Pt rajendra puri

Pt rajendra puri digital creator

29/11/2025

वेद जी को हनुमान चालीसा याद है महज 2.6 साल की उम्र में...

07/08/2025

Bholenath ji ke chamatkar

04/08/2025

"LO JI SIKH LI MARATHI" 😁😁😁

03/08/2025

Achcha hua ye video ban gayi nhi to koi vishvas nhi karta ki dog's bhi itne khatarnak ho sakte hai 🐕🐕🐕

03/08/2025

🩷🩷🩷suno kya tum thakti nhi ho 🩷🩷🩷
☘️♥️💥🌈 🙏🙏🙏❤️❤️

01/08/2025

BACHHO KE SANSKAR, ेशा #ʏᴏɢɪᴀᴅɪᴛʏᴀɴᴀᴛʜ

भैरव साधना से संबंधित कुछ जानकारियां परन्तु किसी भी प्रकार की साधना सिर्फ उचित गुरू के सान्निध्य में ही करनी चाहिए अन्यथ...
30/11/2023

भैरव साधना से संबंधित कुछ जानकारियां परन्तु किसी भी प्रकार की साधना सिर्फ उचित गुरू के सान्निध्य में ही करनी चाहिए अन्यथा परिणाम अनुचित भी आ सकते है, तंत्र साधना 2 धारी तलवार है, एक बार चलना शुरू किया तो वापस आने के कोई मार्ग नहीं होते या तो सफलता मिलेंगी या तो अगले जन्म में फिर शुरुवात करो,
य़ह विधि सिर्फ जानकारी मात्र के लिए है.

तंत्र साधना में शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण नामक छ: तांत्रिक षट् कर्म होते हैं। इसके अलावा नौ प्रयोगों का वर्णन मिलता है:- मारण, मोहनं, स्तंभनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षिणी साधना, रसायन क्रिया तंत्र के ये नौ प्रयोग हैं।

उक्त सभी को करने के लिए अन्य कई तरह के देवी-देवताओं की साधना की जाती है। अघोरी लोग इसके लिए शिव साधना, शव साधना और श्मशान साधना करते हैं। बहुत से लोग भैरव साधना, नाग साधना, पैशाचिनी साधना, यक्षिणी साधा या रुद्र साधना करते हैं। यह प्रस्तुत है अकाल मौत से बचाने वाली और धन संपत्ति प्रदान करने वाली बटुक भैरव साधना।

सुरों के राजा बटुक भैरव
तत्काल प्रभावि भैरव साधना...

भैरव को शिव का रुद्र अवतार माना गया है। तंत्र साधना में भैरव के आठ रूप भी अधिक लोकप्रिय हैं- 1.असितांग भैरव, 2. रु-रु भैरव, 3. चण्ड भैरव, 4. क्रोधोन्मत्त भैरव, 5. भयंकर भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. भीषण भैरव तथा 8. संहार भैरव। आदि शंकराचार्य ने भी 'प्रपञ्च-सार तंत्र' में अष्ट-भैरवों के नाम लिखे हैं। तंत्र शास्त्र में भी इनका उल्लेख मिलता है। इसके अलावा सप्तविंशति रहस्य में 7 भैरवों के नाम हैं। इसी ग्रंथ में दस वीर-भैरवों का उल्लेख भी मिलता है। इसी में तीन बटुक-भैरवों का उल्लेख है। रुद्रायमल तंत्र में 64 भैरवों के नामों का उल्लेख है।
'महा-काल-भैरव' मृत्यु के देवता...

हालांकि प्रमुख रूप से काल भैरव और बटुब भैरव की साधना ही प्रचलन में है। इनका ही ज्यादा महत्व माना गया है। आगम रहस्य में दस बटुकों का विवरण है। भैरव का सबसे सौम्य रूप बटुक भैरव और उग्र रूप है काल भैरव।

' महा-काल-भैरव' मृत्यु के देवता हैं। 'स्वर्णाकर्षण-भैरव' को धन-धान्य और संपत्ति का अधिष्ठाता माना जाता है, तो 'बाल-भैरव' की आराधना बालक के रूप में की जाती है। सद्-गृहस्थ प्रायः बटुक भैरव की उपासना ही करते हैं, जबकि श्मशान साधक काल-भैरव की।

कैसे करें बटुक भैरव की साधना...

भैरवजी तुरंत ही प्रसन्न होने वाले दुर्गा के पुत्र हैं। बटुक भैरव की साधना से व्यक्ति अपने जीवन में सांसारिक बाधाओं को दूर कर सांसारिक लाभ उठा सकता है।

साधना

* साधना का यंत्र और चेतावनी...

