Pradeep Kumar

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Pradeep Kumar ब्रजप्रेम, मुरारी, ब्रजबाला, मोहन, राधा

04/10/2026

भक्ति की ओर - ४
नामजप की महिमा - अजामिल का संक्षिप्त व्याख्यान

भाग ७९४               *श्रीरामचरितमानस*                          *प्रथम सोपान*                          *बाल-काण्ड*     ...
04/10/2026

भाग ७९४
*श्रीरामचरितमानस*
*प्रथम सोपान*
*बाल-काण्ड*
*दोहा सं० २९९*
*(चौपाई सं० १ से ५ तक)*

*बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े ।*
*निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े ॥१॥*
*फेरहिं चतुर तुरग गति नाना ।*
*हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना ॥२॥*
*रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए ।*
*ध्वज पताक मनि भूषन लाए ॥३॥*
*चवँर चारु किंकिनि धुनि करहीं ।*
*भानु जान सोभा अपहरहीं ॥४॥*
*सावँकरन अगनित हय होते ।*
*ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते ॥५॥*
⛳ शब्दार्थ – *बिरद* = बाना; वेशविन्यास । *गाढ़े* = दृढ़ । *रन गाढ़े* = रण में दृढ़ अर्थात् रणधीर। *पनव* = ढोल। *लाए* = लगाकर। *सावकरन* (श्यामकर्ण) – इन घोड़ों का सारा शरीर श्वेतरंग का होता है, केवल एक कान काला होता है। अश्वमेध यज्ञ में हवन किये जानेवाले बछेड़े घोड़े। पूर्व समय में अश्वमेध में यही घोड़े काम में लाये जाते थे। *होते* = यज्ञ में हवन करने योग्य। अथवा, हवन की अग्नि से निकले हुए।
*अर्थ* – शूरता का बाना धारण किए हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगर के बाहर आ खड़े हुए। वे चतुर अपने घोड़ों को तरह-तरह की चालों से फेर रहे हैं और भेरी तथा नगाड़े की आवाज सुन-सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं। सारथियों ने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणों को लगाकर रथों को बहुत विलक्षण बना दिया है। उनमें सुंदर चँवर लगे हैं और घंटियाँ सुंदर शब्द कर रही हैं। वे रथ इतने सुंदर हैं, मानो सूर्य के रथ की शोभा को छीने लेते हैं। अगणित श्यामवर्ण घोड़े थे। उनको सारथियों ने उन रथों में जोत दिया है।
👉 _*'बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े।'*_ – वीरों का बाना धारण किये हैं, यह (बाना) पूर्व दोहे (चौपाई सं० ८) में कहा है, यथा – *'कर सर चाप तून कटि भारी ।'*
👉 _*'पुर बाहेर ठाढ़े'*_ – नगर के बाहर खड़े होने का प्रयोजन अगले दोहे में स्पष्ट किया है, यथा – *'चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।'* अर्थात् सारी बारात जुटाने के लिये बाहर आकर खड़े हुए, जिससे कि सब यहाँ आकर एकत्र हों, सब बारात आगे-पीछे के क्रम से यहाँ सजकर तब चलेगी।
पुनः, *'बाँधे...बीर...ठाढ़े'* का भाव यह है कि मानो बीर-बाना बाँधकर पुर के बाहर रण में खड़े हुए हैं, ऐसा वीर रस का आवेश सभी को है।
👉 _*'फेरहिं चतुर तुरग गति नाना'*_ – *'फेरहिं'* शब्द से लक्षित होता है कि घोड़े बड़े चंचल हैं, खड़े नहीं रह सकते, आगे बढ़-बढ़ जाते हैं, राजकुमार बाग (लगाम) खींच-खींचकर कड़ी करके उनको फेरते हैं, घुमाते, रोकते हैं।
👉 _*'हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना'*_ – पनव और निशान आदि बाजे वीर रस के उद्दीपक हैं। इनको सुनकर वीर सुखी होते हैं। सब रघुवंशी राजकुमार वीरबाना बाँधकर नगर के बाहर खड़े हुए, यह देखकर बजानेवालों ने ढोल, नगाड़े राग से बजाये, इसीलिये वीर सुन-सुनकर सुखी हुए।
यहाँ तक भरतजी की सवारी कही। राजा की आज्ञा थी कि *'चलहु बेगि रघुबीर बराता।'* इसीलिये सबसे पहले भरतजी ने अपनी सवारी निकाली अपने राजकुमार सखाओं सहित बाहर आकर खड़े हुए, जिससे कि सब लोग जल्दी करें और वहीं आ जावें।
👉 _*'चंवर चारु किंकिनि धुनि करहीं'*_ – चँवर धरे हुए हैं। इससे सूचित किया कि यह रघुवंशी राजाओं के लिये हैं, सेवक लोग पीछे बैठकर चँवर करेंगे अर्थात् सिर पर चँवर घुमाया करेंगे। किंकिणियाँ रथों में शोभा के लिये बाँधी जाती हैं।
👉 _*'भानु जान सोभा अपहरहीं'*_ – सूर्य के विमान की उपमा देने का भाव यह है कि सूर्यवंशियों के रथ की उपमा त्रैलोक्य में नहीं है, इसीलिये अपने घर की ही उपमा दी। (सूर्य का ही यह वंश है।) *'भानु जान'* की उपमा से दर्शाया है कि रथ अत्यन्त दीप्तिमान् हैं और दिव्य हैं। दीप्तिमान् दरसाने के लिये *'भानु'* शब्द दिया है।
👉 _*'सावकरन अगनित हय होते'*_ – रथ ऐसे दिव्य हैं कि सूर्य के विमान की शोभा उनके आगे मन्द व फीकी लगती है। इसीलिये रथ के अनुकूल घोड़े भी दिव्य चाहिये, वही यहाँ कहते हैं कि एक तो वे श्यामकर्ण हैं, दूसरे अग्नि से निकले हुए हैं।
पं० रामकुमारजी *'होते'* शब्द का भाव यह कहते हैं – श्यामकर्ण घोड़े कैसे हैं? *'होते'* हैं, अर्थात् चढ़ती उम्र के हैं, अभी पूरे जवान नहीं हो चुके । अथवा, भाव यह है कि ये ऐसे भारी मूल्य के हैं कि इनके मूल्य में अगणित श्यामकर्ण घोड़े होते।
*श्रीराम – जय राम – जय जय राम*

तो यहाँ राधा के रूप में "रस" ही प्रकट है कृष्ण के रूप में "रस" ही उछल रहा है सखियों के रूप में  भी वही 'रस" सेवा में तैय...
03/10/2026

