध्या-आरती में अपने घर सोने के हिंडोलने में झूल कर श्री नवनीतप्रियाजी श्रीजी में पधारते हैं और श्रीजी की गोद में विराजित हो शीतल व उत्सव भोग अरोगते हैं.

उत्सव भोग अरोगे उपरांत श्री नवनीतप्रियाजी और श्री मदनमोहनजी डोल-तिबारी में सोने के हिंडोलना में झूलते हैं

उत्सव भोग में प्रभु को विशेष रूप से भीगी हुई चने की दाल की मोहनथाल, केशरी मनोहर (इलायची-जलेबी) के लड्डू, केशर-युक्त घेवर, केशर-युक्त खोवा के गुंजा (मावा का मीठा मसाला भरे), केशर-युक्त चन्द्रकला (सूतर फेनी), दूधघर की मेवाबाटी, मूंग दाल के गुंजा, उड़द दाल की कचौरी, घी में तले काबुली चना, चना-दाल, फीकी सेव, दहीवडा, पांच प्रकार के शाक-आदि, मोयन की खस्ता पूड़ी, पतली पूड़ी, केशर-युक्त खीर, घी में तले बीज-चालनी के सूखे मेवे, विविध प्रकार के संदाना (आचार), विविध प्रकार के फलफूल और शीतल आदि अरोगाये जाते हैं.
दूधघर का साज अरोगाया जाता है जिसमें मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी (मलाई पूड़ी), केशर-युक्त बासोंदी, जीरायुक्त दही, मावा के खिलौना, माखन, मिश्री, खोवा, मलाई आदि अरोगाये जाते हैं.

सभी समां के कीर्तन :

मंगला - प्रथम हि भादो मास अष्टमी
राजभोग - सब ग्वाल नाचे गोपी गावे
हिंडोलना -
1 मनमोहन रंग बोरे झूलन आई
2 राधे झूलत रमक-झमक
3 झूलत गिरधर लाल हिंडोरे
4 आज लाल झुलत रंग भरे
5 जमुना तट नव सघन कुंज
6 ऐ दोऊ झूलत कुंज कुटीर
7 ऐ दोऊ बाँह जोटि किए
8 झोटा तरल भऐ सो तु राख लेरी
शयन - भादो की अँधियारी

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29/08/2026

व्रज – भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा
ગુજરાતી - શ્રાવણ વદ એકમ
Saturday, 29 August 2026

स्वर्णयुगदाता नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी महाराज का उत्सव

🙏🏼
जय श्री कृष्ण

श्रृंगार दर्शन के आगे का क्रम :

आज गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से श्रीजी को केशरयुक्त जलेबी के टूक एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता, सखड़ी में छःभात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात और नारंगी भात), मीठी सेव और केसरी पेठा आदि अरोगाये जाते हैं.

आज राजभोग दर्शन में पिछवाई बड़ी करदी जाती है, राजभोग से संध्या-आरती तक में प्रभु सोने के बंगले में विराजते हैं.

कीर्तन - (राग : सारंग)

सब ग्वाल नाचे गोपी गावे।
प्रेम मगन कछु कहत न आवे॥1॥
हमारे राय घर ढोटा जायो।
सुनि सब लोग बधाये आयो॥2॥
दूध दही घृत कावरि ढोरी।
तंदुल दूब अलंकृत रोरी॥3॥
हरद दूध दधि छिरकत अंगा।
लसत पीत पट वसन सुरंगा॥4॥
ताल पखावज दुंदुभी ढोला।
हसत परस्पर करत कलोला॥5॥
अजिर पंक गुलफन चढि आये।
रपटत फिरत पग न ठहराये॥6॥
वारिवारि पट भूषन दीने।
लटकत फिरत महा रस भीने॥7॥
सुधि न परे को काकी नारी।
हसिहसि देत परस्पर तारी॥8॥
सुर विमान सब कौतुक भूले।
मुदित ’त्रिलोक’ विमोहित फूले॥9॥

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28/08/2026

व्रज – भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा
ગુજરાતી - શ્રાવણ વદ એકમ
Saturday, 29 August 2026

स्वर्णयुगदाता नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी महाराज का प्राकट्योत्सव

🙏🏼
जय श्री कृष्ण

आज नाथद्वारा के स्वर्णयुग दाता नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी महाराज का उत्सव है.

