Kaalsarpa Pooja

Kaalsarpa Pooja Pandit Shashank Joshi performs Kalsarpa Shanti Pooja, Narayan Naagbali, Tripindi Shraddha Vidhi and

13/05/2024
13/05/2024

Pt. Shashank Kumar Joshi trimbakeshwar
13/05/2024

10/05/2024

|| श्री मारुती स्तोत्र ||
भीमरुपी महारुद्रा, वज्रहनुमान मारुती| वानरी अंजनीसुता, रामदुता प्रभंजना||१||
महाबली प्राणदाता, सकळा उठवी बळे| सौख्यकारी दु:खहारी, धूर्त वैष्णव गायका|| २||
दीननाथा हरीरुपा, सुंदरा जगदंतरा| पातालदेवता हंता, भव्य सिंदुर लेपना|| ३||
लोकनाथा, जगन्नाथा, प्राणनाथा पुरातना| पुण्यवंता, पुण्यशिळा, पावना परितोषका|| ४||
ध्वजांगे उचली बाहो, आवेशे लोटला पुढे| काळाग्नी काळरुद्राग्नी, देखता कांपती भये|| ५||
ब्रम्हांडे माईली नेणों आंवाळे दंतपंक्ती| नेत्राग्नी चालील्या ज्वाळा, भ्रुकुटी ताठिल्या बळे|| ६||
पुच्छ ते मुर्डीले माथा, किरीटी कुंडले बरी| सुवर्ण कटी कांसोटी , घंटा किंकिणी नागरा|| ७||
ठकारे पर्वता ऐसा, नेटका सडपात़ळु| चपळांग पाहता मोठे, महाविद्युल्लतेपरी|| ८||
कोटीच्या कोटी उड्डाणे, झेपावे उत्तरेकडे| मंद्रादीसारखा द्रोणु क्रोधे उत्पाटिला बळे|| ९||
आणिला मागुती नेला, आला गेला मनोगती| मनासी टाकीले मागे, गतिसी तुळणा नसे|| १०||
अणुपासुनि ब्रम्हांडाएवढा होत जातसे, तयासी तुळणा कोठे, मेरुमंदार धाकुटे || ११||
ब्रम्हांडाभोवते वेढे, वज्रपुच्छे करु शके| तयासी तुळणा कैंची, ब्रम्हांडी पाहता नसे|| १२||
आरक्त देखिले डोळा, ग्रासिले सूर्यमंडळा| वाढता वाढता वाढे, भेदिले शून्यमंडळा|| १३||
धनधान्यपशुवृद्धी, पुत्रपौत्रसमस्तही|पावती रुपविद्यादी स्तोत्रपाठेकरुनिया|| १४||
भूतप्रेतसमंधादि रोगव्याधीसमस्तही| नासती तुटती चिंता आनंदे भीमदर्शने|| १५||
हे धरा पंधराश्लोकी लाभली शोभली बरी| दृढदेहो, निसंदेहो, संख्याचंद्रकळागुणे|| १६||
रामदासी अग्रगण्यु, कपीकुळासी मंडणु| रामरुपी अंतरात्मा, दर्शने दोषनासती|| १७||
|| इती श्री रामदासकृतं संकटनिरसनं मारुतीस्तोत्रं सम्पूर्णं ||

10/05/2024

श्री भवानी अष्टक -

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ १ ॥

भवाब्धावपारे महादु:ख्भीरू पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्त: ।
कुसंसारपाशप्रबध्द: सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ २ ॥

न् जानामि दानं न च ध्यानयोगम् न जानामि तन्त्रम् न च स्तोत्र स्तोत्रम्न्त्रम् ।
न जानामि पुजाम् न च न्यासयोगम् गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ३ ॥

न जानामि पुण्यं न जानामि तिर्थम् न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ४ ॥

कुकर्मी कुसड्गी कुबुध्दी: कुदास्: कुलाचारहीन्: कदाचारलीन्: ।
कुदृष्टी: कुवाक्यप्रबन्ध्: सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ५ ॥

प्रजेशम् रमेशम् महेशम् सुरेशम् दिनेशम् निशीधेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ६ ॥

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ७ ॥

अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीन: सदा जाङ्घवक्र: ।
विपत्तौ प्रविष्ट: प्रनष्ट: सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥ ८ ॥

॥इति श्रीमदादिशंकराचार्य् विरचिता भवान्यष्टकं समाप्ता ॥

17/02/2018

इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के विषय में शिवपुराण में यह कथा वर्णित है-

एक बार महर्षि गौतम के तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ किसी बात पर उनकी पत्नी अहिल्या से नाराज हो गईं। उन्होंने अपने पतियों को ऋषि गौतम का अपकार करने के लिए प्रेरित किया। उन ब्राह्मणों ने इसके निमित्त भगवान्‌ श्रीगणेशजी की आराधना की।

उनकी आराधना से प्रसन्न हो गणेशजी ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा उन ब्राह्मणों ने कहा- 'प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो किसी प्रकार ऋषि गौतम को इस आश्रम से बाहर निकाल दें।' उनकी यह बात सुनकर गणेशजी ने उन्हें ऐसा वर माँगने के लिए समझाया। किंतु वे अपने आग्रह पर अटल रहे।

