Koti Devi Devta

Koti Devi Devta दुनिया के सभी देवी देवताओं और मंदिरों की जानकारी
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25/08/2026

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महादेवा पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा जय गणेश जय गणेश

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25/08/2026

सिद्धिविनायक नमो नमः श्री सिद्धिविनायक नमो नमः ॐ गं गणपतये नमो नमः ॐ गं गणपतये नमो नमः ॐ गं गणपतये नमो नमः ॐ गं गणपतये नमो नमः ॐ गं गणपतये नमो नमः

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25/08/2026

जय श्री राम जय हनुमान पवन पुत्र हनुमान की जय श्री राम भक्त हनुमान की जय सियापति रामचंद्र की जय महाबली हनुमान की जय जय श्री राम जय हनुमान पवन पुत्र हनुमान की जय श्री राम भक्त हनुमान की जय सियापति रामचंद्र की जय महाबली हनुमान की जय

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वरलक्ष्मी पूजा व्रत कथा  वरलक्ष्मी व्रतम् शुक्रवार 28, अगस्त  2026 सिंह लग्न पूजा मुहूर्त (प्रातः) - 05-56 से 07-23अवधि ...
25/08/2026

वरलक्ष्मी पूजा व्रत कथा वरलक्ष्मी व्रतम् शुक्रवार 28, अगस्त 2026
सिंह लग्न पूजा मुहूर्त (प्रातः) - 05-56 से 07-23
अवधि - 01 घण्टा 27 मिनट्स
वृश्चिक लग्न पूजा मुहूर्त (अपराह्न) - 11-45 से 14-00
अवधि - 02 घण्टे 15 मिनट्स
कुम्भ लग्न पूजा मुहूर्त (सन्ध्या) - 17-3 से 19-28
अवधि - 01 घण्टा 35 मिनट्स
वृषभ लग्न पूजा मुहूर्त (मध्यरात्रि) - 22-42 से 00-41- 29, अगस्त
अवधि - 01 घण्टा 59 मिनट्स
भगवान शिव, माता पार्वती एवं चित्रनेमि नामक भक्त की कथा प्राचीन काल का वृत्तान्त है, एक समय भगवान शिव कैलाश पर्वत के शिखर पर माता पार्वती के साथ पाशों का खेल अथवा चौसर खेल रहे थे। उसी समय भगवान शिव एवं माता पार्वती के मध्य कौन विजयी हुआ, इस पर विवाद होने लगा। वे दोनों ही स्वयं को विजयी सिद्ध कर रहे थे। उन दोनों ने वहाँ उपस्थित चित्रनेमि से विजेता का नाम पूछा। चित्रनेमि भगवान शिव का भक्त था। अतः उसने मिथ्या बोल दिया कि भगवान शिव विजयी हुये हैं। चित्रनेमि के मिथ्या भाषण से देवी पार्वती को अत्यन्त क्रोध आया तथा उन्होंने उसे शाप देते हुये कहा कि - "हे मिथ्याभाषी! तूने मेरे समक्ष मिथ्या भाषण करके, मेरा अपमान एवं अधार्मिक आचरण किया है, अतः तू कुष्ठ रोग से ग्रसित हो जा।" माता पार्वती के शाप से चित्रनेमि अत्यन्त चकित एवं भयभीत हो गया तथा त्राहिमाम् करने लगा।

तदुपरान्त भगवान शिव ने कहा - "मैंने मिथ्या भाषण से अधिक घोर एवं विकट पाप न कहीं देखा, न सुना है। किन्तु यह चित्रनेमि अत्यन्त विद्वान है, वह कभी मिथ्या भाषण नहीं करता। अतः हे देवि! आप इस असहाय पर कृपा दृष्टि कर, इसे क्षमा करें तथा इस शरणागत का उद्धार करें।"

क्रोध शान्त होने पर माता पार्वती ने दया करते हुये चित्रनेमि को शाप मोचन का मार्ग बताते हुये कहा - "जब सुन्दर सरोवर पर अप्सरायें पवित्र व्रत करेंगी तथा एकाग्रतापूर्वक तुझे सर्वस्व कहेंगी, उस समय तुम शाप मुक्त हो जाओगे।" देवी पार्वती के इतना कहते ही चित्रनेमि कैलाश से नीचे आ गिरा एवं सरोवर के निकट कोढ़ी होकर जीवन व्यतीत करने लगा।

सरोवर के समीप ही उसने अप्सराओं को पूजा-अर्चना करते हुये देखा। उन विलासिनियों को प्रणाम करते हुये चित्रनेमि ने उनसे पूछा - "हे महाभागो! आप सभी किसका पूजन कर रही हैं तथा आपकी क्या मनोकामना है। कृपया मुझे कोई ऐसी साधना बतायें जिसका फल मुझे इस लोक में तथा परलोक में भी प्राप्त हो। कृपया किसी ऐसे व्रत का वर्णन करें जिसका पालन करने से मैं माता पार्वती के उस शाप से मुक्त हो जाऊँ जो दीर्घकाल से मुझे कष्ट दे रहा है।"

उनमें से एक अप्सरा ने कहा - "यह सर्वकामनाओं की सिद्धि करने वाला एवं सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला श्री वरलक्ष्मी व्रत है। तुम भी इस सर्वोत्तम व्रत का पालन करो। जिस समय श्रावण में सूर्यदेव कर्क राशि में स्थित हों उसी समय गङ्गा, यमुना के संगम अथवा तुङ्गभद्रा नदी के तट पर उसी श्रावण मास के शुक्लपक्ष के शुक्रवार को सभी सयंमी पुरुषों को देवी महालक्ष्मी का व्रत करना चाहिये।

इस व्रत को करने हेतु माता पार्वती की चतुर्भुजी स्वर्ण प्रतिमा निर्मित करवायें तथा रंगवल्ली एवं तोरण आदि से घर को सुसज्जित करें। घर के पूर्वभाग में, विशेषतः ईशान कोण में एक प्रस्थ अर्थात् लगभग 400 ग्राम तण्डुल भूमि पर रखें। पद्म पर तीर्थ के जल से भरा एक कलश स्थापित करें। उस पर फल रखकर उसमें स्वर्ण, पीतल अथवा ताम्र धातु एवं पञ्च पल्लव डालकर वस्त्र से ढक दें। तदुपरान्त अग्न्युत्तारण आदि संस्कार सम्पन्न करने के पश्चात् प्रतिमा को विधिपूर्वक कलश पर स्थापित करके उसका पूजन करें। पूजन हेतु क्रमशः शुद्ध स्नान तथा मन्त्रों द्वारा पञ्चामृत से स्नान करवायें एवं देवीसूक्त का पाठ करते हुये अभिषेक करें। अष्टगन्ध से पूजन करके पल्लवों से पूजन करें। अश्वत्थ अर्थात् पीपल, वट, बिल्व, आम्र, मालती तथा अनार आदि के 21 पत्र लें तथा अन्य मालती आदि के पुष्प भी माता को अर्पित करें। धूप-दीप आदि से कामनाओं की पूर्ति करने वाली देवी महालक्ष्मी का पूजन करें। विभिन्न प्रकार के व्यञ्जनों सहित पायस (खीर) एवं इक्कीस अपूप (पुआ) द्वारा देवी शिवा को नैवेद्य अर्पित करें। तदुपरान्त माता से वर प्राप्ति की याचना करें। देवी सरस्वती एवं
मितभाषिणी देवी शची का ध्यान करते हुये नृत्य एवं गानादि के माध्यम से श्री लक्ष्मी जी की प्रार्थना करें।"

उपरोक्त विधि से व्रत करने के उपरान्त पाँच प्रकार के वायन, अर्थात् भोग अर्पित करके श्रद्धापूर्वक व्रत कथा का श्रवण करें। मौन रहकर पाँच आरतियों से माता का पूजन करें। इस प्रकार स्वर्ग की उन अप्सराओं ने वरलक्ष्मी व्रत के विधान का विस्तृत वर्णन किया।

व्रतधारी एक सुपारी लेकर चूर्णरहित एक पत्ते को सावधानीपूर्वक सहेजें, उसे एक वस्त्र के टुकड़े में बाँधकर प्रातःकाल उसका अवलोकन करें। यदि वह ठीक प्रकार से लाल हो जाये तो व्रत करें अन्यथा भूमि की कामना करने वाले को यह व्रत नहीं करना चाहिये। उपरोक्त विधान से ही व्रत ग्रहण करें। समस्त मनोरथों की सिद्धि करने वाले इस व्रत को अप्सराओं ने विधिपूर्वक सम्पन्न किया। पूजन सम्पन्न करने के उपरान्त अप्सराओं ने चित्रनेमि की ओर देखा तो वह धूप के धूम्र एवं घृत के दीपक के प्रभाव से कुष्ठ रहित हो गया था तथा स्वर्ण के समान कान्तिवान हो गया था।

चित्रनेमि ने उन सभी देवियों से कहा - "मैं भी यत्नपूर्वक इस सिद्धिदाता व्रत को अवश्य करूँगा।" चित्रनेमि ने दिव्य वस्त्राभूषणों से युक्त देवी की प्रतिमा निर्मित करवायी तथा पूर्वोक्त विधि-विधान से उनका पूजन किया। वेणु के पात्र, दक्षिणा, फल, अन्न तथा इक्कीस पकवानों से पाँच प्रकार के वायन देवी माँ को अर्पित किये। विप्र, यति, देवी, ब्रह्मचारी तथा सुवासिनी स्त्री को एक-एक वायन अर्पित किया। इस प्रकार पाँच वायन अर्पित करके देवी माँ के चरणों में नमन करके वह अपने निवास स्थान की ओर चल दिया।

