मेरे भोले बाबा jai bhole baba

मेरे भोले बाबा jai bhole baba Jai Bhole baba

🚩हे भगवान शिव, मेरे हाथों, पैरों, वाणी, शरीर या मन से किए गए सभी कर्मों को क्षमा करें—चाहे जानबूझकर किए हों या अनजाने मे...
18/03/2026

🚩हे भगवान शिव, मेरे हाथों, पैरों, वाणी, शरीर या मन से किए गए सभी कर्मों को क्षमा करें—चाहे जानबूझकर किए हों या अनजाने में हुए हों । हे दयालु शंभू, आपकी जय हो।” भगवान भोलेनाथ की कृपा से ही जीवन में शांति और शक्ति मिलती है।
हर हर महादेव 🔱 🚩

🚩रामायण काल का विचित्र मंदिर, जो विज्ञान के नियमो से परे है .... इस मंदिर में नंदी की मूर्ति का आकार इतना बढ़ गया, की खम...
03/02/2026

🚩रामायण काल का विचित्र मंदिर, जो विज्ञान के नियमो से परे है .... इस मंदिर में नंदी की मूर्ति का आकार इतना बढ़ गया, की खम्बो को हटाना पड़ा ।

🚩आंध्र_प्रदेश के कुरनूल में स्थित इस मंदिर का नाम है श्री_यंगती_उमा_महेश्वर_मंदिर। अपने आप में इस अनोखे मंदिर के बारे में कहा जा रहा है कि यहां नंदी के बढ़ते आकार की वजह से रास्‍ते में पड़ रहे कुछ खंबों को हटाना पड़ गया है। एक-एक करके यहां नंदी के आस-पास स्थित कई खंबों को हटाना पड़ा गया है।

🚩इसे 15वीं शताब्‍दी में विजयनगर साम्राज्‍य के संगम वंश के राजा हरिहर_बुक्का राय के द्वारा बनवाया गया है। यह मंदिर हैदराबाद से 308 किमी और विजयवाड़ा से 359 किमी दूर स्थित है। जो कि प्राचीन काल के पल्लव, चोला, चालुक्य और विजयनगर शासकों की परंपराओं को दर्शाता है।

🚩यहां के बारे में स्‍थानीय लोग एक कथा के बारे में बताते हैं कि तब अगस्‍त्‍य ऋषि तपस्‍या कर रहे थे, तो कौवे उनको आकर परेशान कर रहे थे। नाराज ऋषि ने शाप दिया कि वे अब यहां कभी नहीं आ सकेंगे। चूंकि कौए को शनिदेव का वाहन माना जाता है, इसलिए यहां शनिदेव का वास भी नहीं होता।

🚩यहां शिव-पार्वती अर्द्धनारीश्‍वर के रूप में विराजमान हैं और इस मूर्ति को अकेले एक पत्‍थर को तराशकर बनाया गया है।

🚩इस मंदिर की एक खास बात और भी है कि यहां पुष्‍कर्णिनी नामक पवित्र जलस्रोत से हमेशा पानी बहता रहता है। कोई नहीं जानता कि साल 12 महीने इस पुष्कर्णिनी में पानी आता कहां से है। भक्‍तों का मानना है कि मंदिर में प्रवेश से पहले इस पवित्र जल में स्‍नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं।

🚩जय हो सनातन धर्म और संस्कृति की

#हरहरमहादेव



#ॐनमःशिवाय

 #वृन्दावन की एक सत्य घटना - - सन्त चरित :जै जै श्री राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे🚩एक...
03/02/2026

#वृन्दावन की एक सत्य घटना - - सन्त चरित :जै जै श्री राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे

🚩एक बार वृन्दावन में एक संत हुए श्री देवाचार्य नागाजी महाराज(कोई कहता नागा बाबा) - निम्बार्क सम्प्रदाय में। उनकी बड़ी बड़ी जटाएं थी। वो वृन्दावन के सघन वन में जाके भजन करते थे।"हा राधे हा गोविंद" बोलके रोते थे ।

🚩एक दिन जा रहे थे तो रास्ते में उनकी बड़ी बड़ी जटाए झाड़िओ में उलझ गई। उन्होंने खूब प्रयत्न किया किन्तु सफल नहीं हो पाए और थक के वही बैठ गए और बैठे बैठे गुनगुनाने लगे -

"हे मुरलीधर छलिया मोहन

हम भी तुमको दिल दे बैठे,

गम पहले से ही कम तो ना थे,

एक और मुसीबत ले बैठे "

🚩बहुत से ब्रजवासी जन आये और बोले बाबा हम सुलझा देवे तेरी जटाए तो बाबा ने सबको डांट के भगा दिया और कहा की जिसके भजन करते है, वोही आएगा सुलझाने को - एक गहरा बिस्वास है मन मन्दिर में भगवान के प्रति, यही तो है भक्ति की असली शक्ति!!

🚩बहुत समय हो गया बाबा को बैठे बैठे... 1 दिन, 2 दिन, 3 दिन हो गये ...

