मेरे भोले बाबा jai bhole baba

मेरे भोले बाबा jai bhole baba Jai Bhole baba

🚩रामायण काल का विचित्र मंदिर, जो विज्ञान के नियमो से परे है .... इस मंदिर में नंदी की मूर्ति का आकार इतना बढ़ गया, की खम...
03/02/2026

🚩रामायण काल का विचित्र मंदिर, जो विज्ञान के नियमो से परे है .... इस मंदिर में नंदी की मूर्ति का आकार इतना बढ़ गया, की खम्बो को हटाना पड़ा ।

🚩आंध्र_प्रदेश के कुरनूल में स्थित इस मंदिर का नाम है श्री_यंगती_उमा_महेश्वर_मंदिर। अपने आप में इस अनोखे मंदिर के बारे में कहा जा रहा है कि यहां नंदी के बढ़ते आकार की वजह से रास्‍ते में पड़ रहे कुछ खंबों को हटाना पड़ गया है। एक-एक करके यहां नंदी के आस-पास स्थित कई खंबों को हटाना पड़ा गया है।

🚩इसे 15वीं शताब्‍दी में विजयनगर साम्राज्‍य के संगम वंश के राजा हरिहर_बुक्का राय के द्वारा बनवाया गया है। यह मंदिर हैदराबाद से 308 किमी और विजयवाड़ा से 359 किमी दूर स्थित है। जो कि प्राचीन काल के पल्लव, चोला, चालुक्य और विजयनगर शासकों की परंपराओं को दर्शाता है।

🚩यहां के बारे में स्‍थानीय लोग एक कथा के बारे में बताते हैं कि तब अगस्‍त्‍य ऋषि तपस्‍या कर रहे थे, तो कौवे उनको आकर परेशान कर रहे थे। नाराज ऋषि ने शाप दिया कि वे अब यहां कभी नहीं आ सकेंगे। चूंकि कौए को शनिदेव का वाहन माना जाता है, इसलिए यहां शनिदेव का वास भी नहीं होता।

🚩यहां शिव-पार्वती अर्द्धनारीश्‍वर के रूप में विराजमान हैं और इस मूर्ति को अकेले एक पत्‍थर को तराशकर बनाया गया है।

🚩इस मंदिर की एक खास बात और भी है कि यहां पुष्‍कर्णिनी नामक पवित्र जलस्रोत से हमेशा पानी बहता रहता है। कोई नहीं जानता कि साल 12 महीने इस पुष्कर्णिनी में पानी आता कहां से है। भक्‍तों का मानना है कि मंदिर में प्रवेश से पहले इस पवित्र जल में स्‍नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं।

🚩जय हो सनातन धर्म और संस्कृति की

#हरहरमहादेव



#ॐनमःशिवाय

 #वृन्दावन की एक सत्य घटना - - सन्त चरित :जै जै श्री राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे🚩एक...
03/02/2026

#वृन्दावन की एक सत्य घटना - - सन्त चरित :जै जै श्री राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे

🚩एक बार वृन्दावन में एक संत हुए श्री देवाचार्य नागाजी महाराज(कोई कहता नागा बाबा) - निम्बार्क सम्प्रदाय में। उनकी बड़ी बड़ी जटाएं थी। वो वृन्दावन के सघन वन में जाके भजन करते थे।"हा राधे हा गोविंद" बोलके रोते थे ।

🚩एक दिन जा रहे थे तो रास्ते में उनकी बड़ी बड़ी जटाए झाड़िओ में उलझ गई। उन्होंने खूब प्रयत्न किया किन्तु सफल नहीं हो पाए और थक के वही बैठ गए और बैठे बैठे गुनगुनाने लगे -

"हे मुरलीधर छलिया मोहन

हम भी तुमको दिल दे बैठे,

गम पहले से ही कम तो ना थे,

एक और मुसीबत ले बैठे "

🚩बहुत से ब्रजवासी जन आये और बोले बाबा हम सुलझा देवे तेरी जटाए तो बाबा ने सबको डांट के भगा दिया और कहा की जिसके भजन करते है, वोही आएगा सुलझाने को - एक गहरा बिस्वास है मन मन्दिर में भगवान के प्रति, यही तो है भक्ति की असली शक्ति!!

🚩बहुत समय हो गया बाबा को बैठे बैठे... 1 दिन, 2 दिन, 3 दिन हो गये ...

"कब कृपा करोगी राधे,

कब दोगी दर्शन,

तुम बिन सूना सूना ,

मेरा यह जीवन" - बाबा गुनगुनाते रहे।

🚩तभी सामने से 15-16 वर्ष का सुन्दर किशोर हाथ में लकुटी लिए आता हुआ अकेला दिखा। जिसकी मतवाली चाल देखकर करोड़ो काम शर्मा जाएँ। मुखमंडल करोड़ो सूर्यो के जितना चमक रहा था। और चेहरे पे प्रेमिओ के हृदय को चीर देने वाली मुस्कान थी।

आते ही बाबा से बोले " बाबा हमहूँ सुलझा दें जटा"।

बाबा बोले आप कौन हैं श्रीमान जी?

तो ठाकुर जी बोले -"हम व्रज के ग्वाले है" ।

तो बाबा बोले हम तुझे नहीं जानते।

तो भगवान् फिर आये थोड़ी देर में और बोले -"बाबा अब सुलझा दें"।

तो बाबा बोले अब कौन है श्रीमान जी ।

तो ठाकुरजी बोले -"हम हैं वृन्दावन के छोरे"।

तो बाबा बोले हम तुझे नहीं जानते।

तो ठाकुर जी बोले तो बाबा किसको जानते हो बताओ?

तो बाबा बोले हम तो सिर्फ एक ही छोरे को जानता हूं, और वो है मेरे आराध्य कुंजबिहारी।

तो भगवान् ने तुरंत कुंजबिहारी का स्वरुप बना लिया - हाथों में बंशी,माथे पे मौर मुकुट,पीताम्बर धारण किये, बांकेबिहारी सी झलक।

और ठाकुरजी बोले -"ले बाबा अब जटा सुलझा दूँ"।

🚩तब बाबा बोले -" क्यूँ रे लाला हमहूँ पागल बनावे लग्यो! मेरे कुंजबिहारी तो बिना श्री राधा जू के एक पल भी ना रह पावे और एक तू है अकेलो आये मुझे ठगने के लिये"।

तभी पीछे से मधुर रसीली आवाज आई -" बाबा, हम यही हैं " - ये थी हमारी लाडली श्री राधाजी।

और श्री राधाजी बोली - "अब सुलझा देवे बाबा आपकी जटा"।

तो बाबा मन्द-मन्द मुस्कुराए और बोले

- " युगल दर्शन ही जब पा लिया अब तो ये जीवन ही सुलझ गया , जटा की क्या बात है,यह रहे या खुले, मेरा जीवन तो सफल हो गया" !!!

