Jainism

Jainism Jainism, is an Indian religion that prescribes a path of non-violence towards all living beings.

28/11/2019

क्या है जैन धर्म, देखिये इस छोटी सी फ़िल्म में और अपने बच्चों को भी दिखाये और बताये।🙏जय जिनेंद्रजी 🙏

भगवान महावीर के जनम जयंती की बधाई !१९ - २० अप्रैल २०१६ को भगवान महावीर की पवन जयंती पर आप सभी श्रधालुओं को सदर निमंत्रण ...
15/04/2016

भगवान महावीर के जनम जयंती की बधाई !

१९ - २० अप्रैल २०१६ को भगवान महावीर की पवन जयंती पर आप सभी श्रधालुओं को सदर निमंत्रण है कुण्डलपुर एवं सम्मेद शिखर जी में!

भगवान महावीर का संदेश : जियो और जीने दो, अहिंसा परमो धर्म !

सभी महावीर के वंधु गण इस सुचना को अधिक से अधिक शेयर करें !
जय जिनेन्द्र!!!

25/10/2015
Bhagwan Mahavir Janmabhoomi Kundalpur me Bihar Govt. dwara Mahavir Jayanti par aayojit Kundalpur Mahotsav ka Udghatan Ch...
02/04/2015

Bhagwan Mahavir Janmabhoomi Kundalpur me Bihar Govt. dwara Mahavir Jayanti par aayojit Kundalpur Mahotsav ka Udghatan Chief Minister Nitish Kumar Ji dwara Nandyavart Mahal tirth par 2 April ko 3 PM par kiya jayega. Avashya Padharen Or PARAS CHANNEL par LIVE TELECAST 8 AM se, 3 PM se & 6.30 PM se dekhen

02/04/2015

महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाए.....
Jai Jinendra !

08/09/2014

Happy Anant Chaturdashi ! Jai Jinendra

Paryushan is one of the important and biggest festival of Jain religion. A festival of self purification and leaving all...
31/08/2014

Paryushan is one of the important and biggest festival of Jain religion. A festival of self purification and leaving all impurities behind. It's our holy week going on and in our religion we have the culture to accept our mistake and say sorry. In this whole year knowingly or unknowingly if we have hurted you with our deeds, words or behaviour than we are folding our hands for forgiveness. We say Bole Chale Micchami Dukkkadam or we are sorry !

16/08/2014
रक्षा बंधन पर्व !जैन धर्म के अनुसार रक्षा बँधन क्यों?भगवान मुनिसुव्रत के समय की कहानी है | उज्जैनी नगरी में राजा श्रीवर्...
09/08/2014

रक्षा बंधन पर्व !

जैन धर्म के अनुसार रक्षा बँधन क्यों?

भगवान मुनिसुव्रत के समय की कहानी है | उज्जैनी नगरी में राजा श्रीवर्मा राज्य करते थे | उनके बलि,नामुचि, बृहस्पतिऔर प्रह्लाद आदि चार मंत्री थे | उनको धर्म पे श्रद्धा नहीं थी |

एक बार उस नगरी में 700 मुनियों के संघ सहितआचार्य श्री अकम्पन जी का आगमन हुआ | राजा भी उनके मंत्री के साथ गए |

राजा ने मुनि को वंदन किया, पर मुनि तो ध्यान में लीन मौन थे | राजा उनकी शांति को देखकर बहुत प्रभावित हुआ, पर मंत्री कहने लगे - " महाराज ! इन जैन मुनियों को कोई ज्ञान नहीं है इसीलिए मौन रहने का ढोंग कर रहे हैं " |
इसप्रकार निंदा करते हुए वापिस जा रहे थे और यह बात श्री श्रुतसागर जी नाम के मुनिश्री ने सुन ली , उन्हें मुनि संघ की निंदा सहन नहीं हुई | इसलिए उन्हों ने उन मंत्री के साथ वाद-विवाद किया | मुनिराज ने उन्हें चुप कर दिया |

राजा के सामने अपमान जानकार वह मंत्री रात में मुनि को मारने गए , पर जैसे ही उन्हों ने तलवार उठाई उनका हाथ खड़ा ही रह गया | सुबह सब लोगो ने देखा और राजा ने उन्हें राज्य से बाहर कर दिया ।

ये चार मंत्री हस्तिनापुर में गए | यहाँ पद्मराय राजा राज्य करते थे | उनके भाई मुनि थे - उनका नाम विष्णुकुमारथा |

सिंहरथ नाम का राजा , इस हस्तिनापुर के राजा का शत्रु था | पद्मराय राजा उसे जीत नहीं सकता था | अंतमे बलि मंत्री की युक्ति से उसे जीत लिया था | इसलिए राजा ने मुँह माँगा इनाम माँगने को कहा , पर मंत्री ने कहा जब आवश्यकता पड़ेगी तब माँग लूँगा |

इधर आचार्य श्रीअकम्पन जीआदि 700 मुनि भी विहार करते हुए हस्तिनापुर पहुँचे | उनको देखकर मंत्री ने उन्हें मार ने की योजना बनायीं | उन्हों राजा के पास वचन माँग लिया |