चूर्णरहित नागवल्ली अर्थात् पान का एक पत्ता तथा सुपारी वस्त्र में बाँधकर प्रातःकाल उसका अवलोकन किया तो पाया कि वह लाल हो चुका था। उसे लाल देखकर चित्रनेमि ने भक्तिपूर्वक व्रत किया। व्रत के फलस्वरूप देवी माँ ने उसे दर्शन दिया जिससे वह शापमुक्त हो गया। व्रत सम्पन्न करने के उपरान्त वह भगवान शिव के समक्ष कैलाश पर्वत पर पहुँचा। कैलाश पहुँचकर चित्रनेमि ने श्रद्धापूर्वक भगवान शिव एवं देवी पार्वती को प्रणाम किया।

देवी पार्वती ने उससे कहा - "हे चित्रनेमि! तू मेरे पुत्र के समान ही पालनीय एवं रक्षणीय है। इस तथ्य को सत्य समझ।" चित्रनेमि ने कहा - "हे माता! देवी वरलक्ष्मी की कृपा से ही मुझे आपके इन पावन चरण कमलों का दर्शन एवं आश्रय प्राप्त हुआ है। आप मुझ पर सदैव कृपा करें।"

तदुपरान्त भगवान शिव ने चित्रनेमि से कहा - "इस पुण्यप्रदायक वर लक्ष्मी व्रत के प्रभाव से तुम इसी क्षण से कैलाश पर यथेष्ट भोगों को भोगकर अन्त समय में वैकुण्ठ लोक को प्राप्त करोगे। पूर्वकाल में पुत्र प्राप्ति की कामना से देवी पार्वती ने भी इस व्रत का पालन किया था। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से ही उन्हें पुत्र कार्तिकेय की प्राप्ति हुयी थी। विक्रमादित्य को इस व्रत के प्रभाव से राज्य प्राप्त हुआ था तथा नन्द को सुलक्षणा स्त्री की प्राप्ति हुयी थी। नन्द की स्त्री ने भी पुत्र प्राप्ति हेतु यह व्रत किया था जिससे उसे तीनों लोकों का पालन करने में समर्थ पुत्र की प्राप्ति हुयी थी। अतः तुम इस व्रत के फलस्वरूप नाना प्रकार के दुर्लभ सुखों को भोगोगे।"

उसी दिन से यह वरलक्ष्मी व्रत समस्त संसार में लोकप्रिय हो गया। उस दिन से जो भी प्राणी इस व्रत का पालन करता है, वह विभिन्न सुखों को भोगकर अन्त में शिवपुर को प्रस्थान करता है। हे विप्रों! इस प्रकार मैंने वरलक्ष्मी व्रत का सम्पूर्ण वर्णन किया है। जो भी प्राणी श्रद्धापूर्वक एवं एकाग्रता से इस कथा का पाठ एवं श्रवण करेगा, वह अवश्य ही देवी वरलक्ष्मी की कृपा से शिवपुर को गमन करेगा। इस प्रकार भविष्यपुराण में वर्णित श्रावण शुक्रवार को किया जाने वाला वरलक्ष्मी व्रत सम्पूर्ण होता है।
इति श्री वरलक्ष्मी व्रत कथा सम्पूर्ण
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हनुमत्पञ्जरस्तोत्रम्श्रीपराशरसंहितान्तर्गते चतुस्सप्ततितमः पटलःहनुमत्पञ्जरकथनं -पराशरः -पञ्जरन्तु प्रवक्ष्यामि श‍ृणु मैत...
25/08/2026

हनुमत्पञ्जरस्तोत्रम्
श्रीपराशरसंहितान्तर्गते चतुस्सप्ततितमः पटलः
हनुमत्पञ्जरकथनं -
पराशरः -
पञ्जरन्तु प्रवक्ष्यामि श‍ृणु मैत्रेय ! आदरात् ॥ १॥
अस्य पञ्जरस्य ऋषिः श्रीरामचन्द्र भगवानिति च
छन्दोऽनुष्टुप् । श्रीपञ्चवक्त्रहनुमान देवतेति च । ह्रां बीजम् ।
स्वाहा शक्तिः । प्रणवो कीलकं स्मृतः । मन्त्रोक्त
देवताप्रसादसिध्यर्थे विनियोगः ।
दीर्घयामाययायुक्तैः षडङ्गैः परिकीर्तितः ।
रामदूत, वानरमुख, वायुनन्दन तथा नृसिंहमुखपूर्वकं
अञ्जनासूनुः परञ्च । गरुडमुख च तथा हरिमर्कट पदं परम् ।
क्रोडमुखं पदञ्चान्तं रामकार्यधुरन्धरः ।
ततो अश्वमुखञ्चान्तम् । सर्वराक्षसनाशनः ।
सर्वेमुखशब्दान्ताः सर्वं चतुर्घ्यं तं गताः ।
षडङ्गे कराङ्गादयो ह्रां षट्कादिभिस्संयुतम् । न्यसेत्सर्व मनन्यधीः ।
ततो ध्यानं पठित्वातु पूर्वोक्तमार्गतो वापि पञ्जरमारभेत्ततः ॥ २॥
आदौ प्रणवमुच्चार्यं वन्दे हरिपदं ततः ।
उच्चार्य मर्कटपदं मर्कटायेति चोच्चरेत् ॥ ३॥
अग्निजायां समुच्चार्य द्वादशार्णो महामनुः ॥ ४॥

शिरः पातु मम सदा सर्वसौख्यप्रदायकः ॥ ५॥

आदौ प्रणवमुच्चार्य कपिबीजं ततोच्चरेत् ।
नृसिंहबीजमुच्चार्य गारुडञ्च समुच्चरेत् ॥ ६॥

वराहबीजमुच्चार्य हयग्रीवं ततोच्चरेन् ।
नमः पदं ततोच्चार्य स पञ्चास्य महाकपेः ।
चतुर्दशार्णमन्त्रोऽयं मुखं पायात्सदा मम ॥ ७॥

आदौ प्रणवमुच्चार्य नमो भगवते पदं ।
पञ्चवदनाय चोच्चार्य पूर्वमुखेति चोच्चरेत् ॥ ८॥

वानरं बीजमुच्चार्य कपिमुखाय चोच्चरेत् ।
सर्वशत्रुहरायेति महाबलाय चोच्चरेत् ॥ ९॥

अग्निजायां ततोच्चार्य सप्तत्रिंशाक्षराभिधः ।
कण्ठं मम सदा पातु सर्वशत्रुविनाशकः ॥ १०॥

उच्चार्यं प्रणवं चादौ नमो भगवतेतिच ।
नारसिंह महाबीज करालपदमुच्चरेत् ॥ ११॥

नृसिंहाय पदं चोक्त्या सकलभूतप्रेतच ।
पिशाच्चब्रह्मराक्षस प्रमथनाय पदं वदेत् ॥ १२॥

अग्निजायां ततोच्चार्य वसु वेदार्णको मनुः ।
हृदयं मे सदा पातु सर्वशत्रुविनाशकः ॥ १३॥

ॐ नमो भगवतेति पञ्चवदनाय ततः ।
पश्चिममुखेति चोच्चार्य गारुडं बीजमुच्चरेत् ॥ १४॥

वीरगरुडाय महाबलायेति पदं ततः ।
सर्वनाग प्रमथना यान्ते सकलविषेति ॥ १५॥

हराय स्वाहा त्वं ततः वेदाभ्यक्षरसंयुतः ।
हनुमन्ममोदरं पातु सर्वरोगनिबर्हणः ॥ १६॥

ॐ नमो भगवतेति पञ्चवदनाय ततः ।
उत्तरमुखे चोज्चार्यं क्रोडवाग्बीजमुच्चरेत् ॥ १७॥

आदिवाराह सर्वसम्पत्प्रदाय निधि भूमिच ।
प्रदाय पश्चाज्ज्वरेति रोग निकृन्तन स्वाहा ॥ १८॥

नाभिं पातु मम सदा सुखसौभाग्य हेतुकः ।
नेत्र बाणार्णको मनोः पश्चात्प्रणवमुच्चरेत् ॥ १९॥

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय पदं ततः ।
ऊर्ध्वमुखेत्यन्ते हयबीजं ततः परम् ॥ २०॥

हयग्रीवाय सकलप्रदाय सकलेतिच ।
जनवशीकरणाय सकल दानवान्तकाय ॥ २१॥

पश्चात्प्राज्ञाय स्वाहेति षट्पञ्चाशद्वर्णको मनुः ।
मम जानुद्वयं पातु सर्व राक्षसनाशकः ॥ २२॥

ॐ च ह्रीमित्ययं चोक्त्वा नमो भगवते ततः ।
ब्रह्मास्त्रसंहारकाय राक्षसकुलनाशयेति ॥ २३॥

पताक हनुमतेति मायाबीजत्रयं ततः ।
क्रोडास्त्र वह्निजायां तं मनुः पादद्वयं मम ॥ २४॥

