Brahma kumaris Daily Murli

Brahma kumaris Daily Murli Rajayoga meditation center Mysore.

06/06/2026
*_06-06-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_**_“मीठे बच्चे - अमृतवेले का समय बहुत-बहुत अच्छा है, इसलिए सवेरे-सवेर...
06/06/2026

*_06-06-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_*

*_“मीठे बच्चे - अमृतवेले का समय बहुत-बहुत अच्छा है, इसलिए सवेरे-सवेरे उठकर एकान्त में बैठ बाबा से मीठी-मीठी बातें करो''_*

*_प्रश्नः-_* कौन-सी नॉलेज निरन्तर योगी बनने में बहुत मदद करती है?

*_उत्तर:-_* ड्रामा की। जो कुछ बीता, ड्रामा की भावी। ज़रा भी स्थिति हलचल में न आये। भल कैसी भी परिस्थिति हो, अर्थक्वेक आ जाए, धन्धे में घाटा पड़ जाए लेकिन ज़रा भी संशय पैदा न हो - इसको कहते हैं महावीर। अगर ड्रामा की यथार्थ नॉलेज नहीं तो आंसू बहाते रहेंगे। निरन्तर योगी बनने में ड्रामा की नॉलेज बहुत मदद करती है।

*_गीत:-ओम् नमो शिवाए........_*

*_ओम् शान्ति।_*

बच्चे अब अच्छी रीति समझते हैं पतित दुनिया का अब अन्त हो रहा है। पावन दुनिया की आदि हो रही है। यह सिर्फ तुम बच्चे ही जानते हो। और बच्चों को ही यह डायरेक्शन वा श्रीमत मिलती है। कौन देते हैं? ऊंच ते ऊंच भगवान। समझाते रहते हैं कि पतित से पावन बनना है। यह नॉलेज तुम्हारे लिए है और तो सब पतित हैं। यह पतित दुनिया विनाश जरूर होनी है। पतित कहा जाता है विकारी को। बाप समझाते हैं कि तुम जन्म-जन्मान्तर एक-दो को दु:ख देते आये हो, इसलिए तुम आदि-मध्य-अन्त दु:ख पाते हो। एक-दो को पतित बनाते हो। पुकारते भी हैं कि हम पतित हैं, परन्तु बुद्धि में पूरा बैठता नहीं है। कहते भी हैं पतित-पावन आओ परन्तु फिर भी पतितपना छोड़ते नहीं हैं। अभी तुम समझते हो सारी बात है पावन बनने की। यह समझाने वाला भी तो कोई चाहिए। समझाने वाला है ही एक। बाकी यह जो गुरू लोग हैं, ये किसको पावन बना नहीं सकते। पावन भी सिर्फ एक जन्म के लिए नहीं, जन्म-जन्मान्तर के लिए बनना है। तुम्हारे में भी जो ज्ञानवान हैं वे तीखे होते हैं। ड्रामा अनुसार वह नूँध है। तुम्हारे में भी महावीरपना चाहिए। वह आयेगा बाप की याद में रहने से। बाप बहुत अच्छी रीति बैठ समझाते हैं। जैसे बाबा कहते हैं कि सवेरे उठकर याद करो। वह समय बहुत सुन्दर है याद करने का, जिसको प्रभात कहा जाता है। भक्ति मार्ग में भी कहते हैं राम सिमर प्रभात मोरे मन। बाप भी कहते हैं सवेरे उठ बाप को याद करो तो बड़ा मज़ा आयेगा। बाप की याद में बैठ यही ख्याल करना चाहिए कि कैसे किसको समझायें? अमृतवेले का वायुमण्डल बड़ा शुद्ध रहता है। दिन में तो गोरखधन्धा रहता है। रात को 12 बजे तक तो विकारी वायुमण्डल रहता है। साधू-सन्त, भक्त आदि सब भक्ति भी प्रभात को करते हैं। यूँ तो याद दिन में भी कर सकते हैं। धन्धे में भल रहे, बुद्धि का योग, जिस देवता का पुजारी होगा उनके पास होगा। परन्तु ऐसा किसका रहता नहीं है। भक्ति मार्ग में सिर्फ दर्शन के लिए मेहनत करते हैं। मिलता कुछ भी नहीं। उनको भी भक्ति करते-करते तमोप्रधान बनना ही है। भक्ति मार्ग में भी शिव पर बलि चढ़ते हैं, जिसको काशी कलवट कहते हैं। शिव को याद करते-करते कुएं में कूद पड़ते हैं। शिव के ऊपर बलि चढ़ते हैं, वह है भक्ति मार्ग की बलि। यह है ज्ञान मार्ग की बलि। वह भी मुश्किल, यह भी मुश्किल। भक्ति मार्ग में इससे कुछ फायदा नहीं। यह जैसे आत्मा अपने शरीर का घात करती है। यह कोई ज्ञान नहीं है। वह भी कह देते आत्मा सो परमात्मा। आत्म-अभिमानी तो एक बाप ही है, जो बच्चों को समझाते हैं कि परमात्मा तो मैं एक ही हूँ। हम आत्मा सो परमात्मा कहना - यह बड़े से बड़ी झूठ है। यह तो हो नहीं सकता।

