Bishnoi Mandir Nagina

Bishnoi Mandir Nagina Prachin Bishnoi mandir at Nagina. Guru Jambheshwaray Namah!

25/08/2026

सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था।

अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जा कर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा - कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।

रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं - "लक्ष्मण! रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।

परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एक नारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।

ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सेना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।

मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यक्ति की हो।

ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा - "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा को दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया - "प्राणप्रिये! यह भुजा मेरी ही है।

युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वह तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।

पति की भुजा-लिखित पंक्तियां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावण ने आकर कहा - 'शोक न कर पुत्री।

प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली - "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के अभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।'

किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो।

जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एक पत्नी व्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"

सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले - "देवी! तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे। किंतु विधि की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी।

श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा - "देवी! मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ?

सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली - "राघवेन्द्र! मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।

पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा - "सुमित्रानन्दन! तुम भूलकर भी गर्व मत करना कि मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी।

यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।

सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वह यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है।

जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुई कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया - "मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया।

व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे - "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा - "व्यर्थ बातें मत करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।

श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा - "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा।

यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते!समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ।

अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गई। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई...!!

जय जय सियाराम

24/08/2026

पीयूष बेटा तेरे पिता तुझे बहुत याद कर रहे हैं अंतिम समय में तुझे देखना चाहते हैं एक बार आ जा बेटा....दमयंती जी करुणा विगलित स्वर में अपने इकलौते चिराग पियूष से प्रार्थना कर रहीं थीं।
मां कोशिश कर रहा हूं कंपनी में छुट्टी पहले से लेनी पड़ती है ऐसे अचानक नही ले सकता इतनी दूर विदेश में हूं आने जाने सबकी व्यवस्था में समय लगता है मां ....पापा को देश के बेस्ट हॉस्पिटल में एडमिट करवा तो दिया है बेस्ट डॉक्टर्स दिन रात लगे हैं मैं आकर क्या करूंगा....मुझे तो खुद अपने लिए समय नही मिल पाता है..आप लोगों की यही तो ख्वाहिश थी कि उनका बेटा विदेश जाए समाज में इज्जत बढ़ाए .... इन्हीं ख्वाहिशों को पूरा करने में मैने अपनी ख्वाहिशों का गला घोंट दिया ...और कोई भी बेस्ट सुविधा चाहिए तो बता दीजिएगा.... पीयूष ने कहा और फोन कट गया था ।
.और दमयंती जी के जेहन में वो अबोध नन्हा पियूष कौंध रहा था जो फूट फूट कर रो रहा था ...मां मैं हॉस्टल नहीं जाऊंगा मुझे नहीं पढ़ना बाहर जाकर वहां मुझे खाना कौन खिलाएगा अभी तो मुझे अपने जूते की लेस बांधनी भी नहीं आती मां.मुझे आपके पास रहना है..नन्हा पीयूष बिलख रहा था ।
दमयंती जी , प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता उसे समझाने की कोशिश कर रही थीं ....
पियूष अभी सिक्स्थ स्टैंडर्ड में गया था ...लेकिन दमयंती जी के लिए वो बहुत बड़ा हो गया था सिक्स्थ क्लास फ्यूचर डिसाइडिंग क्लास होती है ...उनकी सोसायटी में सभी के बच्चे बाहर हॉस्टल चले गए हैं...उन्हें भी इतने काम रहते हैं आए दिन पीयूष के स्कूल में होने वाली मीटिंग्स और दुनिया भर की गतिविधियों में बेटे के साथ जुड़ने के लिए उनके पास बिलकुल वक्त नहीं रहता जब देखो तब उनके और सोमेश के बीच इन्हीं मुद्दों को लेकर तनातनी होती रहती थी।

सोमेश को अपना ऑफिस और अपना काम अपना पैसा सबसे महत्वपूर्ण लगता था और दमयंती के समाज सुधार के कार्य बेकार और समय बर्बाद करने वाले लगते थे।
आप कुछ कहते क्यों नहीं पीयूष को समझाइए अब बड़ा हो गया है घर से बाहर जाकर ही उसका व्यक्तित्व निर्माण संभव है माधुरी जी का बेटा सुयश चार सालों से आर्मी स्कूल में हॉस्टल में पढ़ रहा है अलग ही दिखता है माधुरी जी बड़ा दंभ करती है उसे लेकर