ह्रां नमः पञ्चवक्त्राय नाभिदेशं सदा मम ।
ह्रीं नमः पञ्चवक्त्राय पातु जङ्घद्वयं मम ।
ह्रूं नमः पञ्चवक्त्राय पातु जानुद्वयं मम ।
ह्रैं नमः पञ्चवक्त्राय पादद्वन्द्वं सदावतु ।
ह्रौं नमः पञ्चवक्त्राय कटिदेशं सदावतु ।
ह्रः नमः पञ्चवक्त्राय चोदरं पातु सर्वदा ।
ऐं नमः पञ्चवक्त्राय हृदयं पातु सर्वदा ।
क्लां नमः पञ्चवक्त्राय बाहुयुग्मं सदावतु ।
क्लीं नमः पञ्चवक्त्राय करयुग्मं सदा मम ।
क्लूं नमः पञ्चवक्त्राय कण्ठदेशं सदावतु ।
क्लैं नमः पञ्चवक्त्राय चुबुकं मे सदावतु ।
क्लौं नमः पञ्चवक्त्राय पातु चोष्ठद्वयं मम ।
क्लः नमः पञ्चवक्त्राय नेत्रयुग्मं सदावतु ।
रां नमः पञ्चवक्त्राय शोत्रयुग्मं सदावतु ।
रीं नमः पञ्चवक्त्राय फालं पातु महाबलः ।
रूं नमः पञ्चवक्त्राय शिरः पायात्सदा मम ।
रैं नमः पञ्चवक्त्राय शिखां मम सदावतु ।
रौं नमः पञ्चवक्त्राय मूर्धानं पातु सर्वदा ।
रः नमः पञ्चवक्त्राय मुखं पातु सदा मम ।
क्ष्रां नमः पञ्चवक्त्राय श्रोत्रयुग्मं सदावतु ।
क्ष्रीं नमः पञ्चवक्त्राय नेत्रयुग्मं सदा मम ।
क्ष्रूं नमः पञ्चवक्त्राय पातु चोष्ठद्वयं मम ।
क्ष्रैं नमः पञ्चवक्त्राय भॄयुग्मं पातु सर्वदा ।
क्ष्रौं नमः पञ्चवक्त्राय नासिकां पातु सर्वदा ।
क्षः नमः पञ्चवक्त्राय कण्ठं पातु कपीश्वरः ।
ग्लां नमः पञ्चवक्त्राय पातु वक्षस्थलं मम ।
ग्लीं नमः पञ्चवक्त्राय बाहुयुग्मं सदा मम ।
ग्लूं नमः पञ्चवक्त्राय करयुग्मं सदावतु ।
ग्लैं नमः पञ्चवक्त्राय मम पातु वलित्रय ।
ग्लौं नमः पञ्चवक्त्राय चोरदं पातु सर्वदा ।
ग्लः नमः पञ्चवक्त्राय नाभिं पातु सदा मम ।
आं नमः पञ्चवक्त्राय वानराय कटिं मम ।
ईं नमः पञ्चवक्त्राय ऊरुयुग्मं सदावतु ।
ऊं नमः पञ्चवक्त्राय जानुद्वन्द्वं सदा मम ।
ऐं नमः पञ्चवक्त्राय गुल्फद्वन्द्वं सदावतु ।
औं नमः पञ्चवक्त्राय पादद्वन्द्वं सदावतु ।
अः नमः पञ्चवक्त्राय सर्वाङ्गानि सदावतु ॥ २५॥

वानरः पूर्वतः पातु दक्षिणे नरकेसरिः ।
प्रतीच्यां पातु गरुड उत्तरे पातु सूकरः ।
ऊर्ध्वं हयाननः पातु सर्वतः पातु मृत्युहा ॥ २६॥

वानरः पूर्वतः पातु आग्नेय्यां वायुनन्दनः ।
दक्षिणे पातु हनुमान् निरृते केसरीप्रियः ॥ २७॥

प्रतीच्यां पातु दैत्यारिः वायव्यां पातु मङ्गलः ।
उत्तरे रामदासस्तु निम्नं युद्धविशारदः ॥ २८॥

ऊर्ध्वे रामसखः पातु पाताले च कपीश्वरः ।
सर्वतः पातु पञ्चास्यः सर्वरोगविकृन्तनः ॥ २९॥

हनुमान पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः ।
पातु प्रतीचि मक्षघ्नो उदीच्यां सागरतारकः ॥ ३०॥

ऊर्ध्वं केसरीनन्दनः पात्वधस्ताद्विष्णुभक्तः ।
पातु मध्यप्रदेशेतु सर्वलङ्का विदाहकः ॥ ३१॥

एवं सर्वतो मां पातु पञ्चवक्त्रः सदा कपिः ॥ ३२॥

सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं मम सर्वदा ।
वायुनन्दनः फालं मे महावीरः भ्रूमध्यमम् ॥ ३३॥

नेत्रे छायापहारीच पातु श्रोत्रे प्लवङ्गमः ।
कपोलौ कर्णमूलेच पातु श्रीरामकिङ्करः ॥ ३४॥

नासाग्रमञ्जनासूनुः पातु वक्त्रः हरीश्वरः ।
पातु कण्ठच दैत्यारिः स्कन्धौ पातुसुरार्चितः ॥ ३५॥

जानौ पातु महातेजः कूर्परौ चरणायुधः ।
नखान् नखायुधः पातु कक्षं पातु कपीश्वरः ॥ ३६॥

सीताशोकापहारीतु स्तनौ पातु निरन्तरम् ।
लक्ष्मणप्राणदाताऽसौ कुक्षि पात्वनिशं मम ॥ ३७॥

वक्षौ मुद्रापहारीच पातु भुजायुधः ।
लखिणीभञ्जनः पातु पृष्ठदेशे निरन्तरम् ॥ ३८॥

नाभिञ्च रामदासस्तु कटिं पात्वनिलात्मजः ।
गुह्यं पातु महाप्राज्ञः सन्धौ पातु शिवप्रियः ॥ ३९॥

ऊरूच जानुनी पातु लङ्काप्रासादभञ्जनः ।
जङ्घौ पातु कपिश्रेष्ठः गुल्फो पातु महाबलः ॥ ४०॥

अचलोद्धारकः पातु पादौ भास्करसन्निभः ।
अङ्गान्यमितसत्वाढ्यः पातु पादाङ्गुलिस्सदा ॥ ४१॥

सर्वाङ्गानि महाशूरः पातु मां रोमवान् सदा ।
भार्यां पातु महातेजः पुत्रान् पातु नखायुधः ॥ ४२॥

पशून् पञ्चाननः पातु क्षेत्रं पातु कपीश्वरः ।
बन्धून् पातु रघुश्रेष्ठः दासः पवनसम्भवः ॥ ४३॥

सीता शोकापहारी सः गृहान् मम सदावतु ॥ ४४॥

हनूमत्पञ्जरं यस्तु पठेद्विद्वान् विचक्षणः ।
स एष पुरुषश्रेष्ठो भक्ति मुक्तिञ्च विन्दति ॥ ४५॥

कालत्रयेऽप्येककाले पठेन्मासत्रयं नरः ।
सर्वशत्रून् क्षणे जित्वा स्वयञ्च विजयी भवेत् ॥ ४६॥

अर्धरात्रौ जले स्थित्वा सप्तवारं पठेद्यदि ।
क्षयापस्मारकुष्ठादि तापज्वरनिवारणम् ॥ ४७॥

अर्कवारेऽश्वत्थमूले स्थित्वा पठति यः पुमान् ।
स पुमान् श्रियमाप्नोति सङ्ग्रामे विजयी भवेत् ॥ ४८॥

अनेन मन्त्रितं चापि यः पिबेत् रोगपीडितः ।
स नरो रोगनिर्मुक्तः सुखी भवति निश्चयः ॥ ४९॥

यो नित्यं ध्यायेद्यस्तु सर्वमन्त्रविनिर्मितम् ।
तं दृष्ट्वा देवतास्सर्वे नमस्यन्ति कपीश्वरम् ॥ ५०॥
राक्षसास्तु पलायन्ते भूता धावन्ति सर्वतः ॥ ५१॥
इदं पञ्जरमज्ञात्वा यो जपन्मन्त्रनायकम् ।
न शीघ्रं फलमाप्नोति सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ५२॥
त्रिकालमेककालं वा पञ्जरं धारयेच्छुभम् ।
पञ्जरं विधिवज्जप्त्वा स्तोत्रैः वेदान्तसम्मितैः ।
तोषयेदञ्जनासूनुं सर्वराक्षसमर्दनम् ॥ ५३॥
इतीदं पञ्जरं यस्तु पञ्चवक्त्रहनूमतः ।
धारयेत् श्रावयेद्वापि कृतकृत्यो भवेन्नरः ॥ ५४॥
इति श्रीपराशरसंहितायां श्रीपराशरमैत्रेयसंवादे
श्रीपञ्चमुखहनुमत्पञ्जरं नाम चतुस्सप्ततितमः पटलः

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हनुमत्प्रसादस्तोत्रम्विलासो वैदेहीहृदयकमलोन्मीलनकला-विदग्धो वाचां यः समभवदशोकावनितले ।प्रमाद्यल्लङ्केशस्मयविदलनोद्दाममहि...
25/08/2026

