श्री विश्वेश्वर नाथ धाम, छोटी काशी।

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श्री विश्वेश्वर नाथ धाम, छोटी काशी। देवों के देव भगवान शिव का मंदिर।
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22/08/2026

*कागज की कश्ती में सवार है हम,*
*फिर भी कल के लिये परेशान है हम..!*

जब जिंदगी तुम्हें राख़ कर दे, तो घबराना मत-महादेव अपना सबसे पवित्र श्रृंगार राख़ से ही करते हैं..Har-Har Mahadev 🖤✨
22/08/2026

जब जिंदगी तुम्हें राख़ कर दे, तो घबराना मत-
महादेव अपना सबसे पवित्र श्रृंगार राख़ से ही करते हैं..

Har-Har Mahadev 🖤✨

18/08/2026
नागपञ्चम्याः शुभाशयाः।नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु।ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥जो सर्प पृथ्वी पर ...
17/08/2026

नागपञ्चम्याः शुभाशयाः।

नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु।
ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥

जो सर्प पृथ्वी पर निवास करते हैं, जो अंतरिक्ष में हैं और जो आकाश/दिव्य लोक में स्थित हैं, उन सभी नाग देवताओं को हमारा बारंबार प्रणाम है।

Our repeated salutations to all the Nag Devtas (serpent deities)—those who dwell upon the Earth, those who abide in the atmosphere, and those who reside in the celestial realms.

वर्ष में एक बार नाग पंचमी पर खुलने वाले, श्री महाकालेश्वर के ऊपर तीसरे फ्लोर वाले नागचंद्रेश्वर भगवान के दर्शन कीजिए
17/08/2026

वर्ष में एक बार नाग पंचमी पर खुलने वाले, श्री महाकालेश्वर के ऊपर तीसरे फ्लोर वाले नागचंद्रेश्वर भगवान के दर्शन कीजिए

16/08/2026

जीवन का सबसे बड़ा मोह धन या रिश्ते नहीं...
बल्कि *"यह मेरा है"* की भावना है।
जब हम किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति को हमेशा अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं, तभी दुख शुरू होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता सिखाती है कि प्रेम कीजिए, लेकिन मोह मत पालिए।
क्योंकि...
जहाँ मोह कम होता है,
वहीं मन हल्का होता है।
और जहाँ मन शांत होता है...
वहीं से सच्ची खुशी की शुरुआत होती है!

मगंलमय प्रभात 🙏🏻

15/08/2026

क्या कभी सोचा है कि सीता स्वयंवर में पूरी दुनिया के राजा बुलाए गए, पर अयोध्या के राजा दशरथ को निमंत्रण क्यों नहीं मिला?

इसके पीछे कोई राजनीतिक रंजिश या वैमनस्य नहीं था, बल्कि इसके पीछे छिपा था एक ऐसा सत्य जिसने राजा जनक जैसे परम ज्ञानी को भी धर्मसंकट और भय में डाल दिया था। यह कहानी है—एक शाप, एक छलनी, अयोध्या की महिमा और राजा जनक के एक छिपे हुए डर की।

राजा जनक के शासनकाल की बात है। एक नवविवाहित युवक पहली बार अपनी ससुराल जा रहा था। रास्ते में एक दलदल था, जहाँ उसने देखा कि एक गाय फँसी हुई है। गाय की हालत ऐसी थी कि उसे निकाला नहीं जा सकता था और वह अंतिम साँसें ले रही थी।

जल्दी में गृहस्थी के सुख की ओर बढ़ रहे उस युवक के मन में दया तो आई, लेकिन उतावलेपन में उसने एक घोर पाप कर दिया—उसने दलदल में फँसी गाय की पीठ पर पैर रखा और छलांग लगाकर आगे बढ़ गया।

गाय ने तुरंत दम तोड़ दिया, लेकिन मरते-मरते उस पाप का फल भी दे गई। गाय की आत्मा ने शाप दिया:

"जिस स्त्री को देखने के अति-उत्साह में तूने मुझ पर पैर रखा है, यदि तूने उसे अपनी आँखों से देखा, तो वह तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी!"

युवक घबरा गया। ससुराल पहुँचकर वह घर के मुख्य द्वार पर अंदर की ओर पीठ करके बैठ गया। परिजनों के लाख बुलाने पर भी उसने मुँह न मोड़ा। जब उसकी नवविवाहिता पत्नी ने आकर एकांत में इसका कारण पूछा, तो उसने रोते हुए पूरी घटना बताई।

पत्नी ने कहा, "स्वामी! यदि मेरा पतिव्रत धर्म सच्चा है, तो यह शाप आप पर निष्फल होगा। आप मेरी ओर देखिए।"

जैसे ही पति ने अपनी पत्नी की ओर देखा, गाय के शाप का असर हुआ—पति की आँखों की रोशनी पूरी तरह चली गई! गाय की हत्या का शाप कोई साधारण बात नहीं थी।

अंधा पति और दुखी पत्नी अपनी गुहार लेकर राजा जनक के दरबार में पहुँचे। राजा जनक ने तुरंत अपने राज्य के प्रकांड विद्वानों, ज्योतिषियों और ऋषियों की सभा बुलाई।

