Bishnoi Mandir Nagina

Bishnoi Mandir Nagina Prachin Bishnoi mandir at Nagina. Guru Jambheshwaray Namah!

01/05/2026

बहू, हमारे घर में जेठ से बात नहीं करते.....

"राकेश भैया, शक्कर खत्म हो गई है, आप आते वक्त ले आइये और ये मम्मी जी की दवाई भी।"

नेहा ने अपने जेठ को बाहर जाते हुए रोककर कहा, सुमिता जी ने सुन लिया, "ये क्या बहू, राकेश तुझसे बड़ा है और तू उसे ही आदेश दे रही है, ये काम तू भी तो कर सकती थी, जेठ को काम बता रही हैं, उसे पहले ही दुकान के लिए देरी हो रही है, थोड़ा पल्लू नीचे कर और अब अपना काम कर, ज्यादा बात मत किया कर, हमारे घर में जेठ से बात नहीं करते हैं।"

नेहा चुपचाप रसोई में आ गई, सब लोगों के लिए खाना तैयार करना था, कहने को घर में सब है फिर भी उसका मन नहीं लगता है, उसके पति आशीष जब से बाहर काम ढूंढने गये है, तब से वो अकेलापन महसूस करती है, घर में कहने को सास-ससुर, जेठ-जेठानी, उनके बच्चे हैं, पर वो सबके बीच रहकर भी अकेली है।

अभी शादी को छह महीने ही तो हुये थे, आशीष और उसकी शादी बड़ी धूमधाम से हुई थी, वो दिन याद करके चेहरे पर उसके मुस्कान आ जाती है पर दूसरे ही पल आशीष से दूर रहकर उसका चेहरा मुरझा जाता है।

शादी के समय आशीष कुछ नहीं करते थे, ये बात ससुराल वालों ने छिपाई थी और कहा था कि वो अपने बड़े भाई के साथ ही बिजनस संभालता है। आशीष ने भी कुछ बताया नहीं, शादी के बाद कुछ दिन तो ठीक निकले पर धीरे-धीरे सबने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये।

उस पर सब घर के काम का बोझ सा डाल दिया और आशीष भी सबके कहे अनुसार घर के और बाहर के काम करता था, उसकी स्थिति घर में नौकर जैसी ही थी।
ये देखकर नेहा को बहुत दुख होता था, मायके में सौतेली मॉं ने घर देखा भाला नहीं और शादी कर दी, अब अपना दुख किससे कहती?

एक दिन उसने आशीष को समझाया, "आप कुछ काम क्यों नहीं करते? इस तरह इधर से उधर समय बर्बाद करते रहते हैं।"

आशीष सीधे मन का था वो हंसने लगा कि, "रोज इतने सारे काम तो करता हूं, भैया के बिजनस का सामान इधर से उधर ले जाता हूं, साथ ही गेहूं पीसवाकर लाता हूं, दूध लाता हूं, बच्चों को स्कूल छोड़कर आता हूं और वापस भी लाता हूं, राशन का सामान लाता हूं, सब्जियां भी, साथ में घर के इतने सारे काम करता हूं, सुबह से रात तक लगा रहता हूं।"

"हॉं, आप लगे रहते हो, लेकिन इसके लिए आपको कोई पगार नहीं मिलती है, पता नहीं क्या कारण रहा कि आपने पढ़ाई करने के बाद भी नौकरी नहीं की और व्यापार भी नहीं किया।"

ये सुनकर वो कहता है, "मैं नौकरी के लिए बाहर गया था,पर अकेले मेरा मन नहीं लगा, तो भैया ने कहा कि वापस आजा और मेरी मदद करवा देना।"

नेहा फिर बोली, "वो भी ठीक है, पर उसके लिए आपको पैसे तो नहीं मिलते है, आप वापस काम पर जाइये और दो पैसे कमाने वाला कोई काम ढूंढ़िए ताकि घर चल सकें।"

"नेहा, घर तो चल रहा है, दो समय की रोटी मिल जाती है और क्या चाहिए?"

नेहा चुप हो जाती है , फिर कहती हैं, "ये रोटी खाना अलग बात है, पर आत्मसम्मान की रोटी खाना अलग बात है, मैं मॉं बनने वाली हूं, होने वाले बच्चे की और मेरी जिम्मेदारी आपकी है, मतलब हम दोनों का खर्चा आपको उठाना है, ये आपका फर्ज है।"

"मैं रोज अपनी सास और जेठानी के ताने नहीं सुन सकती हूं कि मेरा पति बेरोजगार हैं, कुछ कमाता नहीं है, मेरे हलक में रोटी भी बड़ी मुश्किल से उतरती है।"

नेहा की बात सुनकर आशीष को एकदम से झटका सा लगा, उसे महसूस हुआ कि नेहा सही कह रही है, उसे यहां इस शहर में नौकरी नहीं मिल रही है तो क्या हुआ वो दूसरे शहर में चला जायेगा, ये कहकर वो नौकरी की तलाश में चला गया, उसके एक दोस्त ने उसे अपने पास बुला लिया ताकि वो वहां पर रहकर नौकरी ढूंढ सकें।

परिवार वालों ने बहुत समझाया कि, "मत जा, तुम दोनों को खाना तो मिल रहा है, और क्या चाहिए?"
नेहा ने समझाया कि, "खाने के अलावा और भी जरूरतें होती है, फिर बच्चा भी हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी भी तो बनती है, बड़े भैया तो अच्छे हैं पर भाभी नहीं चाहती कि आप उनके साथ काम करें, भाभी का व्यवहार थोड़ा अलग है।"

आशीष ने शहर जाने की तैयारी कर ली त़ब नेहा से कहा, "यहां तुम्हारा ध्यान कौन रखेगा?"

"राकेश भैया है वो बहुत अच्छे हैं, बिल्कुल बड़े भाई की तरह मेरा ख्याल रखते हैं, आप चिंता मत करिये, आप नौकरी ढूंढने जाइये, आपको जरूर सफलता मिलेगी। "

आशीष को मम्मी -पापा ने समझाया पर वो नहीं रुका, उसे अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी थी।
जब से आशीष गया था, तब से उसके मम्मी -पापा नेहा से भी नाराज़ रहने लगे, उन्हें लगता था कि बहू ने आते ही बेटे को हमसे दूर कर दिया, बेटा भाग-भाग कर सारे काम कर देता था, पर अब वो सारे काम कौन करेगा?

