Brahma kumaris Daily Murli

Brahma kumaris Daily Murli Rajayoga meditation center Mysore.

07/09/2026
*_07-09-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_**_“मीठे बच्चे - तुम यहाँ श्रीकृष्ण जैसा प्रिन्स बनने की पढ़ाई पढ़ते ...
07/09/2026

*_07-09-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_*

*_“मीठे बच्चे - तुम यहाँ श्रीकृष्ण जैसा प्रिन्स बनने की पढ़ाई पढ़ते हो, तुम्हें पढ़ाने वाला स्वयं भगवान है''_*

*_प्रश्नः-_* बाबा जब भगवानुवाच शब्द बोलते हैं तो कई बच्चे भी मूँझ जाते हैं - क्यों?

*_उत्तर:-_*:क्योंकि भगवान तो गुप्त है। वह समझते हैं शायद इस दादा ने भगवानुवाच बोला है। परन्तु निराकार भगवान को बोलने के लिए जरूर मुख चाहिए ना। बाबा कहते यह वन्डरफुल समझने की बात है कि मैं कैसे इनमें प्रवेश कर तुम्हें पढ़ाता हूँ।

*_ओम् शान्ति।_*

भगवानुवाच। भगवान क्या कहते हैं? यह भगवानुवाच किसने कहा? देखने में तो कोई आता नहीं। मनुष्य को भगवान नहीं कहा जाता। कोई समझेंगे कि बोलने वाले ही कहते हैं - भगवानुवाच। लेकिन निराकार भगवान बोल रहे हैं, यह सिर्फ तुम ही जानते हो। यह कौन बैठा है! भगवान कहाँ हैं! यह नई बात है ना इसलिए मनुष्य मूंझ जाते हैं। लेकिन भगवानुवाच है जरूर। कहते हैं कि मैं बच्चों को राजयोग सिखा रहा हूँ। नर से नारायण अथवा कृष्ण, नारी को लक्ष्मी अथवा राधे बनाने लिए योग और ज्ञान सिखाता हूँ, इनसे और क्या चाहिए। तुमको हम राजाओं का राजा, प्रिन्स का प्रिन्स बनाता हूँ। प्रिन्स-प्रिन्सेज भी तो मन्दिर में जाते होंगे ना। विकारी प्रिन्स, निर्विकारी प्रिन्स श्रीकृष्ण को नमन करते हैं। तो मैं तुमको प्रिन्स का भी प्रिन्स बनाता हूँ। श्रीकृष्ण जैसे स्वर्ग का प्रिन्स बनो। नॉलेज पढ़ने से ही तो बनेंगे ना। डॉक्टर वा बैरिस्टर कहेंगे ना स्टूडेन्ट को, कि मैं तुमको डॉक्टर वा बैरिस्टर बनाता हूँ। परन्तु पढ़ेंगे तब तो बनेंगे। बाबा कहते बच्चे, अच्छी रीति समझते हो कि राजयोग सिखलाने वाला एक ही भगवान है, न कि श्रीकृष्ण। राधे-कृष्ण तो अलग-अलग राजाई के बच्चे हैं। उन्हों की आपस में सगाई होती है, शादी के बाद नाम बदलता है इसलिए चित्र में भी लक्ष्मी-नारायण के नीचे राधे-कृष्ण को दिखाया है।

अब बाप अच्छी रीति समझाते हैं कि यह ब्रह्मा भी नम्बरवन भगत था। पिछाड़ी में नारायण की पूजा करते थे। श्रीकृष्ण की भक्ति की वा श्रीनारायण की भक्ति की, एक ही बात है। कृष्ण ही बड़ा होकर नारायण बनता है। अब तुमको नर से नारायण बनने के लिए राजयोग सिखला रहे हैं। अब तुम्हारे 84 जन्म पूरे हुए। अब इनकी आत्मा भी पढ़ रही है फिर भविष्य में श्रीकृष्ण बनती है। बाप कहते हैं - बच्चों तुम ज्ञान-चिता पर बैठ गोरे बनते हो फिर काम-चिता पर बैठ सांवरे बन गये हो। यह है कंसपुरी, मैं तुमको कृष्ण पुरी ले जाने के लिए आया हूँ। श्रीकृष्ण ही सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण है... यहाँ कोई में सर्वगुण हैं नहीं। मैं आया हूँ बच्चों को सम्पूर्ण निर्विकारी बनाने। बनना है योगबल से। बाहुबल है - हिंसक लड़ाई, जो तीर-कमान से होती थी। फिर बन्दूकों, तलवारों से हुई। अब तो होती है बॉम्बस से। खुद कहते हैं हम ऐसे बॉम्बस बनाते हैं जो घर बैठे सब खत्म हो जायेंगे। फिर मिलेट्री क्या करेगी! बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों यह पाठशाला है। मैं तुमको प्रिन्स श्रीकृष्ण जैसा बनाता हूँ। जो फर्स्ट प्रिन्स सतयुग का था, वह अब 84 जन्म लेकर कलियुग में बेगर बना है। भारत में ही उनका राज्य था। फिर पुनर्जन्म लेना पड़े ना। श्रीकृष्ण को भगवान कहते तो भगवान फिर पुनर्जन्म में कैसे आयेगा? भगवान तो निराकार है। वह है ही एक रचयिता। बाकी सब हैं रचना, तब तो कहते हैं कि हम आत्मायें सब भाई-भाई हैं। बाप समझाते हैं कि तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी आपस में भाई-बहिन ठहरे। तो फिर क्रिमिनल एसाल्ट कैसे हो। तुम वर्सा एक बाप से लेते हो, भविष्य के लिए। अगर पवित्र नहीं रहेंगे तो शान्तिधाम, सुखधाम में कैसे जायेंगे। पुकारते भी हैं हम पतित बन गये हैं, पावन बनाने आओ। तो बाप कहते हैं मुझे याद करो। यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है। तुम सब आत्मायें अब वापिस वानप्रस्थ में जा सकती हो इसलिए वानप्रस्थी हो। ऐसा कोई गुरू रास्ता बता न सके। यह ज्ञान है ही एक बाप के पास। वही पतित-पावन निराकार है। बाप कहते हैं कि मुझे याद करो, थोड़े टाइम के लिए, मैंने इस तन का लोन लिया है। शरीर बिगर आत्मा कैसे बोल सकेगी! भगवानुवाच है कि मैं बूढ़े साधारण तन में प्रवेश कर तुम बच्चों को पढ़ाता हूँ। मैं गर्भ में नहीं आता हूँ। गर्भ में आने वाले को तो पुनर्जन्म में आना पड़े। मैं एक ही बार आता हूँ। प्रकृति का आधार मुझे जरूर चाहिए। मैं इसमें बैठ तुमको पढ़ाता हूँ। यह तो पहले अपना जवाहरात का धंधा करता था। कोई गुरू ने नहीं सिखाया, अचानक ही बाप ने प्रवेश किया। करनकरावनहार होने कारण इससे कर्तव्य कराते रहते हैं। यह भी सीखता जाता है। तुम भी साथ में सीखते जाते हो। बोलते हैं तुमको, परन्तु सुनता पहले मैं हूँ। पढ़ाने तुम बच्चों को आता हूँ परन्तु इनकी आत्मा भी पढ़ती रहती है। बच्चों को राजयोग सिखलाने आया हूँ। ऐसा कभी कोई पढ़ाते नहीं हैं। यह है पावन बनने की बात। यह संगमयुग है ही पुरुषोत्तम बनने का। पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण था। स्वयंवर के बाद उनकी डिग्री कुछ कम हो जाती है इसलिए श्रीकृष्ण की महिमा बहुत है। नाम ही है श्रीकृष्ण-पुरी, इनको कहा जाता है कंसपुरी। बाकी कहानी बनाई है - श्रीकृष्ण और कंस की।

