सुरत शब्द योग

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सुरत शब्द योग Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from सुरत शब्द योग, Religious Center, JAY GURUDEV BHAWAN, Muzaffarpur.

परम संत , वक्त के समरथ सदगुरु , सूरतों के सच्चे पिता , पूरण धनी बाबा जय गुरूदेव जी महाराज के साथ ही , सभी पिछले संतों के वचन और सूरत शब्द योग यानी नाम योग साधना मार्ग को आम जनमानस में पहुंचाना । जय गुरुदेव धाम , सूरत शब्द योग केंद्र,मुजफ्फरपुर, बिहार ।।

🙏🏾💕 जय गुरुदेव 💕🙏🏾यह तन दुर्लभ तुमने पाया ।कोटि जनम जब भटका खाया ।।अब या को बिरथा नही खोओ।चेतो छिन छिन भक्ति कमाओ।।👉हम अ...
07/10/2026

🙏🏾💕 जय गुरुदेव 💕🙏🏾
यह तन दुर्लभ तुमने पाया ।
कोटि जनम जब भटका खाया ।।
अब या को बिरथा नही खोओ।
चेतो छिन छिन भक्ति कमाओ।।

👉हम अपने आत्म उत्थान और पतन के लिए स्वयं उत्तरदायी होते हैं। हमारे लिए भगवद्प्राप्ति के मार्ग में कोई भी बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। संत और गुरु हमें मार्ग दिखाते हैं, किन्तु हम अपनी मन और इच्छा के मार्ग पर चलना चाहते हैं।जीव का पतन उत्थान उसके स्वयं के कर्मों से होगा। इस जन्म से पूर्व हमारे अनन्त जन्म हो चुके हैं और भगवानुभूत संत भी सदा धरती पर रहे हैं। यदि संसार ऐसे संतों से विहीन होता तो लोग साधना कर के ईश्वर को कैसे प्राप्त करते? इसलिए भगवान सदा यह सुनिश्चित करते हैं कि भगवानुभूत संत या साध जन सदा कलियुग में विद्यमान रहकर निष्ठावान भक्तों का मार्गदर्शन करे और मानवता के प्रेरक बनें।

👉इस प्रकार हम अनन्त पूर्व जन्मों में कई बार इस प्रकार की भगवद्चेतना युक्त संतों से मिले हैं किन्तु फिर भी हमें कभी भगवद्प्राप्ति नहीं हुई। इसका कारण यह है कि उचित मार्गदर्शन के अभाव की समस्या कभी नहीं थी लेकिन या तो इन संतो के उपदेशों को स्वीकार करने में हमारी मूकता या इनका अनुपालन न करना ही मुख्य समस्या रही होगी। इसलिए हमें पहले अपनी वर्तमान आध्यात्मिक अवस्था के स्तर या इसकी कमी को स्वीकार करना चाहिए। यदि हमें अपनी वर्तमान अवस्था का बोध हो जाता है केवल तभी हमारे भीतर आत्म विश्वास जागृत होता है और हम अपने प्रयत्नों से भी स्वयं का उत्थान कर सकते हैं।

👉जब हम आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में प्रतिकूलताओं का सामना करते हैं तब हम शिकायत करते हैं कि अन्य लोग हमारे विध्वंस का कारण हैं और वे हमारे शत्रु हैं। जबकि हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारा अपना मन है। विध्वंस का कारण यही मन है। मन हमारी पूर्णता की अभिलाषा को निष्फल कर देता है।श्रीकृष्ण कहते हैं कि एक ओर जीवात्मा के परम हितैषी के रूप में मन में हमें अधिक से अधिक लाभ प्रदान करने की क्षमता होती है तथा दूसरी ओर उसमें हमें अधिकतम हानि पहुँचाने की क्षमता भी होती है। नियंत्रित मन कई कल्याणकारी कार्य पूर्ण कर सकता है जबकि अनियंत्रित मन अति अधम विचारों के साथ हमारी चेतना को विकृत कर सकता है। मन को मित्र के रूप में प्रयोग करने के लिए मन की प्रवृति को समझना आवश्यक है।इसलिए मन की शक्ति द्वारा अपना आत्म उत्थान करो और स्वयं का पतन न होने दो। मन जीवात्मा का मित्र और शत्रु भी हो सकता है।

