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गरुड़ पुराण – दसवाँ अध्याय"मृत्यु के अनन्तर के कृत्य, शव आदि नाम वाले छ्: पिण्ड दानों का फल, दाह संस्कार की विधि, पंचक म...
05/10/2026

गरुड़ पुराण – दसवाँ अध्याय
"मृत्यु के अनन्तर के कृत्य, शव आदि नाम वाले छ्: पिण्ड दानों का फल, दाह संस्कार की विधि, पंचक में दाह का निषेध, दाह के अनन्तर किये जाने वाले कृत्य, शिशु आदि की अन्त्येष्टि का विधान"

गरुड़ जी बोले – हे विभो :- अब आप पुण्यात्मा पुरुषों के शरीर के दाह संस्कार का विधान बतलाइए और यदि पत्नी सती हो तो उसकी महिमा का भी वर्णन कीजिए।

श्रीभगवान ने कहा – हे तार्क्ष्य :- जिन और्ध्वदैहिक कृत्यों को करने से पुत्र और पौत्र, पितृ-ऋण से मुक्त हो जाते हैं, उसे बताता हूँ, सुनो। बहुत-से दान देने से क्या लाभ? माता-पिता की अन्त्येष्टि क्रिया भली-भाँति करें, उससे पुत्र को अग्निष्टोम याग के समान फल प्राप्त हो जाता है।

माता-पिता की मृत्यु होने पर पुत्र को शोक का परित्याग करके सभी पापों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए समस्त बान्धवों के साथ मुण्डन कराना चाहिए। माता-पिता के मरने पर जिसने मुण्डन नहीं कराया, वह संसार सागर को तारने वाला पुत्र कैसे समझा जाए? अत: नख और काँख को छोड़कर मुण्डन कराना आवश्यक है। इसके बाद समस्त बान्धवों सहित स्नान करके धौत वस्त्र धारण करें तब तुरंत जल ले आकर जल से शव को स्नान करावे और चन्दन अथवा गंगा जी की मिट्टी के लेप से तथा मालाओं से उसे विभूषित करें। उसके बाद नवीन वस्त्र से ढककर अपसव्य होकर नाम-गोत्र का उच्चारण करके संकल्पपूर्वक दक्षिणासहित पिण्डदान देना चाहिए। मृत्यु के स्थान पर “शव” नामक पिण्ड को मृत व्यक्ति के नाम-गोत्र से प्रदान करें। ऎसा करने से भूमि और भूमि के अधिष्ठाता देवता प्रसन्न होते हैं।

इससके पश्चात द्वार देश पर “पान्थ” नामक पिण्ड मृतक के नाम-गोत्रादि का उच्चारण करके प्रदान करे। ऎसा करने से भूतादि कोटि में दुर्गतिग्रस्त प्रेत मृत प्राणी की सद्गति में विघ्न-बाधा नहीं कर सकते। इसके बाद पुत्र वधू आदि शव की प्रदक्षिणा करके उउसकी पूजा करें तब अन्य बान्धवों के साथ पुत्र को शव यात्रा के निमित्त कंधा देना चाहिए। अपने पिता को कंधे पर धारण करके जो पुत्र श्मशान को जाता है, वह पग-पग पर अश्वमेघ का फल प्राप्त करता है।

पिता अपने कंधे पर अथवा अपनी पीठ पर बिठाकर पुत्र का सदा लालन-पालन करता है, उस ऋण से पुत्र तभी मुक्त होता है जब वह अपने मृत पिता को अपने कंधे पर ढोता है। इसके बाद आधे मार्ग में पहुँचकर भूमि का मार्जन और प्रोक्षण करके शव को विश्राम कराए और उसे स्नान कराकर भूत संज्ञक पितर को गोत्र नामादि के द्वारा ‘भूत’ नामक पिण्ड प्रदान करें। इस पिण्डदान से अन्य दिशाओं में स्थित पिशाच, राक्षस, यक्ष आदि उस हवन करने योग्य देह की हवनीयता अयोग्यता नहीं उत्पन्न कर सकते।

उसके बाद श्मशान में ले जाकर उत्तराभिमुख स्थापित करें। वहाँ देह के दाह के लिए यथाविधि भूमि का संशोधन करें। भूमि का सम्मार्जन और लेपन करके उल्लेखन करें अर्थात दर्भमूल से तीन रेखाएँ खींचें और उल्लेखन क्रमानुसार ही उन रेखाओं से उभरी हुई मिट्टी को उठाकर ईशान दिशा में फेंककर उस वेदिका को जल से प्रोक्षित करके उसमें विधि-विधानपूर्वक अग्नि स्थापित करें। पुष्प और अक्षत आदि से क्रव्यादसंज्ञक अग्निदेव की पूजा करें और “लोमभ्य: (स्वाहा)” इत्यादि अनुवाक से यथाविधि होम करना चाहिए। (तब उस क्रव्याद – मृतक का मांस भक्षण करने वाली – अग्नि की इस प्रकार प्रार्थना करें) तुम प्राणियों को धारण करने वाले, उनको उत्पन्न करने वाले तथा प्राणियों का पालन करने वाले हो, यह सांसारिक मनुष्य मर चुका है, तुम इसे स्वर्ग ले जाओ। इस प्रकार क्रव्याद-संज्ञक अग्नि की प्रार्थना करके वहीं चंदन, तुलसी, पलाश और पीपल की लकड़ियों से चिता का निर्माण करें।

हे खगेश्वर :- उस शव को चिता पर रख करके वहाँ दो पिण्ड प्रदान करें। प्रेत के नाम से एक पिण्ड चिता पर तथा दूसरा शव के हाथ में देना चाहिए। चिता में रखने के बाद से उस शव में प्रेतत्व आ जाता है। प्रेतकल्प को जानने वाले कतिपय विद्वज्जन चिता पर दिये जाने वाले पिण्ड को “साधक” नाम से संबोधित करते हैं। अत: चिता पर साधक नाम से तथा शव के हाथ पर “प्रेत” नाम से पिण्डदान करें। इस प्रकार पाँच पिण्ड प्रदान करने से शव में आहुति-योग्यता सम्पन्न होती है। अन्यथा श्मशान में स्थित पूर्वोक्त पिशाच, राक्षस तथा यक्ष आदि उसकी आहुति-योग्यता के उपघातक होते हैं। प्रेत के लिए पाँच पिण्ड देकर हवन किये हुए उस क्रव्याद अग्नि को तिनकों पर रखकर यदि पंचक (धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती ये पाँच नक्षत्र पंचक कहलाते हैं और इन पंचकों के स्वामी ग्रह क्रमश: वसु, वरुण, अजचरण अथवा अजैकपात, अहिर्बुध्न्य और पूषा हैं) न हो तो पुत्र अग्नि प्रदान करे।

पंचक में जिसका मरण होता है, उस मनुष्य को सद्गति नहीं प्राप्त होती। पंचक शान्ति किये बिना उसका दाह संस्कार नहीं करना चाहिए अन्यथा अन्य की मृत्यु हो जाती है। धनिष्ठा नक्षत्र के उत्तरार्ध से रेवती तक पाँच नक्षत्र पंचक संज्ञक है। इनमें मृत व्यक्ति दाह के योग्य नहीं होता औऔर उसका दाह करने से परिणाम शुभ नहीं होता। इन नक्षत्रों में जो मरता है, उसके घर में कोई हानि होती है, पुत्र और सगोत्रियों को भी कोई विघ्न होता है। अथवा इस पंचक में भी दाह विधि का आचरण करके मृत व्यक्ति का दाह-संस्कार हो सकता है।