बाप कहते हैं - मैं आता ही हूँ पतितों को पावन बनाने, सो पावन बना रहा हूँ। बाकी तो ड्रामा में जो होना है सो होगा ही। समझो अर्थक्वेक होती है, छत गिर जाती है, कहेंगे भावी, कल्प पहले भी ऐसे हुआ था। इसमें ज़रा भी हिलने की दरकार नहीं। ड्रामा पर पक्का खड़ा रहना है। इसको ही महावीर कहा जाता है। एक्सीडेंट आदि तो ढेर के ढेर होते रहते हैं। फिर किसकी रक्षा करते हैं क्या? यह तो ड्रामा में नूँध है। ऐसा ही ड्रामा में पार्ट है। जो ड्रामा को नहीं जानते वह देह को याद कर आंसू बहाते हैं। वह कभी शिवबाबा को याद नहीं कर सकते क्योंकि शिवबाबा से प्यार नहीं है। सच्ची प्रीत नहीं है। बाप के साथ तो पूरी प्रीत होनी चाहिए। शिवबाबा के साथ प्रीत बुद्धि तुम कल्प-कल्प बनते हो। देवताओं की बाप के साथ प्रीत बुद्धि थी, ऐसे नहीं कहेंगे। उन्होंने इस प्रीत से वह पद पाया है। वहाँ तो मालूम भी नहीं रहेगा - सारे कल्प में तुमको शिवबाबा का पता भी नहीं रहता है जो प्रीत रख सको। अभी बाप ने अपना परिचय दिया है। अब बाप कहते हैं कि और संग तोड़ मुझ एक साथ जोड़ो। यह विनाश काल तो जरूर है। यह भी तुम बच्चे जानते हो। मनुष्य तो बिल्कुल ही घोर अन्धियारे में हैं। तुम अभी समझते हो हमको तो बाप से पूरा वर्सा लेना है। याद बिगर सतोप्रधान नहीं बन सकेंगे। सर्जन बन अपने रोग को देखना है। श्रीमत पर देखना है कि हमारी बाप के साथ कितनी प्रीत है? अमृतवेले ही बाप को याद करना अच्छा है। प्रभात का समय बहुत अच्छा है। उस समय माया के तूफान नहीं आयेंगे। रात को 12 बजे तक तपस्या करने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि टाइम ही गन्दा होता है। वायुमण्डल खराब रहता है। तो एक बजे तक छोड़ देना चाहिए। एक के बाद वायुमण्डल अच्छा रहता है। बाप कहते हैं - अपना तो है ही सहज राजयोग, भल आराम से बैठो। बाबा अपना अनुभव भी सुनाते हैं। कैसे बाबा से बातें करता हूँ। बाबा कैसा वन्डरफुल यह ड्रामा है! आप कैसे आकर पतित से पावन बनाते हो! सारी दुनिया को कैसे पलटाते हो! बड़ा वण्डर है! जैसे बाप को ख्याल आते हैं वैसे बच्चों को भी आने चाहिए। कैसे मनुष्यों का बेड़ा पार करें अथवा कैसे नईया पार करें। बाप कहते हैं - तुम पुकारते रहते हो हे पतित-पावन आओ। अब मैं आया हूँ, अब तुम पतित न बनो। पतित होकर सभा में आकर नहीं बैठो। नहीं तो वायुमण्डल अशुद्ध कर देते हो। बाबा को मालूम तो पड़ता है। देहली में, बाम्बे में ऐसे विकार में जाने वाले आकर बैठ जाते थे। गाया हुआ है असुर आकर विघ्न डालने बैठते थे। विकार में जाने वालों को असुर कहा जाता है। वायुमण्डल को खराब करते हैं। उनके लिए सज़ा बहुत कड़ी है। बाबा समझाते तो सभी बातें हैं फिर भी अपना घाटा करने के सिवाए रहते नहीं। झूठ भी बोलते हैं। नहीं तो फौरन लिख देना चाहिए - बाबा, हमसे यह भूल हुई, क्षमा करना। अपना पाप लिख दो। नहीं तो वृद्धि को पाते रहेंगे और रसातल में चले जायेंगे। आते हैं कुछ लेने लिए और ही कान कटा लेते। यह भी ड्रामा में पार्ट है। ऐसे असुर कल्प पहले भी थे, अब भी हैं। अमृत छोड़ विष पीते हैं। अपना भी घात करते हैं और औरों को भी नुकसान पहुँचाते हैं। वायुमण्डल खराब कर देते हैं। ब्राह्मणियाँ भी सब एक समान नहीं हैं। महारथी, घोड़ेसवार, प्यादे सब हैं।

तुम बच्चों को अथाह खुशी होनी चाहिए - बाबा मिला और बाकी क्या। हाँ, अपने बच्चों आदि को जरूर सम्भालना है। ऐसे नहीं कि बाबा यह सब आपके हैं, अब आप सम्भालो। हम तो आपके बन गये। बाप समझाते हैं कि गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र बनो। कोई भी पतित काम नहीं करो। बस पहली बात है काम की। द्रोपदी ने भी इस पर पुकारा कि हमको यह नंगन करते हैं। पुकारा भी तब था जब बाप सुनने वाला आया था। बाप के आने के पहले कोई भी पुकारते नहीं हैं। किसको पुकारेंगे? बाबा आया है तब ही पुकारते हैं। पतित से पावन बनकर फिर कहाँ जायेंगे? वापिस जाना है, वह तो यही समय है। सबका सद्गति दाता, लिबरेटर एक ही है। यहाँ तो दु:ख है। साधू-सन्त आदि कोई भी सुखी हो न सकें। सबको कोई न कोई दु:ख, रोग आदि होता ही है। कोई गुरू अन्धा लूला भी होता है। जरूर कोई ऐसा काम किया है तब तो अन्धा लूला आदि बनते हैं। सतयुग में कोई अन्धा लूला आदि थोड़ेही होगा। मनुष्य थोड़ेही समझते हैं। बाप ही आकर समझाते हैं। बाप ही ज्ञान का सागर पतित-पावन है। बाकी तो सब है भक्ति। वह भक्ति मार्ग ही अलग है। वह है सीढ़ी उतरने का मार्ग। उतरने में, जीवनबन्ध में आने में 84 जन्म लगते हैं और फिर एक सेकण्ड लगता है जीवनमुक्त बनने में। अगर उनकी मत पर चल बाप को याद करे तो। नम्बरवार तो हैं ना। कहते हैं हमको फलानी टीचर मिले तो अच्छा है। तो जरूर खुद कमजोर है तब तो कहते हैं फलानी को 2-4 मास के लिए भेज दो। बाबा कहते हैं यह भी भूल है। तुम ब्राह्मणी को क्यों याद करते हो जबकि बाप सहज बात बताते हैं - सिर्फ बाप को याद करो और स्वदर्शन चक्र फिराओ, औरों को भी समझाओ। बस। इसमें ब्राह्मणी आकर क्या करेगी? यह तो सेकण्ड की बात है। तुम धन्धे-धोरी में यह भूल जाते हो फिर भी ब्राह्मणी यही कहेगी मनमनाभव। कई बुद्धू लोग समझते नहीं हैं सिर्फ कहते हैं ब्राह्मणी अच्छी चाहिए। ज्ञान तो तुमको मिला है ना। बाप और वर्से को याद करो। देह-अभिमान को छोड़ो। यह हमारा सेन्टर है, यह इनका सेन्टर है। यह जिज्ञासू यहाँ क्यों जाते हैं... यह सब देह-अभिमान है। सब शिवबाबा के सेन्टर्स हैं, हमारा थोड़ेही सेन्टर है। तुमको यह क्यों होता है कि फलाना हमारे सेन्टर पर क्यों नहीं आता। कहाँ भी जाये। बाबा हमेशा कहते हैं कोई से भी मांगों नहीं। यह समझ सकते हैं कि बीज नहीं बोयेंगे तो मिलेगा क्या? भक्ति मार्ग में भी दान-पुण्य किया जाता है। तुम सब भक्ति मार्ग में ईश्वर अर्थ इनडायरेक्ट करते थे। फिर संन्यासियों को भी बहुत देते हैं। नहीं तो दान गरीबों को दिया जाता है, न कि साहूकारों को। इसमें अनाज का दान सबसे अच्छा होता है। सो भी बाप समझाते हैं दान करने से दूसरे जन्म में उसका फल मिल जाता है। ईश्वर ही सबको फल देते हैं। साधू-सन्त आदि कोई रिटर्न नहीं दे सकते हैं। देने वाला एक ही बाप है। किसके भी थ्रू देवे। बाप समझाते हैं कि तुम ईश्वर अर्थ देते थे तो भी दूसरे जन्म में तुमको एवजा दिलाते थे। अभी तो मैं डायरेक्ट आया हूँ। अभी तुमको 21 जन्म के लिए रिटर्न मिलेगा। फिर तो मौत सामने खड़ा है। भक्ति मार्ग में तुमको ऐसे नहीं कहते थे कि मौत सामने खड़ा है इसलिए अपना सफल करो। नहीं। तो अब बाप समझाते हैं - जिसको भी चाहिए यह रूहानी हॉस्पिटल खोल दो। कोई कहते हैं मकान बनायें, उसमें यह हॉस्पिटल खोलें। बाप कहते हैं - आज मकान बनाओ और कल मर जाओ तो यह सब खत्म हो जायेगा। शरीर पर भरोसा नहीं है। जो है उसमें ही तब तक एक कमरा रख दो, जिसमें रूहानी हॉस्पिटल, रूहानी कॉलेज बनाओ। बहुतों का कल्याण करेंगे तो बहुत ऊंच पद पायेंगे। *_अच्छा!_*