🙏🏾शाकाहार सदाचार अपनाएं 🙏🏾
🙏🏾🌷आप सभी प्रेमियों को सादर जय गुरुदेव एवम सुप्रभात 🌷🙏🏾
#मन #आत्मा
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🙏🏾💕 जय गुरुदेव 💕🙏🏾🪴जानें बिनु न होइ परतीती। 🪴     🪴बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥🪴🪴प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई।🪴     🪴जिम...
05/10/2026

🙏🏾💕 जय गुरुदेव 💕🙏🏾
🪴जानें बिनु न होइ परतीती। 🪴
🪴बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥🪴
🪴प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई।🪴
🪴जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥🪴

👉ज्ञान, विश्वास और प्रेम- इन तीन शब्दों का व्यापक व्यवहार है संसार में भी और हर धर्म में भी , इसका संत तुलसी दास जी ने बड़ा सुंदर निरूपण किया है।उनके अनुसार पहला ज्ञान है , दूसरा विश्वास और तीसरा है प्रेम। ज्ञान और विश्वास ये दोनों दो प्रकार से होते हैं- एक तो theoretical और एक practical ।कोई भी ज्ञान होगा, तो पहले theory में होगा। जब theory में ज्ञान होगा, तो वह ज्ञान अपरिपक्व होगा , doubtful होगा क्योंकि वह अनुभवहीन है। इसलिए विश्वास जो उसका होगा , वह भी कच्चा होगा। कभी होगा, कभी कम होगा, कभी नहीं होगा। इस स्थिति में theory के ज्ञान के बाद जो practical साधना करने लगता है, वह पक्का होता है ।।मतलब जितनी limit में वह साधना में आगे बढ़ता है, उतनी limit में उसका विश्वास पक्का होता है और टिकाऊ होता है। फिर वह कभी साधना से गिर नहीं सकता।। जब साधना पक्की और पूरी हो जाती है, तो अंतःकरण की शुद्धि हो जाती है !

👉साधना जब परिपूर्ण हो गई, तब विश्वास भी परिपूर्ण हुआ। तब जाकर साधक को अपने इष्ट और सदगुरु से प्रेम मिलता है! तो प्रेम मिलने के बाद फिर ज्ञान और विश्वास उसी में लीन हो जाते हैं, फिर खाली प्रेम बचता है।यह भगवत् विषय ज्ञान की theory है , ज्ञान , विश्वास और प्रेम में इसी प्रकार का क्रम चलता है।जगत में भी ऐसा ही होता है करीब-करीब। हम किसी के गुण को सुनते हैं, किसी की प्रशंसा सुनते हैं तो विश्वास करते हैं। लेकिन वह doubtful विश्वास होता है। जब उसको हम प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, तो हमारा विश्वास दृढ होता है। फिर उससे प्यार होता है। लेकिन यहाँ का ज्ञान, यहाँ का विश्वास, यहाँ का प्रेम सब क्षणभंगुर है, वह कितना ही बड़ा हो जाए! क्योंकि मायिक जगत का ज्ञान परिवर्तनशील है और ईश्वरीय जगत का ज्ञान सदा के लिए स्थायी है प्रतिक्षणवर्धमानम् ।तुलसीदास जी ऊपर के दोहे में लिखते हैं कि प्रभुता जाने बिना उन पर विश्वास नहीं जमता, विश्वास के बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षीराज! जल की चिकनाई ठहरती नहीं।।

🙏🏾💕शाकाहार सदाचार अपनाएं 💕🙏🏾
🙏🏾आप सभी प्रेमियों को सादर जय गुरुदेव एवम सुप्रभात 🙏🏾
#ज्ञान #विश्वास #प्रेम #साधना #प्रीति