श्रीजी का सेवाक्रम - उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

आज दिनभर झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है. चारों समां (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) में आरती थाली में की जाती है.

मुड्ढा, पेटी दिवालगिरी का साज केसरी चढ़े. तकिया पर खोल लाल मखमल के काम के आते हैं.

आज श्रीजी को नियम से मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जायेगा. इस श्रृंगार के विषय में मैं पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि प्रभु को मुख्य रूप से तीन लीलाओं (शरद-रास, दान और गौ-चारण) के भाव से मुकुट का श्रृंगार धराया जाता है.

अधिक गर्मी एवं अधिक सर्दी के दिनों में मुकुट नहीं धराया जाता इस कारण देव-प्रबोधिनी से फाल्गुन कृष्ण सप्तमी (श्रीजी का पाटोत्सव) तक एवं अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक मुकुट नहीं धराया जाता.

जब भी मुकुट धराया जाता है वस्त्र में काछनी धरायी जाती है. काछनी के घेर में भक्तों को एकत्र करने का भाव है.

जब मुकुट धराया जाये तब ठाड़े वस्त्र सदैव श्वेत रंग के होते हैं. ये श्वेत वस्त्र चांदनी छटा के भाव से धराये जाते हैं.

जिस दिन मुकुट धराया जाये उस दिन विशेष रूप से भोग-आरती में सूखे मेवे के टुकड़ों से मिश्रित मिश्री की कणी अरोगायी जाती है.

आज श्रीजी प्रभु को केसरी मलमल के सूथन, काछनी, गाती का पटका धराया जाता है. पिछवाई अष्टसखी के भाव की आती है.

श्रृंगार दर्शन –

कीर्तन – (राग : बिलावल)

नंदरायके नवनिधि आई l
माथे मुकुट श्रवन मणि कुंडल पीतबसन अरु चारि भुजाई ll 1 ll
बाजत बीन मृदंग शंख धुनि घसि अरगजा अंग चढ़ाई l
दधि पीवत और चंदन छिरकत रपटि परत है लैत उठाई ll 2 ll
अच्छत दूध लिये चढ़ बड़े द्वारन बंदन माल बंधाई l
‘सूरदास’ सब मिलै परस्पर दान देत नंद मन न अघाई ll 3 ll

साज – श्रीजी में आज अष्टसखी भाव से खड़ी व्रज की गोपीजनों के चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया के ऊपर लाल मखमल बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी मलमल पर सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी एवं गाती का पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र सफेद जामदानी के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. उत्सव के हीरे के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर टंकमा हीरा मुकुट की टोपी व मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में हीरा के मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं. कली, कस्तूरी व कमल माला धरायी जाती है.
सफेद पुष्पों की एवं लाल गुलाब की थागवाली मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरा के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट केसरी, गोटी राग-रंग की व आरसी चार झाड़ की आती है.

इसके आगे का क्रम अगली पोस्ट में

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28/08/2026

व्रज – भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा
ગુજરાતી - શ્રાવણ વદ એકમ
Saturday, 29 August 2026

स्वर्णयुगदाता नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी महाराज का उत्सव

🙏🏼
जय श्री कृष्ण

श्रीजी का सेवाक्रम - उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

आज दिनभर झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है. चारों समां (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) में आरती थाली में की जाती है.

मुड्ढा, पेटी दिवालगिरी का साज केसरी चढ़े. तकिया पर खोल लाल मखमल के काम के आते हैं.

