Sanatan Dhan

Sanatan Dhan The purpose of this organization is to restore the original ideas and basic elements of Sanatan Dharma by protecting them.

06/07/2024

#पप्पू ने सिर्फ हिंदुओं को हिंसक बोला है,
यादव, पंडित, बनिया, ठाकुर, राजपूत, शाक्य, चमार, धोबी,धानुक आदि आदि इनको कुछ नहीं बोला है

30/06/2024

तुम खुलेआम कायरों की मौत ना मारे जाओ इसलिए वो तुम्हें "अग्निवीर" बनाना चाहता है |
मगर तुम्हें तो विरोध करना है !!

07/06/2024

संस्कृति की रक्षा के लिए लड़ते हुए अनेक पीढ़ियां खप जाती हैं, तब जाकर सदियों बाद ऐसा योद्धा, ऐसा महामानव सेनापति के रूप में मिलता है किसी संस्कृति को..
और हमारे आप जैसे अभागे इस योद्धा को जख्म देकर खुश हो रहे हैं कि सबक सिखा दिया.... धिक्कार है ऐसी सोच रखने वाले सनातनियों को...😥

24/05/2024

65 साल जिसके परिवार वालो ने गरीबो का खाता नही खुलवा पाया उसके वंशज आज गरीबो के खाते में खटा ख़ट पैसे देने का वादा कर रहा है।
🤔🤣😎

06/12/2023

"मेरा" और "मैं" जब तक रहेगा..
समस्याएँ जन्म लेती रहेगी ||

26/06/2023

पुनः सनातन उदित होगा, हार कर मत बैठ जाना... एक हिंदू को मैं जगाऊं...एक हिंदू को तुम जगाना..!!
🙏जय श्री राम 🙏