गहन विचार-विमर्श के बाद पंडितों ने हल निकाला:

"यदि कोई परम पतिव्रता स्त्री एक साधारण छलनी में गंगाजल भरकर लाए और उस जल के छींटे इस व्यक्ति की आँखों पर मारे, तो गौ-हत्या के शाप का निवारण हो सकता है और इसकी दृष्टि वापस लौट सकती है।"

राजा जनक ने पहले अपने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया, लेकिन छलनी में पानी रोकना कोई मामूली बात नहीं थी। कोई भी स्त्री इस परीक्षा में सफल न हो सकी। हारकर राजा जनक ने भारतवर्ष के अन्य सभी राज्यों में संदेश भिजवाया कि यदि उनके राज्य में कोई ऐसी परम पतिव्रता स्त्री हो, तो उसे राज-सम्मान के साथ जनकपुर भेजा जाए।

जब यह संदेश अयोध्या के महाराजा दशरथ के पास पहुँचा, तो उन्होंने अपनी रानियों से इस विषय पर चर्चा की। रानियों ने मुस्कुराते हुए कहा:

"महाराज! आप राजमहल की बात करते हैं? अयोध्या की तो सबसे साधारण महिला, यहाँ तक कि गलियों में झाड़ू लगाने वाली स्त्री भी इतनी पवित्र और पतिव्रता है कि वह इस परीक्षा में खरी उतरेगी।"

राजा दशरथ ने परीक्षण और अयोध्या के सामर्थ्य को सिद्ध करने के लिए राज्य की सबसे निम्न श्रेणी मानी जाने वाली एक सफाईकर्मी महिला को बुलवाया। जब उससे पूछा गया, तो उसने विनम्रता से सिर झुकाकर हाँ भर दी।

महाराजा दशरथ ने किसी राजवंशी को भेजने के बजाय उसी सफाईकर्मी महिला को पूरे राजसी सम्मान, रथ और पालकी के साथ जनकपुर विदा किया ताकि दुनिया अयोध्या की महिमा देख सके।

जनकपुर पहुँचकर उस महिला का राजा जनक ने स्वागत किया और समस्या बताई। वह महिला निस्संकोच छलनी लेकर गंगा तट पर गई। उसने माँ गंगा का ध्यान किया और प्रार्थना की:

"हे माँ गंगे! यदि मैंने मन, वचन और कर्म से अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष का चिंतन न किया हो और मेरा पतिव्रत धर्म सच्चा हो, तो आपकी एक बूँद भी इस छलनी से नीचे न गिरे।"

महिला ने जल में छलनी डुबोई और उसे बाहर निकाला। चमत्कार यह हुआ कि छलनी के हज़ारों छिद्रों से भी पानी की एक बूँद नीचे नहीं गिरी! जल ऐसे जम गया मानो पारदर्शी शीशा हो।

पूरा जनकपुर इस दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गया। महिला दरबार में आई, उसने उस अंधे युवक की आँखों पर गंगाजल के छींटे मारे और देखते ही देखते युवक की आँखों की रोशनी पूरी तरह वापस आ गई!

जब वह महिला अयोध्या लौटने के लिए राजा जनक से अनुमति माँगने लगी, तो राजा जनक ने अति-उत्सुकता और सम्मान से उसकी जाति और परिचय पूछा। महिला ने बताया कि वह अयोध्या राज्य में गलियों और महल के बाहर सफाई का कार्य करती है।

यह सुनते ही राजा जनक के पैर तले जमीन खिसक गई। वे सोचने लगे:

"जिस राज्य की सफाई करने वाली साधारण महिला इतनी शक्तिशाली और महा-पतिव्रता है, वहाँ के पुरुष और राजकुमार कितने शक्तिशाली और तेजस्वी होंगे?

यदि अयोध्या से स्वयंवर में कोई भी साधारण व्यक्ति या सैनिक आ गया और उसने धनुष उठा लिया, तो मेरी राजकुमारी सीता का विवाह किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति या साधारण सेवक से भी हो सकता है!"

इसी एक डर और भ्रम के कारण, जब सीता स्वयंवर का समय आया, तो राजा जनक ने दुनिया भर के राजाओं, महाराजाओं और दैत्यों तक को आमंत्रण भेजा—परंतु अयोध्या नरेश महाराजा दशरथ को आमंत्रण पत्र नहीं भेजा!

राजा जनक ने तो अपनी बुद्धि से अयोध्या को दूर रखा था, लेकिन विधाता ने तो सीता जी के लिए अयोध्या के ही जेष्ठ राजकुमार श्री राम को चुना था।

नियति अपना खेल रच चुकी थी। महर्षि विश्वामित्र ताड़का और सुबाहु के वध के बाद श्री राम और लक्ष्मण को अपने साथ जनकपुर की रक्षा और धनुष-यज्ञ दिखाने ले गए।

वहाँ जब कोई भी राजा शिव-धनुष को हिला तक न सका, तब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्री राम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और वह टूट गया।

इस प्रकार, राजा जनक का भय भी दूर हुआ, अयोध्या की मर्यादा भी बनी रही और जगज्जननी सीता का विवाह मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के साथ संपन्न हुआ।

जय श्री राम 🙏🚩

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