Mata Hinglaj Bhavani Shiv-Shakti Peeth Bharat

Mata Hinglaj Bhavani Shiv-Shakti Peeth Bharat माता हिंगलाज भवानी शिव-शक्ति पीठ (भारत

माता के सभी भक्तों को नवरात्रि की शुभकामनाएं...
24/10/2020

माता के सभी भक्तों को नवरात्रि की शुभकामनाएं...

23/10/2020

ॐ हिंगुलाय नमः 🚩

🔴 जय हो माता हिंगलाज भवानी 🚩पाकिस्तान में इस समय माता हिंगलाज भवानी जमकर तांडव कर रही हैं। नवरात्रों में माता की शक्ति अ...
22/10/2020

🔴 जय हो माता हिंगलाज भवानी 🚩

पाकिस्तान में इस समय माता हिंगलाज भवानी जमकर तांडव कर रही हैं। नवरात्रों में माता की शक्ति अनंत गुना बढ़ चुकी है...🙏🚩

जब सब कुछ सही प्रकार से चलता रहा तो जल्दी ही सुखद परिणाम प्राप्त होने की संभावना है। फ़िलहाल, अगले 72 घंटे बेहद अहम !

ॐ🙏🚩

धर्मो रक्षति रक्षितः 🙏🚩🚩🚩

21/10/2020

ॐ🚩

जल्दी ही हिंगलाज शक्ति पीठ मुक्त होगी!

🔴 राम-मन्दिर की नींव में डाली गयी PoK स्थित शारदा पीठ की मिट्टी...!🔥 अयोध्या में लंबे इंतजार के बाद बुधवार को राम मंदिर ...
06/08/2020

🔴 राम-मन्दिर की नींव में डाली गयी PoK स्थित शारदा पीठ की मिट्टी...!

🔥 अयोध्या में लंबे इंतजार के बाद बुधवार को राम मंदिर की आधारशिला रख दी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस दौरान मुख्य अतिथि के तौर पर कार्यक्रम में शामिल हुए और भूमिपूजन का कार्य पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न किया। भूमि पूजन में देशभर से कई प्रतिष्ठित लोग शामिल हुए और इस पल के गवाह बने। इसके अलावा राम मंदिर के लिए रखी गई नींव में देश के अलग-अलग हिस्सों से लाई गई मिट्टी और नदियों के जल भी डाले गए। इसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले पीओके में स्थित शारदा पीठ की मिट्टी भी शामिल थी।

🔥 पीओके स्थित हिंदुओं के पवित्र तीर्थ स्थल शारदा पीठ की मिट्टी भी मंदिर की नींव में डाली गई। हालांकि पीओके की मिट्टी को लाना इतना आसान नहीं था और उसके लिए एक व्यक्ति ने बड़ा खतरा मोल लिया। पीओके में किसी भारतीय को जाने की इजाजत नहीं है, ऐसे में चीन में रहने वाले कर्नाटक के वेंकटेश रमन को उनकी पत्नी के साथ पीओके भेजा गया।

🔥 दंपत्ति को चीन के पासपोर्ट के साथ हांगकांग के रास्ते पीओके की राजधानी मुजफ्फराबाद भेजा गया। यहां से पति-पत्नी शारदा पीठ तीर्थ स्थल पर पहुंचे और फिर वहां की मिट्टी लेकर हांगकांग के रास्ते दिल्ली आ गए। यहां उन्होंने शारदा पीठ से जुड़े अंजना शर्मा नाम के एक व्यक्ति को मिट्टी सौंप दी। शर्मा फिर मिट्टी लेकर अयोध्या पहुंचे और आधारशिला में शामिल करने के लिए दे दिया।अयोध्या पहुंचने पर उनका जोरदार स्वागत किया गया।

🔥 इसके साथ ही शर्मा अपने साथ कर्नाटक के अंजना पर्वत, जिसे राम भक्त हनुमान का जन्म स्थान माना जाता है, वहां से भी पवित्र जल लाए।

🔥 बता दें कि शारदा पीठ करीब 5,000 साल पुराना मंदिर है जिसे सम्राट अशोक के शासनकाल में पुनर्स्थापित किया गया था। यह मंदिर कश्मीरी हिन्दुओं के तीन प्रसिद्ध पवित्र स्थलों में से एक है। हालांकि यह मंदिर अभी पीओके में है और यहां भारतीयों को जाने की इजाजत नहीं है।

-माता हिंगलाज भवानी शिव-शक्ति पीठ (भारत)