05/04/2023

अपने पिता को यदुवंशियों के विनाश की सूचना देकर कृष्ण वन में अपने भाई बलराम के पास वापस लौट आये थे। यदुकुल की स्त्रियों की रक्षा का भार उन्होंने अपने सारथी बाहुक के माध्यम से अर्जुन पर छोड़ दिया था। अब इस धरा पर वे बस अपने भाई के साथ कुछ क्षण व्यतीत करना चाहते थे।
बलराम एक वृक्ष के नीचे निश्चेष्ट बैठे हुए थे। प्राणवान अथवा प्राणहीन, यह देखने भर से पता नहीं चल रहा था। कृष्ण उनकी समाधि को भंग नहीं करना चाहते थे, अतः वहीं निकट ही बैठ गए। कुछ ही क्षण बीते होंगे कि उन्हें बलराम के सिर के पीछे से एक विशाल नाग निकलता हुआ दिखा, जो देखते ही देखते तनिक दूर पर स्थित समुद्र में समा गया। समुद्र तट पर वासुकी, कर्कोटक, शँख, अतिषण्ड इत्यादि नाग एवं स्वयं वरुण देव उसके स्वागत और अगवानी हेतु खड़े थे।
बलराम का शरीर लुढ़क गया। बड़े भाई को मृत जान श्रीकृष्ण तनिक दूर जाकर लेट गए। क्या वे जीवन से थक गए थे? या उन्हें भी संसार छोड़ने की इच्छा हो आई थी। लेटे-लेटे ही उन्हें अपना पूरा भूतकाल स्मरण हो आया। मैया यशोदा की डांट, यमुना का वो तट, राधा के साथ रास, कंस का वध, द्वारिका की स्थापना, रुक्मिणी का प्रेम, संयन्तक मणि, पुत्र प्रद्युम्न, बुआ कुंती, मित्र द्रौपदी, अर्जुन और उसके भाई, महाभारत का युद्ध और अंततः यादवों का विनाश। अभी उनकी विचारधारा बह ही रही थी कि उन्हें अपने एक तलवे में पीड़ा का आभास हुआ। नेत्र खोलकर देखा तो एक बाण धँसा हुआ था।
एक व्याध दौड़ता हुआ आया और कृष्ण के पैरों पर गिरकर रोने लगा। उसने उन गुलाबी चरणों को अपनी गोद में रख लिया और बारम्बार क्षमा मांगने लगा। कृष्ण बोले, "क्यों रोते हो मित्र? तुमसे क्या अपराध हुआ है?"
"क्षमा करो राजन! मृगों को मारने निकला था। तुम्हारे चरणों की झलक दिखी। उन्हें मृग समझ तीर छोड़ दिया। क्षमा करो। मैं अभी इस बाण को निकालकर औषधि लगा देता हूँ।"
"रुको व्याध। पहले अपना नाम तो बताओ!"
"मेरा नाम जरा है राजन!"
"तो मित्र जरा! शांत हो जाओ। तुमसे कोई पाप नहीं हुआ है। और मैं कोई राजा नहीं, देवकी और वसुदेव का पुत्र कृष्ण हूँ।"
कृष्ण का परिचय सुन वह व्याध और अधिक दुख में डूब गया। जिसके जीवित रहते ही संसार ईश्वर मानने लगा हो, उसी के साथ यह अपराध कर दिया उसने! व्याध हिचकियाँ लेते हुए बोला, "यदि आप वे ही कृष्ण हैं, जो मैं समझ पा रहा हूँ तो आप तो साक्षात ईश्वर हैं। आपको तो मुझ जैसे नगण्य व्यक्ति के बाण से घायल होना ही नहीं चाहिए था। और अब हो भी गए तो बिना औषधि के भी आपका घाव ठीक हो जाएगा। है न?"
"ऐसा क्यों कहते हो मित्र? क्या कृष्ण मानव नहीं है? उसे भी घाव लग सकते हैं। महाभारत युद्ध में कितनी ही बार मुझे महारथियों, रथियों, यहाँ तक कि सामान्य पदाति सैनिकों तक से अनगिनत घाव मिले हैं। यह अवश्य है कि वे सभी घाव शीघ्र ही ठीक हो गए। परन्तु तुम्हारा दिया घाव विशिष्ट है मित्र।"
"ऐसा क्या विशिष्ट है मेरे दिए घाव में?"
"यह मेरी मृत्यु का कारण जो बनेगा।"
"हे राम!", लगा कि व्याध के सिर पर पहाड़ गिर पड़ा हो, वह व्याकुल होकर बोला, "ऐसा क्यों कहते हैं कृष्ण? भला मेरे बाण में ऐसी सामर्थ्य कि वह स्वयं ईश्वर के अवतार का अंत कर दे?"
"तुम्हारा बाण महादेव का प्रसाद है मित्र।" व्याध के नेत्रों में जीवंत प्रश्न देख माधव बोलते गए, "बहुत पहले एक बार द्वारिका में एक साधु आया था। वो जोर-जोर से बोल रहा था कि उसका स्वभाव बड़ा क्रोधी है। वो शाप देने में देरी नहीं करता। उसकी इच्छा द्वारिका में कुछ दिन रहने की है। यदि द्वारिका का कोई नागरिक उसके क्रोध को सहन कर सके तो ही उसे आमंत्रित करे।
