01/05/2026
बहू, हमारे घर में जेठ से बात नहीं करते.....
"राकेश भैया, शक्कर खत्म हो गई है, आप आते वक्त ले आइये और ये मम्मी जी की दवाई भी।"
नेहा ने अपने जेठ को बाहर जाते हुए रोककर कहा, सुमिता जी ने सुन लिया, "ये क्या बहू, राकेश तुझसे बड़ा है और तू उसे ही आदेश दे रही है, ये काम तू भी तो कर सकती थी, जेठ को काम बता रही हैं, उसे पहले ही दुकान के लिए देरी हो रही है, थोड़ा पल्लू नीचे कर और अब अपना काम कर, ज्यादा बात मत किया कर, हमारे घर में जेठ से बात नहीं करते हैं।"
नेहा चुपचाप रसोई में आ गई, सब लोगों के लिए खाना तैयार करना था, कहने को घर में सब है फिर भी उसका मन नहीं लगता है, उसके पति आशीष जब से बाहर काम ढूंढने गये है, तब से वो अकेलापन महसूस करती है, घर में कहने को सास-ससुर, जेठ-जेठानी, उनके बच्चे हैं, पर वो सबके बीच रहकर भी अकेली है।
अभी शादी को छह महीने ही तो हुये थे, आशीष और उसकी शादी बड़ी धूमधाम से हुई थी, वो दिन याद करके चेहरे पर उसके मुस्कान आ जाती है पर दूसरे ही पल आशीष से दूर रहकर उसका चेहरा मुरझा जाता है।
शादी के समय आशीष कुछ नहीं करते थे, ये बात ससुराल वालों ने छिपाई थी और कहा था कि वो अपने बड़े भाई के साथ ही बिजनस संभालता है। आशीष ने भी कुछ बताया नहीं, शादी के बाद कुछ दिन तो ठीक निकले पर धीरे-धीरे सबने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये।
उस पर सब घर के काम का बोझ सा डाल दिया और आशीष भी सबके कहे अनुसार घर के और बाहर के काम करता था, उसकी स्थिति घर में नौकर जैसी ही थी।
ये देखकर नेहा को बहुत दुख होता था, मायके में सौतेली मॉं ने घर देखा भाला नहीं और शादी कर दी, अब अपना दुख किससे कहती?
एक दिन उसने आशीष को समझाया, "आप कुछ काम क्यों नहीं करते? इस तरह इधर से उधर समय बर्बाद करते रहते हैं।"
आशीष सीधे मन का था वो हंसने लगा कि, "रोज इतने सारे काम तो करता हूं, भैया के बिजनस का सामान इधर से उधर ले जाता हूं, साथ ही गेहूं पीसवाकर लाता हूं, दूध लाता हूं, बच्चों को स्कूल छोड़कर आता हूं और वापस भी लाता हूं, राशन का सामान लाता हूं, सब्जियां भी, साथ में घर के इतने सारे काम करता हूं, सुबह से रात तक लगा रहता हूं।"
"हॉं, आप लगे रहते हो, लेकिन इसके लिए आपको कोई पगार नहीं मिलती है, पता नहीं क्या कारण रहा कि आपने पढ़ाई करने के बाद भी नौकरी नहीं की और व्यापार भी नहीं किया।"
ये सुनकर वो कहता है, "मैं नौकरी के लिए बाहर गया था,पर अकेले मेरा मन नहीं लगा, तो भैया ने कहा कि वापस आजा और मेरी मदद करवा देना।"
नेहा फिर बोली, "वो भी ठीक है, पर उसके लिए आपको पैसे तो नहीं मिलते है, आप वापस काम पर जाइये और दो पैसे कमाने वाला कोई काम ढूंढ़िए ताकि घर चल सकें।"
"नेहा, घर तो चल रहा है, दो समय की रोटी मिल जाती है और क्या चाहिए?"
नेहा चुप हो जाती है , फिर कहती हैं, "ये रोटी खाना अलग बात है, पर आत्मसम्मान की रोटी खाना अलग बात है, मैं मॉं बनने वाली हूं, होने वाले बच्चे की और मेरी जिम्मेदारी आपकी है, मतलब हम दोनों का खर्चा आपको उठाना है, ये आपका फर्ज है।"
"मैं रोज अपनी सास और जेठानी के ताने नहीं सुन सकती हूं कि मेरा पति बेरोजगार हैं, कुछ कमाता नहीं है, मेरे हलक में रोटी भी बड़ी मुश्किल से उतरती है।"
नेहा की बात सुनकर आशीष को एकदम से झटका सा लगा, उसे महसूस हुआ कि नेहा सही कह रही है, उसे यहां इस शहर में नौकरी नहीं मिल रही है तो क्या हुआ वो दूसरे शहर में चला जायेगा, ये कहकर वो नौकरी की तलाश में चला गया, उसके एक दोस्त ने उसे अपने पास बुला लिया ताकि वो वहां पर रहकर नौकरी ढूंढ सकें।
परिवार वालों ने बहुत समझाया कि, "मत जा, तुम दोनों को खाना तो मिल रहा है, और क्या चाहिए?"
