24/08/2026
श्री कमलेश्वर महादेव मन्दिर, बून्दी
पवित्र सावन मास के चतुर्थ सोमवार की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
राजस्थान के बूंदी जिले में मिनी खजुराहो के नाम से प्रसिद्ध श्री कमलेश्वर महादेव मंदिर, हाड़ौती अंचल में धार्मिक आस्था का केंद्र है। इस मंदिर का निर्माण 7वी सदी का माना जाता है लेकिन मन्दिर में स्थित रणथंभौर के शासक राणा हम्मीरदेव चौहान (हठी हम्मीर) के शिलालेख के अनुसार उनके पिता जेत्रसिंह ने वि.सं. 1345 में चाखन नदी के तट पर इस स्थान पर ऊंचे शिखर वाले इस मंदिर का निर्माण व जीर्णोद्धार कार्य करवाये थे। इस शिलालेख में जैत्रसिंह की मालवा विजय का भी उल्लेख मिलता है। हम्मीरदेव चौहान ने भी मन्दिर में निर्माण कार्य करवाए थे। यह मंदिर चाकन नदी के पास प्रकृति के मनोरम वातावरण में स्थित है। इस स्थान के आसपास घना जंगल मौजूद है। यह बिजासन माता मंदिर और इंद्रगढ़ किले के करीब स्थित है। यह क्षेत्र पूर्व में चक्रवर्ती चाहमान राजवंश के रणथंभौर राज्य में सम्मिलित था। बून्दी नरेश राव सुरजन हाड़ा का रणथम्भौर पर अधिकार होने पर यह क्षेत्र बून्दी के चौहान राज्य में सम्मिलित हुआ। कमलेश्वर महादेव मंदिर में तीन कुंड बने हुए हैं। इनमे से दो कुंड में नहाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई तथा एक अन्य कुंड चाकन नदी के रास्ते में बना है। लोगों की मान्यता है कि इन तीनों कुंडों में स्नान करने से लोगों के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं।
दंतकथा : दंतकथा के अनुसार परम शिवभक्त रावण ने मृत्यु से बचने के लिए भगवान शिव की ओर से लंका में आत्मलिंग की स्थापना करने का प्रयास किया था। चिंतित होकर, भगवान विष्णु ने एक बूढ़े व्यक्ति का वेश धारण करके हस्तक्षेप किया। उन्होंने रावण को सुला दिया तथा उसके हाथों से शिवलिंग छीन लिया और उसे ज़मीन पर रख दिया। जब रावण जागा, तो उसने पाया कि वह लिंगम को धरती पर छूने के बाद उसे उठा नहीं पा रहा था, जिससे उसकी योजना विफल हो गई। कहा जाता है कि वह लिंगम आज भी वहीं स्थापित है। लोकाख्यान में कहा जाता है कि हम्मीरदेव चौहान ने स्वप्न में अपने इष्टदेव भगवान शिव के दर्शन प्राप्त करने के बाद इस मंदिर का निर्माण कराया था।
इतिहास : श्री कमलेश्वर महादेव का मंदिर प्राचीन इतिहास का गवाह रहा है। यह मंदिर मध्यकालीन युग का तीर्थ स्थल है। यहां अभी दो मंदिर शेष है, जिसमें एक तो पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो गया है, जिसे खंडदेवरा के नाम से जाना जाता है। दूसरा मुख्य शिवमंदिर देखने योग्य है। मंदिर के आसपास प्राचीन बस्तियों के अवशेष मौजूद हैं। हम्मीरदेव चौहान के काल के सिक्के भी यहाँ मिले हैं। प्राचीनकाल के मिट्टी के बर्तन और पत्थर के औजार भी यहाँ मिले हैं। पुरा महत्व के अवशेष यहां आदि मानव की तात्कालीन मौजूदगी को भी प्रमाणित करते हैं। सघन वन और चाकन नदी की निकटता इस बात को भी प्रमाणित करती है। मंदिर के दाहिनी ओर पहाड़ी पर एक पत्थर की कार्यशाला है। यहाँ अधूरी मूर्तियाँ और बड़े-बड़े शिलाखंडों पर नक्काशी के पूरे चिह्न हैं। इस क्षेत्र में लौह अयस्क की मौजूदगी के प्रमाण भी बताते हैं कि इसका इस्तेमाल पत्थरों को तराशने में किया जाता होगा।