।। राधे राधे ।।

नोट : - यह स्थान अभी भी है,कदम्बखण्डी,भक्त सब दर्शन करते है ।

🚩कहाँ जाता है कि, ठाकुरजी खुद अपने हाथों से बाबा की जटा खोल दिया,और राधाजी अपने हाथों से बाबा को प्रसाद खिलाया,

🚩उस स्थान पे अब श्री राधाकृष्ण निकुंज बिहारी मंदिर है निम्बार्क सम्प्रदाय के,जो सबसे प्राचीन श्री राधाकृष्ण युगल भजन सम्प्रदाय है जिसका आचार्य है हंसः भगवान - यह ५००० साल से भी प्राचीन भजन परिवार है,अब ५११९ निम्बार्कअब्द चल रहा है।

🚩कडम्बखण्डी की उस मन्दिरमें इस दिव्य घटना को पत्थर पे खोदाई किया गया है,यह बरसाना से गाड़ी में आधा घन्टा दूर है।

प्रेम से बोलो .... "राधे राधे" ।।

🚩काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है अर्थात् ये कर...
11/01/2026

🚩काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है अर्थात् ये कर्म शिव के चरणों में विलीन हुए। यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।

🚩जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।

🚩हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं। अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे। अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।

🚩गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।
अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।
विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।

🚩आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी......

🚩100 शुभ कर्मों की गणना धर्म और नैतिकता के कर्म-
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन
20.नियमित ध्यान और योग सामाजिक और पारिवारिक कर्म
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना सेवा और दान के कर्म
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान, नैतिक और मानवीय कर्म
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना

विधि के अधीन 6 कर्म
95.हानि
96.लाभ
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपयश

#हरहरमहादेव



#ॐनमःशिवाय

🚩प्रेम की पुकार और सांवले सरकार: संत तुकाराम का महामिलन (एक अद्भुत सत्य कथा)!🚩वह गोधूलि बेला थी... जब दिन ढल रहा था और र...
02/01/2026

🚩प्रेम की पुकार और सांवले सरकार: संत तुकाराम का महामिलन (एक अद्भुत सत्य कथा)!

🚩वह गोधूलि बेला थी... जब दिन ढल रहा था और रात धीरे-धीरे अपने पैर पसार रही थी। पंढरपुर की पावन भूमि पर बहने वाली चंद्रभागा नदी का दृश्य अलौकिक था। डूबते सूर्य की अंतिम किरणें नदी के जल को पिघले हुए सोने (स्वर्ण) जैसा रूप दे रही थीं। नदी की लहरों पर तैरते हुए नन्हे-नन्हे दीप ऐसे लग रहे थे, मानो सितारे धरती पर उतरकर उस 'सांवले' की आरती उतार रहे हों।

🚩उसी रेतीले तट पर,दुनिया की भीड़-भाड़ से दूर,एक फकीर बैठा था—संत तुकाराम।शरीर पर साधारण वस्त्र ललाट पर चंदन, और हाथों में वही पुराना एकतारा... जो अब केवल वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि तुकाराम के हृदय की धड़कन बन चुका था।

🚩उनकी उंगलियाँ तारों पर थिरक रही थीं, और रोम-रोम से केवल एक ही ध्वनि निकल रही थी:

🎵 “विठ्ठल... विठ्ठल... पांडुरंगा...” 🎵

💧 विरह की वेदना:

🚩तुकाराम जी की आँखें बंद थीं, पर अंतर्मन जागृत था। उनका कंठ रुंध गया था। अचानक, उनकी बंद पलकों के कोर से एक मोटा-सा आँसू लुढ़का और तप्त रेत पर जा गिरा।

🚩यह आँसू किसी सांसारिक दुख का नहीं था। यह उस 'परम विरह' का था, जो भक्त को भगवान से मिलने के लिए जलाता है। उनके भीतर एक ही तड़प थी— "हे विठ्ठल! अब और कितनी प्रतीक्षा? क्या मेरी भक्ति में कोई कमी रह गई?"

✨ वह दिव्य पल: जब समय थम गया ✨

🚩तभी... प्रकृति ने संकेत दिया। अचानक हवाओं में एक भीनी-भीनी, मादक सुगंध फैल गई—तुलसी और कस्तूरी की गंध!

🚩चंद्रभागा की कल-कल करती लहरें एकदम शांत हो गईं, जैसे किसी के कदमों की आहट सुन रही हों। पक्षी भी चहचहाना भूल गए।सन्नाटा छा गया,पर यह सन्नाटा डरावना नहीं, बल्कि शांतिदायक था। और उसी पल, एक तेजोमय प्रकाश पुंज प्रकट हुआ!

🚩उस दिव्य रोशनी के बीच, ईंट पर खड़े... साक्षात भगवान पांडुरंग विठ्ठल मुस्कुरा रहे थे।

🔸 कमर पर हाथ (कर-कटी): मानो कह रहे हों, "संसार सागर केवल कमर तक गहरा है, डर मत।"

🔸 गले में वैजयंती माला: जो घुटनों तक झूल रही थी।

🔸 नेत्रों में असीम करुणा: ऐसी ममता, जैसे कोई माँ सदियों बाद अपने खोए हुए बच्चे को देख रही हो।

🗣️ भक्त और भगवान का संवाद:

🚩तुकाराम जी ने जैसे ही आँखें खोलीं, वे जड़ हो गए। वाणी मूक हो गई। केवल होठों की कंपन से शब्द फूटे—“हे पांडुरंग...! क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ? आज मेरे जन्म-जन्मांतर की थकान मिट गई प्रभु।

तब त्रिभुवन के स्वामी, विठ्ठल ने अपनी मधुर वाणी में कहा: -“तुका! उठ... देख मैं आ गया।

🚩तूने मुझे वेदों और शास्त्रों के शब्दों में नहीं, बल्कि अपने हृदय की धड़कनों में बाँधा है। जब-जब इस निष्ठुर संसार ने तुझे ठुकराया, तब-तब मैंने अपनी बाहें तेरे लिए फैलाई हैं। तेरे इस एक आँसू का मोल, मेरे लिए हज़ारों यज्ञों से बढ़कर है।"

🏵️ समाधि और वैकुंठ गमन: कहते हैं, उस क्षण जो हुआ, वह इतिहास बन गया।

🚩संत तुकाराम उस दर्शन को पाकर भाव-समाधि में लीन हो गए। चमत्कार यह हुआ कि उनके हाथों का एकतारा बिना बजाए ही बजने लगा—उससे 'विठ्ठल-विठ्ठल' की धुन गूंजने लगी। वहां रखे दीपों की लौ ऊँची हो गई। उपस्थित भक्त जो यह दृश्य देख रहे थे, उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली।