पंचक मरण-प्रयुक्त सभी दोषों की शान्ति के लिए उस दाह-विधि को कहूँगा।
हे तार्क्ष्य :- कुश से निर्मित चार पुतलों को नक्षत्र-मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके शव के समीप में स्थापित करें तब उन पुतलों में प्रतप्त सुवर्ण रखना चाहिए और फिर नक्षत्रों के नाम-मन्त्रों से होम करना चाहिए। पुन: “प्रेता जयता नर इन्द्रो व: शर्म यच्छतु” (ऋग्वेद – 10।103।13, युज. 17।46) इस मन्त्र से उन नक्षत्र-मन्त्रों को सम्पुटित करके होम करना चाहिए।

इसके बाद उन पुतलों के साथ शव का दाह करें, सपिण्ड श्राद्ध के दिन पुत्र यथाविधि पंचक-शान्ति का अनुष्ठान करें। पंचक दोष की शान्ति के लिए क्रमश: तिलपूर्ण पात्र, सोना, चाँदी, रत्न तथा घृतपूर्ण कांस्यपात्र का दान करना चाहिए। इस प्रकार पंचक-शान्ति विधान करके जो शव दाह करता है, उसे पंचकजन्य कोई विघ्न-बाधा नहीं होती और प्रेत भी सद्गति प्राप्त करता है। इस प्रकार पंचक में मृत व्यक्ति का दाह करना चाहिए और पंचक के बिना मरने पर केवल शव का दाह करना चाहिए। यदि मृत व्यक्ति की पत्नी सती हो रही हो तो उसके दाह के साथ ही शव का दाह करना चाहिए।

अपने पति के प्रियसम्पादन में संलग्न पतिव्रता नारी यदि उसके साथ परलोकगमन करना चाहे (सती होना स्त्री की इच्छा पर निर्भर करता है, सती के नाम पर कोई जबर्दस्ती नहीं होनी चाहिए) तो पति की मृत्यु होने पर स्नान करे और अपने शरीर को कुंकुम, अंजन, सुन्दर वस्त्राभूषणादि से अलंकृत करे, ब्राह्मणों और बन्धु-बान्धवों को दान दे। गुरुजनों को प्रणाम करके तब घर से बाहर निकले। इसके बाद देवालय जाकर भक्तिपूर्वक भगवान विष्णु को प्रणाम करे। वहाँ अपने आभूषणों को समर्पित करके वहाँ से श्रीफल लेकर लज्जा और मोह का परित्याग करके श्मशान भूमि में जाए तब वहाँ सूर्य को नमस्कार करके, चिता की परिक्रमा करके पुष्पशैय्या रूपी चिता पर चढ़े और अपने पति को गोद में लिटाए। तदनन्तर सखियों को श्रीफल देकर दाह के लिए आज्ञा प्रदान करे और शरीर दाह को गंगाजल में स्नान के समान मानकर अपना शरीर जलाए।

गर्भिणी (pregnant) स्त्री को अपने पति के साथ अपना दाह नहीं करना चाहिए। प्रसव करके और उत्पन्न बालक का पोषण करने के अनन्तर उसे सती होना चाहिए। यदि स्त्री अपने मृत पति के शरीर को लेकर अपने शरीर का दाह करती है तो अग्नि उसके शरीर मात्र को जलाती है, उसकी आत्मा को कोई पीड़ा नहीं होती। धौंके जाते हुए स्वर्णादि धातुओं का मल जैसे अग्नि में जल जाता है, उसी प्रकार पति के साथ जलने वाली नारी अमृत के समान अग्नि में अपने पापों को जला देती है। जिस प्रकार सत्यपरायण धर्मात्मा पुरुष शपथ के समय तपे हुए लोहपिण्डादि को लेने पर भी नहीं जलता, उसी प्रकार चिता पर पति के शरीर के साथ संयुक्त वह नारी भी कभी नहीं जलती अर्थात उसे दाहप्रयुक्त कष्ट नहीं होता। प्रत्युत उसकी अन्तरात्मा मृत व्यक्ति की अन्तरात्मा के साथ एकत्व प्राप्त कर लेती है।

पति की मृत्यु होने पर जब तक स्त्री उसके शरीर के साथ अपने शरीर को नहीं जला लेती, तब तक वह किसी प्रकार भी स्त्री शरीर प्राप्त करने से मुक्त नहीं होती। इसलिए सर्वप्रयत्नपूर्वक मन, वाणी और कर्म से जीवितावस्था में अपने पति की सदा सेवा करनी चाहिए और मरने पर उसका अनुगमन करना चाहिए। पति के मरने पर जो स्त्री अग्नि में आरोहण करती है, वह महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुन्धती के समान होकर स्वर्गलोक में सम्मानित होती है। वहाँ वह पतिपरायणा नारी अप्सरागणों के द्वारा स्तूयमान होकर चौदह इन्द्रों के राज्यकालपर्यन्त अर्थात एक कल्प तक अपने पति के साथ स्वर्गलोक में रमण करती है। जो सती अपने भर्ता का अनुगमन करती है, वह अपने मातृकुल, पितृकुल और पतिकुल – इन तीनों कुलों को पवित्र कर देती है।

मनुष्य के शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोमकूप हैं, उतने काल तक वह नारी अपने पति के साथ स्वर्ग में आनन्द करती है। वह सूर्य के समान प्रकाशमान विमान में अपने पति के साथ क्रीड़ा करती है और जब तक सूर्य और चन्द्र की स्थिति रहती है तब तक पतिलोक में निवास करती है। इस प्रकार दीर्घ आयु प्राप्त करके पवित्र कुल में पैदा होकर पतिरूप में वह पतिव्रता नारी उसी जन्मान्तरीय पति को पुन: प्राप्त करती है।

जो स्त्री क्षणमात्र के लिए होने वाले दाह-दु:ख के कारण इस प्रकार के सुखों को छोड़ देती है, वह मूर्खा जन्मपर्यन्त विरहाग्नि में जलती रहती है। इसलिए पति को शिवस्वरूप जानकर उसके साथ अपने शरीर को जला देना चाहिए। शव के आधे या पूरे जल जाने पर उसके मस्तक को फोड़ना चाहिए। गृहस्थों के मस्तक को काष्ठ से और यतियों के मस्तक को श्रीफल से फोड़ देना चाहिए।

पितृलोक की प्राप्ति के लिए उसके ब्रह्मरन्ध्र का भेदन करके उसका पुत्र निम्न मन्त्र से अग्नि में घी की आहुति दे – हे अग्निदेव ! तुम भगवान वासुदेव के द्वारा उत्पन्न किए गए हो। पुन: ततुम्हारे द्वारा इसकी तेजोमय दिव्य शरीर की उत्पत्ति हो। स्वर्गलोक में गमन करने के लिए इसका स्थूल शरीर जलकर तुम्हारा हवि हो, एतदर्थ तुम प्रज्वलित होओ। इस प्रकार मन्त्रसहित तिलमिश्रित घी की आहुति देकर जोर से रोना चाहिए, उससे मृत प्राणी सुख प्राप्त करता है।