साधना यंत्र : बटुक भैरव का यंत्र लाकर उसे साधना के स्थान पर भैरवजी के चित्र के समीप रखें। दोनों को लाल वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर यथास्थिति में रखें। चित्र या यंत्र के सामने हाल, फूल, थोड़े काले उड़द चढ़ाकर उनकी विधिवत पूजा करके लड्डू का भोग लगाएं।

साधना समय : इस साधना को किसी भी मंगलवार या मंगल विशेष अष्टमी के दिन करना चाहिए शाम 7 से 10 बजे के बीच।

साधना चेतावनी : साधना के दौरान खान-पान शुद्ध रखें। सहवास से दूर रहें। वाणी की शुद्धता रखें और किसी भी कीमत पर क्रोध न करें। यह साधना किसी गुरु से अच्छे से जानकर ही करें।

*साधना के दौरान बरतें सावधानी...

साधना नियम व सावधानी :

भगवान कालभैरव की महिमा...

1. यदि आप भैरव साधना किसी मनोकामना के लिए कर रहे हैं तो अपनी मनोकामना का संकल्प बोलें और फिर साधना शुरू करें।
2. यह साधना दक्षिण दिशा में मुख करके की जाती है।
3. रुद्राक्ष या हकीक की माला से मंत्र जप किया जाता है।
4. भैरव की साधना रात्रिकाल में ही करें।
5. भैरव पूजा में केवल तेल के दीपक का ही उपयोग करना चाहिए।
6. साधक लाल या काले वस्त्र धारण करें।
7. हर मंगलवार को लड्डू के भोग को पूजन-साधना के बाद कुत्तों को खिला दें और नया भोग रख दें।
8. भैरव को अर्पित नैवेद्य को पूजा के बाद उसी स्थान पर ग्रहण करना चाहिए।
9. भैरव की पूजा में दैनिक नैवेद्य दिनों के अनुसार किया जाता है, जैसे रविवार को चावल-दूध की खीर, सोमवार को मोतीचूर के लड्डू, मंगलवार को घी-गुड़ अथवा गुड़ से बनी लापसी या लड्डू, बुधवार को दही-बूरा, गुरुवार को बेसन के लड्डू, शुक्रवार को भुने हुए चने, शनिवार को तले हुए पापड़, उड़द के पकौड़े या जलेबी का भोग लगाया जाता है।
अगले पन्ने पर, जब प्रसन्न होंगे बटुक भैरव...

इस साधना से बटुक भैरव प्रसन्न होकर सदा साधक के साथ रहते हैं और उसे सुरक्षा प्रदान करते हैं अगाल मौत से बचाते हैं। ऐसे साधक को कभी धन की कमी नहीं रहती और वह सुखपूर्वक वैभवयुक्त जीवन- यापन करता है। जो साधक बटुक भैरव की निरंतर साधना करता है तो भैरव बींब रूप में उसे दर्शन देकर उसे कुछ सिद्धियां प्रदान करते हैं जिसके माध्यम से साधक लोगों का भला करता है।

य़ह मात्र जानकारी के लिए है कोई भी मित्र बंधु अपने घर में या कहीं भी बिना उचित गुरू के प्रयोग ना करे अन्याय खुद जिम्मेदार होंगे........

हर हर महादेव
पंडित राजेंद्र पूरी..

दशनाम गोस्वामी शब्दावली[ Dashnam Goswami Terminology ]🟪🟪🟪🟪🟪🟪🟪🟪🔺 🕉️ नमो नारायण :- दशनाम गोस्वामी लोग जब आपस में मिलते हैं...
18/07/2023

दशनाम गोस्वामी शब्दावली
[ Dashnam Goswami Terminology ]
🟪🟪🟪🟪🟪🟪🟪🟪

🔺 🕉️ नमो नारायण :- दशनाम गोस्वामी लोग जब आपस में मिलते हैं तो एक - दूसरे से "ॐ नमो नारायण" कहकर अभिवादन करते हैं ‌। संस्कृत में इसे "ॐ नमः नारायणाय" कहते हैं।

🔺दसनाम :- दस + नाम = दसनाम । संस्कृत में "दशनाम" । गोस्वामियों की दस शाखाएं हैं : वन , अरण्य , तीर्थ , आश्रम , गिरि , पर्वत , सागर , सरस्वती , भारती , पुरी । शैव संन्यासियों ( अर्थात विरक्त एवं गृहस्थ गोस्वामियों ) की इन्हीं दस शाखाओं को "दसनाम" कहा जाता है।

