Pradeep Kumar

Pradeep Kumar ब्रजप्रेम, मुरारी, ब्रजबाला, मोहन, राधा

25/05/2026

*नदिया-गोद्रुमे*

नदिया-गोद्रुमे नित्यानन्द महाजन
पातियाछे नाम-हट्ट जीवेर कारण॥1॥

(श्रद्धावान जन हे, श्रद्धावान जन हे)
प्रभुर अज्ञाय, भाइ, मागि एइ भिक्षा
बोलो ‘कृष्ण, ‘भजकृष्ण, कर कृष्ण-शिक्षा॥2॥

अपराध-शून्य ह’ये लह कृष्ण-नाम
कृष्ण माता, कृष्ण पिता, कृष्ण धन-प्राण॥3॥

कृष्णेर संसार कर छाडि’ अनाचार।
जीवे दया, कृष्ण-नाम सर्व धर्म-सार॥4॥

(1) भगवान्‌ नित्यानंद, जो भगवान्‌ कृष्ण के पवित्र नाम का वितरण करने के अधिकारी हैं, उन्होंने नदीया में, गोद्रुम द्वीप पर, जीवों के लाभ हेतु भगवान्‌ के पवित्र नाम लेने का स्थान, नाम हाट का प्रबन्ध किया है।

(2) हे सच्चे, वफादार वयक्तियों, हे श्रद्धावान, विश्वसनीय लोगों, हे भाइयों! भगवान्‌ के आदेश पर, मैं आपसे यह भिक्षा माँगता हूँ, “कृपया कृष्ण के नाम का उच्चारण कीजिए, कृष्ण की आराधना कीजिए और कृष्ण की शिक्षाओं का अनुसरण कीजिए। ”

(3) “पवित्र नाम के प्रति अपराध किए बिना, कृष्ण के पवित्र नाम का जप कीजिए। कृष्ण ही आपकी माता है, कृष्ण ही आपके पिता हैं, और कृष्ण ही आपके प्राण-आधार हैं। ”

(4) “संपूर्ण अनुचित आचरण को त्याग कर, कृष्ण से संबधित अपने कत्तवयों को सम्पन्न कीजिए। सभी जीवों के प्रति दया करने के लिए कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण सभी धर्मों का सार है। ”

.      *श्री राधा कृष्ण चरित्र भाग २८३*"चलो अब  वृन्दावन !    मन नही लग रहा  कुरुक्षेत्र में"भानुदुलारी से मिलनें कृष्ण ...
25/05/2026

. *श्री राधा कृष्ण चरित्र भाग २८३*
"चलो अब वृन्दावन ! मन नही लग रहा कुरुक्षेत्र में"

भानुदुलारी से मिलनें कृष्ण आये थे ....पर श्रीराधारानी ललिता सखी से कुछ कह रही थीं......छुप गए .....और ध्यान से सुननें लगे थे ।

श्रीराधा कह रही थीं - चलो सखी ! वृन्दावन .....मन नही लग रहा अब कुरुक्षेत्र में ..........

पर आप ऐसा क्यों कह रही हो.......श्याम सुन्दर तो हैं ना !

ललिता सखी नें कहा ।

सखी ! प्रियतम श्याम सुन्दर वही हैं ......यहाँ कुरुक्षेत्र में मिल भी गए .......और राधा भी मैं वही हूँ.........हम लोगों का मिलन - सुख भी वही है ........पर ......वो बात नही है जो बात वृन्दावन में थी ।

ललिते ! मेरा मन तो उन वृन्दावन बिहारी के प्रति ही निष्ठावान है .....द्वारिकाधीश में वो बात नही है ..........मैं चाहती हूँ सखी ! कि वो पंचम स्वर में बंशी ध्वनि, जो यमुना के तीर में बजती थी .....और हम सब दौड़ पड़तीं ..........मैं , मैं चाहती हूँ ........वृन्दावन में प्रियतम को देखूँ .........रस की सृष्टी हर स्थान पर सम्भव नही है .......इसलिये मेरी सखी ! जितनी जल्दी हो सके मुझे वृन्दावन पहुँचा दो ..........यदुनाथ में वो बात कहाँ ......जो बृजनाथ में थी .........

द्वारिकाधीश में वो बात कहाँ ............जो वृन्दावनाधीश में थी ।

कृष्णचन्द्र छुपकर सुन रहे थे ................ये सब सुनकर उनकी हिलकियाँ बंध गयीं ...........ललिता सखी नें सुना ......तो जाकर देखा ...........स्वामिनी ! श्याम सुन्दर खड़े हैं यहाँ ।

श्रीराधारानी गयीं ............पर श्याम सुन्दर बस रोये जा रहे थे ।

प्यारे ! क्यों रो रहे हो ...............मुझे अब जानें दो वृन्दावन ........मेरे लिये वही स्थान उचित है ...........और आप जब मुझे वहाँ दिखाई देते हो ..........कदम्ब में , मोर के नृत्य में , यमुना की तरंगों में , बरसानें के कुञ्ज - निकुञ्ज में ..........बहुत आनन्द है वहाँ .........पिया ! मत रोको अब ..........आप प्रसन्न हो मेरे लिए यही जानना आवश्यक था .........मैने देख लिया । .........आपको प्रसन्न देखकर ....आपकी समस्त रानियों से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा .........आपकी देख रेख अच्छी हो रही है .........प्यारे ! खुश रहो ..........मेरे प्राण ! ऐसे ही प्रसन्नता आपके मुखारविन्द में छाई रहे.........इतना कहते हुए आगे बढ़कर श्रीराधारानी नें आँसू पोंछ दिए थे कृष्ण चन्द्र के ।

पर कृष्ण की हिलकियाँ रुक कहाँ रही थीं .............

ऐसा मत करो.........बैठ गयीं श्रीराधारानी.........गोद में श्याम सुन्दर का शीश रख लिया .......सहलाती रहीं उन घुँघराले केशों को ।

क्या चाहते हो ? जब कृष्ण का रुदन नही रुका तब पूछा श्रीराधारानी नें.......बोलो प्यारे........राधा से तुम्हे क्या अपेक्षा है ?

एक बार मेरी द्वारिका में अपनें चरण रख दो .............

कृष्ण चन्द्र नें विनती की ।

अब रहनें दो ............अब शीघ्र इस अवतार लीला को विराम दो और चलो निकुञ्ज में..........श्रीराधारानी नें कहा ।

नही ...........जिद्द मत करो पिय ! द्वारिका में मेरा क्या काम ?

