26/11/2020
संविधान दिन चिरायु हो !
जब, देश के कई राज्यों में, भाजपा की सरकारे बनना शुरू हुई और केंद्र में भी भाजपा की सरकारे बनने के आसार नजर आने लगे तबसे, 'देश में भाजपा की सरकार आयी तो, बाबासाहब का संविधान, देश का संविधान बदला जायेगा - अम्बेडकरवादियों सावधान' इस तरह के नारो की गूंज, सर्वत्र फ़ैलाने का काम कांग्रेसियों ने शुरू किया और तथाकथित अम्बेडकरी नेता, विद्वान, लेखक और भाषण बहाद्दूरोंने, कांग्रेस के इस सुर में, बड़े ही जोर-शोर से अपना सुर मिलाना शुरू कियाl
हम सब जानते है की, साम्यवादी विचारधारा के लोग संसदीय लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते तो, विश्वास रखने का सिर्फ ढोंग करते है l इस विचारधारा की मातृभूमि और जननी 'रूस' में एकही पार्टी का राज होता है और दूसरी पार्टी चलाने का कोई प्रावधान भी नहीं l यहाँ आजादी दी नहीं जाती, फिर वह व्यक्ति की हो या समूह की l यहाँ तो, आजादी छीनी जाती है l विचारो से कम्युनिस्ट चीन रूस का बड़ा भाई है l लोकतंत्र की आड़ में वे हूकूमशाह ही है l देश में बुलेट की बात करनेवाले 'नक्सल' इसी विचारो की नाजायज औलाद है, जो बैलट की जगह बुलेट पर विश्वास रखती है l ऐसे, ये गैर लोकतंत्रवाद के पुरोधा जो-साम्यवादी व नक्सलवादी है, 'भाजपा देश का संविधान बदलेगी', कांग्रेस के इस सुर में अपना सुर मिलाकर अम्बेडकरवादी जनता को भ्रमित करने का काम कर रहे हैl
साथियो ! समय की आवश्यकतानुसार संविधान में 'उचित संशोधन' करने का प्रावधान हमारे संविधान निर्माता ही कर गए l उसके अनुसार, देशहित को ध्यान में रखते हुए संविधान में संशोधन होना भी चाहिए। लेकिन जब, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जी की, सन १९७१ में रायबरेली लोकसभा से हुयी जीत को १२ जून १९७५ को इलाहबाद हाई कोर्ट ने अवैध करार देकर इंदिराजी को ६ साल के लिए चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई और २४ जून १९७५ को, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहबाद हाई कोर्ट के इस फैसले को बरक़रार रखा, तब देश में इंदिराजी के त्याग पत्र की मांग के लिए आंदोलन खड़ा हुआ तब इंदिराजी ने इस आंदोलन को दबाने के लिए तथा अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश में आपातकाल घोषित किया और इस आपातकाल के चलते देश में सारे चुनावो पर पाबंदी लगी और नागरिको के अधिकारों को समाप्त करने की मनमानी की गयी। मतलब कांग्रेस की सर्वेसर्वा सन्माननीय इंदिरा गाँधी जी ने देश नहीं, कांग्रेस नहीं तो केवल और केवल अपनी कुर्सी कायम रखने के लिए सन १९७५ में, देश में आपातकाल लागु कर, सन १९७६ में, ४२ वे संविधान संशोधन के तहत, देश के संविधान में तक़रीबन ४१ संशोधन कर डाले, इतना ही नहीं तो संविधान में १४ नए आर्टिकल भी जोड़ दियेl इसीलिए देश, इस संशोधन को 'मिनी संविधान' कहता है l
'हमारा देश, किसी एक धर्म विशेष का राष्ट्र नहीं होने से हमारे संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द की कोई आवश्यकता नहीं', ऐसा आशय व्यक्त करते हुये, डॉ बाबासाहब आंबेडकर जी ने, संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ शब्द के समावेश के सन्दर्भ में रखे गए प्रस्ताव का, संविधान सभा में पुरजोर विरोध किया था l इसलिए तब, इस सेक्युलर शब्द का संविधान की प्रस्तावना में अंतर्भाव नहीं हो पाया l बाबासाहब ने, संविधान सभा में कांग्रेस के जिन-जिन प्रस्तावों का पुरजोर विरोध कर, उन्हें संविधान में सामिल करने से रोका था, उनमे से अधिकतर बातो को इंदिरा गाँधीजी ने ४२ वे संविधान संशोधन द्वारा, संविधान में सामिल कर लिया l जिसके तहत, सेक्युलर व सोशलिस्ट शब्द, संविधान की प्रस्तावना में नये से जोड़ा गया l