🔺शैव :- भगवान शिव के अनुयायी को शैव कहते हैं।

🔺शिवगण :- वैसे तो भगवान शिव के गण हैं भैरव , वीरभद्र , मणिभद्र , चंदिस , नंदी , शैल इत्यादि । गण का शाब्दिक अर्थ होता है "समूह" जैसे - - देवगण , ऋषिगण , पितृगण इत्यादि । दशनाम गोस्वामी लोग अपने आपको "शिवगण" भी कहते हैं। वे अपने को शिवसैनिक मानते हैं।

🔺परिव्राजक :- परिव्राजक तो संन्यासी का एक प्रकार है । फर्क इतना है कि समाज को छोड़कर संन्यासी निर्जन वनों में या अंधेरी कंदराओं में या ऊंचे - ऊंचे पहाड़ों पर रहते थे जबकि परिव्राजक गांव के किनारे कुटिया बनाकर रहता था । परिव्रज्या व्रत धारण करके और भिक्षाचारण के द्वारा जीवनयापन करनेवाले संन्यासी को परिव्राजक कहते हैं । परिव्राजक चार प्रकार के होते हैं -- - ( 1) कुटीचक , ( 2) बहूदक , ( 3 ) हंस , ( 4 ) परमहंस । जो साधु अपने पुत्रादि के गृहों से भिक्षाचारण करते हुए आत्मसाधना करते हैं उनको कुटीचक या कुटीचर कहते हैं । जो साधु त्रिदंड , कमंडलु , शिक्यपक्ष ( रस्सी से बना हुआ छींका या झोला या बटुआ ) , पवित्र जलपात्र , पादुका , आसन , शिखा , कौपीन तथा कषाय ( भगवा ) वेश धारण करते हुए सच्चरित्र ब्राह्मणों के घरों से भिक्षाचारण करते हुए आत्मतत्व का चिंतन करते हैं उन्हें बहूदक कहते हैं । जो साधु एक दंड धारण करते हैं , शिखारहित यज्ञोपवीतधारी , हाथ में शिक्यपक्ष एवं कमंडलु धारण करनेवाले को हंस कहते हैं । वे ग्राम में केवल एक रात्रि और नगर एवं तीर्थ में केवल पांच रात्रि विश्राम करते हैं । वे एक रात्रि , दो रात्रि कृच्छ चांद्रायणादि व्रत करते हुए आत्मचिंतन करते हैं । परिव्राजक की सर्वोच्च अवस्था परमहंस कहलाती है । जो साधु दंड धारण नहीं करते , मुंडित रहते हुए कंथा और कौपीन धारण करते हैं वे परमहंस कहलाते हैं। वे व्यक्तलिंग ( अर्थात अप्रकट चिह्न ) वाले अव्यक्त ( गुप्त ) आचरण करनेवाले अर्थात धीर - शांत रहनेवाले होते हैं , जो अनुन्मत होते हुए भी उन्मत्त की तरह व्यवहार करते हैं । वे त्रिदंड , कमंडलु , शिक्यपक्ष , पवित्र जलपात्र , पादुका, आसन , शिखा और यज्ञोपवीत इत्यादि का त्याग कर देते हैं । वे शून्यगृह ( निर्जन घर ) अथवा देवालय में वास करते हैं । उनके लिए धर्म - अधर्म , सत्य - असत्य कुछ नहीं होता है । वे सब कुछ सहन करनेवाले , समदर्शी , मिट्टी , पत्थर और स्वर्ण को समान समझनेवाले होते हैं । वे यथालब्ध संतोषी तथा चारों वर्णों से भिक्षा प्राप्त करते हुए आत्मा को बंधन से मुक्त करते हैं , आत्मा के मोक्ष के लिए उपाय करते हैं । उदाहरण , स्वामी रामकृष्ण परमहंस।

🔺पंथ :- पंथ ( Cult / Creed ) का शाब्दिक अर्थ है पथ या मार्ग या मत या सम्प्रदाय । धर्म के अंतर्गत एक जैसी धार्मिक विचारधारा के छोटे समूह को पंथ कहते हैं । उदाहरणार्थ -- वैष्णव पंथ , दशनाम पंथ , नाथ पंथ , नानक पंथ ( सिक्ख पंथ ) , कबीर पंथ , दादू पंथ इत्यादि।