नेहा ने समझाया कि, "खाने के अलावा और भी जरूरतें होती है, फिर बच्चा भी हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी भी तो बनती है, बड़े भैया तो अच्छे हैं पर भाभी नहीं चाहती कि आप उनके साथ काम करें, भाभी का व्यवहार थोड़ा अलग है।"
आशीष ने शहर जाने की तैयारी कर ली त़ब नेहा से कहा, "यहां तुम्हारा ध्यान कौन रखेगा?"
"राकेश भैया है वो बहुत अच्छे हैं, बिल्कुल बड़े भाई की तरह मेरा ख्याल रखते हैं, आप चिंता मत करिये, आप नौकरी ढूंढने जाइये, आपको जरूर सफलता मिलेगी। "
आशीष को मम्मी -पापा ने समझाया पर वो नहीं रुका, उसे अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी थी।
जब से आशीष गया था, तब से उसके मम्मी -पापा नेहा से भी नाराज़ रहने लगे, उन्हें लगता था कि बहू ने आते ही बेटे को हमसे दूर कर दिया, बेटा भाग-भाग कर सारे काम कर देता था, पर अब वो सारे काम कौन करेगा?
उनका बेटा नौकरी करेगा और फिर बहू को लेकर अलग हो जायेगा तो बुढ़ापे में भी कौन सेवा करेगा? हालांकि वो अपने बड़े बेटे और बहू के साथ रह रहे थे।
वहीं नेहा की सोच थी कि जिस पति के भरोसे वो ससुराल में आई है, अगर वो ही उसकी जिम्मेदारी नहीं उठायेगा तो वो और उसका बच्चा किसके भरोसे पलेंगे?
नेहा की सास ने उस पर इल्ज़ाम लगाया कि, "बहू तो हमारे साथ रहना ही नहीं चाहती है, इसलिए बेटे को दूर कर दिया।"
नेहा सब चुपचाप सहन कर रही थी, क्यों कि उसे अपने बड़े भाई समान जेठ जी का सहारा था, नेहा गर्भवती थी तो ज्यादा काम नहीं कर पाती थी, थक जाती थी तो राकेश उसे आराम करने को कहता तो ये सुनकर उसकी पत्नी अनु जल-भुन जाती थी।
"आप मेरे पति हो तो आपको नेहा का ख्याल रखने की कोई जरूरत नहीं है, उसका ख्याल रखने वाला उसका पति तो दूसरे शहर चला गया, वो हमारे भरोसे थोड़ी इस घर में आई है।"
एक दिन उसका बड़ा जी मचला रहा था, उसकी कुछ चटपटा खाने की इच्छा हो रही थी तो उसने राकेश को फोन किया, "भैया आते वक्त शर्मा की दुकान वाले गोलगप्पे ले आइये, आज बड़ा मन कर रहा है।"
राकेश ने घर आते ही पैकेट नेहा को दे दी, सब लगभग सो चुके थे, नेहा अपने कमरे में बैठकर गोलगप्पे खाने लगी तो अनु की नजर उस पर पड़ गई और उसने घर में कोहराम मचा दिया, "ये तो मेरे पति को मुझसे छीन लेगी, इसके तो लक्षण सही नहीं है, इसने तो मेरे पति को अपना गुलाम बना लिया है, मैं अब इस घर में नहीं रह सकती हूं, तुझे राकेश ही मिला था, अरे! वो तेरा जेठ है, अपनी चटोरी जीभ को काबू में नहीं रख सकती है क्या? गोलगप्पे नहीं खाती तो तेरा बच्चा मर तो नहीं जाता! मेरा पति तेरी सेवा करने के लिए नहीं है।"
अनु अनाप- शनाप कहने लगी, नेहा की आंखों से आंसू बहने लगे।
"भाभी, मैंने भैया से कुछ मंगवा लिया तो क्या हो गया ?मैं भैया को दिल से अपना बड़ा भाई मानती हूं, मेरा तो कोई बड़ा भाई नहीं है, मम्मी बचपन में ही चली गई थी, दूसरी मॉं ने भी प्यार नहीं दिया और बस मेरी शादी निपटा दी।"
"मैंने राकेश भैया को हमेशा अपना बड़ा भाई माना है और उस नाते कुछ सामान मंगवा लिया तो क्या हो गया? मैं पापाजी को कुछ कह नहीं सकती हूं, मम्मी जी भी मुझे समझती नहीं है, आखिर उनके बेटे का अंश ही तो मेरे पेट में पल रहा है।"