दाह के अनन्तर स्त्रियों को स्नान करना चाहिए। तत्पश्चात पुत्रों को स्नान करना चाहिए। तदनन्तर मृत प्राणि के गोत्र-नाम का उच्चारण करके तिलांजलि देनी चाहिए फिर नीम के पत्तों को चबाकर मृतक के गुणों का गान करना चाहिए। आगे-आगे स्त्रियों को और पीछे पुरुषों को घर जाना चाहिए और घर में पुन: स्नान करके गोग्रास देना चाहिए। पत्तल में भोजन करना चाहिए और घर का अन्न नहीं खाना चाहिए। मृतक के स्थान को लीपकर वहाँ बारह दिन तक रात-दिन दक्षिणाभिमुख अखण्ड दीपक जलाना चाहिए।
हे तार्क्ष्य :- शवदाह के दिन से लेकर तीन दिन तक सूर्यास्त होने पर श्मशान भूमि में अथवा चौराहे पर मिट्टी के पात्र में दूध तथा जल देना चाहिए।

काठ की तीन लकड़ियों को दृढ़तापूर्वक सूत से बाँधकर अर्थात तिगोड़िया बनाकर उस पर दूध और जल से भरे हुए कच्चे मिट्टी के पात्र को रखकर यह मन्त्र पढ़े – हे प्रेत ! तुम श्मशान की आग से जले हुए हो, बान्धवों से परित्यक्त हो, यह जल और यह दूध तुम्हारे लिए है, इसमें स्नान करो और इसे पीओ (याज्ञवल्क्य स्मृति 3।17 की मिताक्षरा में विज्ञानेश्वर ने कहा है कि प्रेत के लिए जल और दूध पृथक-पृथक पात्रों में रखना चाहिए और “प्रेत अत्र स्नाहि” कहकर जल तथा “पिब चेदम्” कहकर दूध रखना चाहिए)। साग्निक – जिन्होंने अग्न्याधान किया हो – को चौथे दिन अस्थिसंचय करना चाहिए और निषिद्ध वार-तिथि का विचार करके निरग्नि को तीसरे अथवा दूसरे दिन अस्थिसंचय करना चाहिए।

अस्थिसंचय के लिए श्मशान भूमि में जाकर स्नान करके पवित्र हो जाए। ऊन का सूत्र लपेटकर और पवित्री धारण करके – श्मशानवासियों (भूतादि) के लिए पुत्र को “यमाय त्वा.” (यजु. 38।9) इस मन्त्र से माष (उड़द) की बलि देनी चाहिए और तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। हे खगेश्वर ! इसके बाद चितास्थान को दूध से सींचकर जल से सींचे। तदनन्तर अस्थिसंचय करे और उन अस्थियों को पलाश के पत्ते पर रखकर दूध और जल से धोएँ और पुन: मिट्टी के पात्र पर रखकर यथाविधि श्राद्ध – पिण्डदान – करें। त्रिकोण स्थण्डिल बनाकर उसे गोबर से लीपे। दक्षिणाभिमुख होकर स्थपिण्डल के तीनों कोनों पर तीन पिण्डदान करें। चिताभस्म को एकत्र करके उसके ऊपर तिपाई रखकर उस पर खुले मुखवाला जलपूर्ण घट स्थापित करें।

इसके बाद चावल पकाकर उसमें दही और घी तथा मिष्ठान्न मिलाकर जल के सहित प्रेत को यथाविधि बलि प्रदान करें।
हे खग :- फिर उत्तर दिशा में पंद्रह कदम जाएँ और वहाँ गढ्ढा बनाकर अस्थि पात्र को स्थापित करें। उसके ऊपर दाहजनित पीड़ा नष्ट करने वाला पिण्ड प्रदान करें और गढ्ढे से उस अस्थि पात्र को निकालकर उसे लेकर जलाशय को जाएँ। वहाँ दूध और जल से उन अस्थियों को बार-बार प्रक्षालित करके चन्दन और कुंकुम से विशेषरूप से लेपित करें फिर उन्हें एक दोने में रखकर हृदय और मस्तक में लगाकर उनकी परिक्रमा करें तथा उन्हें नमस्कार करके गंगा जी में विसर्जित करें। जिस मृत प्राणी की अस्थि दस दिन के अन्तर्गत गंगा में विसर्जित हो जाती है, उसका ब्रह्मलोक से कभी भी पुनरागमन नहीं होता। गंगाजल में मनुष्य की अस्थि जब तक रहती है उतने हजार वर्षों तक वह स्वर्गलोक में विराजमान रहता है।

गंगा जल की लहरों को छूकर हवा जब मृतक का स्पर्श करती है तब उस मृतक के पातक तत्क्षण ही नष्ट हो जाते हैं। महाराज भगीरथ उग्र तप से गंगा देवी की आराधना करके अपने पूर्वजों का उद्धार करने के लिए गंगा देवी को ब्रह्मलोक से भूलोक ले आए थे। जिनके जल ने भस्मीभूत राजा सगर के पुत्रों को स्वर्ग में पहुँचा दिया, उन गंगा जी का पवित्र यश तीनों लोकों में विख्यात है।

जो मनुष्य अपनी पूर्वावस्था में पाप करके मर जाते हैं उनकी अस्थियों को गंगा में छोड़ने पर वे स्वर्गलोक चले जाते हैं। किसी महा अरण्य में सभी प्राणियों की हत्या करने वाला कोई व्याध सिंह के द्वारा मारा गया और जब वह नरक को जाने लगा तभी उसकी अस्थि गंगाजी में गिर पड़ी, जिससे वह दिव्य विमान पर चढ़कर देवलोक को चला गया। इसलिए सत्पुरुष को स्वत: ही अपने पिता की अस्थियों को गंगाजी में विसर्जित करना चाहिए। अस्थिसंचयन के अनन्तर दशगात्रविधि का अनुष्ठान करना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति विदेश में या वन में अथवा चोरों के भय से मरा हो और उसका शव प्राप्त न हुआ हो तो जिस दिन उसके निधन का समाचार सुने, उस दिन कुश का पुत्तल बनाकर पूर्वविधि के अनुसार केवल उसी का दाह करे और उसकी भस्म को लेकर गंगा जल में विसर्जित करें। दशगात्रादि कर्म भी उसी दिन से आरम्भ करना चााहिए और सांवत्सरिक श्राद्ध में भी उसी दिन (सूचना प्राप्त होने वाले) को ग्रहण करना चाहिए।

यदि गर्भ की पूर्णता हो जाने के अनन्तर नारी की म्रत्यु हो गई हो तो उसके पेट को चीरकर बालक को निकाल ले, यदि वह भी मर गया हो तो उसे भूमि में गाड़कर केवल मृत स्त्री का दाह करें। गंगा के किनारे मरे हुए बालक को गंगाजी में ही प्रवाहित कर दे और अन्य स्थान पर मरे सत्ताईस महीने तक के बालक को भूमि में गाड़ दें। इसके बाद की अवस्था वाले बालक का दाह संस्कार करे और उसकी अस्थियाँ गंगा जी में विसर्जित करें तथा जलपूर्ण कुम्भ प्रदान करें तथा केवल बालकों को ही भोजन कराएँ।