तो यहाँ राधा के रूप में "रस" ही प्रकट है कृष्ण के रूप में "रस" ही उछल रहा है सखियों के रूप में भी वही 'रस" सेवा में तैयार है अरे ! इतना ही नही इस श्रीधाम वृन्दावन के वृक्ष भी "रस" रूप हैं यहाँ की लताएँ भी उसमें खिलनें वाले पुष्प भी यमुना भी रज कण भी पक्षी भी अरे ! श्रीराधा रानी की चन्द्रिका भी उनकी करधनी, हार, नुपुर ये सब भी "रस" का ही विस्तार हैं ।

. *श्री राधा लीलामृतम् - भाग ६१*
*श्रीराधा माधव, दोनों ही भौरें हैं, पर दोनों ही कमल भी हैं, दोनों ही चकोर हैं, तो दोनों ही चन्दा भी हैं, दोनों ही प्रेम हैं तो दोनों ही प्रेमसिन्धु भी हैं।*

सृष्टि के आदि अंत तक एक दूसरे को देखते रहनें पर भी .......इनका अभी तक अच्छे से परिचय भी नही हुआ है ...........ये एक दूसरे को निहारते रहते हैं.........तब कितनी ही सृष्टियाँ बदल जाती हैं ......कितनें ब्रह्मा और रूद्र बदल जाते हैं ......पर ये अघाते नही ............श्याम सुन्दर तो बस यही कहते हैं .........."राधे ! तेरो मुख नित नवीन सो लागे"।

रस उछलता है .....रस ही रस में "रस" समा जाता है ..........फिर रस, रस को ही चखनें के लिये उतावला दिखाई देता है ......।

*हे वज्रनाभ ! तुम्हे क्या लगता है राधा कोई स्त्री हैं ?कृष्ण पुरुष हैं ? सखियाँ कोई नारी हैं ? नही वज्रनाभ ! नही। इस निकुञ्ज की केलि में न कोई स्त्री है न कोई पुरुष है सब तरफ "रस ही रस" का विस्तार है।*

तुमनें सुना होगा ना ......वेदों नें कहा है ...."रसो वै सः "...."सः" यानि ."वह" वह यानि ब्रह्म .......ब्रह्म रस रूप है ।

तो यहाँ राधा के रूप में "रस" ही प्रकट है ...कृष्ण के रूप में "रस" ही उछल रहा है ........सखियों के रूप में भी वही 'रस" सेवा में तैयार है .......अरे ! इतना ही नही ....इस श्रीधाम वृन्दावन के वृक्ष भी "रस" रूप हैं ......यहाँ की लताएँ भी .........उसमें खिलनें वाले पुष्प भी .....यमुना भी ......रज कण भी.....पक्षी भी...अरे ! श्रीराधा रानी की चन्द्रिका भी....उनकी करधनी, हार, नुपुर ये सब भी ...."रस" का ही विस्तार हैं ।

कृष्ण का मुकुट ..... बंशी .. पीताम्बरी ...... गूँजा की माला ..... सब कुछ "रस" ही है .........

समझे वज्रनाभ ! सब कुछ रसमय है इस वृन्दावन में.......यानि सब कुछ ब्रह्ममय है .......रस ही रस है यहाँ तो ।

क्यों न हो ....."रसराज" स्वयं दूल्हा बनें बैठे हैं .....और उनकी आल्हादिनी श्रीराधा रानी दुल्हन के रूप में सजी हुयी हैं ........

*ये सामान्य घटना नही हैं........ये रस का ही उत्सव है......मात्र रस ही रस .....वाह ! आनन्दित हो उठे थे ये सब कहते हुए स्वयं महर्षि ।*

क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

.                *श्री राधा लीलामृतम् - भाग ६१**श्रीराधा माधव,  दोनों ही भौरें हैं, पर दोनों ही कमल भी हैं, दोनों ही चको...
03/10/2026

. *श्री राधा लीलामृतम् - भाग ६१*
*श्रीराधा माधव, दोनों ही भौरें हैं, पर दोनों ही कमल भी हैं, दोनों ही चकोर हैं, तो दोनों ही चन्दा भी हैं, दोनों ही प्रेम हैं तो दोनों ही प्रेमसिन्धु भी हैं।*

सृष्टि के आदि अंत तक एक दूसरे को देखते रहनें पर भी .......इनका अभी तक अच्छे से परिचय भी नही हुआ है ...........ये एक दूसरे को निहारते रहते हैं.........तब कितनी ही सृष्टियाँ बदल जाती हैं ......कितनें ब्रह्मा और रूद्र बदल जाते हैं ......पर ये अघाते नही ............श्याम सुन्दर तो बस यही कहते हैं .........."राधे ! तेरो मुख नित नवीन सो लागे"।

रस उछलता है .....रस ही रस में "रस" समा जाता है ..........फिर रस, रस को ही चखनें के लिये उतावला दिखाई देता है ......।

*हे वज्रनाभ ! तुम्हे क्या लगता है राधा कोई स्त्री हैं ?कृष्ण पुरुष हैं ? सखियाँ कोई नारी हैं ? नही वज्रनाभ ! नही। इस निकुञ्ज की केलि में न कोई स्त्री है न कोई पुरुष है सब तरफ "रस ही रस" का विस्तार है।*

तुमनें सुना होगा ना ......वेदों नें कहा है ...."रसो वै सः "...."सः" यानि ."वह" वह यानि ब्रह्म .......ब्रह्म रस रूप है ।

तो यहाँ राधा के रूप में "रस" ही प्रकट है ...कृष्ण के रूप में "रस" ही उछल रहा है ........सखियों के रूप में भी वही 'रस" सेवा में तैयार है .......अरे ! इतना ही नही ....इस श्रीधाम वृन्दावन के वृक्ष भी "रस" रूप हैं ......यहाँ की लताएँ भी .........उसमें खिलनें वाले पुष्प भी .....यमुना भी ......रज कण भी.....पक्षी भी...अरे ! श्रीराधा रानी की चन्द्रिका भी....उनकी करधनी, हार, नुपुर ये सब भी ...."रस" का ही विस्तार हैं ।

कृष्ण का मुकुट ..... बंशी .. पीताम्बरी ...... गूँजा की माला ..... सब कुछ "रस" ही है .........

समझे वज्रनाभ ! सब कुछ रसमय है इस वृन्दावन में.......यानि सब कुछ ब्रह्ममय है .......रस ही रस है यहाँ तो ।

क्यों न हो ....."रसराज" स्वयं दूल्हा बनें बैठे हैं .....और उनकी आल्हादिनी श्रीराधा रानी दुल्हन के रूप में सजी हुयी हैं ........