"उस अत्यंत लंबे और पतले साधु के बारे में समस्त संसार जानता है। दुर्वासा थे वे। जब किसी ने भी उन्हें अपने घर नहीं बुलाया तो मैं आगे बढ़ा और उन्हें अपने घर लिवा लाया। अद्भुत थे वे। कभी खाना खाते तो खाते ही चले जाते। दस लोगों का भोजन कम पड़ जाता। कभी एक ग्रास खाकर उठ जाते। कभी अचानक ही सोने चले जाते तो कभी अचानक ही उठ जाते। इसलिए उनके लिए सदैव ही भोजन, शयन की उत्तम व्यवस्था रखनी पड़ती। एक बार तो शैया सहित सब कुछ जलाकर चल पड़े, और थोड़ी ही देर में सोने चले आये। उन्होंने अपनी ओर से बहुत प्रयास किया कि उनकी सेवा में उन्हें कोई कमी दिख जाए। परन्तु मैंने और मेरे परिवारजनों ने ऐसा कोई अवसर ही नहीं दिया।
"एक बार उन्होंने बहुत सारी खीर बनवाई। मैं और रुक्मिणी उन्हें खीर परोसने के लिए खड़े थे। उन्होंने उस स्वादिष्ट खीर में अपनी एक उंगली डुबोई और बस उतना सा ही खाकर बोले कि इस खीर को अपने पूरे शरीर पर मल लूं। मैंने निःसंकोच उनकी आज्ञा का पालन किया। उन्होंने रुक्मिणी की ओर देखा। उनकी इच्छा समझ मैंने रुक्मिणी को भी खीर लगा दिया। तत्पश्चात वे बाहर आये और एक रथ के घोड़ों को हटाकर उसमें रुक्मिणी को ही जोत दिया। जैसे अश्वों पर कशाघात होते हैं, वैसे ही रुक्मिणी को भी कशाघात सहने पड़े। द्वारिका की वीथियों पर उस रथ पर बैठे वे साधु रुक्मिणी की पीठ पर प्रहार करते हुए चले जा रहे थे। अंततः वे उतरे और पैदल ही एक दिशा में चलने लगे। हम उनके पीछे भागे।
"वे एक स्थान पर रुके और रुक्मिणी से बोले कि उनकी परीक्षा पूर्ण हुई। घावों को त्वरित रूप से ठीक करने के लिए औषधि देते हुए उसे अनन्त आशीर्वाद दिया और मुझसे बोले, 'मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। संसार ने तुम्हारी उदण्डता को कई बार देखा है। अपनी माता और ग्रामवासियों को सताने से लेकर पापी राक्षसों, असुरों और अन्यायी राजाओं का वध करते आये हो। तुमने सदैव अपने मन की ही की है। आज संसार ने तुम्हारा विनय भी देख लिया। मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। आगे एक महायुद्ध होने वाला है। मुझे ज्ञात है कि उस युद्ध में तुम्हें असंख्य बार असंख्य घाव लगेंगे, और तुम उनका प्रतिकार भी नहीं करोगे। अतः, शरीर के जिस भी अंग पर तुमने खीर का लेपन किया है, वह घावों को सहन कर लेगा। वे अतिशीघ्र भर जाएंगे। परन्तु कृष्ण, तुमने अपने तलवों पर खीर नहीं मला। चलो, यह भी ठीक ही हुआ। तुम्हें भी एक बहाना मिल जाएगा।"
व्याध, जो अपने हाथ से माधव के तलुओं से निकलते रक्त को रोकने का प्रयास करते हुए उनकी बात सुन रहा था, बोला, "बहाना कैसा कृष्ण? और तुमने कहा था कि मेरा बाण महादेव का प्रसाद है। सो कैसे?"
"मृत्यु तो निश्चित है न मित्र। मृत्यु के लिए कोई न कोई तो बहाना चाहिए ही। मेरा जीवन पूर्ण हुआ। जिस उद्देश्य के लिए मेरा जन्म हुआ था, वह पूर्ण हुआ। वे साधु, वे महात्मा दुर्वासा महारुद्र के ही अंश हैं। उन्होंने ही मेरे पूरे शरीर को निरोगी होने का आशीर्वाद दिया था और एक स्थान छोड़ दिया कि मेरी मृत्यु को मार्ग मिल सके।"
"तो क्या आप सच में मर जाएंगे? फिर संसार का क्या होगा?"
"संसार तो मेरे होने से पहले भी था मित्र, और मेरे जाने के बाद भी होगा। धर्म की स्थापना हो चुकी है। मेरा उद्देश्य पूर्ण हो चुका है। जीवन नश्वर है। पर धर्म और अधर्म का युद्ध शाश्वत है। पूर्वकाल में भी जब-जब धर्म की हानि हुई, कोई न कोई आया था। भविष्य में भी जब-जब पुनः अधर्म प्रबल होगा, कोई न कोई किसी अन्य रूप में आएगा ही।
"अब तुम जाओ मित्र। बहुत बोल लिया मैंने। जीवन भर बोलता ही तो रहा हूँ। अब बस शांति चाहता हूँ। जाओ, अपने मन पर कोई बोझ न रखो। जाओ। तुम्हारा कल्याण हो।"
---------
COPY