"कब कृपा करोगी राधे,

कब दोगी दर्शन,

तुम बिन सूना सूना ,

मेरा यह जीवन" - बाबा गुनगुनाते रहे।

🚩तभी सामने से 15-16 वर्ष का सुन्दर किशोर हाथ में लकुटी लिए आता हुआ अकेला दिखा। जिसकी मतवाली चाल देखकर करोड़ो काम शर्मा जाएँ। मुखमंडल करोड़ो सूर्यो के जितना चमक रहा था। और चेहरे पे प्रेमिओ के हृदय को चीर देने वाली मुस्कान थी।

आते ही बाबा से बोले " बाबा हमहूँ सुलझा दें जटा"।

बाबा बोले आप कौन हैं श्रीमान जी?

तो ठाकुर जी बोले -"हम व्रज के ग्वाले है" ।

तो बाबा बोले हम तुझे नहीं जानते।

तो भगवान् फिर आये थोड़ी देर में और बोले -"बाबा अब सुलझा दें"।

तो बाबा बोले अब कौन है श्रीमान जी ।

तो ठाकुरजी बोले -"हम हैं वृन्दावन के छोरे"।

तो बाबा बोले हम तुझे नहीं जानते।

तो ठाकुर जी बोले तो बाबा किसको जानते हो बताओ?

तो बाबा बोले हम तो सिर्फ एक ही छोरे को जानता हूं, और वो है मेरे आराध्य कुंजबिहारी।

तो भगवान् ने तुरंत कुंजबिहारी का स्वरुप बना लिया - हाथों में बंशी,माथे पे मौर मुकुट,पीताम्बर धारण किये, बांकेबिहारी सी झलक।

और ठाकुरजी बोले -"ले बाबा अब जटा सुलझा दूँ"।

🚩तब बाबा बोले -" क्यूँ रे लाला हमहूँ पागल बनावे लग्यो! मेरे कुंजबिहारी तो बिना श्री राधा जू के एक पल भी ना रह पावे और एक तू है अकेलो आये मुझे ठगने के लिये"।

तभी पीछे से मधुर रसीली आवाज आई -" बाबा, हम यही हैं " - ये थी हमारी लाडली श्री राधाजी।

और श्री राधाजी बोली - "अब सुलझा देवे बाबा आपकी जटा"।

तो बाबा मन्द-मन्द मुस्कुराए और बोले

- " युगल दर्शन ही जब पा लिया अब तो ये जीवन ही सुलझ गया , जटा की क्या बात है,यह रहे या खुले, मेरा जीवन तो सफल हो गया" !!!

।। राधे राधे ।।

नोट : - यह स्थान अभी भी है,कदम्बखण्डी,भक्त सब दर्शन करते है ।

🚩कहाँ जाता है कि, ठाकुरजी खुद अपने हाथों से बाबा की जटा खोल दिया,और राधाजी अपने हाथों से बाबा को प्रसाद खिलाया,

🚩उस स्थान पे अब श्री राधाकृष्ण निकुंज बिहारी मंदिर है निम्बार्क सम्प्रदाय के,जो सबसे प्राचीन श्री राधाकृष्ण युगल भजन सम्प्रदाय है जिसका आचार्य है हंसः भगवान - यह ५००० साल से भी प्राचीन भजन परिवार है,अब ५११९ निम्बार्कअब्द चल रहा है।

🚩कडम्बखण्डी की उस मन्दिरमें इस दिव्य घटना को पत्थर पे खोदाई किया गया है,यह बरसाना से गाड़ी में आधा घन्टा दूर है।

प्रेम से बोलो .... "राधे राधे" ।।

🚩काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है अर्थात् ये कर...
11/01/2026

🚩काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है अर्थात् ये कर्म शिव के चरणों में विलीन हुए। यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।

🚩जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।

🚩हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं। अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे। अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।

🚩गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।
अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।
विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।

🚩आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी......

🚩100 शुभ कर्मों की गणना धर्म और नैतिकता के कर्म-
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन
20.नियमित ध्यान और योग सामाजिक और पारिवारिक कर्म
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना सेवा और दान के कर्म
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान, नैतिक और मानवीय कर्म
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना

विधि के अधीन 6 कर्म
95.हानि
96.लाभ
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपयश

#हरहरमहादेव



#ॐनमःशिवाय

🚩प्रेम की पुकार और सांवले सरकार: संत तुकाराम का महामिलन (एक अद्भुत सत्य कथा)!🚩वह गोधूलि बेला थी... जब दिन ढल रहा था और र...
02/01/2026

🚩प्रेम की पुकार और सांवले सरकार: संत तुकाराम का महामिलन (एक अद्भुत सत्य कथा)!