हनुमत्प्रसादस्तोत्रम्
विलासो वैदेहीहृदयकमलोन्मीलनकला-
विदग्धो वाचां यः समभवदशोकावनितले ।
प्रमाद्यल्लङ्केशस्मयविदलनोद्दाममहिमा
स दद्यादस्माकं सुरभिरिह वाचां मधुरताम् ॥ १॥
त्विषामीशं देवं वियति समुदञ्चत्स्वकिरणं
सुरद्रोर्मन्वानः फलमिति परीपाकमधुरम् ।
ग्रहीतुं तं मातुर्बहिरवतरन्नेव जठरात्
समुद्युक्तो योऽभूत् स वितरतु घाटीं मम गिराम् ॥ २॥
तुरासाहि स्तोकं रचितवति यस्मिन्नविनयं
वितन्वन्तं स्तब्धं बधिरमवशं लोकमखिलम् ।
समाधातुं कॢप्तं कति कति समीरं स्तुतिगिरः
समन्ताद्वैधात्र्यो दिवि समुदिता नः स शरणम् ॥ ३॥
तपस्तप्त्वा तीव्रं जगति शरदां यच्छतमहो
सुराणां सर्वेषां समभिलषितं चाप्यसुलभम् ।
तदस्मिन् ब्रह्मास्त्रं समजनि यया कुण्ठितबलं
नमस्तस्यै शक्त्यै प्रणतजनगत्यै भवतु मे ॥ ४॥
पुरस्तादुल्लोलोच्चलदलघुवीचीतरलितं
पयोधिं संवीक्ष्य द्रुतगलितधैर्ये कपिकुले ।
जजृम्भे गम्भीरा तनुरधिमहेन्द्रक्षितिधरं
यदीया दिव्या सा भवतु मम भव्याय महते ॥ ५॥
महावेगे तस्मिन् तरति जलधिं साह्यविधये
समायाताः केचिन्न परिगणिताः कार्यवशतः ।
विनश्यद्विश्वासे मरणशरणे दुर्गतजने
सुखं वा दुःखं वा किमु कलयते कार्यपरता ॥ ६॥
गभीरप्रोन्मीलन्नतवलितनाभीविलसितं
मदोद्यल्लोलम्बद्युतिरुचिररोमावलियुतम् ।
समुन्मीलत्सान्द्रत्रिवलिजितगङ्गाम्बुललितं
नताङ्गीवृन्दं को भवति विमुखो वीक्ष्य यदृते ॥ ७॥
स्फुटन्मल्लीमालाकलितकबरीभाररुचिराः
समञ्चद्वक्षोजद्वयविहतकोकीमदभराः ।
समृध्यत्तारुण्या निशि विवसना वीक्ष्य युवती-
र्विना तं धीराग्र्यं जगति गणयेत् तुच्छमिह कः ॥ ८॥
त्रिलोकीकल्याणी त्रिषवणपराणामभिमता
त्रयीवेद्या स्तुत्या त्रिदशपतिसन्त्राणनिपुणा ।
दिदीपे शाखेव क्षितिनिपतिता प्रोन्नततरो-
रशोकोद्याने यन्नयनसुभगा दीप्तिकलिका ॥ ९॥
दयासारद्रोणी दरदलितपङ्केरुहरुचिः
शरज्ज्योत्स्नाधारा शमधनजनानन्दजननी ।
अशोकोद्यानेऽर्चिःकलितकरुणी कापि रुरुचे
यदग्रे कल्याणी कलयतु स नः कामितमिह ॥ १०॥
विलुप्ते विश्वासे विगतवति धैर्ये द्रुमतले
निरूपाभिर्हंहो विनयरहिताभिः परिवृतौ ।
निदेशे यो भावः समजनि रहो भूषणवरे
चिराद् दृष्टे देव्या तमनुगदितुं को नु चतुरः ॥ ११॥
पटीयान् पाथोधेः सलिलमखिलं शोषकलिलं
विधातुं लङ्कां वा भसितकलुषां मारुतसखः ।
यदीयं वालाग्रं स्वयमधिगतो नादहदहो
स मे देवो हार्दं व्यपनयतु गाढान्धतमसम् ॥ १२॥
समुत्साहं ब्रूमः कथमिव कपीनां यदुदिते
समुत्कण्ठा सर्वङ्कषपटुनि गम्भीरवचसि ।
अहो दृष्टा सीतेत्यमृतरसनिष्यन्दमधुरे
निषोदद्बालानामिव स जयतान्मातृवचने ॥ १३॥
यदानीते सान्द्रस्फुरदनुपमानन्दलहरी
यथा धेनोर्वत्सेऽस्रवदिव जगन्मूर्तिहृदये ।
स देवीमूर्धालङ्करणमहिते दृष्टिविषये
मणौ स्यान्मे भूत्यै प्रणतजनचिन्तामणिवरे ॥ १४॥
जयतु जयतु रम्यं ब्रह्मचर्यस्य भाग्यं
जयतु जयतु देव्या अञ्जनायाश्च भाग्यम् ।
जयतु च रघुवीरे भक्तिमद्भागधेयं
जयतु विशरणानां पक्त्रिमं भागधेयम् ॥ १५॥
भैरोजीरङ्गनाथेन कृतं स्तोत्रं हनूमतः ।
भूयाद् भूत्यै रसविदां भक्तिभाजां हनूमति ॥ १६॥
इति (भैरोजी) रङ्गनाथकृतं श्रीहनुमत्प्रसादस्तोत्रं सम्पूर्णम्

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एकादश मुखि हनुमत्कवचम् एकादशमुखी हनुमानजी महात्म्यशंकर जी बोले हे उमा ! परम भक्ति पद एकादश मुखी हनुमान जी का चरित्र ,इन्...
25/08/2026