08/02/2023

अपने को पिछड़ा कहकर जिन लोगों ने सैकड़ों वर्षो तक राज किया हो उनके बारे में स्वयं जाने..🙏🏻
किसी के बरगलावे में न आयें स्वस्थ और सशक्त भारत के निर्माण में एकजुट हो समानता लायें..
हम कल भी साथ थे आज भी हैं
और आगे भी रहेंगे..
300 वर्ष तक भारत के बड़े भू-भाग पर राज करने वाले होल्कर की जाति से आने वाले धनगर और सिंधिया के कुनबे वाले आज पिछड़े हैं..
वहीं उन महाराजा विक्रमादित्य हेमराज तेली के वंशज आज पिछड़े हैं जिन्होंने अखंड भारत पर राज किया..!
वह मौर्य साम्राज्य आज पिछड़ा/दलित है, जिनके वंशजों ने पीढ़ियों तक बंगाल की खाड़ी से लेकर पर्शिया की सीमा तक अखंड भारतवर्ष पर राज किया..
महापद्मनंद और धनानंद का वंशज नाई समुदाय आज पिछड़ा है। जो भारत के सबसे शक्तिशाली राजे होते थे..!
हिंदुओं के सबसे पवित्र ग्रंथ रामायण के रचियता और श्री राम की अर्धांगिनी माता सीता को अपने आश्रम में शरण देने वाले, श्री राम के पुत्रों लव कुश का पालन पोषण और उनको शिक्षित करने वाले महर्षि वाल्मीकि के वंशज आज अछूत कैसे हो गए या हो सकते हैं..!
महर्षि वेद व्यास की माता व मछुआरा समुदाय से आने वाली रानी सत्यवती के वंशज भी आज पिछड़े हैं। जिनके बच्चे हस्तिनापुर पर राज करने वाले कौरव और पांडव अखंड भारत के सबसे महान योद्धा और चक्रवर्ती सम्राट थे..
उस आदिवासी कन्या शकुंतला का समुदाय भी आज अनुसूचित जनजाति में काउंट होता है जिनके पुत्र "भरत" के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा..
महर्षि वेद व्यास, महर्षि वाल्मीकि, आचार्य विदुर, सम्राट चंद्रगुप्त, सम्राट अशोक जैसे और भी अनेका अनेक उदाहरण हैं..
जिनके वंशज/स्वजातीय लोग आज स्वयं को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग का बताकर अपने साथ शोषण, दमन और अत्याचार हुआ बताते हैं..!
अब सवाल ये उठता है कि
क्या इतने लंबे समय तक राज करने वाले इन वर्गों के राजाओं ने अपनी ही जात, बिरादरी वालों पर स्वयं ही अत्याचार किया/होने दिया या उन को पढ़ने/बढ़ने नही दिया !! उन्हें हजारो वर्षों से अनपढ़, गंवार व शोषित बनाये रखा..!
भगवान कृष्ण के वंशज होने का दावा करने वाले, आज भी बड़ी बड़ी जमीन जायदाद वाले, हर तरह से संपन्न यदुवंशी अंततः पिछड़े कैसे हो गए..!
मध्य काल में बहराइच से नेपाल तक बड़े भूभाग पर राज करने वाले पासी आखिर दलित कैसे हो गए..!
मध्यकाल में प्रसिद्ध पाल वंशी राजाओं के वंशज कैसे पिछड़े हो गए..!
इतिहास में चंवर वंशी राजाओं का जिक्र है जो आज दलित कहे जाते हैं।
गौर, गुर्जर, मीणा, जाट, वर्मा, गोंड आदि वर्ग के राजा सब बड़े लम्बे समय तक शासक रहे हैं। देश के इतिहास में इनकी छाप है। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि मुगल आक्रांताओं के शासन काल व उसके बाद अंग्रेजी शासन काल की गुलामी के बाद ये सारे वर्ग विभाजित होकर वंचित, शोषित और पीड़ित कहलाने लगे.. क्या किसी ने यह विचार किया कि कहीं विदेशी आक्रांताओं ने ही हिंदू सनातन समाज में फूट डालने के लिए ये अंकुरण तो नहीं किया..?
परतंत्रता से निकलने के बाद भी विभाजन की दोधारी तलवार से समस्त हिंदु समाज को काटने की रणनीति के चलते ही 1947 के बाद इस विभाजन को और गहरा ही किया गया..!
अन्यथा यह कैसे संभव है कि तुम लंबे समय तक राज भी करो और विदेशी नेक्सस के फैलाए जाल में फंसकर विक्टिज़्म भी बन जाओ..
और राजा बनने के बाद भी क्या आपके स्वजातीय राजा अपनी जात/बिरादरी के साथ ऐसा ही करते रहे कि वो अनपढ़/गंवार/मूर्ख/पिछड़ा/दबा/कुचला ही बना रहे..!
सैकड़ों वर्षो तक अखंड भारत पर राज करने के बाद भी तुम अपनी जाति का उद्धार नहीं कर सके तो इसमें दोष दूसरो को क्यों देते हो..!
एक बार स्वयं की ओर झांक कर भी देखो..!
जय श्री राम🚩🚩