मंगला दर्शन :
कीर्तन : प्रथम हि भादो मास अष्टमी

28/08/2026
व्रज - श्रावण शुक्ल पूर्णिमाગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ પૂનમFriday, 28 August 2026 रक्षाबंधन, नित्यलीलास्थ श्री दामोदरजी का प्र...
27/08/2026

व्रज - श्रावण शुक्ल पूर्णिमा
ગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ પૂનમ
Friday, 28 August 2026

रक्षाबंधन, नित्यलीलास्थ श्री दामोदरजी का प्राकट्योत्सव

🙏🏼
जय श्री कृष्ण

*पुष्टिमार्ग में भद्रा रहित पूर्णिमा में श्री ठाकुरजी को रक्षा (राखी) धरायी जाती है अतः श्रीनाथजी में आज श्रावण शुक्ल पूर्णिमा (शुक्रवार, 28 अगस्त 2026) को प्रातः श्रृंगार दर्शन में रक्षा (राखी) धरायी जाएगी.*

आज भाई-बहन का प्रेम पर्व रक्षाबंधन है.
बहन अपने भाई की मंगलकामना हेतु राखी बांधती है इस भाव से बहन सुभद्रा राखी बांधती है, गर्गादिक ऋषि भी राखी बांधते हैं, माता यशोदा भी लालन की रक्षा हेतु राखी बांधती है
इन सभी भावनाओं के कीर्तन अष्टसखाओं ने गाये हैं. यह पर्व व्रज में सर्वत्र मनाया जाता है.

आज श्री गुसांईजी के ज्येष्ठ पुत्र गिरधरजी के पुत्र नित्यलीलास्थ श्री दामोदरजी का प्राकट्योत्सव भी है.

आज से श्रीजी में जन्माष्टमी की बड़ी बधाई बैठती भी है जिससे नवमी तक पिछवाई, गादी, तकिया आदि सर्व साज पर आगे की सफेदी नहीं चढ़ाई जाती है, तकिया लाल मखमल के आते हैं.
जड़ाव स्वर्ण के पात्र, चौकी, पडघा, शैयाजी आदि आते हैं.

मंगला दर्शन के आगे का क्रम

मंगला दर्शन के उपरांत ठाकुरजी को चन्दन, आवंला, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है.

श्रीजी प्रभु को नियम से रुपहली पठानी किनारी से सुसज्जित लाल मलमल का पिछोड़ा व श्रीमस्तक पर चिल्ला वाली पाग के ऊपर सादी मोरपंख की चन्द्रिका का श्रृंगार धराया जाता है.

🌼 रक्षाबंधन

श्रीजी में पवित्रा की भांति ही रक्षा (राखी) भी शुभमुहूर्त से कभी प्रातः श्रृंगार दर्शन में और कभी उत्थापन दर्शन में धरायी जाती है.

पुष्टिमार्ग में सूर्योदय के समय की तिथि से त्यौहार मनाया जाता है व भद्रा रहित समय में श्रीनाथजी को रक्षा (राखी) धरायी जाती है.
इस साल श्रीनाथजी में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा (शुक्रवार, 28 अगस्त 2026) को श्रृंगार समय में श्रीजी को रक्षा (राखी) धरायी जाएगी

खुले श्रृंगार के दर्शन में ही झालर,घण्टा बजाते हुए व शंखध्वनि के साथ श्रीजी को तिलक, अक्षत कर दोनों श्रीहस्त में एवं दोनों बाजूबंद के स्थान पर रक्षा (राखी) बांधी जाएगी. तदुपरांत भेंट की जाएगी और दर्शन उपरांत उत्सव भोग धरे जाएंगे.
श्रीजी को रक्षा (राखी) धराए जाने के पश्चात सभी स्वरूपों को रक्षा (राखी) धराई जाती हैं.

उत्सव भोग में विशेष रूप से गुलपापड़ी (गेहूं के आटे की मोहनथाल जैसी सामग्री), दूधघर में सिद्ध केशर-युक्त बासोंदी (रबड़ी) की हांड़ी, घी में तले बीज-चालनी के सूखे मेवे, विविध प्रकार के संदाना और फल आदि अरोगाये जाते हैं.
रात्रि के अनोसर में श्रीजी के सनमुख अत्तरदान,
मिठाई का थाल, चोपड़ा,चार बीड़ा आरसी इत्यादि धरे जाते हैं.

आज के अलावा श्रीजी को गुलपापड़ी केवल घर के छप्पनभोग (माघशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा) के दिन ही आरोगायी जाती है.