एकादश मुखि हनुमत्कवचम् एकादशमुखी हनुमानजी महात्म्य
शंकर जी बोले हे उमा ! परम भक्ति पद एकादश मुखी हनुमान जी का चरित्र ,इन्द्रियों से फ़ांस छुड़ाने वाला, इस संसार सागर से मोक्ष दिलाने वाला, सब संकट, दु:ख,ताप, भय को हरने वाला है। सुनो
दोहा भए पुकारत सुरन्ह सब, त्राहि त्राहि परमेश।
सीय रमन करुन अयन, हरहु हमर कलेश।।
शिवजी कहते है कि - कालकारमुख नामक एक भयानक बलवान राक्षस हुआ। ग्यारह मुख वाले उस विकराल राक्षस ने बहुत काल तक ब्रम्हा जी की कठोर ताप किया। उसके ताप से प्रसन्न हो कर ब्रम्हा जी ने कालकार मुख राक्षस से कहा की हे तात मुझसे वर मांगो।
असुर बोला कि हे कर्तार-आप मुझे ऐसा वर दीजिये -"मुझे कोई भी जीत न पावे रण में सामने काल भी क्यों न हो! जो मेरे जनम की तिथि पर ग्यारह मुख धारण करे वही मुझे मारे "तथास्तु कहकर चतुरानन ब्रम्हा जी अन्तर्ध्यान हो गए।
वरदान पाकर अभिमानी असुर जगत में मनमानी करने लगा। उसने देवताओ के सभी अधिकार छीन लिए तथा श्रुतियो के सभी आचार भ्रष्ट कर दिए। संसार अति त्रस्त हो गया एवं अपार हाहाकार मच गया। सभी देहधारियो ,देवताओ ने पुकारा हे परमेश्वर बचाओ हे करुणा के घर सीतारमण जू हमारे क्लेश हरिये।
दोहा निशिचरपति के कंठ पुनि,झपटि गहेउ हनुमंत।
उदेउ गगन महँ ताहि ले,अतिशय वेग तुरंत।।
शिवजी कहते है कि -हे भवानी ! देवताओ की आर्त वाणी को सुनकर प्रभु रामजी ने हनुमान जी से कहा -"हे-कपि ! महावीर! हनुमान !अतुलित बल,बुद्धि, तथा ज्ञान के निधान तुम्हारा नाम संकट मोचन है उसे यथार्थ करो। धर्म भारी संकट में पड़ गया है उसे निस्तार करो "
प्रभु की आज्ञा सादर शिरोधार्य कर कपीश हनुमान जी ने एकादश मुख रूप ग्रहण करके, जगत में सुख की राशि बनकर चैत्र पूर्णिमा को शनिश्चर के दिन -उस राक्षस के जनम तिथि एवं दिन के समय प्रकट हुए देवताओ को जय एवं सुख की शिला देने ! यह सुनते ही असुर अपने संग विशाल सेना लिए दौड़ा ! दुष्ट को देखकर कुपित हनुमंत जू तुरंत अनल के समान भभक उठे तथा क्षण में उन्होंने सभी खल-दल को नस्ट कर दिया, देखकर आकाश में देवता प्रफुल्लित हुए !फिर हनुमंत जू ने झपटकर राक्षसपति के कंठ पकडे और उसे लेकर तुरंत अतिशय वेग से गगन में उड़े !
दोहा -देवी धसि पताल महँ , पड़तहि चाप महान ! एकादश मुख धारिके , बैठी रहेउ हनुमान
एकादशमुखिहनुमत्कवचम्
यह कवच महात्मा अगस्त्य जी ने लोपामुद्रा ने उनसे अभिलाषा कही थी जिसके उत्तर मे ब्रह्माजी के द्वारा कथित यह कवच बताया था
ब्रह्माजी के द्वारा कथित यह कवच वाद-विवाद, भयानक दुःख-कष्ट, ग्रहभय, जलभय ,सर्पभय,राजभय, शस्त्रभय किसी भी प्रकार का भय इसके पाठ करने से नहीं रहता
तीनो संध्यो में इसका पाठ करने निःसंदेह लाभ मिलता है। इस कवच को विभीषण ने छंदोबद्ध किया था और गरुड़जी ने लेखन करवाया था। इस कवच के माहात्म्य के अनुसार जो इसका नित्य पाठ करेगा उसके हाथो में सभी सिद्धिया निवास करेगी। इसलिए सिद्धिया प्राप्त करने वाले साधक अभिलाषी को इसका अवश्य नित्य पाठ करना चाहिए।
एकादशमुखिहनुमत्कवचम् ॥ (रुद्रयामलतः) पाठ
ॐ श्रीसमस्तजगन्मङ्गलात्मने नमः ।
श्रीदेव्युवाच
शैवानि गाणपत्यानि शाक्तानि वैष्णवानि च ।
कवचानि च सौराणि यानि चान्यानि तानि च ॥ १॥
श्रुतानि देवदेवेश त्वद्वक्त्रान्निःसृतानि च ।
किञ्चिदन्यत्तु देवानां कवचं यदि कथ्यते ॥ २॥
ईश्वर उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सावधानावधारय ।
हनुमत्कवचं पुण्यं महापातकनाशनम् ॥ ३॥
एतद्गुह्यतमं लोके शीघ्रं सिद्धिकरं परम् ।
जयो यस्य प्रगानेन लोकत्रयजितो भवेत् ॥ ४॥
ॐ अस्य श्रीएकादशवक्त्रहनुमत्कवचमालामन्त्रस्य
वीररामचन्द्र ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीमहावीरहनुमान् रुद्रो देवता ।
ह्रीं बीजं । ह्रौं शक्तिः । स्फें कीलकम् ।
सर्वदूतस्तम्भनार्थं जिह्वाकीलनार्थं,
मोहनार्थं राजमुखीदेवतावश्यार्थं
ब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीभूतप्रेतादिबाधापरिहारार्थं
श्रीहनुमद्दिव्यकवचाख्यमालामन्त्रजपे विनियोगः ।
ॐ ह्रौं आञ्जनेयाय अङ्गुष्ठभ्यां नमः ।
ॐ स्फें रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ स्फें वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ स्फें अञ्जनीगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ स्फें रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं आञ्जनेयाय हृदयाय नमः ।
ॐ स्फें रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ स्फें वायुपुत्राय शिखायै वषट् ।
ॐ ह्रौं अञ्जनीगर्भाय कवचाय हुम् ।
ॐ स्फें रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय अस्त्राय फट् ।
इति न्यासः ।
अथ ध्यानम् ।
ॐ ध्यायेद्रणे हनुमन्तमेकादशमुखाम्बुजम् ।
ध्यायेत्तं रावणोपेतं दशबाहुं त्रिलोचनं
हाहाकारैः सदर्पैश्च कम्पयन्तं जगत्त्रयम् ।
ब्रह्मादिवन्दितं देवं कपिकोटिसमन्वितं
एवं ध्यात्वा जपेद्देवि कवचं परमाद्भुतम् ॥
दिग्बन्धाः
ॐ इन्द्रदिग्भागे गजारूढहनुमते ब्रह्मास्त्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ अग्निदिग्भागे मेषारुढहनुमते अस्त्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ यमदिग्भागे महिषारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ निऋर्तिदिग्भागे नरारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेताल समूहो च्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ वरुणदिग्भागे मकरारूढहनुमते प्राणशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ वायुदिग्भागे मृगारूढहनुमते अङ्कुशशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ कुबेरदिग्भागे अश्वारूढहनुमते गदाशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ ईशानदिग्भागे राक्षसारूढहनुमते पर्वतशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ अन्तरिक्षदिग्भागे वर्तुलहनुमते मुद्गरशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ भूमिदिग्भागे वृश्चिकारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
ॐ वज्रमण्डले हंसारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनी वेताल समूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।
मालामन्त्रः। । ।
ॐ ह्रीं यीं यं प्रचण्डपराक्रमाय एकादशमुखहनुमते हंसयतिबन्ध-मतिबन्ध-वाग्बन्ध-भैरुण्डबन्ध-भूतबन्धप्रेतबन्ध-पिशाचबन्ध-ज्वरबन्ध-शूलबन्धसर्वदेवताबन्ध-रागबन्ध-मुखबन्ध-राजसभाबन्धघोरवीरप्रतापरौद्रभीषणहनुमद्वज्रदंष्ट्राननाय
वज्रकुण्डलकौपीनतुलसीवनमालाधराय सर्वग्रहोच्चाटनोच्चाटनाय
ब्रह्मराक्षससमूहोच्चाटानाय ज्वरसमूहोच्चाटनाय राजसमूहोच्चाटनाय
चौरसमूहोच्चाटनाय शत्रुसमूहोच्चाटनाय दुष्टसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ १ ॥
ॐ वीरहनुमते नमः ।
ॐ नमो भगवते वीरहनुमते पीताम्बरधराय कर्णकुण्डलाद्याभरणालङ्कृतभूषणाय किरीटबिल्ववनमालाविभूषिताय कनकयज्ञोपवीतिने कौपीनकटिसूत्रविराजिताय
श्रीवीररामचन्द्रमनोभिलषिताय लङ्कादिदहनकारणाय घनकुलगिरिवज्रदण्डाय अक्षकुमारसंहारकारणाय ॐ यं ॐ नमो भगवते रामदूताय फट् स्वाहा ॥
ॐ ऐं ह्रीं ह्रौं हनुमते सीतारामदूताय सहस्रमुखराजविध्वंसकाय
अञ्जनीगर्भसम्भूताय शाकिनी डाकिनी विध्वंसनाय किलिकिलिचुचु कारेण विभीषणाय वीरहनुमद्देवाय ॐ ह्रीं श्रीं ह्रौ ह्रां फट् स्वाहा ॥
ॐ श्रीवीरहनुमते हौं ह्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं ह्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रौं ह्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ ह्रां श्रीवीरहनुमते ह्रौं हूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रैं हुं फट् स्वाहा ।
ॐ ह्रां पूर्वमुखे वानरमुखहनुमते लं
सकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ आग्नेयमुखे मत्स्यमुखहनुमते रं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ दक्षिणमुखे कूर्ममुखहनुमते मं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ नैऋर्तिमुखे वराहमुखहनुमते क्षं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ पश्चिममुखे नारसिंहमुखहनुमते वं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ वायव्यमुखे गरुडमुखहनुमते यं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ उत्तरमुखे शरभमुखहनुमते सं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ ईशानमुखे वृषभमुखहनुमते हूं आं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ ऊर्ध्वमुखे ज्वालामुखहनुमते आं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ अधोमुखे मार्जारमुखहनुमते ह्रीं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ सर्वत्र जगन्मुखे हनुमते स्फ्रूं
सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीसीतारामपादुकाधराय महावीराय वायुपुत्राय कनिष्ठाय ब्रह्मनिष्ठाय एकादशरुद्रमूर्तये महाबलपराक्रमाय भानुमण्डलग्रसनग्रहाय चतुर्मुखवरप्रसादाय
महाभयरक्षकाय यं हौं ।
ॐ हस्फें हस्फें हस्फें श्रीवीरहनुमते नमः एकादशवीरहनुमन् मां रक्ष रक्ष शान्तिं कुरु कुरु तुष्टिं कुरु करु पुष्टिं कुरु कुरु महारोग्यं कुरु कुरु अभयं कुरु कुरु अविघ्नं कुरु कुरु महाविजयं कुरु कुरु सौभाग्यं कुरु कुरु सर्वत्र विजयं कुरु कुरु महालक्ष्मीं देहि हुं फट् स्वाहा ॥
फलश्रुतिः
इत्येतत्कवचं दिव्यं शिवेन परिकीर्तितम् ।
यः पठेत्प्रयतो भूत्वा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥
द्विकालमेककालं वा त्रिवारं यः पठेन्नरः ।
रोगान् पुनः क्षणात् जित्वा स पुमान् लभते श्रियम् ॥
मध्याह्ने च जले स्थित्वा चतुर्वारं पठेद्यदि ।
क्षयापस्मारकुष्ठादितापत्रयनिवारणम् ॥
यः पठेत्कवचं दिव्यं हनुमद्ध्यानतत्परः ।
त्रिःसकृद्वा यथाज्ञानं सोऽपि पुण्यवतां वरः ॥
देवमभ्यर्च्य विधिवत्पुरश्चर्यां समारभेत् ।
एकादशशतं जाप्यं दशांशहवनादिकम् ॥
यः करोति नरो भक्त्या कवचस्य समादरम् ।
ततः सिद्धिर्भवेत्तस्य परिचर्याविधानतः ॥
गद्यपद्यमया वाणी तस्य वक्त्रे प्रजायते ।
ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥
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श्री हनुमानबाहुक हिन्दी अनुवादश्रीजानकीवल्लभो विजयतेश्रीमद्-गोस्वामि-तुलसीदास-कृत हनुमान बाहुकछप्पयसिंधु-तरन, सिय-सोच-हर...
25/08/2026