#जयगुरूदेव
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🙏🏽🙏🏽आप सभी प्रेमियों, साधकों को सादर जय गुरुदेव एवम सुप्रभात 🙏🏽🙏🏽 fans
03/10/2026

🙏🏽🙏🏽आप सभी प्रेमियों, साधकों को सादर जय गुरुदेव एवम सुप्रभात 🙏🏽🙏🏽
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🙏🏽🌷🌳  जय गुरुदेव 🌳🌷🙏🏽🔱 परमात्मा आनन्दमय , नित्य , अनादि , असीम है ।वे सर्वशक्तिमान , सर्वस्वरूप , सबके परम कारण तथा सर्व...
02/10/2026

🙏🏽🌷🌳 जय गुरुदेव 🌳🌷🙏🏽
🔱 परमात्मा आनन्दमय , नित्य , अनादि , असीम है ।वे सर्वशक्तिमान , सर्वस्वरूप , सबके परम कारण तथा सर्वान्तर्यामी हैं ।सांसारिक विषयों को ग्रहण करने वाली इन्द्रियों और उसके भोगों की वहां पहुंच नही हैं । वह अनामी अपने ही अंश जीवात्माओं के साथ सचिदानंद स्वरूप में अपने लोक में बैठकर शक्ति का संचार नीचे के लोकों में करते रहता है ।।वहीं पर जीवात्मा या आत्मा भी अनादि है ।अंश तो यह परमात्मा का ही परंतु “ ससीम ” है ..अर्थात् जिसकी सीमा हो । यह शान्त है पर यह भी नित्य है क्योंकि यह सत्यस्वरूप है ।यह शरीर से अलग है क्योंकि शरीर नश्वर है, अनित्य है और नाशवान है । फिर भी लोग इन दोनों को एक मानते हैं ।उपर्युक्त श्लोक के अनुसार ..यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता॥

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं
भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

🔱परमात्मा तथा जीवात्मा के बीच के संबंधो को भगवान् श्रीरामकृष्ण परमहंस जी ने इस प्रकार प्रकाशित किया है - “पानी और बुलबुला वस्तुतः एक ही हैं ।बुलबुला पानी में ही उत्पन्न होता है , पानी में ही रहता है और अंत में पानी में ही समा जाता है । उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा वस्तुतः एक ही है ।उनमें अंतर केवल उपाधि के तारतम्य का है - एक सान्त-सीमित है तो दूसरा अनन्त-असीम , एक आश्रित है तो दूसरा स्वतंत्र ।’’ यह अविद्या माया के ही कारण है कि हमें आत्मा ससीम प्रतीत होता है । अविद्या और अज्ञान के नष्ट हो जाने पर आत्मा जो नितान्त अभेद है परमात्मा से , अपने स्वरूप को सदगुरु की दया से अपने आप ही प्रकट कर देता है अर्थात् वह भी परमात्मा ही हो जाता है ।जरूरत है किसी ऐसे सदगुरु से मिलने की , खोज करने की ..जो जीते जी इस मनुष्य शरीर में बैठी जीवात्मा को प्रभु से मिलाकर उसका रूप बना दे।।

🙏🏽🙏🏽शाकाहारी , सदाचारी, नशामुक्त बनें 🙏🏽🙏🏽
🔱🙏जय गुरुदेव नाम प्रभु का 🙏🔱
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🙏🙏जय गुरुदेव 🙏🙏शब्द बिना सारा जग अंधा ।काटे कौन मोह का फंदा ।।शब्द बिना बिरथा सब धंधा ।शब्द बिना जीव बंधन बंधा।।👉प्रार्थ...
30/09/2026

🙏🙏जय गुरुदेव 🙏🙏
शब्द बिना सारा जग अंधा ।
काटे कौन मोह का फंदा ।।
शब्द बिना बिरथा सब धंधा ।
शब्द बिना जीव बंधन बंधा।।