बच्चों को समझाया है कि परिपक्व अवस्था होने से भक्ति आपेही छूट जायेगी। तुम कभी कोई को ऐसा नहीं कहना कि भक्ति न करो। उनको ज्ञान देना है। बाप तुमको ज्ञान दे स्वर्ग का प्रिन्स बनाने आये हैं। श्रीकृष्ण भी स्वर्ग का मालिक था, अब नहीं है। फिर से वह भी राजयोग द्वारा बन रहे हैं। तुमको भी पुरुषार्थ कर बाप को याद करना है। हेविन की स्थापना करने वाला है - हेविनली गॉड फादर। वही आकर नई सृष्टि रचते हैं। वह करेगा तब जब कलियुग पूरा होगा। सतयुग-त्रेता में नहीं आते। कहते हैं मैं कल्प-कल्प संगमयुगे आता हूँ। उन्होंने कल्प अक्षर निकाल सिर्फ युगे-युगे लिख दिया है। तो भी 4 युग हैं। पांचवा है यह संगमयुग। अच्छा फिर तो 5 अवतार मानों। परन्तु इतने कच्छ-मच्छ परशुराम अवतार होते हैं क्या! यह सभी हैं शास्त्रों की बातें। धर्म का नाम और भारत का नाम ही बदली कर दिया है। हिन्दू धर्म और हिन्दुस्तान कह देते हैं। भारत नाम क्यों बदलना चाहिए! यदा यदाहि धर्मस्य... भारत। उसमें भी भारत का अक्षर आता है। बाप समझाते हैं कि तुमने कोई एक जन्म थोड़ेही भक्ति की है। द्वापर से की है। भक्ति भी पहले अव्यभिचारी थी, सिर्फ शिव की भक्ति करते थे। जिस शिवबाबा ने ही भारत को स्वर्ग बनाया था और अब फिर स्वर्ग का मालिक बनाने आये हैं। तो पतित शरीर में बैठ बताते हैं कि मैं आता ही हूँ, पतित शरीर में, पतित दुनिया में पतितों को पावन बनाने। भक्ति मार्ग में तो फिर भी मेरे लिए बड़ा भारी मन्दिर बनाते हैं। कितनी क्लीयर बात है। इनमें बाबा की प्रवेशता हुई और गीता आदि पढ़ना छोड़ दिया। भक्ति छूट गई। अनायास ही तो छोड़ा। तुमको कोई ने कहा नहीं कि भक्ति नहीं करो।

अब तुम बच्चों को बाबा समझाते हैं कि फिर से मैं तुमको कृष्णपुरी का मालिक बनाता हूँ। श्रीकृष्ण की फिर 8 डिनायस्टी चलती हैं। पहले कहेंगे प्रिन्स ऑफ सतयुग फिर बनता है किंग ऑफ सतयुग। 8 पीढ़ी उनकी चलती हैं। उस समय तो दूसरी राजाई होती नहीं। अब बाबा कहते हैं तुम बच्चे भी सतयुग के प्रिन्स बनो। भक्ति में कोई सुख नहीं है। ज्ञान से तुम स्वर्ग के मालिक बनते हो। कोई का बाप मर जाता है तो उनसे पूछा जाये तुम्हारा बाप कहाँ गया! कहेंगे स्वर्गवासी हुआ। समझते हैं आत्मा और शरीर दोनों गये। लेकिन शरीर तो यहाँ ही छोड़ गये, बाकी गई आत्मा। इसका मतलब पहले नर्क में था। आत्मा शरीर छोड़ स्वर्ग में गई फिर इसमें रोने की क्या दरकार है? स्वर्ग अब यहाँ है क्या? परन्तु समझते नहीं हैं। कह देते सब ईश्वर का हुक्म है। सुख दु:ख सब ईश्वर देता है, सब ईश्वर के रूप हैं। परन्तु बाप कहते हैं कि मैं बच्चों को दु:ख कैसे दे सकता हूँ। बाप से बच्चे कब दु:ख माँगते हैं क्या? बाप तो बच्चों को लायक बनाकर प्रापर्टी दे जाते हैं। बाकी दु:ख तो हर एक को कर्मों के अनुसार ही मिलता है। बाप कहते हैं कि अभी बच्चे आदि कुछ नहीं माँगो। अभी यह प्रॉपर्टी आदि सब खत्म होने वाली है। फिर तुम्हारे बच्चों को क्या मिलेगा! इतना समय ही नहीं है जो तुम्हारी प्रॉपर्टी का बच्चा मालिक बन सके। बच्चा बड़ा हो तब तो मालिक बनें, परन्तु इतना टाइम ही नहीं है। विनाश सामने खड़ा है। मनुष्य तो कहते हैं कि कलियुग में अजुन 40 हजार वर्ष पड़े हैं। यह ब्रह्माकुमार-कुमारियां तो विनाश-विनाश करते रहते हैं। कहानी है ना - शेर आया, शेर आया... आखिर तो आया और खा गया। सब समझते हैं कि थोड़ा-थोड़ा काल आयेगा। यह तो होता ही रहता है लेकिन तुम कहते हो कि महाकाल आया हुआ है। शिवबाबा कालों का काल आया हुआ है, जो सभी आत्माओं को वापिस ले जायेगा। तो शरीर तो जरूर छोड़ना पड़े इसलिए बाबा कहते हैं - योग से पवित्र बनो। आत्माओं को पवित्र बनाए फिर वापिस ले जायेंगे। अगर पवित्र नहीं बनेंगे तो बहुत सजायें अन्त में खानी पड़ेंगी और ऊंच पद भी पा नहीं सकेंगे। श्रीकृष्ण नम्बरवन पास विद् ऑनर है, उनको स्कॉलरशिप मिलती है। 21 जन्म राज्य पाते हैं। कितना सहज समझाते हैं। बुद्धि में बैठता भी है फिर गुम हो जाता है। किसको भी भक्ति छुड़ानी नहीं है। बाप आये हैं - भक्तों को भक्ति का फल देने। कहते हैं मैं कल्प पहले मिसल फिर उसी साधारण तन में आया हूँ। कल्प-कल्प आकर तुमको पढ़ाता हूँ। यह है ऊंच से ऊंच पढ़ाई।