श्री हनुमानबाहुक हिन्दी अनुवाद
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद्-गोस्वामि-तुलसीदास-कृत हनुमान बाहुक
छप्पय
सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु।।
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट।। १।।
भावार्थ- जिनके शरीर का रंग उदयकाल के सूर्य के समान है, जो समुद्र लाँघकर श्रीजानकीजी के शोक को हरने वाले, आजानु-बाहु, डरावनी सूरत वाले और मानो काल के भी काल हैं। लंका-रुपी गम्भीर वन को, जो जलाने योग्य नहीं था, उसे जिन्होंने निःसंक जलाया और जो टेढ़ी भौंहो वाले तथा बलवान् राक्षसों के मान और गर्व का नाश करने वाले हैं, तुलसीदास जी कहते हैं – वे श्रीपवनकुमार सेवा करने पर बड़ी सुगमता से प्राप्त होने वाले, अपने सेवकों की भलाई करने के लिये सदा समीप रहने वाले तथा गुण गाने, प्रणाम करने एवं स्मरण और नाम जपने से सब भयानक संकटों को नाश करने वाले हैं।1।
स्वर्न-सैल-संकासकोटि-रबि-तरुन-तेज-घन।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज्र बज्र-तन।।
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन।
कपिस केस, करकस लँगूर, खल-दल बल भानन।।
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुँ नहिं आवत निकट।।2।।
भावार्थ- वे सुवर्ण-पर्वत (सुमेरु) – के समान शरीरवाले, करोड़ों मध्याह्न के सूर्य के सदृश अनन्त तेजोराशि, विशाल-हृदय, अत्यन्त बलवान् भुजाओं वाले तथा वज्र के तुल्य नख और शरीरवाले हैं, पीले नयन तथा, जीभ, दाँत और मुख विकराल हैं, बाल भूरे रंग के तथा पूँछ कठोर और दुष्टों के दल के बल का नाश करने वाली है। तुलसीदासजी कहते हैं – श्रीपवनकुमार की डरावनी मूर्ति जिसके हृदय में निवास करती है, उस पुरुष के समीप दुःख और पाप स्वप्न में भी नहीं आते।।2।।
झूलना
पंचमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो।
बाँकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो।।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल, बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो।।3।।
भावार्थ- शिव, स्वामि-कार्तिक, परशुराम, दैत्य और देवता-वृन्द सबके युद्ध रुपी नदी से पार जाने में योग्य योद्धा हैं। वेदरुपी वन्दीजन कहते हैं – आप पूरी प्रतिज्ञा वाले चतुर योद्धा, बड़े कीर्तिमान् और यशस्वी हैं। जिनके गुणों की कथा को रघुनाथ जी ने श्रीमुख से कहा तथा जिनके अतिशय पराक्रम से अपार जल से भरा हुआ संसार-समुद्र सूख गया। तुलसी के स्वामी सुन्दर राजपूत (पवनकुमार) – के बिना राक्षसों के दल का नाश करने वाला दूसरा कौन है ? (कोई नहीं)।।3।।
घनाक्षरी
भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो।।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो।।4।।
भावार्थ- सूर्य भगवान के समीप में हनुमान् जी विद्या पढ़ने के लिये गये, सूर्यदेव ने मन में बालकों का खेल समझकर बहाना किया (कि मैं स्थिर नहीं रह सकता और बिना आमने-सामने के पढ़ना-पढ़ाना असम्भव है)। हनुमान् जी ने भास्कर की ओर मुख करके पीठ की तरफ पैरों से प्रसन्न-मन आकाश-मार्ग में बालकों के खेल के समान गमन किया और उससे पाठ्यक्रम में किसी प्रकार का भ्रम नहीं हुआ। इस अचरज के खेल को देखकर इन्द्रादि लोकपाल, विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा की आँखें चौंधिया गयीं तथा चित्त में खलबली-सी उत्पन्न हो गयी। तुलसीदासजी कहते हैं – सब सोचने लगे कि यह न जाने बल, न जाने वीररस, न जाने धैर्य, न जाने हिम्मत अथवा न जाने इन सबका सार ही शरीर धारण किये हैं।।4।।
भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो।।
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूँतें घाटि नभतल भो।
नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो।।5।।
भावार्थ- महाभारत में अर्जुन के रथ की पताका पर कपिराज हनुमान् जी ने गर्जन किया, जिसको सुनकर दुर्योधन की सेना में घबराहट उत्पन्न हो गयी। द्रोणाचार्य और भीष्म-पितामह ने कहा कि ये महाबली पवनकुमार है। जिनका बल वीर-रस-रुपी समुद्र का जल हुआ है। इनके स्वाभाविक ही बालकों के खेल के समान धरती से सूर्य तक के कुदान ने आकाश-मण्डल को एक पग से भी कम कर दिया था। सब योद्धागण मस्तक नवा-नवाकर और हाथ जोड़-जोड़कर देखते हैं। इस प्रकार हनुमान् जी का दर्शन पाने से उन्हें संसार में जीने का फल मिल गया।।5।।
गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निसंक परपुर गलबल भो।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो।।
संकट समाज असमंजस भो रामराज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह, लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो।।6।।
भावार्थ- समुद्र को गोखुर के समान करके निडर होकर लंका-जैसी (सुरक्षित नगरी को) होलिका के सदृश जला डाला, जिससे पराये (शत्रु के) पुर में गड़बड़ी मच गयी। द्रोण-जैसा भारी पर्वत खेल में ही उखाड़ गेंद की तरह उठा लिया, वह कपिराज के लिये बेल-फल के समान क्रीडा की सामग्री बन गया। राम-राज्य में अपार संकट (लक्ष्मण-शक्ति) -से असमंजस उत्पन्न हुआ (उस समय जिसके पराक्रम से) युग समूह में होने वाला काम पलभर में मुट्ठी में आ गया। तुलसी के स्वामी बड़े साहसी और सामर्थ्यवान् हैं, जिनकी भुजाएँ लोकपालों को पालन करने तथा उन्हें फिर से स्थिरता-पूर्वक बसाने का स्थान हुईं।।6।।
कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो, महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो।।
कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईंधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो।। 7।।
भावार्थ- कच्छप की पीठ में जिनके पाँव के गड़हे समुद्र का जल भरने के लिये मानो नाप के पात्र (बर्तन) हुए। राक्षसों का नाश करते समय वह (समुद्र) ही उनके भागकर छिपने का गढ़ हुआ तथा वही बहुत-से बड़े-बड़े मत्स्यों के रहने का स्थान हुआ। तुलसीदासजी कहते हैं – रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद रुपी ईंधन को जलाने के निमित्त जिनका प्रताप प्रचण्ड अग्नि हुआ। भीष्मपितामह कहते हैं – मेरी समझ में हनुमान् जी के समान अत्यन्त बलवान् तीनों काल और तीनों लोक में कोई नहीं हुआ।। 7।।
दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको, तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो।।
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो।। 8।।
भावार्थ- आप राजा रामचन्द्रजी के दूत, पवनदेव के सुयोग्य पुत्र, अंजनीदेवी को आनन्द देने वाले, असंख्य सूर्यों के समान तेजस्वी, सीताजी के शोकनाशक, पाप तथा अवगुण के नष्ट करने वाले, शरणागतों की रक्षा करने वाले और लक्ष्मणजी को प्राणों के समान प्रिय हैं। तुलसीदासजी के दुस्सह दरिद्र-रुपी रावण का नाश करने के लिये आप तीनों लोकों में आश्रय रूप प्रकट हुए हैं। अरे लोगो ! तुम ज्ञानी, गुणवान्, बलवान् और सेवा (दूसरों को आराम पहुँचाने) – में सजग हनुमान् जी के समान चतुर स्वामी को अपने हृदय में बसाओ।।8।।
दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को। पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को।। लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को। राम को दुलारो दास बामदेव को निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को।।9।।
भावार्थ- दानवों की सेना को नष्ट करने में जिनका पराक्रम विश्व-विख्यात है, वेद यश-गान करते हैं कि देवताओं को कारागार से छुड़ाने वाला पवनकुमार के सिवा दूसरा कौन है ? आप पापान्धकार और कष्ट-रुपी पाले को घटाने में प्रवीण तथा सेवक रुपी कमल को प्रसन्न करने के लिये प्रातः-काल के सूर्य के समान हैं। तुलसी के हृदय में एकमात्र हनुमान् जी का भरोसा है, स्वप्न में भी लोक और परलोक की चिन्ता नहीं, शोकरहित हैं, रामचन्द्रजी के दुलारे शिव-स्वरुप (ग्यारह रुद्र में एक) केसरी-नन्दन का नाम कलिकाल में कल्प-वृक्ष के समान है।।9।।
महाबल-सीम महाभीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन, करुना-कलित मन धारमिक धीर को।।
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को।।10।।
भावार्थ- आप अत्यन्त पराक्रम की हद, अतिशय कराल, बड़े बहादुर और रघुनाथजी द्वारा चुने हुए महाबलवान् विख्यात योद्धा हैं। वज्र के समान कठोर शरीर वाले जिनके जोर पड़ने अर्थात् बल करने से रणस्थल में कोलाहल मच जाता है, सुन्दर करुणा एवं धैर्य के स्थान और मन से धर्माचरण करने वाले हैं। दुष्टों के लिये काल के समान भयावने, सज्जनों को पालने वाले और स्मरण करने से तुलसी के दुःख को हरने वाले हैं। सीताजी को सुख देने वाले, रघुनाथजी के दुलारे और सेवकों की सहायता करने में पवनकुमार बड़े ही साहसी हैं।।10।।
रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि, हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो।।
खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो।।11।।
भावार्थ- आप सृष्टि-रचना के लिये ब्रह्मा, पालन करने को विष्णु, मारने को रुद्र और जिलाने के लिये अमृत-पान के समान हुए; धारण करने में धरती, अन्धकार को नसाने में सूर्य, सुखाने में अग्नि, पोषण करने में चन्द्रमा और सूर्य हुए; खलों को दुःख देने और दूषित बनाने वाले, सेवकों को संतुष्ट करने वाले एवं माँगना-रुपी मैलेपन का विनाश करने में मोदक-दाता हुए। तीनों लोकों में दुःखियों के दुःख छुड़ाने के लिये तुलसी के स्वामी श्रीहनुमान् जी दृढ़-प्रतिज्ञ हुए हैं।।11।।