03/11/2022

*गायत्री मंत्र कब ज़रूरी है.
सुबह उठते वक़्त 8 बार,
अष्ट कर्मों को जीतने के लिए l
भोजन के समय 1 बार
अमृत समान भोजन प्राप्त होने के लिए l
बाहर जाते समय 3 बार
समृद्धि सफलता और सिद्धि के लिए l
मन्दिर में 12 बार
प्रभु के गुणों को याद करने के लिए l छींक आए तब गायत्री मंत्र उच्चारण 1 बार
अमंगल दूर करने के लिए l
सोते समय 7 बार
सात प्रकार के भय दूर करने के लिए l
कृपया सभी बन्धुओं को प्रेषित करें...
*"ॐ"*

02/10/2022

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः"
मतलब कि जब सभी लड़कियों को देवी मानकर पूजेंगे तो फिर ब्याह भी देवी से ही कर लेंगे और देवी को ही लवर बना लेंगे..??
ऐसा कहकर मेरा मित्र ठहाका लगाकर हँसने लगा...!!
उसके साथ ही मैं भी हँसने लगा..!
हमदोंनो के हँसी में अंतर सिर्फ ये था कि वो इस श्लोक पर हँस रहा था और मैं उसकी बुद्धि पर...!
हँसी के बाद मैंने उससे कहा कि... जानते हो ?
असल में इसी दुविधा के समाधान हेतु अज्ञानियों को धर्मग्रंथ पढ़ने से मना किया गया था..
ताकि, वे अर्थ का अनर्थ न कर दें..!
असल में होता ये है कि... तुम्हारी ही तरह एक बुद्धिमान लड़का था.
उसको स्कूल में मास्टर जी ने महत्वपूर्ण बताते हुए गणित का एक प्रश्न बताया कि...
मान लो , तुम्हारे पास 6 आम हैं और उसमें से आधे अर्थात 3 आम तुमने अपने एक दोस्त को दे दिए तो तुम्हारे पास कितने आम बचे ???
इस प्रश्न के हल के लिए तुम 6 आम में से उसके आधे अर्थात 3 आम को घटा देना जिससे उसका उत्तर निकल आएगा..!
तो, उत्तर हुआ : 6-3 = 3 आदमी.
उस विद्यार्थी ने ये प्रश्न और उसका उत्तर रट लिया.
और, अपने सभी मित्रों को भी खूब अच्छे से समझा समझा कर बताने लगा कि अगर ये प्रश्न आ जाये तो उसका उत्तर ये होगा.
फिर, परीक्षा हुई और उस परीक्षा में सभी लड़के पास हो गए सिवाए उस पहले लड़के के.
उसका रिजल्ट देखकर मास्टर साहब को बहुत आश्चर्य हुआ कि इसका सिखाया सभी लड़के पास कर गए लेकिन ये खुद कैसे फेल कर गया ??
जब लड़के को बुलाकर पूछा तो उसने बताया कि... आपने ने 6 आम वाले प्रश्न में बताया था कि 3 घटा देना है.
लेकिन, परीक्षा में तो 6 आम वाला प्रश्न आया ही नहीं था बल्कि 10 आम वाला प्रश्न आया था.
इसीलिए, मैंने वो प्रश्न छोड़ दिया क्योंकि मुझे वो नहीं मालूम था.
यही हाल तुमलोगों का है.
तुमने जो श्लोक कहा है वो असल में मनुस्मृति का श्लोक है..
और, उसका पूरा श्लोक है....
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।
(मनुस्मृति 3/56 )
इसका मतलब होता है...
जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं..
और, जहाँ स्त्रियों की पूजा नहीं होती है, वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं.
इसका तात्पर्य ये नहीं है कि... स्त्री को बैठा के धूप, दीप , अक्षत और प्रसाद आदि चढ़ा के पूजा करने लगो.
बल्कि, इसका तात्पर्य ये है कि... जहाँ स्त्रियों और उनकी भावना का सम्मान होता है वो घर स्वर्ग सरीखा बन जाता है अर्थात वहाँ देवताओं का वास होता है.