समस्त सनातनी परिवार को श्रीरामजन्मभूमि शिलान्यास की हार्दिक शुभकामनायें 💐💐💐-माता हिंगलाज भवानी शिव-शक्ति पीठ (भारत)
06/08/2020

समस्त सनातनी परिवार को श्रीरामजन्मभूमि शिलान्यास की हार्दिक शुभकामनायें 💐💐💐

-माता हिंगलाज भवानी शिव-शक्ति पीठ (भारत)

सभी विश्ववासियों को रंग-पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। मां भवानी हम सभी के जीवन को अपना सशक्त मार्गदर्शन प्रदान कर अपनी कृप...
10/03/2020

सभी विश्ववासियों को रंग-पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। मां भवानी हम सभी के जीवन को अपना सशक्त मार्गदर्शन प्रदान कर अपनी कृपा से अभिभूत करें!

जय माता भवानी 🙏🚩
- माता हिंगलाज भवानी शिव-शक्ति पीठ (भारत)

09/02/2020
09/02/2020
माता हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ (भारत)मां दुर्गा की 51 शक्तिपीठों में माता हिंगलाज भवानी प्रथम स्थान रखती हैं। एक पौराणिक कथ...
09/02/2020

माता हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ (भारत)

मां दुर्गा की 51 शक्तिपीठों में माता हिंगलाज भवानी प्रथम स्थान रखती हैं। एक पौराणिक कथानुसार राजा दक्ष प्रजापति द्वारा किए गए एक यज्ञ में अवढरदानी आदिदेव महादेव का अपमान करने पर उनकी पत्नी माता सती ने अपने पिता के यज्ञ में अपनी आहुति देकर उनके यज्ञ को विध्वंस कर दिया था जिसके उपरांत देवाधिदेव महादेव ने क्रोधित होकर उनके मृत शरीर को अपने कंधों पर रखकर पूरे ब्रह्मांड में तांडव किया था। ब्रह्मांड को महादेव के क्रोध से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे। धरती पर गिरने के बाद माता सती के शरीर के वे टुकड़े शक्तिपीठों में परिवर्तित हो गए। माता सती का सिर गिरने के बाद जो शक्तिपीठ अस्तित्व में आई उसे माता हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ के नाम से जाना गया।

माता हिंगलाज भवानी न्याय की देवी हैं जो अपने त्वरित न्याय के लिए जानी जाती हैं। अपने भक्तों के प्रति दुष्टता रखने वाले दुष्टों को उनकी दुष्टता की गंभीरता के आधार पर माता हिंगलाज भवानी 9 से 108 दिनों के अंदर अवश्य दंडित करती हैं।

सिर भाग होने के कारण माता हिंगलाज भवानी को माता की 51 शक्तिपीठों में शीर्ष स्थान प्राप्त है। इसीलिए माता हिंगलाज भवानी समस्त शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखती हैं एवं सर्वाधिक शक्तिशाली मानी जाती हैं। एक ओर जहां माता की अन्य शक्तिपीठें "परित्राणाय साधुनाम्..." सूत्र का पालन करते हुए अपने भक्तों के कल्याण हेतु अपना आशीष प्रदान करती हैं, वहीं दूसरी ओर माता हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ अपने भक्तों को अपना आशीष प्रदान करने के साथ-साथ "विनाशाय च दुष्कृताम्" सूत्र का पालन करते हुए अपने भक्तों के प्रति दुष्टता का भाव रखने वाले दुष्टों को त्वरित दंडित करने के लिए जानी जाती हैं।

माता के सभी भक्तों को भारत में स्थापित की जाने वाली माता हिंगलाज भवानी पीठ की अग्रिम शुभकामनाएं।

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ॐ हिंगुले परम हिंगुले अमृतरूपिणी।
तनुशक्ति मनः शिवे श्री हिंगुलाय नमो नमः।।
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-माता हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ
(भारत)

हिंगलाज मानव सेवा संस्थान की जन्म कुंडली के कुछ रोचक तथ्य:1. लग्नेश शुक्र है जिसकी देवता/देवी माता लक्ष्मी / भवानी अर्था...
09/02/2020

हिंगलाज मानव सेवा संस्थान की जन्म कुंडली के कुछ रोचक तथ्य:

1. लग्नेश शुक्र है जिसकी देवता/देवी माता लक्ष्मी / भवानी अर्थात यह ट्रस्ट देवी स्वरूप है। शुक्र स्वयं मीन राशि अर्थात अपनी उच्चतम राशि में है जिसका अर्थ है कि माता पूरी शक्ति से ट्रस्ट में विराजमान हैं।