अनु ने सुना और गुस्से में पैर पटकते हुए अपने कमरे में आ गई । उधर आशीष की नौकरी लगी नहीं उसे काम की तलाश थी, वो जगह-जगह इंटरव्यू दे रहा था। नेहा की डिलेवरी के दिन नजदीक आ रहे थे, अब वो और भी परेशान रहने लगी थी।
डॉक्टर के चेकअप करवाने वो अपनी सास के साथ जाती थी, लेकिन सास को अपने मायके जाना पड़ गया, उनके भतीजे के यहां गृहप्रवेश था।
ससुर जी आधा समय पार्क घूमने चले जाते थे और दोस्तों के साथ वक्त बिताया करते थे, वो घर में क्या हो रहा है, ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।
एक दिन सुबह अनु बच्चों को स्कूल छोड़ने गई और वहां अपनी सहेलियों के साथ पार्क में घूमने लग गई, नेहा को पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा था, घर में कोई नहीं दिखा तो उसने राकेश से कहा, उसने फटाफट मोटरसाइकिल निकाली और नेहा को बैठाकर अस्पताल ले गया, वहां पूरा चेकअप करवाया, डॉक्टर ने कहा, "अभी डिलेवरी में समय है, ऐसा दर्द गर्भावस्था में हो जाता है।"
कुछ दवाइयां दिलाकर राकेश नेहा को वापस ले आया।
घर के बाहर मोटरसाइकिल रोकी ही थी, कि उसकी सास भी मायके से आ चुकी थी और दूसरी ओर से अनु भी आ रही थी। अपने पति के साथ नेहा को देखकर वो फिर से आग बबूला हो गई, सास भी नेहा पर गुस्सा करने लगी।
"बहू, ऐसी बेशर्मी तो पहली बार देखी है, तू तो जेठ के साथ बैठकर मोटरसाइकिल पर घूमने को निकल गई।"
तभी अनु भी बोलती है, "तुझे मेरा ही सुहाग मिला था क्या? अब तेरा पति तो तेरे साथ नहीं रहता, तुझे छोड़कर चला गया है, तो तू मेरे पति पर ही डोरे डाल रही है, तुझे शर्म नहीं आई?"
ये सब सुनकर आज राकेश से रहा नहीं गया, "आप दोनों चुप करिये, आखिर ये सब झूठा इल्जाम क्यों लगा रहे हो? मैं नेहा को अपनी छोटी बहन मानता हूं और एक बहन अगर तकलीफ में है तो भाई का फर्ज बनता है कि मैं उसे अस्पताल दिखा लाऊं, और मेरे अलावा घर में कौन है? जिससे ये मदद मांगती? मैं बड़े भाई होने के नाते इसे डॉक्टर के दिखा लाया तो क्या गुनाह हो गया?"
"आप दोनों अपनी घटिया सोच बदलिए, यहां पर मेरा छोटा भाई नहीं है और उसकी पत्नी को सबके साथ और सहयोग की जरूरत है, तो क्या हम उसे अकेला छोड़ दें?"
"ये भी तो सुबह से लेकर रात तक हम लोगों के लिए लगी रहती है, क्योंकि ये हमें अपना मानती है, तो क्या हम सबका फर्ज नहीं है हम भी आशीष की अनुपस्थिति में इसका ख्याल रखें?"
नेहा की आंखे भर आती है, "मम्मी जी आप भी ये क्या सोच रही है, आप दोनों भी तो किसी की पत्नियां हैं, क्या पत्नी अपने पति के होते हुए किसी दूसरे के बारे में सोचती है? तो आपने मेरे और भैया के रिश्ते को कलंकित क्यों कर दिया?
"अनु भाभी मैं आपसे पूछती हूं कि, "देवर जब भाभी का छोटा भाई बन सकता है तो जेठ जी मेरे बड़े भाई क्यों नहीं बन सकते हैं? आप भी तो आशीष से इतना काम करवाती थी, उनका फर्ज भी बनता है वो आपसे छोटे हैं, आपके छोटे भाई के समान है तो मैंने राकेश भैया में अपने बड़े भाई की छवि देखी तो क्या बुरा किया है?"
"हमारे रिशते को बदनाम क्यों किया जा रहा है?
राकेश भैया मुझे अपनी छोटी बहन मानते हैं और मैं उन्हें बड़े भाई के रूप में ही उनका सम्मान करती हूं।
क्या एक छोटी बहन बड़े भाई से मदद नहीं ले सकती है? जेठ का पद बड़ा होता है, अगर वो अपने छोटे भाई की पत्नी का ख्याल रख भी लेते हैं तो इसमें इतनी बातें बनाने वाली क्या बात है?"