👉प्रार्थना कीजिए , अपने हृदय को खोल कर कीजिए , चाहे जिस रूप जहां भी कीजिए , चाहे एकांत निर्जन स्थान में या घर में कीजिए , अपनी टूटी-फूटी लडख़ड़ाती भाषा या हिंदी , संस्कृत , अंग्रेजी में कीजिए , आपके सदगुरु ,आपके भगवान् सर्वज्ञ हैं। वे तुरंत ही आप की हर भाषा को समझ लेंगे। प्रात: काल प्रार्थना , मध्याह्न या संध्या को कीजिए , सर्वत्र कीजिए और सभी अवस्थाओं में कीजिए। लेकिन जरूरत और उचित तो यही है कि आप की प्रार्थना निरंतर होती रहे और यही नही ; तब तक कीजिए जब तक आप का संपूर्ण जीवन प्रार्थनामय न बन जाए।हर मानव यहां शांति चाहता है , चिरशांति , पर वह शांति है कहाँ ? संसार में तो अशांति का ही साम्राज्य है , शांति के भंडार तो वही केवल शक्तिपुंज सर्वेश्वर सदगुरु भगवान् ही हैं।

👉वे ही परम गति हैं और उनके पास पहुँचने के लिए सत्य हृदय से की गई प्रार्थना ही तो पंख स्वरूप है जिससे आपको उनका अक्षय भंडार मिल जाएगा और सम्पूर्ण जीवन में आपको सुख शांति की प्राप्ति होती रहेगी ।।प्रभु से माँगिए कुछ नहीं , वे तो सबके माँ बाप हैं तथा सबकी आवश्यकताओं को वे खूब जानते हैं। आप सिर्फ दृढ़ता से उनके मंगल विधान को सर्वथा स्वीकार कर लीजिए चाहे आपको अच्छा लगे या बुरा । उनकी इच्छा के साथ आपनी इच्छा को जोडक़र एकरूप कर दीजिए , उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहिए , तभी सच्ची शांति का अनुभव कर सकोगे।जब कभी जो भी परिस्थिति अनुकूल अथवा प्रतिकूल आ जाए, भगवान को हृदय से धन्यवाद दीजिए और सहर्ष खुशी खुशी स्वीकार करिए ।।

🙏🙏शाकाहार सदाचार अपनाएं 🙏🙏
🙏🏽आप सभी प्रेमियों साधकों भक्तों को सादर जय गुरुदेव 🙏 प्रणाम 🙏

#अध्यात्म #आध्यात्मिक #भजन #भक्ति #सदगुरु #जयगुरूदेव #संत #वचन #सुरत #शब्द #योग #आत्मा #रूह #रूहानी #मन
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🙏🌹जयगुरुदेव🌹🙏🍂मनहिं दिया निज सब दिया,                           मन से संग शरीर।🍂🍂अब देवे को क्या रहा,                   ...
29/09/2026

🙏🌹जयगुरुदेव🌹🙏
🍂मनहिं दिया निज सब दिया,
मन से संग शरीर।🍂
🍂अब देवे को क्या रहा,
यो कथि कहहिं कबीर॥🍂
🍂सतगुरु मिला जु जानिये,
ज्ञान उजाला होय।🍂
🍂भ्रम का भाँडा तोड़ी करि,
रहै निराला होय॥🍂

🍂जब आप सुबह उठिए तो चारपाई पर बैठकर आंखें बन्द करके पांचों धनियों के स्वरूप का ध्यान करिए , उनका नाम अंदर ही अंदर लीजिए और दृष्टि प्रणाम करिए। फिर अपना दैनिक कार्य हाथ मुंह धोने का करिए। इसी प्रकार जब रात में सोने जाइए तब भी इस क्रिया को करके सो जाइए ,बहुत फायदा का काम है । इसके अलावा जब भी आपको समय मिले पांच मिनट, दस मिनट, आधा घण्टा, सुमिरन, ध्यान, भजन करो। सुमिरन चौबीस घण्टे में एक बार मन को रोककर ठीक से करिय। ध्यान भजन आप कई बार कर सकते हो। ध्यान तो कुछ देर के लिए सबके बीच रहते हुए भी आंख बन्द करके कर सकते हो मगर भजन के लिए थोड़ा एकान्त चाहिए। साधना जब भी करिए सिर ढककर करनी चाहिए।🍂