गर्भ के नष्ट होने पर उसकी कोई क्रिया नहीं की जाती पर शिशु के मरने पर उसके लिए दुग्धदान करना चाहिए। बालक – चूड़ाकरण से पूर्व या तीन वर्ष की अवस्था वाले – के मरने पर उसके लिए जलपूर्ण घट का दान करना चाहिए और खीर का भोजन कराना चाहिए। कुमार के मरने पर कुमार बालकों को भोजन कराना चाहिए और उपनीत पौगण्ड अवस्था के बच्चे के मरने पर उसी अवस्था के बालकों के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

पाँच वर्ष की अवस्था से अधिक वाले बालक की मृत्यु होने पर, वह चाहे उपनीत (यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न) हो अथवा अनुपनीत (जिसका यज्ञोपवीत न हुआ हो) हो, पायस और गुड़ के दस पिण्ड क्रमश: प्रदान करने चाहिए। पौगण्ड अवस्था के बालक की मृत्यु होने पर वृषोत्सर्ग तथा महादान की विधि को छोड़कर एकादशाह तथा द्वादशाह की क्रिया का सम्पादन करना चाहिए। पिता के जीवित रहने पर पौगण्डावस्था में मृत बालक का सपिण्डन श्राद्ध नहीं होता। अत: बारहवें दिन उसका केवल एकोद्दिष्ट श्राद्ध करें।

स्त्री और शूद्रों के लिए विवाह ही व्रतबन्ध-स्थानीय संस्कार कहा गया है। व्रत अर्थात उपनयन के पूर्व मरने वाले सभी वर्णों के मृतकों के लिए उनकी अवस्था के अनुकूल समान क्रिया होनी चाहिए। जिसने थोड़ा कर्म किया किया हो, थोड़े विषयों से जिसका संबंध रहा हो, कम अवस्था हो और स्वल्प देह वाला हो, ऎसे जीव के मरने पर उसकी क्रिया भी स्वल्प ही होनी चाहिए। किशोर अवस्था के और तरुण अवस्था के मनुष्य के मरने पर शय्यादान, वृषोत्सर्गादि, पददान, महादान और गोदान आदि क्रियाएँ करनी चाहिए। सभी प्रकार के सन्यासियों की मृत्यु होने पर उनके पुत्रों आदि के द्वारा न तो उनका दाह-संस्कार किया जाना चाहिए, न उन्हें तिलांजलि देनी चााहिए और न ही उनकी दशगात्रादि क्रिया ही करनी चाहिए क्योंकि दण्डग्रहण (सन्यास ग्रहण) कर लेने मात्र से नर ही नारायण स्वरूप हो जाता है। त्रिदण्ड (मन, वाणी और इन्द्रियों का संयम ही त्रिदण्ड है) ग्रहण करने से मृत्यु के अनन्तर उस जीव को प्रेतत्व प्राप्त नहीं होता।

ज्ञानीजन तो अपने स्वरूप का अनुभव कर लेने के कारण सदा मुक्त ही होते हैं। इसलिए उनके उद्देश्य से दिये जाने वाले पिण्डों की भी उन्हें आकांक्षा नहीं होती। अत: उनके लिए पिण्डदान और उदकक्रिया नहीं करनी चाहिए, किंतु पितृभक्ति के कारण तीर्थश्राद्ध और गया श्राद्ध करने चाहिए।

हे तार्क्ष्य :- हंस, परमहंस, कुटीचक और बहूदक – इन चारों प्रकार के सन्यासियों की मृत्यु होने पर उन्हें पृथ्वी में गाड़ देना चाहिए। गंगा आदि नदियों के उपलब्ध न रहने पर ही पृथ्वी में गाड़ने की विधि है, यदि वहाँ कोई महानदी हो तो उन्हीं में उन्हें जलसमाधि दे देनी चाहिए।
इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “दाहास्थिसंचयकर्मनिरुपण” नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ

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05/10/2026

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गरुड़ पुराण -नवाँ अध्यायमरणासन्न व्यक्तियों के निमित्त किये जाने वाले कृत्य"गरुड़जी बोले -हे प्रभो :- आपने आतुरकालिक दान...
05/10/2026

गरुड़ पुराण -नवाँ अध्याय
मरणासन्न व्यक्तियों के निमित्त किये जाने वाले कृत्य"
गरुड़जी बोले -हे प्रभो :- आपने आतुरकालिक दान के संदर्भ में भली भाँति कहा। अब म्रियमाण (मरणासन्न) व्यक्ति के लिए जो कुछ करना चाहिए, उसे बताइए।
श्रीभगवान ने कहा – हे तार्क्ष्य :- जिस विधान से मनुष्य मरने पर सद्गति प्राप्त करते हैं, शरीर त्याग करने की उस विधि को मैं कहता हूँ, सुनो। कर्म के संबंध से जब प्राणी अपना शरीर छोड़ने लगता है तो उस समय तुलसी के समीप गोबर से एक मण्डल की रचना करनी चाहिए। वहाँ उस मण्डल के ऊपर तिल बिखेरकर कुशों को बिछाए, तदनन्तर उनके ऊपर श्वेत वस्त्र के आसन पर शालिग्राम शिला को स्थापित करें। जहाँ पाप, दोष और भय को हरण करने वाली शालग्राम-शिला विद्यमान है, उसके संनिधान में मरने से प्राणी की मुक्ति सुनिश्चित है। जहाँ जगत के ताप का हरण करने वाली तुलसी वृक्ष की छाया है, वहाँ मरने से सदैव मुक्ति ही होती है, जो मुक्ति दानादि कर्मों से दुर्लभ है।

जिसके घर में तुलसी वृक्ष के लिए स्थान बना हुआ है, वह घर तीर्थ स्वरुप ही है, वहाँ यम के दूत प्रवेश नहीं करते। तुलसी की मंजरी से युक्त होकर जो प्राणी अपने प्राणों का परित्याग करता है, वह सैकड़ों पापों से युक्त हो तो भी यमराज उसे देख नहीं सकते। तुलसी के दल को मुख में रखकर तिल और कुश के आसन पर मरने वाला व्यक्ति पुत्रहीन हो तो भी नि:संदेह विष्णुपुर को जाता है। तीनों प्रकार के तिल काले, सफेद और भूरे, कुश और तुलसी – ये सब म्रियमाण प्राणी को दुर्गति से बचा लेते हैं। यत: मेरे पसीने से तिल पैदा हुए हैं, अत: वे पवित्र हैं। असुर, दानव और दैत्य तिल को देखकर भाग जाते हैं,
हे तार्क्ष्य :- मेरे रोम से पैदा हुए दर्भ (कुश) मेरी विभूति हैं इसलिए उनके स्पर्श से ही मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

कुश के मूल में ब्रह्मा, कुश के मध्य में जनार्दन और कुश के अग्रभाग में शंकर – इस प्रकार तीनों देवता कुश में स्थित रहते हैं। इसलिए कुश, अग्नि, मन्त्र, तुलसी, ब्राह्मण और गौ – ये बार-बार उपयोग किये जाने पर भी निर्माल्य नहीं होते। पिण्डदान में उपयोग किये दर्भ, प्रेत के निमित्त भोजन करने वाले ब्राह्मण, नीच के मुख से उच्चरित मन्त्र, नीच संबंधी गाय और तुलसी तथा चिता की आग – ये सब निर्माल्य अर्थात अपवित्र होते हैं।