वास्तुकला : मंदिर की वास्तुकला उस अवधि के दौरान प्रचलित विशिष्ट हिंदू मंदिर वास्तुकला शैली को दर्शाती है। यहां पर पत्थरों को तराश कर विभिन्न मुद्राओं में योग, आसन एवं संगीत कला को विभिन्न मूर्तियों के रुप में दिखाया गया है। मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की कलात्मक मूर्तियां विराजमान है, जो स्थापत्य कला प्रमुख रूप से आकर्षण का केंद्र बिंदु है तथा उत्कीर्ण मूर्तियां उत्तम स्थापत्य कला की अनुपम उदाहरण है। इन पर जीवन दर्शन को दर्शाती कला को बड़ी बारीकी से पत्थरों पर उकेरा गया है, जिसकी विशेषता नक्काशीदार पत्थर की दीवारें, स्तंभ और पौराणिक रूपांकनों को दर्शाती मूर्तियाँ हैं। मंदिर परिसर में गर्भगृह में भगवान शिव का लिंगम (लिंग प्रतीक) है, जो एक स्तंभित हॉल (मंडप) और एक खुले आंगन से घिरा है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर विभिन्न देवताओं को दर्शाती नक्काशी है।
त्यौहार और समारोह : मंदिर पूरे साल धार्मिक उत्सवों और सांस्कृतिक समारोहों का केंद्र है। मंदिर में मनाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार महाशिवरात्रि है, जिसे भक्त बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाते हैं, प्रार्थना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं और धार्मिक जुलूसों में भाग लेते हैं। महाशिवरात्रि के अलावा, श्रावण मास और अमावस्या से पहले प्रदोष जैसे अन्य त्यौहार भी उत्साह के साथ मनाए जाते हैं, जो भगवान शिव का आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दूर से भक्तों को आकर्षित करते हैं।
संरक्षण की आवश्यकता : श्री कमलेश्वर महादेव मंदिर क्षेत्र धार्मिक और पुरा महत्व के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। इससे अलग हुई कलात्मक प्रतिमाएं इस क्षेत्र में इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं। मंदिर और उसके आस-पास की विरासत संरचनाओं को संरक्षित करने के प्रयास होने चाहिए। 13वीं सदी के इस पौराणिक मंदिर में स्थापत्य कला को देखते हुए पुरातत्व विभाग को इस क्षेत्र और मंदिर को संरक्षित करना चाहिए। अब भी इन्हें संरक्षित नहीं किया गया तो इस कलात्मक धरोहर के नष्ट होने की आशंका है। इसके लिए यहां साइट म्यूजियम बनाया जाना चाहिए, जिससे इधर-उधर बिखरी पड़ी कलात्मक प्रतिमाओं को एक सुरक्षित मुकाम मिल सकेगा। कमलेश्वर महादेव मंदिर परिक्षेत्र रणथंभौर टाइगर रिजर्व एरिया के करीब होने से यहां पर्यटन की अपार संभावनाएं है। इसके पास ही रणथंभौर बाघ परियोजना के पर्यटन क्षेत्र के जोन 9 का प्रवेश द्वार है। इस क्षेत्र में अक्सर टाइगर की मूवमेंट होती रहती है। यहां पर्यटन को विकसित करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करने के साथ मूलभूत सुविधाओं के विस्तार की भी ज़रूरत है। इससे यहां पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा औैर पर्यटक इस स्थान की प्राचीन कला से भी रूबरू हो सकेंगे।
ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
©आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी
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