Pradeep Kumar

Pradeep Kumar ब्रजप्रेम, मुरारी, ब्रजबाला, मोहन, राधा

.          *श्रीकृष्ण लीलामृतम् - भाग ३१*बधाई हो !  बधाई हो ! नाचती गाती  गोपियाँ  लौट रही थीं नन्दालय से ।पूतना देख रही...
26/08/2026

. *श्रीकृष्ण लीलामृतम् - भाग ३१*
बधाई हो ! बधाई हो !

नाचती गाती गोपियाँ लौट रही थीं नन्दालय से ।

पूतना देख रही है ।

"धन्य हो गया ये गोकुल .......... आज छ दिन हो गए हैं यशोदा के लाला हुये .......... पर उत्सव अभी भी चल ही रहा है ......... कितनी उदार हैं हमारी बृजरानी..........अरी ! लाला कितना सुन्दर है ! दूसरी गोपी तुरन्त कह रही थी...........पूतना इन सबकी बातें सुन रही है ।

पता है ........बृजरानी नें मुझे मोतियों का हार दिया है ....देख !

दे तो मुझे भी रही थीं पर मैने नही लिया ! दूसरी गोपी नें कहा ।

क्यों ? फिर बधाई में तेनें क्या माँगा ? पहली गोपी नें पूछा ।

मैने तो कह दिया ........मुझे ये सब नही .......मुझे तो अपनें लाला का मुख दिखा दो ! पहले तो मना किया बृजरानी नें ......पर बाद में मुझे लेकर गयीं पालनें के पास ...............आहा ! सखी !

क्या सुन्दरता ! माखन में मानों नीला रँग मिला हो ......ऐसा देह है बृजरानी के लाला का........चंचल नयन......... उसनें मुझे देखा...... अपनें नन्हे पाँव पटके .......मैं तो मन्त्र मुग्ध हो गयी ....सबकुछ भूल गयी थी , सच ! अद्भुत बालक जाया है बृजरानी नें ।

पूतना सुन रही है गोपियों की बातें ।

सुनिये !

पूतना नें गोपियों को रोका ।

हाँ ...........गोपियाँ रुकीं ।

ये नन्दालय कहाँ है ? पूतना नें पूछा ।

क्यों ? नयी आई हो ? क्या गोकुल की नही हो ?

गोपियों ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।

कहाँ की हो ? बड़ी सुन्दर हो ? यशोदा की बहन लगती हो ?

ओह ! उसके लाला हुआ है इसलिये आयी हो.........कुछ लाई हो ? खिलौनें ? अच्छा दिखाओगी, क्या लाई हो ?

प्रश्न इतनें कर दिए कि पूतना तो घबडा गयी ..............

तुम भी ना !

एक गोपी, बूढी बड़ी थी. उसनें पहले तो गोपियों को टोक कर चुप कराया......फिर आगे बढ़कर कहा , पूतना से बोली ......जाओ ! सीधे जाओ........ दूध दही की कीच मची है ..... हल्ला हो रहा है ....लोग लुगाई सब नाच रहे हैं...........जाओ ! बस वही है नन्दालय ।

पूतना गयी ..................

भीड़ थी लोग नाच गा रहे थे वहाँ.......धूम मची थी उत्सव की।

आज छठी उत्सव मनाया जा रहा था ........बृजरानी का लाला आज छ दिन का जो हो गया था ।

पूतना नें देखा .......भीड़ बहुत है ...........और मुझे जाना है यशोदा के अन्तःपुर में.........वहाँ तक कैसे जाऊँ ।

पर जाना तो है ........पूतना चली भीड़ के पास ..........

पर पूतना को देखते ही भीड़ छंटनें लगी..........क्यों की ये इतनी बन ठन के जो आई थी ........... सुन्दर- अतिसुन्दर रूप जो इसनें बनाया था ........गोपों नें रास्ता दे दिया पूतना को ...........

नाचना गाना सब रुक गया ग्वालों का ............

"बड़ी सुन्दर है ये" .........एक नें दूसरे के कान में कहा ।

बृजरानी के पीहर की लग रही है............देखो तो !