गोबर से लीपी हुई और कुश बिछाकर संस्कार की हुई पृथ्वी पर आतुर (मरणासन्न व्यक्ति) को स्थापित करना चाहिए। अन्तरिक्ष का परिहार करना चाहिए अर्थात चौकी आदि पर नहीं रखना चाहिए। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा अन्य सभी देवता और हुताशन (अग्नि) – ये सभी मण्डल पर विराजमान रहते हैं, इसलिए मण्डल की रचना करनी चाहिए। जो भूमि लेपरहित होती है अर्थात मल-मूत्र आदि से रहित होती है, वह सर्वत्र पवित्र होती है किंतु जो भूमि भाग कभी लीपा जा चुका है या मल-मूत्र आदि से दूषित है वहाँ पुन: लीपने पर उसकी शुद्धि हो जाती है।

बिना लीपी हुई भूमि पर और चारपाई आदि पर या आकाश में (भूमि की सतह से ऊपर) राक्षस, पिशाच, भूत, प्रेत और यमदूत प्रविष्ट हो जाते हैं। इसलिए भूमि पर मण्डल बनाए बिना अग्निहोत्र, श्राद्ध, ब्राह्मण-भोजन, देव-पूजन और आतुर व्यक्ति का स्थापन नहीं करना चाहिए। इसलिए लीपी हुई भूमि पर आतुर व्यक्ति को लिटाकर उसके मुख में स्वर्ण और रत्न का प्रक्षेप करके शालग्राम स्वरुपी भगवान विष्णु का पादोदाक देना चाहिए।

जो शालग्राम-शिला के जल को बिन्दुमात्र भी पीता है वह सभी पापों से मुक्त हो वैकुण्ठ लोक में जाता है। इसलिए आतुर व्यक्ति को महापातक को नष्ट करने वाले गंगा जल को देना चाहिए। गंगा जल का पान सभी तीर्थों में किये जाने वाले स्नान-दानादि के पुण्यरूपी फल को प्रदान करने वाला है। जो शरीर को शुद्ध करने वाले चान्द्रायण व्रत को एक हजार बार करता है और जो एक बार गंगा जल का पान करता है, वे दोनों समान फल वाले रहते हैं।
हे तार्क्ष्य :- अग्नि के संबंध से जैसे रूइ की राशि नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार गंगाजल से पातक भस्मसात हो जाते हैं।

जो सूर्य की किरणों से संतप्त गंगा के जल का पान करता है, वह सभी योनियों से छूटकर हरि के धाम को प्राप्त होता है। अन्य नदियाँ मनुष्यों को जलावगाहन (स्नान) करने पर पवित्र करती हैं, किंतु गंगाजी तो दर्शन, स्पर्श, दान अथवा “गंगा” इस नाम का कीर्तन करने मात्र से सैकड़ों, हजारों पुण्यरहित पुरुषों को भी पवित्र कर देती हैं। इसलिए संसार से पार लगा देने वाले गंगा जल को पीना चाहिए।

जो व्यक्ति प्राणों के कण्ठगत होने पर ‘गंगा-गंगा’ ऎसा कहता है वह विष्णु लोक को प्राप्त होता है और पुन: भूलोक में जन्म नहीं लेता। प्राणोत्क्रमण (प्राणों के निकलने) के समय जो पुरुष श्रद्धायुक्त होकर मन से गंगा काा चिन्तन करता है वह भी परम गति को प्राप्त होता है। अत: गंगा का ध्यान, गंगा को नमन, गंगा का संस्मरण करना चाहिए और गंगा जल का पान करना चाहिए। इसके बाद मोक्ष प्रदान करने वाली श्रीमद्भागवत की कथा को जितना सम्भव हो उतना श्रवण करना चाहिए। जो व्यक्ति अन्त समय में श्रीमद्भागवत के एक श्लोक, आधे श्लोक अथवा एक पाठ का भी पाठ करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर पुन: संसार में कभी नहीं आता।

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को मरण काल में वेद और उपनिषदों का पाठ तथा शिव व विष्णु की स्तुति से मुक्ति प्राप्त होती है।
हे खग :- प्राण त्याग के समय मनुष्य को अनशन व्रत अर्थात अन्न तथा जल का त्याग करना चाहिए और यदि वह विरक्त द्विजन्मा हो तो उसे आतुर सन्यास लेना चाहिए। प्राणों के कण्ठ में आने पर जो प्राणी “मैंने सन्यास ले लिया है” – ऎसा कहता है, वह मरने पर विष्णु लोक को प्राप्त होता है। पुन: पृथ्वी पर उसका जन्म नहीं होता।
इस प्रकार हे खग :- जिस धार्मिक पुरुष के आतुरकालिक पूर्वोक्त कार्य सम्पादित किये जाते हैं, उसके प्राण ऊपर के छिद्रों से सुखपूर्वक निकलते हैं। मुख, दोनों नेत्र, दोनों नासिकारन्ध्र तथा दोनों कान – ये सात (ऊपर के) द्वार (छिद्र) हैं, इनमें से किसी द्वार से सुकृती (पुण्यात्मा) – के प्राण निकलते हैं और योगियों के प्राण तालुरन्ध्र से निकलते हैं। अपान से मिले हुए प्राण जब पृथक हो जाते हैं तब प्राणवायु सूक्ष्म होकर शरीर से निकलता है।

प्राणवायु रूपी ईश्वर के निकल जाने पर काल से आहत शरीर निराधार वृक्ष की भाँति गिर पड़ता है। प्राण से मुक्त होने के बाद शरीर तुरंत चेष्टाशून्य, घृणित, दुर्गन्धयुक्त, अस्पृश्य और सभी के लिए निन्दित हो जाता है। इस शरीर की कीड़ा, वीष्ठा तथ भस्मरूप – ये तीन अवस्थाएँ होती हैं, इसमे कीड़े पड़ते हैं, यह विष्ठा के समान दुर्गन्धयुक्त हो जाता है अथवा अन्तत: चिता में भस्म हो जाता है। इसलिए क्षण मात्र में नष्ट हो जाने वाले इस देह के लिए मनुष्यों के द्वारा गर्व क्यों किया जाए। पंचभूतों से निर्मित इस शरीर का पृथ्वी तत्व पृथ्वी में लीन हो जाता है, जलतत्व जल में, तेजस्तत्त्व तेज में और वायुतत्व वायु में लीन हो जाता है, इसी प्रकार आकाश तत्व भी आकाश में लीन हो जाता है। सभी प्राणियों के देह में स्थित रहने वाला, सर्वव्यापी, शिवस्वरुप, नित्य मुक्त और जगत्साक्षी आत्मा अजर-अमर है।

सभी इन्द्रियों से युक्त और शब्द आदि विषयों से युक्त (मृत व्यक्ति की देह से निकला) जीव कर्म-कोश से समन्वित तथा काम और रोगादि के सहित – पुण्य की वासना से युक्त होकर अपने कर्मों के द्वारा निर्मित नवीन शरीर में उसी प्रकार प्रवेश करता है जैसे घर के जल जाने पर गृहस्थ दूसरे नवीन घर में प्रवेश करता है। तब किंकिणी जाल की मालाओं से युक्त विमान लेकर सुन्दर चामरों से सुशोभित देवदूत आते हैं। धर्म के तत्व को जानने वाले, बुद्धिमान, धार्मिक जनों के प्रिय वे देवदूत कृतकृत्य इस जीव को विमान से स्वर्ग ले जाते हैं। सुन्दर, दिव्य देह धारण करके निर्मल वस्त्र और माल्य धारण करके, सुवर्ण और रत्नादि के आभरणों से युक्त होकर वह महानुभाव जीव दान के प्रभाव से देवताओं से पूजित होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है।
इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “म्रियमाणकृत्यनिरुपण” नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ

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मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा।कथा के अनुसार भगवान शंकर के दोनों पुत्रों में आपस में इस बात पर विवाद उत्पन्न हो गया कि...
05/10/2026

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा।
कथा के अनुसार भगवान शंकर के दोनों पुत्रों में आपस में इस बात पर विवाद उत्पन्न हो गया कि पहले किसका विवाह होगा. जब श्री गणेश और श्री कार्तिकेय जब विवाद में किसी हल पर नहीं पहुंच पायें तो दोनों अपना- अपना मत लेकर भगवान शंकर और माता पार्वती के पास गए।
अपने दोनों पुत्रों को इस प्रकार लडता देख, पहले माता-पिता ने दोनों को समझाने की कोशिश की. परन्तु जब वे किसी भी प्रकार से गणेश और कार्तिकेयन को समझाने में सफल नहीं हुए, तो उन्होने दोनों के समान एक शर्त रखी।
दोनों से कहा कि आप दोनों में से जो भी पृथ्वी का पूरा चक्कर सबसे पहले लगाने में सफल रहेगा. उसी का सबसे पहले विवाह कर दिया जायेगा.
विवाह की यह शर्त सुनकर दोनों को बहुत प्रसन्नता हुई. कार्तिकेयन का वाहन क्योकि मयूर है, इसलिए वे तो शीघ्र ही अपने वाहन पर सवार होकर इस कार्य को पूरा करने के लिए चल दिए।
परन्तु समस्या श्री गणेश के सामने आईं, उनका वाहन मूषक है., और मूषक मन्द गति जीव है. अपने वाहन की गति का विचार आते ही श्री गणेश समझ गये कि वे इस प्रतियोगिता में इस वाहन से नहीं जीत सकते।
श्री गणेश है. चतुर बुद्धि, तभी तो उन्हें बुद्धि का देव स्थान प्राप्त है, बस उन्होने क्या किया, उन्होनें प्रतियोगिता जीतने का एक मध्य मार्ग निकाला और, शास्त्रों का अनुशरण करते हुए, अपने माता-पिता की प्रदक्षिणा करनी प्रारम्भ कर दी।
शास्त्रों के अनुसार माता-पिता भी पृथ्वी के समान होते है. माता-पिता उनकी बुद्धि की चतुरता को समझ गये़. और उन्होने भी श्री गणेश को कामना पूरी होने का आशिर्वाद दे दिया।
शर्त के अनुसार श्री गणेश का विवाह सिद्धि और रिद्धि दोनों कन्याओं से कर दिया गया।
पृथ्वी की प्रदक्षिणा कर जब कार्तिकेयन वापस लौटे तो उन्होने देखा कि श्री गणेश का विवाह तो हो चुका है. और वे शर्त हार गये है. श्री गणेश की बुद्धिमानी से कार्तिकेयन नाराज होकर श्री शैल पर्वत पर चले गये श्री शैल पर माता पार्वती पुत्र कार्तिकेयन को समझाने के लिए गई।
और भगवान शंकर भी यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में अपनी पुत्र से आग्रह करने के लिए पहुंच गयें. उसी समय से श्री शैल पर्वत पर मल्लिकार्जुन ज्योर्तिलिंग की स्थापना हुई, और इस पर्वत पर शिव का पूजन करना पुन्यकारी हो गया।
श्री मल्लिकार्जुन मंदिर निर्माण कथा इस पौराणिक कथा के अलावा भी श्री मल्लिकार्जुन ज्योर्तिलिंग के संबन्ध में एक किवदंती भी प्रसिद्ध है. किवदंती के अनुसार एक समय की बात है, श्री शैल पर्वत के निकट एक राजा था. जिसकानाम चन्द्रगुप्त था. उस राजा की एक कन्या थी।
वह कन्या अपनी किसी मनोकामना की पूर्ति हेतू महलों को छोडकर श्री शैलपर्वत पर स्थित एक आश्रम में रह रही थी. उस कन्या के पास एक सुन्दर गाय थी. प्रतिरात्री जब कन्या सो जाती थी. तो उसकी गाय का दूध को दुह कर ले जाता था।
एक रात्रि कन्या सोई नहीं और जागकर चोर को पकडने का प्रयास करने लगी. रात्रि हुई चोर आया, कन्या चोर को पकडने के लिए उसके पीछे भागी परन्तु कुछ दूरी पर जाने पर उसेकेवल वहा शिवलिंग ही मिला. कन्या ने उसी समय उस शिवलिंग पर श्री मल्लिकार्जुन मंदिर का निर्माण कार्य कराया।
प्रत्येक वर्ष यहां शिवरात्रि के अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है. वही स्थान आज श्री मल्लिका अर्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है।
इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से भक्तों की इच्छा की पूर्ति होती है. और वह व्यक्ति इस लोक में सभी भोग भोगकर, अन्य लोक में भी श्री विष्णु धाम में जाता है।
श्री मल्लिकार्जुन भ्रमराम्बिका स्तोत्रावलिः Shri Mallikarjuna Suprabhatam
ॐ नमो भगवतो बलेन भगवतो वीर्येण भगवतः कौतुका भगवतः कर्मणा भगवतः अनुज्ञाप्य । चंडादि द्वारपालेभ्यो नमः अनुज्ञाप्य
श्री मल्लिकार्जुन भ्रमराम्बिका सुप्रभात स्तोत्रम् ।।
प्रातःस्मरामि गणनाथमनाथबंधुं सिंदूरपूरपरिसेवितगंडयुग्मम् ।
उद्दंडविघ्नपरिखंडन चंड दंडमाखंडलादि सुरनायक बृंदवन्द्यम्।।1।।
कलाभ्याम् चूडालंकृत शशिकलाभ्याम् निजतपः फलाभ्याम् भक्तेषु प्रकटित फलाभ्याम भवतु मे ।
शिवाभ्यामस्तोकत्रिभुवनशिवाभ्याम् हृदि पुनर्भवाभ्यामानंदस्फुरदनुभवाभ्याम् नतिरियम् ।।2।।
नमस्ते नमस्ते महादेव शंभो नमस्ते नमस्ते दयापूर्णसिंधो ।
नमस्ते नमस्ते प्रपन्नात्मबंधो नमस्ते नमस्ते नमस्ते महेश ।।3।।