🔺सम्प्रदाय :- एक ही धर्म की अलग - अलग परम्परा या विचारधारा को माननेवाले वर्गों को सम्प्रदाय कहा जाता है । सम्प्रदाय में गुरू- शिष्य परम्परा चलती है । भारत में सनातन धर्म में अनेक सम्प्रदाय हैं , जैसे --- वैष्णव सम्प्रदाय ( भगवान विष्णु को परमेश्वर मानने ) , शैव सम्प्रदाय ( भगवान शिव को परमेश्वर माननेवाले ) , शाक्त सम्प्रदाय ( आद्याशक्ति को परमेश्वर माननेवाले ) , स्मार्त संप्रदाय ( परमेश्वर के विभिन्न रूपों को समान माननेवाले ) , आजीवक सम्प्रदाय ( नास्तिकवादी या भौतिकवादी जो ईश्वर, वेद , कर्मकांड , पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखते हैं ) । दशनाम भी एक सम्प्रदाय है लेकिन आजकल सम्प्रदाय का गलत अर्थ निकाला जा रहा है । अतः अब दशनाम सम्प्रदाय को दशनाम पंथ लिखा जा रहा है।
वैसे दशनाम पंथ में संन्यासियों के चार सम्प्रदाय प्रचलित हैं --- भोगवार ( गोवर्धन मठ , पुरी ) , कीटवार ( शारदा मठ , द्वारका ) , आनंदवार ( ज्योतिर्मठ , उत्तराखंड ) और भूरिवार ( श्रृंगेरी मठ , मैसूर , कर्नाटक )।

🔺ब्रह्मचारी :- ब्रह्मचारी का मूलशब्द ब्रह्मचर्य है जिसका संधि विच्छेद है --- ब्रह्म + चर्य । ब्रह्म का अर्थ है ईश्वर और चर्य का अर्थ है विचरना । जो व्यक्ति ईश्वर के भावों में विचरण करे उसे ब्रह्मचारी कहते हैं। वैसे आमजन इसका अर्थ दूसरा बताते हैं -- "वह व्यक्ति जो विवाह नहीं करता है और अपने वीर्य का विसर्जन नहीं करता है ब्रह्मचारी कहलाता है ।
दशनाम पंथ में चार प्रकार के ब्रह्मचारी हैं --- प्रकाश ( पुरी मठ उड़ीसा ) , स्वरूप ( द्वारका मठ , गुजरात ) , आनंद ( ज्योतिर्मठ , उत्तराखंड ) , चैतन्य ( श्रृंगेरी मठ , मैसूर , कर्नाटक )।

🔺कैलाशवासी :-- वैष्णवों ( ब्राह्मणों ) में जब कोई व्यक्ति मर जाता है तो उसके लिए "बैकुंठ को जाना" या "स्वर्ग में जाना" बोला जाता है । मृतक के नाम के साथ "बैकुंठवासी" या "स्वर्गवासी" लिखा जाता है । दशनाम गोस्वामी के मरने को "शिवलोकगमन" या "कैलाशगमन" कहा जाता है और मृतक के नाम के साथ "कैलाशवासी" लिखा जाता है।

🔺धर्म :- धर्म का शाब्दिक अर्थ है "धारण करने योग्य" । उचित धारणा को धर्म कहते हैं । एकनिष्ठ भाव से परमात्मा का चिंतन ही धर्म कहलाता है । एक परम्परा के मानने वालों विशद समूह को धर्म कहते हैं । उदाहरण के लिए --- मानव धर्म , सनातन धर्म ( हिंदू धर्म ) , जैन धर्म , बौद्ध धर्म , ईसाई धर्म , मुस्लिम धर्म ( इस्लाम धर्म ) , सिक्ख धर्म , ओशो धर्म इत्यादि । धर्म का उद्देश्य मानव एवं जगत कल्याण होता है।

🔺सनातन धर्म :- सनातन का शाब्दिक अर्थ है "शाश्वत" Eternal ) या "सदैव चलते रहनेवाला" (Continuously going on ) । सनातन का अर्थ होता है "जिसका कोई आदि या अंत नहीं होता है" ( No Beginning & No End ) । सनातन धर्म की उत्पत्ति केवल भारतवर्ष है । यहीं से यह सारी दुनिया में फैला । यह संसार का प्राचीनतम धर्म है।