🚩यह भक्ति की वह पराकाष्ठा थी जहाँ शरीर और आत्मा का भेद मिट जाता है। कुछ समय पश्चात, एक गरुड़ रूपी विमान उतरा और संत तुकाराम सदेह (शरीर के साथ) वैकुंठ धाम को पधारे। आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई, और धरती 'जय हरि विठ्ठल' के नाद से गूंज उठी।

✨यह चित्र और यह कथा हमें एक ही संदेश देती है:

🔸 ईश्वर दूर नहीं है: वह मंदिर की मूर्तियों में नहीं, आपकी पुकार में बसता है।

🔸 भाव ही सब कुछ है: भगवान को आपकी धन-दौलत नहीं, केवल आपका प्रेम और समर्पण चाहिए।

🔸 नाम की शक्ति: जब सब साथ छोड़ दें, तो 'विठ्ठल' नाम का सहारा लो, वह स्वयं दौड़े चले आएंगे।

#बोलोपंढरीनाथभगवानकीजय



#ॐनमःशिवाय

((होनी बहुत बलवान है))🚩अभिमन्यु के पुत्र, राजा परीक्षित थे। राजा परीक्षित के बाद उनके लड़के जनमेजय राजा बने।🚩एक दिन जनमे...
28/12/2025

((होनी बहुत बलवान है))

🚩अभिमन्यु के पुत्र, राजा परीक्षित थे। राजा परीक्षित के बाद उनके लड़के जनमेजय राजा बने।

🚩एक दिन जनमेजय वेदव्यास जी के पास बैठे थे। बातों ही बातों में जन्मेजय ने कुछ नाराजगी से वेदव्यास जी से कहा.. कि,"जहां आप समर्थ थे भगवान श्रीकृष्ण थे, भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य कुलगुरू कृपाचार्य जी, धर्मराज युधिष्ठिर, जैसे महान लोग उपस्थित थे...फिर भी आप महाभारत के युद्ध को होने से नहीं रोक पाए और देखते-देखते अपार जन-धन की हानि हो गई। यदि मैं उस समय रहा होता तो, अपने पुरुषार्थ से इस विनाश को होने से बचा लेता"।

🚩अहंकार से भरे जन्मेजय के शब्द सुन कर भी, व्यास जी शांत रहे। उन्होंने कहा, पुत्र अपने पूर्वजों की क्षमता पर शंका न करो। यह विधि द्वारा निश्चित था,जो बदला नहीं जा सकता था, यदि ऐसा हो सकता तो श्रीकृष्ण में ही इतनी सामर्थ्य थी कि वे युद्ध को रोक सकते थे।

🚩जन्मेजय अपनी बात पर अड़ा रहा और बोला,"मैं इस सिद्धांत को नहीं मानता। आप तो भविष्यवक्ता है, मेरे जीवन की होने वाली किसी होनी को बताइए... मैं उसे रोककर प्रमाणित कर दूंगा कि विधि का विधान निश्चित नहीं होता"।

🚩व्यास जी ने कहा पुत्र यदि तू यही चाहता है तो सुन...। कुछ वर्ष बाद तू काले घोड़े पर बैठकर शिकार करने जाएगा दक्षिण दिशा में समुद्र तट पर पहुंचेगा...वहां तुम्हें एक सुंदर स्त्री मिलेगी.. जिसे तू महलों में लाएगा, और उससे विवाह करेगा। मैं तुम को मना करूँगा कि ये सब मत करना लेकिन फिर भी तुम यह सब करोगे। इस के बाद उस लड़की के कहने पर तू एक यज्ञ करेगा। मैं तुम को आज ही चेता रहा हूं कि उस यज्ञ को तुम वृद्ध ब्राह्मणो से कराना.. लेकिन, वह यज्ञ तुम युवा ब्राह्मणो से कराओगे.... और..

🚩जनमेजय ने हंसते हुए व्यासजी की बात काटते हुए कहा कि,"मै आज के बाद काले घोड़े पर ही नही बैठूंगा..तो ये सब घटनाऐ घटित ही नही होगी।

🚩व्यासजी ने कहा कि ये सब होगा..और अभी आगे की सुन... "उस यज्ञ मे एक ऐसी घटना घटित होगी....कि तुम उस रानी के कहने पर उन युवा ब्राह्मणों को प्राण दंड दोगे, जिससे तुझे ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा...और तुझे कुष्ठ रोग होगा.. और वही तेरी मृत्यु का कारण बनेगा। इस घटनाक्रम को रोक सको तो रोक लो"।

🚩वेदव्यास जी की बात सुनकर जन्मेजय ने एहतियात वश शिकार पर जाना ही छोड़ दिया। परंतु जब होनी का समय आया तो उसे शिकार पर जाने की बलवती इच्छा हुई। उस ने सोचा कि काला घोड़ा नहीं लूंगा.. पर उस दिन उसे अस्तबल में काला घोड़ा ही मिला। तब उस ने सोचा कि मैं दक्षिण दिशा में नहीं जाऊंगा परंतु घोड़ा अनियंत्रित होकर दक्षिण दिशा की ओर गया और समुद्र तट पर पहुंचा वहां पर उसने एक सुंदर स्त्री को देखा, और उस पर मोहित हुआ। जन्मेजय ने सोचा कि इसे लेकर महल मे तो जाउंगा.... लेकिन शादी नहीं करूंगा।

🚩परंतु, उसे महलों में लाने के बाद, उसके प्यार में पड़कर उस से विवाह भी कर लिया। फिर रानी के कहने से जन्मेजय द्वारा यज्ञ भी किया गया। उस यज्ञ में युवा ब्राह्मण ही रक्खे गए।

🚩किसी बात पर युवा ब्राह्मण... रानी पर हंसने लगे। रानी क्रोधित हो गई ,और रानी के कहने पर राजा जन्मेजय ने उन्हें प्राण दंड की सजा दे दी.. फलस्वरुप उसे कोढ हो गया।

🚩अब जन्मेजय घबरा गया और तुरंत व्यास जी के पास पहुंचा...और उनसे जीवन बचाने के लिए प्रार्थना करने लगा।

🚩वेदव्यास जी ने कहा कि "एक अंतिम अवसर तेरे प्राण बचाने का और देता हूं.... मैं तुझे महाभारत में हुई घटना का श्रवण कराऊंगा जिसे तुझे श्रद्धा एवं विश्वास के साथ सुनना है... इससे तेरा कोढ् मिटता जाएगा।

🚩परंतु यदि किसी भी प्रसंग पर तूने अविश्वास किया.. तो मैं महाभारत का प्रसंग रोक दूंगा.. और फिर मैं भी तेरा जीवन नहीं बचा पाऊंगा... याद रखना अब तेरे पास यह अंतिम अवसर है।