अब मैं क्या बोलूं तुम्हें जब मेरी कोई बात सुननी ही नही है तो ये तो अभी बहुत छोटा है ये क्या समझेगा तुम क्यों नही समझ जाती हो कि अभी से इसे बाहर नहीं भेजना चाहिए थोड़ा बड़ा हो जाएगा तो समझ आ जायेगी तब भेज देंगे ...सोमेश के कहते ही दमयंती का स्वर तेज हो गया
बहुत छोटा है बहुत छोटा है कह कह के आपने ही इसका दिमाग चढ़ा दिया है अरे जब एक दिन बाहर जाना ही है तो अभी से आदत डाल लेने हर्ज ही क्या है... यहां घर पर ही रहता है तो भी आपके पास तो समय नहीं रहता उसके लिए मुझे ही उसके साथ लगे रहना पड़ता है...वहां हॉस्टल में उसकी ट्यूशन कोचिंग स्कूल बस टिफिन तैयार करने बीमारी में देखभाल इन सबकी चिंता से मैं दूर हो जाऊंगी....
हां दूर होकर क्या करोगी वही समाज सुधार के चोचले..! दिखावटी सुधार है सब तुम्हारा बाहर घूमने फिरने और घर की जिम्मेदारियों से बचे रहने का ढोंग है अभी ही तुम्हारे करने से क्या कर पा रहा है इतनी छोटी पांचवी कक्षा में क्या मार्क्स आएं हैं इसके
मुझे तो शर्म आती है इसे अपना बेटा कहते हुए बेस्ट स्कूल बेस्ट कोचिंग बेस्ट सुविधाएं...सब कुछ तो कर रहा हूं बेस्ट पापा हूं मैं नौकरी क्या होती है कैसे मिलती है पैसे का महत्व समझ में नहीं आ रहा है इसे !!मेरे साथ के सभी सहकर्मियों के बच्चे विदेशों में सेटल्ड हैं....मेरे बेटे को देख लो ....दब्बू कहीं का मां के अंचल से बाहर ही नहीं निकलना चाहता मेरी इज्जत डुबोएगा ये...एक ही तो है और किससे क्या उम्मीद रखूं....सोमेश जी उत्तेजित ऊंची होती आवाज के बीच ही ...
"....मां मैं हॉस्टल जा रहा हूं सारा सामान मैंने बांध लिया है और हां पिताजी अब आप लोगों को मेरी वजह से समाज परिवार में किसी भी बेइज्जती का सामना नहीं करना पड़ेगा.... कहता नन्हा पियूष अचानक बड़ा हो गया था। उस दिन वो घर छोड़कर जो हॉस्टल गया तो फिर पलट के नही देखा जैसे निर्मोही सा हो गया था घर आना ही नही चाहता था मां पिताजी भी उसे हॉस्टल में रक्कर कोचिंग करते देखना चाहते थे ....पियूष भी पढ़ता ही गया बढ़ता ही गया और अनजाने ही मां पिता से दूर होता गया और पिता की इच्छा अनुरूप न्यूयॉर्क चला गया वहीं सेटल हो गया .....!
सच है कल जब उसे मां की ममता और पिता के स्नेह की छांव की जरूरत थी तब हमने उसे अपने से दूर कर दिया था..आज हमें पुत्र के स्नेहिल सान्निध्य की जरूरत है तो वो हमसे दूर हो गया है!!
हमने तो खुद अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारी है.....पुत्र को याद करती हुई व्यथित सी दमयंती जी सोमेश जी के पास बैठ गई थीं।
अरे वाह बेटा हो तो आपके पियूष जैसा हो देखो कितना ख्याल रखता है मां पिता का बिचारा खुद नहीं आ पाया तो क्या हुआ देश का बेस्ट डॉक्टर नर्सिंग होम और बेस्ट सुविधाएं उपलब्ध करवाई हैं उसने ....सोसायटी के अशोक जी और सुमेधा ने सोमेश के बेड के पास बैठते हुए जोर से दमयंती जी से कहा तो दमयंती और सोमेश एक दूसरे की ओर नजर उठा कर देखने का साहस नहीं संजो पाए।
लतिका श्रीवास्तव

21/08/2026

अशोक जी अपनी पत्नी के साथ अपनी रिटायर्ड जिंदगी बहुत हँसी खुशी गुजा़र रहे थे।

उनके तीनों बेटे अलग अलग शहरों में अपने अपने परिवारों के साथ उनसे अलग रहते थे।

लेकिन अशोक जी नें नियम बना रखा था....दीपावली पर तीनों बेटे सपरिवार उनके पास आते थे...वो एक सप्ताह कैसे मस्ती में बीत जाता था...किसी को कुछ पता ही नही चलता था।

कैसे क्या हुआ...उनकी खुशियों को जैसे नज़र ही लग गई। अचानक शीला जी को दिल का दौरा पड़ा ...एक झटके में उनकी सारी खुशियाँ बिखर गईं।

तीनों बेटे दुखद समाचार पाकर दौड़े आए। उनके सब क्रिया कर्म के बाद सब शाम को एकत्रित हो गए।

बड़ी बहू ने बात उठाई,"बाबूजी, अब आप यहाँ अकेले कैसे रह पाऐंगे , आप हमारे साथ चलिऐ।"

"नही बहू, अभी यही रहने दो। यहाँ अपनापन लगता है। बच्चों की गृहस्थी में...।" कहते कहते वो चुप से हो गए।

बड़ा बेटा कुछ बोलने को हुआ , पर उन्होंने हाथ के इशारे से उसे चुप कर दिया।

"बच्चों, अब तुम लोगों की माँ हम सबको छोड़ कर हमेशा के लिए जा चुकी हैं। उनकी कुछ चीजें हैं , वो तुम लोग आपस में बांट लो। हमसे अब उनकी साजसम्हाल नही हो पाएगी।"