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गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से श्रीजी को केशरयुक्त जलेबी के टूक एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता, सखड़ी में मीठी सेव व केसरी पेठा का बिलसारु अरोगाया जाता है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

हेरि है आज नंदराय के आनंद भयो l
नाचत गोपी करत कुलाहल मंगल चार ठयो ll 1 ll
राती पीरी चोली पहेरे नौतन झुमक सारी l
चोवा चंदन अंग लगावे सेंदुर मांग संवारी ll 2 ll
माखन दूध दह्यो भरिभाजन सकल ग्वाल ले आये l
बाजत बेनु पखावज महुवरि गावति गीत सुहाये ll 3 ll
हरद दूब अक्षत दधि कुंकुम आँगन बाढ़ी कीच l
हसत परस्पर प्रेम मुदित मन लाग लाग भुज बीच ll 4 ll
चहुँ वेद ध्वनि करत महामुनि पंचशब्द ढ़म ढ़ोल l
‘परमानंद’ बढ्यो गोकुलमे आनंद हृदय कलोल ll 5 ll

साज - श्रीजी में आज लाल मलमल पर रुपहली ज़री के हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी के ऊपर सफेद और तकिया के ऊपर लाल मखमल बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है. पीठिका और पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते हैं.

वस्त्र - श्रीजी को आज रुपहली पठानी किनारी से सुसज्जित लाल मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र पीले धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला से दो अंगुल ऊंचा (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. उत्सव के मिलवा – हीरे, मोती, माणक, पन्ना, नीलम तथा जड़ाव स्वर्ण के आभरण व दुलड़ा धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर लाल चिल्ला वाली पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरा के कुंडल धराये जाते हैं.
कली की माला धरायी जाती है. श्वेत पुष्पों की मालाजी एवं विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उत्सव का, गोटी जड़ाऊ व आरसी चार झाड़ की आती है.

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27/08/2026

व्रज - श्रावण शुक्ल पूर्णिमा
ગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ પૂનમ
Friday, 28 August 2026

रक्षाबंधन, नित्यलीलास्थ गोस्वामी श्री दामोदरजी का प्राकट्योत्सव

जय श्री कृष्ण
🙏🏻

*आज रक्षाबंधन का पर्व है.*
*पुष्टिमार्ग में भद्रा रहित पूर्णिमा में श्री ठाकुरजी को रक्षा (राखी) धरायी जाती है अतः श्रीनाथजी में आज श्रावण शुक्ल पूर्णिमा (शुक्रवार, 28 अगस्त 2026) को प्रातः श्रृंगार दर्शन में रक्षा (राखी) धरायी जाएगी.*

आज भाई-बहन का प्रेम पर्व रक्षाबंधन है.
बहन अपने भाई की मंगलकामना हेतु राखी बांधती है इस भाव से बहन सुभद्रा राखी बांधती है, गर्गादिक ऋषि भी राखी बांधते हैं, माता यशोदा भी लालन की रक्षा हेतु राखी बांधती है
इन सभी भावनाओं के कीर्तन अष्टसखाओं ने गाये हैं. यह पर्व व्रज में सर्वत्र मनाया जाता है.

आज श्री गुसांईजी के ज्येष्ठ पुत्र गिरधरजी के पुत्र नित्यलीलास्थ श्री दामोदरजी का प्राकट्योत्सव भी है.
आप का प्राकट्य विक्रम संवत १६३२ में आज के दिन हुआ था.
आपने अपने जीवनकाल में श्रीजी के विविध मनोरथ किये थे. आपश्री वेदज्ञ, मन्त्रज्ञ, अत्यंत तेजस्वी एवं सरल स्वाभाव के थे.

एक बार आपश्री से छुपा कर श्रीजी के तत्कालीन अधिकारी ने प्रभु सेवा के तीन लाख रुपये एक वृक्ष के नीचे गाड़ दिए थे तब श्रीजी ने स्वयं आपश्री को यह बात बतायी और आपने तुरंत रुपये मंगाकर श्रीजी को अर्पण कर दिए थे.

आज से श्रीजी में जन्माष्टमी की बड़ी बधाई बैठती भी है जिससे नवमी तक पिछवाई, गादी, तकिया आदि सर्व साज पर आगे की सफेदी नहीं चढ़ाई जाती है, तकिया लाल मखमल के आते हैं.
जड़ाव स्वर्ण के पात्र, चौकी, पडघा, शैयाजी आदि आते हैं.