🍂भजन के वक्त जब आवाज सुनते-सुनते उसमें लय होने लगोगे तब आवाज यानी शब्द जीवात्मा को खींचेगी। शब्द से जब प्यार हो जायेगा तो मन और जीवात्मा ऊपर की तरफ खिंच जाएंगे। जीवात्मा चेतन है और शब्द भी चेतन है इसलिए शब्द जीवात्मा को अपने में मिलाना चाहता है। गुरू शब्द स्वरूप हैं उसे बराबर याद करते रहिएगा तो भजन में अपने आप रस मिलने लगेगा। भजन में शब्द से अमृत चूता है और कभी बंद होता ही नही उसी को पीकर जीवात्मा आनन्दित और बलवती होती है। मन को जब शब्द का रस मिलने लगता है तब वो कैद हो जाता है जिस प्रकार भंवरा कंवल में बन्द हो जाता है।

👉सद्गुरु मिल गये - यह बात तब सच्चा जानिए , जब आपके हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाये , भ्रम का भंडा फोडकर निराले स्वरूप यानी निज स्वरूप का ज्ञान प्राप्त हो जाये ।।यदि अपना मन आपने अपने गुरु को दे दिया तो जानो सब दे दिया, क्योंकि मन के साथ ही शरीर है, वह अपने आप समर्पित हो गया ।।साहब के अनुसार अब देने को रहा ही क्या है ।।

🍂शाकाहार सदाचार अपनाए 🍂
🙏जयगुरुदेव नाम प्रभु का 🙏
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🙏🙏🌷जय गुरुदेव 🌷🙏🙏मानत नही मन मोरा साधो ,,             मानत नही मन मोरा रे ।।बार बार सदगुरु समझावे            जग में जीवन...
27/09/2026

🙏🙏🌷जय गुरुदेव 🌷🙏🙏
मानत नही मन मोरा साधो ,,
मानत नही मन मोरा रे ।।
बार बार सदगुरु समझावे
जग में जीवन थोड़ा रे ..।।
इस काया का गर्व न कीजे ,
क्या सांवर क्या गोरा रे ...।।
बिन भक्ति तन काम न आवे ,
कोटि सुगंध चभोरा रे ... ।।

👉⚜️मानव देह में जीवात्मा सहस्त्रार चक्र यानि अंतिम चक्र के ठीक नीचे आज्ञा चक्र पर विराजती है। यहाँ से स्व का बोध यानि खुद का जागरण बेहद सरल है, अति सुगम है। सिर्फ़ नाम यानी शब्द / अनहद नाद को पकड़ कर आप जीते जी अपने सच्चे घर , अपने धाम लौट सकते हो।कलियुग में संत सदगुरु ने इसे बेहद सरल कर दिया , इससे सुगम कभी भी किसी युग में कोई तकनीक न थी।इसलिए इस ख़ास मौक़े का आप फायदा उठा लो। इस शरीर में रहते हुये यानी जीते जी अपनी आत्मा को जगा लो और प्रभु को प्राप्त कर लो। अन्यथा स्मरण रहे कि मरने के बाद कर्मानुसार सिर्फ़ एक नयी देह के सिवा कुछ न मिलेगा और आप ख़ाली हाथ ही रह जाओगे।आप जीवित रहते हुये ऐसे साधू महात्माओं को खोज लो, जो ऊपर का भेद जानते हैं,जीव आवागमन का असली रहस्य पहचानते हैं।