लेकिन, अगर तुम स्त्रियों की भावना का सम्मान नहीं करोगे तो तुम्हारा कमाया सारा धन और इज्जत मटियामेट हो जाएगा.
अब इसकी प्रासंगिकता को समझने को समझने के लिए पहले बेसिक को समझो..
बेसिक ये है कि.... स्त्रियाँ खुद के लिए नहीं जीती हैं बल्कि वे खुद से ज्यादा अपने परिवार यथा अपने पति और बच्चों के लिए चिंतित रहती हैं.
अगर तुम चाहो तो इसमें अपनी प्रेयसी भी जोड़ लो.
वो हमेशा अपने से जुड़े लोगों के प्रति चिंतित रहती हैं और उनके भलाई के लिए वे कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहती है.
तुम ... जितिया से लेकर करवाचौथ अथवा नवरात्र या छठ पर्व कोई भी कठिन से कठिन पर्व उठा कर देख लो...
सभी पर्व त्योहार स्त्रियाँ ही करती है लेकिन कोई भी पर्व स्त्रियों के खुद के लिए नहीं है.
बल्कि, सारे पर्व परिवार के लिए ही होते हैं जिन्हें वो खुशी से करती हैं.
लेकिन, यदि मान लो कि.... इसके बाद भी उनकी भावना का सम्मान नहीं होता है..
तो, फिर उसका विश्वास डगमगाने लगता है..
और, वे अपने परिवार की भलाई हेतु इससे भी इतर कुछ खोजने लगती है.
जिस कारण... वे ढोंगी बाबा, गंडे-ताबीज, टोटका आदि के चक्कर में पड़ जाती है.
इसीलिए.... तुमने गौर किया होगा कि अधिकांश बाबाओं के पुरुष से ज्यादा स्त्रियाँ जाती है और उनकी भक्त बनती है.
और, परिणामस्वरूप... घर का पैसा भी जाता है, इज्जत भी जाती है और कभी कभी जान भी चली जाती है.
इसीलिए, हमारे धर्मग्रंथों में नारी को पूजने अर्थात उनके भावना की सम्मान की बात कही गई...
कि.... अगर स्त्री अपने पति के शराब पीने के कारण दुखी है, नहीं कमाने के कारण दुखी है, उसके खराब व्यवहार के कारण दुखी है... या फिर, किसी और कारण से दुखी है...
तो, फिर उस स्थिति में .... उनकी मनोस्थिति को समझते हुए... समुचित कदम उठाने चाहिए...
जिससे, वे ऐसे चक्करों में न पड़ें.. और, घर में खुशहाली बनी रहे.
इसी खुशहाली बने रहने को शास्त्रों में "तत्र देवताः" कहा गया है.
शायद मेरी बात... मेरे मित्र को भी समझ आ गई और इसके बाद वो सहमति में मुंडी हिलाकर चला गया.
तो... इस संबंध में मेरा सिर्फ ये कहना है कि हमारे धर्मग्रंथों में लिखी बात गलत नहीं है बल्कि वो हर कालखंड में प्रासंगिक है..
क्योंकि , वो एक सिद्धांत (फार्मूला) है.
और , सिद्धांत कभी गलत नहीं हुआ करते हैं.
जरूरत है तो सिर्फ उस सिद्धांत (फॉर्मूले) को वर्तमान के समय और परिस्थिति पर अप्लाई करने की.
जैसे कि... 6 आम में आधे अर्थात 3 आम दोस्त को दे दिए तो 3 बचेंगे.
और, 10 आम में से उसके आधे आम अर्थात 5 दे देंगे तो 5 बचेंगे.
इसमें सिद्धांत (फार्मूला) 6 या 10 नहीं है...
बल्कि, सिद्धांत (फार्मूला) है कि...
हमें उपरोक्त संख्या का आधा दे देना है.
जय महाकाल...!!!
नोट : उपरोक्त कहानी मेरे एक उच्च कुलीन मित्र से बातचीत पर आधारित है..
इसीलिए, इस कहानी में कोई जातिवादी एंगल नहीं है बल्कि सिर्फ और सिर्फ धर्मग्रंथों की व्याख्या का एंगल है.
Kumar Satish