ये कहते हुए अशोक जी अलमारी से कुछ निकाल कर लाए।

मखमल के थैले में बहुत सुंदर चाँदी का श्रंगारदान था। एक बहुत सुंदर सोने के पट्टे वाली पुरानी हाथ की घड़ी थी...।

सब के सब एक साथ इतनी खूबसूरत चीजों पर लपक से पड़े।

छोटा बेटा जोश में बोला,"अरे ये घड़ी तो अम्मा सरिता को देना चाहती थी।"

अशोक जी धीरे से बोले," और सब तो मैं तुम लोगों को बराबर से दे ही चुका हूँ। इन दो चीजों से उन्हें बहुत लगाव था। बेहद चाव से कभी कभी निकाल कर देखती थीं लेकिन अब कैसे उनकी दो चीजों को तुम तीनों में बांटू ?"

सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

तभी मंझला बेटा बड़े संकोच से बोला,"ये श्रंगारदान वो अक़्सर मीरा को देने की बात करती थी।"

पर समस्या तो बनी ही थी।अब अशोक जी अपने मन में सोच रहे थे...बड़ी बहू को क्या दूँ ??

उनके मन के भाव को शायद बड़ी बहू ने पढ़ लिए," बाबू जी, आप शायद मेरे विषय में सोच रहे हैं। आप श्रंगारदान मीरा को और हाथ वाली घड़ी सरिता को दे दीजिए... अम्मा भी तो यही चाहती थी।"

"पर नन्दिनी, तुझे क्या दूँ...समझ में नही आ रहा ?? "अशोक जी बोल पड़े ।

"आपके पास एक और अनमोल चीज़ है और वो अम्मा जी हमेशा से मुझे ही देना चाहती थीं।"

सबके मुँह हैरानी से खुले के खुले रह गए।

दोनों बहुऐं तो बहुत हैरान परेशान हो गईं...अब कौन सा बेशकीमती पिटारा खुलेगा ??

सबकी हैरानी और परेशानी को भाँप कर बड़ी बहू मुस्कुराते हुए बोली," वो सबसे अनमोल तो आप स्वयं हैं बाबूजी । पिछली बार अम्माजी ने मुझसे कह दिया था," मेरे बाद बाबूजी की देखरेख तेरे जिम्मे । बस अब आप उनकी इच्छा का पालन करें और हमारे साथ चलें इसी वक़्त वो भी बिना देर किए ।

ये सुनकर अशोक जी की आँखें नम हो गई और वहाँ मौजूद कुछ की आँखें नीची........
आभार नीरजा कृष्णा

19/08/2026

एक बौद्ध भिक्षु हुआ--आर्य असंग। बड़ा बहुमूल्य भिक्षु हुआ। उसके जीवन में बड़ी अनूठी कथा है। नालंदा में आचार्य था। फिर समझ आयी संसार की व्यर्थता की तो सब छोड़कर चला गया। तय कर लिया कि अब तो ध्यान में ही डूबूंगा, हो गया ज्ञान बहुत। जान लिया सब, और जाना तो कुछ भी नहीं। पढ़ डाले शास्त्र सब, हाथ तो कुछ भी न आया। छोड़कर पहाड़ चला गया। एक गुफा में बैठ गया। तीन साल अथक ध्यान किया। लेकिन कहीं मंजिल करीब आती मालूम न पड़ी।
हतोत्साह, हताशा से भरा गुफा से बाहर निकल आया। सोचा लौट जाऊं। तभी उसने क्या देखा कि एक चिड़िया वृक्षों से पत्ते तोड़त्तोड़कर लाती है, पत्ते गिर-गिर जाते हैं, घोंसला बनता नहीं; मगर फिर चली जाती है, फिर ले आती है, फिर चली जाती है, फिर ले आती है। उसने सोचा क्या इस चिड़िया से भी कमजोर है मेरा साहस और मेरी आशा और मेरी आस्था? घोंसला बन नहीं रहा है, लेकिन इसकी कहीं भी आशा नहीं टूटती, हताशा नहीं आती। वह फिर वापस गुफा में चला गया। तीन साल तक कहते हैं, फिर उसने हिम्मत करके ध्यान किया। कुछ न हुआ। सब श्रम लगा दिया, लेकिन कुछ न हुआ। फिर घबड़ाकर एक दिन बाहर आ गया और कहा, अब बहुत हो गया!
फिर उस वृक्ष के नीचे बैठा था कि देखा एक मकड़ी जाला बुन रही है। गिर-गिर जाती है, जाले का धागा सम्हलता नहीं, फिर-फिर बुनती है। फिर उसे खयाल आया कि आश्चर्य की बात है, ऐसी चीजें मुझे बाहर आते ही से दिखायी पड़ जाती हैं। अभी मकड़ी भी नहीं हारी, मैं क्यों हारूं? एक बार और कोशिश कर लूं। कहते हैं, वह फिर तीन साल ध्यान किया। कुछ न हुआ। बहुत परेशान हुआ। अब उसने सोचा, अब बाहर निकलूंगा पता नहीं फिर कुछ हो जाए, तो अब की दफे आंख बंद करके ही चले जाना है। अब कुछ भी हो रहा हो बाहर--मकड़ी हो कि चिड़िया हो कि कुछ भी हो, परमात्मा कोई भी इशारे दे, अब बहुत हो गया, नौ साल कोई थोड़ा वक्त नहीं, सारा जीवन गंवा दिया!
वह आंख बंद करके भागा। वह जैसे ही पहाड़ से नीचे उतर रहा था, उसने देखा एक कुतिया, उसकी पीठ सड़ गयी है, उसमें कीड़े पड़ गये हैं--वह उसे दिखायी पड़ी। उससे न रहा गया। बैठा, उसके कीड़े अलग किये, जब वह उसके घाव धो रहा था, तभी ध्यान घटा। जो नौ साल में नहीं घटा था, वह घटा। अचानक, जैसे कुछ गहन में भीतर खींचे लिये चला गया। आंख बंद हो गयीं, वह भीतर पहुंच गया। जिसकी तलाश थी, वह रोशनी सामने खड़ी है। जिसकी तलाश थी, वह बुद्धत्व खिला। उसने कहा, हे प्रभु! इतने दिन तक खोजता था--नौ वर्ष अथक श्रम किये, तब तुम न दिखायी पड़े, तब यह रोशनी न मिली, अब! तो कहते हैं उस रोशनी से उत्तर आया कि मैं तो तब भी तेरे ही भीतर था, लेकिन तेरे ध्यान की चेष्टा बड़ी अहंकार-पूर्ण थी। तेरा अहंकार बाधा बन रहा था। इस कुतिया के घाव धोते वक्त एक क्षण को तेरा अहंकार मौजूद न रहा। करुणा हो, तो अहंकार मौजूद नहीं रहता। प्रेम हो, तो अहंकार समाप्त हो जाता है। मैं तो सदा से तेरे पास था--नौ महीने से भी और नौ सालों से भी, नौ जन्मों से भी । मैं तो भीतर था ही, मैं तेरा स्वभाव हूं, लेकिन तू भीतर नहीं आ पाता था। ध्यान भी कर रहा था तू, तो उसमें अकड़ थी--मैं पाकर रहूंगा। वह अहंकार की उदघोषणा थी।