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को।।
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ-तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को।।12।।
भावार्थ- सेवक हनुमान् जी की सेवा समझकर जानकीनाथ ने संकोच माना अर्थात् अहसान से दब गये, शिवजी पक्ष में रहते और स्वर्ग के स्वामी इन्द्र नवते हैं। देवी-देवता, दानव सब दया के पात्र बनकर हाथ जोड़ते हैं, फिर दूसरे बेचारे दरिद्र-दुःखिया राजा कौन चीज हैं। जागते, सोते, बैठते, डोलते, क्रीड़ा करते और आनन्द में मग्न (पवनकुमार के) सेवक का अनिष्ट चाहेगा ऐसा कौन सिद्धान्त का समर्थ है ? उसका जहाँ-तहाँ सब दिन श्रेष्ठ रीति से पूरा पड़ेगा, जिसके हृदय में अंजनीकुमार की हाँक का भरोसा है।।12।।
सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी।।
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की।।13।।
भावार्थ- जिसके हृदय में हनुमान् जी की हाँक उल्लसित होती है, उसपर अपने सेवकों और पार्वतीजी के सहित शंकर भगवान्, समस्त लोकपाल, श्रीरामचन्द्र, जानकी और लक्ष्मणजी भी प्रसन्न रहते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं फिर लोक और परलोक में शोकरहित हुए उस प्राणी को तीनों लोकों में किसी योद्धा के आश्रित होने की क्या लालसा होगी ? दया-निकेत केसरी-नन्दन निर्मल कीर्तिवाले हनुमान् जी के प्रसन्न होने से सम्पूर्ण सिद्ध-मुनि उस मनुष्य पर दयालु होकर बालक के समान पालन करते हैं, उन करुणानिधान कपीश्वर की कीर्ति ऐसी ही निर्मल है।।13।।
करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही, नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ।।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ।
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ।।14।।
भावार्थ- तुम दया के स्थान, बुद्धि-बल के धाम, आनन्द महिमा के मन्दिर और गुण-ज्ञान के निकेतन हो; राजा रामचन्द्र के स्नेही, शंकरजी के रूप और नाम लेने से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के देने वाले हो। हे हनुमान् जी ! आप अपनी शक्ति से श्रीरघुनाथजी के शील-स्वभाव, लोक-रीति और वेद-विधि के पण्डित हो !मन, वचन, कर्म तीनों प्रकार से तुलसी आपका दास है, आप चतुर स्वामी हैं अर्थात् भीतर-बाहर की सब जानते हैं।।14।।
मन को अगम, तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं।
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं।।15।।
भावार्थ- हे कपिराज ! महाराज रामचन्द्रजी के कार्य के लिये सारा साज-समाज सजकर जो काम मन को दुर्गम था, उसको आपने शरीर से करके सुलभ कर दिया। हे केशरीकिशोर ! आप देवताओं को बन्दीखाने से मुक्त करने वाले, संग्राम-भूमि में कोलाहल मचाने वाले हैं और आपकी नामवरी युग-युग से संसार में विराजती है। हे जबरदस्त योद्धा ! आपका बल तुलसी के लिये क्यों घट गया, जिसको सुनकर साधु सकुचा गये हैं और दुष्टगण प्रसन्न हो रहे हैं, हे अंजनीकुमार ! मेरी बिगड़ी बात उसी तरह सुधारिये जिस प्रकार आपके प्रसन्न होने से होती (सुधरती) आयी है।।15।।
सवैया जान सिरोमनि हौ हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो।
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो।।
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहाँ तुलसी को न चारो।
दोष सुनाये तें आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तौ हिय हारो।।16।।
भावार्थ- हे हनुमान् जी ! आप ज्ञान-शिरोमणी हैं और सेवकों के मन में आपका सदा निवास है। मैं किसी का क्या गिराता वा बिगाड़ता हूँ। हे स्वामी ! आपने मुझे सेवक के नाते से च्युत कर दिया, इसमें तुलसी का कोई वश नहीं है। यद्यपि मन हृदय में हार गया है तो भी मेरा अपराध सुना दीजिये, जिसमें आगे के लिये होशियार हो जाऊँ।।16।।
तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले।
तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले।।
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले।।17।।
भावार्थ- हे वानरराज ! आपके बसाये हुए को शंकर भगवान भी नहीं उजाड़ सकते और जिस घर को आपने नष्ट कर दिया उसको कौन बसा सकता है ? हे गरीबनिवाज ! आप जिस पर प्रसन्न हुए, वे शत्रुओं के हृदय में पीड़ा रूप होकर विराजते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं, आपका नाम लेने से सम्पूर्ण संकट और सोच मकड़ी के जाले के समान फट जाते हैं। बलिहारी ! क्या आप मेरी ही बार बूढ़े हो गये अथवा बहुत-से गरीबों का पालन करते – करते अब थक गये हैं ? (इसी से मेरा संकट दूर करने में ढील कर रहे हैं)।।17।।
सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले अरि-कुंजर छैल छवा से।।
तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से।
बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से।।18।।
भावार्थ- आपने समुद्र लाँघकर बड़े-बड़े दुष्ट राक्षसों का विनाश करके लंका -जैसे विकट गढ़ को जलाया। हे संग्राम-रुपी वन के सिंह ! राक्षस शत्रु बने-ठने हाथी के बच्चे के समान थे, आपने उनको सिंह की भाँति विनष्ट कर डाला। आपने बराबर समर्थ और अच्छे स्वामी की सेवा करते हुए तुलसी दोष और दुःख की आग को सहन करे (यह आश्चर्य की बात है)। हे वानर-रुपी बाज ! बहुत-से दुष्ट-जन-रुपी पक्षी बढ़ गये हैं, उनको आप बटेर के समान क्यों नहीं लपेट लेते ?।।18।।
अच्छ-विमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न-से कुंजर केहरि-बारो।।
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूँ-तें सदा तुलसी कहँ सो रखवारो।।19।।
भावार्थ- हे अक्षयकुमार को मारने वाले हनुमान् जी ! आपने अशोक-वाटिका को विध्वंस किया और रावण-जैसे प्रतापी योद्धा के मुख के तेज की ओर देखा तक नहीं अर्थात् उसकी कुछ भी परवाह नहीं की। आप मेघनाद, अकम्पन और कुम्भकर्ण -सरीखे हाथियों के मद को चूर्ण करने में किशोरावस्था के सिंह हैं। विपक्षरुप तिनकों के ढेर के लिये भगवान राम का प्रताप अग्नि-तुल्य है और पवनकुमार उसके लिये पवन-रुप हैं। वे पवननन्दन ही तुलसीदास को सर्वदा पाप, शाप और संताप – तीनों से बचाने वाले हैं।।19।।
घनाक्षरी
जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन, मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये।
सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये।।
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये।।20।।
भावार्थ- हे हनुमान् जी ! बलि जाता हूँ, अपनी प्रतिज्ञा को न भुलाइये, जिसको संसार जानता है, मन में विचारिये, आपका कृपा-पात्र जन बाधारहित और सदा प्रसन्न रहता है। हे स्वामी कपिराज ! तुलसी कभी सेवा के योग्य था ? क्या चूक हुई है, अपनी साहिबी को सँभालिये, मुझे अपराधी समझते हों तो सहस्त्रों भाँति की दुर्दशा कीजिये, किन्तु जो लड्डू देने से मरता हो उसको विष से न मारिये। हे महाबली, साहसी, पवन के दुलारे, रघुनाथजी के प्यारे ! भुजाओं की पीड़ा को शीघ्र दूर कीजिये।।20।।
बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये।।
बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर, बाँहुपीर राहुमातु ज्यौं पछारि मारिये।।21।।
भावार्थ- हे दीनबन्धु ! बलि जाता हूँ, बालक को देखकर आपने लड़कपन से ही अपनाया और मायारहित अनोखी दया की। सोचिये तो सही, तुलसी आपका दास है, इसको आपका भरोसा, आपका ही बल और आपकी ही आशा है। अत्यन्त भयानक कलिकाल ने किसको बेचैन नहीं किया ? इस बलवान् का पैर मेरे मस्तक पर भी देखकर उसको हटाइये। हे केशरीकिशोर, बरजोर वीर ! आप रण में कोलाहल उत्पन्न करने वाले हैं, राहु की माता सिंहिका के समान बाहु की पीड़ा को पछाड़कर मार डालिये।।21।।
उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो सँभारिये।
राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये।।
साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये।
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यौं पकरि कै बदन बिदारिये।।22।।
भावार्थ- हे केशरीकुमार ! आप उजड़े हुए (सुग्रीव-विभीषण) – को बसाने वाले और बसे हुए (रावणादि) – को उजाड़ने वाले हैं, अपने उस बल का स्मरण कीजिये। हे रामदूत ! रामचन्द्रजी के सेवकों के लिये आप कल्पवृक्ष हैं और मुझ-सरीखे दीन-दुर्बलों को आपका ही सहारा है। हे वीर ! तुलसी के माथे पर आपके समान समर्थ स्वामी विद्यमान रहते हुए भी वह बाँधकर मारा जाता है। बलि जाता हूँ, मेरी भुजा विशाल पोखरी के समान है और यह पीड़ा उसमें जलचर के सदृश है, सो आप मकरी के समान इस जलचरी को पकड़कर इसका मुख फाड़ डालिये।।22।।
राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये।।
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै बिचारिये।
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह-पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये।।23।।