"जय श्री राम"  V/S  " जय सिया-राम" चूँकि श्री राम ने शारदीय नवरात्र की उपासना आरंभ की थी इसलिए दुर्गा पूजा के विसर्जन मे...
28/09/2022

"जय श्री राम" V/S " जय सिया-राम"

चूँकि श्री राम ने शारदीय नवरात्र की उपासना आरंभ की थी इसलिए दुर्गा पूजा के विसर्जन में इसी कारण “जय श्री राम” का उद्घोष भी सुनाई दे जाता है। इस उद्घोष का उद्भव कैसे हुआ ये पता नहीं होने के कारण धूप में बाल पकाकर आ गए कुछ काले कौवे दुर्गा पूजा में “जय श्री राम” का उद्घोष सुनकर अकारण ही दुखी होने लगते हैं। “जय श्री राम” से उनके कुछ दूसरे धूर्त कुटुम्बियों की शिकायत ये होती है कि हम तो “सीता-राम” कहने वाले हैं जी! स्त्री के सम्मान में हम तो सीता का नाम लेंगे जी!

ये भी एक धूर्तता से अधिक कुछ नहीं। सोचकर देखिये कि आप आम तौर पर बोलते कैसे हैं? क्या शंकर, शिव, इंद्र, वरुण इत्यादि के नाम को श्री लगाकर बोलने की आदत है? क्यों भई? देवताओं के नाम में श्री क्यों नहीं लगा रहे? भगवान विष्णु की बात करते समय तो बड़े आराम से “श्री हरी” कह देते हैं! ऐसा आप इसलिए करते हैं क्योंकि देवी लक्ष्मी का एक नाम श्री होता है। भगवान विष्णु की पत्नी का नाम आप उनके आगे लगा रहे होते हैं, शिव-ब्रह्मा आदि के आगे नहीं लगाते। हिन्दू विवाह में स्त्री को देवी लक्ष्मी और पुरुष को विष्णु स्वरुप माना जाता है। इसलिए विवाहित लोगों का नाम सम्मान के साथ लिया जाये तो आगे “श्री” जोड़ा जाता है।

अब जो लोग "जय श्री राम" के बारे में भ्रम फैला रहे है उन्हें जबाव दो उन्हें
लगता है। वो जो भ्रम फैला रहे है उसे रोकना हर सनातनी का परम कर्त्तव्य
है।