तुम जानते हो हम सतोप्रधान थे। अब तमोप्रधान हैं फिर भारत ही सतोप्रधान बनता है। और धर्म वालों ने इतना सुख नहीं देखा है तो दु:ख भी नहीं देखा है। बाहर वालों के पास पैसा तो बहुत है तो गरीब देश को कर्ज देते हैं। उन बिचारों को पता नहीं है, यह तो रिटर्न हो रहा है। बिल्कुल घोर अन्धियारे में कुम्भकरण की नींद में सोये हुए हैं। पिछाड़ी में हाय-हाय कर उठेंगे। फिर तुम कहेंगे - टू लेट क्योंकि लड़ाई शुरू हो जायेगी। फिर क्या करेंगे! भंभोर को आग लग जाती फिर तो टू लेट हो जाता है इसलिए बाप कहते हैं - बच्चे, अब जल्दी-जल्दी पुरुषार्थ करते जाओ। बाबा कोई जास्ती तकलीफ नहीं देते हैं। बाबा को आकर कहते हैं कि बाबा अगर हम पूजा नहीं करते तो वह कहते हैं कि यह तो नास्तिक बन गया है। बाबा राय देते हैं कि साक्षी होकर बाबा की याद में रहो। थोड़ी-थोड़ी पूजा बाहर से कर दो। एक होता है दिल से करना, दूसरा होता है राज़ी करने के लिए करना। अन्दर में तुमको शिवबाबा को याद करना है। अगर कोई तंग करते हैं तो पूजा कर दिखाओ, तो वह खुश हो जायेंगे। यह कोई पाप का काम नहीं है। बाबा तो बहुतों को कहते हैं शादी आदि पर भले जाओ। दोनों तरफ तोड़ निभाना है। वहाँ भी सुनाते-सुनाते कोई न कोई को तीर लग जायेगा। युक्ति से चलना है। बाप का फरमान है कि अब पतित नहीं बनना है। पवित्र बनने से ही तुम श्रीकृष्णपुरी के मालिक बनेंगे। शिवबाबा को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे और विश्व के मालिक बन जायेंगे। बच्चों, ऐसी-ऐसी युक्ति से अपने मित्र-सम्बन्धियों को समझाना है। वह है जिस्मानी यात्रा, यह है रूहानी यात्रा। यह रूहानी यात्रा बाप सिखलाते हैं। कहते हैं कि मामेकम् याद करो तो पतित से पावन बन जायेंगे और सब दु:ख दूर हो जायेंगे। कोई विरला व्यापारी व्यापार करे अर्थात् वैकुण्ठ की बादशाही लेवे। श्रीमत पर चलते रहो। ऐसे भी न हो पैसे आदि कहाँ मुफ्त में जायें, कुछ फल नहीं निकले। घरबार भी सम्भालना है, बच्चों की पालना भी करनी है। सिर्फ श्रीमत पर चलना है। राय लेनी है कि बाबा इस हालत में हम क्या करें! बाबा बच्ची कहती हैं कि हम शादी करें तो बाबा कहते हैं कि शादी करानी ही पड़ेगी क्योकि उनका हिस्सा है, उनको दे दो। बाप सिर्फ समझाते हैं फिर भी कुछ पूछना हो तो पूछकर श्रीमत पर चलो। बच्चों को बाप की आज्ञा पर चलना है, इसमें ही कल्याण है। *_अच्छा!_*

*_मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।_*

*_धारणा के लिए मुख्य सार:-_*

1) हर कर्म साक्षी होकर शिवबाबा की याद में करना है। लौकिक, अलौकिक दोनों तरफ तोड़ निभाना है। लौकिक से युक्तियुक्त चलना है।

2) इस समय अन्तिम जन्म में भी यह वानप्रस्थ अवस्था है। वापिस घर जाना है इसलिए पावन जरूर बनना है। कोई भी बंधन नहीं बनाने हैं।

*_वरदान:-_* फरमान की पालना द्वारा सर्व अरमानों को खत्म करने वाले माया प्रूफ भव

अमृतवेले से लेकर रात तक दिनचर्या में जो भी फरमान मिले हुए हैं, उसी प्रमाण अपनी वृत्ति, दृष्टि, संकल्प, स्मृति, सर्विस और सम्बन्ध को चेक करो। जो हर संकल्प हर कदम फरमान को पालन करते हैं उनके सब अरमान खत्म हो जाते हैं। अगर अन्दर में पुरषार्थ का वा सफलता का अरमान भी रह जाता है तो जरूर कहाँ न कहाँ कोई न कोई फरमान पालन नहीं हो रहा है। तो जब भी कोई उलझन आये तो चारों ओर से चेक करो - इससे मायाप्रूफ स्वत: बन जायेंगे।

*_स्लोगन:-_* अपनी सूक्ष्म कमजोरियों का चिंतन करके उन्हें मिटा देना - यही स्वचिंतन है।

*_अव्यक्त इशारे - अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो_*

जैसे कोई खाली स्थान होता है तो आलराउन्ड सेवाधारी समय प्रमाण जगह भर देते हैं। ऐसे अगर किसी के द्वारा कोई भी शक्ति की कमी अनुभव हो तो भी अपने सहयोग से जगह भर दो, जिससे दूसरे की कमी का भी अन्य कोई को अनुभव न हो, इसको कहा जाता है - दाता के बच्चे बन समय प्रमाण उसे सहयोग की देन देना।

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*_06-09-26 प्रात:मुरलीओम् शान्ति''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 19-10-11 मधुबन_**_“व्यर्थ समय, व्यर्थ संकल्प के विजयी बन आपस...
06/09/2026

*_06-09-26 प्रात:मुरलीओम् शान्ति''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 19-10-11 मधुबन_*

*_“व्यर्थ समय, व्यर्थ संकल्प के विजयी बन आपस में संस्कार मिलन की रास का संकल्प करो''_*

आज बापदादा अपने चारों ओर के मीठे-मीठे प्यारे-प्यारे बच्चों को देख रहे हैं। सभी बड़े प्यार से अपनी याद दे रहे हैं। इतना प्यार सिर्फ बाप को ही करते हैं। यह परमात्म प्यार सिर्फ अभी प्राप्त होता है। हर एक बच्चा प्यार में लवलीन है। बाप भी हर बच्चे को प्यार का रेसपान्ड दे रहे हैं। वाह बच्चे वाह! चाहे सम्मुख हैं, चाहे दूर हैं लेकिन हर एक बच्चा बाप के दिल में समाया हुआ है। सबके दिल में यह गीत बज रहा है इतना प्यार करेगा कौन! यह बाप और बच्चों का आत्मिक प्यार हर बच्चे को देह से न्यारा और बाप का प्यारा बनाने वाला है और यह प्यार अभी ही बच्चों को प्राप्त होता है। यह प्यार बच्चों को क्या से क्या बनाने वाला है। यह प्यार सिर्फ इस एक जन्म में प्राप्त होता है। बाप भी बच्चों का स्नेह देख बच्चों के स्नेह में समा जाता है।