🚩अब तक जन्मेजय को व्यासजी की बातों पर पूरा विश्वास हो चुका था,इसलिए वह पूरी श्रद्धा और विश्वास से कथा श्रवण करने लगा।

🚩व्यासजी ने कथा आरम्भ करी और जब भीम के बल के वह प्रसंग सुनाए.... जिसमें भीम ने हाथियों को सूंडों से पकड़कर उन्हें अंतरिक्ष में उछाला... वे हाथी आज भी अंतरिक्ष में घूम रहे हैं.... तब जन्मेजय अपने आप को रोक नहीं पाया,और बोल उठा कि ये कैसे संभव हो सकता है। मैं नहीं मानता।

🚩व्यास जी ने महाभारत का प्रसंग रोक दिया....और कहा..कि,"पुत्र मैंने तुझे कितना समझाया...कि अविश्वास मत करना...परंतु तुम अपने स्वभाव को नियंत्रित नहीं कर पाए। क्योंकि यह होनी द्वारा निश्चित था।

🚩फिर व्यास जी ने अपनी मंत्र शक्ति से आवाहन किया..और वे हाथी पृथ्वी की आकर्षण शक्ति में आकर नीचे गिरने लगे.... तब व्यास जी ने कहा, यह मेरी बात का प्रमाण है।

🚩जितनी मात्रा में जन्मेजय ने श्रद्धा विश्वास से कथा श्रवण की, उतनी मात्रा में वह उस कुष्ठ रोग से मुक्त हुआ परंतु एक बिंदु रह गया और वही उसकी मृत्यु का कारण बना।

🚩सार :- कर्म हमारे हाथ मे है लेकिन उस का फल हमारे हाथों में नहीं है।

🚩गीता जी के 11 वें अध्याय के 33 वे श्लोक मैं श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "उठ खड़ा हो और अपने कार्य द्वारा यश प्राप्त कर। यह सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं तू तो केवल निमित्त बना है।

🚩होनी को टाला नहीं जा सकता लेकिन उत्तम कर्म व ईश्वर नाम जाप से होनी के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

#जयश्रीकृष्णजी



#ॐनमःशिवाय

🚩सुदामा के साथ बातें करते हुए कब श्रीकृष्ण उनके पाँव दबाने लगे ये सुदामा को पता ही नही चला। सुदामा सो चुके थे किंतु श्री...
25/12/2025

🚩सुदामा के साथ बातें करते हुए कब श्रीकृष्ण उनके पाँव दबाने लगे ये सुदामा को पता ही नही चला। सुदामा सो चुके थे किंतु श्रीकृष्ण अपनी ही सोच में मगन उनके पाँव दबाते हुए बचपन की बातें करते चले जा रहे थे, कि तभी रुक्मिणी ने उनके कंधे पर हाथ रखा।

🚩श्रीकृष्ण ने चौंक कर पहले रुक्मिणी को देखा और फिर सुदामा को, फिर रुक्मिणी का आशय समझ कर वहाँ से उठ कर अपने कक्ष में चले आये।

🚩श्रीकृष्ण की ऐसी मगन अवस्था देखकर रुक्मिणी ने पूछा, "स्वामी आज आपका व्यवहार बहुत ही विचित्र प्रतीत हो रहा है।

🚩आप, जो इस संसार के बड़े से बड़े सम्राट के द्वारका आने पर उनसे तनिक भी प्रभावित नही होते हैं, वो अपने मित्र के आगमन की सूचना पर इतने भावविव्हल हो गए कि भोजन छोड़कर नंगे पाँव उन्हे लेने के लिए भागते चले गए।

🚩आप, जिनको कोई भी दुख, कष्ट या चुनौती कभी रुला नही पाई, यहाँ तक कि जो गोकुल छोड़ते समय मैया यशोदा के अश्रु देखकर भी नही रोये,

🚩 वे अपने मित्र के जीर्ण शीर्ण, घावों से भरे पाँवों को देखकर इतने भावुक हो गए कि अपने अश्रुओं से ही उनके पाँवों को धो दिया।

🚩कूटनीति, राजनीति और ज्ञान के शिखर पुरुष आप, अपने मित्र को देखकर इतने मगन हो गए कि बिना कुछ भी विचार किये उन्हे समस्त त्रिलोक की संपदा एवं समृद्धि देने जा रहे थे।"

🚩श्रीकृष्ण ने अपनी उसी आमोदित अवस्था में कहा, "वह मेरे बालपन का मित्र है रुक्मिणी।"

🚩”परंतु उन्होंने तो बचपन में आपसे छुपाकर वो चने भी खाये थे जो गुरुमाता ने उन्हे आपसे बाँटकर खाने को कहे थे? अब ऐसे मित्र के लिए इतनी भावुकता क्यों?", सत्यभामा ने भी अपनी जिज्ञासा रखी।

🚩श्रीकृष्ण मुस्कुराये," सुदामा ने तो वह कार्य किया है सत्यभामा, कि समस्त सृष्टि को उसका आभार मानना चाहिए। वो चने उसने इसलिए नही खाये थे कि उसे भूख लगी थी बल्कि उसने इसलिए खाये थे क्योंकि वो नही चाहता था कि उसका मित्र कृष्ण दरिद्रता देखे।

🚩उसे ज्ञात था कि वे चने आश्रम में चोर छोड़कर गए थे, और उसे यह भी ज्ञात था कि उन चोरों ने वे चने एक ब्राह्मणी के गृह से चुराए थे। उसे यह भी ज्ञात था कि उस ब्राह्मणी ने यह श्राप दिया था कि जो भी उन चनों को खायेगा, वह जीवन पर्यंत दरिद्र ही रहेगा।

🚩सुदामा ने वे चने इसलिए मुझसे छुपा कर खाये ताकि मैं सुखी रहूँ। वो मुझे ईश्वर का अंश समझता था, तो उसने वे चने इसलिए खाये क्योंकि उसे लगा कि यदि ईश्वर ही दरिद्र हो जायेगा तो संपूर्ण सृष्टि ही दरिद्र हो जायेगी। सुदामा ने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए स्वयं का दरिद्र होना स्वीकार किया।"

🚩”इतना बड़ा त्याग!", रुक्मिणी के मुख से स्वतः ही निकला।

🚩”मेरा मित्र ब्राह्मण है रुक्मिणी, और ब्राह्मण ज्ञानी और त्यागी होते हैं। उनमें जनकल्याण की भावना कूट कूट कर भरी होती है। इक्का दुक्का अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो ब्राह्मण ऐसे ही होते हैं।