वैकुण्ठ को ही पृथ्वी पर उतारा है आपनें........मुझे पता है .......भू वैकुण्ठ है आपकी द्वारिका ..........पर वैकुण्ठ में मेरा क्या काम ......आपकी महालक्ष्मी रुक्मणी हैं .............उनके साथ आप सानन्द विराजे हैं ..........वहाँ मेरी क्या आवश्यकता ! ऐश्वर्य में माधुर्य का क्या काम ? इसलिये ज्यादा आग्रह मत करो ।

गम्भीर हो उठे थे श्रीकृष्ण चन्द्र .......राधे ! महाभारत का युद्ध होगा अब .......महाभीषण युद्ध है .........उसके बाद एक और सूर्यग्रहण तुरन्त ही पड़नें वाला है .........मेरी इच्छा है कि उस सूर्यग्रहण में आप द्वारिका पधारें .......द्वारिका के पास में ही एक तीर्थ है "कश्यपाश्रम सिद्ध पुर"........आप वहाँ आजायें .....हम सब द्वारिकावासी भी वहाँ पहुंचेंगें ........मैनें बाबा से और मैया से भी प्रार्थना की है .....मैया तो मना ही कर रही थी .......पर बाबा नें मेरी बात मान ली है ............हे राधिके !

आपके श्रीचरणों में ये मेरी प्रार्थना है ...........इतना कहते हुए श्रीजी के चरणों में कृष्ण चन्द्र झुक गए थे ............

नही प्यारे ! उठा लिया श्रीजी नें और अपनें बाहु पाश में भर लिया ।

दोनों मिले........बड़े प्रेम से मिलते रहे.........अश्रु बहते रहे दोनों के।

हे वज्रनाभ ! अब समस्त वृन्दावनवासी कुरुक्षेत्र से चलनें की तैयारी में थे ...........नन्दबाबा और वसुदेव जी गले मिले विदा होते हुए .......देवकी रोहिणी नें मैया यशोदा का बहुत आदर किया .......और बहुत प्यार किया......ये हैं भी प्यारी मैया - कन्हैया की मैया ।

कन्हैया तो बस अपनी मैया से ही चिपके हैं ..................

चल ! तू भी चल वृन्दावन ! मैया यशोदा नें विनोद में कहा था ।

पर फिर हिलकियाँ फूट पड़ीं कृष्ण की ............ऐसा सौभाग्य कहाँ है मैया ! तेरे लाला के भाग में .........वो तेरे हाथ की माखन रोटी ........इतना ही बोल पाये कृष्ण ...........।

मनसुख को गले से लगाया कृष्ण नें ..........श्रीदामा तो बस रोता ही जा रहा है .........अन्य सखा विरहकातर हो उठे हैं ।

ललिता रंगदेवी .....से कृष्णचन्द्र कहा ...............मेरी प्यारी राधा का आप लोग सम्भाल करना .........ललिता सखी रो गयीं .......तो .अपनें हृदय से लगा लिया कृष्ण नें .............

अपनी अपनी बैल गाडी में सब बैठे......और कुरुक्षेत्र से श्रीधाम वृन्दावन की ओर ।

क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

भाग ७२८                  *श्रीरामचरितमानस*                         *प्रथम सोपान*                         *बाल-काण्ड*    ...
25/05/2026

भाग ७२८
*श्रीरामचरितमानस*
*प्रथम सोपान*
*बाल-काण्ड*
*दोहा सं० २७४*
*(चौपाई सं० १ से ४ तक)*