🔺संन्यासी :- सम् + न्यासी = संन्यासी अर्थात सर्वस्व का न्यास । शैवमत के साधु को संन्यासी कहते हैं जो अपना घर - परिवार , मोह , ममता , धन , सम्पत्ति , वैभव , मान - अपमान को त्यागकर मोक्ष की खोज में शिव की आराधना में लीन हो जाता है। केवल शिवभक्त को ही संन्यासी कहा जाता था लेकिन अब तो कोई भी ऐरा - गैरा - नत्थू खैरा अपने को संन्यासी बता देता है जबकि संन्यासी का स्थान ईश्वर ( शिव ) के बाद माना जाता है । संन्यासी को जर , जोरू और ज़मीन से बिल्कुल दूर रहने का प्रावधान है । असली संन्यासी को हर स्त्री को मां के रूप में मानना होता है । असली संन्यासी कभी भी स्त्री के मुख की ओर बात नहीं कर सकता था । असली संन्यासी को स्त्री के साथ आसन साझा करने की मनाही है लेकिन अब समय बहुत बदल गया है । अब संन्यासीजीवन में भारी बदलाव आ गये हैं । संन्यासी का जीवन बहुत कठोर होता है । उसे अनेक कष्टों से गुजरना पड़ता है । असली संन्यासी पर मान - अपमान का कोई असर नहीं होता है।

🔺शंकराचार्य :- राज्य की सत्ता को सम्हालने वाले व्यक्ति को राजा या शासक या सम्राट कहते हैं लेकिन धर्म की सत्ता के स्वामी को "शंकराचार्य" कहा जाता है अर्थात "धर्मसम्राट" । आदि शंकराचार्य ( शंकर + आचार्य ) सबसे पहले "शंकराचार्य" थे । उन्होंने भारत की चार दिशाओं में चार महामठ बनाकर अपने शिष्यों को पीठाधीश्वर बनाया था और उनको "शंकराचार्य" की उपाधि प्रदान की थी । केवल उन्हीं चार महामठों के पीठाधीश्वरों को अपने नामों के साथ "शंकराचार्य" लिखने का अधिकार है जबकि अब तो कोई भी अपने नाम के साथ "शंकराचार्य" लिखकर घूम रहा है और उसमें शंकराचार्य के गुण कतई नहीं हैं।

🔺मठ :- धार्मिक किले को मठ कहा जाता है । मठ के अंदर पूजा पाठ तो होता ही था लेकिन साथ ही वे सब चीजें भी होती हैं जो एक किले के अंदर होती हैं । मठ के परिसर में महंत का निवास , गोशाला , धूना ( धूनी ) , बगीचा , शिवालय , समाधिस्थल इत्यादि हो सकते हैं । मठ के नाम खेत , खलिहान , बाग - बगीचे हो सकते हैं।

🔺महंत :- मठ के पीठाधीश्वर को "महंत" कहते हैं । महंत के अंतर्गत अनेक पुजारी हो सकते हैं । महंत अपने क्षेत्र का सर्वोच्च धर्माधिकारी माना जाता था । उसकी आज्ञा के बिना उसके क्षेत्र में कोई भी बड़ी धार्मिक गतिविधि नहीं हो सकती थी । फसलों की बुवाई , जुताई और कटाई उसकी आज्ञा से ही होती थी । फसल कटाई पर सबसे पहला हिस्सा मठ को ही प्रदान किया जाता था । राजनीतिक क्षेत्र में जो स्थान जिलाधीश ( डी . एम . ) का होता था धार्मिक क्षेत्र में वही स्थान महंत का होता था । बल्कि कलैक्टर भी उसके आगे नतमस्तक होता था । अंग्रेजों ने बहुत से महंतों को "ऑनरेरी मजिस्ट्रेट" बनाया था । महंत को विवाह करना वर्जित था । उसको संतान उत्पन्न करने की मनाही थी । कालांतर में बहुत से महंतों ने विवाह किए और बच्चे उत्पन्न किए । अब वे केवल नाम के महंत हैं । संन्यास धर्म में महंत को आजीवन अविवाहित रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है।

