25/05/2026
भाग ७२८
*श्रीरामचरितमानस*
*प्रथम सोपान*
*बाल-काण्ड*
*दोहा सं० २७४*
*(चौपाई सं० १ से ४ तक)*
*श्रीपरशुराम—प्रसंग*
*(भाग – २१)*
श्रीपरशुरामजी विश्वामित्रजी से कहते हैं —
*कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु ।*
*कुटिल कालबस निज कुल घालकु ॥१॥*
*भानु बंस राकेस कलंकू ।*
*निपट निरंकुस अबुध असंकू ॥२॥*
*काल कवलु होइहि छन माहीं ।*
*कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं ॥३॥*
*तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा ।*
*कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा ॥४॥*
अर्थ – हे विश्वामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, काल के वश होकर यह अपने कुल का घातक बन रहा है। यह सूर्यवंश रूपी पूर्ण चन्द्र का कलंक है। यह बिल्कुल उद्दण्ड, मूर्ख और निडर है। अभी क्षण भर में यह काल का ग्रास हो जायेगा। मैं पुकारकर कहे देता हूँ, फिर मुझे दोष नहीं है। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो।
👉 _*'कौशिक सुनहु'*_ – विश्वामित्रजी से क्यों कहा? इसका कारण यह है कि –
(१) श्रीजनकजी पर क्रोध है, इसलिये उनसे नहीं कहते, और श्रीरामजी से यह समझकर नहीं कहा कि वे भी तो लड़के ही हैं, उनके डाँटने एवं मना करने से यह नहीं मानेगा। दूसरे, परशुरामजी ने अभी श्रीरामजी की वाणी अच्छी तरह नहीं सुनी है, इसलिये इनका स्वभाव भी अभी नहीं जानते, बिना सुने-जाने कैसे कहते ?
(२) रह गये विश्वामित्रजी, सो ये दोनों लड़कों को लेकर स्वयं आकर इनसे मिले थे और इन्होंने दोनों लड़कों से इनके चरणों में प्रणाम कराया था, अतएव निश्चय है कि इनका कहना लक्ष्मणजी अवश्य मानेंगे, यह समझकर उनसे कहा। पुनः,
(३) 'कौशिक' सम्बोधन का भाव यह भी है कि 'जब हम कुशवंशियों को मारने लगे थे तब तुमने कितनों को ही अपने कुल के सम्बन्ध से बचाया था, इसलिये इस बालक के लिये भी जो तुम्हें पुनः प्रार्थना करनी हो तो इसे निवारण (मना) करो, नहीं तो फिर हम इसे क्रोध में नहीं छोड़ेंगे।'
(४) कौशिकजी से कहने का एक कारण यह भी है कि ये दोनों कुमारों को दशरथजी से माँग लाये थे। यदि राजकुमार मार डाला गया तो इनको कलंक लगेगा, इनकी प्रतिष्ठामें धब्बा लग जायगा। अतः ये उसे अवश्य चुप करेंगे।
बात तो यह है कि लक्ष्मणजी से बातों में जीत नहीं सके, कुछ उत्तर नहीं बन पड़ा, तब उधर झुके, उनसे पुकार की।
श्रीप्रज्ञानानन्द स्वामीजी — परशुरामजी का मन लखनलाल से (न तो वाग्युद्ध में और न शस्त्रास्त्रायुध युद्ध में विजय पाने की निराशा होने पर) अपनी हार स्वीकृत करने को तैयार नहीं है। वे इधर से उधर, उधर से इधर फिर-फिर के कुछ-न-कुछ आधार पकड़कर अपनी जीत सिद्ध करने का विफल प्रयत्न कर रहे हैं। जैसे- जैसे विफलता बढ़ती है, वैसे-वैसे कोप-कृशानु भी अधिक धधकता जाता है। एक पर कोप का कार्य न होता देख दूसरे पर! कैसा मानवी प्रकृति का विचित्र, यथार्थ चित्रण है!