*श्रीपरशुराम—प्रसंग*
*(भाग – २१)*

श्रीपरशुरामजी विश्वामित्रजी से कहते हैं —
*कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु ।*
*कुटिल कालबस निज कुल घालकु ॥१॥*
*भानु बंस राकेस कलंकू ।*
*निपट निरंकुस अबुध असंकू ॥२॥*
*काल कवलु होइहि छन माहीं ।*
*कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं ॥३॥*
*तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा ।*
*कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा ॥४॥*
अर्थ – हे विश्वामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, काल के वश होकर यह अपने कुल का घातक बन रहा है। यह सूर्यवंश रूपी पूर्ण चन्द्र का कलंक है। यह बिल्कुल उद्दण्ड, मूर्ख और निडर है। अभी क्षण भर में यह काल का ग्रास हो जायेगा। मैं पुकारकर कहे देता हूँ, फिर मुझे दोष नहीं है। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो।
👉 _*'कौशिक सुनहु'*_ – विश्वामित्रजी से क्यों कहा? इसका कारण यह है कि –
(१) श्रीजनकजी पर क्रोध है, इसलिये उनसे नहीं कहते, और श्रीरामजी से यह समझकर नहीं कहा कि वे भी तो लड़के ही हैं, उनके डाँटने एवं मना करने से यह नहीं मानेगा। दूसरे, परशुरामजी ने अभी श्रीरामजी की वाणी अच्छी तरह नहीं सुनी है, इसलिये इनका स्वभाव भी अभी नहीं जानते, बिना सुने-जाने कैसे कहते ?
(२) रह गये विश्वामित्रजी, सो ये दोनों लड़कों को लेकर स्वयं आकर इनसे मिले थे और इन्होंने दोनों लड़कों से इनके चरणों में प्रणाम कराया था, अतएव निश्चय है कि इनका कहना लक्ष्मणजी अवश्य मानेंगे, यह समझकर उनसे कहा। पुनः,
(३) 'कौशिक' सम्बोधन का भाव यह भी है कि 'जब हम कुशवंशियों को मारने लगे थे तब तुमने कितनों को ही अपने कुल के सम्बन्ध से बचाया था, इसलिये इस बालक के लिये भी जो तुम्हें पुनः प्रार्थना करनी हो तो इसे निवारण (मना) करो, नहीं तो फिर हम इसे क्रोध में नहीं छोड़ेंगे।'
(४) कौशिकजी से कहने का एक कारण यह भी है कि ये दोनों कुमारों को दशरथजी से माँग लाये थे। यदि राजकुमार मार डाला गया तो इनको कलंक लगेगा, इनकी प्रतिष्ठामें धब्बा लग जायगा। अतः ये उसे अवश्य चुप करेंगे।
बात तो यह है कि लक्ष्मणजी से बातों में जीत नहीं सके, कुछ उत्तर नहीं बन पड़ा, तब उधर झुके, उनसे पुकार की।
श्रीप्रज्ञानानन्द स्वामीजी — परशुरामजी का मन लखनलाल से (न तो वाग्युद्ध में और न शस्त्रास्त्रायुध युद्ध में विजय पाने की निराशा होने पर) अपनी हार स्वीकृत करने को तैयार नहीं है। वे इधर से उधर, उधर से इधर फिर-फिर के कुछ-न-कुछ आधार पकड़कर अपनी जीत सिद्ध करने का विफल प्रयत्न कर रहे हैं। जैसे- जैसे विफलता बढ़ती है, वैसे-वैसे कोप-कृशानु भी अधिक धधकता जाता है। एक पर कोप का कार्य न होता देख दूसरे पर! कैसा मानवी प्रकृति का विचित्र, यथार्थ चित्रण है!
👉 लक्ष्मणजी ने परशुरामजी को उत्तर-प्रत्युत्तर में ऐसा फँसाया कि रामजी को धनुष-भंग-कर्ता जानने पर भी वे रामजी की ओर नहीं घूम सके लक्ष्मणजी से ही जी छुड़ाना कठिन हो गया। तब उनके (श्रीराम-लक्ष्मणजी के) अभिभावक विश्वामित्रजी से कहने लगे कि यह बालक मन्द है, वह मन्द नहीं जिसने धनुष तोड़ा है। लक्ष्मणजी ने आठ चौपाइयों में ( *'अहो मुनीस महा भटमानी'* से लेकर *'व्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा'* तक) आठ बातें कहीं, उन्हीं आठ बातों को दृष्टिमें रखकर परशुरामजी उन्हें आठ विशेषणों से क्रमशः विशेषित करते हैं – (१) मंद, (२) कुटिल, (३) कालबस, (४) निजकुल घालकु (५) भानुबंस राकेस कलंकू (६) निपट निरंकुसु (७) अबुध (८) असंकू ।
विभिन्न विशेषणों का भाव –
(१) *मंद* – बड़े का अपमान करता है, अतः मंद है।
(२) *'कुटिल'* का भाव यह है कि इसके सब वचन प्रलाप के हैं। अतः बहुत अभिमान है। स्वयं वीर बनता है और जो हमने सहस्रबाहु आदि कितने ही क्षत्रियों को मारा उनको फूँक बताता है, हमको वीर नहीं मानता, कोरा ब्राह्मण कहता है और कहता है कि धनुष-बाण-कुठार न बाँधो। पुनः, स्वयं तो धर्मात्मा बनता है, कहता है कि मेरा कुल ब्रह्मण्य है और साथ ही हमारा सिर काट डालने को तैयार है, आप वीर बनकर हमसे बड़ा बनना चाहता है, इत्यादि सब कुटिलता है।
(३) *'कालबस'* है, क्योंकि सँभालकर नहीं बोलता, जिह्वा पर लगाम नहीं है, मेरे कुठार को तर्जनी समझ रहा है। पुनः, हम जो क्षत्रियों के लिये काल हैं, उन्हीं से वाद-विवाद करता है, अतः जाना गया कि कालवश है।
(४) *'निजकुल घालकु'* – भाव यह है कि कटुवादी होने से इसका तो वध होगा ही, पर इसके कटु वचनों के कारण इसके कुल का नाश होगा। तात्पर्य यह है कि हम इसको मारकर फिर इसके वैर से इसके सारे कुल का नाश करेंगे, जैसे सहस्रबाहु के वैर से क्षत्रियमात्र का नाश किया। जैसे लक्ष्मणजी ने *'भृगुसुत समुझि'* कहा, वैसे ही उसकी जोड़ में परशुरामजी ने 'निजकुल घालकु' कहा। लक्ष्मणजी भृगुवंशी समझकर नहीं मारते और इन्हें 'सूर्यवंश' का खयाल है।
(५) *'भानुबंस राकेस कलंकू'* – *'निजकुल घालकु'* कहकर अब उसका हेतु कहते हैं कि भानुवंश राकेश है, निर्मल है; उसमें यह दोषरूप है। इसी के दोष से भानुवंश का नाश होगा। यह ब्राह्मण का अपमान करता है। ब्राह्मण अपमान से कुल का नाश होता है, यथा – *'जिमि द्विज द्रोह किए कुल नासा'*। ब्राह्मण का अपमान करने से भानुवंश के कीर्तिचन्द्र को मलिन कर रहा है। प्रथम लक्ष्मणजी ने आशय से दर्शाया था कि धनुषादि धारण करने से ब्राह्मणकुल छिप जाता है। अर्थात् शस्त्रास्त्र का धारण करना ब्राह्मणकुल को दूषित करता है; इसी पर परशुरामजी कहते हैं कि यह बालक कुल का नाशक और कुल का कलंक है।
(६) *'निपट निरंकुश '* – निपट अर्थात् भरपूर, बिल्कुल। बालपने से इसे किसी ने शिक्षा नहीं दी, इसीलिये हम अपना बल-प्रताप-रोष कहते हैं तो इसे ज्ञान नहीं होता। सुर, महिसुर, भक्तजन और गाय प्रातः स्मरणीय हैं, उन्हें दीन मानता है।
(७) *'अबुध'* है। स्वयं को मुझे वध करने की योग्यता मानता है और मुझसे पराजित होना भी अपने लिये लज्जाजनक समझता है।
(८) *'अशंक'* – अबुध है इसीलिये अशंक है। मेरे धनु-बाण-कुठार-धारण को व्यर्थ बतलाता है। इस भाँति यह बढ़-बढ़कर बोलता है। अपने को इतना बड़ा वीर मानता है कि मेरे शस्त्र बाँधने पर क्रोध दिखलाता है, कहता है – *'जो बिलोकि अनुचित कहेउँ...।'* भाव यह है कि बुद्धि हो तब तो हमारे स्वरूप का ज्ञान इसे हो, हमारा स्वरूप जानता तो शंका होती।
पुरुष की परीक्षा चार प्रकार से की जाती है – स्वरूप से, कुल से, संग से और कर्म से। परशुरामजी मंदादि विशेषण देकर लक्ष्मणजी को चारों प्रकार से दूषित दिखाते हैं। 'मंद, कुटिल, कालवश अर्थात् मृतक समान' कहकर अपने *स्वरूप से दूषित* कहा। 'भानुबंस राकेस कलंकू' और 'निजकुल घालकु' कहकर दर्शाया है कि इसने *कुल को दूषित* कर दिया। 'अबुध' से *संगदूषित* कहा अर्थात् इसने कभी बुद्धिमानों का संग नहीं किया और, 'निपट निरंकुसु' और 'असंकू' से *कर्म दूषित* दिखाये, तात्पर्य यह है कि स्वतन्त्र है, अपने मन का काम करता है।
👉 _*'काल कवलु...'*_ – भाव यह है कि समस्त संसार काल का कलेवा है, यथा – *'अग जग जीव नाग मुनि देवा । नाथ सकल जग काल कलेवा ॥'* तब यह तो उस काल के कौरभर को भी नहीं है। तात्पर्य यह है कि इसकी सब करनी देख लो, मेरा एक आघात सहने में भी समर्थ नहीं होगा। इसलिये पुकारकर कहे देता हूँ जिसे रोकना हो इसे रोको, नहीं तो मेरे हाथ से इसका वध हुआ ही चाहता है। पीछे मुझे कोई दोष न दे।
👉 _*'कहि प्रताप बल रोष हमारा'*_ – इससे सूचित करते हैं कि परशुरामजी अपने *प्रताप-बल-रोष* के अभिमान से परिपूर्ण हैं। पुनः, भाव यह है कि यह कहकर मना न करो कि ब्राह्मण हैं, जाने दो, अब कुछ न कहो, बल्कि हमारा *'बल प्रताप रोष'* कहकर इसका मुँह बंद करो, समझा दो कि अपने बल का अभिमान न करे कि धनुष तोड़ डाला।
*बल, प्रताप और रोष* क्या हैं? *'भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही'* – यह बल है। *'गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर ।'* फरसे की घोरता सुनकर रानियों के गर्भ गिर जाते हैं – यह प्रताप है। *'सहसबाहु भुज छेदनिहारा'* और *'बाल ब्रह्मचारी अति कोही । बिश्व बिदित क्षत्रियकुलद्रोही ॥'* यह रोष है।
*श्रीराम – जय राम – जय जय राम*