आज बापदादा हर एक के मस्तक में तीन भाग्य देख रहे हैं। एक बाप के स्वरूप में प्राप्त वर्से का भाग्य, दूसरा शिक्षक के रूप में श्रेष्ठ शिक्षा का भाग्य और तीसरा सतगुरू के रूप में वरदानों का भाग्य। हर एक का मस्तक इन तीनों भाग्य से चमक रहा है। बापदादा भी अपने भाग्यशाली बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। चाहे सम्मुख बैठे हैं, चाहे दूर बैठे हैं लेकिन दिल में नजदीक हैं। ऐसे बच्चों और बाप का प्यार सारे कल्प में इस समय ही प्राप्त होता है। यह प्यार का अनुभव औरों को भी करा रहे हो। अभी कोई-कोई लोग समझते हैं कि इन ब्राह्मण आत्माओं को कुछ मिला है। क्या मिला है, उसका स्पष्टीकरण होता जा रहा है। बाप ने देखा अब इस प्लैटिनम जुबली का चारों ओर प्रभाव है और बच्चों ने भी दिल से सेवा की है और आगे भी प्लैन बनाया है। तो बापदादा भी चारों ओर के बच्चों को मुबारक दे रहे हैं वाह बच्चे वाह! यह 75 वर्ष अपने-अपने पुरुषार्थ अनुसार पार करते निर्विघ्न बनके, बनाके पहुंच गये हो। अभी बाप बच्चों से क्या चाहते हैं? बाप को सदा हर बच्चे में यही आशा है कि हर बच्चा बाप समान बन जाए। जैसे ब्रह्मा बाप विजयी बने, ऐसे हर बच्चा सदा विजयी बने। इसके लिए जैसे ब्रह्मा बाप ने क्या किया? फालो फादर। तो आप सभी भी हर कदम उठाते पहले चेक करो कि यह कदम ब्रह्मा बाप ने किया? ब्रह्मा बाप ने हर बच्चे प्रति, चाहे जानते थे कि यह बच्चा कमजोर है, पुरुषार्थ में भी, सेवा में भी लेकिन कमजोर के ऊपर और ही रहम और कल्याण की भावना रही। ऐसे ही बापदादा सभी बच्चों को भी यही कहते अपने परिवार के हरेक भाई या बहन प्रति शुभ भावना, शुभ कामना, रहम और कल्याण की दृष्टि से उनके भी सहयोगी बनो। बापदादा ने पहले भी सुनाया कि प्यार की सब्जेक्ट में हर एक बच्चा यथा शक्ति पास है। प्यार के कारण ही आगे बढ़ रहे हैं। अभी बापदादा बच्चों के प्यार को देख खुश है। प्यार की सब्जेक्ट के कारण हर एक बच्चा नम्बरवार चल रहा है। अभी बापदादा चाहते हैं कि प्यार में कुछ कुर्बानी भी की जाती है। बाप से प्यार है इसलिए कौन सी कुर्बानी करनी है? जो बापदादा चाहता है वह समझ तो गये हो, समझते हो ना बाप क्या चाहता है? समझते हो? कांध हिलाओ। समझते हो? तो करना है इसकी भी हिम्मत है ना! हिम्मत है तो हाथ उठाओ। हिम्मत है? अच्छा। तो हिम्मते बच्चे मददे बाप है ही।

अभी बापदादा चाहते हैं, रिजल्ट में देखा तो अभी तक सम्पूर्ण पवित्रता के हिसाब से व्यर्थ संकल्प भी अपवित्रता का बीज है। तो बापदादा ने देखा यह व्यर्थ संकल्प चलना, यह मैजारिटी बच्चों में अब भी संस्कार रहा हुआ है। एक व्यर्थ संकल्प और दूसरा व्यर्थ समय यह मैजारिटी बच्चों में अब भी दिखाई देता है। और व्यर्थ संकल्प का आधार है मन, जो मनमनाभव होने नहीं देता क्योंकि बापदादा ने काफी समय से इशारा दे दिया है कि जो कुछ होना है वह अचानक होना है। तो अचानक के हिसाब से बापदादा ने चेक किया मैजारिटी बच्चों में यह व्यर्थ संकल्प का संस्कार है। तो जब ब्रह्मा बाप व्यर्थ समय, व्यर्थ संकल्प के विजयी बन कर्मातीत हुए तो फालो फादर।

बापदादा ने देखा कि मन है तो आपकी रचना, आप मन के रचता हो तो मन को चलाने वाले हो। मन की कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर के मालिक हो लेकिन फिर भी मन कहाँ धोखा दे देता है। है आपकी रचना, मेरा है ना! लेकिन कन्ट्रोलिंग पावर कम होने के कारण धोखा दे देता है। मन को घोड़ा भी कहा जाता है लेकिन आपके पास श्रीमत की लगाम है। है ना लगाम! अगर मन कभी भी वेस्ट संकल्प की तरफ ले जाता तो लगाम को टाइट करने से व्यर्थ संकल्प की थोड़ी भी अपवित्रता को खत्म कर सकते हो। मन के मालिक बन, जैसे ब्रह्मा बाप ने रोज़ मन की चेकिंग की, ऐसे रोज़ चेक करो और व्यर्थ संकल्प को समाप्त करो। तो आज बापदादा यही चाहता है कि इस व्यर्थ संकल्पों को समाप्त करो। बुरे संकल्प कम हैं, व्यर्थ ज्यादा हैं लेकिन इसमें टाइम बहुत जाता है। मन के मालिक बन मन को ऐसे बिजी करो जो और तरफ आकर्षित हो आपकी लगाम को ढीला नहीं करे। हो सकता है यह? आज बापदादा व्यर्थ संकल्प के समाप्ति का सबको संकल्प दे रहे हैं। हो सकता है? हाथ उठाओ जो समझते हैं व्यर्थ संकल्प भी समाप्त, सेरीमनी मनायेंगे। व्यर्थ समय भी बचाना है। समय और संकल्प दोनों को बचाना है क्योंकि बापदादा सबका चार्ट देखते हैं। तो चार्ट में यह कमी मैजारिटी में देखने आई। मन के मालिक ही विश्व के मालिक बनने हैं। जैसे ब्रह्मा बाप मनजीत बन विश्व का मालिक बन गया, अभी तो आपके लिए, बच्चों के लिए आवाह्न कर रहे हैं, आपकी एडवांस पार्टी भी आवाह्न कर रही है। सुनाया था चार बजे एडवांस पार्टी वाले भी वतन में आते हैं तो पूछते हैं कब मुक्ति का गेट खोलेंगे? किसको खोलना है? आप सभी मुक्ति का गेट खोलने वाले हो ना! आपका सम्पूर्ण बनना अर्थात् मुक्ति का गेट खुलना। तो बापदादा से एडवांस पार्टी रूहरिहान करती है, कब तक? तो बाप आपसे पूछते हैं कब तक? तो क्या जवाब देंगे? पहली लाइन वाले बोलो, कब तक? हर कार्य के लिए डेट फिक्स करते हो ना! तो इस कार्य की डेट कब तक? ब्रह्मा बाप तो फरिश्ते रूप में आवाह्न कर रहे हैं। बता सकते हो डेट? बोलो, डेट फिक्स कर सकते हैं? अभी डेट फिक्स है? पाण्डव हाथ उठाओ, डेट फिक्स है? नहीं है। क्यों? दीदी कहती है बाबा हम लोगों को लगन थी घर जाना है, घर जाना है, घर जाना है। दादी कहती है हमको लगन थी कर्मातीत होना है, कर्मातीत होना है...। तो आप सभी का तो दीदी दादी से प्यार है ना। है तो सभी से क्योंकि जो भी एडवांस पार्टी में गये हैं उन सभी से आपका प्यार तो है। अभी उनके प्रश्न का उत्तर दो। तो आपस में रूहरिहान कर अब कुछ जवाब तैयार करना। करेंगे?