*_मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।_*

*_धारणा के लिए मुख्य सार:-_*

1) श्रीमत पर अपने आपको देखना है कि इस विनाश काल में मेरी एक बाप से सच्ची प्रीत है? और सब संग तोड़ एक संग जोड़ी है? कभी कोई विकर्म करके असुर तो नहीं बनते? ऐसी चेकिंग कर स्वयं को परिवर्तन करना है।

2) इस शरीर पर कोई भरोसा नहीं इसलिए अपना सब कुछ सफल करना है। अपनी स्थिति एकरस, अचल बनाने के लिए ड्रामा के राज़ को बुद्धि में रखकर चलना है।

*_वरदान:-_* बार-बार हार खाने के बजाए बलिहार जाने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान् विजयी भव

स्वयं को सदा विजयी रत्न समझकर हर संकल्प और कर्म करो तो कभी भी हार हो नहीं सकती। मास्टर सर्व-शक्तिमान् कभी हार नहीं खा सकते। यदि बार-बार हार होती है तो धर्मराज की मार खानी पड़ेगी और हार खाने वालों को भविष्य में हार बनाने पड़ेंगे, द्वापर से अनेक मूर्तियों को हार पहनाने पड़ेंगे इसलिए हार खाने के बजाए बलिहार हो जाओ, अपने सम्पूर्ण स्वरूप को धारण करने की प्रतिज्ञा करो तो विजयी बन जायेंगे।

*_स्लोगन:-_* “कब'' शब्द कमजोरी सिद्ध करता है इसलिए “कब'' करेंगे नहीं, अब करना है।

*_ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।_*

इस बेहद की स्टेज पर मैं खिलाड़ी हूँ। यह खिलाड़ी की स्टेज सदा हर्षितमुख रहने का अनुभव कराती है। किसी भी प्रकार की कोई भी बात, जिसको दुनिया वाले आपदा समझते हैं लेकिन खिलाड़ी बन खेल करने वाले और साक्षी हो खेल देखने वाले, ऐसी आपदा के रूप को खेल समझ, सहनशीलता की शक्ति से मनोरंजन का अनुभव करते हैं।

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*_05-06-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_**_“ मीठे बच्चे - बाप के साथ - साथ तभी चल सकेंगे जब इस पुरानी दुनिया ...
05/06/2026

*_05-06-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_*

*_“ मीठे बच्चे - बाप के साथ - साथ तभी चल सकेंगे जब इस पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य होगा ''_*

*_प्रश्नः-_* भगवान समर्थ होते हुए भी उसके रचे हुए यज्ञ में विघ्न क्यों पड़ते हैं?

*_उत्तर:-_* क्योंकि रावण भगवान से भी तीखा है। जरूर जब उसका राज्य छीना जायेगा तो वह विघ्न डालेगा ही। शुरू से लेकर ड्रामा अनुसार इस यज्ञ में विघ्न पड़ते ही आये हैं, पड़ने ही हैं। हम पतित दुनिया से पावन दुनिया में ट्रांसफर हो रहे हैं तो जरूर पतित मनुष्य विघ्न डालेंगे।

*_गीत:-ओ दूर के मुसाफिर..._*

*_ओम् शान्ति।_*

मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत की लाइन सुनी। जैसे वेद शास्त्र आदि भक्ति मार्ग का रास्ता बताते हैं वैसे गीत भी थोड़ा रास्ता बताते हैं। वह तो कुछ समझते नहीं। शास्त्रों की कथायें आदि सुनना, वह जैसे है कनरस। अब बच्चे जानते हैं - दूरदेश का मुसाफिर किसको कहा जाता है। आत्मा जानती है - हम भी दूर के मुसाफिर हैं, हमारा घर शान्तिधाम है। मनुष्य इन बातों को नहीं समझे तो गोया कुछ नहीं समझे। बाप को न जानने से सृष्टि चक्र को कोई नहीं जानते हैं। यह आत्मा समझती है कि शिवबाबा कहते हैं - मैं टैप्रेरी जीव आत्मा बनता हूँ। तुम स्थाई जीव आत्मा हो। मैं सिर्फ संगम पर ही टैप्रेरी जीव आत्मा हूँ। सो भी तुम्हारे मुआफिक नहीं बनता। मैं इस जीव में प्रवेश करता हूँ, अपना परिचय देने। नहीं तो तुमको परिचय कैसे मिले? बाप ने समझाया है - रूहानी बाप एक ही है, जिसको शिवबाबा अथवा भगवान कहते हैं। दूसरा कोई नहीं जानते। इसमें पवित्रता का भी बन्धन है। बड़े ते बड़ा बन्धन है अपने को आत्मा समझना, जिस दूर के मुसाफिर पतित-पावन को भक्ति मार्ग में याद करते हैं। वह रूहानी बाप समझाते हैं कि मैं सबको ले चलूँगा। किसको भी छोड़ नहीं जाऊंगा, वापिस तो सबको जाना है। प्रलय भी नहीं होनी है। भारत खण्ड तो रहता ही है। भारत खण्ड का कभी विनाश नहीं होता है। सतयुग आदि में सिर्फ भारत खण्ड ही रहता है। कल्प के संगम पर जब बाप आते हैं तो आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन करना होता है। बाकी सब धर्म विनाश होने हैं। तुम भी आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन करने में मदद कर रहे हो। तो गीत सुना - कहते हैं बाबा हमको भी साथ ले चलो। बाप कहते हैं - ऐसे साथ में कोई चल न सके, जब तक पुरानी दुनिया से वैराग्य न आये। नया मकान बनता है तो पुराने से दिल टूट जाती है। तुम भी जानते हो यह पुरानी दुनिया खत्म होनी है। अब नई दुनिया में चलना है। जब तक सतोप्रधान नहीं बनेंगे तब तक सतोप्रधान देवी-देवता बन नहीं सकेंगे इसलिए बाबा बार-बार समझाते हैं - अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते रहो। सद्गति करने वाला दूर का मुसाफिर एक ही आया हुआ है, उनको दुनिया नहीं जानती। सर्वव्यापी कह दिया है। अभी तुम बच्चे नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार जानते हो कि हम शिवबाबा की सन्तान हैं। आते भी हैं तो समझते हैं हम बापदादा के पास जाते हैं, तो यह फैमली हो गई। यह है ईश्वरीय फैमली। किसको बहुत बच्चे होते हैं तो बड़ी पलटन हो जाती है। शिवबाबा के बच्चे जो इतने बी.के. भाई-बहिन हैं, यह भी बड़ी पलटन हो जाती है। ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ सब जानते हैं - हम बेहद के बाप से वर्सा लेते हैं। शास्त्रों में दिखाते हैं पाण्डवों और कौरवों ने खेल खेला। राजाई दांव में रखी। अब राजाई न कौरवों की है, न पाण्डवों की हैं। ताज आदि कुछ भी नहीं है। दिखाते हैं उनको शहर निकाला मिला। हथियार आदि छिपाकर जाए रखा। यह सब हैं दन्त कथायें। न पाण्डव राज्य है, न कौरव राज्य है। न उन्हों की आपस में लड़ाई चली है। लड़ाई राजाओं की लगती है। यह तो भाई-भाई हैं। लड़ाई हुई है कौरवों और यौवनों की। बाकी भाई एक दो को कैसे खत्म करेंगे। दिखाते हैं पाण्डव, कौरव लड़े। बाकी 5 पाण्डव बचे और एक कुत्ता रहा। वह भी सब पहाड़ पर गल मरे। खेल ही खलास। राजयोग का अर्थ ही नहीं निकला।