उनका बेटा नौकरी करेगा और फिर बहू को लेकर अलग हो जायेगा तो बुढ़ापे में भी कौन सेवा करेगा? हालांकि वो अपने बड़े बेटे और बहू के साथ रह रहे थे।
वहीं नेहा की सोच थी कि जिस पति के भरोसे वो ससुराल में आई है, अगर वो ही उसकी जिम्मेदारी नहीं उठायेगा तो वो और उसका बच्चा किसके भरोसे पलेंगे?

नेहा की सास ने उस पर इल्ज़ाम लगाया कि, "बहू तो हमारे साथ रहना ही नहीं चाहती है, इसलिए बेटे को दूर कर दिया।"

नेहा सब चुपचाप सहन कर रही थी, क्यों कि उसे अपने बड़े भाई समान जेठ जी का सहारा था, नेहा गर्भवती थी तो ज्यादा काम नहीं कर पाती थी, थक जाती थी तो राकेश उसे आराम करने को कहता तो ये सुनकर उसकी पत्नी अनु जल-भुन जाती थी।

"आप मेरे पति हो तो आपको नेहा का ख्याल रखने की कोई जरूरत नहीं है, उसका ख्याल रखने वाला उसका पति तो दूसरे शहर चला गया, वो हमारे भरोसे थोड़ी इस घर में आई है।"

एक दिन उसका बड़ा जी मचला रहा था, उसकी कुछ चटपटा खाने की इच्छा हो रही थी तो उसने राकेश को फोन किया, "भैया आते वक्त शर्मा की दुकान वाले गोलगप्पे ले आइये, आज बड़ा मन कर रहा है।"

राकेश ने घर आते ही पैकेट नेहा को दे दी, सब लगभग सो चुके थे, नेहा अपने कमरे में बैठकर गोलगप्पे खाने लगी तो अनु की नजर उस पर पड़ गई और उसने घर में कोहराम मचा दिया, "ये तो मेरे पति को मुझसे छीन लेगी, इसके तो लक्षण सही नहीं है, इसने तो मेरे पति को अपना गुलाम बना लिया है, मैं अब इस घर में नहीं रह सकती हूं, तुझे राकेश ही मिला था, अरे! वो तेरा जेठ है, अपनी चटोरी जीभ को काबू में नहीं रख सकती है क्या? गोलगप्पे नहीं खाती तो तेरा बच्चा मर तो नहीं जाता! मेरा पति तेरी सेवा करने के लिए नहीं है।"

अनु अनाप- शनाप कहने लगी, नेहा की आंखों से आंसू बहने लगे।
"भाभी, मैंने भैया से कुछ मंगवा लिया तो क्या हो गया ?मैं भैया को दिल से अपना बड़ा भाई मानती हूं, मेरा तो कोई बड़ा भाई नहीं है, मम्मी बचपन में ही चली गई थी, दूसरी मॉं ने भी प्यार नहीं दिया और बस मेरी शादी निपटा दी।"

"मैंने राकेश भैया को हमेशा अपना बड़ा भाई माना है और उस नाते कुछ सामान मंगवा लिया तो क्या हो गया? मैं पापाजी को कुछ कह नहीं सकती हूं, मम्मी जी भी मुझे समझती नहीं है, आखिर उनके बेटे का अंश ही तो मेरे पेट में पल रहा है।"

अनु ने सुना और गुस्से में पैर पटकते हुए अपने कमरे में आ गई । उधर आशीष की नौकरी लगी नहीं उसे काम की तलाश थी, वो जगह-जगह इंटरव्यू दे रहा था। नेहा की डिलेवरी के दिन नजदीक आ रहे थे, अब वो और भी परेशान रहने लगी थी।
डॉक्टर के चेकअप करवाने वो अपनी सास के साथ जाती थी, लेकिन सास को अपने मायके जाना पड़ गया, उनके भतीजे के यहां गृहप्रवेश था।

ससुर जी आधा समय पार्क घूमने चले जाते थे और दोस्तों के साथ वक्त बिताया करते थे, वो घर में क्या हो रहा है, ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

एक दिन सुबह अनु बच्चों को स्कूल छोड़ने गई और वहां अपनी सहेलियों के साथ पार्क में घूमने लग गई, नेहा को पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा था, घर में कोई नहीं दिखा तो उसने राकेश से कहा, उसने फटाफट मोटरसाइकिल निकाली और नेहा को बैठाकर अस्पताल ले गया, वहां पूरा चेकअप करवाया, डॉक्टर ने कहा, "अभी डिलेवरी में समय है, ऐसा दर्द गर्भावस्था में हो जाता है।"

कुछ दवाइयां दिलाकर राकेश नेहा को वापस ले आया।
घर के बाहर मोटरसाइकिल रोकी ही थी, कि उसकी सास भी मायके से आ चुकी थी और दूसरी ओर से अनु भी आ रही थी। अपने पति के साथ नेहा को देखकर वो फिर से आग बबूला हो गई, सास भी नेहा पर गुस्सा करने लगी।

"बहू, ऐसी बेशर्मी तो पहली बार देखी है, तू तो जेठ के साथ बैठकर मोटरसाइकिल पर घूमने को निकल गई।"

तभी अनु भी बोलती है, "तुझे मेरा ही सुहाग मिला था क्या? अब तेरा पति तो तेरे साथ नहीं रहता, तुझे छोड़कर चला गया है, तो तू मेरे पति पर ही डोरे डाल रही है, तुझे शर्म नहीं आई?"

ये सब सुनकर आज राकेश से रहा नहीं गया, "आप दोनों चुप करिये, आखिर ये सब झूठा इल्जाम क्यों लगा रहे हो? मैं नेहा को अपनी छोटी बहन मानता हूं और एक बहन अगर तकलीफ में है तो भाई का फर्ज बनता है कि मैं उसे अस्पताल दिखा लाऊं, और मेरे अलावा घर में कौन है? जिससे ये मदद मांगती? मैं बड़े भाई होने के नाते इसे डॉक्टर के दिखा लाया तो क्या गुनाह हो गया?"

"आप दोनों अपनी घटिया सोच बदलिए, यहां पर मेरा छोटा भाई नहीं है और उसकी पत्नी को सबके साथ और सहयोग की जरूरत है, तो क्या हम उसे अकेला छोड़ दें?"

"ये भी तो सुबह से लेकर रात तक हम लोगों के लिए लगी रहती है, क्योंकि ये हमें अपना मानती है, तो क्या हम सबका फर्ज नहीं है हम भी आशीष की अनुपस्थिति में इसका ख्याल रखें?"