👉🚩जो सद्गुरु या साध प्रभु को प्राप्त करके उसमें समाहित हो चुका हैं या प्रभु की अनुकंपा से ही नीचे उतरे हैं। जो ऊपर के लोकों में आते जाते हों।जिनकी दृष्टि खुली हो। जो पढ़ी-लिखी या कही-सुनी नहीं, दिव्य दृष्टि से "आखन देखी" कहते हों। उनसे अपने असली परिचय की युक्ति सीख लो , मार्ग जान लो। यदि आपको वो पवित्र तकनीक, विशिष्ट मार्ग मिल जाये तो आपका जीवन सफल हो जाये। इसलिये समय व्यर्थ मत करो, वरना ८४ लाख प्रकार की जेलों में ठूँस दिये जाओगे।सच्चे सदगुरु या संत आपके पास कुछ लेने नहीं , सिर्फ़ देने आते हैं।आपके पास अपना है ही क्या जो उन्हें दे सकोगे , जो आपका है ही नहीं उसे वो आपसे ले कैसे सकेंगे और वो पराया माल लेकर उसे जायेंगे कहाँ। इसलिये महापुरुषों पर शक सन्देह मत करिए , अन्यथा आप इस अनमोल अवसर को पाकर भी गँवा दोगे।

🙏🏽🙏शाकाहार सदाचार अपनाए 🙏🏽🙏
🙏🏽आप सभी प्रेमियों को सादर जय गुरुदेव एवम सुप्रभात 🙏🏽
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🙏🌹जय गुरुदेव🌹🙏👉गुरू और शब्द यह दोउ मीत।👉नहीं कोई और इन धर चीत।।👉❤️ समरथ गुरु यानी तत्वदर्शी संत सदगुरू और शब्द (यानी अनह...
25/09/2026

🙏🌹जय गुरुदेव🌹🙏
👉गुरू और शब्द यह दोउ मीत।
👉नहीं कोई और इन धर चीत।।

👉❤️ समरथ गुरु यानी तत्वदर्शी संत सदगुरू और शब्द (यानी अनहद नाद , आयतें, कलमा , word, देववाणी , ईश्वरीय संगीत , आकाशवाणी ) दोनों दयाल के स्वरूप हैं और हमारी आत्मा को कर्मों के जाल से छुड़ाने के लिए सतलोक से चलकर हम तक पहुॅचते हैं।अगर हम उनकी संगति करके उनके लिए प्रेम पैदा कर के उनके स्वरूप को अपने चित्त में बराबर धारण करें और उनके बताये हुये उपदेश पर चलें तो उनकी संगति में हम कर्म फल के दायरे को पार कर सकते हैं । तभी हम कर्मों के जाल से बाहर निकल कर अपने निज घर यानी मोक्ष पा सकते हैं।❤️

👉❤️यदि शिष्य-भजन, सिमरन को नियमित रूप से समय देते रहें तो उनके अन्दर सतगुरू तथा शब्द के लिए प्रेम जाग्रत हो जायेगा । इस तरह उनका फैला हुआ ध्यान अंतर में एकाग्र हो जायेगा और उनकी निष्काम भाव से कर्म करने की योग्यता बढ़ जायेगी , एवम सदगुरु के नूरानी चरण कमल का दर्शन भी हो जायेगा ।। सद्गुरु के चरणों में सारे पवित्र तीर्थ रहते हैं, अर्थात उनके चरण कमल तीर्थों के समान पवित्र एवं पूज्य है।। इस समस्त संसार में ऐसा कोई धाम या तीर्थ नहीं है जो सद्गुरु के चरणों में नहीं है।