अभी तुम बच्चे जानते हो बाप कल्प-कल्प आकर एक धर्म की स्थापना करते हैं। बुलाते भी हैं हे पतित-पावन बाबा आओ, आकर पतित से पावन बनाओ। सतयुग में सूर्यवंशी राजधानी ही होती है। ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी की स्थापना हो रही है। अब बाप आये हैं तो उनके डायरेक्शन पर चलना है। कमल पुष्प समान पवित्र रहना है। कन्याओं को तो नहीं कहेंगे कि गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहो। वह तो हैं ही पवित्र। यह गृहस्थियों के लिए कहा जाता है। कुमार और कुमारियों को तो शादी करनी ही नहीं चाहिए। नहीं तो वह भी गृहस्थी हो पड़ेंगे। कुछ गन्धर्वी विवाह का नाम भी है। कन्या पर मार पड़ती है तो लाचारी हालत में गन्धर्वी विवाह कराया जाता है। वास्तव में मार भी सहन करनी चाहिए, परन्तु अधरकुमारी नहीं बनना चाहिए। बाल ब्रह्मचारी का नाम बहुत होता है। शादी की तो हाफ पार्टनर हो गये। कुमारों को कहा जाता है - तुम तो पवित्र रहो। गृहस्थ व्यवहार वालों को कहा जाता है - गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल के समान बनो। उन्हों को ही मेहनत होती है। शादी न करने से बन्धन नहीं रहेगा। कन्या को तो पढ़ना है और ज्ञान में बहुत मजबूत रहना है। छोटी कुमारियां जो सगीर हैं, उनको तो हम ले नहीं सकते। वह अपने घर में रहकर पढ़ सकती हैं। माता-पिता ज्ञान में आये तो सगीर को ले सकते हैं। यह तो स्कूल का स्कूल है, घर का घर है और सतसंग का सतसंग। सत माना एक बाप, जिसके लिए ही कहते हैं ओ दूर के मुसाफिर। आत्मा गोरी बनती है। बाप कहते हैं - मैं मुसाफिर सदा गोरा रहता हूँ। प्योरिटी में रहने वाला हूँ। मैं आकर सभी आत्माओं को पवित्र गोरा बनाता हूँ और तो कोई ऐसे मुसाफिर हैं नहीं। बाप समझाते हैं - मैं आया हूँ रावण राज्य में। यह शरीर भी पराया है। तुम्हारी आत्मा कहेगी - यह हमारा शरीर है। बाबा कहेंगे यह हमारा शरीर नहीं है। यह इनका शरीर है। यह पतित शरीर हमारा नहीं है। आते ही हैं इनके बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में। जो नम्बरवन पावन था, वही नम्बर लास्ट अर्थात् अन्त में विकारी बनते हैं। पहला नम्बर 16 कला सम्पूर्ण था। अब कोई कला नहीं रही है। पतित तो सब हैं ही। तो बाप दूरदेश का मुसाफिर हुआ ना। तुम आत्मायें भी मुसाफिर हो। यहाँ आकर पार्ट बजाती हो। इस सृष्टि चक्र को कोई नहीं जानते हैं। भल कोई कितना भी शास्त्र आदि पढ़ा हो परन्तु यह ज्ञान कोई नहीं दे सकते। बाप समझाते हैं - मैं इस तन में प्रवेश कर इन आत्माओं को ज्ञान देता हूँ। वह तो मनुष्य, मनुष्य को शास्त्रों का ज्ञान देते हैं। वह हो गये भगत। सद्गति दाता तो एक ही है। वही ज्ञान का सागर है, उनको न जानने कारण देह-अभिमान आ जाता है। वह कोई यह तो समझाते नहीं हैं कि अपने को आत्मा निश्चय करो। आत्मा पढ़ती है। यह कोई समझाते नहीं हैं क्योंकि देह-अभिमान है। अभी दूर का मुसाफिर तो शिव-बाबा को ही कहेंगे। तुम जानते हो हम 84 जन्म का चक्र लगा चुके हैं।