19/08/2026
19/08/2026

पापा ने जैसे ही ऑफिस में कदम रखा, तभी फोन की घंटी बजने लगी। उन्होंने फोन उठाया और दूसरी तरफ से एक मीठी लेकिन सख्त आवाज सुनाई दी, "सर, नमस्कार! मैं आपकी बेटी की क्लास टीचर बोल रही हूँ। आज सेकंड क्लास की पैरेंट्स टीचर मीटिंग है, जिसमें रिपोर्ट कार्ड दिखाया जाएगा। कृपया आप अपनी बेटी के साथ समय पर पहुंचें।"

पापा की समझ में नहीं आया कि वे क्या करें। ऑफिस में काम का दबाव था, लेकिन आदेश के पाबंद, उन्होंने तुरंत छुट्टी ली और बेटी को लेकर स्कूल के लिए निकल पड़े। स्कूल पहुंचने पर उन्होंने देखा कि क्लासरूम में गुलाबी साड़ी पहने, छोटी सी बिंदी लगाए, एक बेहद तेज-तर्रार और गोरी सी मैडम बैठी हुई थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी सख्ती थी।

पापा ने कुछ बोलने की कोशिश की, लेकिन मैडम ने उन्हें डांटते हुए कहा, "आप अभी रुकिए, मैं आपसे अलग से बात करूंगी।"

पापा ने अपनी बेटी की तरफ देखा, जो खुद को छुपाने की कोशिश कर रही थी, और फिर दोनों चुपचाप पीछे जाकर बैठ गए। "मैम बहुत गुस्से में लगती हैं," बेटी ने धीरे से कहा। पापा भी धीरे से बोले, "तुम्हारा रिपोर्ट कार्ड तो शायद ठीक नहीं होगा।"

बेटी ने चिंतित स्वर में कहा, "मुझे नहीं पता पापा, मैंने तो अब तक देखा ही नहीं।"

पापा ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, "लगता है आज तुम्हारी मैम तुम्हारे साथ मेरी भी क्लास लेने वाली हैं।"

दोनों आपस में फुसफुसा ही रहे थे कि तभी मैम ने आवाज दी, "हाँ, अब आप दोनों आ जाइए।"

पापा और बेटी दोनों डरते-डरते मैम के पास पहुंचे। बेटी पापा के पीछे छुप कर खड़ी हो गई।

मैम ने रिपोर्ट कार्ड निकालते हुए कहा, "देखिए, आपकी बेटी की शिकायतें तो बहुत हैं, लेकिन पहले आप इसकी परीक्षा की कॉपियां और रिपोर्ट देखिए। फिर बताइए कि इसे कैसे पढ़ाया जाए।"

उन्होंने अंग्रेजी की कॉपी सामने रखी और कहा, "पहले इसे देखिए, आपकी बेटी इसमें फेल है।"

पापा ने एक नजर बेटी की तरफ डाली, जो सहमी-सहमी खड़ी थी। फिर मुस्कुराते हुए बोले, "मैम, अंग्रेजी तो विदेशी भाषा है। इस उम्र में बच्चे अपनी ही भाषा ठीक से नहीं समझ पाते, तो अंग्रेजी कैसे समझेंगे?"