नेहा की आंखे भर आती है, "मम्मी जी आप भी ये क्या सोच रही है, आप दोनों भी तो किसी की पत्नियां हैं, क्या पत्नी अपने पति के होते हुए किसी दूसरे के बारे में सोचती है? तो आपने मेरे और भैया के रिश्ते को कलंकित क्यों कर दिया?

"अनु भाभी मैं आपसे पूछती हूं कि, "देवर जब भाभी का छोटा भाई बन सकता है तो जेठ जी मेरे बड़े भाई क्यों नहीं बन सकते हैं? आप भी तो आशीष से इतना काम करवाती थी, उनका फर्ज भी बनता है वो आपसे छोटे हैं, आपके छोटे भाई के समान है तो मैंने राकेश भैया में अपने बड़े भाई की छवि देखी तो क्या बुरा किया है?"

"हमारे रिशते को बदनाम क्यों किया जा रहा है?
राकेश भैया मुझे अपनी छोटी बहन मानते हैं और मैं उन्हें बड़े भाई के रूप में ही उनका सम्मान करती हूं।
क्या एक छोटी बहन बड़े भाई से मदद नहीं ले सकती है? जेठ का पद बड़ा होता है, अगर वो अपने छोटे भाई की पत्नी का ख्याल रख भी लेते हैं तो इसमें इतनी बातें बनाने वाली क्या बात है?"

तभी नेहा की सास चिल्लाई, "नेहा तू चुप कर, जेठ कभी भी बड़ा भाई नहीं हो सकता है, जेठ तो जेठ रहता है, हमारे घर में जेठ से पल्ला लिया जाता है, जेठ और ससुर कमरे में हो तो बहूंएं उस कमरे में नहीं बैठती है और तू मोटरसाइकिल पर बैठकर कैसे चली गई? ये मायके के रिशते मायके में ही रहने दे, ससुराल में सबसे शर्म करनी होती है।"

"यहां ससुराल में सबका मान रखना होता है, ये बड़े भाई कहकर जेठ के रिश्ते को नकारा नहीं जा सकता है, आशीष को आने दे, मैं तेरी शिकायत करूंगी, तभी तुझे अक्ल आयेगी, तू तो हम सबसे छोटी होकर बराबर जबान लड़ा रही है, मैं तुझे इसके लिए कभी माफ नहीं करूंगी।"

तभी अनु बोलती है, "नेहा तू मुझे माफ़ कर दें, मैंने अपने ही पति और छोटी बहन को गलत समझा। जेठ भी बड़ा भाई हो सकता है, मुझे अपने पुराने दिन याद आ गये है, जिन्हें मैं भुल गई थी।
जब मैं पहली बार गर्भवती थी तो आशीष भैया मेरा बहुत ध्यान रखते थे, तुम्हारे भैया तो अपने नये बिजनस को लेकर व्यस्त रहते थे, मेरे लिए कभी गोलगप्पे तो कभी आलू की टिक्की लाते थे, कभी आइसक्रीम तो कभी जूस भी लाते थे, वो मेरे छोटे भाई के समान मेरी हर इच्छा को पूरी करते थे।"

"राकेश तो तुम्हें आज अस्पताल लेकर गए है, पर आशीष भैया तो मुझे हर महीने चेकअप के लिए ले जाते थे, मैं वो सब कैसे भुल गई? मेरे लिए दवाईयां लाते थे, डॉक्टर के कहे अनुसार टेस्ट करवाने को लेकर जाते थे।"

"राकेश यही पर थे तब भी वो मेरा इतना ध्यान रखते थे, और हम सब तुम्हारे साथ क्या कर रहे हैं? जब आशीष भैया यहां नहीं है तो हमें ही तुम्हारा हर तरह से ध्यान रखना चाहिए, लेकिन हम सब तो तुम्हें मानसिक और शारीरिक तकलीफ दे रहे हैं।"

अनु की आंखों से लगातार पानी बह रहा था।
अनु की बातें सुनकर सास-ससुर को भी पुराने दिन याद आ गये, सब शर्मिंदा हो रहे थे, तभी सबकी नजर दरवाजे पर जाती है, वहां आशीष खड़ा था, उसे देखकर सबको आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी होती है।

"मैंने सब सुन लिया है, नेहा मुझे बताती थी तो मुझे विश्वास नहीं होता था, पर आज अपनी आंखों से देख सुन लिया है, मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि मेरे परिवार वाले मेरी पत्नी के साथ इतना बुरा व्यवहार कर सकते हैं।"

"नेहा, मेरी नौकरी लग गई है, मैंने फोन पर नहीं बताया, मैं सबको खुद आकर ये खबर देना चाहता था,और अब नेहा तुम मेरे साथ रहने के लिए सामान पैक कर लो।"

ये सुनते ही नेहा का सारा दर्द खुशी में बदल गया। वो बड़ी खुश हो गई, और आशीष को कहती हैं, "यहां सब ठीक है, घर-परिवार में छोटी बड़ी बातें होती रहती है, मैंने सबको माफ कर दिया है, आप भी मन में मैल मत रखिए, अभी आपकी नई नौकरी लगी है, घर बसाने में कुछ समय लगेगा, मेरी भी डिलेवरी होने वाली है, यहां मम्मी जी और भाभी है जो मेरी देखभाल करेंगी और राकेश भैया भी तो है, जो आपकी जिम्मेदारी निभायेंगे, नेहा की बात से आशीष भी सहमत हो जाता है और कुछ दिन रहकर वापस चला जाता है।'

कुछ महीनों बाद नेहा को बेटी होती है, दो महीने बाद वो आशीष के साथ रहने को चली जाती है, पर हर राखी पर वो राकेश भैया को राखी भेजना नहीं भुलती थी, घर की छोटी बहू घर की बेटी बन जाती है।

पाठकों, छोटा देवर भाई हो सकता है तो जेठ भी बड़ा भाई हो सकता है, दोनों ही रिश्ते पवित्र है, दोनों ही रिश्तों की अपनी गरिमा है, रिशते तो वैसे भी प्यार और विश्वास से ही निभते है।

01/05/2026

" कृष्ण टेढ़े क्यों है टेढ़े कान्हा की कथा "
बहुत ही अद्भूत कथा है हमारा बेड़ा पार तो हमारे कान्हा जी ही लगा सकते है !
एक बार की बात है ,वृंदावन का एक साधू अयोध्या की गलियों में राधे कृष्ण राधे कृष्ण जप रहा था । अयोध्या का एक साधू वहां से गुजरा तो राधे कृष्ण राधे कृष्ण सुनकर उस साधू को बोला ,अरे जपना ही है तो सीता राम जपो, क्या उस टेढ़े का नाम जपते हो ?