बाप कहते हैं - 5 हजार वर्ष पहले भी समझाया था कि बच्चे तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो। मैं जानता हूँ - गीता में आटे में लून मिसल कुछ है। वही गीता का एपीसोड, वही महाभारत की लड़ाई, वही मनमनाभव-मध्याजी भव का ज्ञान है। मामेकम् याद करो। लड़ाई भी बरोबर लगी है। पाण्डवों की विजय हुई। विजय माला विष्णु की गाई जाती है। शास्त्रों में तो दिखाया है पाण्डव गल मरे। फिर माला कहाँ से बनी। अब तुम समझते हो कि हम विष्णु की माला बनने यहाँ आये हैं। ऊपर में है पतित-पावन बाप। उनका यादगार चाहिए ना। भक्ति मार्ग में यादगार गाया जाता है। कोई 8 की माला, कोई 108 की माला, कोई 16108 की बनाई है। गाते हैं - चढ़ती कला तेरे भाने सर्व का भला। अभी तुम जानते हो - हमारी चढ़ती कला है। हम चले जायेंगे अपने सुखधाम फिर हम वहाँ से नीचे कैसे उतरते हैं। 84 जन्म कैसे लेते हैं, यह सारा ज्ञान तुम्हारी बुद्धि में है। यह ज्ञान भूलना नहीं चाहिए। हमारे सब दु:ख दूर करने, श्राप मिटाए सुख का वर्सा देने बाप आया है। रावण के श्राप से सबको दु:ख होता है। तो अब बाप को और वर्से को याद करना है। तुम जानते हो हम सूर्यवंशियों ने भारत में राज्य किया। भारत में ही शिवबाबा आते हैं। भारत ही स्वर्ग था, यह घड़ी-घड़ी बुद्धि में याद करना पड़े। जिसने 84 का चक्र नहीं खाया होगा, वह न धारणा करेंगे, न करायेंगे उसके लिए समझा जायेगा कि इसने 84 जन्म नहीं लिये हैं। यह देरी से आते हैं। स्वर्ग में नहीं आते हैं। पहले-पहले जाना तो अच्छा है ना। नये मकान में पहले खुद रहते हैं फिर किराये पर चढ़ाते हैं। तो वह फिर सेकेण्ड हैण्ड हुआ ना। सतयुग है नई दुनिया। त्रेता सेकेण्ड हैण्ड कहेंगे। तो अब बुद्धि में आता है हम स्वर्ग नई दुनिया में जायें। पुरुषार्थ करना है, प्रजा भी बनती जायेगी। तुमको मालूम पड़ता जायेगा कि माला में कौन-कौन पिरो सकते हैं। अगर किसको सीधा कहा जाए कि तुम नहीं आयेंगे तो हार्टफेल हो जाए इसलिए कहा जाता है कि पुरुषार्थ करो, अपनी जांच करो कि हमारा बुद्धियोग भटकता तो नहीं है! तुम्हारा शिवबाबा से कितना लव होता जाता है! कहते भी हैं हम बापदादा के पास जाते हैं। शिवबाबा से दादा द्वारा वर्सा लेने जाते हैं। ऐसे बाप के पास तो कई बार जायें। परन्तु गृहस्थ व्यवहार भी सम्भालना है। भल बहुत धनवान हैं परन्तु इतनी फुर्सत नही। पूरा निश्चय नहीं। नहीं तो मास दो मास बाद आकर रिफ्रेश हो सकते हैं। उनको घड़ी-घड़ी कशिश होगी। सुई पर जंक चढ़ी हुई होती है तो चुम्बक इतना खींचता नहीं है। जिनका पूरा योग होगा उनको झट कशिश होगी, भाग आयेंगे। जितनी कट उतरती जायेगी, उतनी कशिश होगी। हम चुम्बक से मिलें। गीत है चाहे मारो, चाहे कुछ भी करो... हम दर से कभी नहीं निकलेंगे। परन्तु वह अवस्था तो पिछाड़ी में होगी। कट निकली हुई होगी तो वह अवस्था होगी। बाप कहते हैं - हे आत्मायें मनमनाभव, रहो भल अपने गृहस्थ व्यवहार में। ऐसे नहीं कि यहाँ भागकर आए बैठ जाना है। सागर पास बादलों को आना है - रिफ्रेश होने। फिर सर्विस पर जाना है। बन्धन जब खलास हो तो सर्विस पर जा सकें। माँ-बाप को अपने बच्चों को सम्भालना है। बाप की याद में रहना है। पवित्र बनना है।

बाप ने समझाया है - अनेक प्रकार के विघ्न ज्ञान यज्ञ में पड़ते हैं। कहते हैं ईश्वर तो समर्थ है फिर विघ्न क्यों? मनुष्यों को पता ही नहीं है, रावण भगवान से भी तीखा है। उनकी राजाई छीनी जाती है तो अनेक प्रकार के विघ्न पड़ते रहते हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार फिर भी विघ्न पड़ेंगे। शुरूआत से लेकर पतितों के विघ्न पड़ते हैं। शास्त्रों में भी लिख दिया है - श्रीकृष्ण को 16108 पटरानियां थी। सर्प ने डसा। राम की सीता चुराई गई। अब रावण स्वर्ग में कहाँ से आये। झूठ तो बहुत है। कहते हैं विकार बिगर बच्चे कैसे होंगे। उनको पता ही नहीं - जो वर्सा लेने वाले होंगे वही आकर समझेंगे। तो इस ज्ञान यज्ञ में असुरों के विघ्न पड़ते हैं। पतित को असुर कहा जाता है। है ही रावण सम्प्रदाय। अभी तुम संगम पर हो। रावण राज्य से किनारा कर लिया है फिर भी कुछ लैस आती है। यह बुद्धि में ज्ञान है कि हम जा रहे हैं। बैठे तो यहाँ ही हैं। बुद्धि में ज्ञान है। बैठे यहाँ हो परन्तु उनसे जैसे तुमको वैराग्य है। यह छी-छी दुनिया कब्रिस्तान बननी है। भिन्न-भिन्न प्वाइन्ट्स से समझाया जाता है। वास्तव में तो एक ही प्वाइन्ट है मनमनाभव। कितनों की चिट्ठियां आती हैं - बाबा हम बांधेली हैं। एक द्रोपदी तो नहीं हैं, हजारों हो जायेंगी। अभी तुम पतित दुनिया से पावन दुनिया में ट्रांसफर हो रहे हो। जो कल्प पहले फूल बने होंगे वही निकलेंगे। गॉर्डन ऑफ अल्लाह की यहाँ स्थापना होगी। कोई-कोई तो ऐसे अच्छे-अच्छे फूल होते हैं जो देखने से ही आराम आ जाता है। नाम ही है किंग ऑफ फ्लावर्स। 5 रोज़ से रखा हो तो भी खिला रहेगा। खुशबू फैलती रहेगी। यहाँ भी जो बाप को याद करते और याद दिलाते हैं उनकी खुशबू फैलती है। सदैव खुश रहते हैं। ऐसे मीठे-मीठे बच्चों को देख बाप हर्षित होते हैं। उन्हों के आगे बाबा की ज्ञान डांस अच्छी होती है। *_अच्छा।_*

*_मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।_*

*_धारणा के लिए मुख्य सार:-_*

1) ज्ञान और योग में मजबूत बनना है। अगर कोई बन्धन नहीं है तो बन्धनों में जानबूझकर फॅसना नहीं है। बाल ब्रह्मचारी होकर रहना है।