🔺अखाड़ा :- वैसे तो मल्लयुद्ध के स्थान को "अखाड़ा" बोला जाता है अर्थात पहलवानों के लड़ने का स्थान लेकिन दशनाम पंथ में अखाड़े का अर्थ "धार्मिक सैन्य टुकड़ी" ( Religious Military Troop ) से है । प्राचीन काल में दशनाम संन्यासी केवल तपस्या में लीन रहते थे । इतिहास में ऐसा समय भी आया जब सनातन धर्म को बौद्ध धर्म निगलने को तैयार हो गया तब दशनाम संन्यासियों ने अपने आप को "धर्म सैनिकों" ( Religious Soldiers ) में बदल दिया और सनातन धर्म को बचाया और उसका सम्बर्धन किया । दशनाम संन्यासियों के सात अखाड़े हैं - - जूना अखाड़ा , निरंजनी अखाड़ा , अग्नि अखाड़ा , आनंद अखाड़ा , अटल अखाड़ा , आवाहन अखाड़ा , महानिर्वाणी अखाड़ा । अखाड़ों को राजाओं , महाराजाओं , ज़मीनदारों , सेठों , साहूकारों से आर्थिक मदद मिलती थी । शैव संन्यासियों की नकल पर कालांतर में बैरागियों ( ब्राह्मणों ) ने भी अपने तीन अखाड़े बनाये । तीन अखाड़े उदासिनों के बने जिन्हें सिक्ख अखाड़े भी कहते हैं । अब तो किन्नरों ने अपना एक अखाड़ा स्थापित कर लिया है । इस समय कुल मिलाकर चौदह अखाड़े मौजूद हैं।

🔺मंडलेश्वर :- अखाड़े के सबसे बड़े धर्माधिकारी को "मंडलेश्वर" या "महामंडलेश्वर" कहा जाता है जैसे जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर हैं स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज । मंडलेश्वर का दर्जा सेनापति का होता है । वह अपने अखाड़े का सर्वोच्च अधिकारी होता है । वह अखाड़े का नेतृत्व करता है । कुंभ के मेले में उसके नेतृत्व में ही शाही यात्रा निकाली जाती है । मंडलेश्वर को उच्च कोटि का विद्वान , तर्कशास्त्री , ब्रह्मचारी , साहसी , धर्मनिष्ठ और युद्धविशारद होना अति आवश्यक है । उसमें धर्म के लिए मर मिटने की भावना होनी चाहिए। उसके तर्कों में इतनी शक्ति होनी चाहिए कि श्रोताओं के मन में विश्वास पैदा कर दे और शत्रुओं के सीनों को छलनी कर दे।

🔺पेशवाई :- पूना से मराठाओं को शासन चलता था । मराठा शासक को "पेशवा" कहा जाता था । पेशवा हिंदू धर्म के कट्टर समर्थक थे । वे कुंभ में अपने दल - बल के साथ पधारते थे । उनकी शाही सवारी निकलती थी जिसे "पेशवाई" कहा जाता था। अब हर अखाड़े की सवारी कुंभ में निकलती है जिसे अब भी "पेशवाई" कहा जाता है।

🔺जोट :- प्राचीन काल में भारत में अनेक पंथ और सम्प्रदाय होते थे जो दूसरों के प्राणों के प्यासे रहते थे । जिसको जहां मौका मिलता था वह दूसरे पंथ वालों को मौत के घाट उतार देता था । अतः साधु - संतों को बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती थी । अखाड़े के अकेले साधु को कहीं भी घूमने की मनाही थी । दो साधु मिलकर कहीं जाते थे जिसे "जोट" ( Pair ) कहते थे।

🔺नागफनी :- अखाड़े के कुछ साधुओं पर तुरही की तरह एक वाद्ययंत्र होता था जिसे "नागफनी" कहते थे । नागफनी के बजने पर साधु - संत एक साथ पंगत में बैठते थे और नागफनी के बजने पर ही पंगत से उठते थे । यात्रा के दौरान नागफनी के बजने पर खतरे का आभास कराया जाता था । मुसीबत में फंसा हुआ संन्यासी नागफनी बजाकर दूसरों से मदद मांगता था जैसे कि आजकल पुलिस का सिपाही सीटी ( Whistle ) बजाकर मदद बजाकर मदद की गुहार लगाता है।