मैम को पापा की यह बात नागवार गुजरी। उन्होंने थोड़ी खीझते हुए हिंदी की कॉपी निकालकर कहा, "तो ये देखिए, आपकी बेटी हिंदी में भी फेल है। इसका क्या कहना चाहेंगे?"

पापा ने फिर बेटी की तरफ देखा, मानो उसकी आँखों में "मुझे माफ कर दो" लिखा हो। पापा ने कहा, "मैम, हिंदी एक कठिन भाषा है। यह ध्वनि आधारित है, जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। अब आपके इंग्लिश स्कूल में कोई शुद्ध हिंदी बोलने वाला शायद ही हो।"

मैम को यह सुनते ही और गुस्सा आ गया। उन्होंने पापा की बात को बीच में काटते हुए कहा, "और बाकी बच्चे? वे कैसे पास हो जाते हैं? और आपकी बेटी क्यों नहीं?"

पापा ने बिना झिझके जवाब दिया, "मैं बाकी बच्चों के बारे में नहीं बता सकता, लेकिन..."

इस बार मैम ने पापा की बात को काटते हुए कहा, "और ये देखिए, ये कंप्यूटर में भी फेल है। आज के बच्चे मोबाइल और लैपटॉप की रग-रग से वाकिफ हैं, तो आपकी बेटी कंप्यूटर में कैसे फेल हो गई?"

पापा ने गंभीरता से कॉपी को देखा और बोले, "मैम, ये कोई उम्र है कंप्यूटर पढ़ने और मोबाइल चलाने की? अभी तो बच्चों को फील्ड में खेलना चाहिए।"

मैम का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया था। उन्होंने सारी कापियां समेटते हुए कहा, "साइंस की कॉपी दिखाने से तो कोई फायदा नहीं है। क्योंकि मैं जानती हूँ, अल्बर्ट आइंस्टीन भी बचपन में फेल होते थे।"

पापा इस बार चुपचाप थे। मैम ने एक गहरी सांस ली और फिर शिकायतों की फेहरिस्त जारी रखी, "आपकी बेटी क्लास में डिसिप्लिन में नहीं रहती, शोर करती है, इधर-उधर घूमती है।"

पापा ने इस बार मैम को बीच में रोकते हुए कहा, "मैम, वह सब छोड़िए! गणित की कॉपी कहां है? उसका रिजल्ट तो बताइए।"

मैम ने मुंह फेरते हुए कहा, "उसे दिखाने की जरूरत नहीं है।"

पापा ने जिद्दी लहजे में कहा, "जब सारी कापियां दिखा दीं, तो वह क्यों बाकी रह गई?"

मैम ने अनमने मन से गणित की कॉपी निकालकर पापा को थमा दी। पापा ने देखा कि गणित के नंबर बाकी सभी विषयों से अलग थे—100%!

पापा ने इस बार मैम की ओर देखा और सवाल किया, "तो मैम, मेरी बेटी को अंग्रेजी कौन पढ़ाता है?"

मैम ने धीरे से जवाब दिया, "मैं।"

"और हिंदी कौन पढ़ाता है?"

"वो भी मैं।"

"और कंप्यूटर?"

"वो भी मैं।"

पापा ने मुस्कुराते हुए पूछा, "और गणित कौन पढ़ाता है?"

मैम इस बार कुछ बोल पाती, उससे पहले ही पापा ने खुद जवाब दिया, "मैं।"

मैम ने झेंपते हुए सिर हिलाया, "हाँ, पता है।"

पापा ने अपनी बेटी की ओर देखकर गर्व से कहा, "तो अच्छा टीचर कौन है? और हाँ, दुबारा मुझसे मेरी बेटी की शिकायत मत करना। बच्ची है, शरारत तो करेगी ही।"

मैम तिलमिलाकर खड़ी हो गईं और गुस्से से बोलीं, "मिलना तुम दोनों आज घर पर! दोनों बाप-बेटी की अच्छे से खबर लेती हूँ!"

पापा और बेटी हंसते हुए क्लासरूम से बाहर निकल गए, मानो उन्होंने कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो।