👉 लक्ष्मणजी ने परशुरामजी को उत्तर-प्रत्युत्तर में ऐसा फँसाया कि रामजी को धनुष-भंग-कर्ता जानने पर भी वे रामजी की ओर नहीं घूम सके लक्ष्मणजी से ही जी छुड़ाना कठिन हो गया। तब उनके (श्रीराम-लक्ष्मणजी के) अभिभावक विश्वामित्रजी से कहने लगे कि यह बालक मन्द है, वह मन्द नहीं जिसने धनुष तोड़ा है। लक्ष्मणजी ने आठ चौपाइयों में ( *'अहो मुनीस महा भटमानी'* से लेकर *'व्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा'* तक) आठ बातें कहीं, उन्हीं आठ बातों को दृष्टिमें रखकर परशुरामजी उन्हें आठ विशेषणों से क्रमशः विशेषित करते हैं – (१) मंद, (२) कुटिल, (३) कालबस, (४) निजकुल घालकु (५) भानुबंस राकेस कलंकू (६) निपट निरंकुसु (७) अबुध (८) असंकू ।
विभिन्न विशेषणों का भाव –
(१) *मंद* – बड़े का अपमान करता है, अतः मंद है।
(२) *'कुटिल'* का भाव यह है कि इसके सब वचन प्रलाप के हैं। अतः बहुत अभिमान है। स्वयं वीर बनता है और जो हमने सहस्रबाहु आदि कितने ही क्षत्रियों को मारा उनको फूँक बताता है, हमको वीर नहीं मानता, कोरा ब्राह्मण कहता है और कहता है कि धनुष-बाण-कुठार न बाँधो। पुनः, स्वयं तो धर्मात्मा बनता है, कहता है कि मेरा कुल ब्रह्मण्य है और साथ ही हमारा सिर काट डालने को तैयार है, आप वीर बनकर हमसे बड़ा बनना चाहता है, इत्यादि सब कुटिलता है।
(३) *'कालबस'* है, क्योंकि सँभालकर नहीं बोलता, जिह्वा पर लगाम नहीं है, मेरे कुठार को तर्जनी समझ रहा है। पुनः, हम जो क्षत्रियों के लिये काल हैं, उन्हीं से वाद-विवाद करता है, अतः जाना गया कि कालवश है।
(४) *'निजकुल घालकु'* – भाव यह है कि कटुवादी होने से इसका तो वध होगा ही, पर इसके कटु वचनों के कारण इसके कुल का नाश होगा। तात्पर्य यह है कि हम इसको मारकर फिर इसके वैर से इसके सारे कुल का नाश करेंगे, जैसे सहस्रबाहु के वैर से क्षत्रियमात्र का नाश किया। जैसे लक्ष्मणजी ने *'भृगुसुत समुझि'* कहा, वैसे ही उसकी जोड़ में परशुरामजी ने 'निजकुल घालकु' कहा। लक्ष्मणजी भृगुवंशी समझकर नहीं मारते और इन्हें 'सूर्यवंश' का खयाल है।
(५) *'भानुबंस राकेस कलंकू'* – *'निजकुल घालकु'* कहकर अब उसका हेतु कहते हैं कि भानुवंश राकेश है, निर्मल है; उसमें यह दोषरूप है। इसी के दोष से भानुवंश का नाश होगा। यह ब्राह्मण का अपमान करता है। ब्राह्मण अपमान से कुल का नाश होता है, यथा – *'जिमि द्विज द्रोह किए कुल नासा'*। ब्राह्मण का अपमान करने से भानुवंश के कीर्तिचन्द्र को मलिन कर रहा है। प्रथम लक्ष्मणजी ने आशय से दर्शाया था कि धनुषादि धारण करने से ब्राह्मणकुल छिप जाता है। अर्थात् शस्त्रास्त्र का धारण करना ब्राह्मणकुल को दूषित करता है; इसी पर परशुरामजी कहते हैं कि यह बालक कुल का नाशक और कुल का कलंक है।