🚩वह गोधूलि बेला थी... जब दिन ढल रहा था और रात धीरे-धीरे अपने पैर पसार रही थी। पंढरपुर की पावन भूमि पर बहने वाली चंद्रभागा नदी का दृश्य अलौकिक था। डूबते सूर्य की अंतिम किरणें नदी के जल को पिघले हुए सोने (स्वर्ण) जैसा रूप दे रही थीं। नदी की लहरों पर तैरते हुए नन्हे-नन्हे दीप ऐसे लग रहे थे, मानो सितारे धरती पर उतरकर उस 'सांवले' की आरती उतार रहे हों।

🚩उसी रेतीले तट पर,दुनिया की भीड़-भाड़ से दूर,एक फकीर बैठा था—संत तुकाराम।शरीर पर साधारण वस्त्र ललाट पर चंदन, और हाथों में वही पुराना एकतारा... जो अब केवल वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि तुकाराम के हृदय की धड़कन बन चुका था।

🚩उनकी उंगलियाँ तारों पर थिरक रही थीं, और रोम-रोम से केवल एक ही ध्वनि निकल रही थी:

🎵 “विठ्ठल... विठ्ठल... पांडुरंगा...” 🎵

💧 विरह की वेदना:

🚩तुकाराम जी की आँखें बंद थीं, पर अंतर्मन जागृत था। उनका कंठ रुंध गया था। अचानक, उनकी बंद पलकों के कोर से एक मोटा-सा आँसू लुढ़का और तप्त रेत पर जा गिरा।

🚩यह आँसू किसी सांसारिक दुख का नहीं था। यह उस 'परम विरह' का था, जो भक्त को भगवान से मिलने के लिए जलाता है। उनके भीतर एक ही तड़प थी— "हे विठ्ठल! अब और कितनी प्रतीक्षा? क्या मेरी भक्ति में कोई कमी रह गई?"

✨ वह दिव्य पल: जब समय थम गया ✨

🚩तभी... प्रकृति ने संकेत दिया। अचानक हवाओं में एक भीनी-भीनी, मादक सुगंध फैल गई—तुलसी और कस्तूरी की गंध!

🚩चंद्रभागा की कल-कल करती लहरें एकदम शांत हो गईं, जैसे किसी के कदमों की आहट सुन रही हों। पक्षी भी चहचहाना भूल गए।सन्नाटा छा गया,पर यह सन्नाटा डरावना नहीं, बल्कि शांतिदायक था। और उसी पल, एक तेजोमय प्रकाश पुंज प्रकट हुआ!

🚩उस दिव्य रोशनी के बीच, ईंट पर खड़े... साक्षात भगवान पांडुरंग विठ्ठल मुस्कुरा रहे थे।

🔸 कमर पर हाथ (कर-कटी): मानो कह रहे हों, "संसार सागर केवल कमर तक गहरा है, डर मत।"

🔸 गले में वैजयंती माला: जो घुटनों तक झूल रही थी।

🔸 नेत्रों में असीम करुणा: ऐसी ममता, जैसे कोई माँ सदियों बाद अपने खोए हुए बच्चे को देख रही हो।

🗣️ भक्त और भगवान का संवाद:

🚩तुकाराम जी ने जैसे ही आँखें खोलीं, वे जड़ हो गए। वाणी मूक हो गई। केवल होठों की कंपन से शब्द फूटे—“हे पांडुरंग...! क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ? आज मेरे जन्म-जन्मांतर की थकान मिट गई प्रभु।

तब त्रिभुवन के स्वामी, विठ्ठल ने अपनी मधुर वाणी में कहा: -“तुका! उठ... देख मैं आ गया।

🚩तूने मुझे वेदों और शास्त्रों के शब्दों में नहीं, बल्कि अपने हृदय की धड़कनों में बाँधा है। जब-जब इस निष्ठुर संसार ने तुझे ठुकराया, तब-तब मैंने अपनी बाहें तेरे लिए फैलाई हैं। तेरे इस एक आँसू का मोल, मेरे लिए हज़ारों यज्ञों से बढ़कर है।"

🏵️ समाधि और वैकुंठ गमन: कहते हैं, उस क्षण जो हुआ, वह इतिहास बन गया।

🚩संत तुकाराम उस दर्शन को पाकर भाव-समाधि में लीन हो गए। चमत्कार यह हुआ कि उनके हाथों का एकतारा बिना बजाए ही बजने लगा—उससे 'विठ्ठल-विठ्ठल' की धुन गूंजने लगी। वहां रखे दीपों की लौ ऊँची हो गई। उपस्थित भक्त जो यह दृश्य देख रहे थे, उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली।

🚩यह भक्ति की वह पराकाष्ठा थी जहाँ शरीर और आत्मा का भेद मिट जाता है। कुछ समय पश्चात, एक गरुड़ रूपी विमान उतरा और संत तुकाराम सदेह (शरीर के साथ) वैकुंठ धाम को पधारे। आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई, और धरती 'जय हरि विठ्ठल' के नाद से गूंज उठी।

✨यह चित्र और यह कथा हमें एक ही संदेश देती है:

🔸 ईश्वर दूर नहीं है: वह मंदिर की मूर्तियों में नहीं, आपकी पुकार में बसता है।

🔸 भाव ही सब कुछ है: भगवान को आपकी धन-दौलत नहीं, केवल आपका प्रेम और समर्पण चाहिए।

🔸 नाम की शक्ति: जब सब साथ छोड़ दें, तो 'विठ्ठल' नाम का सहारा लो, वह स्वयं दौड़े चले आएंगे।

#बोलोपंढरीनाथभगवानकीजय



#ॐनमःशिवाय

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