तभी नेहा की सास चिल्लाई, "नेहा तू चुप कर, जेठ कभी भी बड़ा भाई नहीं हो सकता है, जेठ तो जेठ रहता है, हमारे घर में जेठ से पल्ला लिया जाता है, जेठ और ससुर कमरे में हो तो बहूंएं उस कमरे में नहीं बैठती है और तू मोटरसाइकिल पर बैठकर कैसे चली गई? ये मायके के रिशते मायके में ही रहने दे, ससुराल में सबसे शर्म करनी होती है।"
"यहां ससुराल में सबका मान रखना होता है, ये बड़े भाई कहकर जेठ के रिश्ते को नकारा नहीं जा सकता है, आशीष को आने दे, मैं तेरी शिकायत करूंगी, तभी तुझे अक्ल आयेगी, तू तो हम सबसे छोटी होकर बराबर जबान लड़ा रही है, मैं तुझे इसके लिए कभी माफ नहीं करूंगी।"
तभी अनु बोलती है, "नेहा तू मुझे माफ़ कर दें, मैंने अपने ही पति और छोटी बहन को गलत समझा। जेठ भी बड़ा भाई हो सकता है, मुझे अपने पुराने दिन याद आ गये है, जिन्हें मैं भुल गई थी।
जब मैं पहली बार गर्भवती थी तो आशीष भैया मेरा बहुत ध्यान रखते थे, तुम्हारे भैया तो अपने नये बिजनस को लेकर व्यस्त रहते थे, मेरे लिए कभी गोलगप्पे तो कभी आलू की टिक्की लाते थे, कभी आइसक्रीम तो कभी जूस भी लाते थे, वो मेरे छोटे भाई के समान मेरी हर इच्छा को पूरी करते थे।"
"राकेश तो तुम्हें आज अस्पताल लेकर गए है, पर आशीष भैया तो मुझे हर महीने चेकअप के लिए ले जाते थे, मैं वो सब कैसे भुल गई? मेरे लिए दवाईयां लाते थे, डॉक्टर के कहे अनुसार टेस्ट करवाने को लेकर जाते थे।"
"राकेश यही पर थे तब भी वो मेरा इतना ध्यान रखते थे, और हम सब तुम्हारे साथ क्या कर रहे हैं? जब आशीष भैया यहां नहीं है तो हमें ही तुम्हारा हर तरह से ध्यान रखना चाहिए, लेकिन हम सब तो तुम्हें मानसिक और शारीरिक तकलीफ दे रहे हैं।"
अनु की आंखों से लगातार पानी बह रहा था।
अनु की बातें सुनकर सास-ससुर को भी पुराने दिन याद आ गये, सब शर्मिंदा हो रहे थे, तभी सबकी नजर दरवाजे पर जाती है, वहां आशीष खड़ा था, उसे देखकर सबको आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी होती है।
"मैंने सब सुन लिया है, नेहा मुझे बताती थी तो मुझे विश्वास नहीं होता था, पर आज अपनी आंखों से देख सुन लिया है, मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि मेरे परिवार वाले मेरी पत्नी के साथ इतना बुरा व्यवहार कर सकते हैं।"
"नेहा, मेरी नौकरी लग गई है, मैंने फोन पर नहीं बताया, मैं सबको खुद आकर ये खबर देना चाहता था,और अब नेहा तुम मेरे साथ रहने के लिए सामान पैक कर लो।"
ये सुनते ही नेहा का सारा दर्द खुशी में बदल गया। वो बड़ी खुश हो गई, और आशीष को कहती हैं, "यहां सब ठीक है, घर-परिवार में छोटी बड़ी बातें होती रहती है, मैंने सबको माफ कर दिया है, आप भी मन में मैल मत रखिए, अभी आपकी नई नौकरी लगी है, घर बसाने में कुछ समय लगेगा, मेरी भी डिलेवरी होने वाली है, यहां मम्मी जी और भाभी है जो मेरी देखभाल करेंगी और राकेश भैया भी तो है, जो आपकी जिम्मेदारी निभायेंगे, नेहा की बात से आशीष भी सहमत हो जाता है और कुछ दिन रहकर वापस चला जाता है।'
कुछ महीनों बाद नेहा को बेटी होती है, दो महीने बाद वो आशीष के साथ रहने को चली जाती है, पर हर राखी पर वो राकेश भैया को राखी भेजना नहीं भुलती थी, घर की छोटी बहू घर की बेटी बन जाती है।
पाठकों, छोटा देवर भाई हो सकता है तो जेठ भी बड़ा भाई हो सकता है, दोनों ही रिश्ते पवित्र है, दोनों ही रिश्तों की अपनी गरिमा है, रिशते तो वैसे भी प्यार और विश्वास से ही निभते है।