न्यायपालिका, विधिपालिका (संसद) और कार्यपालिका के साथ-साथ लोकतंत्र प्रणाली भी, हमारे संविधान की आधारशीला है l संविधान के अनुसार, हमारी न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र है l लेकिन, ४२ वे संविधान संशोधन द्वारा न्यायपालिका की स्वतंत्रता का हनन किया गया l इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा, इंदिरा जी की जीत को गैर कानूनी ठहराने से, हड़बड़ाई इंदिरा जी ने चुनावी मसलो को न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया l वैसे ही, ४२ वे संविधान संशोधन द्वारा, लोकसभा का कार्यकाल ५ साल से बढ़ाकर ६ साल किया, देश की अंतर्गत स्थिति व कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए, देश के अंदर, सेना का वापर करने का प्रावधान किया l राज्यों के अनेक अधिकारों का हनन किया गया तब कोई तथाकथित अम्बेडकरवादी नेता, विद्वान, लेखक व भाषण बहाद्दर और आज संविधान बचाओ का नारा देनेवाले, साम्यवादी व नक्सल संगठन क्यों चुप रहे ? चुप ही नहीं रहे, बल्कि इनमे से अधिकतर, इंदिरा जी के साथ हो लिए।
बौद्ध देश 'तिब्बत' को गुलाम बनाने के बाद तिब्बत की आजादी के उठे स्वर कुचलने के लिए चीन की कम्युनिस्ट सेना द्वारा एक ही दिन में २०० तिब्बतियों का खात्मा किया गया l तिब्बत पर चीन की कम्युनिस्ट सेना के कब्जे से भुकमरी, फांसी तथा श्रम शिबिरो में बंदी का शिकार होकर अबतक १० लाख से ऊपर तिब्बती मारे गए l तिब्बती संस्कृति और बौद्ध धम्म का विध्वंस करने की नियत से ६००० से अधिक महाविहार, इसी कम्युनिस्ट सेना द्वारा ध्वस्त किये गए l भिक्षु एवं भिक्षुणीयो को केवल, 'वे बुद्ध धम्म का पालन करते है', इस एक आरोप के तहत जेलों में ठूस कर छत से उल्टा टांगना, उनके आतंरिक अंगो में सिगरेट के चटके देना तथा बिजली की छड़ी ठूसना और धातु की तारो से उन्हें बुरी तरह पीटना इत्यादि, मरण यातनायुक्त उत्पीड़न किया जा रहा है l तिब्बती युवक तथा युवतियों की जबरन नसबंदी कराई जाती है l इस चीन और रुस के कम्युनिस्ट विचारों से प्रेरित, भारत के कम्युनिस्ट, संविधान व मानवाधिकारों की दुहाई देकर जब भारत में आंदोलन खड़े करते है तब देश की तमाम जनता ने विशेषकर अंबेडकरी समुदाय ने कम्युनिस्टों की नियत से सावधान रहने की जरुरत है l
सन १९५६ में, अनुसूचित वर्ग के महार-चमार, मांग व अन्य अनुसूचित समूह द्वारा बुद्ध धम्म की दीक्षा लेने से उनका अनुसूचित वर्ग का दर्जा समाप्त कर दिया गया था, इसीलिए, तब से लेकर सन १९९० तक, लगातार अनुसूचित वर्ग का अपना दर्जा व आरक्षण पाने के लिए/ कायम करने के लिए अनुसूचित वर्ग, देश के गलियारों से लेकर दिल्ली की सड़को पर उतर कर, लगातार आंदोलन करता रहा l फिर भी कांग्रेस की सरकारों ने इसकी सुध नहीं ली l
लेकिन, संविधान की धारा २५ (2) (ख) स्पष्टीकरण २ के नुसार, 'हिन्दुओ के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जायेगा की, उसके अंतर्गत सिख, जैन या बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्तियों के प्रति निर्देश है और हिन्दुओ की धार्मिक संस्थाओ के प्रति निर्देश का अर्थ तदनुसार लगाया जायेगा' और इसके आधार पर, संविधान (अनुसूचित जाती) आदेश क्र.१९, सन १९५० के सेक्शन ३ नुसार अनुसूचित जाती का दर्जा पाने के लिए, अनुसूचित जाती के व्यक्ति का प्रथम हिन्दू होने का प्रावधान किया गया था तथा पश्चात, इस आदेश में सिख धर्म को जोड़ा गया और १९९० में जनता दल की सरकार ने, इस घटना आदेश में संशोधन कर, हिन्दू व सिख के साथ-साथ, बौद्धों का भी समावेश किया तब जाकर, १९५६ के बाद से अनुसूचित जाती से दीक्षित बौद्धों को सन १९९० से केंद्र में अनुसूचित जाती के होने का हक़ पुनश्च बहाल हुआ और तबसे वे अनुसूचित जाती के आरक्षण व अन्य लाभों से पुनश्च लाभान्वित होने लगे l
संविधान की धारा २५ (2) (ख) स्पष्टीकरण २ में, मुस्लिम तथा ईसाई भाइयो का उल्लेख नहीं होने से, अनुसूचित जाती के जिन व्यक्तियो ने ईसाई और इस्लाम धर्म कबूल किया, उन्हें अनुसूचित जाती का मानने की, हमारा कानून इजाजत नहीं देता l यह भी एक विभेद ही है, जिसके चलते अनुसूचित जाती के 'हिन्दू, सिख, बौद्धों ', के हक़ सुरक्षित है।