*ये सामान्य घटना नही हैं........ये रस का ही उत्सव है......मात्र रस ही रस .....वाह ! आनन्दित हो उठे थे ये सब कहते हुए स्वयं महर्षि ।*

क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

.               *श्री कृष्ण लीलामृतम् - भाग ५०*                      *कान्हा चलने लगे - २*तभी   महर्षि शाण्डिल्य अपनें ब...
02/10/2026

. *श्री कृष्ण लीलामृतम् - भाग ५०*
*कान्हा चलने लगे - २*
तभी महर्षि शाण्डिल्य अपनें ब्राह्मणों को साथ में लेकर स्वस्तिवाचन करते हुए नन्दालय के आँगन में पहुँच गए थे।

महर्षि के चरण स्वयं नन्द दम्पति नें धोये .......आसन दिया ......समस्त ब्राह्मणों को सुन्दर आसन में बैठाया ।

मन्त्रोच्चार के कारण वातावरण और दिव्य बन रहा था........तभी पीपल, आम इत्यादि कि सूखी लकड़ियों में अग्नि का आव्हान किया......एक वेदिका में इन सब लकड़ियों को रखा गया था..... ऊपर से घृत कि धार छोड़ते हुये अग्नि का जब अव्हान किया गया .....बस देखते ही देखते अग्नि देवता भी शुद्ध सत्व रूप से प्रकट हो गए.........

कुछ देर तक मन्त्रोच्चार होता रहा ...... आहुति भी बृजराज और बृजरानी देते रहे.......... पौर्णमासी नें अब आकर कहा ........ बृजरानी ! आप उठो ......... और लाला के पास चलो .........बृजरानी उठकर लाला के पास आयीं ..............

हजारों गोप गोपियाँ खड़े हैं......... और लोक गीत गाकर सब आनन्दित हो रहे हैं........बीच बीच में गोप "बृजराज कि जय"..."बृजराज के लाला कि जय" जयकार लगा रहे हैं ।

पालनें से उठाया बृजरानी नें ...........

महर्षि शाण्डिल्य नें बृजराज के द्वारा पृथ्वी कि पूजा कराई ..... जल, फिर चन्दन रोरी, फिर अक्षत मोली इत्यादि से पृथ्वी कि पूजा की ।

इशारा किया महर्षि नें .......तो पौर्णमासी नें बृजरानी से कहा .......लाला को पृथ्वी में रख दो अब .............

रुक गयीं बृजरानी .........कठोर है, कठोर है पृथ्वी .......और मेरा लाला बहुत कोमल है ...........हे भगवती पौर्णमासी ! आप कहें तो नीचे कुछ वस्त्रों को बिछाकर लाला को बैठा दूँ ?

हँसते हुये पौर्णमासी बोलीं .........नही बृजरानी ! कुछ नही होगा ......और लाला को तो सीखना ही पड़ेगा ना चलना ....बैठना ।

बृजरानी कि दशा देखकर सब हँसनें लगे ...........क्यों कि उनका वात्सल्य उमड़ पड़ा था .........

पर लाला को पृथ्वी में रखना ही पड़ेगा ............डरते हुए उन्होंने जैसे ही लाला को पृथ्वी में रखा .......... लाला तो बैठ गया .......... अपनें आपको साध लिया ...........सब गोप गोपी प्रसन्न हो उठे .........

लाला सबको देखकर किलकारियाँ भरनें लगा ........ ताली बजानें लगा .........पर कुछ ही देर में अपनें आपको न सम्भाल पानें के कारण वो गिर गया ........जब गिरा ..........तब पौर्णमासी नें बृजरानी को रोक दिया .........उसे खेलनें दो रानी !

लाला जब गिरा ......तब थोड़ा ही रोया होगा .........फिर देखते ही देखते वो पलट गया ............फिर कोशिश करते हुये सिर उठाया ...........सब लोग देख रहे हैं.........ये आनन्द देवों को भी दुर्लभ था ........जो इस समय गोकुल वासी ले रहे थे ...........हाँ तात ! दुनिया को चलानें वाला आज चलना सीख रहा था .......ये अद्भुत लीला थी ब्रह्म की ।

अपनें दोनों नन्हें नन्हे घुटनों को उठाया और चल पड़े कन्हैया घुटवन घुटवन ........नेत्रों से आनन्द के अश्रु छलक पड़े थे नन्द दम्पति के ।

आगे कहाँ जाएगा ........भीड़ तक गया लाला ......जब भीड़ देखी सामनें तो मुँह बनाकर रोनें लगा .....गोप गोपियों की भीड़ .रोते कन्हैया को देखकर भी आनन्दित है .....क्यों कि इसका रोना भी अद्भुत है ....ये और सुन्दर लगता है , मुँह बनाकर रोते हुए ........पीछे से मैया नें आवाज दी ....लाला ! लाला ! लाला ! आवाज सुनते ही मुड़ा कन्हैया ...........अपनी मैया को देखा तो ख़ुशी से उस तरफ ही चल पड़ा ............बृजरानी दौड़ पडीं .......और अपनें लाला को गोद में ले ही लिया ...........लाला के मुख को चूमती रहीं यशोदा मैया ............ इस दृश्य को देखकर सब मुग्ध थे ....मुग्ध गोकुल वासी ही नही ..........देवता भी मन्त्र मुग्ध हो रहे थे ।

"कान्हा चलनें लगे , कान्हा चलनें लगे"

गोपियाँ नृत्य कर रही हैं.........

उनको देखकर स्वर्ग कि अप्सरायें भी नाच रही थीं..........

"रुनझुन झनके पैजनियाँ कान्हा चलनें लगे , कान्हा चलनें लगे"

तात विदुर जी ! इस रूप सुधा का पान कीजिये ..........

उद्धव स्वयं डूब गए थे ........वही बाल कृष्ण कि छबि उनके हिय में प्रकट हो गयी थी ।

क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

02/10/2026

. *श्रीमद्भगवद्गीता से*
_*मनुष्य की सर्वोच्च उपलब्धि*_
_*यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।*_
_*सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।।*_
( गीता, ४.२२ )

अर्थात् जो ( कर्मयोगी ) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्या से रहित, द्वन्द्वों से अतीत तथा सिद्धि और असिद्धि में सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।

यह एक तथ्य है कि मनुष्य सब कुछ यहीं एकत्रित करता है और सब कुछ यहीं छोड़कर सहसा चला जाता हैं। यदि सब कुछ छूटना है तो हम उसे स्वयं ही छोड़ दें अर्थात् उसके ममत्व, स्वामित्व और आसक्ति के भाव को छोड़कर भार मुक्त हो जायें।

सब धन परमात्मा का ही है। अतः 'इदं न मम' ( यह मेरा नहीं है। ) की भावना को शिरोधार्य करके धन का उपभोग एवं सदुपयोग करना सब प्रकार से श्रेष्ठ है।

निश्चय ही आत्मज्ञान की अपेक्षा धन अत्यन्त तुच्छ है।

बृहदारण्यक उपनिषद् में मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य ऋषि से पूछा, “यदि यह धन से सम्पन्न सारी पृथ्वी मेरी हो जाये तो क्या मैं अमर हो सकती हूँ?”