श्रीजी का सेवाक्रम - पर्व रुपी उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

आज दिनभर झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है. चारों समां (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) में आरती थाली में की जाती है.

मंगला दर्शन :
कीर्तन - सोहेलरा नंद महर घर आज

व्रज - श्रावण शुक्ल चतुर्दशीગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ ચૌદસThursday, 27 August 2026प्रथम तिलकायत नित्यलीलास्थ श्री विट्ठलेशराय...
26/08/2026

व्रज - श्रावण शुक्ल चतुर्दशी
ગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ ચૌદસ
Thursday, 27 August 2026

प्रथम तिलकायत नित्यलीलास्थ श्री विट्ठलेशरायजी महाराज (१६५७) का उत्सव

🙏🏼
जय श्री कृष्ण

श्री गुसांईजी के प्रपौत्र अर्थात उनके प्रथम पुत्र गिरधरजी के द्वितीय पुत्र दामोदरजी के पुत्र श्री विट्ठलेशरायजी (१६५७) का आज प्राकट्योत्सव है.

आपका धराया टिपारा का अद्भुत श्रृंगार श्रीजी को सुहाता था एवं आपश्री श्रीजी के प्रिय थे अतः आप को ‘टिपारा वाले विट्ठलेशजी’ भी कहा जाता है.

श्रीजी ने स्वयं आज्ञा कर गृह के मुखिया के रूप में तिलक कर आपको प्रथम तिलकायत के रूप में नियुक्त किया एवं उन्हें वर्ष के 360 दिनों में 60 दिन के श्रृंगार करने की आज्ञा भी प्रदान की.
ये वे श्रृंगार हैं जो वर्ष में सभी बड़े उत्सवों पर धराये जाते हैं और ‘घर के श्रृंगार’ कहे जाते हैं और इन पर तिलकायत महाराज का विशेष अधिकार होता है.

आप ने ही श्रीजी को दूधघर की विविध प्रकार सामग्रियां अरोगाने का क्रम प्रारंभ किया.

तिलकायत के रूप में पदासीन होने के पश्चात आपने श्रीजी के कई मनोरथ किये, अपने चमत्कारों से तत्कालीन मुग़ल बादशाह जहाँगीर को भी प्रभावित किया एवं उनके पास से गोकुल एवं गोपालपुर (जतीपुरा) में जमीनें प्राप्त कर बड़ी-बड़ी गौशालाओं का निर्माण करवाया.

आपके काल से ही श्रीजी में तिलकायत परम्परा का प्रारंभ हुआ जो कि आज भी जारी है. आपके नित्यलीला में प्रवेश के पश्चात आपके ज्येष्ठ पुत्र श्री लालगिरिधर जी तिलकायत के रूप में पदासीन हुए.

श्रीजी का सेवाक्रम - नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री विट्ठलेशरायजी का उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.
दिनभर सभी समय झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है.

आज श्रीजी को नियम का रुपहली पठानी किनारी से सुसज्जित चंपाई (पीली) मलमल का पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर कुल्हे के ऊपर सुनहरी घेरा का श्रृंगार धराया जाता है.

श्रावण शुक्ल एकादशी से श्रावण शुक्ल पूर्णिमा तक प्रतिदिन श्रृंगार समय मिश्री की गोल-डली का भोग अरोगाया जाता है.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से श्रीजी को केशरयुक्त जलेबी के टूक एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता सखड़ी में मीठी सेव व केशरयुक्त पेठा अरोगाये जाते हैं.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

आंगन नन्द के दधिकादो।
छिरकत गोपी ग्वाल परस्पर प्रगटे जग में जादो॥१॥
दूध लियो दधि लियो लियो घृत माखन माट संयूत।
घरघरते सब गावत आवत भयो महर के पूत॥२॥
वाजत तूर करत कोलाहल वारि वारि दे दान।
जियो जसोदा पूत तिहारो यह घर सदा कल्यान॥३॥
छिरके लोग रंगीले दीसे हरदी पति सुवास।
’मेहा’ आनंद पुंज सुमंगल यह ब्रज सदा हुलास॥४॥

साज – श्रीजी में आज चंपाई मलमल पर रुपहली ज़री की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है.
गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.
पीठिका व पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते हैं.