2. लग्न पर सोम अर्थात चंद्र है जो शिवजी के शीष पर विराजमान है अर्थात शिव स्वरूप है। सोम शिवजी का दिन और ग्रहों में शिवजी का प्रतीक है। और चंद्र लग्न में उच्चतम राशि अर्थात वृषभ राशि में है अर्थात शिवजी पूर्ण शक्ति से ट्रस्ट में विराजमान है।

3. ट्रस्ट में 3 उच्च श्रेणी के राजयोग हैं पहला शुक्र से दूसरा शनि से व तीसरा बुध से बनता है, जिसका अर्थ है कि किसी भी अहम प्रोजेक्ट में सबसे पहले माता हिंगलाज की पूजा करने के बाद फिर कुत्सित बाधाओं का यथार्थ अवलोकन करना होगा। तत्पश्चात फिर अपनी बुद्धि का पूर्ण उपयोग करना होगा। इसके बाद उन बाधाओं पर 100% विजय सुनिश्चित है।

4. राहु केतु दोनों उच्च के हैं। राहु के देवता काल व अधिदेवता सर्प हैं जो शिवजी के गले में पड़े हैं। राहु एवं केतु का यह संयोग हर बाधा पर पूर्ण विजय प्राप्त करवाने में सक्षम होगा।

5. ट्रस्ट की आत्मा (अर्थात सूर्य) धर्म के घर में है। मकर राशि में होने से उसे दिग्बल प्राप्त है। अतः बड़ी से बड़ी बाधा भी माता रानी के भक्तों के ऊपर कोई संकट खड़ा नहीं कर पाएगी।

-ज्योतिषाचार्य गौरवेन्द्र नारायण जी
(बदायूं)

कश्मीर : निर्गमन से पुनर्वसन तक1947 में जब भारत आजाद हुआ था तब जम्मू-कश्मीर का कुल क्षेत्रफल था 2,22,236 वर्ग किलोमीटर ज...
18/01/2020

कश्मीर : निर्गमन से पुनर्वसन तक

1947 में जब भारत आजाद हुआ था तब जम्मू-कश्मीर का कुल क्षेत्रफल था 2,22,236 वर्ग किलोमीटर जिसमें से चीन और पाकिस्तान ने मिलकर लगभग आधे जम्मू-कश्मीर पर कब्ज़ा किया हुआ है और भारत वर्ष के पास केवल 1,02,387 वर्ग किलोमीटर कश्मीर भूमि शेष है।

जम्मू-कश्मीर के जो भाग आज हमारे पास नहीं हैं उनमें से गिलगिट, बाल्टिस्तान, बजारत, चिल्लास, हाजीपीर आदि हिस्से पर पाकिस्तान का सीधा शासन है और मुज़फ्फराबाद, मीरपुर, कोटली और छंब आदि इलाके हालांकि स्वायत्त शासन में हैं परंतु ये इलाके भी पाक के नियंत्रण में हैं।

पाक नियंत्रण वाले इसी कश्मीर के मुज़फ्फराबाद जिले की सीमा के किनारे से पवित्र "कृष्ण-गंगा" नदी बहती है। कृष्ण-गंगा नदी वही है जिसमें समुद्र मंथन के पश्चात् शेष बचे अमृत को असुरों से छिपाकर रखा गया था और उसी के बाद ब्रह्मा जी ने उसके किनारे माँ शारदा का मंदिर बनाकर उन्हें वहां स्थापित किया था।

जिस दिन से माँ शारदा वहां विराजमान हुई उस दिन से ही सारा कश्मीर "नमस्ते शारदादेवी कश्मीरपुरवासिनी / त्वामहंप्रार्थये नित्यम् विदादानम च देहि में" कहते हुये उनकी आराधना करता रहा है और उन कश्मीरियों पर माँ शारदा की ऐसी कृपा हुई कि आष्टांग योग और आष्टांग हृदय लिखने वाले वाग्भट वहीं जन्में,नीलमत पुराण वहीं रची गई,चरक संहिता, शिव-पुराण, कल्हण की राजतरंगिणी, सारंगदेव की संगीत रत्नकार सबके सब अद्वितीय ग्रन्थ वहीं रचे गये, उस कश्मीर में जो रामकथा लिखी गई उसमें मक्केश्वर महादेव का वर्णन सर्व-प्रथम स्पष्ट रूप से आया। शैव-दार्शनिकों की लंबी परंपरा कश्मीर से ही शुरू हुई। चिकित्सा, खगोलशास्त्र, ज्योतिष, दर्शन, विधि, न्यायशास्त्र, पाककला, चित्रकला और भवनशिल्प विधाओं का भी प्रसिद्ध केंद्र था कश्मीर क्योंकि उसपर माँ शारदा का साक्षात आशीर्वाद था। ह्वेनसांग के अपने यात्रा विवरण में लिखा है शारदा पीठ के पास उसने ऐसे-ऐसे विद्वान् देखे जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती कि कोई इतना भी विद्वान् हो सकता है। शारदापीठ के पास ही एक बहुत बड़ा विद्यापीठ भी था जहाँ दुनिया भर से विद्यार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे।