🚩अब तुम ही बताओ ऐसे मित्र के लिए ह्रदय में प्रेम नही तो फिर क्या उत्पन्न होगा प्रिये? गोकुल छोड़ते हुए मैं इसलिए नही रोया था क्योंकि यदि मैं रोता तो मेरी मैया तो प्राण ही छोड़ देती। परंतु मेरे मित्र के ऐसे पाँव देखकर, उनमें ऐसे घावों को देखकर मेरा ह्रदय भर आया रुक्मिणी। उसके पाँवों में ऐसे घाव और जीवन में उसकी ऐसी दशा मात्र इसलिए हुई क्योंकि वह अपने इस मित्र का भला चाहता था।

🚩पता है रुक्मिणी, परिवार को छोड़कर किसी और ने कभी इस कृष्ण का इतना भला नही चाहा। लोग तो मुझसे उनका भला करने की अपेक्षा रखते हैं। बस सुदामा जैसे मित्र ही होते हैं जो अपने मित्र के सुख के लिए स्वेच्छा से दरिद्रता एवं कष्ट का आवरण ओढ़ लेते हैं।

🚩ऐसे मित्र दुर्लभ होते हैं और न जाने किन पुण्यों के फलस्वरूप मिलते हैं। अब ऐसे मित्र को यदि त्रिलोक की समस्त संपदा भी दे दी जाए तो भी कम होगा।", श्रीकृष्ण अपने भावुकता से भर्राये हुए स्वर में बोले।

🚩इधर कक्ष में समस्त रानियों के नेत्र सजल थे और उधर कक्ष के बाहर खड़े सुदामा के नेत्रों से गंगा यमुना बह रही थीं।

#जयश्रीकृष्णजी



#ॐनमःशिवाय

((राधारानी की दिव्य कथा))🚩वृंदावन की पवित्र भूमि पर राधारानी का प्राकट्य एक अलौकिक घटना मानी जाती है। कहा जाता है कि बरस...
24/12/2025

((राधारानी की दिव्य कथा))

🚩वृंदावन की पवित्र भूमि पर राधारानी का प्राकट्य एक अलौकिक घटना मानी जाती है। कहा जाता है कि बरसाने के पास स्थित रावल गाँव में राजा वृषभानु और रानी कीर्तिदा ने जन्म के अनेक वर्षों बाद भी संतान का सुख नहीं पाया था। दोनों प्रतिदिन भगवान से प्रार्थना करते कि उन्हें एक ऐसी संतान मिले जो संसार में शुभता और प्रेम फैलाए।

🚩एक दिन राजा वृषभानु यमुना के तट पर स्नान करने गए। अचानक उनकी दृष्टि एक तेजस्वी प्रकाश पर पड़ी। जब वे उस स्थान के निकट पहुँचे, तो उन्होंने एक शिशु बालिका को प्रकट होते देखा। वह बालिका दिव्य तेज से चमक रही थी। जैसे ही राजा ने उसे गोद में उठाया, उनके हृदय में अपूर्व आनंद भर गया। वे समझ गए कि यह कोई साधारण बालिका नहीं है। उसे घर लाकर रानी कीर्तिदा को सौंपते ही पूरा महल मंगल ध्वनियों से गूंज उठा। वही बालिका आगे चलकर श्रीराधा के नाम से पूजित हुई।

🚩राधारानी जन्म से ही असाधारण थीं। बचपन में जब राधारानी ने अपने नयन नहीं खोले तब नंदबाबा और यशोदा जी छोटे श्रीकृष्ण को लेकर उनसे मिलने आए। जैसे ही श्रीकृष्ण उनके पास आए, राधारानी ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं। सभी समझ गए कि यह प्रेम का ऐसा बंधन है जो जन्मों से चला आ रहा है।

🚩बाल्यकाल से ही राधारानी और श्रीकृष्ण के बीच अनोखी मधुरता थी। दोनों गोपियों और गोपों के साथ यमुना तट पर खेलते, वन में कदम्ब के वृक्षों के नीचे झूला झूलते, और मुरली की धुन पर रास रचाते। वृंदावन की हर गली, हर कुंज, हर पवन में राधा-कृष्ण का प्रेम बसता गया। कहा जाता है कि अगर श्रीकृष्ण संगीत हैं तो राधारानी भाव और अगर श्रीकृष्ण सृष्टि हैं तो राधारानी शक्ति।

🚩एक बार कंस द्वारा भेजे गए एक दैत्य ने वृंदावन में भय फैलाया। श्रीकृष्ण ने उसे परास्त किया, लेकिन इस घटना से गोपियाँ बहुत विचलित हो गईं। तब राधारानी ने सबको आश्वस्त करते हुए कहा कि जब तक श्रीकृष्ण हमारे साथ हैं, तब तक कोई भी शक्ति हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। सभी के मन से भय दूर हो गया। राधारानी की करुणा और धैर्य का यह अद्भुत रूप था।

🚩समय बीतता गया। जब श्रीकृष्ण को मथुरा जाना पड़ा, तब राधारानी ने उन्हें रोका नहीं। उन्होंने कहा—
“तुम जहाँ भी रहो, मैं तुम्हारे प्रेम में ही स्वयं को पाऊँगी”
यही राधारानी का दिव्य प्रेम है—जिसमें वियोग भी मिलन से बढ़कर माना जाता है।

🚩वृंदावन आज भी राधारानी की पवित्र स्मृतियों से भरा हुआ है। बरसाने की लट्ठमार होली, नंदगांव की रासलीला, और वृंदावन की गलियाँ आज भी कहती हैं कि राधारानी केवल एक देवी नहीं, प्रेम का सर्वोच्च रूप हैं। उनका नाम लेने भर से मन में आनंद, शांति और भक्ति का अनुभव होता है।

🚩राधारानी वह शक्ति हैं जिन्होंने संसार को सिखाया कि सच्चा प्रेम त्याग, विश्वास और दिव्यता का प्रतीक होता है। इसीलिए कहा गया है— “राधारानी के बिना श्रीकृष्ण अधूरे हैं, और श्रीकृष्ण के बिना राधारानी ।”

#राधारानीकीजय



#ॐनमःशिवाय

🚩शबरी बोली, यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो हे राम! तुम यहाँ कहाँ से आते ?🚩राम गंभीर हुए और कहा कि "भ्रम में न पड़ो मात...
24/12/2025

🚩शबरी बोली, यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो हे राम! तुम यहाँ कहाँ से आते ?