वस्त्र - श्रीजी को आज चंपाई (पीली) मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र लाल धराये जाते हैं.

श्रृंगार - श्रीजी को आज मध्य से दो आंगुल ऊंचा (घुटने तक) का श्रृंगार धराया जाता है.
माणक के सर्व-आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर चंपाई (पीली) मलमल की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, सुनहरी घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. हांस, त्रवल नहीं धराये जाते वहीं कली माला व बघ्घी धरायी जाती है. श्रीकर्ण में माणक के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी मालाजी एवं विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं. श्रीहस्त में कमलछड़ी, माणक के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं. पट पीला व गोटी श्याम मीना की धरायी जाती है.

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भोग समय धराये जाने वाले फीका के स्थान पर बीज चालनी के सूखे मेवा अरोगाये जाते हैं.

सभी समां के कीर्तन :
मंगला - तुम ब्रजरानी के लाला
राजभोग - नंद के दधि कादो आँगन
हिंडोलना -
1 झुलत हैं ब्रजनाथ हिंडोरे
2 नटवर सुरंग हिंडोरे
3 श्री विट्ठलराय लाल गिरधारी
4 ओल्हर आई हो घन घटा
शयन - हेरी हेरी रे भैय्या

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व्रज - श्रावण शुक्ल चतुर्दशीગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ ચૌદસThursday, 27 August 2026प्रथम तिलकायत नित्यलीलास्थ श्री विट्ठलेशराय...
26/08/2026

व्रज - श्रावण शुक्ल चतुर्दशी
ગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ ચૌદસ
Thursday, 27 August 2026

प्रथम तिलकायत नित्यलीलास्थ श्री विट्ठलेशरायजी महाराज (१६५७) का उत्सव

🙏🏼
जय श्री कृष्ण

श्रीनाथजी का सेवाक्रम - नित्यलीलास्थ तिलकायत श्री विट्ठलेशरायजी का उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.
दिनभर सभी समय झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है.

मंगला दर्शन:
कीर्तन –तुम ब्रजरानी के लाला

व्रज - श्रावण शुक्ल त्रयोदशीગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ તેરસWednesday, 26 August 2026किंकोडा तेरस, चतुरा नागा के श्रृंगार 🙏🏼जय ...
25/08/2026

व्रज - श्रावण शुक्ल त्रयोदशी
ગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ તેરસ
Wednesday, 26 August 2026

किंकोडा तेरस, चतुरा नागा के श्रृंगार

🙏🏼
जय श्री कृष्ण

आज किंकोड़ा तेरस है.
आज के दिन व्रज में विराजित श्रीजी यवनों के उपद्रव का नाश कर सद्दू पांडे के पाड़े (भैंसे) के ऊपर बैठकर रामदासजी, कुम्भनदासजी आदि को साथ लेकर चतुरा नागा नाम के विरक्त योगी को दर्शन देने एवं सद्दू पांडे के पाड़े (भैंसे) का उद्धार करने टॉड का घना नाम के घने वन में पधारे थे.

चतुरा नागा श्रीजी के दर्शन को लालायित थे परन्तु वे श्री गिरिराजजी पर पैर नहीं रखते थे जिससे श्रीजी के दर्शन से विरक्त थे.
भक्तवत्सल प्रभु अत्यन्त दयालु हैं एवं अपने सभी भक्तों को मान देते हैं अतः वे स्वयं अपने भक्त को दर्शन देने पधारे. चतुरा नागा की अपार प्रसन्नता का कोई छोर नहीं था.
वर्षा ऋतु थी सो चतुरा नागा तुरंत वन से किंकोडा के फल तोड़ लाये और उसका शाक सिद्ध किया. रामदासजी साथ में चून का सीरा (गेहूं के आटे का हलवा) सिद्ध कर के लाये थे सो श्रीजी को सीरा एवं किंकोडा का शाक भोग अरोगाया.