2) अभी हमारी चढ़ती कला है, बाबा हमारे सब दु:ख दूर करने, श्राप मिटाए वर्सा देने आये हैं। बाप और वर्से को याद कर अपार खुशी में रहना है। जांच करनी है कि हमारा बुद्धियोग कहाँ भटकता तो नहीं है।

*_वरदान:-_* समाने और सामना करने की शक्ति द्वारा सेवा में सफलता प्राप्त करने वाले रूहानी सेवाधारी भव

रूहानी सेवाधारियों को सेवा के सिवाए कुछ भी सूझता नहीं, वे मन्सा-वाचा-कर्मणा सर्विस से एक सेकण्ड भी रेस्ट नहीं लेते इसलिए बेस्ट बन जाते हैं। वे सेवाओं में सफलता प्राप्त करने के लिए सदा यही याद रखते कि समाना और सामना करना - यही हमारा निशाना है। वे अपने पुराने संस्कारों को समाते हैं और सामना माया से करते न कि दैवी परिवार से। ऐसे बच्चे जो नॉलेजफुल के साथ-साथ पावरफुल भी हैं उन्हें ही कहा जाता है रूहानी सेवाधारी।

*_स्लोगन:-_* छोटी बात को बड़ा नहीं करो, वातावरण को शक्तिशाली बनाओ।

*_ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ , सहनशील बनो।_*

दुनिया में लोग जिंदा होते भी नाउम्मींदी की चिता पर बैठे हुए हैं, ऐसी आत्माओं को मरजीवा बनाओ, नये जीवन का दान दो। अपने खुशनसीब, हर्षित मुख चेहरे द्वारा उन्हें मानव जीवन में जीना सिखाओ। आपको देखकर उनमें हिम्मत, उमंग-उत्साह आ जाये, इसके लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ और सदा कमल समान स्थिति के आसन पर डबल लाइट स्थिति में स्थित रहो।

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*_04-06-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_**_“मीठे बच्चे - तुम पारलौकिक बाप को यथार्थ रीति जानते हो इसलिए तुम्ह...
04/06/2026

*_04-06-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_*

*_“मीठे बच्चे - तुम पारलौकिक बाप को यथार्थ रीति जानते हो इसलिए तुम्हें ही सच्चे प्रीत बुद्धि वा आस्तिक कहेंगे''_*

*_प्रश्नः-_* बाप के किस कर्तव्य से सिद्ध होता है कि वह भक्तों का रक्षक है?

*_उत्तर:-_* सब भक्तों को रावण की जेल से छुड़ाना, इनसालवेन्ट से सालवेन्ट बनाना, यह एक बाप का ही कर्तव्य है। जो पुराने भक्त हैं उन्हें ब्राह्मण बनाकर देवता बना देना - यही उनकी रक्षा है। भक्तों का रक्षक आया है - अपने सभी भक्तों को मुक्ति-जीवनमुक्ति देने।

*_गीत:-भोलेनाथ से निराला..._*

*_ओम् शान्ति।_*

यह किसकी महिमा सुनी बच्चों ने? गाया जाता है ऊंच ते ऊंच भगवान और भगवान को ही बाप कहा जाता है। वही इस सारी रचना का रचयिता है। जैसे लौकिक बाप भी रचयिता है अपनी रचना का। पहले कन्या को अपनी स्त्री बनाते हैं और फिर उनसे रचना रचते हैं। 5-7 बच्चे पैदा करते हैं। उनको कहा जायेगा रचना। बाप ठहरा रचयिता। वह हद के रचयिता ठहरे। यह भी बच्चे जानते हैं रचना को रचयिता बाप से वर्सा मिलता है। मनुष्य को दो बाप तो होते ही हैं - एक लौकिक, दूसरा पारलौकिक। बच्चों को समझाया है ज्ञान और भक्ति अलग-अलग है, फिर है वैराग्य। इस समय तुम बच्चे संगम पर बैठे हो और बाकी सब कलियुग में बैठे हुए हैं। हैं तो सब बच्चे परन्तु तुमने बेहद के बाप को जाना है जो सारी रचना का रचयिता है। लौकिक बाप होते भी उस पारलौकिक बाप को याद करते हैं। सतयुग में लौकिक बाप होते पारलौकिक बाप को कोई याद नहीं करते क्योंकि है ही सुखधाम। उस पारलौकिक बाप को दु:ख में याद करते हैं। यहाँ पढ़ाया जाता है, मनुष्य को समझदार बनाया जाता है। भक्ति मार्ग में मनुष्य बाप को भी नहीं जानते हैं। कहते भी हैं परमपिता परमात्मा, हे गॉड फादर, हे दु:ख हर्ता सुख कर्ता। फिर कह देते सर्वव्यापी। पत्थर में, कण-कण, कुत्ते, बिल्ली सबमें है। परमात्मा बाप को गालियाँ देने लग पड़ते हैं।