उन्हों ने कहा - "महाराज हमें यज्ञ करना है इसलिए आप हमें सात दिन के लिए राज्य सौप दें | राजा ने राज्य सौप दिया फिर मंत्रियो ने मुनिराज के चारो और पशु, हड्डी, मांस, चमड़ी के ढेर लगा दिए फिर आग लगा दी | मुनिवरो पर घोर उपसर्ग हुआ |

यह बात विष्णुकुमार मुनि को पता चली | वह हस्तिनापुर गए और एक ब्राह्मण पंडित का रूप धारण कर लिया और बलि राजा के सामने उत्तमोत्तम श्लोक बोलने लगे |

बलि राजा पंडित से बहुत खुश हुआ और इच्छित वर माँगने को कहा |विष्णुकुमार ने तीन पग जमीन माँगी |

विष्णुकुमार ने विराट रूप धारण किया और एक पग सुमेरु पर्वत पर रखा और दूसरा मानुषोतर पर्वत पर रखा और बलि राजा से कहा - "बोल अब तीसरा पग कहा रखूँ ? तीसरा पग रखने की जगह दे नहीं तो तेरे सिर पर रखकर तुझे पाताल में उतार दूँगा" | चारो और खलबली मचगयी|

देवो और मनुष्यों ने विष्णुकुमार मुनि को विक्रिया समेटने के लिए कहा | चारो मंत्रियो ने भी क्षमा माँगी |

श्री विष्णुकुमार मुनि ने अहिंसा पूर्वक धर्मं का स्वरूप समझाया | इसप्रकार विष्णुकुमार ने 700 मुनियों की रक्षा की |हजारो श्रावक ने 700 मुनियों की वैयावृति की और बलि आदि मंत्री ने मुनिराजो से क्षमा माँगी |

जिसदिन यह घटना घटी , उसदिन श्रावण सुदी पूर्णिमा थी | विष्णुकुमार ने 700 मुनियों का उपसर्ग दूर हुआ और उनकी रक्षा हुई , अतः वह दिन रक्षा पर्व के नाम से प्रसिद्ध हुआ | आज भी यह दिन रक्षाबंधन पर्व के नाम से मनाया जाता है |

वास्तव में कर्मो से न बंधकर स्वरूप की रक्षा करना ही 'रक्षा-बंधन ' है |

जय जिनेन्द्र।

Jai Jinendra and a very Happy Raksha Bandhan to all of you :)
09/08/2014

Jai Jinendra and a very Happy Raksha Bandhan to all of you :)

एक कुंवे मे एक मेंढक रहता था। एक बार समुन्द्र का एक मेंढक कुंवे मे आ पहुंचा तो कुंवे के मेंढक ने उसका हालचाल, अता पता पू...
07/08/2014

एक कुंवे मे एक मेंढक रहता था। एक बार समुन्द्र का एक मेंढक कुंवे मे आ पहुंचा तो कुंवे के मेंढक ने उसका हालचाल, अता पता पूछा। जब उसे ज्ञांत हुआ कि वह मेंढक समुन्द्र मे रहता हैं और समुन्द्र बहुत बड़ा होता हैं तो उसने अपने कुंवे के पानी मे एक छोटा-सा चक्कर लगाकर उस समुन्द्र के मेंढक से पूछा कि क्या समुन्द्र इतना बड़ा होता हैं?
कुंवे के मेंढक ने तो कभी समुन्द्र देखा ही नहीं था। समुन्द्र के मेंढक ने उसे बताया कि इससे भी बड़ा होता हैं।
कुंवे का मेंढक चक्कर बड़ा करता गया और अंत मे उसने कुंवे की दीवार के सहारे-सहारे आखिरी चक्कर लगाकर पूछा- "क्या इतना बड़ा हैं तेरा समुन्द्र ?"
इस पर समुन्द्र के मेंढक ने कहा- "इससे भी बहुत बड़ा?"
अब तो कुंवे के मेंढक को गुस्सा आ गया। कुंवे के अलावा उसने बाहर की दुनिया तो देखी ही नहीं थी। उसने कह दिया- "जा तू झूठ बोलता हैं। कुंवे से बड़ा कुछ होता ही नहीं हैं। समुन्द्र भी कुछ नहीं होता।"

मेंढक वाली ये कथा यह ज्ञांत करती हैं कि जितना अध्धयन होगा उतना अपने अज्ञान का आभास होगा। आज जीवन मे पग-पग पर ह्मे ऐसे कुंवे के मेंढक मिल जायेंगे, जो केवल यही मानकर बैठे हैं कि जितना वे जानते हैं, उसी का नाम ज्ञान हैं, उसके इधर-उधर और बाहर कुछ भी ज्ञान नहीं हैं। लेकिन सत्य तो यह हैं कि सागर कि भांति ज्ञान की भी कोई सीमा नहीं हैं। अपने ज्ञानी होने के अज्ञानमय भ्रम को यदि तोड़ना हो तो अधिक से अधिक अध्धयन करना आवश्यक हैं जिससे आभास होगा कि अभी तो बहुत कुछ जानना और पढ़ना बाकी हैं

Jai Jinendra Dev Ki......!
05/08/2014

Jai Jinendra Dev Ki......!

Address

Nalanda
803111

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Jainism posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to Jainism:

Share