आज तो डबल फारेनर्स के मिलन का दिन है ना! तो डबल फारेनर्स भी आपस में राय करके डेट बताना और भारत वाले भी इस पर चर्चा करके बताना। है जवाब। हाँ बोलो, बोलो...। जो बोले वह हाथ उठाओ। (मोहनी बहन न्यूयार्क - बाबा डेट आप फिक्स करिये, हम लोग एवररेडी हैं) नहीं आप फिक्स करो ना। तैयार आपको होना है ना। बाप तो कहेगा कि इस दीवाली पर दीवाली करो, एवररेडी। एवररेडी? या कहेंगे जल्दी है? इसलिए कहते हैं आप बताओ। (डा.निर्मला बहन ने कहा - बाबा एक साल दो) अच्छा, इसमें शामिल हो, यह कह रही है एक साल। जो समझते हैं एक साल वह हाथ उठाओ। बड़ा हाथ उठाओ। अच्छा। एक साल वालों का नाम नोट करो। अच्छा है। दूसरे सब मुस्कराते हैं। बोलो। (निर्वैर भाई ने कहा - नाउ और नेवर, आज अभी होना है) तो ताली बजाओ। अच्छा, बहुत अच्छा। तो अभी अभी सभी अपने मन में यह प्रामिस करो कि कभी भी व्यर्थ संकल्प नहीं आने देंगे। यह हो सकता है? अभी से कहते हैं नाउ आर नेवर, तो कम से कम यह सब प्रामिस करते हैं कि अभी से न व्यर्थ संकल्प, न व्यर्थ समय गंवायेंगे? इसमें जो तैयार हैं वह हाथ उठाओ। मैजारिटी ने उठाया है। जो समझते हैं कि टाइम लगेगा, वह हाथ उठाओ। कोई नहीं। थोड़े-थोड़े हैं जो हाथ उठा रहे हैं। अच्छा तो इस दीवाली पर यह एक दृढ़ संकल्प करना, जिन्होंने मैजारिटी ने हाथ उठाया है, वह स्वाहा करना इसीलिए आप सबकी तरफ से दृढ़ संकल्प के लिए आज केक काटेंगे। पसन्द है ना! आज का केक इस दृढ़ संकल्प का सूचक है क्योंकि सभी चाहते हैं, अज्ञानी भी चाहते हैं कि अब कुछ होना चाहिए, अब कुछ होना चाहिए लेकिन ताकत नहीं है। आप बच्चों में तो संकल्प को पूर्ण करने की ताकत है। फालो फादर है ना। ब्रह्मा बाप का जन्म ही दृढ़ संकल्प से हुआ है। करना है। सोचेंगे नहीं, क्या करूं, क्या नहीं करूं, करना है। उस एक दृढ़ संकल्प ने इतने बच्चों का भविष्य बनाया। एक ब्रह्मा बाप ने कितनी हिम्मत रखी। आधा हिस्सा मिला और यज्ञ रचा। यज्ञ के ब्राह्मण रचे और अब देश विदेश की आत्मायें पहुंच गई हैं, एक ब्रह्मा बाप के दृढ़ संकल्प के कारण। तो दृढ़ संकल्प क्या नहीं कर सकता। यह तो आपके आगे एक्जैम्पुल है। संकल्प करते हो, बहुत अच्छे अच्छे संकल्प बाप के पास पहुंचते हैं लेकिन उसमें दृढ़ता कम होती है। कोई बात सामने आई ना तो दृढ़ता कम हो जाती है। दृढ़ता सफलता की चाबी है।

देखो, दिल्ली वालों ने दृढ़ संकल्प किया, करना ही है। हो गया ना! सोचेंगे, देखेंगे, यह नहीं किया। सबका दृढ़ संकल्प, निमित्त बने हुए बच्चों का सहयोग और दृढ़ संकल्प उसने प्रैक्टिकल सफलता लाई। इसमें सबने साथ दिया और एकमत हुए। हाँ ना, हाँ ना नहीं, एक दृढ़ मत हुई तो दृढ़ता में इतनी शक्ति है। जो कार्य आरम्भ करते हैं उसमें पहले दृढ़ संकल्प का बीज डालो, उसका फल निकलना ही है। यह इतना 75 वर्ष कैसे बीता, ब्रह्मा बाप और बच्चों के साथ ने दृढ़ संकल्प से 75 वर्ष पूरे किये। उमंग-उत्साह से बढ़ते बढ़ाते रहे, तब यह 75 वर्ष पूरे किये। अभी यह संकल्प करो आज व्यर्थ समय, व्यर्थ संकल्प समाप्त करना ही है। जब व्यर्थ समाप्त हो जायेगा तो सदा श्रेष्ठ संकल्प का खजाना कमाल दिखायेगा।

तो बापदादा डबल विदेशियों को देख खुश है, वृद्धि भी कर रहे हैं और डबल सेवा की तरफ अटेन्शन अच्छा है। सिर्फ बापदादा यह इशारा फिर भी दे रहा है कि आपस में संस्कार मिलन की रास करो। यह नहीं सोचो, सेन्टर तो अच्छा चल रहा है, सर्विस तो अच्छी हो रही है लेकिन जब एक परिवार है, प्रभु परिवार है, लौकिक परिवार नहीं प्रभु परिवार है। प्रभु परिवार का अर्थ ही है एक दो में शुभ भावना, कल्याण की भावना। एक दो में यही संकल्प रहे कि हम सभी को साथ-साथ एक दो को आगे बढ़ाते मुक्ति का गेट खोलके साथ जाना ही है, इसलिए हर सेन्टर में ऐसा वायुमण्डल हो जो समझ में आवे यह 8 नहीं, 10 नहीं लेकिन 10 ही एक हैं। तो दीवाली पर हर एक अपने में संकल्प करो कि अभी संस्कार मिलन की रास करनी ही है। एक भी आत्मा एक दो से दूर नहीं हो, सब एक हो। तो इस दीवाली पर संस्कार मिलन की रास करना। मन में दृढ़ संकल्प करना कि एक भी मेरे से भारी नहीं हो, सब हल्के। संस्कार नहीं मिलते हैं तो भारी होते हैं। तो बाप समझते हैं कि इस संकल्प से मुक्ति का दरवाजा खोलने के लिए जल्दी तैयार हो जायेंगे। चेक करो कोई भी हमारे से नाराज़ नहीं, लेकिन भारी भी नहीं होना चाहिए। हो सकता है यह? हो सकता है? कांध हिलाओ हो सकता है। हो सकता है तो हाथ उठाओ। तो इस दीवाली पर अच्छी रौनक हो जायेगी।

बापदादा डबल फारेनर्स को रोज़ दिल में इमर्ज करते हैं, क्यों? क्यों इमर्ज करते हैं? क्योंकि डबल फारेनर्स निमित्त बने हैं सारे विश्व में बाप का नाम बाला करने के लिए। किस बात पर? कि जब यह भारतवासी नहीं हैं, फारेनर्स हैं इन्होंने अपना भाग्य बना लिया तो हम क्यों रह जाएं! यह प्रेरणा इस दिल्ली के प्रोग्राम से भारत में अच्छी फैली है इसलिए बापदादा सेवा के निमित्त आप सभी को इमर्ज करते हैं। भारत को जगायेंगे, जगा रहे हैं और आगे भी ऐसे वी.आई.पी तैयार करेंगे जो भारत को जगायेंगे। उनका अनुभव भारत वालों को जगायेगा। बापदादा को याद है शुरू-शुरू में बहुत वी.आई.पीज ले आते थे। प्रोग्राम्स करते थे। अभी यह सेवा नहीं है। ऐसे वी.आई.पी तैयार करो जो स्टेज पर अपना अनुभव सुनायें। अभी ज्यादा कल्चरल दिखाया, अनुभव भी सुनाया लेकिन थोड़ा टाइम था, अभी ऐसे वी.आई.पी लाओ जो भारत वालों की तकदीर को जगाये। अभी भी जो फारेनर्स और भारत की सेवा इकट्ठी की उसका भी प्रभाव अच्छा रहा। अब मिल करके ऐसी सेवा को बढ़ाते चलो। और मुख्य बात अपने को हर एक चाहे भारतवासी चाहे फारेनर्स जल्दी जल्दी ऐसे सम्पन्न बनाओ जो आप सबकी सम्पन्नता मुक्ति का गेट खोल दे। अच्छा।