🚩राम गंभीर हुए और कहा कि "भ्रम में न पड़ो माते! राम क्या केवल रावण का वध करने यहां आया है...? अरे रावण का वध तो मेरा अनुज लक्ष्मण भी कर सकता था।

🚩राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है तो केवल तुमसे मिलने आया है माते, ताकि हजारों वर्षों बाद जब कोई पाखण्डी भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे। तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था।
जब कोई कपटी भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं। यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।

🚩राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है।

🚩राम वन में इसलिए आया है, ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतिक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। सबरी एकटक राम को निहारती रहीं।

🚩राम ने फिर कहा:- कि राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए, आदर्श की स्थापना के लिए, धर्म की स्थापना के लिए।

🚩राम आया है ताकि विधर्मियों को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है l

🚩राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाए और खर-दूषणो का घमंड तोड़ा जाय।

🚩राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी बूढ़ी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं।

सबरी की आँखों में अश्रु भर आए,

उसने बात बदलकर कहा:- कन्द खाओगे पुत्र राम...।

🚩राम मुस्कुराए बोले, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं माँ..." संसार को मर्यादा का पाठ पढ़ाने वाले पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र जी की जय 🚩🚩

#श्रीरामचन्द्रकीजय



#ॐनमःशिवाय

🚩14 वर्ष के वनवास के बाद जब भगवान श्रीराम वापस अयोध्या आये, तो अगस्त्य ऋषि उनसे मिलने आये और लंकायुद्ध की चर्चा छिड़ गयी...
22/12/2025

🚩14 वर्ष के वनवास के बाद जब भगवान श्रीराम वापस अयोध्या आये, तो अगस्त्य ऋषि उनसे मिलने आये और लंकायुद्ध की चर्चा छिड़ गयी।

🚩भगवान श्रीराम ने उन्हें बताया कि कैसे उन्होंने रावण और कुंभकर्ण जैसे उग्र नायकों को मार डाला और लक्ष्मण ने इंद्रजीत और अतिकाय जैसे कई शक्तिशाली असुरों को भी मार डाला।

🚩तब अगस्त्य ऋषि ने कहा, 'बेशक रावण और कुंभकर्ण बहुत वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा असुर मेघनाद (इंद्रजीत) था। उसने स्वर्ग में देवराजइन्द्र से युद्ध किया और उन्हें बाँधकर लंका ले आया। जब ब्रह्मा ने मेघनाद से उसे छोड़ने के लिए कहा तो इंद्र को मुक्त कर दिया गया। लक्ष्मण ने सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को मार डाला, इसलिए वह सबसे महान योद्धा बन गये।

🚩अगस्त्य ऋषि से भाई की वीरता की प्रशंसा सुनकर भगवान श्रीराम बहुत प्रसन्न हुए, लेकिन उनके मन में यह जिज्ञासा उठ रही थी कि अगस्त्य ऋषि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से भी अधिक कठिन था।

🚩भगवान श्रीराम की जिज्ञासा को शांत करने के लिए, अगस्त्य ऋषि ने कहा, "इंद्रजीत को वरदान था कि उसे कोई ऐसा व्यक्ति ही मार सकता है जो 12 वर्षों तक सोया नहीं हो और 12 वर्षों तक कुछ भी नहीं खाया हो

🚩अगस्त्य ऋषि की बातें सुनकर भगवान श्रीराम ने कहा, 'मैं वनवास काल के दौरान 14 वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से के फल और फूल उन्हें दिया करता था।"मैं सीता के साथ एक कुटिया में रहता था,बगल की कुटिया में लक्ष्मण थे, फिर उन्होंने सीता का चेहरा भी नहीं देखा और 12 साल तक सोए नहीं, यह कैसे संभव है"!!

🚩लक्ष्मण को बुलाकर इस बारे में पूछा गया। फिर, उन्होंने उत्तर दिया, “जब हम पहाड़ पर गए, तो सुग्रीव ने हमसे उनके गहने दिखाकर उसे पहचानने के लिए कहा। मैंने उनके पैरों में नूपुर के अलावा कोई भी आभूषण नहीं पहचाना, क्योंकि मैंने कभी उनकी ओर देखा ही नहीं। जब आप और देवी सीता कुटिया में शयन करते थे तो मैं सारी रात बाहर पहरा देता था। जब नींद ने मेरी आँखों पर कब्ज़ा करने की कोशिश की तो मैंने अपने बाणों से मेरी आँखों को अवरुद्ध कर दिया था।” तब लक्ष्मण ने 12 वर्ष तक भूखे रहने के बारे में बताया, "मैं जो फल-फूल लाता था उसका 3 भाग आप करते थे। आप मुझे एक भाग देकर कहते थे- यह फल रख लो लक्ष्मण। आपने मुझसे कभी फल खाने को नहीं कहा।" - तो फिर आपकी इजाजत के बिना मैं इसे कैसे खा सकता था ?

🚩लक्ष्मण की ये बातें सुनकर भगवान श्रीराम ने उन्हें गले लगा लिया।'' यही कारण था कि इन कठोर प्रतिज्ञाओं के कारण ही वे मेघनाथ को मारने का साहसी कार्य कर सके और वीर योद्धा कहलाये।

#जयश्रीराम



#ॐनमःशिवाय

🚩शिव पुराण में एक कथा आती है, जब स्वयं माता सती भगवान् विष्णु की माया को देख भ्रमित हो गयीं तथा भगवान् महेश्वर की कही बा...
22/12/2025