वृन्दावन का साधू भडक कर बोला -ज़रा जुबान संभाल कर बात करो, हमारी जुबान भी पान भी खिलाती हैं तो लात भी खिलाती है । तुमने मेरे इष्ट को टेढ़ा कैसे बोला ?

अयोध्या वाला साधू बोला इसमें गलत क्या है ? तुम्हारे कन्हैया तो हैं ही टेढ़े । कुछ भी लिख कर देख लो-
उनका नाम टेढ़ा – कृष्ण
उनका धाम टेढ़ा – वृन्दावन

वृन्दावन वाला साधू बोला चलो मान लिया, पर उनका काम भी टेढ़ा है और वो खुद भी टेढ़ा है, ये तुम कैसे कह रहे हो ?

अयोध्या वाला साधू बोला – अच्छा अब ये भी बताना पडेगा ? तो सुन

जमुना में नहाती गोपियों के कपड़े चुराना, रास रचाना, माखन चुराना – ये कौन सीधे लोगों के काम हैं ? और आज तक ये बता कभी किसी ने उसे सीधे खडे देखा है कभी ?

वृन्दावन के साधू को बड़ी बेइज्जती महसूस हुई , और सीधे जा पहुंचा बिहारी जी के मंदिर । अपना डंडा डोरिया पटक कर बोला – इतने साल तक खूब उल्लू बनाया लाला तुमने ।
ये लो अपनी लुकटी, ये लो अपनी कमरिया, और पटक कर बोला ये अपनी सोटी भी संभालो ।

हम तो चले अयोध्या राम जी की शरण में ।
और सब पटक कर साधू चल दिये ।

अब बिहारी जी मंद मंद मुस्कुराते हुए उसके पीछे पीछे । साधू की बाँह पकड कर बोले अरे ” भई तुझे किसी ने गलत भडका दिया है ”

पर साधू नही माना तो बोले, अच्छा जाना है तो तेरी मरजी , पर ये तो बता राम जी सीधे और मै टेढ़ा कैसे ? कहते हुए बिहारी जी कूंए की तरफ नहाने चल दिये ।

वृन्दवन वाला साधू गुस्से से बोला

” नाम आपका टेढ़ा- कृष्ण,
धाम आपका टेढ़ा- वृन्दावन,

काम तो सारे टेढ़े- कभी किसी के कपडे चुरा, कभी गोपियों के वस्त्र चुरा, और सीधे तुझे कभी किसी ने खड़े होते नहीं देखा। तेरा सीधा है किया”।

अयोध्या वाले साधू से हुई सारी झैं झैं और बइज़्जती की सारी भड़ास निकाल दी।

बिहारी जी मुस्कुराते रहे और चुप से अपनी बाल्टी कूँए में गिरा दी ।

फिर साधू से बोले अच्छा चला जाइये, पर जरा मदद तो कर जा, तनिक एक सरिया ला दे तो मैं अपनी बाल्टी निकाल लूं ।

साधू सरिया ला देता है और कृष्ण सरिये से बाल्टी निकालने की कोशिश करने लगते हैं ।

साधू बोला अब समझ आइ कि तौ मैं अकल भी ना है।
अरै सीधै सरिये से बाल्टी भला कैसे निकलेगी ?
सरिये को तनिक टेढ़ा कर, फिर देख कैसे एक बार में बाल्टी निकल आवेगी ।

बिहारी जी मुस्कुराते रहे और बोले – जब सीधापन इस छोटे से कूंए से एक छोटी सी बालटी नहीं निकाल पा रहा, तो तुम्हें इतने बडे भवसागर से कैसे पार लगा सकेगा ?

अरे आज का इंसान तो इतने गहरे पापों के भवसागर में डूब चुका है कि इस से निकाल पाना मेरे जैसे टेढ़े के ही बस की है !

श्री द्वारिकेशो जयते।

बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय।
जय जय श्री राधे।

01/05/2026

सनातन धर्म और मैनेजमेंट

01/05/2026

एक नर्स लंदन में ऑपरेशन से दो घंटे पहले मरीज़ के कमरे में घुसकर कमरे को ठीक करने में और वहां रखे गुलदस्ते को संवारने में लगी थी।

ऐसे ही काम करते करते उसने मरीज की ओर देखकर यूँही रेंडमली पूछ लिया;

"सर आपका ऑपरेशन कौन सा डॉक्टर कर रहा है?"

नर्स ने सवाल कर के करीब से उस मरीज को देखा, जो थोड़ा घबराया हुआ सा लग रहा था! लाजिमी है कि उसका ऑपरेशन था तो उसे घबराहट होगी ही।

फिर भी मरीज़ ने अपने लहजे को थोड़ा बेहतर करते हुए कहा; "डॉ. जबसन।"

नर्स ने डॉक्टर का नाम सुना और आश्चर्य के साथ मुस्कराते हए अपना काम बीच मे छोड़कर मरीज़ के एकदम पास पहुँची और पूछा;

"सर, क्या डॉ. जबसन ने वास्तव में आपके ऑपरेशन को स्वीकार किया हैं?

मरीज़ ने कहा "हाँ, मेरा ऑपरेशन वही कर रहे है।"

नर्स ने कहा "बड़ी अजीब बात है, विश्वास नहीं होता"

परेशान होते हुए मरीज़ ने पूछा ;

"लेकिन इसमें ऐसी क्या अजीब बात है?"

नर्स ने कहा "वास्तव में इस डॉक्टर ने अब तक हजारों ऑपरेशन किए हैं उसके ऑपरेशन में सफलता का अनुपात 100 प्रतिशत है । इनकी तीव्र व्यस्तता की वजह से इन्हें समय निकालना बहुत मुश्किल होता है। मैं हैरान हूँ आपका ऑपरेशन करने के लिए उन्हें फुर्सत कैसे मिली?

नर्स की बात सुनते ही मरीज़ ने एकदम प्रफुल्लित होते हुए कहा;

ये मेरी अच्छी किस्मत है कि डॉ जबसन को फुरसत मिली और वह मेरा ऑपरेशन कर रहे हैं!