19/08/2026

एक बार की बात है कि देवर्षि नारद वैकुंठ धाम गए। वहां उन्होंने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और श्रीहरि विष्णु भगवन से कहा, ‘‘ हे प्रभु’ पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम हो रहा है। धर्म की राह पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा, और जो पाप कर रहे हैं उनका सब भला हो रहा है।’’ उनके मजे ही मजे हैं।
तब श्रीहरि विष्णु भगवान् ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं है ‘नारद’ जो भी हो रहा है सब नियति के कारण हो रहा है।’’
नारद बोले, ‘‘प्रभु ‘ मैं तो यह सब पृथ्वीलोक देखकर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है।’’
श्री विष्णु भगवान ने कहा, ‘‘नारद कोई ऐसी घटना बताओ जो तुमने देखा हो। तब..
नारद जी ने कहा: अभी मैं पृथ्वीलोक के एक जंगल से आ रहा हूँ। मैंने देखा कि वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था। तभी एक चोर उधर से गुजर रहा था। वह चोर गाय को फंसा हुआ देखकर भी रुका नहीं, बल्कि वह उसपर पैर रखकर दलदल लांघकर आगे निकल गया। “आश्चर्य तो तब हुआ जब आगे जाकर उस चोर को सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिली। ’’
थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को दलदल में फंसा देख उसको बचाने की पूरी कोशिश की। साधू ने अपने पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया। लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु जब कुछ दूर आगे गया, तो एक गड्ढे में गिर गया। ‘हे प्रभु’ अब आप ही बताइए यह कौन सा न्याय है?
देवर्षि नारद की पूरी बात सुनने के बाद श्री हरी बोले,- यह तो सही ही हुआ नारद ! जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था उसकी किस्मत में तो पहले से ही एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरें ही मिलीं।
परन्तु …. प्रभु , नारद बोले – बेचारे उस साधू ने तो कोई पाप नहीं किया था, फिर उसे गड्ढे में गिरकर मृत्यु क्यों मिली !
तब श्री विष्णु भगवान्व ने नारद को समझाया – नारद उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में उस समय बहुत ही कष्टदायक मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय को बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसकी मृत्यु एक छोटी-सी चोट में बदल गई जिससे उसे मृत्यु के समय बहुत ही कम दर्द का आभाष हुआ और वह स्वर्ग के भागी बना।
अब नारद जी संतुष्ट थे।
इसलिए इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है। इंसान को कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि कर्म से भाग्य बदला जा सकता है।
मित्रो तुलसीदास जी कहते हैं कि यह विश्व कर्म प्रधान है। मनुष्य जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। यानी जैसे कर्म वह करता है, उसे उनका वैसा ही फल मिल जाता है। यहाँ कोई भी हेराफेरी नहीं होती। यह सीधा-सा गणित है। अच्छे कर्म करने पर सुख-समृद्धि मिलती है। इसके विपरीत बुरे कर्म करने पर दुख और परेशानियाँ ही मिलती हैं।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि भाग्य और कर्म एक दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। हमें मेहनत करनी चाहिए, निरंतरता बनाए रखनी चाहिए, और संघर्ष में निरंतरता से अग्रसर रहना चाहिए। हमें अपने कर्मों पर विश्वास रखना चाहिए और समय के साथ सही अवसरों का सम्मान करना चाहिए

17/08/2026

सूर्यवंश में 'सत्यव्रत' नाम के एक अत्यंत प्रतापी और पराक्रमी राजा हुए। वे अपनी प्रजा का पालन-पोषण धर्मपूर्वक करते थे, परंतु उनके भीतर अपने सौंदर्य, बल और सत्ता का एक सूक्ष्म अहंकार पनप रहा था ​एक दिन राजसभा में बैठे-बैठे उनके मन में एक अनूठा और अभिमानी विचार आया:

​संसार में जितने भी पुण्य आत्मा हैं, वे मृत्यु के बाद अपना यह शरीर छोड़कर केवल आत्मा रूप में स्वर्ग जाते हैं। परंतु मैं इतना महान और शक्तिशाली राजा हूँ कि मुझे अपने इस पंचभौतिक मानव देह (सशरीर) के साथ ही स्वर्ग जाना चाहिए, ताकि देवता भी मेरे इस हाड़-मांस के शरीर का आदर करें!

सत्यव्रत अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और प्रणाम करके बोले:हे ब्रह्मर्षि! आप अपनी तपस्या के बल से एक ऐसा यज्ञ कराइए, जिसके प्रभाव से मैं अपने इसी जीवित शरीर के साथ स्वर्गलोक चला जाऊँ।

महर्षि वशिष्ठ ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और राजा से शांत स्वर में कहा:
हे राजन्! यह विचार धर्म, प्रकृति और विधि के विधान के विरुद्ध है। यह नश्वर शरीर पृथ्वी के पंचतत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है। इसे स्वर्ग में ले जाना असंभव और अधर्म है। अपनी इस व्यर्थ हठ को त्याग दो और निष्काम भाव से प्रजा-पालन करो।

परंतु राजा सत्यव्रत पर हठ का भूत सवार था। उन्होंने वशिष्ठ जी की बात मानने के बजाय कहा कि यदि आप यह यज्ञ नहीं कराएंगे, तो मैं किसी अन्य ऋषि के पास चला जाऊँगा वशिष्ठ जी के इंकार करने पर राजा सत्यव्रत उनके १०० पुत्रों के पास गए। वशिष्ठ-पुत्रों ने जब देखा कि राजा उनके गुरु और पिता के निर्णय की अवहेलना कर रहा है, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने राजा को शाप दे दिया:
"रे अभिमानी नृप! गुरु की आज्ञा का अनादर करने के कारण तू अत्यंत नीच और कुरूप 'चांडाल' बन जा!
शाप मिलते ही राजा सत्यव्रत का दिव्य रूप, राजसी वस्त्र और आभूषण नष्ट हो गए। उनका शरीर काला, बाल बिखरे हुए, और वस्त्र जीर्ण-शीर्ण हो गए। वे एक भयानक व कुरूप चांडाल के रूप में बदल गए। इस रूप में अयोध्या की प्रजा ने भी उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया।