याज्ञवल्क्य ने कहा,”भोग-सामग्रियों से सम्पन्न मनुष्यों का जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा जीवन भी हो जायेगा। धन से अमृतत्व की तो आशा ही नहीं।”
*अमृतत्वस्य नाशास्ति वित्तेन।*

मैत्रेयी ने कहा, “जिससे मैं अमृता नहीं हो सकती, उसे लेकर क्या करूँगी? मुझे तो अमृतत्व का साधन बतलायें।”
*येनाहं नामृतास्यां किमहं तेन कुर्याम्?*
*यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहि।*

जीवन का उद्देश्य तो अमृत स्वरूप आत्मा को जानकर अमृतत्व प्राप्त करना है। उपनिषदों में अनेक स्थलों पर अमृतत्व की चर्चा है। जीवन काल में आत्मतत्त्व को जानकर अमृतत्व प्राप्त करना ही उत्तम धन है।
यही मानव की सर्वोच्च उपलब्धि भी है।

हरे कृष्ण

भाग ७९३              *श्रीरामचरितमानस*                          *प्रथम सोपान*                          *बाल-काण्ड*      ...
02/10/2026

भाग ७९३
*श्रीरामचरितमानस*
*प्रथम सोपान*
*बाल-काण्ड*
*दोहा सं० २९८*
*(चौपाई सं० ५ से ८ एवं दोहा)*

भरतजी ने कैसे घोड़े तैयार करवाये हैं, अब उनकी विशेषता बतलाते हैं –
*सुभग सकल सुठि चंचल करनी ।*
*अय इव जरत धरत पग धरनी ॥५॥*
*नाना जाति न जाहिं बखाने ।*
*निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने ॥६॥*
⛳ शब्दार्थ - *अय* (अयस्) = लोहा। *छयल* (छैल) = बने-ठने, रंगीले।
*अर्थ* – सब घोड़े बड़े ही सुंदर और चंचल करनी (चाल) के हैं। वे धरती पर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहे पर रखते हों। अनेकों जाति के घोड़े हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। (ऐसी तेज चाल के हैं) मानो हवा का निरादर करके उड़ना चाहते हैं।
👉 _*'सुभग सकल सुठि...'*_ – 'सुभग' शब्द 'सुन्दरता' और सुन्दर ऐश्वर्य दोनों अर्थो का यहाँ बोधक है। घोड़े सुन्दर हैं और ऐश्वर्ययुक्त हैं। अर्थात् अनेक आभूषणों को धारण किये हुए हैं। 'सकल' दोनों ओर लगता है। सभी सुन्दर हैं और सभी की करनी चंचल है। 'सुठि' कहकर दर्शाया है कि और घोड़े भी चंचल होते हैं पर, ये 'अत्यन्त चंचल' हैं।
👉 _*'सुठि चंचल करनी'*_ अर्थात् चलने में, कूदने में, नाचने में और दौड़ने में बहुत ही तेज हैं। चंचल करनी का आगे दृष्टान्त देते हैं – *'अय इव...'*।
👉 _*'नाना जाति न जाहिं बखाने '*_ – संसार में तीन स्थल हैं-जल, थल, और नभ तीनों का हाल कहते हैं। थल में जलते हुए लोहे (पर पैर धरने) के समान पैर धरते हैं ( *'अय इव जरत।'*), पवन का निरादर कर आकाश में उड़ना चाहते हैं और जल में थल की तरह चलते हैं‌
*'नाना जाति न जाहिं बखाने'* अर्थात् अनेकों जाति के हैं, बखाने नहीं जा सकते, यह कहकर भी कुछ जाति का संकेत भी कर दिया है। *'अय इव जरत धरत पग धरनी'* ये 'जमावटि' हैं। *'निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने'* ये 'कुदैती' हैं। *'निदरि पवनु'* से दर्शाया है कि ये पवनवेगी घोड़े हैं। इसी प्रकार यहाँ जलचर, थलचर, नभचर तीन जाति के भी दरसा दिये, यथा – *'अय इव जरत धरत पग धरनी'* से थलचर; *'निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने'* से नभचर और *'जे जल चलहिं'* (अगले दोहे की सातवीं चौपाई में) से जलचारी। *'जे जल चलहिं'* ये दरियायी घोड़े हैं।
👉 _*'जनु चहत उड़ाने'*_ – भाव यह है कि उड़ना चाहते हैं, पर उड़ने नहीं पाते, क्योंकि सेवक उन्हें थामें हुए हैं।
*तिन्ह सब छयल भए असवारा ।*
*भरत सरिस बय राजकुमारा ॥७॥*
*सब सुंदर सब भूषनधारी ।*
*कर सर चाप तून कटि भारी ॥८॥*
अर्थ – उन सब घोड़ों पर भरतजी के समान अवस्था वाले सब छैल-छबीले राजकुमार सवार हुए। वे सभी सुंदर हैं और सब आभूषण धारण किए हुए हैं। उनके हाथों में बाण और धनुष हैं तथा कमर में भारी तरकस बँधे हैं।
👉 _*'तिन्ह सब छयल भए असवारा'*_ – 'सब छयल' अर्थात् छैलों को छोड़ अन्य अवस्थावाले इन पर सवार नहीं हुए।
👉 _*'भरत सरिस बय'*_ का भाव यह है कि जब भरतजी घोड़े पर सवार हुए तब उन्होंने अपने समान अवस्थावाले राजकुमारों को अपने साथ लिया। यह राजाओं की चाल है। वे अपने रूप और अवस्था के समान पुरुषों को खोजकर संग में रखते हैं। *'छयल'* से सभी की किशोर अवस्था सूचित की है। *'भरत सरिस'* से यह दर्शाया है कि सबके आगे भरतजी की सवारी निकली; क्योंकि राजा की आज्ञा है कि शीघ्र चलो। अतः भरतजी ने सोचा कि हमारे आगे चलने से सब शीघ्रता करेंगे। यहाँ सब छैले हैं, क्योंकि भरतजी के साथवालों का वर्णन है। अपनी-अपनी अवस्था इत्यादिवाले एक साथ रहते हैं. तभी शोभा होती है।
👉 _*'तून कटि भारी'*_ – भारी तरकश है अर्थात् उसमें बहुत बाण भरे हुए हैं। बहुत बाणों से भरा भारी तरकश लेने का तात्पर्य यह है कि सब सुन चुके हैं कि जनकपुर में तीनों लोकों के वीरों का मान भंग हुआ है, न जाने विवाह के समय कौन वीर कहाँ से युद्ध के लिये आ जाय, इसीलिये सब साधन साथ हैं। पुनः, इनको छरे, छबीले और छैला कह आये हैं, इसमें संदेह हो सकता है कि. ये सब बड़े कोमल और सुकुमार होंगे, अतः *'कर सर चाप तून कटि भारी'* कहकर दर्शाया है कि ये वीर हैं। राजा ने तो इतना ही कहा था – *'हय गय स्यंदन साजहु जाई ।....'* तथापि यह सब भरतजी की सावधानता है।
।। दोहा ।।
*छरे छबीले छयल सब, सूर सुजान नबीन ।*
*जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन ॥२९८॥*
⛳ शब्दार्थ – *छरे* = छटे हुए, चुने हुए। *छबीले* = छबि व शोभायुक्त, बाँके, कान्तिमान्।
*अर्थ* – सभी चुने हुए छबीले छैल, शूरवीर, चतुर और नवयुवक हैं। प्रत्येक सवार के साथ दो पैदल सिपाही हैं, जो तलवार चलाने की कला में बड़े निपुण हैं।
👉 _*'छरे छबीले छयल सब सूर..'*_ – जो ऊपर *'तिन्ह सब छयल भए असवारा'* कहा है, वे ही *'छरे छबीले'* हैं। पूर्व के वर्णन को यहाँ स्पष्ट करते हैं :–
(१) भरत सरिस वय है। कौन वय है ? – नवीन ।
(२) राजकुमार हैं। इसीलिये *'छरे'* कहा। अर्थात् छाँटकर सब राजकुमारों को ही संग में लिया है, दूसरी जाति को नहीं।
(३) सुन्दर हैं, इसीलिये *'छबीले'* हैं।
(४) भूषणधारी हैं, क्योंकि सब *'छैले'* हैं।
(५) *'कर सर चाप'* है, क्योंकि सब *'शूरवीर'* हैं।
(६) कटि में भारी तूणीर है, क्योंकि सब बाणों के प्रयोग में सुजान हैं।
यहाँ छ: विशेषण दिये गये, जो गुण ऊपर चौपाइयों में कहे, वे सब इस दोहे में एकत्र किये गये। यथा – पूर्व कहा कि *'भरत सरिस बय राजकुमारा'* उसकी जोड़ में यहाँ *'नवीन'*; पूर्व *'राजकुमार'* उसकी जोड़ में यहाँ *'छरे'*; पूर्व *'सब सुंदर'* यहाँ *'छबीले'*; पूर्व *'भूषन धारी'* और *'छयल भए असवारा'* कहा और यहाँ *'छयल'*; पूर्व *'कर सर चाप'* यहाँ *'सूर सुजान'*। *'सूर सुजान'* से दर्शाया है कि बाण चलाने में सब सुजान हैं, ऐसा नहीं कि अस्त्र का मन्त्र नहीं जानते हों।
👉 _*'जुग पदचर असवार प्रति'*_ – दो-दो पैदल साथ होने का भाव यह है कि एक तो घोड़े भारी हैं, जबर हैं, एक पैदल के सँभाले नहीं सँभले रह सकते, दूसरे जब सवार घोड़े से उतरे तब भी दो सेवक घोड़ा सँभालने के लिये चाहिये क्योंकि ये अत्यन्त चंचल हैं अथवा, एक घोड़े को थामे सँभालेगा और एक मालिक की सेवा में रहेगा।
*श्रीराम – जय राम – जय जय राम*