🔺मढ़ी :- गोस्वामियों में कुलगोत्र को "मढ़ी" कहा जाता है । आदि शंकराचार्य ने महामठ बनाये थे लेकिन उनके अनुयायियों ( दशनाम संन्यासियों ) ने पूरे देश में अनेक उप मठ स्थापित किए थे जहां लोगों को दीक्षित करके संन्यासी बनाया जाता था । उप मठ का सर्वोच्च धर्माधिकारी ( महंत ) दीक्षित होनेवाले व्यक्ति को अपना नाम प्रदान करता था जिसे मढ़ी कहा जाता है । "महंत की गद्दी" को मढ़ी कहा जाता है । उदाहरण के लिए , मेरी मढ़ी का नाम "रामदत्ती" है जिसका अर्थ है कि मेरा कोई पूर्वज दशनाम संन्यासी रामदत्त गिरि का शिष्य बना होगा । पहले ज़माने में मढ़ी के नाम को गुप्त रखा जाता था ताकि कोई गैर दशनाम गोस्वामी पंथ में घुसपैठ न कर जाये लेकिन अब ज़माना बदल गया है तो सब कुछ पारदर्शी हो गया है । वैष्णवों ( ब्राह्मणों ) में समान ऋषि गोत्र में विवाह नहीं हो सकता है । दशनाम गोस्वामियों में समान ऋषि गोत्र में विवाह हो सकता है लेकिन समान मढ़ी में विवाह करना वर्जित है । यही दशनाम की परम्परा है।
दशनाम संन्यासियों की अरण्य , तीर्थ , आश्रम , पर्वत , सागर और सरस्वती शाखाओं ने अपनी मढ़ियां स्थापित नहीं कीं लेकिन गिरि की सत्ताईस , वन की चार , भारती की चार और पुरी की सोलह मढ़ियां है । एक मढ़ी तिब्बत में लामा की है जो गिरि शाखा से सम्बंधित है । इस लिहाज से गिरि शाखा की अट्ठाइस मढ़ियां हैं । कथा या विवाह के अवसर पर मढ़ी को पूछा जाता है । केवल खानदान के लोग ही अपनी मढ़ी की जानकारी दे सकते हैं , बाहर का आदमी ऐसी जानकारी नहीं दे पायेगा।

🔺शैवागम :- आर्यों के पवित्र ग्रंथों को "वेद" कहते हैं जिसका अर्थ होता है "ज्ञान" ( Knowledge ) । उसी प्रकार शैवों के पवित्र ग्रंथों को "शैवागम" कहा जाता है जिसका अर्थ होता है "सम्पूर्ण ज्ञान" ( Complete Knowledge ) । शैवागमों की संख्या अट्ठाइस है : कार्मिक , योगज , चिंत्य , कारण , अजित , दप्ति , सूक्ष्म , सहस्र , अंशुमन , सुप्रभेद , विजय , निश्वास , स्वायंभुव , अनल , वीर , रौरव , मकुट , विमल , चंद्रज्ञान , बिम्ब , ललित , प्रोद्रीत , सिद्ध , संतान , सर्वोक्त, पारमेश्वेर , किरण और वातुल । वैष्णवों ( ब्राह्मणों ) ने इन्हें नष्ट कर दिया है , अब तो बस इनके नाम ही रह गए हैं।

🔺तीर्थ :- तीर्थ का अर्थ उस स्थान से है जहां पर पवित्र स्नान किया जाता है । गोस्वामियों के लिए गंगोत्री , यमुनोत्री , संगम , पुष्कर तो तीर्थ हैं ही लेकिन भारत की चार दिशाओं में चार महातीर्थ हैं - -- पूर्वी भारत में "महोदधि" , पश्चिमी भारत में "गोमती" , उत्तरी भारत में "अलकनंदा" और दक्षिणी भारत में "तुंगभद्रा"।

🔺धाम :- धाम का अर्थ होता है पवित्र स्थान । दशनाम गोस्वामियों के भारत की चार दिशाओं में चार धाम हैं --- पूर्वी दिशा में "पुरी" ( उड़ीसा ) , पश्चिमी दिशा में "द्वारका" ( गुजरात ) , उत्तरी दिशा में "बद्रिकाश्रम" ( उत्तराखंड ) , और दक्षिणी दिशा में "श्रृंगेरी" ( मैसूर , कर्नाटक )

🔺अवस्थाएं :-- आत्मा से शरीर में चेतना रहती है । चेतन शक्ति की चार अवस्थाएं हैं --- जाग्रतावस्था , स्वप्नावस्था , सुषुप्तावस्था और तुरियावस्था । जाग्रतावस्था में पांच इंद्रियों के द्वारा आत्म शक्ति इस संसार को अनुभव करती है। इस अवस्था में शरीर की बड़ी भूमिका होती है । स्वप्नावस्था में शरीर से ज्यादा मन की भूमिका होती है। जो देखा, सुना और अनुभव किया वह इस अवस्था में उभरकर आता है। सुषुप्तावस्था में शरीर और मन दोनों शांत हो जाते हैं लेकिन आत्मा के द्वारा सब अनुभव होता है। तुरियावस्था में केवल ईश्वर के प्रति लौ लग जाती है जिसे शून्य अवस्था या मुक्ति अवस्था भी कहते हैं । मरने पर गोस्वामी को समाधि दी जाती है तो माना जाता है कि मृतक ईश्वर के भाव में लीन है।