दुखी और अपमानित होकर सत्यव्रत वन-वन भटकने लगे। अंत में वे महर्षि विश्वामित्र के आश्रम पहुँचे। विश्वामित्र जी उस समय महर्षि वशिष्ठ से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए प्रयासरत थे।
चांडाल रूपी राजा सत्यव्रत ने विश्वामित्र के चरणों में गिरकर रोते हुए अपनी व्यथा सुनाई।

विश्वामित्र जी ने सोचा कि यदि वे वशिष्ठ के मना किए गए कार्य को अपनी तपस्या से पूरा कर दें, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी श्रेष्ठता सिद्ध हो जाएगी। विश्वामित्र जी ने प्रतिज्ञा की:

हे राजन्! तुम वशिष्ठ के शाप से चांडाल बने हो, परंतु मैं अपने उग्र तपोबल से तुम्हें इसी शरीर के साथ देवराज इंद्र के सामने स्वर्ग में बिठाकर रहूँगा!

विश्वामित्र जी ने एक विशाल महायज्ञ का आयोजन किया और सभी ऋषियों को निमंत्रण भेजा। परंतु वशिष्ठ जी के पुत्रों ने इस अस्वाभाविक यज्ञ में आने से मना कर दिया।
यज्ञ की पूर्णाहुति के समय विश्वामित्र ने देवताओं को अपना हविर्भाग (आहुति) लेने के लिए आवाह्न किया, परंतु धर्म-विरुद्ध कार्य होने के कारण कोई भी देवता यज्ञ-स्थल पर प्रकट नहीं हुआ।
इससे विश्वामित्र जी का क्रोध प्रचंड हो उठा। उन्होंने अपने हाथ में जल लिया और अपनी वर्षों की तपस्या का पुण्य राजा सत्यव्रत को अर्पित करते हुए कहा:
हे राजन्! देवताओं के न आने पर भी मेरी तपस्या का फल देखो। मैं तुम्हें अपनी साधना के बल से आकाश में ऊपर स्वर्ग की ओर उछालता हूँ महान तपोबल के प्रभाव से राजा सत्यव्रत का चांडाल शरीर धरती छोड़कर तेज़ी से आकाश की ओर उड़ने लगा।

राजा सत्यव्रत उड़ते हुए सीधे स्वर्ग लोक के द्वार पर पहुँच गए। जब देवताओं के राजा इन्द्र ने एक चांडाल रूपी मनुष्य को सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करते देखा, तो वे क्रोधित हो गए।
इंद्र ने देवताओं के साथ मिलकर राजा को रोका और कहा:
हे नीच! तू गुरु के शाप से पतित हुआ है और प्रकृति के नियम को तोड़कर सशरीर यहाँ आया है। तेरा स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है!
इंद्र ने एक शक्तिशाली प्रहार करके राजा सत्यव्रत को स्वर्ग से नीचे फेंक दिया।

राजा सत्यव्रत सिर के बल (उलटे) आकाश से धरती की ओर तेज़ी से गिरने लगे। भयभीत होकर वे आर्तनाद करने लगे—हे विश्वामित्र! हे ऋषिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिए, मैं नीचे गिर रहा हूँ!
विश्वामित्र जी ने जब राजा की यह दुर्दशा देखी, तो उन्होंने अपने कमंडलु के जल से संकल्प लिया और गड़गड़ाती वाणी में कहा:
"तिष्ठ! तिष्ठ!" (वहीं ठहर जाओ!)

विश्वामित्र के तपोबल की शक्ति नीचे से ऊपर ढकेल रही थी और इंद्र का बल ऊपर से नीचे फेंक रहा था। परिणाम यह हुआ कि राजा सत्यव्रत न तो ऊपर स्वर्ग जा सके और न ही नीचे धरती पर गिर पाए। वे आकाश और पृथ्वी के बीचों-बीच अधर में (उलटे लटके हुए) अटक गए!

स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—इन तीनों लोकों से अलग तीन संकटापन्न स्थितियों में फँसने के कारण उनका नाम 'त्रिशंकु' पड़ा।

जब इंद्र ने त्रिशंकु को स्वीकार नहीं किया, तो विश्वामित्र जी ने इसे अपना व्यक्तिगत अपमान माना। उन्होंने अपने क्रोध और तपोबल से अधर में लटके त्रिशंकु के चारों ओर एक नया स्वर्ग, नए सप्तर्षि और नए नक्षत्र-मंडल (दूसरा ब्रह्मांड) बनाना शुरू कर दिया!
विश्वामित्र जी ने कहा:

यदि इंद्र मेरे राजा को अपने स्वर्ग में नहीं रहने देगा, तो मैं अपने तपोबल से एक दूसरा इंद्र और नया देवलोक बनाकर इस राजा को वहाँ का स्वामी बनाऊँगा सृष्टि के इस नए समानांतर विधान को देखकर ब्रह्मा जी और सभी देवता भयभीत होकर विश्वामित्र जी के पास पहुँचे।