शश्वच्छ्रीगिरिमूर्धनि त्रिजगतां रक्षाकृतौ लक्षितां ।
साक्षादक्षतसत्कटाक्षसरणि श्रीमत्सुधावर्षिणीम् ।
सोमार्धांकितमस्तकाम् प्रमतां निःसीमसंपत्प्रदाम् ।
सुश्लोकाम् भ्रमराम्बिकाम् शंभोःसखीम् त्वां नुमः ।।4।।
मातःप्रसीद सदया भव भव्यशीले लीलालवाकुलित दैत्यकुलापहारे ।
श्रीचक्रराजनिलये श्रुतगीतकीर्ते श्रीशैलनाथदयिते तव सुप्रभातम् ।।5।।
शंभो सुरेंद्रनुत शंकर शूलपाणे चंद्रावतंस शिव शर्व पिनाकपाणे ।
गंगाधर क्रतुपते गरुडध्वजाप्त श्रीमल्लिकार्जुनविभो तव सुप्रभातम् ।।6।।
विश्वेश विश्वजनसेवित विश्वमूर्ते विश्वंभर त्रिपुरभेदन विश्वयोने ।
फालाक्ष भव्यगुण भोगिविभूषणेश श्रीमल्लिकार्जुनविभो तव सुप्रभातम् ।।7।।
कल्याणरूप करुणाकर कालकंठ कल्पद्रुमप्रसवपूजित कामदायिन् ।
दुर्नीतिदैत्यदलनोद्यत देव देव श्रीमल्लिकार्जुनविभो तव सुप्रभातम् ।।8।।
गौरीमनोहर गणेश्वरसेवितांघ्रे गंधर्वयक्षसुरकिन्नरगीतकीर्ते ।
गंडावलंबिफणिकुण्डलमंडितास्य श्रीमल्लिकार्जुनविभो तव सुप्रभातम् ।।9।।
नागेंद्रभूषण निरीहित निर्विकार निर्माय निश्चल निरर्गल नादभेदिन् ।
नारायणीप्रिय नतेष्टद निर्मलात्मन् श्रीपर्वताधिपविभो तव सुप्रभातम् ।।10।।
सृष्टं त्वयैव जगदेतदशेषमीश रक्षाविधिश्च विधिगोचर तावकीनः ।
संहारशक्तिरपि शंकर किंकरी ते श्रीशैलशेखरविभो तव सुप्रभातम् ।।11।।
एकस्त्वमेव बहुधा भव भासि लोके निःशंकधीर्वृषभकेतन मल्लिनाथ ।
श्रीभ्रामरीप्रिय सुखाश्रय लोकनाथ श्रीशैलशेखरविभो तव सुप्रभातम् ।।12।।
पातालगांगजलमज्जननिर्मलांगाः भस्मत्रिपुंड्रसमलंकृतफालभागाः ।
गायंति देवमुनिभक्तजना भवंतं श्रीमल्लिकार्जुन विभो तव सुप्रभातम् ।।13।।
सारस्वतांबुयुतभोगवतीश्रितायाः ब्रह्मेशविष्णुगिरिचुंबितकृष्णवेण्याः ।
सोपानमार्गमधिरुह्य भजंति भक्ताः श्रीमल्लिकार्जुन विभो तव सुप्रभातम् ।।14
श्रीमल्लिकार्जुन महेश्वरसुप्रभात स्तोत्रम् पठंति भुवि ये मनुजाः प्रभाते ।
ते सर्वसौखअयमनुभूय परानवाप्यं श्री शांभवं पदमवाप्य मुदं लभंते ।।15।।
।। श्रीमल्लिकार्जुनभ्रमराम्बिकास्तोत्रम् ।।
नमःशिवाभ्याम् नवयौवनाभ्याम् परस्पराश्लिष्टवपुर्थराभ्याम् ।
नगेंद्रकन्या वृषकेतनाभ्याम् नमो नमःशंकरपार्वतीभ्याम् ।।1।।
नमःशिवाभ्याम् वृषवाहनाभ्याम् विरिंञ्चिविष्ण्विंद्रसुपूजिताभ्याम् ।
विभूति पाटीरविलेपनाभ्याम् नमो नमःशंकरपार्वतीभ्याम् ।।2।।
अनघं जनकं जगतां प्रथमं वरदं करशूलधरं सुलभम् ।
करुणांबुनिधिं कलुषापहरं प्रणमामि महेश्वरमेकमहम् ।।3।।
अमलं कमलोद्भवगीतगुणं शमदं समदासुरनाशकरम् ।
रमणीयरुचिं कमनीयतनुं नमः सांबशिवं नतपापहरम् ।।4।।
शिवं शंकरं बंधुरं सुंदरेशं नटेशं गणेशं गिरीशं महेशं ।
दिनेशेंदुनेत्रं सुगात्रं मृडानीपतिं श्रीगिरीशं हृदा भावयामि ।।5।।
भृङ्गीच्छानटनोत्कटः करिमदग्राहि स्फुरन्माधवाह्लादो नादयुतो महासितवपुः पंचेषुणा चा धृतः ।
सत्पक्षः सुमनोवनेषु स पुनःसाक्षान्मदीये मनो राजीवे भ्रमराधिपो विहरताम् श्रीशैलवासी विभुः ।।6।।
सोमोत्तंसःसुरपरिषदामेष जीवातुरीशः पाशच्छेत्ता पदयुगजुषां पुल्लमल्लीनिकाशः ।
ध्येयो देवः प्रकटितवधूरूपवामात्मभागः श्रीशैलाग्रे कलितवसतिर्विश्वरक्षाधुरीणः ।।7।।
एणं पाणौ शिरसि तरुणोल्लासमेणांकखण्डं पार्श्वे वामे वपुषि तरुणीं दृक्षु कारुण्यलीलाम् ।
भूतिं फाले स्मितमपि मुखे गांगमंभः कपर्दे बिभ्रत्प्रेम्णा भुवनमखिलं श्रीगिरीशः स पायात् ।।8।।
श्रीशैले स्वर्णशृंगे मणिगणरचिते कल्पवृक्षालिशीते । स्फीते सौवर्ण रत्नस्फुरितनवगृहे दिव्यपीठे शुभार्हे ।
आसीनःसोमचूडःसकरुणनयनःसांगनःस्मेरवक्त्रः ।
शंभुःश्रीभ्रामरीशः प्रकटितविभवो देवतासार्वभौमः ।।9।।
या योगिबृंदहृदयांबुजराजहंसी मंदस्मितस्तुतमुखी मधुकैटभघ्ने ।
विघ्नांधकारपटभेदपटीयसी सा मूर्तिः करोतु कुतुकं भ्रमरांबिकायाः ।।10।।
कस्तूरीतिलकांचितेंदुविलस्त्प्रोद्भासिफालस्थलीं कर्पूरद्रवमिश्रचूर्णखपुरामोदोल्लसद्वीटिकाम् ।
लोलापांगतरंगितैः अतिकृपासारैर्नतानंदिनीं श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ।।11।।
राजन्मत्तमरालमंदगमनां राजीवपत्रेक्षणां राजीवप्रभवादिदेवमकुटै राजत्पदांभोरुहाम् ।
राजीवायतपत्रमंडितकुचां राजाधिराजेश्वरीं श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ।।12।।
श्रीनाथादृतपालितत्रिभुवनां श्रीचक्रसंचारिणीं गानासक्तमनोज्ञयौवनलसद्गंधर्वकन्यावृतां ।
दीनानामतिवेलभाग्यजननीम् दिव्याम्बरालंकृतां श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ।।13।।
उभौ दर्वीकुंभौ मणिकनकसंभावितगुणौ दधाना पाणिभ्याममृतरसमृष्टान्नकलितौ ।
कलाढ्या कल्याणी कलितसदना श्रीगिरिशिरस्यसौ भ्रामर्यंबा रचयतु मदिष्टार्थविभवम् ।।14।।
।। श्रीमल्लिकार्जुनप्रपत्तिः।।