🔺 समाधि :- दशनाम गोस्वामियों में मृत्यु के बाद समाधि देने की प्रथा है । दो प्रकार की समाधियों का प्रावधान है --- जल-समाधि और भू-समाधि । नदियां दूषित न हों इसलिए जल-समाधि को टाल दिया गया है । भू-समाधि ही अधिक प्रचलन में है । व्यक्ति को मरते ही खाट या पलंग या सोफा से नीचे उतार दिया जाता है और जमीन पर पद्मासन में बैठा दिया जाता है। नहला - धुलाकर घंटा - घड़ियाल बजाते हुए शव यात्रा निकाली जाती है । ज़मीन में गड्ढा खोदकर मंत्रोच्चार के साथ अंतिम विदाई दी जाती है । रामरस ( नमक ) और मिट्टी से ढक देते हैं । संन्यासी का सोलह दिनों बाद भंडारा होता है । समाधि के ऊपर एक लघु शिवलिंग भी स्थापित किया जाता है । उसके ऊपर शिवालय भी बना देते हैं।
शहरों में समाधियों के लिए जगह नहीं है, अतः गोस्वामी लोग मजबूरी में वहां मृतकों का दाह-संस्कार कर रहे हैं।

🔺 गोस्वामियों के वर्ग :-- दशनाम गोस्वामियों के दो मुख्य वर्ग हैं --- ( 1) विरक्त गोस्वामी और ( 2 ) गृहस्थ गोस्वामी । विरक्त वर्ग तो धार्मिक सैनिक शाखा ( Religious Military Branch ) है जबकि सामान्य गोस्वामी तो धार्मिक सिविलियन शाखा ( Religious Civilian Branch ) है । विरक्त गोस्वामी ( संन्यासी ) विवाह नहीं कर सकता है और बच्चे पैदा करने की भी मनाही है जबकि गृहस्थ गोस्वामी विवाह भी कर सकता है और बच्चे भी पैदा कर सकता है । विरक्त का उत्तराधिकारी उसका शिष्य होता है जबकि गृहस्थ गोस्वामी के उत्तराधिकारी उसके बच्चे होते हैं।

🔺गुरू - शिष्य परंपरा :- दशनाम संन्यासियों में गुरू - शिष्य परंपरा प्रचलित है । संन्यास धारण करनेवाला व्यक्ति अपना गुरू चुनता है । पिता के नाम पर गुरू का नाम लिखा जाता है । वह शिष्य ( चेला ) को अपने पुत्र की तरह पालता है । चेला ही बाद में उत्तराधिकारी बनता है। यदि अपने जीवित रहते हुए गुरू अपना उत्तराधिकारी नहीं बना पाता है तो फिर उस क्षेत्र के विद्वान लोग सर्वसम्मति से चुनाव करते हैं। ज्यादा बड़े मामले में पंच परमेश्वर और विभिन्न अखाड़ों के संत - महंत निर्णय लेते हैं।

🔺दंडी स्वामी :- जिस साधु के हाथ में दंड ( डंडा ) होता है वह दंडी स्वामी कहलाता है । दंडी स्वामी केवल ब्राह्मण ही बन सकता है । दंडी स्वामी निर्गुण ब्रह्म की उपासना करता है।

🏵

==================

जिस राष्ट्र में चार धाम 12 ज्योति लिंग 52 शक्तिपीठ, 7 पुरी, 108 सिद्धपीठ अनेकों दिव्य मंदिर हैं, फिर भी अगर KAHI  OR जान...
11/06/2023

जिस राष्ट्र में चार धाम 12 ज्योति लिंग 52 शक्तिपीठ, 7 पुरी, 108 सिद्धपीठ अनेकों दिव्य मंदिर हैं, फिर भी अगर KAHI OR जाना पड़े आप हिन्दू हो ही नहीं...

धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः।तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते।।भावार्थ:धर्म को जाननेवाले, धर्म मुताब...
06/04/2023

धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः।
तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते।।
भावार्थ:
धर्म को जाननेवाले, धर्म मुताबिक आचरण करनेवाले, धर्मपरायण, और सब शास्त्रों में से तत्त्वों का आदेश करनेवाले गुरु कहे जाते हैं।

Address

Dighori Shree Ram Nagar Bahadura Fata Dighori Nagpur
Nagpur

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Pt rajendra puri posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share