क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

26/08/2026

. *मनुस्मृति*
*जब मुद्दाविहीन हो जाओ तो मनुस्मृति को गाली दे दो। जब स्वयं को आधुनिक व बुद्धिजीवी दिखाना हो तो मनुस्मृति को गाली दे दो। जब वोक दिखना हो तो मनुस्मृति को गाली दे दो।*
मनुस्मृति कहती है कि कन्या का अविवाहित रह जाना बेहतर है, लेकिन उसका विवाह किसी गुणहीन पुरुष से नहीं किया जाना चाहिए। *नारी-सशक्तिकरण के लिए इससे बेहतर समझ रखते हैं आप?*
मनुस्मृति कहती है कि शारीरिक परिपक्वता के बाद निर्धारित अवधि तक प्रतीक्षा करने के बाद ही लड़की का विवाह हो, उस समय के हिसाब से 17 वर्ष तक। *बाल-विवाह के विरुद्ध इससे बेहतर कोई प्रमाण है आपके पास?*

मनुस्मृति कहती है - विन्देत सदृशं पतिम्। कन्या अपने योग्य पति का स्वयं वरण करे। यदि अभिभावक विवाह नहीं कराते और कन्या स्वयं पति चुन ले, तो न कन्या किसी पाप या अपराध की भागी होती है, और न वह पुरुष जिसे वह चुनती है। *स्वेच्छा और कंसेंट को इससे बेहतर परिभाषित कर सकते हैं आप?*

*पुत्रेण दुहिता समा। पुत्री पुत्र के समान है। स्त्री-पुरुष समानता के लिए मनुस्मृति से बेहतर कुछ ला सकते हैं आप? क़ुरान या बाइबिल लेकर आइए, देख लीजिए।*

स्वयं डॉ आंबेडकर ने बुढ़ापे में मनुस्मृति का लोहा माना है, उत्तराधिकार वाले विषय को लेकर।
मनुस्मृति माता की निजी संपत्ति को अलग से मान्यता देती है और उसे अविवाहित पुत्री का भाग बताती है। परिवार में महिलाओं को सशक्त रखने के लिए इससे बेहतर कोई व्यवस्था अबतक लेकर आए आप?

बल, दबाव या जबरन नियंत्रण से स्त्रियों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। विश्वसनीय पुरुष भी उन्हें क़ैद नहीं रख सकते। आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः। मतलब, जो स्त्री अपने विवेक से अपनी रक्षा करती हैं, वही सुरक्षित है। बाहरी निगरानी से ऊपर विवेक को रखा गया है। स्त्रियों को विवेकी माना गया है। इससे अधिक सम्मान देते हैं आप? आपने (राहुल) तो अपनी बहन तक को चुनावी राजनीति में खुद के 2 दशक बाद उतारा।

धन के देखभाल एवं प्रबंधन के लिए मनुस्मृति ने स्त्रियों पर विश्वास जताया है। राजा को मनुस्मृति आदेश देती है कि ऐसी स्त्रियों की रक्षा करे जिनके पति बाहर हैं, जिनका परिवार प्रभावशाली नहीं है, जो बीमार हैं या जिनके पति या पुत्र नहीं हैं। अगर कोई संबंधी भी किसी स्त्री की संपत्ति हड़पता है तो उसे चोर मानकर दंड देने को कहा है। इससे अधिक परवाह है आपको स्त्रियों की?

पति को आदेश है कि बाहर जाने से पहले पत्नी की आजीविका की व्यवस्था करके जाए। अब ये मत कहिएगा कि पत्नी ख़ुद नहीं कर सकती क्या। जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः। आगे ये भी लिखा है कि पति न करे तो स्त्री ख़ुद सम्मानजनक कार्यों के जरिए कमाए। *आत्मनिर्भरता के लिए इससे बेहतर नियम बना लेंगे आप?*

तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः। धार्मिक कार्य पति-पत्नी साथ मिलकर करें। पत्नी के बिना कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता है। हमारे यहाँ पत्नी को बेगम नहीं, अर्धांगिनी कहा गया है। यहीं से निकला है 'आधी आबादी'। पूरे पचास प्रतिशत - उतना ही, जितना पुरुष का हिस्सा। पचास-पचास। *इससे अधिक सटीक तरीके से बराबरी का सन्देश दे सकते हैं आप?*
अन्योन्यस्य। एक-दूसरे के प्रति। वैवाहिक जीवन में भी दोनों की ज़िम्मेदारियाँ हैं। मनुस्मृति कहती है कि न स्त्री और न ही पुरुष वैवाहिक मर्यादा का उल्लंघन करे। इसमें क्या जोड़ देंगे आप क्रांतिकारी कहलाने के लिए? कुछ बाक़ी है क्या? *मनुस्मृति कहती है कि नियम दोनों पर हैं।*