🚩शिव पुराण में एक कथा आती है, जब स्वयं माता सती भगवान् विष्णु की माया को देख भ्रमित हो गयीं तथा भगवान् महेश्वर की कही बात पर भी अविश्वास कर स्वयं भगवान् विष्णु की माया-लीला में प्रवेश कर गयीं।
🚩एक समय की बात है, तीनों लोकों में विचरने वाले भगवान् रुद्र सती के साथ बैल पर आरूढ़ हो इस भूतल पर भ्रमण कर रहे थे।
🚩घूमते-घूमते वे दण्डकारण्य में आये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मण सहित भगवान् श्रीराम को देखा, जो रावण द्वारा छलपूर्वक हर कर ले गयी अपनी प्यारी पत्नी सीता की खोज कर रहे थे। वे 'हा सीते !' ऐसा उच्चस्वर से पुकारते, जहाँ-तहाँ देखते और बारंबार रोते थे। उनके मन में विरह का आवेश छा गया था।
🚩सूर्यवंश में उत्पन्न, दशरथनन्दन, भरताग्रज श्रीराम आनन्द रहित हो लक्ष्मण के साथ वन में भ्रमण कर रहे थे और उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। उस समय भगवान् शंकर ने बडी प्रसन्नता के साथ उन्हें प्रणाम किया, किन्तु भगवान् शंकर ने उस वन में श्रीराम के सामने अपने को प्रकट नहीं किया, और जय जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये।
🚩शिव की मोह में डालने वाली ऐसी लीला देख सती को बड़ा विस्मय हुआ। वे उनकी माया से मोहित हो उनसे इस प्रकार बोलीं, 'नाथ! ये दोनों पुरुष कौन हैं; इनकी आकृति विरहव्यथा से व्याकुल दिखायी दे रही है।
🚩इनमें जो ज्येष्ठ है, उसकी अंगकान्ति नीलकमल के समान श्याम है। उसे देखकर किस कारण से आप आनन्दविभोर हो उठे थे? आपका चित्त क्यों अत्यन्त प्रसन्न हो गया था ? आप इस समय भक्त के समान विनम्र क्यों हो गये थे ?
🚩सती की यह बात सुनकर भगवान् शंकर ने कहा, 'प्रिये ! ये दोनों भाई वीरों द्वारा सम्मानित हैं। इनके नाम हैं-श्रीराम और लक्ष्मण। इनका प्राकट्य सूर्यवंश में हुआ है। ये दोनों राजा दशरथ के विद्वान् पुत्र हैं। इनमें जो गोरे रंग के छोटे बन्धु हैं, वे साक्षात् शेष के अंश हैं। उनका नाम लक्ष्मण है। इनके बड़े भैया का नाम श्रीराम है। इनके रूप में भगवान् विष्णु ही अपने सम्पूर्ण अंश से प्रकट हुए हैं। ये साधुपुरुषों की रक्षा और लोगों के कल्याण के लिये इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं।'
🚩भगवान् शिव की बात सुनकर भी सती के मन को इस पर विश्वास नहीं हुआ। और हो भी कैसे ?, भगवान् विष्णु की माया बड़ी प्रबल है, वह सम्पूर्ण लोकों को मोह में डाल देने वाली है। सती के मन में संशय देख भगवान् शिव बोले, 'देवि! मेरी बात सुनो। यदि तुम्हारे मन में मेरे कथन पर विश्वास नहीं है तो तुम वहाँ जाकर अपनी ही बुद्धि से श्रीराम की परीक्षा कर लो। प्रिये! जिस प्रकार तुम्हारा मोह या भ्रम नष्ट हो जाय, वह करो। तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो। तब तक मैं इस बरगद के नीचे खड़ा हूँ।'
🚩भगवान् शिव की आज्ञा से सती वहाँ गयीं और मन-ही-मन यह सोचने लगीं कि 'मैं वनचारी राम की कैसे परीक्षा करूँ ? विचार आया, मैं सीता का रूप धारण करके राम के पास चलूँ। यदि राम साक्षात् विष्णु हैं, तब तो सब कुछ जान लेंगे; अन्यथा वे मुझे नहीं पहचानेंगे। ऐसा विचार सती सीता बनकर श्रीराम के समीप उनकी परीक्षा लेने के लिये गयीं।
🚩सती को सीता के रूप में सामने आयी देख शिव-शिव का जप करते हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम सब कुछ जान गये और हँसते हुए उन्हें नमस्कार करके बोले, 'सतीजी! आपको नमस्कार है। भगवान् शम्भु कहाँ गये हैं ? आप पति के बिना अकेली ही इस वन में क्योंकर आयीं? देवि! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये यह नूतन रूप धारण किया है? मुझ पर कृपा करके इसका कारण बताइये ?'
🚩श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं। वे शिवजी की कही हुई बात का स्मरण करके और उसे यथार्थ समझकर बहुत लज्जित हुईं। श्रीराम को साक्षात् विष्णु जान अपने रूप को प्रकट करके मन-ही-मन भगवान् शिव के चरणारविन्दों का चिन्तन कर प्रसन्नचित्त हुई सती उनसे इस तरह बोलीं- 'रघुनन्दन! स्वतन्त्र परमेश्वर भगवान् शिव मेरे तथा अपने पार्षदों के साथ पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए इस वन में आ गये थे। यहाँ उन्होंने सीता की खोज में लगे हुए लक्ष्मण सहित आपको देखा। उस समय सीता के लिये आपके मन में बड़ा क्लेश था और आप विरहशोक से पीड़ित दिखायी देते थे। उस अवस्था में आपको प्रणाम करके वे चले गये, और उस वटवृक्ष के नीचे अभी खड़े ही हैं। भगवान् शिव बड़े आनन्द के साथ आपके वैष्णवरूप की उत्कृष्ट महिमा का गान कर रहे थे। यद्यपि उन्होंने आपको चतुर्भुज विष्णु के रूप में नहीं देखा तो भी आपका दर्शन करते ही वे आनन्द विभोर हो गये। इस निर्मल रूप की ओर देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। मेरे पूछने पर भगवान् शम्भु ने जो आपका परिचय बताया उसे सुनकर मेरे मन में भ्रम उत्पन्न हो गया। अत: राघवेन्द्र ! मैंने उनकी आज्ञा लेकर आपकी परीक्षा की है। श्रीराम! अब मुझे ज्ञात हो गया कि आप साक्षात् विष्णु हो। अब मेरा संशय दूर हो गया फिर भी महामते ! आप भगवान् शिव के वन्दनीय कैसे हो गये ? मेरे मन में यह एक संदेह है। इसे निकाल दो और शीघ्र ही मुझे पूर्ण शान्ति प्रदान करो।'
🚩सती का यह वचन सुनकर श्रीराम के नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान खिल उठे। उन्होंने मन-ही-मन अपने प्रभु भगवान् शिव का स्मरण किया, किन्तुआज्ञा न होने के कारण वे सती के साथ भगवान् शिव के निकट नहीं गये।