भावार्थ- मुझमें रामचन्द्रजी के प्रति स्नेह, रामचन्द्रजी की भक्ति, राम-लक्ष्मण और जानकीजी की कृपा से साहस (दृढ़ता-पूर्वक कठिनाइयों का सामना करने की हिम्मत) है, अतः मेरे शोक-संकट को दूर कीजिये। आनन्दरुपी बंदर रोग-रुपी अपार समुद्र को देखकर मन में हार गये हैं, जीवरुपी जाम्बवन्त को आपका बड़ा भरोसा है। हे कृपालु ! तुलसी के सुन्दर प्रेमरुपी पर्वत से कूदिये, श्रेष्ठ स्थान (हृदय) -रुपी सुबेलपर्वत पर बैठे हुए जीवरुपी जाम्बवन्त जी सोचते (प्रतीक्षा करते) हैं। हे महाबली बाँके योद्धा ! मेरे बाहु की पीड़ारुपिणी लंकिनी को लात की चोट से क्यों नहीं मरोड़कर मार डालते ?।।23।।
लोक-परलोकहुँ तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये।।
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये।
बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये।।24।।
भावार्थ- लोक, परलोक और तीनों लोकों में चारों नेत्रों से देखता हूँ, आपके समान योग्य कोई नहीं दिखायी देता। हे नाथ ! कर्म, काल, लोकपाल तथा सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जीवसमूह आपके हू हाथ में हैं, अपनी महिमा को विचारिये। हे देव ! तुलसी आपका निजी सेवक है, उसके हृदय में आपका निवास है और वह भारी दुःखी दिखायी देता है। वात-व्याधि-जनित बाहु की पीड़ा केवाँच की लता के समान है, उसकी उत्पन्न हुई जड़ को बटोरकर वानरी खेल से उखाड़ डालिये।।24।।
करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बकभगिनी काहू तें कहा डरैगी।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहूबल बालक छबीले छोटे छरैगी।।
आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपिकान्ह तुलसी की, बाँहपीर महाबीर तेरे मारे मरैगी।।25।।
भावार्थ- कर्मरुपी भयंकर कंसराजा के भरोसे बकासुर की बहिन पूतना राक्षसी क्या किसी से डरेगी ? बालकों को मारने में बड़ी भयावनी, जिसकी लीला कही नहीं जाती है, वह अपने बाहुबल से छोटे छबिमान् शिशुओं को छलेगी। आप ही विचारकर देखिये, वह सुन्दर रूप बनाकर आयी है, यदि आप-सरीखे गुणी के पाले पड़ेगी तो सभी का पाप दूर हो जायेगा। हे महाबली कपिराज ! तुलसी की बाहु की पीड़ा पूतना पिशाचिनी के समान है और आप बालकृष्ण-रुप हैं, यह आपके ही मारने से मरेगी।।25।।
भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की।।
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की।।26।।
भावार्थ- यह कठिन पीड़ा कपाल की लिखावट है या समय, क्रोध अथवा त्रिदोष का या मेरे भयंकर पापों का परिणाम है, दुःख किंवा धोखे की छाया है। मारणादि प्रयोग अथवा यन्त्र-मन्त्र रुपी वृक्ष का फल है; अरी मन की मैली पापिनी पूतना ! भाग जा, नहीं तो मैं डंका पीटकर कहे देता हूँ कि कपिराज का स्वभाव जानकर तू पगली न बने। जो बाहु की पीड़ा रहे तो मैं महाबीर बलवान् हनुमान् जी की दोहाई और सौगन्ध करता हूँ अर्थात् अब वह नहीं रह सकेगी।। 26।।
सिंहिका सँहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है।।
तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महँतारी है।
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है।।27।।
भावार्थ- सिंहिका के बल का संहार करके सुरसा के छल को सुधार कर लंकिनी को मार गिराया और अशोक-वाटिका को उजाड़ डाला। लंकापुरी को विनाश किया। यमराज का खड्ग अर्थात् परदा फाड़कर मेघनाद की माता और रावण की पटरानी को राजमहल से बाहर निकाल लाये। हे महाबली कपिराज ! तुलसी को बड़ा सोच है, किसके संकोच में पड़कर आपने केवल मेरे बाहु की पीड़ा के भय को छोड़ रखा है।।27।।
तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहै आरति न काहु की।।
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की।।28।।
भावार्थ- हे वीर ! आपके लड़कपन का खेल सुनकर धीरजवान् भी भयभीत हो जाते हैं और इन्द्र, सूर्य तथा राहु अपने शरीर की सुध भुला जाती है। आपके बाहुबाल से सब लोकपाल शोकरहित होकर बसते हैं और आपका नाम लेने से किसी का दुःख नहीं रह जाता। साम, दान और भेद-नीति का विधान तथा वेद-लवेद से भी सिद्ध है कि चोर-साहु की चोटी कपिनाथ के ही हाथ में रहती है। तुलसीदास के जो इतने दिन बाहु की पीड़ा रही है सो क्या आपका आलस्य है अथवा क्रोध, परिहास या शिक्षा है।।28।।
टूकनि को घर-घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है।
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है।।
इतनो परेखो सब भाँति समरथ आजु, कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है।।29।।
भावार्थ- हे गरीबों के पालन करने वाले कृपानिधान ! टुकड़े के लिये दरिद्रतावश घर-घर मैं डोलता-फिरता था, आपने बुलाकर बालक के समान मेरा पालन-पोषण किया है। हे वीर अंजनीकुमार ! मुख्यतः आपने ही मेरी रक्षा की है, अपने जन को आप न भुलायेंगे, इसका मुझे भी भरोसा है। हे कपिराज ! आज आप सब प्रकार समर्थ हैं, मैं सच कहता हूँ, आपके समान भला तीनों लोकों में कौन है ? किंतु मुझे इतना परेखा (पछतावा) है कि यह सेवक दुर्दशा सह रहा है, लड़कों के खेलवाड़ होने के समान चिड़िया की मृत्यु हो रही है और आप तमाशा देखते हैं।।29।।
आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है।।
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है।।30।।
भावार्थ- मेरे ही पाप वा तीनों ताप अथवा शाप से बाहु की पीड़ा बढ़ी है, वह न कही जाती और न सही जाती है। अनेक औषधि, यन्त्र-मन्त्र-टोटकादि किये, देवताओं को मनाया, पर सब व्यर्थ हुआ, पीड़ा बढ़ती ही जाती है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, कर्म, काल और संसार का समूह-जाल कौन ऐसा है जो आपकी आज्ञा को न मानता हो। हे रामदूत ! तुलसी आपका दास है और आपने इसको अपना सेवक कहा है। हे वीर ! आपकी यह ढील मुझे इस पीड़ा से भी अधिक पीड़ित कर रही है।।30।।
दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को।।
एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को।
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को।।31।।
भावार्थ- आप राजा रामचन्द्र के दूत, पवनदेव के सत्पुत्र, हाथ-पाँव के समर्थ और निराश्रितों के सहायक हैं। आपके सुन्दर यश की कथा विख्यात है, वेद गान करते हैं और रावण-जैसा त्रिलोक-विजयी योद्धा आपके घूँसे की चोट से घायल हो गया। इतने बड़े योग्य स्वामी के अनुग्रह करने पर भी आपका श्रेष्ठ सेवक आज तन-मन-वचन से दुःख पा रहा है। तुलसी को इस थोड़ी-सी बाहु-पीड़ा की बड़ी ग्लानि है, मेरे कौन-से पाप के कारण वा क्रोध से आपका प्रत्यक्ष प्रभाव लुप्त हो गया है ?।।31।।
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं।।
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं।।32।।
भावार्थ- देवी, देवता, दैत्य, मनुष्य, मुनि, सिद्ध और नाग आदि छोटे-बड़े जितने जड़-चेतन जीव हैं तथा पूतना, पिशाचिनी, राक्षसी-राक्षस जितने कुटिल प्राणी हैं, वे सभी रामदूत पवनकुमार की आज्ञा शिरोधार्य करके मानते हैं। भीषण यन्त्र-मन्त्र, धोखाधारी, छलबाज और दुष्ट रोगों के आक्रमण हनुमान् जी की दोहाई सुनकर स्थान छोड़ देते हैं। मेरे खोटे कर्म पर क्रोध कीजिये, तुलसी को सुखावन दीजिये और जो दोष हमें दुःख देते हैं, उनका सुधार करिये।।32।।
तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबर के।।
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के।।33।।
भावार्थ- आपके बल ने युद्ध में वानरों को रावण से जिताया और आपके ही नष्ट करने से राक्षस घर-घर के (तीन-तेरह) हो गये। आपके ही बल से राजा रामचन्द्रजी ने देवताओं का सब काम पूरा किया और आपने ही रघुनाथजी के समाज का सम्पूर्ण साज सजाया। आपके गुणों का गान सुनकर देवता रोमांचित होते हैं और ब्रह्मा, विष्णु, महेश की आँखों में जल भर आता है। हे वानरों के स्वामी ! तुलसी के माथे पर हाथ फेरिये, आप-जैसे अपनी मर्यादा की लाज रखने वालों के दास कभी दुःखी नहीं देखे गये।।33।।
पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये।।
अँबु तू हौं अँबुचर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये।।34।।
भावार्थ- आपके टुकड़ों से पला हूँ, चूक पड़ने पर भी मौन न हो जाइये। मैं कुमार्गी दो कौड़ी का हूँ, पर आप अपनी ओर देखिये। हे भोलेनाथ ! अपने भोलेपन से ही आप थोड़े से रुष्ट हो जाते हैं, सन्तुष्ट होकर मेरा पालन करके मुझे बसाइये, अपना सेवक समझकर दुर्दशा न कीजिये। आप जल हैं तो मैं मछली हूँ, आप माता हैं तो मैं छोटा बालक हूँ, देरी न कीजिये, मुझको आपका ही सहारा है। बच्चे को व्याकुल जानकर प्रेम की पहचान करके रक्षा कीजिये, तुलसी की बाँह पर अपनी लम्बी पूँछ फेरिये (जिससे पीड़ा निर्मूल हो जावे)।।34।।
घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है।।
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूँकि फौजैं ते उड़ाई है।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है।।35।।
भावार्थ- रोगों, बुरे योगों और दुष्ट लोगों ने मुझे इस प्रकार घेर लिया है जैसे दिन में बादलों का घना समूह झपटकर आकाश में दौड़ता है। पीड़ा-रुपी जल बरसाकर इन्होंने क्रोध करके बिना अपराध यशरुपी जवासे को अग्नि की तरह झुलसकर मूर्च्छित कर दिया है। हे दया-निधान महाबलवान् हनुमान् जी ! आप हँसकर निहारिये और ललकारकर विपक्ष की सेना को अपनी फूँक से उड़ा दीजिये। हे केशरीकिशोर वीर ! तुलसी को कुरोग-रुपी निर्दय राक्षस ने खा लिया था, आपने जोरावरी से मेरी रक्षा की है

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