.      श्री राधा कृष्ण चरित्र भाग २८२मैं आपसे  "प्रेमतत्व" पर कुछ सुनना चाहती थी ........पर  आपको तो मुझ से शिकायत है .....
24/05/2026

. श्री राधा कृष्ण चरित्र भाग २८२
मैं आपसे "प्रेमतत्व" पर कुछ सुनना चाहती थी ........पर आपको तो मुझ से शिकायत है ............द्रोपदी मुस्कुराई ।

"प्रेम तत्व" को लेकर ही शिकायत है ........प्रेम करती हो तुम श्याम सुन्दर से......मुझे पता है ..........पर प्रेम के वास्तविक स्वरूप को नही जानती .........श्रीराधारानी नें कहा ।

मैने सुना है ...............भरी सभा में जब तुम्हे नग्न किया जा रहा था ......उस समय तुमनें कृष्ण को पुकारा था ...........बेचारे भोजन कर रहे थे ............भोजन को छोड़कर वे दौड़ पड़े .............

नयन बरस पड़े थे श्रीराधारानी के ।

कौन सी आफ़त आगयी थी........जो अपनें प्रेमास्पद को इतना कष्ट दिया तुमनें..........श्रीराधारानी भाव में बोल रही थीं ।

क्या होता ? ये शरीर ही तो नग्न होता.........फिर क्या फ़र्क पड़ता है ...........ये शरीर तो एक दिन राख बनेगा .....या फेंक देंगें तो कुत्ते खा जायेगें.........ऐसे शरीर के लिये तुमनें कष्ट दिया अपनें प्रियतम को ? श्रीराधारानी बोलीं .........हे द्रोपदी ! ये प्रेम है ....ये प्रेम का मार्ग है .............प्रेम इतना सरल नही है ...........प्राणों की बलि देकर भी प्रेम अगर मिलता है द्रोपदी ! तो सस्ता है ........ले लो प्रेम ।

पर सच्चे प्रेम में स्वसुख की किंचित् भी वाँछा नही होती .......सच्चा प्रेम तो प्रियतम का सुख देखता है .........बचाओ ! बचाओ ! ये सच्चे प्रेमी की पुकार नही है........सच्चा प्रेमी तो कोई कष्ट भी दे तो मुस्कुराता है.......और प्रियतम से कहता है .........कोई बात नही ......मुझे कुछ नही हो रहा ......आप चिन्ता मत करो मेरी ......मैं ठीक हूँ .......पर प्यारे ! आप तो ठीक हो ना ?

श्रीराधारानी द्रोपदी को प्रेम तत्व की दीक्षा दे रही हैं आज ।

हे द्रोपदी ! ये प्रेम तत्व सबसे बड़ा तत्व है .............इसके पथ टेढ़े मेढे हैं ............इसलिये बहुत सम्भल कर चलनें की जरूरत है ........

प्रेमी के जीवन का "अथः" और "इति" ये मात्र आत्मबलिदान में ही है ........प्राणों का मोह सबको होता है .........पर प्रेमी इस व्यापक नियम के अपवाद में आगया ..........प्रेमी को किसी का मोह नही होता ......अपनें प्राणों का मोह तो होता ही नही है ........अगर है ......तो अभी पूर्ण प्रेमी वो है नही ।

हँसी श्रीराधारानी ............हे द्रोपदी ! ये सिर जब तक धड़ में है .....तब तक प्रेम , सच्चा प्रेम प्रकट कैसे होगा ...........इस सिर को प्रियतम के चरणों में चढ़ा दो ............यानि "मैं" को चढ़ा दो ।

इसलिये तो सच्चा शूर वीर प्रेमी को ही कहा गया है ...........जिसे अपनें प्राणों का भी मोह नही है ........वह कितना ऊंचा और सच्चा पराक्रमी होगा ...........विचार करो द्रोपदी !

अपनें अहंकार की होली जलाकर जो निकल पड़ा है प्रेम के रस्ते ..........क्या उससे बड़ा कोई वीर इस दुनिया में है ?

हे द्रोपदी ! थोड़े में ही घबडा जाना .........ये प्रेमी के लक्षण हो ही नही सकते ...........हमें देखो ! श्रीराधारानी नें द्रोपदी को कहा .......हमें देखो द्रोपदी ! सौ वर्ष के बाद मिले हैं ..........पर कोई शिकायत नही है .......क्यों हो शिकायत ? क्या वे प्रसन्न रहें हम नही चाहते ?

अगर चाहते हैं ......तो उनकी राजी में ही हम राजी क्यों नही ?

द्रोपदी के नेत्रों से अश्रु बह रहे थे ...........द्रोपदी मात्र श्रीराधारानी के चरणों को ही देख रही थीं..........उनके हृदय में गुरुभाव की जागृति हुयी श्रीराधारानी के प्रति.......प्रेम को तत्वतः समझा दिया था श्रीराधा नें......अहोभाव से भर गयीं द्रोपदी .........और अत्यन्त भावुक हो श्रीराधारानी की वन्दना करनें लगी थीं ।

पर वन्दना करते हुए ........उन्हें कुछ विशेष दर्शन हुए थे ।

श्रीराधा के दाहिनें स्कन्ध से श्याम सुन्दर प्रकट हो गए ..........