.             *श्री राधा लीलामृतम् - भाग ६०*श्रीराधा की अष्ट सखियाँ हैं .......... और उन अष्ट सखियों की भी अष्ट सखियाँ ह...
01/10/2026

. *श्री राधा लीलामृतम् - भाग ६०*
श्रीराधा की अष्ट सखियाँ हैं .......... और उन अष्ट सखियों की भी अष्ट सखियाँ हैं ........... मुस्कुराते हैं महर्षि !

विचित्र बात है ...... कृष्ण के साथ ये सोलह का अंक जुड़ा हुआ है ..... और बहुत गहरा जुड़ा है .......... गोपियां कितनी ? सोलह हजार ... पत्नियाँ कितनी सोलह हजार ........ कृष्ण में कलाएं कितनी ? सोलह कलाएं ..... अच्छा श्रृंगार में श्रृंगार कितनें ? सोलह ।

कर्मकाण्ड में पूजा करनें के उपचार कितनें - सोलह ।

*और आश्चर्य ! वज्रनाभ ! यह हमारे शरीर का पूरा पिण्ड ...... पांच ज्ञानेन्द्रियां और पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन ..... पूरे हुए सोलह ।*

पर कृष्ण बड़े विलक्षण हैं .........वे सब को एक कर देते हैं .........सोलह को एक ही करके मानते हैं .......... सारे अनुमानों को गड़बड़ कर देते हैं .....सारे अनुमानों से मुक्त हो वे केवल एक पुकार बन जाते हैं अंतिम में .... ब्रह्म .....बस एक .... कृष्ण .. बस एक .......पर वो भी तड़फ़ उठता है .....पुकारनें लगता है ..... और वह पुकारता है अपनें आपको ....... वो "अपना" कौन ? वह अपना ....अपनी .....श्रीराधा ही हैं ।

सब सोलहों को .....जो पूर्ण है..........पर उन सबको एक करते हुए ..........वो अपनें में ही रमनें के लिये बैचेन हो उठता है ......... जो अपना ही है .......... अपनें में ही है ....... इतनी भी दूरी नही है .........उसी से फिर मिलनें के लिये मण्डप रचता है .........सेज सजाता है ........ अपनें से ही प्रकट करता है ......... फिर उसी से एक हो जाता है ....अपनें में समेट लेता है ........... बोलते बोलते महर्षि स्वयं खो रहे हैं ।

तभी एक दिव्य रथ आकर रुकता है ............