ब्रह्मा जी ने अत्यंत मधुर वाणी में विश्वामित्र जी से कहा:
"हे ब्रह्मर्षि! शांत हो जाइए। आपका तपोबल अगाध है, परंतु सनातन प्रकृति और धर्म की मर्यादा को नष्ट मत कीजिए। नश्वर शरीर कभी मुख्य देवलोक में नहीं रह सकता।
विश्वामित्र जी द्वारा रचे गए ये नए नक्षत्र और तारे 'त्रिशंकु मंडल' के नाम से जाने जाएँगे राजा त्रिशंकु इसी अधर में बने नए लोक (त्रिशंकु लोक) में सशरीर निवास करेंगे, परंतु वे मुख्य स्वर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे।वे उलटे लटके रहेंगे और उनके मुँह से जो लार टपकेगी, वही पृथ्वी पर 'कर्मनाशा नदी' के रूप में बहेगी (मान्यता है कि इस नदी के जल को छूने से संचित पुण्य नष्ट हो जाते हैं)।

अधर में उलटे लटके रहने के बाद राजा सत्यव्रत (त्रिशंकु) की आँखें खुलीं। उनका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने स्वीकार किया
मेरे कुलगुरु वशिष्ठ जी का ज्ञान ही सत्य था। मैंने व्यर्थ के अहंकार और देह-सक्ति में पड़कर अपना लोक और परलोक दोनों बिगाड़ लिया।

!! जय श्री कृष्णा!!

16/08/2026

यूनान में ऐसा हुआ, एक ज्योतिषी रात आकाश के तारों का अध्ययन करता हुआ चला जा रहा था, एक कुएं में गिर पड़ा। पाट नहीं थी कुएं पर। आंखें आकाश में अटकी थीं। चांद—तारों का अध्ययन हो रहा था। कुएं में गिर पड़ा तो चिल्लाया। पास के ही झोपड़े से एक गरीब बुढ़िया ने उसे बामुश्किल निकाला। वह यूनान का सबसे बड़ा ज्योतिषी था। सम्राट भी उसके द्वार पर आते थे।

उसने बुढ़िया का बहुत—बहुत धन्यवाद किया और कहा कि देख, तुझे पता नहीं कि तुझे सौभाग्य से किसको बचाने का अवसर मिला है! मैं यूनान का सबसे बड़ा ज्योतिषी हूं। तारों, नक्षत्रों, उनकी गतिविधियों, मनुष्य के भाग्य से उनके संबंध में मुझसे बड़ा कोई जानकार पृथ्वी पर नहीं है। बड़े से बड़े सम्राट: मेरे पास आते हैं। मेरी फीस भी बहुत ज्यादा है। लेकिन तूने मुझे बचाया है तो तेरा भाग्य मैं बिना फीस के देख दूंगा, तू कल आ जाना।

वह बुढ़िया हंसने लगी। उस ज्योतिषी ने कहा : तू हंसती क्यों है? उसने कहा. मैं इसलिए हंसती हूं कि जिसे अपने सामने का कुआं नहीं दिखाई पड़ता, उसे चांद—तारों की गतिविधि, नक्षत्र और भविष्य...। तुझे अपने पैर सम्हलते नहीं हैं, तू मेरा भविष्य बतायेगा?

होश में आ!

और कहते हैं यह घटना उस ज्योतिषी के जीवन में क्रांति का कारण बन गयी। उसने ज्योतिष छोड़ दी। यह चोट भारी थी! यह बात भी इतनी सच थी! सामने पैर के कुआं है, नहीं दिखाई पड़ा! मगर उसे क्यों कुआं नहीं दिखाई पड़ा था? नहीं कि उसके पास आंख नहीं थी; आंख थी, मगर आंख दूर के तारों पर अटकी थी!

यही आदर्शवादी की भ्रांति है, उसकी आंख दूर के तारों पर अटकी है। आदर्शवादी कहता है मोक्ष पायेंगे! अभी यह सड़ा—गला क्रोध, इससे छुटकारा नहीं हो रहा है। यह सड़ा—गला काम, इससे छुटकारा नहीं हो रहा है। मोक्ष पायेंगे! बैकुंठ जायेंगे! निर्वाण होगा! आंखें बड़े दूर के आकाश पर लगी हैं। और उसकी वजह से रोज—रोज गड्डों में गिर रहे हो। गड्डे—क्रोध के, काम के, वैमनस्य के, ईर्ष्या के, घृणा के! मैं तुमसे कहता हूं : आंखें लौटा लाओ जमीन पर। जहां चलना है वहीं आंखें होनी चाहिए। इस क्षण में ही आंखें होनी चाहिए, क्योंकि गड्डे यहां हैं। और सारे गड्डों से तुम बच जाओ, तो उसी बचाव का नाम मोक्ष है।

मोक्ष कहीं दूर आकाश में नहीं है। जिसके जीवन में गिरने की संभावना न रही, वही मुक्त है।

- ओशो

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