आमाँथान मंदिर कुण्डल,नैनीताल चंपावत की आस्था का एक दिव्य केंद्र है, जहाँ पहुँचते ही मन को अद्भुत शांति का अनुभव होता है। धनखोला पर्वत और नन्धौर नदी के किनारे स्थित यह पवित्र स्थान प्रकृति और भक्ति का सुंदर संगम है,आपकी हर मनोकामनाए पूर्ण हो। खेम सिह बिष्ट https://www.youtube.com/
आमाँथान मंदिर पेज में अपने आप जुड़ें सभी दोस्तों को भी जोड़ें आपकी अति कृपा होगी सिर्फ सनातन धर्म की जै
आमाचार्य - श्री खेम बिष्ट Khem Bisht 7579002300
नैनीताल में आमाँथान सबसे प्राचीन मंदिर है जिसे शक्तिधाम, आमाँ, वरदायनी, देवीस्थली, माँ अम्बे,भी कहा जाता है सभी आमा नाम से पुकारते हैं मगर कुण्डल गाँव की महिलायें सासुथान कहती हैं उत्तराखंड के नैनीताल जिले में हल्द्वानी से हैडाखान रोड से आमाँथान मात्र 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है कुछ मान्यताओं के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण ग्यारहवीं सदी के बीच कराया था. यहाँ पर अन्य देवी देवताओं- ईष्ट देवता मंदिर, ऐडी थान मंदिर, गोलू देवता मंदिर, देवीथान मंदिर, भूमिया मंदिर स्थापित हैं.
आमाँथान मंदिर, तहसील खनस्यू से मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर कुण्डल गाँव में स्थित है धनखोला पर्वत से जलधारा का उदगम होता है जो नन्धौर नदी से मितली है संगम पर आमाँ विराजमान हैं यहाँ तक पहुँचने के लिए आपको छोटे-छोटे गाँवों हैडाखान, खंनस्यू, पतलोट, डालकनिया, कुण्डल(नन्धौर घाटी) आदि से होकर गुज़रना पड़ता है.सड़क वन-वे और संकरी है और ज़्यादा ट्रैफिक न होने की वजह से ठीक हालत में है. इस छोटी सी यात्रा का सबसे रोचक पहलू है सड़क का एकदम चढ़ाई पर होना जैसा कि अमूमन लद्दाख की सड़कों में महसूस किया जाता है. यहॉं आने से पहले आपके वाहन को चढ़ाई पर आसानी से चलने का डोप टेस्ट पास करना होगा अन्यथा दिक्कत पेश आ सकती है.
नन्धौर घाटी और सड़क में घाटी की ओर से आपकी तरफ आती सफेद बादलों की चादर देख ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रकृति आपको खुद में समेट लेना चाहती है. हर मोड़ पार करने के साथ ही मन करता है कि गाड़ी एक किनारे लगाऊँ और प्रकृति के सारे रंगो को अपनी ऑंखों व कैमरे में कैद कर लूँ. सावन के मौसम में प्रकृति अपने सैकड़ों रंग घाटी में बिखेर देती है. चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आती है. कई बार आप घाटी में इतना ऊपर पहुँच जाते हैं कि बादल आपको घाटी में तैरते नजर आते हैं.
घाटी में बने नीले रंग के घरों को देख ऐसा प्रतीत होता है जैसे नीले आसमान का एक टुकड़ा घाटी में गिर गया हो. सीढ़ीनुमा खेतों में लहलहाती खेती एक ऊर्ध्वाधर घास के मैदान सी नजर आती है. इसी बीच अगर बूँदाबाँदी होने लगे तो ऐसा लगता है जैसे दूर कहीं घाटी में बारिश पहाड़ों का जलाभिषेक कर रही है. चारों ओर एक मनमोहक छटा बिखर जाती है जिसे शब्दों में बयॉं कर पाना आसान नहीं है.
कहने को तो सिलपाटा उत्तराखंड के पर्यटन स्थलों में कोई अहम जगह नहीं रखता लेकिन नैनीताल तक जाने वाले पर्यटकों को समय निकालकर यहॉं जरूर जाना चाहिये. बेशक आप आमाँथान में ही रूकें लेकिन 2-3 घंटे में आप प्रकृति के इस अद्भुत नजारे को अपनी सुंदर यादों का हिस्सा बना सकते हैं. मेरे हिसाब से सावन का मौसम प्रकृति के इस नायाब तोहफे को अपना बनाने का सबसे अच्छा मौसम है