चारों ओर के चाहे सामने बैठे हैं, चाहे कहाँ भी बैठे हैं लेकिन सबका अटेन्शन मधुबन में है। बापदादा को देख रहे हैं, मैजारिटी तो देख ही रहे हैं। बापदादा भी सभी बच्चों को, चारों ओर के बच्चों को सदा हर्षित रहने वाले, सदा डबल पुरुषार्थी, डबल पुरुषार्थी अर्थात् स्व के पुरुषार्थ में भी और सेवा के पुरुषार्थ में, ऐसे डबल पुरुषार्थी और डबल निश्चय और नशे में रहने वाले, सदा बाप के साथ रहने वाले, सदा आपस में भी कल्याण और रहम की शुभ भावना में रहने वाले, एक-एक बच्चे को नाम सहित बापदादा दिल की याद प्यार दे रहे हैं।

लेकिन आज की बात व्यर्थ संकल्प की समाप्ति की भूल नहीं जाना। बापदादा के पास रिकार्ड तो पहुंच ही जाता है। बापदादा देखेंगे कितने तीव्र पुरुषार्थी बच्चे हैं और एक दो को भी उमंग उत्साह दे आगे बढ़ाने वाले हैं। अगर कोई गलत भी करता है तो उसके प्रति वह गलत करता है, और आप उसकी गलती का मन में संकल्प करते हो, यह करता है, यह करता है, यह करता है... यह भी खत्म करो। उनको सहयोग दो, श्रेष्ठ भावना दो, ऐसी सेवा करते सारे संगठन को श्रेष्ठ संकल्प वाले बनाना ही है। कोई सेन्टर पर कभी भी एक दो के प्रति कोई भी और भावना नहीं हो, शुभ भावना, शुभ कामना, ठीक है ना! बहुत अच्छा। अभी सभी बच्चों को बापदादा मुबारक के साथ दिल का यादप्यार भी साथ में दे रहे हैं। *_अच्छा।_*

*_वरदान:-_* निष्काम सेवा द्वारा विश्व का राज्य प्राप्त करने वाले विश्व कल्याणी, रहमदिल भव

जो निष्काम सेवाधारी हैं उन्हें कभी यह संकल्प नहीं आ सकता कि मैंने इतना किया, मुझे इससे कुछ शान-मान वा महिमा मिलनी चाहिए...यह भी लेना हुआ। दाता के बच्चे अगर लेने का संकल्प भी करते हैं तो दाता नहीं हुए। यह लेना भी देने वाले के आगे शोभता नहीं। जब यह संकल्प समाप्त हो तब विश्व महाराज़न का स्टेटस प्राप्त हो। ऐसा निष्काम सेवाधारी, बेहद का वैरागी ही विश्व कल्याणी, रहमदिल बनता है।

*_स्लोगन:-_* अपनी गलती दूसरे पर लगाना - यह भी परचिंतन है।

*_अव्यक्त इशारे - अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो_*

सबसे बड़े से बड़ी देन है - दाता के बच्चे बन सर्व को सहयोग देना। बिगड़े हुए कार्य को, बिगड़े हुए संस्कारों को, बिगड़े हुए मूड को शुभ भावना से ठीक करने में सदा सर्व के सहयोगी बनना। इसने यह कहा, यह किया, यह देखते, सुनते, समझते हुए भी अपने सहयोग के स्टॉक द्वारा परिवर्तन कर उसे भरपूर करना - यह सबसे बड़ा दान है।

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*_05-09-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_**_“मीठे बच्चे - बाप का सहयोगी बनने के लिए सबको मनमनाभव का मन्त्र पक्...
05/09/2026

*_05-09-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_*

*_“मीठे बच्चे - बाप का सहयोगी बनने के लिए सबको मनमनाभव का मन्त्र पक्का कराओ, एक बाप को सदा फॉलो करो''_*

*_प्रश्नः-_* पुरुषोत्तम बनने का सहज और श्रेष्ठ पुरुषार्थ क्या है?

*_उत्तर:-_* हे पुरुषोत्तम बनने वाले बच्चे - तुम सदा श्रीमत पर चलते रहो। एक बाप को याद करो और कोई भी बात में इन्टरफियर न करो। खाओ पियो सब कुछ करो लेकिन बाप को याद करते रहो तो पुरुषोत्तम बन जायेंगे। पुरुषोत्तम वही बनते जिन पर ब्रहस्पति की दशा है। वह कभी श्रीमत की अवज्ञा नहीं करते। उनसे कोई उल्टा कर्म नहीं होता।

*_गीत:-ओम् नमो शिवाय...._*

*_ओम् शान्ति।_*

यह महिमा किसकी है? एक परमपिता परमात्मा की, जो अच्छा काम करते हैं उनकी महिमा जरूर होती है। जो बुरा कर्तव्य करते हैं उनकी निंदा होती है। जैसे अकबर था तो उसकी महिमा थी, औरंगजेब की निंदा थी। राम की महिमा करेंगे, रावण की निंदा करेंगे। भारत में ही रामराज्य, रावण-राज्य मशहूर है। रामराज्य को कहेंगे पुरुषोत्तम राज्य और रावण राज्य को कहेंगे आसुरी राज्य। बच्चों को तो अभी संगमयुग का पता पड़ा है। यह है ही पुरुषोत्तम युग। इस भारत को पुरुषोत्तम बनाकर ही छोड़ना है। रहने वालों को भी पुरुषोत्तम बनाना है और रहने की जगह को भी पुरुषोत्तम बनाना है। भारत को ही स्वर्ग कहते हैं, रहने वालों को देवी-देवता, स्वर्गवासी कहते हैं। तो दोनों उत्तम बनते हैं। सबको पता है कि नई दुनिया उत्तम होती है और पुरानी दुनिया कनिष्ट होती है। जैसी दुनिया, वैसे रहने वाले। गाया भी जाता है, भारत नया, भारत पुराना और कोई खण्ड को नया खण्ड नहीं कहेंगे। ऐसे नहीं कि नई दुनिया में नई अमेरिका, नई चाईना होती है। नहीं, नई दुनिया में तो नया भारत गाया जाता है इसलिए न्यू इन्डिया कहा जाता है। नया भारत तो नाम रखते हैं, परन्तु है सब बिगर अर्थ। न्यू इन्डिया फिर इस समय कहाँ से आई! न्यु इन्डिया में तो देहली परिस्तान है। अब परिस्तान कहाँ है। तुम बच्चे यहाँ आते हो पुरुषोत्तम बनने। ऊंच ते ऊंच ब्रहस्पति की दशा है। पुरुषोत्तम बनने से ब्रहस्पति की दशा बैठती है। तुम जानते हो कि नई दुनिया की स्थापना करने वाले बेहद के बाप द्वारा हम बेहद का सुख लेने का पुरुषार्थ कर रहे हैं। सतयुग में पुरुषोत्तम होते हैं। फिर नीचे आते हैं तो मध्यम फिर कनिष्ट बन जाते हैं। तुम बच्चे जानते हो-कि अभी बाप हमको सतोप्रधान सतयुगी स्वर्गवासी, पुरुषोत्तम बना रहे हैं। यह है बहुत-बहुत सहज। न कोई खाने की दवा है, न कोई करने की बात। सिर्फ याद करना है, इसलिए कहा जाता है सहज याद। याद से ही पाप आत्मा से पुण्य आत्मा बनना है। यह तो जरूर है सबको मुक्ति मिलनी है।