वज्रनाभ देखते हैं ......ओह ! ये तो हस्तिनापुर नरेश परीक्षित हैं ।

महर्षि, परीक्षित को देखकर आनन्दित होते हैं.........वज्रनाभ उठकर उनका स्वागत करते हैं ................

महर्षि के चरणों में सम्राट परीक्षित जब प्रणाम करते हैं ......तब आनन्दित हो महर्षि कहते हैं ......हे परम भागवत परीक्षित ! बहुत सुन्दर समय में आपका आना हुआ है ...... आज श्याम सुन्दर और उनकी आल्हादिनी श्रीराधा रानी का ब्याह महामहोत्सव है ........

इतना सुनते ही आनन्दित हो नाच उठते हैं परीक्षित .........उनके रोम रोम से प्रेम के परमाणु निकलनें लगते हैं .............

*राधा ! राधा ! राधा रासेश्वरी !*
*राधा ! राधा ! राधा ! कृष्ण प्राणेश्वरी !*

पर ये क्या ! "श्रीराधा लीलामृतम्" की दिव्य कथा में आज ........परम प्रेमी भक्त श्रीउद्धव जी महाराज का भी प्राकट्य होता है ...........साष्टांग प्रणाम करते हुए ........वे महर्षि को आग्रह करते हैं कि हमें उस दिव्य कथा का पान कराइये ...... वो कथा जो "अनादि दम्पति के ब्याह की कथा है" ..... परीक्षित उद्धव जी को प्रणाम करते हैं ......वज्रनाभ दोनों को प्रणाम करते हैं........आहा ! कितना सुन्दर वातावरण ....कितना प्रेम रस पूर्ण वातावरण का निर्माण श्रीधाम वृन्दावन की भूमि में हो रहा है.........महर्षि और अधिक उत्साह से आगे की कथा सुनानें लगते हैं ।

*****************************

आदि सृष्टा ब्रह्मा जी नें हाथ जोड़कर आल्हादिनी श्रीराधा रानी की स्तुति की ........श्रीराधारानी के सहस्र पवित्र नामों का अपनें चार मुख से उच्चारण करते हुए .......उनके चरणों में नमस्कार किया ।

मैं सृष्टा ब्रह्मा !

आप दोनों के ब्याह का विधान करने आया हूँ ........कृपा करें ।

मुस्कुराईं श्रीराधा रानी !

और अपनें प्राणधन श्यामसुन्दर की ओर देखा ।

मैं आपसे नाराज था विधाता ! ...... क्यों की आपनें मेरे ग्वालवालों का अपहरण किया था .......... पर आज मेरे हृदय की बात आपनें कही है ... तो मैं आपसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ ...... मेरी प्राण बल्लभा श्रीराधा रानी का कोई पूरा नाम भी नही ......मात्र "रा" भी कहे ....तो मैं उसके पीछे दौड़ पड़ता हूँ ..........और जब वह "धा" कह देता है .....तब तो मैं उसका ही होकर रह जाता हूँ ...............फिर आपनें हमारे ब्याह करानें की बात जो कही है ..........इससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ .......

ठीक है .....आप ही ब्याह कराइये ..........

इतना सुनते ही ..........ब्रह्मा जी आनन्द से भर गए ।

अच्छा ! कन्यादान कौन करेगा ?
बड़ी विनम्रता से ब्रह्मा जी नें श्याम सुन्दर से ही पूछा था ।

पर इस रस में ब्रह्मा का ज्यादा विघ्न देना सखियों को अच्छा नही लगा ..... ललिता सखी बोल पडीं .............पण्डित जी ! मन्त्र पढ़ो तुम तो बस ........इधर उधर करनें की सोचना भी मत ........ तुम्हे मन्त्र पढ़ा रहे हैं ..........यही बहुत है .... कन्या दान किसे करना है ........क्या करना है .........इस सब के लिये हम हैं !

ब्रह्मा जी नें सखियों को हाथ जोडा और चुप हो गए ।

जिस के संकल्प से सम्पूर्ण सृष्टि बन जाती है .......वो ब्रह्मा स्वयं ब्याह करानें के लिये बैठ गए हैं ...........

पर रँग देवि सुदेवी सखियों नें आकर "श्रीजी" का हाथ पकड़ा ....और बोलीं आप चलिये ! पहले आपको देवी की पूजा करनी है ।

ये क्या कह रही हो .........इनसे बड़ी देवी और कौन हैं ?

ब्रह्मा जी नें बीच में बोलनें की कोशिश की .........पर सखियों नें उन्हें चुप कर दिया .......आप न बोलो ज्यादा ।

पर मैं वैदिक रीती का पक्षधर हूँ !
ब्रह्मा जी नें श्याम सुन्दर से कहा।

धरो अपनें पास अपनी वैदिक रीती !
.....हम तो "प्रेम रीती" को भी महत्व देंगी ।

इतना कहकर "श्रीजी" का हाथ पकड़ , बड़े प्रेम से सखियों नें उठाया।

दूर कुञ्ज में ले गयीं ..........वहाँ एक देवी का विग्रह था .......

दुल्हन को पहले देवि पूजनी ही चाहिये ................

पर ये कौन सी देवि हैं ?

ललिता सखी नें कहा.....ये "नेह की देवि" हैं ....यानि ये प्रेम की देवि ।

"श्री जी" नें उन प्रेम की देवि को ..... बड़े प्रेम से पूजा ............बिधि पूरी की .......फिर धीरे धीरे श्रीजी को लेकर आईँ उसी ब्याह मण्डप में।

रतन चौकी में दोनों विराजें हैं ....... पाग पहनें हुए हैं श्याम सुन्दर ..... मोर पंख उस पाग में शोभा पा रहा है .......... चन्द्रिका श्रीजी के माथे में सुशोभित है ..........काजल सखियाँ लगा देती हैं .......ताकि किसी की नजर न लगे इस दोनों दूल्हा दुल्हन को ..............

*ये दोनों इतनें सुन्दर लग रहे हैं कि इनकी शोभा देखकर ब्रह्मा भी वेद विधि और वेद मन्त्रों को भूल जाते हैं तब सखियाँ ही ब्रह्मा को वेद मन्त्र याद दिलाती हैं या स्वयं पढ़नें लग जाती हैं।*

अग्नि देव स्वयं प्रकट हो गए हैं वेदी में ..................