नर्स ने एक बार फिर कहा;

" यकीन मानिए, मेरा हैरत अभी भी बरकरार है कि दुनिया का सबसे अच्छा डॉक्टर आपका ऑपरेशन कर रहा है! "

मरीज ने अपने हाथ जोड़कर प्रसन्न मुद्रा में ईश्वर का धन्यवाद किया। और इस बातचीत के बाद मरीज को ऑपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया गया।

मरीज़ का ऑपरेशन सफल हुआ, और उसे आराम से अपने कमरे में ले जाया गया। मरीज ने तेज़ी से रिकवरी करी, और उसे छुट्टी भी मिल गई। किंतु उसे यह आश्चर्य हुआ कि, ऑपरेशन से पहले मिलने आई नर्स उसे फिर से दिखाई नहीं दी।

वास्तव में मरीज़ के कमरे में आई महिला कोई नर्स नहीं, बल्कि उसी अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉक्टर थी। जिनका काम मरीजों को मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से संचालित करना था। उन्हें ऑपरेशन के लिए संतुष्ट करना था, और उनपर मरीज़ शक भी नहीं कर सकता था।

इस महिला डॉक्टर ने अपना काम मरीज़ के कमरे में गुलदस्ता सजाते हुए, बहुत खूबसूरती से किया।

उसने मरीज़ के दिल और दिमाग में बिठा दिया कि, जो डॉक्टर इसका ऑपरेशन करेगा वो दुनिया का मशहूर और सबसे सफल डॉक्टर है जिसका हर ऑपरेशन सफल ऑपरेशन है और इन सब के साथ मरीज़ स्वयं सकारात्मक तरीके से सुधार की तरफ लौट आया।

आज ज्ञान ने सिद्ध कर दिया कि रोगी जितनी दृढ़ता से रोग को नियंत्रित करने का वादा करता है, उतनी ही दृढ़ता से रोग पर जीत दर्ज कर सकता है ।

यह सत्य है कि उपचार केवल शरीर का नहीं, मन का भी होता है। दवाइयाँ अपना काम बेशक करती हैं, पर असली बदलाव विश्वास से ही शुरू होता है।

जब मरीज मन मे पॉजिटिविटी रखे कि वह ठीक होगा, तो उसकी हर कोशिका उसी दिशा में जुट जाती हैं। डर शरीर को कमजोर करता है, जबकि भरोसा उसे लड़ने की ताकत देता है।

कहते हैं न ; मन के हारे हार है। मन के जीते जीत।

नोट: को रोना काल में पढ़ी सबसे खूबसूरत कहानियों में से एक कहानी है यह।

#यादों_से
#साभार

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टीशा

01/05/2026

एक प्राचीन आश्रम में एक वृद्ध साधु रहते थे। तीस वर्षों से उन्होंने कठोर तपस्या और प्रभु का सिमरन किया था। अब जब मृत्यु का समय निकट आया, तो उनके मन में एक गहरा संतोष था। वे सोचते थे, "मैंने अपना पूरा जीवन ईश्वर को दे दिया, मोह-माया का त्याग किया, निश्चित ही मेरे पास पुण्यों का इतना बड़ा भंडार होगा कि मोक्ष मेरे द्वार पर खड़ा होगा।"
उसी रात उनके ध्यान में एक धुंधली सी स्त्री की आकृति उभरी। उस स्त्री ने बड़े करुण स्वर में कहा, "हे महात्मा! क्या आप मुझे अपने एक दिन का पुण्य देकर, बदले में मेरे एक दिन का पाप स्वीकार करेंगे?"
साधु चौंक गए। तीस साल में कभी किसी स्त्री का विचार तक मन में नहीं आया, अब अंत समय में यह कैसी परीक्षा? उन्होंने इसे मन का भ्रम मानकर झटक दिया। पर वह स्त्री बार-बार ध्यान में आने लगी। साधु व्याकुल हो गए। उन्हें लगा कि शायद यह कोई दुखी आत्मा है, पर फिर गुरु की शिक्षा याद आई— "पुण्य ही तुम्हारी असली पूँजी है, इसे कभी किसी को मत देना, वरना मोक्ष हाथ से निकल जाएगा।"
साधु ने अपने गुरु से मार्गदर्शन माँगा। गुरु ने भी उन्हें डांटा, "सावधान! यह माया का जाल है। अपने पुण्यों की कमाई को बचाकर रखो, यही तुम्हें स्वर्ग ले जाएगी।"
अगली बार जब वह स्त्री ध्यान में आई, तो उसने कड़े शब्दों में कहा, "तुम्हारे गुरु का ज्ञान अधूरा है। तुम दोनों ने त्याग के अहंकार को ही धर्म मान लिया है। तुम तो किसी जरूरतमंद की पुकार सुनकर भी अपना 'पुण्य' बचाने में लगे हो। क्या यही तुम्हारी अध्यात्म की कमाई है?"
साधु द्वंद्व में फंस गए। एक तरफ गुरु की आज्ञा और मोक्ष का लोभ था, दूसरी तरफ उस स्त्री की पीड़ा। अंततः उन्होंने ईश्वर से ही मार्ग दिखाने की प्रार्थना की। तभी एक दिव्य आकाशवाणी हुई।
ईश्वर ने पूछा, "साधु! तुम किस पुण्य के भरोसे मोक्ष चाहते हो?"
साधु ने गर्व से कहा, "प्रभु, तीस साल का सिमरन, त्याग और वैराग्य!"
आकाशवाणी गूँजी, "कैसा सिमरन? तुमने तीस वर्षों तक दूसरों का कमाया हुआ अन्न खाया, समाज के लिए कोई रचनात्मक कार्य नहीं किया। नाम जपना यदि पुण्य होता, तो धन-धन जपने से दरिद्र का बैंक खाता भर जाता। तुम्हारे खाते में सेवा और कर्म का पुण्य शून्य है।"
साधु सन्न रह गए। उन्होंने कांपते हुए पूछा, "फिर वह स्त्री मुझसे पुण्य क्यों मांग रही है?"
भगवान ने उत्तर दिया, "वह स्त्री तुम्हारी पत्नी यशोदा है। जिसे तुम 'मोह' कहकर बीच राह में छोड़ आए थे। उसने तुम्हारे जाने के बाद आंसुओं को पोंछकर बच्चों को पाला। जब कोई काम नहीं मिला, तो एक कुष्ठ आश्रम में बीमारों की सेवा शुरू की। वह आज भी खुद को 'पापिनी' मानती है क्योंकि उसका पति उसे छोड़ गया। वह आज मृत्युशैया पर है, पर उसे तुम्हारी चिंता है। वह चाहती है कि तुम्हें मोक्ष मिले, इसलिए वह अपने पुण्यों के बदले तुम्हारे कल्पित पाप लेना चाहती थी।"
साधु की आत्मा कांप उठी। उन्हें समझ आया कि असली 'पुण्य' मंदिर में बैठकर माला फेरने में नहीं, बल्कि उन हाथों में था जो दीन-दुखियों के घाव धो रहे थे। यशोदा का 'पाप' भी उनके 'पुण्य' से कहीं अधिक पवित्र था।
अचानक साधु की आँखें खुली। पसीने से लथपथ वे बिस्तर से उठे। सुबह की पहली किरण फूट रही थी। उन्होंने अपना झोला उठाया और गुरु के पास पहुँचे।
गुरु ने पूछा, "कहाँ जा रहे हो?"
साधु ने दृढ़ता से कहा, "गुरुदेव, अब तक मैंने सिर्फ़ शब्दों को पढ़ा था, अब धर्म को जीने जा रहा हूँ। मैं घर जा रहा हूँ, सेवा का पुण्य कमाने।"