जय जय जय शंभो जंभभित्पूर्वदेव प्रणतपदसरोजद्वंद्व निर्द्वंद्व बंधो ।
जय जय जय जन्मस्थेमसंहारकार प्रणयसगुणमूर्ते पालयास्मान्प्रपन्नान् ।।1।।
वधूमुखं वल्गदपांगरेखं अखंडितानंदकरप्रसादम् । विलोकयन् विस्फुरदात्मभावः स मे गतिःश्रीगिरिसार्वभौमः ।।2।।
कुरंगपाणिः करुणावलोकः सुरोत्तमश्चंद्रकलावतंसः । वधूसहायःसकलेष्टदाता भवत्यसौ श्रीगिरिभाग्यराशिः ।।13।।
संध्यारंभविजृंभितं श्रुतिशिरःस्थानांतराधिष्ठितं सप्रेमभ्रमराभिराममसकृत्सद्वासनाशोभितम् ।
भोगींद्राभरणं समस्तसुमनःपूज्यं गुणाविष्कृतं सेवे श्रीगिरिमल्लिकार्जुनमहालिंगं शिवालिंगितम् ।।14।।
या मूलं सचराचरस्य जगतः पुंसः पुराणी सखी व्यक्तात्मा परिपालनाय जगतामाप्तावतारस्थितिः ।
दुष्टध्वंस सदिष्टदानविधये नानासनाद्यासिनी श्रीशैलाग्रनिवासिनी भवतु मे श्रेयस्करी भ्रामरी ।।15।।
यत्तेजःपरमाणुरेतदखिलं नाना स्फुरन्नामभिः भूतं भावि भवच्चराचरजगद्धत्ते बहिश्चांतरे ।
सा साक्षात्भ्रमराम्बिका शिवसखी श्रीशैलवासोत्सुका दिश्यादाश्रितलोककल्पलतिका श्रेयांसि भूसांसि नः ।।16।।
शरणम् तरुणेदुशेखरःशरणमं मे गिरिराजकन्यका । शरणम् पुनरेव तावुभौ शरणम् नान्यदुपैमि दैवतम् ।।17।।
।। श्रीमल्लिकार्जुनभ्रमराम्बायाःमंगलाशासनम् ।।
उमाकांताय कांताय कामितार्थ प्रदायिने । श्रीगिरीशाय देवाय मल्लिनाथाय मङ्गलम् ।।1।।
सर्वमङ्गलरूपाय श्रीनगेंद्रनिवासिने । गंगाधराय नाथाय श्रीगिरीशाय मङ्गलम् ।।2।।
सत्यानंदस्वरूपाय नित्यानंदविधायिने । स्तुत्याय श्रुतिगम्याय श्रीगिरीशाय मङ्गलम् ।।3।।
मुक्तिप्रदाय मुख्याय भक्तानुग्रहकारिणे । सुंदरेशाय सौम्याय श्रीगिरीशाय मङ्गलम् ।।4।।
श्रीशैलेशचरणशरणाष्टकम् ।।
गौरीमनोहर सुरासुरमौनिबृंद संसेवितांघ्रियुग चंद्रकलावतंस ।
कैलासवास करुणाकर भक्तबंधो श्रीशैलवास चरणं शरणं तवास्मि ।।1।।
भक्तार्तिहार भवबंधविनाशकेश दिव्यापगा कलित कांत जटाकलाप ।
शेषाहिभूष वृषवाहन व्योमकेश श्रीशैलनाथ चरणं शरणं तवास्मि ।।2।।
भृंगीशसेवित गणेशकुमारतात मृत्युञ्जय त्रिपुरदानवभेदकारिन् ।
पाणावुपात्त मृग डामरुक त्रिशूल श्रीशैलवास चरणं शरणं तवास्मि ।।3।।
नागेंद्रचर्मवसनाग्नि रवींदु नेत्र नारायणीप्रिय महेश नगेश शंभो ।
मौनिप्रियाश्रित महाफलदोग्ररूप श्रीशैलनाथ चरणं शरणं तवास्मि ।।4।।
सर्वार्तिभंजन सदाशिव दानवारे पार्थप्रहार कलितोत्तममूर्थभाग ।
यक्षेश सेवित पदाब्ज विभूतिदायिन् श्रीशैलवास चरणं शरणं तवास्मि ।।5।।
श्रीभ्रामरीश मदनांतक कृत्तिवास सर्पास्थि रुंड कलिता मलहारधारिन् ।
भूतेश खंडपरशो भवबंधनाश श्रीशैलनाथ चरणं शरणं तवास्मि ।।6।।
सर्वागमस्तुत पवित्रचरित्र नाथ यज्ञप्रिय प्रणतदेवगणोत्तमांग ।
कल्पद्रुमप्रसवपूजितदिव्यपाद श्रीशैलवास चरणं शरणं तवास्मि ।।7।।
शंभो गिरीश हर शूलधरांधकारे श्रीशैलवास भ्रमराम्बिकया समेत ।
श्रीपार्वतीदयित साक्षिगणाधिपेड्य श्रीशैलनाथ चरणं शरणं तवास्मि ।।8।।
श्रीशैलं शिखरेश्वरं गणपतिं श्रीहाटकेशं पुनःसारंगेश्वर बिंदुतीर्थममलं घंटार्कसिद्धेश्वरं ।
गंगां श्रीभ्रमराम्बिकां गिरिसुतामारामवीरेश्वरं शंखं चक्र वराह तीर्थकलितं श्रीशैलनाथं भजे ।।9।।
।। शिवमानसपूजा ।।
रत्नैःकल्पितमासनम् हिमजलैः स्नानम् च दिव्याम्बरम् । नानारत्नविभूषितम् मृगमदामोदाङ्कितम् चंदनम् ।
जातीचंपकबिल्वपत्ररचितम् पुष्पम् च धूपम् तथा । दीपम् देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितम् गृह्यताम् ।।1।।
सौवर्णे नवरत्न खण्डरचिते पात्रे घृतम् पायसम् । भक्ष्यम् पंञ्चविधम् पयोदधियुतम् रंभाफलम् पानकम् ।
शाकानामयुतम् जलम् रुचिकरम् कर्पूरखंडोज्ज्वलम् । तांबूलम् मनसा मया विरचितम् भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ।।2।।
छत्रम् चामरयोर्युगम् व्यजनकम् चादर्शकम् निर्मलम् । वीणाभेरि मृदंग काहलकलागीतम् च नृत्यम् तथा ।
साष्टांगम् प्रणतिः स्तुतिर्भहुविधा ह्येतत्समस्तम् मया । संकल्पेन समर्पितम् तव विभो पूजाम् गृहाण प्रभो ।।3।।
आत्मा त्वम् गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरम् गृहम् । पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो । यत्कर्म करोमि तत्तदखिलम् शंभो तवाराधनम् ।।4।।
करचरणकृतम् वा कर्म वाक्कायजम् वा । श्रवण नयनजम् वा मानसम् वाऽपराधम् ।
विहितमविहितम् वा सर्वमेतत् क्षमस्व । जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शंभो ।।5।।
वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये । जगत् पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ ।।
श्रृतिस्मृति पुराणानाम् आलयं करुणालयम् । नमामि भगवत्पाद शङ्करम् लोकशङ्करम् ।।
।। सर्वं श्रीउमामहेश्वरपरब्रह्मार्पणमस्तु ।

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