🚩सती का प्रश्न सुनकर श्रीराम बोले, 'देवि! प्राचीन काल में एक समय भगवान् शम्भु ने अपने परात्पर धाम में विश्वकर्मा को बुलाकर उनके द्वारा अपनी गोशाला में एक रमणीय भवन बनवाया, जो बहुत ही विस्तृत था। उसमें एक श्रेष्ठ सिंहासन का भी निर्माण कराया। उस सिंहासन पर भगवान् शंकर ने विश्वकर्मा द्वारा एक छत्र बनवाया, जो बहुत ही दिव्य, सदा के लिये अद्भुत और परम उत्तम था। तत्पश्चात् उन्होंने सब ओर से इन्द्र आदि देवगणों, सिद्धों, गन्धर्वो, नागादिकों तथा सम्पूर्ण उपदेवों को भी शीघ्र वहाँ बुलवाया। समस्त वेदों और आगमों को, पुत्रों सहित ब्रह्माजी को, मुनियों को तथा अप्सराओं सहित समस्त देवियों को, जो नाना प्रकार की वस्तुओं से सम्पन्न थीं, आमन्त्रित किया। इनके सिवा देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और नागों की सोलह-सोलह कन्याओं को भी बुलवाया, जिनके हाथों में मांगलिक वस्तुएँ थीं। वीणा, मृदंग आदि नाना प्रकार के वाद्यों को बजवाकर सुन्दर गीतों द्वारा महान् उत्सव रचाया। सम्पूर्ण ओषधियों के साथ राज्याभिषेक के योग्य द्रव्य एकत्र किये गये प्रत्यक्ष तीर्थों के जलों से भरे हुए पाँच कलश भी मँगवाये गये। इनके सिवा और भी बहुत-सी दिव्य सामग्रियों को भगवान् शंकर ने अपने पार्षदों द्वारा मँगवाया और वहाँ उच्चस्वर से वेदमन्त्रों का घोष करवाया।
🚩देवि! भगवान् विष्णु की पूर्ण भक्ति से महेश्वरदेव सदा प्रसन्न रहते थे इसलिये उन्होंने प्रीतियुक्त हृदय से श्रीहरि को वैकुण्ठ से बुलवाया और शुभ मुहूर्त में श्रीहरि को उस श्रेष्ठ सिंहासन पर बिठाकर महादेवजी ने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उन्हें सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित किया। उनके मस्तक पर मनोहर मुकुट बाँधा गया और उनसे मंगल-कौतुक कराये गये। यह सब हो जाने के बाद महेश्वर ने स्वयं ब्रह्माण्ड मण्डप में श्रीहरि का अभिषेक किया और उन्हें अपना वह सारा ऐश्वर्य प्रदान किया, जो दूसरों के पास नहीं था।
🚩तदनन्तर शम्भु ने श्रीहरि का स्तवन किया और बोले, 'आज से विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये। तुम सम्पूर्ण देवता श्रीहरि को प्रणाम करो और ये वेद मेरी ही तरह इन श्रीहरि का वर्णन करें। रुद्रदेव ने उपर्युक्त बात कहकर स्वयं ही श्रीगरुडध्वज को प्रणाम किया। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों और सिद्ध आदि ने भी उस समय श्रीहरि की वन्दना की। इसके बाद देवताओं के समक्ष महेश्वर ने श्रीहरि को इस तरह बड़े-बड़े वर प्रदान किये, 'हरे! तुम मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण लोकों के कर्ता, पालक और संहारक होओ। धर्म, अर्थ और काम के दाता तथा दुर्नीति अथवा अन्याय करने वाले दुष्टों को दण्ड देने वाले होओ; महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न, जगत्पूज्य जगदीश्वर बने रहो। समरांगण में तुम कहीं भी जीते नहीं जा सकोगे। मुझसे भी तुम कभी पराजित नहीं होओगे। तुम मुझसे मेरी दी हुई तीन प्रकार की शक्तियाँ ग्रहण करो। एक तो इच्छा आदि की सिद्धि दूसरी नाना प्रकार की लीलाओं को प्रकट करने की शक्ति और तीसरी तीनों लोकों में नित्य स्वतन्त्रता। हरे! जो तुमसे द्वेष करने वाले हैं, वे निश्चय ही मेरे द्वारा प्रयत्न पर्वक दण्डनीय होंगे। विष्णो ! मैं तुम्हारे भक्तों को उत्तम मोक्ष प्रदान करूँगा।
🚩तुम इस माया को भी ग्रहण करो जिसका निवारण करना देवता आदि के लिये भी कठिन है तथा जिससे मोहित होने पर यह विश्व जडरूप हो जायगा। हरे! तुम मेरी बायीं भुजा हो और विधाता दाहिनी भुजा हैं। तुम इन विधाता के भी उत्पादक और पालक होओगे। तुम यहाँ रहकर विशेष रूप से सम्पूर्ण जगत् का पालन करो। नाना प्रकार की लीलाएँ करने वाले विभिन्न अवतारों द्वारा सदा सबकी रक्षा करते रहो। मेरे चिन्मय धाम में तुम्हारा जो यह परम वैभवशाली और अत्यन्त उज्ज्वल स्थान है, वह गोलोक नाम से विख्यात होगा। हरे! भूतल पर जो तुम्हारे अवतार होंगे, वे सबके रक्षक और मेरे भक्त होंगे। मैं उनका अवश्य दर्शन करूँगा। वे मेरे वर से सदा प्रसन्न रहेंगे।
🚩इस प्रकार श्रीहरि को अपना अखण्ड ऐश्वर्य सौंपकर भगवान् शिव स्वयं कैलास पर्वत पर रहते हुए अपने पार्षदों के साथ स्वच्छन्द क्रीडा करते हैं। तभी से भगवान् लक्ष्मीपति वहाँ गोपवेष धारण करके आये और गोप-गोपी तथा गौओं के अधिपति होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ रहने लगे। वे श्रीविष्णु प्रसन्नचित्त हो समस्त जगत् की रक्षा करने लगे। वे शिव की आज्ञा से नाना प्रकार के अवतार ग्रहण करके जगत् का पालन करते हैं।
🚩इस समय वे ही श्रीहरि भगवान् शंकर की आज्ञा से चार भाइयों के रूप में अवतीर्ण हैं। उन चार भाइयों में सबसे बड़ा मैं राम हूँ, दूसरे भरत हैं, तीसरे लक्ष्मण हैं और चौथे भाई शत्रुघ्न हैं। देवि ! मैं पिता की आज्ञा से सीता और लक्ष्मण के साथ वन में आया था। यहाँ किसी निशाचर ने मेरी पत्नी सीता को हर लिया है और मैं विरही होकर भाई के साथ इस वन में अपनी प्रिया का अन्वेषण करता हूँ। जब आपका दर्शन प्राप्त हो गया, तब सर्वथा मेरा कुशल-मंगल ही होगा। माँ सती ! आपकी कृपा से ऐसा होने में कोई संदेह नहीं है। देवि ! निश्चय ही आपकी ओर से मुझे सीता की प्राप्ति विषयक वर प्राप्त होगा। आपके अनुग्रह से उस दुःख देने वाले पापी राक्षस को मारकर मैं सीता को अवश्य प्राप्त करूँगा। आज मेरा महान् सौभाग्य है जो आप दोनों ने मुझ पर कृपा की। जिस पर आप दोनों दयालु हो जायें, वह पुरुष धन्य और श्रेष्ठ है।
🚩इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर कल्याणमयी सती देवी को प्रणाम करके रघुकुलशिरोमणि श्रीराम उनकी आज्ञा से उस वन में विचरने लगे। पवित्र हृदय वाले श्रीराम की यह बात सुनकर सती मन-ही-मन शिवभक्ति परायण रघुनाथजी की प्रशंसा करती हुई बहुत प्रसन्न हुईं। पर अपने कर्म को याद करके उनके मन में बड़ा शोक हुआ। उनकी अंगकान्ति फीकी पड़ गयी। वे उदास होकर शिवजी के पास लौटीं।

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