:- स्वर्ग और नरक की चिंता छोड़कर, केवल इस बात का ध्यान रखें कि आपके स्वार्थ से किसी का दिल न दुखे। सच्ची साधना पत्थर की मूर्तियों के सामने नहीं, बल्कि टूटते हुए इंसानों को सहारा देने में है। मुसीबत में जो साथ खड़ा है, वही सबसे बड़ा है।

30/04/2026

महाराज रघु के पुत्र राजा अज की कथा रघुकुल के इतिहास में सबसे भावुक और हृदयस्पर्शी मानी जाती है। जहाँ रघु अपनी वीरता और दान के लिए जाने गए, वहीं उनके पुत्र अज अपनी न्यायप्रियता और अपनी पत्नी इन्दुमती के प्रति अटूट प्रेम के लिए प्रसिद्ध हुए।
कालिदास के 'रघुवंशम्' में इस कथा का बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है:

विदर्भ देश की राजकुमारी इन्दुमती अत्यंत सुंदर और गुणवान थीं। उनके स्वयंवर में दूर-दूर के प्रतापी राजा आए थे। जब इन्दुमती हाथ में वरमाला लेकर राजाओं की पंक्तियों के बीच से गुजरीं, तो वे ऐसी लग रही थीं जैसे रात के समय चलती हुई मशाल, जिसके आगे बढ़ते ही पीछे के राजा अंधकार (निराशा) में डूब जाते थे।
जब वे राजकुमार अज के सामने पहुँचीं, तो अज के तेज और सौम्यता को देखकर उन्होंने उन्हें अपना पति चुन लिया

स्वयंवर में आए अन्य राजा अज की सफलता से ईर्ष्या करने लगे। जब अज इन्दुमती को लेकर अयोध्या लौट रहे थे, तो उन राजाओं ने मिलकर उन पर आक्रमण कर दिया। युवा अज ने अकेले ही अपनी वीरता से उन सबको परास्त किया और गौरव के साथ अयोध्या में प्रवेश किया।

राजा अज और इन्दुमती का जीवन सुखमय बीत रहा था। उन्हें दशरथ के रूप में एक प्रतापी पुत्र की प्राप्ति हुई। लेकिन एक दिन, जब वे उपवन में विहार कर रहे थे, एक विचित्र घटना घटी।
आकाश मार्ग से देवर्षि नारद जा रहे थे। उनकी वीणा पर चढ़ी हुई दिव्य पुष्पों की माला (सुरपुष्प) हवा के झोंके से नीचे गिर गई। वह माला सीधे इन्दुमती के हृदय पर गिरी। वह माला सामान्य नहीं थी; उसके स्पर्श मात्र से इन्दुमती के प्राण पखेरू उड़ गए। वह वास्तव में एक अप्सरा थीं, जिन्हें एक श्राप के कारण मृत्युलोक में आना पड़ा था और उस दिव्य माला के स्पर्श से उनका श्राप समाप्त हो गया।

अपनी प्रिय पत्नी के अचानक बिछड़ जाने से राजा अज टूट गए। उनका विलाप इतना मार्मिक था कि पत्थर भी पिघल जाएँ। उन्होंने अपनी पत्नी के शव को गोद में लेकर पूछा— "हे प्रिये! जो फूल अत्यंत कोमल हैं, वे तुम्हारे प्राण कैसे ले सकते हैं? यदि विधाता को तुम्हें ले जाना ही था, तो मुझे भी साथ क्यों नहीं ले गया?"

इन्दुमती के विरह में अज ने राज-काज से मन हटा लिया। उन्होंने अपने पुत्र दशरथ का राज्याभिषेक किया। अंत में, उन्होंने सरयू नदी के संगम पर जाकर उपवास के माध्यम से अपना शरीर त्याग दिया और स्वर्ग में पुनः अपनी प्रिय इन्दुमती से जा मिले।

राजा अज की यह कथा दिखाती है कि रघुकुल के राजा केवल कठोर योद्धा ही नहीं थे, बल्कि उनके भीतर प्रेम और संवेदना की भी गहरी धारा बहती थी।
राजा अज के इसी वंश में आगे चलकर महाराजा दशरथ हुए और फिर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम।

30/04/2026

*गोद_भराई*
विनीता के विवाह को पूरे 11 साल हो चुके थे परंतु मां बनने का सुख उसको मिला ही नही। था।... मंदिर ,देवी मनौती,व्रत उपवास सब किया पर कुछ नहीं मिला...डॉक्टर ने भी कोई कमी नहीं बताई थी दोनों में फिर..पता नहीं किस पाप का फल मुझे ईश्वर ने दिया ...यही सोच कर मन खराब किये रहती विनीता।

उसके दोनों देवरों की शादी उसके सामने हुई ...

साल भर में दोनों की गोद में एक-एक बच्चा भगवान ने उनको दे दिया . !

रोज ही तकिया गीला करते उसकी रात कटती...!

हालांकि पति कुछ कहते नही थे ...पर जब शाम को बाहर से आते ही देवरानियों के बच्चों को लेकर व्यस्त हो जाते ..उन्हें गोद में लेकर खिलाने लगते तब विनीता का मन बहुत ही कचोटता ...! खैर किया भी क्या जा सकता था??

ऐसा नहीं कि वो इन बच्चों से प्यार नहीं करती थी.. वो तो जान छिड़कती थी... उन पर

किन्तु मन का एक कोना बहुत उदास रहता था ....उसका ....!

समय पंख लगा कर उड़ रहा था ...!इस बीच मंझले देवर का ट्रांसफर दूसरे शहर हो गया ।अब घर में छोटे देवर- देवरानी और उनकी छुटकी बेटी और वो और उसकी दुनिया बन गयी....!

अचानक उसे पता चलता कि छोटी के पांव फिर से भारी है।मन में एक बार फिर अपनी कमी का अहसास तो हुआ पर उसने भगवान की इच्छा के आगे हथियार डाल दिये थे...!