#जयश्रीराम #जयसियाराम #सनातन

29/08/2022

जरूर पढ़ें--

सोनाली बेंद्रे - कैंसर
अजय देवगन - लिट्राल अपिकोंडिलितिस
(कंधे की गंभीर बीमारी)
इरफान खान - कैंसर
मनीषा कोइराला - कैंसर
युवराज सिंह - कैंसर
सैफ अली खान - हृदय घात
रितिक रोशन - ब्रेन क्लोट
अनुराग बासु - खून का कैंसर
मुमताज - ब्रेस्ट कैंसर
शाहरुख खान - 8 सर्जरी
(घुटना, कोहनी, कंधा आदि)
ताहिरा कश्यप (आयुष्मान खुराना की पत्नी) - कैंसर
राकेश रोशन - गले का कैंसर
लीसा राय - कैंसर
राजेश खन्ना - कैंसर,
विनोद खन्ना - कैंसर
नरगिस - कैंसर
फिरोज खान - कैंसर
टोम अल्टर - कैंसर...

ये वो लोग हैं या थे-
जिनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है/थी!
खाना हमेशा डाइटीशियन की सलाह से खाते है।
दूध भी ऐसी गाय या भैंस का पीते हैं
जो AC में रहती है और बिसलेरी का पानी पीती है।
जिम भी जाते है।
रेगुलर शरीर के सारे टेस्ट करवाते है।
सबके पास अपने हाई क्वालिफाइड डॉक्टर है।
अब सवाल उठता है कि आखिर
अपने शरीर की इतनी देखभाल के बावजूद भी इन्हें इतनी गंभीर बीमारी अचानक कैसे हो गई।

क्योंकि ये प्राक्रतिक चीजों का इस्तेमाल
बहुत कम करते है।
या मान लो बिल्कुल भी नहीं करते।
जैसा हमें प्रकृति ने दिया है ,
उसे उसी रूप में ग्रहण करो वो कभी नुकसान नहीं देगा।
कितनी भी फ्रूटी पी लो ,
वो शरीर को आम के गुण नहीं दे सकती।
अगर हम इस धरती को प्रदूषित ना करते
तो धरती से निकला पानी बोतल बन्द पानी से
लाख गुण अच्छा था।

आप एक बच्चे को जन्म से ऐसे स्थान पर रखिए
जहां एक भी कीटाणु ना हो।
बड़ा होने से बाद उसे सामान्य जगह पर रहने के लिए छोड़ दो,
वो बच्चा एक सामान्य सा बुखार भी नहीं झेल पाएगा!
क्योंकि उसके शरीर का तंत्रिका तंत्र कीटाणुओ से लड़ने के लिए विकसित ही नही हो पाया।
कंपनियों ने लोगो को इतना डरा रखा है,
मानो एक दिन साबुन से नहीं नहाओगे तो तुम्हे कीटाणु घेर लेंगे और शाम तक पक्का मर जाओगे।
समझ नहीं आता हम कहां जी रहे है।
एक दूसरे से हाथ मिलाने के बाद लोग
सेनिटाइजर लगाते हुए देखते हैं हम।

इंसान सोच रहा है- पैसों के दम पर हम जिंदगी जियेंगे।
आपने कभी गौर किया है--
पिज़्ज़ा बर्गर वाले शहर के लोगों की
एक बुखार में धरती घूमने लगती है।
और वहीं दूध दही छाछ के शौकीन
गांव के बुजुर्ग लोगों का वही बुखार बिना दवाई के ठीक हो जाता है।
क्योंकि उनकी डॉक्टर प्रकृति है।
क्योंकि वे पहले से ही सादा खाना खाते आए है।
प्राकृतिक चीजों को अपनाओ!
विज्ञान के द्वारा लैब में तैयार
हर एक वस्तु शरीर के लिए नुकसानदायक है!

पैसे से कभी भी स्वास्थ्य और खुशियां नहीं मिलती।।

आइए फ़िर से चलें -
प्रकृति की ओर....

Address

Delhi

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Sanatan Dhan posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share