सन १९८९ में, अनुसूचित जाती-जनजाति अत्याचार निवारण कानून बनाया गया l सन २०१४ में, देश में भाजपा की पूर्ण बहुमतवाली सरकार बनी l तब २५ साल के पश्चात, अनुसूचित जाती-जनजाति वर्ग के हित में, इस कानून को और मजबूत करने के लिए भाजपा सरकार ने सन २०१५ में उचित संशोधन किये, जैसे अनुसूचित जाती-जनजाति वर्ग के दूल्हों को घोड़ी पर चढ़कर बारात ले जाने की मनाई करने पर, इस कानून के तहत जुर्म माना गया l इस वर्ग के लोगो को, बंधवा मजदूर बनाने पर जुर्म माना गया l सिर पर मैला ढोने के लिए, बाध्य करने को, जुर्म माना गया l अनुसूचित जाती-जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत, न्यायालय में सालो-साल चलनेवाले मुकदमो से, पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता था l इसलिए इस जुर्म के लिए चलने वाले केसेस के सन्दर्भ में न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल होने के पश्चात दो माह की अवधि में ही, केस का निर्णय करने की समय सिमा का प्रावधान भाजपा सरकार ने किया, इससे पीड़ित को न्याय मिलने की सम्भावनाये बढ़ गयी l
"ब्रिटेन की संसद ने ४ जुलाई, १९४७ को भारत वर्ष के विभाजन पर मोहर लगाते ही भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा खींचने की जिम्मेवारी सिरिल रेडक्लिफ को सौंपी गयी और बंगाल का कौनसा हिस्सा पूर्व पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में रहे, यह निश्चित करने के लिए 'बंगाल बॉउंड्री कमिशन' स्थापित हुआ l
बांग्लादेश में चकमा बौद्धों की संख्या तक़रीबन ४ लाख से अधिक है और उसका 'चित्तगांव पर्वतीय क्षेत्र', यह बौद्ध बहुल है l ३ लाख के करीब चकमा बौद्ध, इसी चित्तगांव पर्वतीय क्षेत्र के निवासी है l १५ अगस्त, १९४७ को, भारत अंग्रेजो की गुलामी से मुक्त हुआ तब बंगाल का चित्तगांव पर्वतीय क्षेत्र, भारत के हिस्से में था l इसलिए, इस पर्वतीय क्षेत्र के नागरिकों ने बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ १५ अगस्त, १९४७ को भारत की आजादी का जश्न मनाया l लेकिन सिरिल रेडक्लिफ द्वारा गठित, बंगाल बॉउंड्री कमिशन ने १७ अगस्त, १९४७ को अपनी रिपोर्ट जारी कर, इस बौद्ध बहुल 'चित्तगांव पर्वतीय क्षेत्र' को तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने, पूर्व पाकिस्तान याने वर्तमान बांग्लादेश को सौंप दिया l
पाकिस्तान कहे या वर्तमान मे बांग्लादेश, यह दोनों घोषित मुस्लिम राष्ट्र है l बांग्लादेश के मुस्लिम बंधुओ द्वारा होनेवाले अमानुष अत्याचारों से तंग आकर, आखिरकार सन १९७०-७१ से इन चकमा बौद्ध भाइयों ने अपने ऊपर होनेवाले अत्याचारों का सामना करने की ठानी l सन १९८७ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश की पुलिस और सेना द्वारा मनमाने तरीकों से बौद्ध कार्यकर्ताओं को बंदी बनाकर उनपर अत्याचारों का सिलसिला शुरू हुआ l
इन अत्याचारों से हजारो बौद्ध कार्यकर्ताओं की मौते हुयी l सेकड़ो महिला व बौद्ध युवतियों का बलपूर्वक शारीरिक शोषण किया गया l बौद्ध भिक्षुओ की हत्याए की गयी तथा बौद्ध विहारों को लूटने के पश्चात उन्हें ध्वस्त किया गया l परिणाम स्वरुप हजारो चकमा बौद्धों ने भारत में शरण ली और शरणार्थी जीवन जीने के लिए विवश हुए, जिनकी संख्या लाखो में है l
'नागरिकता (संशोधित) कानून' २०१९ ने, ऐसे लाखो शरणार्थी बौद्धों को, उनके मूलभूत अधिकार व नागरिकता प्रदान कर, सम्मानित व प्रताड़ना रहित जिंदगी जीने का रास्ता खोला है l
भाजपा सरकार ने, अपने किसी भी कार्यकाल में देश के संविधान/ कानून में, कोई ऐसा एक भी संशोधन नहीं किया, जिससे अनुसूचित जाती-जनजाति वर्ग का अहित होता हो। उल्टा, इस वर्ग के हित को ध्यान में रखते हुये, कानून में जो-जो आवश्यक बदलाव करने पड़े या फिर नये कानून बनाने पड़े, वे भाजपा सरकार ने बनाये।
जय भीम! जय भारत!