इस दृश्य को देखकर आनन्दित हो उठीं द्रोपदी ।

"आपही सर्वेश्वरी हो ......हे राधिके ! आप के गुन गन को गाना कोई साधारण बात तो है नही ........आप ब्रह्म की आल्हादिनी, हम साधारण विषयी जीवों को प्रेमतत्व की शिक्षा देनें के लिये ही आप का आविर्भाव होता है.........आप दो नही हैं ........जो श्रीराधा और श्याम सुन्दर को दो मानते हैं ........वो अपराध ही करते हैं ......आप दो नही .......आप एक ही हैं ........कृष्ण ही राधा हैं और राधा ही कृष्ण हैं ।

इतना कहते हुए चरणों में वन्दन किया द्रोपदी नें ...........श्रीराधारानी के साथ अब यहाँ श्याम सुन्दर भी खड़े थे .........युगल की झाँकी का दर्शन करके द्रोपदी के आनन्द का कोई पारावार न रहा ।

क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

भाग ७२७                 *श्रीरामचरितमानस*                          *प्रथम सोपान*                         *बाल-काण्ड*    ...
24/05/2026

भाग ७२७
*श्रीरामचरितमानस*
*प्रथम सोपान*
*बाल-काण्ड*
*दोहा सं० २७३*
*(चौपाई सं० ७, ८ एवं दोहा)*