भोजन करते करतेअचानक एक दिन उसने सुना ... देवरजी देवरानी से कह रहे थे "सीमा हम अपना दूसरा बच्चा बड़े भाभी-भैया को दे देते हैं..!कैसा रहेगा ??विनीता ने सुना तो वो धक्क से रह गयी ।क्या ऐसा होगा??मैं सचमुच में किसी बच्चे की मां की बन सकती हूँ???अपनी खुशी के रौ में वो देवरानी के चेहरे के भाव नहीं देख पाई..!

दूसरे दिन से वो देवरानी की और ज्यादा देखभाल करने लगी। विनीता इतनी खुश थी मानो वो खुद ही मां बन रही हो। उसने छुप- छुप कर नए बच्चे के लिए कपड़े- मोजा टोपा सब बना लिए...!

समय आया छोटी देवरानी को बच्चा तो हुआ किन्तु बच्चा मां की गोद में ही रहा... देवरानी के उदासीन व्यवहार ने उसका दिल एकदम तोड़ दिया।बची खुची उम्मीद उसने उन दोनों की बात सुनकर छोड़ दी...जब देवर अपनी पत्नी को समझा रहे थे कि "क्या हुआ अगर हम भाभी को बच्चा दे दे तो...!

और देवरानी का कहना कि... भई बच्चा तो घर में ही रहेगा मेरे पास रहे या उनके ... मैं पूरा पूरा अपने बच्चे को किसी को नहीं दे सकती...

बस!

पटाक्षेप हो गया उसके मां बनने के सपने का भी....!

कुछ दिनों बाद फिर खबर आई कि मंझली देवरानी भी मां बनने वाली है ..फोन पर खूब बधाई दी विनीता ने...! मन बहुत रोया उसका पर ईश्वर की इच्छा के आगे भला क्या हो सकता है...?

एक रात खबर आई मंझली के बेटा हुआ है... दरअसल मंझली देवरानी को इस बार कुछ कॉम्प्लिकेशन होने के कारण डॉक्टर ने ट्रेवल करने मना कर दिया था...!तो वो उन लोगों ने वहीं शहर में ही डिलवरी करवाने का फैसला कर लिया था.....!रात फोन पर देवर ने कहा "भाभी आप सबको लेकर आ जाइए अगले हफ्ते फंक्शन रख रहे हैं बच्चे का...!"

मन ही मन रोते- रोते उसने यात्रा पूरी की। छोटा देवर,उसके दोनों बच्चे, पति, सास सब थे साथ में ...बस वो किसी के साथ नहीं थी ..!"मेरा जीवन तो निरर्थक हो गया भगवान तुमने मेरी कभी नहीं सुनी ...! हर गुजरते मंदिर के आगे वो ऐसा बुदबुदाती...!

शाम तक वो सबके साथ मंझले के घर पर पहुंच चुकी थी...!लम्बा चौड़ा आयोजन खूब लोग- बाग गहमा- गहमी !

लेकिन उससे कोई ठीक से बात तक नहीं कर रहा था ...!कुछ औरतें कानाफूसी भी कर रही थी ...पति भी आकर काम में रम गए थे ।वो ही निठल्ली सी बैठी थी...!तभी एक स्त्री ने कहा "आप विनीता जी हैं?"जी हां""चलिये आप"... कह कर वो औरत विनीता को एक कमरे में ले गयी...वहां मंझली देवरानी बच्चे के साथ लेटी थी... उलाहना देते हुए बोली "दीदी कहां हो आप ?शाम को हमारा गोद भराई का फंक्शन है और आप ऐसे मुंह उतार कर बैठी हो ...चलो पहले आप तैयार हो जाइए अच्छे से फिर बच्चे को

सम्भालिए ...रुआंसी सी विनीता तैयार होने उठी तो साथ आई महिला ने कहा "आज चलिये मैं आपको तैयार कर देती हूं.....विनीता को बाद में पता चला कि वो ब्यूटिशियन थी...!

हल्का मेकअप ,आंखों में काजल, बालों में ढेर सारा गजरा, लाल बनारसी साड़ी ....विनीता का सौंदर्य देखते ही बन रहा था किंतु आंखों में झुंझलाहट भी थी ...गोद में बच्चा देवरानी के आया है और मुझे इन लोग क्यों इतना सजा रहे हैं ..??

फिर हॉल में जहां कार्यक्रम होना था सब इकठ्ठे हुए ....!

बच्चे को मंझली देवरानी एक बार भी उसको हाथ लगाने नहीं दी थी... !बस रोने- रोने को हुई जा रही थी विनीता.... तभी मंझले देवर ने सबको शांत करते हुए कहा... "आज का यह आयोजन मेरे बड़े भैया और भाभी के प्रथम पुत्र रत्न की प्राप्ति के उपलक्ष्य में रखा गया है... आप सब श्रीमती विनीता एवं राजेश जी को और नवजात शिशु को अपना आशीर्वाद देकर हमें अनुग्रहित करें...।

और मंझली ने आकर विनीता को उलाहना देते हुए कहा...लो भी दीदी अब अपने बच्चे को गोद में कब से लिये लिए फिर रही हूं... थक गई हूँ भई मैं...!!!!

और विनीता के आंखों के आँसू झर- झर बहने लगे..राजेश की बांहों का सहारा और उन दोनों के बीच नन्हा- सा राजकुमार सब मानो गड्डमगड्ड हुए जा रहे थे...!!

क्या मैं सचमुच मां बन गयी???

तालियों का शोर सबके मुस्कुराते चेहरे मंझले देवर देवरानी की पुलकित मुस्कान यही तो कह रही थी...

कि वो मां बन गयी...🙏🙏🙏

29/04/2026

लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गरम थी, विभीषण ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला।

यह रावण का निजी पुस्तकालय था। सोने की दीवारें नहीं, ताड़पत्र थे। दस हज़ार से ज़्यादा। उन पर कोई राक्षसी मंत्र नहीं, सामवेद के स्वर, आयुर्वेद के सूत्र, नक्षत्र गणना, और वीणा के आलाप लिखे थे।

एक युवा राक्षस, मेघनाद का बेटा अक्षय नहीं, उसका शिष्य तरणि, ने पूछा, "महाराज विभीषण, सब कहते हैं दशानन अजेय था क्योंकि ब्रह्मा का वरदान था। क्या यही उसकी शक्ति का रहस्य था?"