बाप कहते हैं कि मैं सर्व का सद्गति दाता हूँ तो जरूर मनुष्यों के शरीर खत्म हो जायेंगे। बाकी आत्माओं को पवित्र बनाकर ले जाऊंगा। वापिस जाने के लिए तैयारी करनी पड़े। बाप तैयारी करा रहे हैं क्योंकि आत्मा के पंख टूट चुके हैं अर्थात् तमोप्रधान आत्मा है। तुम योगबल से पवित्र बनने की मेहनत करते हो। जो नहीं करते उनको हिसाब-किताब देना पड़ेगा, इसमें कोई विचार करने की बात नहीं। बच्चों का काम है बाप से पूरा वर्सा लेना, बाप का मददगार बन सहयोग देना पड़ता है। बाप का भी सहयोग, बच्चों का भी सहयोग। कैसे सहयोग देवें, वह बाप को देख फालो करो। सभी को मेरा मन्त्र देते जाओ - पुरुषोत्तम बनने के लिए। बाप कल्प-कल्प आकर कहते हैं - पतित से पावन मुझे याद करने बिगर नहीं बनेंगे। मैं कोई गंगा स्नान कराता हूँ क्या? सिर्फ महामन्त्र याद करना है “मनमनाभव''। इसका अर्थ है मुझे याद करो तो तुम पावन बन, पुरुषोत्तम बन स्वर्ग का मालिक बनेंगे। स्त्री पुरुष दोनों ही पवित्र प्रवृत्ति वाले मालिक बनेंगे। बाप यह सभी बातें डिटेल में समझाते हैं। तुम प्रैक्टिकल में बनते हो। तुम जानते हो भगवान ने आकर बच्चों को पुरुषोत्तम बनाया है तब तो कहते हैं कि पतितों को पावन बनाने वाले पतित-पावन आओ। पुरुषोत्तम मास की बड़ी महिमा सुनाते हैं ना। तो इस पुरुषोत्तम युग की बड़ी महिमा है। कलियुग अर्थात् रात के बाद दिन जरूर आना है। दु:ख के बाद सुख आता है। यह अक्षर भी क्लीयर है। स्त्री पुरुष दोनों उत्तम से उत्तम श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनते हैं क्योंकि प्रवृत्ति मार्ग है। सतयुग तो नामीग्रामी है, उनको ही सुखधाम कहा जाता है, फिर जब द्वापर युग आता है तब मनुष्य संन्यास धारण कर उत्तम बनते हैं इसलिए पतित मनुष्य जाकर उन्हों को माथा टेकते हैं। पवित्र के आगे अपवित्र माथा टेकते हैं, यह तो कॉमन बात है। पतित-पावन बाप को न जानने के कारण पतित-पावनी गंगा को पावन समझ जाकर माथा टेकते हैं। गंगा और सागर का भी मेला लगता है। तुम बच्चों को बाप बहुत क्लीयर कर समझाते हैं फिर भी बाप कहते हैं - कोटों में कोई, कोई में भी कोई समझते हैं। उसमें भी आश्चर्यवत सुनन्ती, कथन्ती, फारकती देवन्ती और भागन्ती, डिससर्विस करन्ती बन जाते हैं। सर्विस और डिससर्विस दोनों होती रहती हैं। भागन्ती भी बहुत होते हैं, जो बाप को नहीं जानते।

तुम पाप आत्मा से पुण्य आत्मा बनते हो। फिर बच्चे ही बैठ विघ्न डालते हैं, डिससर्विस करते हैं तो कितना महान पाप है। रावण सबको महापापी बनाते हैं लेकिन जो बच्चे बन डिससर्विस करे उनके लिए ट्रिब्युनल बैठती है। भक्ति मार्ग में इतनी कड़ी सज़ा नहीं मिलती, परन्तु यहाँ बाप का बनकर फिर डिससर्विस करते तो बाप का राइटहैण्ड है धर्मराज इसलिए बाप कहते हैं - बच्चे मेरी सर्विस में मददगार बन फिर और ही उल्टा काम नहीं करना, डिससर्विस करेंगे तो फिर अबलाओं पर विघ्न पड़ेगा। माताओं पर बाबा को तरस आता है। द्रोपदी के भी भगवान ने पांव दबाये हैं ना। द्रोपदी ने पुकारा कि हमको नंगन करते हैं। बाबा माताओं के सिर पर कलष रखते हैं। पहले है माता, पीछे है पुरुष। परन्तु आजकल पुरुषों में मगरूरी बहुत है कि मैं स्त्री का गुरू हूँ, पति ईश्वर हूँ, स्त्री मेरी दासी है। यहाँ बाप निरंहकारी बन माताओं के पांव भी दबाते हैं। तुम थक गई हो। मैं तुम्हारी थकान दूर करने के लिए आया हूँ। तुम माताओं का सभी ने तिरस्कार किया। संन्यासी स्त्री को छोड़ चले जाते हैं। कोई को 5-7 बच्चे होते हैं, सम्भाल नहीं सकते तो तंग होकर भाग जाते हैं। रचना कर फिर उनको भटका कर जाते हैं। बाप कहते हैं - मैं किसको भटकाता नहीं हूँ। मैं तो सभी का दु:ख हर्ता, सुख कर्ता हूँ। माया आकर दु:खी करती है। यह भी खेल है। अज्ञान-काल में मनुष्य समझते हैं कि भगवान ही दु:ख सुख देते हैं परन्तु बाप ईश्वर यह धन्धा नहीं करते हैं। यह तो कर्मों के अनुसार बना हुआ ड्रामा है, जो जैसा कर्म करता वैसा फल पाता है। इस समय श्रेष्ठ कर्म करने की बात है। कर्म कूटने की बात नहीं। कोई बीमार होते हैं, देवाला मारते हैं तो कर्म कूटते हैं। तुम बच्चे कितने सौभाग्यशाली बनते हो, जो 21 जन्म कब कर्म नहीं कूटना पड़ेगा। कितना भारी फल है। तो बाप की श्रीमत पर चलना चाहिए। बाप और कोई भी बात में इन्टरफियर नहीं करते हैं। खाओ, पियो कुछ भी करो सिर्फ बाप और वर्से को याद करो। तुम कहते हो हम पतित हैं तो बाप जो पावन बनने की युक्ति बताते हैं, उस पर चलो। सिर्फ याद की मेहनत है। माया के तूफानों से डरना नहीं है। गुप्त मेहनत है। ज्ञान भी गुप्त है, मुरली चलाना तो प्रत्यक्ष है। परन्तु इस वाणी से तुम पावन नहीं बनेंगे। पावन याद से ही बनेंगे। तो बेहद के बाप को याद करो और मददगार भी बनना चाहिए। रूहानी हॉस्पिटल और युनिवर्सिटी खोलने का भी पुरुषार्थ करो। कोई अच्छी जगह हो तो जाकर भाषण करो। तुमको हाथ में पुस्तक नहीं लेना है। तुमको अन्दर सारा ज्ञान है, बाकी समझाने के लिए झाड़ त्रिमूर्ति, सृष्टि चक्र का सबको राज़ समझाना है। बाप कहते हैं - मैं ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण रचता हूँ। ब्राह्मणों की एम आब्जेक्ट, विष्णु खड़ा है। बनाने वाला टीचर वह है निराकार। गाया हुआ है ब्रह्मा द्वारा स्थापना, विष्णु द्वारा पालना... कल्प पहले भी ऐसे ही चित्र बनवाये थे। देखो साइंस आदि से कितने मिसाइल्स बनाते हैं। तुम बच्चों को पुरुषोत्तम बनने में भी मेहनत लगती है क्योंकि जन्म-जन्मान्तर का बोझा सिर पर है। सेकण्ड में सगाई हुई फिर आत्माओं को बाप को याद करना है, जो तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायें।