*श्रीपरशुराम—प्रसंग*
*(भाग – २०)*

लक्ष्मणजी ने कहा था कि हमारे कुल में देवता, ब्राह्मण, भगवद्भक्त और गऊ इन पर शूरता (वीरता) नहीं दिखाते क्योंकि –
*बधें पापु अपकीरति हारें ।*
*मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें ॥७॥*
*कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा ।*
*ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा ॥८॥*
अर्थ – इन्हें मारने से पाप लगता है और इनसे हार जाने पर अपकीर्ति होती है। इसलिए आप मारें तो भी आपके पैर ही पड़ना चाहिये। आपका एक-एक वचन ही करोड़ों वज्रों के समान है। धनुष-बाण और कुठार तो आप व्यर्थ ही धारण करते हैं।
👉 _*'बधे पापु अपकीरति हारे'*_ – चौपाई के इस भाग में दो बातें कही गयी हैं –
(क) *बधे पापु* और (ख) *अपकीरति हारे*
'बधे पापु' का भाव यह है कि संग्राम में यदि वीर को वीर मार डाले, तो वीर को पाप नहीं लगता। परंतु सुर-महिसुर आदि वीर नहीं हैं, इसलिये इन्हें संग्राम में मारने से भी पाप लगेगा।
'अपकीरति हारे' का भाव यह है कि संग्राम में वीर से हारने से वीर की अपकीर्ति नहीं होती; परंतु ये वीर नहीं हैं, इसलिये अपकीर्ति होगी। इनसे लड़ने से दोनों प्रकार हार ही है, जीतने में भी हार, क्योंकि पाप लगता है, और हारने में भी हार क्योंकि अपकीर्ति होगी।
इस कथन से दर्शाया है कि आप शूर तो हैं नहीं, ब्राह्मण हैं, अतएव पाप और अपयश दोनों से बचने के लिये हम वचन सहते हैं।
👉 _*'मारतहू पा परिय तुम्हारे'*_ – भाव यह है कि हम आपका वचन क्रोध रोककर सहते हैं और यदि आप मारें भी तो हम आपके पैरों ही पड़ेंगे। महात्मा लोग ऐसा ही कहते हैं; यथा – *'सापत ताड़त परुष कहंता । बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ॥'* (३/३४)
*'बधे पापु अपकीरति हारे'* का ऐसा अर्थ भी लोगों ने किया है कि 'आपके वध में पाप और आपके हारने में अर्थात् आपसे जीतने में भी अपकीर्ति ही है।' जीतने में पाप है, हारने से अपयश है, इसीलिये इन पर वीरता नहीं दिखाते।
ब्राह्मण अवध्य है, यथा – *'अवध्या ब्राह्मणा नित्यं स्त्रियो बालाश्च ज्ञातयः। येषां चान्नानि भुंजीथ ये चास्य शरणं गताः ॥'* मनुजी का (मनु० ४/१६२) वाक्य है कि आचार्य, कथावाचक, पिता, माता, गुरु, ब्राह्मण, गौ और तपस्वियों की हिंसा नहीं करनी चाहिये। यथा – *'आचार्यं च प्रवक्तारं पितरं मातरं गुरुम्। न हिंस्याद् ब्राह्मणान् गाश्च सर्वांश्चैव तपस्विनः ॥'*
श्रीनंगे परमहंसजी का मत है कि 'पूर्व जो *'जनेउ बिलोकी'* कहा है उसके सम्बन्ध से *'बधे पापु अपकीरति हारे'* कहा अर्थात् आपका जनेऊ ब्राह्मण बतला रहा है तो हमारे कुल में ब्राह्मणों से वीरता नहीं की जाती, क्योंकि वध करें तो पाप लगे और हारें तो अपकीर्ति हो'। और *'भृगुकुल समुझि'* के सम्बन्ध से *'मारतहू पा परिय'* कहा। अर्थात् 'आप ब्राह्मणों में भृगुकुल के हैं कि जिस भृगुलता को विष्णुभगवान् धारण किये हुए हैं, अर्थात् भृगुजी ने श्रीविष्णुभगवान्‌ को लात मारी पर भगवान्‌ ने सहन कर लिया, यही समझकर आप जो कुछ कहिये मैं सहन करूँगा, श्रीलक्ष्मणजी ने *'भृगुकुल समुझि'* का भाव भृगुलता कहा।'
👉 _*‘कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा'*_ – यहाँ 'बचन' एक कहा, क्योंकि यदि बहुत वचन कहते तो ‘बचन तुम्हारे' कहना चाहिये था। यद्यपि परशुरामजी ने बहुत वचन कहे हैं तो भी 'बचन तुम्हारे' न कहकर 'बचनु तुम्हारा' कहने में भाव यह है कि आपका एक-एक वचन करोड़ों वज्र के समान है।
👉 _*'व्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा'*_ – भाव यह कि जिसे आप कोप करके शाप दे दें वह भस्म हो जाय, जैसा कि स्वयं श्रीशिवजी ने कहा है – *'इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला । कालदंड हरिचक्र कराला । जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई ॥'* (७/१०९)
श्रीकरुणासिंधुजी लिखते हैं कि *'कोटि कुलिस सम'* का भाव यह है कि ब्राह्मण का एक शाप उससे भी अधिक कठिन काम करता है, जितना इन्द्र के करोड़ों वज्राघात से भी नहीं हो सकता, यदि उसमें शुद्ध ब्राह्मण के गुण हों। अतः कहा कि आपका वचन ही फरसा आदि से कठिन है, इनकी आवश्यकता ही क्या कि जो आप वीरवेष बनाये हैं।
परशुरामजी को धनुष, बाण और कुठार का बड़ा अभिमान है, इसीलिये लक्ष्मणजी ने ब्राह्मण का सामर्थ्य कहकर धनुषादि का धारण करना ही व्यर्थ किया, अर्थात् उनकी वीरता की जड़ ही उखाड़ डाली - इस चतुराई से बात की। जब परशुरामजी ने धनुष की बड़ाई की, तब लक्ष्मणजी ने उसे *'धनुही'* कहा और छूते ही टूट जाना कहकर उसे जीर्ण सूचित किया, इस पर परशुरामजी निरुत्तर हो गये। जवाब नहीं बन पड़ा तब उन्होंने अपने कुठार की बड़ाई की - *'सहसबाहु भुज छेदनिहारा ।....'* जिसके उत्तर में इन्होंने अपने को पहाड़ और उनके परशु को फूँक कहा। पुनः, 'ब्राह्मण के वचन के आगे धनुषादि का धारण करना व्यर्थ है' इस कथन का आशय यह है कि इनका किया कुछ नहीं होता, जैसे फूँक से पहाड़ नहीं उड़ता। पूर्व परशुरामजी ने धनुषकी बड़ाई की, उसका निरादर लक्ष्मणजी ने *'सुनहु देव सब धनुष समाना'* कहकर किया। फिर उन्होंने अपनी वीरता की प्रशंसा की, उसका निरादर इन्होंने दोहा २७३ में किया और विशेषरूप से इस चौपाई में, जिसका भाव यह है कि ये सब वीर का बाना छोड़ दो, हथियार अलग कर दो, ये हमारे क्षत्रियों के अस्त्र-शस्त्र हैं सो छोड़कर हमें दे दो। ब्राह्मणों के लिये तो शाप ही पर्याप्त हथियार है।
श्रीलमगोड़ाजी लिखते हैं – *'क्षत्रियकुलद्रोही'* के श्रेणी के युद्धवाले शब्दों का कितनी खिल्ली उड़ानेवाला उत्तर है, परंतु कितना सच्चा ! द्रोह का उत्तर द्रोह नहीं अपितु शील ही है। अन्तिम पद *'सुर महिसुर सुराई'* की व्याख्या स्वयं लक्ष्मणजी ने यों की है और बताया है कि वे ब्राह्मण आदि से क्यों नहीं लड़ते – *'बधे पापु....तुम्हारे।'* प्रथम चरण का व्यंग्य कितना सुन्दर है और दूसरे चरण की नम्रता उसे और उभार देती है। *'कोटि कुलिस.....कुठारा'* माधुर्य का यह व्यंग्यपूर्ण वार गजब का है। लक्ष्मणजी कहते हैं कि आपके शब्दरूपी बाण ही क्या कम हैं जो इतने हथियार लेकर चलते हैं।
।। दोहा ।।
*जो बिलोकि अनुचित कहेउँ, छमहु महामुनि धीर ।*
*सुनि सरोष भृगुबंसमनि, बोले गिरा गभीर ॥२७३॥*
अर्थ – इन्हें (धनुष-बाण और कुठार को) देखकर मैंने कुछ अनुचित कहा हो, तो उसे हे धीर महामुनि! क्षमा कीजिये। यह सुनकर भृगुवंशमणि परशुरामजी क्रोध के साथ गंभीर वाणी बोले।
👉 _*'जो बिलोकि'*_ का भाव यह है कि यदि हम इन्हें न देखते तो अनुचित न कहते, यथा – *'जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाई । पदरज सिर सिसु धरत गोसाईं ॥'* (२८२/३) तात्पर्य यह है कि हथियार धारण करने से ब्राह्मण का स्वरूप छिप जाता है और उसका अपमान होता है, इससे आप इन्हें व्यर्थ धारण किये हुए हैं।
👉 _*'महामुनि धीर'*_ अर्थात् आप मननशीलों में शिरोमणि हैं, धीर हैं अर्थात् विकारों से क्षोभ को प्राप्त होनेवाले नहीं हैं; अतएव क्षमा कीजिये। ये व्याजव्यंग्योक्ति से अपमानित सम्बोधन है इसीलिये परशुरामजी *'सुनि सरोष बोले'*
👉 _*'सरोष'*_ – धनुषादि का धारण करना व्यर्थ कहने पर रुष्ट हुए कि जिन अस्त्र-शस्त्रों से हमने सहस्रबाहु आदि ऐसे भारी वीरों का नाश किया उन्हीं को व्यर्थ कहता है।
👉 _*'भृगुवंश मनि'*_ – प्रथम परशुरामजी को सूर्य कहा था, यथा – *'तेहि अवसर सुनि सिवधनुभंगा । आयेउ भृगुकुल कमल पतंगा ॥'* (२६८/२) यहाँ 'मणि' कहकर सूचित करते हैं कि पहले सूर्य के समान थे, परंतु श्रीराम-लक्ष्मणजी को कटु वचन बोले, इसीलिये क्रमशः तेज घट गया। अथवा, उस प्रतापरवि को लक्ष्मणजी ने अस्त कर दिया। अब पतंग से मणि रह गये और आगे यह भी नहीं रह जायेंगे।
पं० विजयानन्द त्रिपाठीजी लिखते हैं – लक्ष्मणजी कह रहे हैं कि आपके वचन में कोटि वज्र की शक्ति निहित है, उससे हम निःसंदेह डरते हैं, आपकी गौरव की दृष्टि उस पर न होकर इस धनु, बाण और कुठार में है। आप व्यर्थ ही लोहा लादे फिरते हैं। इससे डर होना तो दूर गया, हम लोगों को प्रतिस्पर्धी वीर समझकर क्रोध होता है, हम क्षात्रतेज से नहीं डरते, ब्राह्मतेज से डरते हैं। *'चारु जनेउ माल मृगछाला'* से हमें भय का संचार होता है, तूण, शर, कुठार और धनुष देखकर तो युद्धोत्साह होता है। उन्हें देखकर ही मैंने आपसे ऐसी बातें कीं, जो उचित नहीं थीं। आप महामुनि हैं, धीर हैं, अपने स्वरूप पर आइये, स्वधर्म सँभालिये, परधर्म का अभिमान त्याग करिये। मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। सारांश यह कि आपके शाप-प्रदान पर उद्यत होने को मैं डरता हूँ, युद्ध के लिये उद्यत होने को नहीं। क्योंकि मैं स्वधर्म में स्थित हूँ ।
*श्रीराम – जय राम – जय जय राम*

.          *श्री राधा कृष्ण चरित्र भाग २८१*यज्ञ की पूर्णाहुति हो चुकी थी .......ब्राह्मणों को  दान- दक्षिणा  वसुदेव जी द...
22/05/2026

. *श्री राधा कृष्ण चरित्र भाग २८१*
यज्ञ की पूर्णाहुति हो चुकी थी .......ब्राह्मणों को दान- दक्षिणा वसुदेव जी द्वारा दिया जा रहा था ............एक तरफ खड़े थे पाण्डव ......पर पाण्डवों की दृष्टि श्रीराधारानी पर ही थी ..........तभी ललिता सखी के कान में श्रीराधारानी नें कहा ........मुझे यहाँ सबकी दृष्टि चुभ रही है .....मुझे यहाँ से ले चलो ...........ललिता सखी नें हाथ पकड़ा और पीछे अष्ट सखियाँ श्रीजी को लेकर उनके शिविर में चली गयीं थीं ।

आप प्रसन्न हैं ना स्वामिनी ! श्याम सुन्दर से मिलन हो गया ना आपका ! रंगदेवी नें पूछा था ।

मेरी प्यारी सखियों !......."प्रेम हर जगह नही बहा करता"............प्रेम के लिये स्थान की भी अपनी महत्ता होती है ।

हँसी श्रीराधारानी ........यहाँ शंख ध्वनि हो सकती है .....पर प्रेम की वंशी ध्वनि तो वृन्दावन में ही होती है ..............