अंततः गणेशजी को विवश होकर उनकी बात माननी पड़ी। अपने भक्तों का मन रखने के लिए वे एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि गौतम के खेत में जाकर रहने लगे। गाय को फसल चरते देखकर ऋषि बड़ी नरमी के साथ हाथ में तृण लेकर उसे हाँकने के लिए लपके। उन तृणों का स्पर्श होते ही वह गाय वहीं मरकर गिर पड़ी। अब तो बड़ा हाहाकार मचा।

सारे ब्राह्मण एकत्र हो गो-हत्यारा कहकर ऋषि गौतम की भर्त्सना करने लगे। ऋषि गौतम इस घटना से बहुत आश्चर्यचकित और दुःखी थे। अब उन सारे ब्राह्मणों ने कहा कि तुम्हें यह आश्रम छोड़कर अन्यत्र कहीं दूर चले जाना चाहिए। गो-हत्यारे के निकट रहने से हमें भी पाप लगेगा। विवश होकर ऋषि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहाँ से एक कोस दूर जाकर रहने लगे। किंतु उन ब्राह्मणों ने वहाँ भी उनका रहना दूभर कर दिया। वे कहने लगे- 'गो-हत्या के कारण तुम्हें अब वेद-पाठ और यज्ञादि के कार्य करने का कोई अधिकार नहीं रह गया।' अत्यंत अनुनय भाव से ऋषि गौतम ने उन ब्राह्मणों से प्रार्थना की कि आप लोग मेरे प्रायश्चित और उद्धार का कोई उपाय बताएँ।

तब उन्होंने कहा- 'गौतम! तुम अपने पाप को सर्वत्र सबको बताते हुए तीन बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करो। फिर लौटकर यहाँ एक महीने तक व्रत करो। इसके बाद 'ब्रह्मगिरी' की 101 परिक्रमा करने के बाद तुम्हारी शुद्धि होगी अथवा यहाँ गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से शिवजी की आराधना करो। इसके बाद पुनः गंगाजी में स्नान करके इस ब्रह्मगीरि की 11 बार परिक्रमा करो। फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा।

ब्राह्मणों के कथनानुसार महर्षि गौतम वे सारे कार्य पूरे करके पत्नी के साथ पूर्णतः तल्लीन होकर भगवान शिव की आराधना करने लगे। इससे प्रसन्न हो भगवान शिव ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा। महर्षि गौतम ने उनसे कहा- 'भगवान्‌ मैं यही चाहता हूँ कि आप मुझे गो-हत्या के पाप से मुक्त कर दें।' भगवान्‌ शिव ने कहा- 'गौतम ! तुम सर्वथा निष्पाप हो। गो-हत्या का अपराध तुम पर छल पूर्वक लगाया गया था। छल पूर्वक ऐसा करवाने वाले तुम्हारे आश्रम के ब्राह्मणों को मैं दण्ड देना चाहता हूँ।'

इस पर महर्षि गौतम ने कहा कि प्रभु! उन्हीं के निमित्त से तो मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। अब उन्हें मेरा परमहित समझकर उन पर आप क्रोध न करें।' बहुत से ऋषियों, मुनियों और देव गणों ने वहाँ एकत्र हो गौतम की बात का अनुमोदन करते हुए भगवान्‌ शिव से सदा वहाँ निवास करने की प्रार्थना की। वे उनकी बात मानकर वहाँ त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग के नाम से स्थित हो गए। गौतमजी द्वारा लाई गई गंगाजी भी वहाँ पास में गोदावरी नाम से प्रवाहित होने लगीं। यह ज्योतिर्लिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला है।

लक्ष्मीसूक्त संस्कृतपद्मानने पद्मऊरू पद्माक्षि पद्मसंभवेतन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम ||१||अश्वदायै गोदायै धन...
01/11/2017

लक्ष्मीसूक्त संस्कृत
पद्मानने पद्मऊरू पद्माक्षि पद्मसंभवे
तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम ||१||
अश्वदायै गोदायै धनदायै महाधने
धनं मे लभतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ||२||
पद्मानने पद्मवि पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि
विश्वप्रिये विश्वमनोनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधस्त्व ||३||
पुत्रपौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम
प्रजानां भवसि माता आयुष्मंतं करोतु मे ||४||
धनमग्निर्धनंवायुर्धनं सूर्यो धनं वसु:
धनमिंद्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्विना ||५||
वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः||६||
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मति:
भवंति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत ||७||
सरसिजनिलयेसरोजहस्ते धवलरांशुकगंधमाल्य शोभे
भगवतिहरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यं ||८||
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियां
लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभां ||९||
महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि
तन्नो ल़क्ष्मी प्रचोदयात ||१०||
आनंद: कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुता :
ऋषयश्च श्रियः पुत्रा मयि श्रीर्देवीदेवता ||११||
ऋणरोगादि दारिद्र्यं पापश्च अपमृत्यवः
भयशोकमनस्तापा नश्यंतु मम सर्वदा ||१२||
श्रीवर्चस्वमायुष्यमारोग्यविधाच्छोभमानं महीयते
धान्यं धनं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायु:||१३||
http://www.kaalsarpapooja.com

19/10/2017

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