"आहा ! देखो ! सखी ये दोनों कितनें सुन्दर लग रहे हैं ............ सच में कहूँ तो इनको देखना ही इन नयनों की धन्यता है ........... सखियां दूल्हा दुल्हन को देख देख कर ..........मुग्ध हो जाती हैं ।

"गठ जोर" करो.....ब्रह्मा जी के कहनें से पहले ही सखियाँ तैयार थीं ।

"गठ जोर" किया ललिता सखी नें ...........फिर लाल जू की ओर देखकर सजल नयन बोलीं ....... "हमारी लाली को कभी छोड़ना नही"

भाँवरि पड़नें लगी .....मन्त्र पढ़ रहे हैं .....ब्रह्मा जी .........गीत गा रही हैं सखियाँ .............

*देखो ! देखो ! भाँवरि लेते हुए दोनों कितनें दिव्य लग रहे हैं........ सखियों ! इस छबि को अपनें हिय में बसाओ ........ यही हमारे जीवन धन हैं ..... यही हमारे सर्वश्व हैं ।*

पर एक सखी से रहा नही गया ........ वो चँवर ले उठी ....... और भाँवरि देते हुए "लाडिली लाल"" के पीछे पीछे चँवर ढुराते हुए चलनें लगी ।

इस छबि को ब्रह्मा देखते हैं तो बिधि भूल जाते हैं ..........इक टक बस इन दोनों को देखते ही रह जाते हैं .......सखियों को ही कहना पड़ता है ......"अब ये करो विधाता .....अब वो करो" !

ललिता सखी आगे आयीं............. अब कन्यादान !

"मैं करूंगी कन्यादान"

पर चरण प्रक्षालन का अधिकार मुझे भी मिलना चाहिये .......... ब्रह्मा मचल कर बोले थे ललिता सखी से ।

श्याम सुन्दर के हाथ काँप रहे हैं ........काँप तो लाली के भी रहे हैं ।

ललिता सखी नें अपनी लाली का हाथ लाल जू श्यामसुन्दर के हाथों में जब दिया......ललिता सखी रो गयी ....".हमारी लाली बहुत भोरी हैं ......इनका ध्यान रखना लाल ! "

सिन्दुर दान के समय तो ....... श्याम सुन्दर की दशा देखनें जैसी थी.....सखियों नें सम्भाला था उन्हें .........वो बार बार अपनी देह दशा भूल रहे थे ........... सखियाँ तो सब सिद्धा हैं .......... कोई साधारण तो हैं नहीं .........वो सब अपनें आपको सम्भाले हुए हैं ......सेवा में ही इनका ध्यान रहता है ..........सेवा में मिलनें वाले "आनन्द" को भी ये ठुकराते हुए चलती हैं ........यही तो विशेषता है इन सखियों की ........ तभी तो ये "श्रीजी" की सहचरी हैं।

हे वज्रनाभ ! उद्धव ! परीक्षित ! एक गम्भीर बात जो इस ब्याह में घटित हुआ वो सुनो .......... महर्षि बोले ।

ब्रह्मा जी मूर्छित हो गए .........जब वो चरण धोनें लगे थे ...........उस समय वो पुरोहित के रूप में नही थे ..............और जैसे ही चरण धोनें लगे ..........तभी आनन्द की अतिरेकता के कारण वे मूर्छित हो गए ।

तब ललिता सखी नें एक रहस्य की बात ब्रह्मा के कान में कही थी .......

हे ब्रह्मा जी ! ये नेह की वीथी है .....ये प्रेम का मार्ग है ......इसमें अपनें आपको सम्भालना पड़ता है .......तनिक चूक से सब कुछ बिगड़नें का डर रहता है ...........हे ब्रह्मा जी ! आप अपना सुख देख रहे हैं ......आपको चरण धोते हुए आनन्द आरहा है .....तो आप उसी आनन्द में डूब रहे हैं ........पर जानते हो .......इस प्रेम मार्ग में "स्वयं के आनन्द में डूबना" ये भी उचित नही माना जाता ........... क्यों की ये भी स्वार्थ है ....हमनें अपनें आनन्द को महत्व दिया ...... पर हमें अपनें आनन्द को नही, अपनें प्रिया प्रियतम के आनन्द को महत्व देना है ।

ओह ! ऐसी प्रेम रहस्य की बात जब ब्रह्मा जी नें सुनी ......तो उनकी बुद्धि चकरा गयी........वो उठे ......उन्होंने युगल सरकार के चरणों में प्रणाम किया ........फिर सखियों को भी हाथ जोड़ा .।

मुझे इस रस महोत्सव में सम्मिलित करनें के लिये आप सब सखियों का बहुत बहुत धन्यवाद ..........हे युगलवर ! इस रस को पानें का मैं कहाँ अधिकारी ? ........मैं बुद्धिजीवी .....पर ये रस बुद्धि से परे है .....इसके द्वार तो हृदय से ही खुलते हैं .............

दक्षिणा माँगो ! पण्डित जी !

सखियों नें हँसते हुए कहा ।

क्या ब्याह सम्पन्न हो गया .....?

ब्रह्मा जी नें सखियों से पूछा ।

ब्याह अभी कैसे सम्पन्न होगा ?

पर आपकी वैदिक विधि सम्पन्न होगयी ।

हमारी "नेह विधि" तो चलती रहेगी ।

*ब्रह्मा जी नें अपनें चारों मस्तक धरती में रखकर प्रणाम किया । "आप दोनों के चरणों में अविचल भक्ति हो " यही मेरी दक्षिणा है। मुस्कुरा कर श्रीराधा माधव नें ब्रह्मा जी को देखा और दिया।*

ब्रह्मा जी तो चले गए
...पर सखियों की "नेह विधि" अब शुरू हो गयी थी ।

"तैसिये रूप माधुरी अंग अंग, तैसिये दुहुँन के नैंन विशाल"

चारों ओर आनन्द छा रहा था ...........आनन्द की धारा में बह रहे थे सब ...........महर्षि , वज्रनाभ , परीक्षित और उद्धव जी।

"तैसिये चतुर सखी चहुँ ओरैं, गावत राग सुहाग रसाल

राधा दुल्हन दूल्हा लाल"

क्रमशः
*जय जय श्री राधे राधे*

भाग ७९२             *श्रीरामचरितमानस*                          *प्रथम सोपान*                          *बाल-काण्ड*       ...
30/09/2026

भाग ७९२
*श्रीरामचरितमानस*
*प्रथम सोपान*
*बाल-काण्ड*
*दोहा सं० २९८*
*(चौपाई सं० १ से ४ तक)*