यहाँ कहाँ मिलन ? मिलन तो वृन्दावन का ही है .........

सखियों ! मुझे अब याद आरही है अपनें वृन्दावन की ..........मुझे याद आरहा है अपना बरसाना ...............मुझे अब ले चलो वहीँ ।

एकाएक भावुक हो उठीं थीं श्रीराधारानी ............
पर ये क्या ? किसी सुन्दरी नें पीछे से चरण छू लिए थे श्रीराधारानी के ..........चौंक गयीं श्रीराधा .......कौन ? कौन हो तुम ?

मैं द्रोपदी .........आपके दर्शनों की अभिलाषा से आयी हूँ ।

हाथ जोड़कर बड़े विनम्र भाव से कह रही थीं ।

ओह ! द्रोपदी ? श्रीराधारानी नें हृदय से लगा लिया था ।

तुम मेरे श्याम सुन्दर की सखी हो ना ? चिबुक में हाथ रखते हुए बड़े प्रेम से श्रीराधा बोलीं थीं ।

मेरा सौभाग्य है कि .........श्रीकृष्ण नें इस "कृष्णा" को अपनी सखी माना.......मुझ से मित्रता की.......मैं अपनें आपको धन्य मानती हूँ ।

द्रोपदी कितनी शान्त भाव से बोल रही थीं ।

हे राधिके ! आपके विषय में कौन नही जानता ..........सखा कृष्ण नें ही कई बार आपकी चर्चा की है........और चर्चा करते हुए बड़े भावुक हो उठते हैं.........पर मैने उनकी बातों को कभी गम्भीरता से नही लिया था.......किन्तु ! एक दिन मेरे पतिदेव अर्जुन वृन्दावन चले गए मैने सुना ........वृन्दावन क्यों गए होंगें .......मैं सोचती रहती थी ......कई दिनों के बाद मेरे पतिदेव लौटकर आये.........तब उन्होंने आपके बारे में जो बताया वो विलक्षण था...........आप ब्रह्म की आल्हादिनी हैं ......आप ही प्रेम हैं ......आप सौन्दर्य की देवी हैं ...........हे राधिके ! बहुत कुछ कहा था मेरे पति अर्जुन नें ............आप प्रेम का साकार रूप हैं .........और मैं क्या कहूँ ..........तब से मेरे मन में यही कामना थी .........कि आपके दर्शन कर लूँ एक बार ..........आपके चरण की धूलि अपनें माथे से लगा लूँ .........मेरी इच्छा पूरी हो गयी ......ये कहते हुए द्रोपदी श्रीराधारानी के चरणों में गिर गयी थीं ।

हे अर्जुनप्रिया ! उठो ..........हे याज्ञसेनी ! बताओ क्या जानना चाहती हो .......पर एक बात कहूँ ? मुझे तुमसे शिकायत भी है ......श्रीराधारानी नें कहा था ।

क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

22/05/2026

मैं स्वास्थ्य के कारण पिछले कई दिनों से कोई पोस्ट न प्रसारित कर सका।
क्षमा प्रार्थी

दासानुदास
प्रदीप कुमार

.         *श्री राधा कृष्ण चरित्र भाग २७९*हे वज् में भी कह चुका हूँ ......कुरुक्षेत्र में  सूर्यग्रहण के कारण  सब आये ही...
16/05/2026

. *श्री राधा कृष्ण चरित्र भाग २७९*
हे वज् में भी कह चुका हूँ ......कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के कारण सब आये ही थे.........पर "हरिप्रिया" श्रीराधारानी भी आरही हैं .....ये जब सुना....तो सब दौड़ पड़े थे कुरुक्षेत्र की ओर ।

अर्जुन तो इसी दिन की प्रतीक्षा में ही थे .......इंद्रप्रस्थ - हस्तिनापुर कुरुक्षेत्र के पास में ही हैं........इसलिये पाण्डवों को आनें में कोई दिक्कत भी नही थी......अर्जुन ही विशेष आग्रह कर करके अपनें समस्त परिवार को लेकर आगये थे........साथ में द्रोपदी भी थीं ......द्रोपदी को दर्शन करनें थे श्रीराधारानी के ।

ग्रहण का स्नान हो गया था.......अब बारी थी दान पुण्य इत्यादि करनें की.......एक यज्ञ का आयोजन भी वसुदेव जी नें रख दिया था .........जिस यज्ञ का पुरोहित हम दोनों को बनाया गया ......आचार्य गर्ग और मैं ( महर्षि शाण्डिल्य ) ।

मैं बहुत प्रसन्न था.........आचार्य गर्ग और मैं दोनों बड़े प्रेम से गले मिले थे........हम लोगों में विनोद भी हुआ.......फिर यज्ञ की तैयारियों में हम सब जुट गए ।

वृन्दावन के शिविर में.......मैया यशोदा के पास कृष्ण की मुख्य अष्ट पटरानीयाँ वन्दन करनें के लिये गयी थीं ।

मैया यशोदा के आनन्द का कोई ठिकाना नही था.........

कृष्ण पत्नियों नें मैया यशोदा को सजाया.....साडी पहनाई .....सुन्दर सुन्दर बना दिया.........

अरी ! मों बुढ़िया कू सजाय के कहा करोगी ? मैया हँसती हैं ।

रुक्मणी को मैया यशोदा की बृजभाषा बहुत प्रिय लगती है......वो बार बार बातें करती हैं मैया से........फिर हँसती हैं ।

तुम्हारे छोरा नही है.......बता दो कितनें छोरा छोरी हैं तुम सबके ?