तुम बाप के बने हो तो तुम हो गये आस्तिक। तुम्हारी बाप के साथ प्रीत बुद्धि है। बाकी सबकी बाप के साथ विपरीत बुद्धि है। अब तुम जानते हो महाभारी लड़ाई भी सामने खड़ी है। पुरानी दुनिया के विनाश अर्थ हर 5 हजार वर्ष बाद कलियुगी पतित दुनिया पूरी हो फिर सतयुगी पावन दुनिया स्थापन होती है, बाप के द्वारा। जिसको ही याद करते हैं - हे पतित-पावन आओ। हे खिवैया हमको इस विषय सागर से निकाल क्षीरसागर में ले जाओ। गांधी जी भी गाते थे - पतित-पावन सीताराम... हे राम सब सीताओं को पावन बनाओ। तुम सब हो सीतायें, भक्तियाँ। वह है भगवान, सब उनको पुकारते हैं। वह तुमको पतित से पावन बना रहे हैं। तुमको कहाँ भी धक्के नहीं खिलाते हैं। ऐसे नहीं कहते तीर्थों पर जाओ, कुम्भ के मेले पर जाओ। नहीं, यह नदियाँ कोई पतित-पावनी नहीं हैं। पतित-पावन एक ज्ञान का सागर बाप है। सागर वा नदियों को कोई याद नहीं करते हैं। पुकारते हैं बाप को, हे पतित-पावन बाबा हमको पावन बनाओ। बाकी पानी की नदियाँ तो सारी दुनिया में हैं, वह थोड़ेही पतित-पावनी हैं। पतित-पावन एक बाप को ही कहा जाता है। वह जब आये तब आकर पावन बनाये। भारत की महिमा बहुत भारी है। भारत सब धर्मों का तीर्थ स्थान है। शिव जयन्ती भी यहाँ गाई जाती है। सतयुग तो है पावन दुनिया, उसमें देवी-देवता रहते हैं। देवताओं की महिमा गाई जाती है, सर्वगुण सम्पन्न 16 कला सम्पूर्ण... चन्द्रवंशियों को 14 कला कहेंगे। फिर सीढ़ी नीचे उतरते हैं। बाप आकर सेकण्ड में सीढ़ी चढ़ाए शान्तिधाम-सुखधाम में ले जाते हैं। फिर 84 का चक्र लगाए सीढ़ी उतरते हैं। 84 जन्म कोई ने तो जरूर लिये होंगे। मुख्य है सर्वशास्त्रमई शिरोमणी गीता, श्रीमत् भगवत माना भगवान की गाई हुई। परन्तु भगवान किसको कहा जाता है - यह पतित मनुष्य नहीं जानते। पतित-पावन सर्व का सद्गति दाता एक निराकार शिव ही है परन्तु वह कब आया, यह कोई नहीं जानते। बाप आपेही आकर अपना परिचय देते हैं। अब देखो यह बच्चे और बच्चियाँ दोनों बाबा कहते हैं। गाया भी जाता है तुम मात-पिता... तुम्हारे इस राजयोग सीखने से सुख घनेरे मिलते हैं। तुम यहाँ आते ही हो बेहद के बाप से स्वर्ग के 21 जन्मों का वर्सा पाने। अब शिव जयन्ती भी भारत में ही मनाते हैं। रावण भी भारत में ही दिखाते हैं। परन्तु अर्थ कुछ भी नहीं जानते। शिव हमारा बेहद का बाप है, यह एक भी नहीं जानते सिर्फ शिव की पूजा करते रहते हैं। जब सारा झाड़ तमोप्रधान हो जाता है तब बाप आते हैं। नई दुनिया में भारत स्वर्ग था। भारत में ही सतयुग था। भारत में ही अब कलियुग है। बाप समझाते हैं पहले-पहले तुम स्वर्ग के मालिक थे। अब तुम 84 जन्म भोग नर्कवासी बने हो। अब मैं तुमको राजयोग सिखलाए मनुष्य से देवता, पतित से पावन बनाता हूँ। भक्ति अर्थात् ब्रह्मा की रात। ज्ञान अर्थात् ब्रह्मा का दिन। तुम ब्रह्माकुमार कुमारियाँ दिन में जाते हो। इस पुरानी दुनिया को अब आग लगनी है, बरोबर महाभारत लड़ाई है। बरोबर इस महाभारत लड़ाई के बाद ही भारत स्वर्ग बन जाता है। अनेक धर्म विनाश हो एक धर्म की स्थापना होती है।

तुम बच्चे बाबा के मददगार बन आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना कर रहे हो। तुम स्वर्ग के मालिक बनने लायक बन जायेंगे तो फिर विनाश शुरू हो जायेगा। यह है शिवबाबा का ज्ञान यज्ञ फिर शिव कहो वा रूद्र कहो। कृष्ण ज्ञान यज्ञ कभी नहीं कहा जाता। सतयुग त्रेता में यज्ञ होता नहीं। यज्ञ तब रचा जाता है जब उपद्रव होता है। अनाज नहीं होगा वा लड़ाई लगेगी तो यज्ञ रचेंगे शान्ति के लिए। तुम बच्चे जानते हो - विनाश होने बिगर तो भारत स्वर्ग बन न सके। भारत माता शिव शक्ति सेना गाई हुई है। वन्दना पवित्र की ही की जाती है। तुम माताओं को वन्दे मातरम् कहा जाता है क्योंकि तुमने श्रीमत पर भारत को स्वर्ग बनाया है। अब बाप कहते हैं मौत तो सबके सिर पर खड़ा है इसलिए अब यह एक जन्म पवित्र बनो और बाप को याद करो तो तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। अभी तुम शूद्र से ब्राह्मण बन फिर देवता बनेंगे, यह कोई नई बात नहीं। कल्प-कल्प हर 5 हजार वर्ष बाद यह चक्र फिरता रहता है। नर्क से स्वर्ग बनता है। पतित दुनिया में मनुष्य जो कुछ कर्म करते हैं वह विकर्म ही बनता है। बाप कहते हैं - 5 हजार वर्ष पहले भी तुमको कर्म-अकर्म-विकर्म की गति समझाई थी। अब फिर से तुमको समझाता हूँ। मैं परमपिता परमात्मा निराकार तुम्हारा बाप हूँ। यह शरीर, जिसका हमने आधार लिया है, यह कोई भगवान नहीं है। मनुष्य को देवता भी नहीं कहा जाता। तो मनुष्य को भगवान कैसे कह सकते हैं। बाप समझाते हैं, तुम 84 जन्म लेते-लेते नीचे सीढ़ी उतरते आये हो, ऊपर कोई जा नहीं सकता है। सभी पतित बनने का ही रास्ता बताते हैं, खुद भी पतित बनते जाते हैं। तब बाप कहते हैं उनका भी उद्धार करने मुझे आना पड़ता है। यह है रावण राज्य। तुम अभी रावण राज्य से निकल आये हो। धीरे-धीरे सबको पता पड़ेगा। ब्राह्मण बनने बिगर शिवबाबा से वर्सा ले नहीं सकते। बाप हैं ही दो। एक निराकारी बाप, एक साकारी बाप। वर्सा मिलता है एक साकारी बाप से साकारी बच्चों को और फिर निराकारी बेहद के बाप से वर्सा मिलता है निराकारी आत्माओं को। अब तुम बच्चे जानते हो - मीठे-मीठे शिवबाबा से हम 21 जन्म के लिए सुखधाम का वर्सा लेने आये हैं। विश्व के मालिक बनते हैं योगबल से। कोई हथियार आदि नहीं हैं। तो बाप से योग लगाए विकर्म विनाश कर विष्णुपुरी के मालिक बनते हैं। अब अमरलोक में जाने के लिए अमर कथा सुन रहे हैं। वहाँ अकाले मृत्यु कभी होता नहीं। दु:ख का नाम-निशान नहीं। तुम बच्चे आये हो श्रीमत पर चल बेहद के बाप से श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ देवी-देवता बनने। यह कोई शास्त्रों का ज्ञान नहीं है। दिखाते हैं विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला। उनके हाथ में फिर शास्त्र देते हैं। बाप कहते हैं - ब्रह्मा द्वारा मैं तुमको सारी रचना के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान सुना रहा हूँ। मैं ही ज्ञान का सागर हूँ। गाते भी हैं ज्ञान सूर्य प्रगटा... अज्ञान अन्धेर विनाश। सतयुग में अज्ञान होता नहीं। वह सचखण्ड था तो भारत हीरे जैसा था, हीरे जवाहरों के महल बनते थे। अभी तो मनुष्यों को पूरा खाने के लिए भी नहीं है। इनसालवेन्ट विश्व को फिर सालवेन्ट कौन बनाये! यह बाप का ही काम है। बाप को ही तरस पड़ता है। कहते हैं तुमको राजयोग सिखाने आया हूँ। नर को नारायण, नारी को लक्ष्मी बनाता हूँ। भक्तों का रक्षक है ही बाप। तुमको रावण की जेल से छुड़ाए सुखधाम में ले जाता हूँ। सारी दुनिया में जो ब्राह्मण बनेंगे वही देवता बनेंगे। ब्रह्मा का नाम भी बाला है - प्रजापिता ब्रह्मा। तुम ब्राह्मण हो सबसे उत्तम, तुम भारत की सच्ची रूहानी सेवा कर रहे हो। बाप की याद से ही विकर्म विनाश होंगे। और कोई रास्ता नहीं है - पतित से पावन बनने का। याद से ही खाद भस्म होगी। सोनार लोग जानते हैं - सच्चा सोना, झूठा सोना कैसे बनता है। उसमें चांदी-तांबा-लोहा डालते हैं। तुम भी पहले सतोप्रधान थे फिर तुम्हारे में खाद पड़ती है, तमोप्रधान बन पड़े हो। अभी फिर सतोप्रधान बनना पड़े तब सतयुग में जा सकेंगे। बाप कहते हैं - कोई भी देहधारी को याद नहीं करो। गृहस्थ व्यवहार में रहते एक बाप के सिवाए और कोई को याद नहीं करो तो तुम स्वर्गपुरी के मालिक बन जायेंगे। स्वर्ग अथवा विष्णुपुरी थी, अब रावणपुरी है। फिर विष्णुपुरी बनेगी जरूर। साधू-सन्त आदि सबका उद्धार करने आता हूँ, तब ही कहा जाता है यदा यदाहि धर्मस्य... यह भारत की ही बात है। सर्व का सद्गति दाता मैं एक बाप शिव हूँ। शिव, रूद्र सब उनके ही नाम हैं, अथाह नाम रख दिये हैं। बाप कहते हैं - मेरा असली नाम तो एक ही है - शिव। मैं शिव हूँ, तुम सालिग्राम बच्चे हो। तुम आधाकल्प देह-अभिमानी रहे हो। अब देही-अभीमानी बनो। एक बाप को जानने से बाप द्वारा तुम सब कुछ जान जाते हो। मास्टर ज्ञान सागर बन जाते हो। *_अच्छा!_*