पूर्व दोहे (२९५) में कहा गया था कि श्रीदशरथजी ने महल में जाकर रनवास को बुलाया और उन्हें जनकपुर की चिट्ठी को पढ़कर सुनाया। फिर यह कहकर कि यह सब 'मुनि की कृपा' का फल है, वे राजद्वार पर आ गये :–
*भूप भरत पुनि लिए बोलाई ।*
*हय गयस्यंदन साजहु जाई ॥१॥*
*चलहु बेगि रघुबीर बराता ।*
*सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता ॥२॥*
अर्थ – फिर राजा ने भरतजी को बुला लिया और कहा कि जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजी की बारात में चलो। यह सुनते ही दोनों भाई (भरतजी और शत्रुघ्नजी) आनन्दवश पुलक से भर गये।
👉 _*'भूप भरत पुनि लिये बोलाई'*_ – 'उन्होंने भरतजी को बुलवाया' इससे पाया गया कि जब राजा रनवास में गये तब भरतजी का साथ छूट गया था। वे राजा के साथ भीतर मर्यादा का विचार करके नहीं गये कि माता-पिता एकत्र होंगे, स्नेह की कोई बात हमारे सामने करने में संकोच करेंगे, क्योंकि अब सयाने हो गये हैं। साथ होते तो बुलाना नहीं कहते।
👉 _*'हय गय स्यंदन साजहु जाई'*_ – चतुरंगिणी सेना में से यहाँ घोड़े, हाथी और रथ ये तीन ही कहे, पैदल को नहीं कहा। क्योंकि चतुरंगिणी के यही तीन अंग साजे जाते हैं, पैदल तो स्वयं ही आज्ञा पाते ही सज जाते हैं, घोड़ों आदि को सजाना पड़ता है। गुरुजी की आज्ञा है कि *'सजहु बरात बजाइ निसाना'*, वही आज्ञा राजा भरतजी को दे रहे हैं। हाथी, घोड़े और रथों का सजाना ही 'बरात का' सजाना है, यह बात यहाँ स्पष्ट की।
👉 _*'चलहु बेगि....'*_ – *'बेगि'* कहने की शृंखला (सिलसिला/क्रम) श्रीगुरुजी से शुरू हुई है। प्रथम गुरु की आज्ञा राजा को हुई कि *'चलहु बेगि'*। इसीलिये राजा ने श्रीभरतजी को *'बेगि'* चलने की आज्ञा दी। *'रघुबीर'* शब्द से स्पष्ट होता है कि दशरथजी के अन्तश्चक्षु को श्रीरामजी की 'कीरति करनी' अभी तक दिखायी पड़ रही है। इस शब्द से वे जानते हैं कि बारात ऐसी सजानी चाहिये जो रघुवंशी वीरों के योग्य हो। भरतजी इस आशय को समझ गये।
👉 _*'सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता'*_ – प्रथम श्रीराम-लक्ष्मणजी का कुशल-समाचार सुनकर आनन्द हुआ था, यथा – *'सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता । अधिक सनेह समात न गाता ॥'*; अब बारात चलने की आज्ञा सुनकर आनन्द हुआ कि अब चलकर दोनों भाइयों का दर्शन होगा; प्रथम भरतजी ने विचारा कि दो भाई उधर हैं और शत्रुघ्नजी लड़के हैं, ऐसा न हो कि महाराज हमें यहाँ छोड़ें कि कोई यहाँ अवश्य चाहिये। पर जब *'चलहु'* कहा, तब बड़ा आनन्द हुआ, शरीर भरपूर पुलकायमान हो गया। *'दोउ भ्राता'* कहने से पाया गया कि भरतजी के साथ-ही-साथ शत्रुघ्नजी भी आये। ये उनके अनुगामी हैं, सदा साथ रहते ही हैं।
*भरत सकल साहनी बोलाए ।*
*आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए ॥३॥*
*रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे ।*
*बरन बरन बर बाजि बिराजे ॥४॥*
⛳ शब्दार्थ – *साहनी* = हाथी-घोड़े-रथ के दारोगा । *रुचि* = रुचिर, रुचिकर, चमचमाती हुई।
अर्थ – भरतजी ने सब साहनी बुलाये और उन्हें (घोड़ों को सजाने की) आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े। उन्होंने रुचि के साथ (यथायोग्य) जीनें कसकर घोड़े सजाये। रंग-रंग के उत्तम घोड़े शोभित हो गये।
👉 _*'सकल साहनी'*_ अर्थात् घोड़ों के साहनी, हाथियों के साहनी और रथों के साहनी, सभी के साहनियों को बुलाया।
👉 _*'आयसु दीन्ह'*_ – क्या आज्ञा दी यहाँ यह नहीं कहा, क्योंकि राजा की आज्ञा में उसे स्पष्ट कहा ही है, अतः *'हय गय स्यंदन साजहु जाई'* यह आज्ञा भरतजी ने भी दी।
👉 _*'मुदित'*_ – साहनी भी मुदित हुए, क्योंकि यह बात ही बड़े हर्ष की है, जो सुनता है वहीं हर्षित होता है। यथा –
*'सभा समेत राउ अनुरागे'*,
*'प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी'*,
*'सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे'*,
*'सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता'*, और
यहाँ *'आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए'*, इत्यादि।
👉 _*'उठि धाए'*_ से दर्शाया है कि भरतजी ने घोड़े आदि शीघ्र ही सजाने की आज्ञा दी। गुरु ने राजा को, राजा ने भरतजी को और भरतजी ने साहनी लोगों को शीघ्रता करने की सिलसिलेवार आज्ञा दी।
👉 _*'रचि रुचि जीन'*_ – यहाँ 'रुचि' से 'रुचिर' समझना चाहिये। 'रुचि' के दोनों अर्थ यहाँ गृहीत होंगे। एक तो 'सुन्दर शोभा के अनुकूल, फबती हुई, योग्य, चमकदार और दूसरे अपनी-अपनी रुचि की जीन । अर्थात् जिस घोड़े पर जो खिले, फबै, वही उस पर अच्छी तरह सजाकर लगाते हैं।
👉 _*'तुरग'*_ – यहाँ घोड़े को 'तुरग' नाम देकर शीघ्रता दरसायी है। 'तुरग' का भाव यह है कि जो 'तुर (तुरा, त्वरा वा वेग) से गमन करे' अर्थात् शीघ्रगामी घोड़े। इसी शीघ्रता को आगे चौ० ६ में *'निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने'* से पुष्ट किया है। यहाँ शीघ्रता का काम है, इसलिये घोड़ों के साज का वर्णन इतने में ही कर दिया। *'रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे'* इतना ही यहाँ कहा, क्योंकि आगे दोहा सं० ३१६ में जब श्रीरामजी घोड़े पर सवार होंगे तब इनका साज-श्रृंगार विस्तृतरूप से वर्णन करेंगे।
*श्रीराम – जय राम – जय जय राम*

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