मैया यशोदा के मुख से ये सुनकर सब हँसीं..........खूब हँसीं ।

"दस छोरा हैं और एक छोरी हैं" रुक्मणी भी मैया की भाषा में ही थोडा बोलीं तो सबनें हँसकर रुक्मणी के लिये तालियाँ बजाईं ।
मैया यशोदा हँसती हुयी बोलीं तेरे ही ग्यारह हैं कि सबन के?
"सबन के" ये कहते हुए खूब हँस रही थीं रुक्मणी।

फिर तो बहुत हे गए होंगें? ऊँगली में गिनते हुए बोलीं मैया - 90 बालक है गए. मैया की बात पर हँसते हुए सब बोलीं मैया ! सोलह हजार एक सौ आठ हैं हम सब मिलाके ।
मैया हँसी ओह !

ओह नही मैया ! ये तो ईमानदारी के व्याह है तेरे लाला के ।

सत्यभामा आँखें मटकाते हुए रुक्मणी से बोलीं ..............

आप तो सीख गयीं बृजभाषा ! सत्यभामा की बातें सुनकर रुक्मणी नें कहा ........अब मैं उनसे इसी भाषा में बात करूंगी ........वो बहुत खुश होंगें.......रुक्मणी नें ये कहते हुए फिर मैया यशोदा को प्रणाम किया था.......और चरण चाँपन करनें लगी थीं ।

*****************************

ओह ! नन्दराय जी ! आगे बढ़कर चरण छूनें चाहे वसुदेव जी नें .....पर नन्द बाबा किसी से अपनें पाँव नही छूवाते ...........वैसे वसुदेव जी छोटे हैं नन्दबाबा से .............पर साधू स्वभाव के कारण किसी को भी अपनें चरण इन बाबा नें छुवानें नही दिए ।

नन्दराय जी को वसुदेव नें यज्ञ में विशेष निमन्त्रण दिया था ।

वसुदेव को अपनें हृदय से लगा लिया नन्द जी नें ..........और दोनों के ही अश्रु बहनें लगे थे...............

मैं अपराधी हूँ आपका.........मुझे क्षमा करें हे पूज्य नन्दराय जी ।

वसुदेव की हिलकियाँ फूट पड़ी थीं ............वो रोते ही जा रहे थे ।

मैं अपराधी हूँ ..........आपका अपराधी हूँ ........हे नन्दराय जी !

आज आपके सामनें और इस कुरुक्षेत्र की भूमि में ........मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ ............बस आपसे मुझे यही आशा है कि इस स्वार्थी वसुदेव को आप क्षमा करेंगें !

आप क्या कह रहे हैं वसुदेव ! .........वसुदेव के कन्धे में हाथ रखते हुए नन्दराय जी नें उन्हें सहज किया ।

ये आपकी महानता है ............आपका साधू स्वभाव तीनों लोकों में वन्दनीय है ...........मेरा पुत्र कृष्ण आपकी चर्चा करते हुये भावुक हो उठता है .......आपका प्रेम ......आपका निःस्वार्थ प्रेम ! और मैं ?

मैं स्वार्थ से भरा हुआ ...........एक स्वार्थी मानव ............

अपनें आँसुओं को पोंछते हुए वसुदेव जी नें कहा -

"आपकी पुत्री का मैं वसुदेव हत्यारा हूँ"...........इतना कहते हुए नन्दराय जी के चरणों में वसुदेव जी गिर गए थे ।

हाँ .........मेरे जैसा स्वार्थी और कौन होगा ...............अपनें पुत्र की रक्षा करनें के लिये मैने आपके पुत्री की बलि चढ़ाई ..............रुदन बढ़ता ही जा रहा था वसुदेव का ।

कंस के भय से मैने अपनें पुत्र को तो बचा लिया .......पर मैं कितना स्वार्थ से भरा हुआ था ..........मैने इतना भी नही सोचा कि वसुदेव तेरा पुत्र, तेरा पुत्र है ........पर जिसकी पुत्री नवजात ..........उसे उठाकर कंस के हाथों दे दिया, मारनें के लिये .......!

मुझे आप क्षमा करें........वसुदेव फिर नन्दराय के चरणों में गिरे ।

हे वसुदेव ! बुद्धिमान व्यक्ति बीती हुयी बातों का शोक नही करता ।

ज्ञानी उसे ही कहते हैं ............हे वसुदेव ! जो बीती बातों का शोक नही करता और आनें वाले समय को लेकर भयभीत नही होता .....उसे ही ज्ञानी कहा गया है .............हे वसुदेव ! शोक को त्यागो .........और यज्ञ के कार्य में लगो .........हम सब तुमसे प्रसन्न हैं ..........

मुस्कुराते हुये वसुदेव को फिर अपनें हृदय से लगाया नन्दराय नें ।

यज्ञ प्रारम्भ हो रहा था ........वसुदेव ही मुख्य यजमान थे ।

मैं महर्षि शाण्डिल्य - उस समय चकित हो उठा था जब यज्ञ में सप्तऋषि भी पधारे .....मैने और आचार्य गर्ग नें उनसबको आसन दिया और प्रणाम किया .......पर मैने देखा ...........सप्तऋषियों को इस यज्ञ से कोई प्रयोजन ही नही था ...........उनका ध्यान न मन्त्र की ओर था .....न स्वाहा, न स्वधा की ओर ........वो सब इधर उधर दृष्टि घुमा रहे थे ..........सप्तऋषि इतनें चंचल !

मेरे मन की बात को वो समझ गए थे .......इसलिये मुस्कुराये ......

और मेरे पास आकर धीरे से बोले .......महर्षि शाण्डिल्य ! हम तुम्हारे यज्ञ में नही आये हैं ..........बस एक ही लोभ हमें यहाँ खींच लाया है ।

कौन सा लोभ ऋषि ? .........मैने पूछा ।

उन सनातन प्रेमीयों का दर्शन हो जाए ................महर्षि ! निकुञ्ज में हमारा प्रवेश नही है ........... इस बार अवतार हुआ है ..........तो दर्शन कर लें .........वैसे वृन्दावन में हमनें महारास के समय में दर्शन किये थे .......पर इस कुरुक्षेत्र में सौ वर्षों के लम्बे वियोग पश्चात्.....ये दोनों मिलें हैं ........हम अपनें नेत्रों को शीतल करनें आये हैं ..हम उन युगलवर के दर्शन करके अपनी तपस्या को धन्य करनें आये हैं .........कहाँ है श्रीराधाश्याम सुन्दर ?

शान्त , परमशान्त ऋषि भी आज प्रेम की उन्मत्तता के कारण ........चंचल हो उठे थे .......।

मैने उन सब को आदर सहित कहा ..........आनें वाले हैं ...... आप दर्शन करके ही जाइयेगा ।

मेरी बात सुनकर सप्तऋषि बहुत प्रसन्न हुए राधा कृष्ण के दर्शन की प्रतीक्षा करनें लगे थे ।
क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

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