*_मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।_*

*_धारणा के लिए मुख्य सार:-_*

1) श्रीमत पर चलकर श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ देवता बनना है। सारे विश्व की सच्ची-सच्ची रूहानी सेवा करनी है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना में बाप का पूरा मददगार बनना है।

2) आत्मा को सच्चा सोना बनाने के लिए एक बाप के सिवाए किसी भी देहधारी को याद नहीं करना है। पारलौकिक बाप से सच्ची-सच्ची प्रीत रखनी है।

*_वरदान:-_* आत्मिक उन्नति के साधन द्वारा सर्व परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने वाले अकालमूर्त भव

जैसे शरीर निर्वाह के लिए अनेक साधन अपनाते हो ऐसे आत्मिक उन्नति के भी साधन अपनाओ, इसके लिए सदा अकालमूर्त स्थिति में स्थिति होने का अभ्यास करो। जो स्वयं को अकालमूर्त (आत्मा) समझकर चलते हैं वह अकाले मृत्यु से, अकाल से, सर्व समस्याओं से बच जाते हैं। मानसिक चिंतायें, मानसिक परिस्थितियों को हटाने के लिए सिर्फ अपने पुराने शरीर के भान को मिटाते जाओ।

*_स्लोगन:-_* कोई भी बात जो बार-बार फील करता है वह फाइनल में फेल हो जाता है।

*_मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य - “मनुष्य साक्षात्कार में कैसे जाते हैं?''_*

यह जो साक्षात्कार में जाना होता है तो इसकी फिलॉसाफी भी बहुत महीन है। यह अंत:वाहक शरीर से जाकर घूम आते हैं। जैसे कोई बाहर घूमने जाता है ना, तो ऐसे नहीं घूमने गया तो मरा, वो घूम कर फिर वापस लौटकर आयेगा ना। तो यह भी आत्मा इस बॉडी से निकल अन्त:वाहक शरीर से सैर करने जाती है, थोड़े समय के लिये इनकी आत्मा उड़ता पंछी है, यह भी परमात्मा का काम है जो उनकी रस्सी को खैंच दिव्य दृष्टि से उनको साक्षात्कार कराता है। जैसे रात को हम जब शरीर से न्यारी आत्मा हो सुख-पथ अथवा स्वप्न की अवस्था में चले जाते हैं, तो उसी समय शरीर शान्त है, तो देह और देह के धर्म भूल जाते परन्तु ऐसे नहीं कोई शरीर मर गया फिर जब जागृत में आता है, तो उस रात के सपने की अवस्था का वर्णन कर सुनाते हैं। वैसे परमात्मा के साथ योग लगाने से परमात्मा फिर दिव्य दृष्टि से आत्मा को सैर कराते हैं। फिर जब ध्यान से उठते हैं तो वो देखा हुआ साक्षात्कार, फिर वर्णन कर सुनाते हैं कि हम यह देखकर आये। तो वह स्वप्न रजोगुण, तमोगुण भी होता है, यह ध्यान फिर सतोगुण अवस्था है। तो ध्यान में कोई शरीर मरता नहीं है, मगर शरीर की भासना गुम हो जाती है। जैसे क्लोरोफॉर्म देने से शरीर की सुध-बुध भूल जाती है, देखो, डॉक्टर जब कोई अंग को डेड करते हैं तो इंजेक्शन लगाकर डेड कर देते हैं परन्तु और इन्द्रियां तो चलती हैं, तो ध्यान भी इसी तरह से है कि आत्मा कोई उड़कर सैर कर आती है परन्तु शरीर मर नहीं जाता, अब यह रस्सी खींचने की स्मृति भी परमात्मा में है, न कि मनुष्य आत्मा में। *_अच्छा, ओम् शान्ति।_*

*_ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।_*

सदा हर्षित रहने वालों का यादगार विष्णु के रूप में दिखाया है। विष्णु क्षीरसागर में आराम से लेटा हुआ ज्ञान का सिमरण कर हर्षित हो रहा है। तो हर्षित रहने का साधन है ज्ञान का सिमरण। जो जितना ज्ञान का सिमरण करते हैं वह उतना ही हर्षित रहते हैं। कोई भी परिस्थिति उनकी हिम्मत, उमंग-हुल्लास को कम नहीं कर सकती। वे सहनशीलता की शक्ति से हर परिस्थिति को सहज पार कर लेते हैं।

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Gyan Sarovar Retreat Center Lingadevarakoppal
Mysore
570030

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