27/08/2026
व्रज - श्रावण शुक्ल पूर्णिमा
ગુજરાતી - શ્રાવણ સુદ પૂનમ
Friday, 28 August 2026
रक्षाबंधन, नित्यलीलास्थ श्री दामोदरजी का प्राकट्योत्सव
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जय श्री कृष्ण
*पुष्टिमार्ग में भद्रा रहित पूर्णिमा में श्री ठाकुरजी को रक्षा (राखी) धरायी जाती है अतः श्रीनाथजी में आज श्रावण शुक्ल पूर्णिमा (शुक्रवार, 28 अगस्त 2026) को प्रातः श्रृंगार दर्शन में रक्षा (राखी) धरायी जाएगी.*
आज भाई-बहन का प्रेम पर्व रक्षाबंधन है.
बहन अपने भाई की मंगलकामना हेतु राखी बांधती है इस भाव से बहन सुभद्रा राखी बांधती है, गर्गादिक ऋषि भी राखी बांधते हैं, माता यशोदा भी लालन की रक्षा हेतु राखी बांधती है
इन सभी भावनाओं के कीर्तन अष्टसखाओं ने गाये हैं. यह पर्व व्रज में सर्वत्र मनाया जाता है.
आज श्री गुसांईजी के ज्येष्ठ पुत्र गिरधरजी के पुत्र नित्यलीलास्थ श्री दामोदरजी का प्राकट्योत्सव भी है.
आज से श्रीजी में जन्माष्टमी की बड़ी बधाई बैठती भी है जिससे नवमी तक पिछवाई, गादी, तकिया आदि सर्व साज पर आगे की सफेदी नहीं चढ़ाई जाती है, तकिया लाल मखमल के आते हैं.
जड़ाव स्वर्ण के पात्र, चौकी, पडघा, शैयाजी आदि आते हैं.
मंगला दर्शन के आगे का क्रम
मंगला दर्शन के उपरांत ठाकुरजी को चन्दन, आवंला, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है.
श्रीजी प्रभु को नियम से रुपहली पठानी किनारी से सुसज्जित लाल मलमल का पिछोड़ा व श्रीमस्तक पर चिल्ला वाली पाग के ऊपर सादी मोरपंख की चन्द्रिका का श्रृंगार धराया जाता है.
🌼 रक्षाबंधन
श्रीजी में पवित्रा की भांति ही रक्षा (राखी) भी शुभमुहूर्त से कभी प्रातः श्रृंगार दर्शन में और कभी उत्थापन दर्शन में धरायी जाती है.
पुष्टिमार्ग में सूर्योदय के समय की तिथि से त्यौहार मनाया जाता है व भद्रा रहित समय में श्रीनाथजी को रक्षा (राखी) धरायी जाती है.
इस साल श्रीनाथजी में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा (शुक्रवार, 28 अगस्त 2026) को श्रृंगार समय में श्रीजी को रक्षा (राखी) धरायी जाएगी
खुले श्रृंगार के दर्शन में ही झालर,घण्टा बजाते हुए व शंखध्वनि के साथ श्रीजी को तिलक, अक्षत कर दोनों श्रीहस्त में एवं दोनों बाजूबंद के स्थान पर रक्षा (राखी) बांधी जाएगी. तदुपरांत भेंट की जाएगी और दर्शन उपरांत उत्सव भोग धरे जाएंगे.
श्रीजी को रक्षा (राखी) धराए जाने के पश्चात सभी स्वरूपों को रक्षा (राखी) धराई जाती हैं.
उत्सव भोग में विशेष रूप से गुलपापड़ी (गेहूं के आटे की मोहनथाल जैसी सामग्री), दूधघर में सिद्ध केशर-युक्त बासोंदी (रबड़ी) की हांड़ी, घी में तले बीज-चालनी के सूखे मेवे, विविध प्रकार के संदाना और फल आदि अरोगाये जाते हैं.
रात्रि के अनोसर में श्रीजी के सनमुख अत्तरदान,
मिठाई का थाल, चोपड़ा,चार बीड़ा आरसी इत्यादि धरे जाते हैं.
आज के अलावा श्रीजी को गुलपापड़ी केवल घर के छप्पनभोग (माघशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा) के दिन ही आरोगायी जाती है.
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गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से श्रीजी को केशरयुक्त जलेबी के टूक एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता, सखड़ी में मीठी सेव व केसरी पेठा का बिलसारु अरोगाया जाता है.
राजभोग दर्शन –
कीर्तन – (राग : सारंग)
हेरि है आज नंदराय के आनंद भयो l
नाचत गोपी करत कुलाहल मंगल चार ठयो ll 1 ll
राती पीरी चोली पहेरे नौतन झुमक सारी l
चोवा चंदन अंग लगावे सेंदुर मांग संवारी ll 2 ll
माखन दूध दह्यो भरिभाजन सकल ग्वाल ले आये l
बाजत बेनु पखावज महुवरि गावति गीत सुहाये ll 3 ll
हरद दूब अक्षत दधि कुंकुम आँगन बाढ़ी कीच l
हसत परस्पर प्रेम मुदित मन लाग लाग भुज बीच ll 4 ll
चहुँ वेद ध्वनि करत महामुनि पंचशब्द ढ़म ढ़ोल l
‘परमानंद’ बढ्यो गोकुलमे आनंद हृदय कलोल ll 5 ll
साज - श्रीजी में आज लाल मलमल पर रुपहली ज़री के हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी के ऊपर सफेद और तकिया के ऊपर लाल मखमल बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है. पीठिका और पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते हैं.
वस्त्र - श्रीजी को आज रुपहली पठानी किनारी से सुसज्जित लाल मलमल का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र पीले धराये जाते हैं.
श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला से दो अंगुल ऊंचा (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. उत्सव के मिलवा – हीरे, मोती, माणक, पन्ना, नीलम तथा जड़ाव स्वर्ण के आभरण व दुलड़ा धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर लाल चिल्ला वाली पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरा के कुंडल धराये जाते हैं.
कली की माला धरायी जाती है. श्वेत पुष्पों की मालाजी एवं विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उत्सव का, गोटी जड़ाऊ व आरसी चार झाड़ की आती है.
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