👉❤️ भजन सिमरन करनेवाले जो साधक हैं , वे कर्म करते हुए भी अपने कर्मों और उनके फल से नहीं बंधेंगे। वे कर्म तो करेंगे, परन्तु उनके कर्म बंधनकारी नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में वे बीज तो बोएंगे, परन्तु वे बीज फूटेंगे नहीं और उन्हें उनकी फसल नहीं काटनी पड़ेगी ।। जब तक उनका अंत समय आएगा, वे अपने प्रारब्ध कर्मों का हिसाब चुकता कर चुके होंगे ।। तब सदगुरु दया व अपनी साधन तरक्की की सहायता से उन्होंने अपने कर्मों का भुगतान भी कर लिया होगा और निज घर का मार्ग प्रशस्त भी ।।

🌿शाकाहार अपनाए सदाचार अपनाए 🌿
🙏🌿जयगुरुदेव नाम प्रभु का 🌿🙏
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🙏🌹जय गुरूदेव 🌹🙏🌼तेरा साथी कोई भी नहीं है। सब मनुष्य स्वार्थ में बंधे हुए हैं, जब तक इस बात का भरोसा मन में जाग्रत होता त...
23/09/2026

🙏🌹जय गुरूदेव 🌹🙏
🌼तेरा साथी कोई भी नहीं है। सब मनुष्य स्वार्थ में बंधे हुए हैं, जब तक इस बात का भरोसा मन में जाग्रत होता तब तक आत्मा के प्रति विश्वास जाग्रत नहीं होता। वास्तविकता का ज्ञान न होने से मनुष्य संसार में रमा रहता है ,जब संसार के सच को जान लेता है , इस स्वार्थमय सृष्टि को समझ लेता है , तब ही अंतरात्मा और आत्मज्ञान की ओर उन्मुख होता है।

🌼रूहानी शक्तियां मनुष्य के भीतर प्रसुप्तावस्था में होती हैं, जिन्हें किसी समरथ गुरु से युक्ति लेकर शब्द योग के द्वारा सहज रूप से जागृत किया जा सकता है। समर्पण एवं शब्द योग के अवलम्बन से अंतरात्मा का अंतर्जागरण संभव है, तब चेतना यानी सूरत और निरत सहज रूप से अपने प्रीतम का रूहानी दर्शन करके जागृत, संतुलित और परिपूर्ण हो जाती हैं।

🌹कागत लिखै सो कागदी,को व्यहाारि जीव।🌹
🌹आतम द्रिष्टि कहां लिखै ,जित देखो तित पीव।।🌹

🌼शब्द योग आपके आंतरिक भय को मिटाने में बड़ी भूमिका का निर्वहन करता है। जब व्यक्ति डर से निर्मुक्त होता है, जब उसके रोम रोम से अभय की रोशनी चमक उठती है। और उसका चरित्र दृढ़ होने लगता है। तब वह अपने अंतर्मन की शक्ति का अहसास करके आनंदित रहने लगता है। उसके भीतर से रूहानियत का फूल झरने लगता है।

🌼अंतर्मन पर पूर्ण क़ाबू करके असंभव भी संभव हो सकता है। स्वयं पर नियंत्रण होते ही मानव असीम शक्ति संपन्न होकर महामानव बन जाता है। खुद पर क़ाबू का मतलब स्वयं को भली-भांति जान लेना है। और अपने कर्मों की शक्ल पहचान लेना । इसी बोध को आत्मज्ञान कहते हैं। जब आत्मज्ञान और आत्म अनुभव होने लगता है तो शास्त्र और किताबो की बात तो महज दस्तावेज ही लगता है ,क्योंकि साधक उसके बाद हर जगह अपने प्रीतम को ही देखता है ।।।

🌼कागज में लिखा शास्त्रों की बात महज दस्तावेज है । वह जीव का व्यवहारिक अनुभव नही है ।आत्म दृष्टि से प्राप्त व्यक्तिगत अनुभव कहीं लिखा नहीं रहता है । हम तो जहाॅ भी देखते है अपने प्यारे परमात्मा को ही पाते हैं।

🌿निखरता वही है जो पहले बिखरता है साहब 🌿

🌼शाकाहार सदाचार नशामुक्त जीवन अपनाए 🌼
🙏🙏 जय गुरुदेव नाम प्रभु का🙏🙏
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