तब कुम्भनदासजी ने यह पद गाया –
“भावत है तोहि टॉडको घनो ।
कांटा लगे गोखरू टूटे फाट्यो है सब तन्यो ।। 1 ।।
सिंह कहां लोकड़ा को डर यह कहा बानक बन्यो ।
‘कुम्भनदास’ तुम गोवर्धनधर वह कौन रांड ढेडनीको जन्यो ।।

कुछ देर पश्चात समाचार आये कि यवन लश्कर फिर से बढ़ गया है जिससे तुरंत श्रीजी को पुनः मंदिर में पधराया गया.

आज भी राजस्थान में भरतपुर के समीप टॉड का घना नमक स्थान पर श्रीजी की चरणचौकी एवं बैठकजी है जो कि अत्यंत रमणीय स्थान है.

आज श्रीजी को मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है. इस श्रृंगार के विषय में मैं पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि प्रभु को मुख्य रूप से तीन लीलाओं (शरद-रास, दान और गौ-चारण) के भाव से मुकुट का श्रृंगार धराया जाता है.

अधिक गर्मी एवं अधिक सर्दी के दिनों में मुकुट नहीं धराया जाता इस कारण देव-प्रबोधिनी से फाल्गुन कृष्ण सप्तमी (श्रीजी का पाटोत्सव) तक एवं अक्षय तृतीया से रथयात्रा तक मुकुट नहीं धराया जाता.

जब भी मुकुट धराया जाता है वस्त्र में काछनी धरायी जाती है. काछनी के घेर में भक्तों को एकत्र करने का भाव है.
जब मुकुट धराया जाये तब ठाड़े वस्त्र सदैव श्वेत रंग के होते हैं. ये श्वेत वस्त्र चांदनी छटा के भाव से धराये जाते हैं.
जिस दिन मुकुट धराया जाये उस दिन विशेष रूप से भोग-आरती में सूखे मेवे के टुकड़ों से मिश्रित मिश्री की कणी अरोगायी जाती है.

आज प्रभु को लाल-श्वेत लहरिया के वस्त्र, श्रीमस्तक पर सिलमा-सितारा का मुकुट धराया जाएगा व हिंडोलना के भाव की पिछवाई आएगी.

उपरोक्त वर्णित प्रसंग की भावना से ही आज के दिन श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में किंकोडा का शाक एवं चून का सीरा (गेहूं के आटे का हलवा) अरोगाया जाता है.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज महा मंगल महराने l
पंच शब्द ध्वनि भीर बधाई घर घर बेरखबाने ll 1 ll
ग्वाल भरे कांवरि गोरस की वधु सिंगारत वाने l
गोपी ग्वाल परस्पर छिरकत दधि के माट ढुराने ll 2 ll
नाम करन जब कियो गर्गमुनि नंद देत बहु दाने l
पावन जश गावति ‘कटहरिया’ जाही परमेश्वर माने ll 3 ll

साज – चतुरा नागा के भाव चित्रांकन की सुन्दर पिछवाई आज श्रीजी में धरायी जाती है. (चित्र में भिन्न)
गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है. पीठिका के ऊपर व इसी प्रकार से पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते हैं.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल-सफेद लहरिया का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी एवं पीताम्बर (रास-पटका) धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र श्वेत डोरिया के धराये जाते हैं.

श्रृंगार - प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है.
मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं. कली व कमल माला धरायी जाती है. आज चोटीजी नहीं धरायी जाती है.
श्रीमस्तक पर सिलमा-सितारा की टोपी व मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
श्रीकर्ण में मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं. श्रीहस्त में कमलछड़ी, झीने लहरिया के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं. पट लाल व गोटी मीना की आती है.

सभी समां के कीर्तन :

मंगला - यह नित नेम यशोदा ज़ू
श्रृंगार - नंदराय के नव निध आई
राजभोग - महा मंगल मेहराने आज
हिंडोलना -
1 झूलत गिरधर लाल
2 साँवरे संग गोरी झूलत
3 आज लाल झूलत रंग भरे
4 मोर मुकुट की लटकन मटकन
शयन - आज तो बधाई बाजे मन्दिर

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