विभीषण हँसा, पर हँसी में थकान थी। "वरदान कवच देता है, तलवार नहीं। भैया की शक्ति का रहस्य दस सिरों में नहीं था। वह दस सिरों में बँटा हुआ था।"

पहला सिर – सुनने वाला

रावण पैदा पुलस्त्य के कुल में हुआ, पर जन्म से ब्राह्मण था। दस साल की उम्र में उसने अपने पिता विश्रवा से पूछा, "पिताजी, राक्षस क्यों डरते हैं?" विश्रवा ने कहा, "क्योंकि वे सुनते नहीं।"

रावण ने तब पहला तप किया। वह हिमालय गया, कैलाश की छाया में बैठा, और शिव तांडव नहीं, शिव का मौन सुना। सात साल तक उसने सिर्फ सुना। हवा, पानी, यक्षों की फुसफुसाहट, मरते हुए पशुओं की साँस।

जब वह लौटा, तो उसके पास पहला सिर था – श्रोता। वह किसी भी भाषा को एक बार में समझ लेता। देव, दानव, नाग, पशु। इसीलिए वह यम से युद्ध कर सका, क्योंकि यम के भैंसे की थकान की आवाज़ सुन ली थी।

लोगों ने कहा, "रावण को वरदान मिला।" सच यह था कि उसने सुनने की तपस्या की थी।

दूसरा सिर – गाने वाला

दूसरा रहस्य उसकी वीणा थी, रुद्र वीणा। रावण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए सिर काटे, यह कथा सब जानते हैं। पर वह सिर काटना बलि नहीं था, स्वर था।

हर बार जब वह अपना सिर चढ़ाता, तो नाड़ी से एक नया स्वर निकलता। नौ बार उसने किया। दसवें बार शिव ने हाथ पकड़ लिया। कहा, "बस कर। तूने मृत्यु को संगीत बना दिया।"

उस दिन से रावण के कंठ में वह शक्ति आई कि वह सामवेद को उल्टा गा सके। उल्टा सामवेद मृत्यु को रोकता नहीं, समय को धीमा करता है। इसीलिए लंका में घड़ी धीरे चलती थी। राक्षस सौ साल जवान रहते।

विभीषण ने एक ताड़पत्र उठाया। उस पर राग भैरव उल्टा लिखा था। "भैया इसे रोज़ भोर में गाते थे। कहते थे, शक्ति मारने में नहीं, ठहरने में है।"

तीसरा सिर – गिनने वाला

रावण ज्योतिषी था, पर फलित नहीं, गणित। उसने लंका की नींव उस मुहूर्त में रखी जब शनि वक्री था। सबने कहा अपशकुन। उसने कहा, "वक्री ग्रह पीछे देखता है। जो पीछे देखे, वह गिरता नहीं।"

उसने नवग्रह को बंदी बनाया, यह भी आधा सच है। उसने उन्हें बंदी नहीं, बंधक बनाया। हर ग्रह से एक सूत्र लिया। मंगल से धातु विज्ञान, बुध से भाषा, शुक्र से संजीवनी का अधूरा सूत्र।

उसका दसवाँ सिर यही था – संग्रहकर्ता। वह जानता था कि ज्ञान बाँटने से घटता नहीं, पर रोकने से सड़ता है। उसने रोक लिया। लंका का पुस्तकालय दुनिया का सबसे बड़ा था, पर द्वार बंद था।

चौथा रहस्य – अहंकार नहीं, भय

तरणि ने पूछा, "फिर हारा क्यों?"

विभीषण ने राख पर हाथ फेरा। "क्योंकि उसने दस सिरों को एक साथ कभी नहीं सुना।"

रावण की असली शक्ति एकाग्रता थी। वह एक समय में एक ही सिर से सोचता। युद्ध में वह योद्धा, यज्ञ में ब्राह्मण, दरबार में राजा, वीणा पर कलाकार। पर जब सीता को लाया, तब पहली बार दसों सिर एक साथ बोले।

एक ने कहा, यह अधर्म है। दूसरे ने कहा, यह प्रतिशोध है। तीसरे ने कहा, यह प्रेम है। चौथे ने कहा, यह परीक्षा है। पाँचवें ने कहा, यह नियति है।

वह सुन नहीं पाया। उसने सुनना बंद कर दिया था। जिस दिन उसने श्रोता सिर को चुप कराया, उसी दिन शिव का दिया हुआ स्वर टूट गया।

लोग कहते हैं राम ने नाभि में बाण मारा। नाभि में अमृत था, यह भी कथा है। सच यह है कि नाभि वह जगह है जहाँ से आवाज़ निकलती है। रावण की नाभि में वह पहला स्वर बचा था जो उसने कैलाश पर सुना था। राम ने उसे नहीं मारा, उसे मुक्त किया।

बाण लगते ही रावण हँसा। विभीषण ने देखा था। अंतिम क्षण में दसों सिर एक साथ चुप हो गए, और पहली बार वह पूरा सुन पाया – अपने भीतर का मौन।

उसने राम से कहा, "मुझे ब्राह्मण की तरह अग्नि देना।" वह वरदान नहीं माँग रहा था, वह याद दिला रहा था कि वह कौन था।

रहस्य का अंत

विभीषण ने ताड़पत्र समेटे और कहा, "भैया की शक्ति तप था, संगीत था, गणना थी। पर शक्ति का रहस्य यह नहीं कि तुम कितना इकट्ठा कर लो। रहस्य यह है कि तुम कितना छोड़ सको।"

"उसने देवताओं से अमरता माँगी, ब्रह्मा ने कहा नहीं। उसने मनुष्य और वानर को छोड़ दिया, क्योंकि उसे लगा वे तुच्छ हैं। वही छूट उसे ले डूबी। शक्ति जब चुनती है कि किसे छोटा समझे, तभी वह अंधी हो जाती है।"

तरणि ने पूछा, "तो क्या रावण बुरा था?"

विभीषण ने उत्तर नहीं दिया। उसने वीणा उठाई, जो कोने में रखी थी। एक तार टूटा था। उसने उसे छेड़ा। बेसुरी आवाज़ निकली।

"बुरा नहीं, अधूरा था। दस सिर होने का अर्थ दस बार सोचना नहीं, एक बार दसों को सुनना है। वह कभी नहीं कर पाया।"

बाहर लंका में नई सुबह हो रही थी। राख पर अंकुर फूट रहे थे। विभीषण ने पुस्तकालय का द्वार खोल दिया। पहली बार लंका के बच्चे अंदर आए, ताड़पत्र छुए, स्वर पढ़े।

और तब, कहते हैं, हवा में कहीं दूर से रुद्र वीणा का उल्टा भैरव फिर बजा, पर इस बार धीमा नहीं, मुक्त। जैसे कोई बहुत पुराना श्रोता अंत में अपना ही गीत सुन रहा हो।

Raksha Bharti

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