(६) *'निपट निरंकुश '* – निपट अर्थात् भरपूर, बिल्कुल। बालपने से इसे किसी ने शिक्षा नहीं दी, इसीलिये हम अपना बल-प्रताप-रोष कहते हैं तो इसे ज्ञान नहीं होता। सुर, महिसुर, भक्तजन और गाय प्रातः स्मरणीय हैं, उन्हें दीन मानता है।
(७) *'अबुध'* है। स्वयं को मुझे वध करने की योग्यता मानता है और मुझसे पराजित होना भी अपने लिये लज्जाजनक समझता है।
(८) *'अशंक'* – अबुध है इसीलिये अशंक है। मेरे धनु-बाण-कुठार-धारण को व्यर्थ बतलाता है। इस भाँति यह बढ़-बढ़कर बोलता है। अपने को इतना बड़ा वीर मानता है कि मेरे शस्त्र बाँधने पर क्रोध दिखलाता है, कहता है – *'जो बिलोकि अनुचित कहेउँ...।'* भाव यह है कि बुद्धि हो तब तो हमारे स्वरूप का ज्ञान इसे हो, हमारा स्वरूप जानता तो शंका होती।
पुरुष की परीक्षा चार प्रकार से की जाती है – स्वरूप से, कुल से, संग से और कर्म से। परशुरामजी मंदादि विशेषण देकर लक्ष्मणजी को चारों प्रकार से दूषित दिखाते हैं। 'मंद, कुटिल, कालवश अर्थात् मृतक समान' कहकर अपने *स्वरूप से दूषित* कहा। 'भानुबंस राकेस कलंकू' और 'निजकुल घालकु' कहकर दर्शाया है कि इसने *कुल को दूषित* कर दिया। 'अबुध' से *संगदूषित* कहा अर्थात् इसने कभी बुद्धिमानों का संग नहीं किया और, 'निपट निरंकुसु' और 'असंकू' से *कर्म दूषित* दिखाये, तात्पर्य यह है कि स्वतन्त्र है, अपने मन का काम करता है।
👉 _*'काल कवलु...'*_ – भाव यह है कि समस्त संसार काल का कलेवा है, यथा – *'अग जग जीव नाग मुनि देवा । नाथ सकल जग काल कलेवा ॥'* तब यह तो उस काल के कौरभर को भी नहीं है। तात्पर्य यह है कि इसकी सब करनी देख लो, मेरा एक आघात सहने में भी समर्थ नहीं होगा। इसलिये पुकारकर कहे देता हूँ जिसे रोकना हो इसे रोको, नहीं तो मेरे हाथ से इसका वध हुआ ही चाहता है। पीछे मुझे कोई दोष न दे।
👉 _*'कहि प्रताप बल रोष हमारा'*_ – इससे सूचित करते हैं कि परशुरामजी अपने *प्रताप-बल-रोष* के अभिमान से परिपूर्ण हैं। पुनः, भाव यह है कि यह कहकर मना न करो कि ब्राह्मण हैं, जाने दो, अब कुछ न कहो, बल्कि हमारा *'बल प्रताप रोष'* कहकर इसका मुँह बंद करो, समझा दो कि अपने बल का अभिमान न करे कि धनुष तोड़ डाला।
*बल, प्रताप और रोष* क्या हैं? *'भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही'* – यह बल है। *'गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर ।'* फरसे की घोरता सुनकर रानियों के गर्भ गिर जाते हैं – यह प्रताप है। *'सहसबाहु भुज छेदनिहारा'* और *'बाल ब्रह्मचारी अति कोही । बिश्व बिदित क्षत्रियकुलद्रोही ॥'* यह रोष है।
*श्रीराम – जय राम – जय जय राम*