बाप कहते हैं - मन्मनाभव, तुम कर्मयोगी हो। याद का चार्ट रखना चाहिए। तुम्हारी लड़ाई माया के साथ है। बहुत कड़ी लड़ाई है। तुम कोशिश करेंगे याद में रहने की, माया उड़ा देगी। ज्ञान में कोई अड़चन नहीं। आत्मा में 84 जन्मों के संस्कार भरे हुए हैं। ये अनादि बना-बनाया ड्रामा है। यह चक्र फिरता ही रहता है। बन्द होने का नहीं है। सृष्टि रची ही क्यों, यह सवाल नहीं उठता। आत्मा कैसे बदलेगी। नई आत्मा कहाँ से आती नहीं है। जो आत्माएं हैं वही हैं, कम जास्ती हो नहीं सकती। एक्टर सब पूरे हैं। तुम बेहद के एक्टर्स हो, तुम जो कुछ देखते हो उतने एक्टर ड्रामा में हैं, इतने फिर होंगे। मोक्ष कोई पाता नहीं। मनुष्य आवागमन के चक्र से छूटना चाहते हैं, परन्तु छूट नहीं सकते हैं। जो पार्ट बजाने आते हैं, उनको फिर आना है। बाप कहते हैं - मुझे भी इस पतित दुनिया में आना और जाना पड़ता है। कल्प-कल्प मैं आता हूँ। जब मुझे ही आना पड़ता है तो बच्चों का बन्द कैसे हो सकता है। तुम 84 बार शरीर में आते हो, मैं एक ही बार आता हूँ। मेरा आना जाना बड़ा वन्डरफुल है, तब गाते हैं तुम्हरी गत मत तुम ही जानो... सद्गति करने के लिए जो मत है वह तुम ही जानो और न जाने कोई। वह गाते हैं तुम प्रैक्टिकल में हो। मूल बात है याद की, फिर अन्धों की लाठी बनना है। ये है पुरुषोत्तम युग। यह 5000 वर्ष के बाद आता है। पुरुषोत्तम मास तीन वर्ष के बाद आता है। वह सब है भक्ति मार्ग। उनके जन्त्र-मन्त्र की ढेर पुस्तके हैं। यहाँ तो वह बात नहीं है। भक्ति न करने वालों को इरिलीजस कहते हैं। तो उन्हों को राज़ी करने के लिए निमित्त कुछ करना भी पड़ता है। बाप समझाते हैं मीठे बच्चे, कभी डिससर्विस करने का पुरुषार्थ नहीं करना। कोई ट्रेटर बन जाते हैं तो उनको कहेंगे अजामिल। अजामिल, सूरदास आदि की कितनी कथायें हैं। यह सब है भक्ति मार्ग। उनसे भी जास्ती पाप आत्मा वह है जो यहाँ आकर, मेरा बनकर मुझे फारकती दे देते हैं। मेरी निंदा कराते हैं, उनके लिए फिर ट्रिब्युनल बैठती है। प्रतिज्ञा कर फिर डिससर्विस करेंगे तो कड़ी सजा मिलेगी। पद ऊंचा है तो फिर भूल की भी कड़ी सजा है इसलिए कोई भी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए। गाया हुआ है सतगुरू का निंदक ठौर न पाये अर्थात् एम आब्जेक्ट पा न सके, नर से नारायण बनने का। गुरूओं से तुम पूछ सकते हो कि तुम कहते हो गुरू का निंदक... वह कौन सा ठौर है? वह ठौर तो बता नहीं सकते। बाप की पाग उन्होंने अपने ऊपर रख दी है। टीचर कहते हैं अगर पूरा पढ़ेंगे नहीं तो पद भी ऊंचा नहीं पायेंगे। पावन सो देवी-देवता बनना है। यहाँ कोई पावन होते नहीं। अभी सबको पावन बनना है। राज्य भाग्य 21 जन्मों के लिए मिलता है तो यह सिर्फ अन्तिम जन्म पावन बनना है, कितनी बड़ी प्राप्ति है। प्राप्ति न होती तो ऐसा पुरुषार्थ करते क्या? परन्तु माया ऐसी है जो ऊंच प्राप्ति में भी विघ्न डालती है और गिरा देती है। अहो मम् माया...। *_अच्छा!_*

*_मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।_*

*_धारणा के लिए मुख्य सार:-_*

1) कोई भी डिस-सर्विस का कार्य नहीं करना है। कोई ऐसा भी कर्म न हो जिससे बाप की निंदा हो। अवज्ञाओं से बचना है, पुरुषोत्तम बनना है।

2) माया के तूफानों से डरना नहीं पावन बनने के लिए याद में रहने का पुरुषार्थ करना है।

*_वरदान:-_* थकी वा तड़पती हुई आत्माओं को सिद्धि देने वाले खुदाई खिदमतगार भव

आत्माओं की बहुत समय से इच्छा वा आशा है - निर्वाण वा मुक्तिधाम में जाने की। इसके लिए ही अनेक जन्मों से अनेक प्रकार की साधना करते-करते थक चुकी हैं। अभी हर एक सिद्धि चाहते हैं न कि साधना। सिद्धि अर्थात् सद्गति - तो ऐसी तड़फती हुई, थकी हुई प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाने के लिए आप श्रेष्ठ आत्मायें अपने साइलेन्स की शक्ति वा सर्व शक्तियों से एक सेकण्ड में सिद्धि दो तब कहेंगे खुदाई खिदमतगार।

*_स्लोगन:-_* कमजोर संस्कार ही माया के आने का चोर गेट है, अब यह गेट बन्द करो।

*_अव्यक्त इशारे - अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो_*

आप भाग्य की लकीर खींचने वाले ब्रह्मा के बच्चे ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियाँ हो इसलिए सदा आपके भण्डारे भरपूर रहें। किसको भी खाली हाथ जाने नहीं देना। सदा दाता के बच्चे देते रहो और सर्व की भावनायें, सर्व की आशायें पूर्ण करते रहो। महादानी, वरदानी बनो यही आपका स्वरूप है।

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Address

Gyan Sarovar Retreat Center Lingadevarakoppal
Mysore
570030

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