माँ शारदा के उस पवित्र पीठ में न जाने कितने सहस्त्र वर्षों से हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी के दिन एक विशाल मेला लगता था जहाँ भारत के कोने-कोने से वाग्देवी सरस्वती के उपासक साधना करने आते थे। भाद्रपद महीने की अष्टमी तिथि को शारदा अष्टमी इसीलिये कहा जाता था। शारदा तीर्थ श्रीनगर से लगभग सवा सौ किलोमीटर की दूरी पर बसा है और वहां के लोग तो पैदल माँ के दर्शन करने जाया करते थे।

शास्त्रों में एक बड़ी रोचक कथा मिलती है कि कथित निम्न जाति के एक व्यक्ति को भगवान शिव की उपासना से एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम उस दम्पति ने शांडलि रखा। शांडलि बड़े प्रतिभावान था। उनसे जलन भाव रखने के कारण ब्राह्मणों ने उनका यज्ञोपवित संस्कार करने से मना कर दिया। निराश शांडलि को ऋषि वशिष्ठ ने माँ शारदा के दर्शन करने की सलाह दी और उनके सलाह पर जब वो वहां पहुँचे तो माँ ने उन्हें दर्शन दिया उन्हें नाम दिया ऋषि शांडिल्य। आज हिन्दुओं के अंदर हरेक जाति में शांडिल्य गोत्र पाया जाता है।

हिन्दू धर्म का मंडन करने निकले शंकराचार्य जब शारदापीठ पहुँचे थे तो वहां उन्हें माँ ने दर्शन दिया था और हिन्दू जाति को बचाने का आशीर्वाद भी। उन्हीं माँ शारदा की कृपा से कश्मीर के शासक जैनुल-आबेदीन का मन बदल गया था जब वो उनके दर्शनों के लिये वहां गया था और उसने कश्मीर में अपने बाप सिकंदर द्वारा किये हर पाप का प्रायश्चित किया। इतिहास की किताबों में आता है कि माँ शारदा की उपासना में वो इतना लीन हो जाता था कि उसे दुनिया की कोई खबर न होती थी।

भारत के कई हिस्सों में जब यज्ञोपवीत संस्कार होता है तो बटु को कहा जाता है कि तू शारदा पीठ जाकर ज्ञानार्जन कर और सांकेतिक रूप से वो बटुक शारदापीठ की दिशा में सात कदम आगे पढ़ता है और फिर कुछ समय पश्चात् इस आशय से सात कदम पीछे आता है कि अब उसकी शिक्षा पूर्ण हो गई है और वो विद्वान् बनकर वहां से लौट आ रहा है।

एक समय था जब ये सांकेतिक संस्कार एक दिन वास्तविकता में बदलता था क्योंकि वो बटुक शिक्षा ग्रहण करने वहीं जाता था मगर आज दुर्भाग्य से हमारी "माँ शारदा" हमारे पास नहीं है और हम उनके पास जायें ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है तो शायद अब यज्ञोपवीत की ये रस्म सांकेतिक ही रह जायेगी सदा के लिये।

हमको शारदापीठ की मुक्ति चाहिये, हमको शारदा पीठ तक जाना है, हमें दुनिया को बताना है कि "केवल शारदा संस्कृति ही कश्मीरियत" है और इसलिये शारदापीठ पर भारत का पूर्ण नियंत्रण हो ऐसी मांग उठाइये और जब तक ये नहीं होता कम से कम तब तक करतारपुर साहिब कॉरिडोर की तर्ज़ पर "शारदादेवी कॉरिडोर" अविलम्ब आरंभ हो, इसकी मांग कीजिए।

अभिजीत सिंह

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