*मनुस्मृति ने स्त्री को महाभागाः (सौभाग्यशालिनी और सौभाग्य लाने वाली) कहा। मनुस्मृति ने स्त्री को पूजार्हाः (सम्मान की अधिकारी) कहा। मनुस्मृति ने स्त्री को गृहदीप्तयः (घर को प्रकाशित और प्रसन्न रखने वाली) कहा। परिवार के सुख का आधार कहा। गृहस्थ-जीवन का प्रत्यक्ष आधार कहा।*

अब जिसने परिवार नामक संस्था को ख़त्म करने का लक्ष्य ले रखा हो, उसे ये सब बुरा लगेगा ही। वो पूछेगा कि स्त्री परिवार के सुख के लिए तिनका भी क्यों हिलाए। वो ये नहीं पूछेगा कि मनुस्मृति ने पुरुष को भी स्त्री के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाने को क्यों कहा है।

*यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते… रटा-रटाया है, इसीलिए इसे नहीं गिनाया। सबको पता है। इसी प्रसङ्ग में ये भी लिखा है कि जिस घर में स्त्री दुःखी रहती है वह परिवार शीघ्र नष्ट होता है। यानी, परिवार की स्थिति का पैमाना यह तय कर दिया गया है कि उसमें महिलाओं को प्रसन्न रखा जा रहा है या नहीं।"

लेकिन नहीं, गाली तो केवल मनुस्मृति को ही पड़ेगी। क़ुरान और बाइबिल का नाम नहीं लिया जाएगा। राहुल गाँधी आज 'स्त्रीवादी' बने हैं, काश मनुस्मृति पढ़ लिया होता कम से कम। पढ़ा तो हमने भी नहीं है, इसीलिए जो कहा जाता है मान लेते हैं। सफाई देने लगते हैं कि ये उस समय की व्यवस्था थी।

*मनुस्मृति से अधिक फेमिनिज्म और कहीं नहीं है।* फ़िलहाल इस इकोसिस्टम के लिए तो फेमिनिज्म सिर्फ़ अश्लीलता और अंग-प्रदर्शन ही है।

भाग ७७१               *श्रीरामचरितमानस*                           *प्रथम सोपान*                         *बाल-काण्ड*     ...
25/08/2026

भाग ७७१
*श्रीरामचरितमानस*
*प्रथम सोपान*
*बाल-काण्ड*
*दोहा सं० २९०*
*(चौपाई सं० १ से ४ तक)*

*श्रीराम–बारात–प्रसंग प्रारम्भ*

*पहुँचे दूत राम पुर पावन ।*
*हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥१॥*
अर्थ – जनकजी के दूत श्रीरामचन्द्रजी की पवित्र पुरी अयोध्या में पहुँचे। सुंदर नगर देखकर वे हर्षित हुए।
👉 _*'पहुँचे दूत रामपुर...'*_ – यहाँ अयोध्याजी को *'रामपुर'* कहने का भाव यह है कि –
(१) पिछले दोहों में श्रीजनकपुर की शोभा का वर्णन कर अन्त में कहा था कि *'बसइ नगर जेहि लच्छि....'* अर्थात् श्रीजनकपुर की शोभा जो कही गयी है, वह श्रीजानकीजी के सम्बन्ध से है; अंश-अंशी से अभेद है। इसीलिये यहाँ *'रामपुर'* शब्द देकर सूचित करते हैं कि श्रीअयोध्याजी की शोभा श्रीरामजी के सम्बन्ध से है। इस तरह दोनों का जोड़ मिलाया। अथवा
(२) दूत श्रीरामजी के मंगल के लिये तथा मंगल समाचार लेकर आये हैं, अतः *'रामपुर'* नाम दिया। आगे (श्रीरामजी के वन-गवन से पूर्व) श्रीदशरथजी के अमंगल के लिये जब सरस्वतीजी आयीं, तब दशरथजी के सम्बन्ध से 'दशरथपुर' कहा है। (यथा – *'हरषि हृदय दसरथ पुर आई । जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई ॥'* (२/१२/८) अथवा
(३) उपदेश के लिये 'रामपुर' कहा। अर्थात् जो कोई रामचरित (कहता, सुनता या) धारण करता है वह 'रामपुर' में पहुँच जाता है। ये दूत श्रीरामचरित की पत्रिका लिये हुए हैं, इसीलिये इनका 'रामपुर' में पहुँचना कहा। अथवा
(४) दूत श्रीरघुनाथजी से ही परिचित हैं, उनकी शोभा, वीरता आदि उनके हृदय में गड़ी हुई है, इसीलिये *'रामपुर'* नाम दिया।
👉 *'पावन'* – श्रीअयोध्याजी में अनन्त गुण हैं पर 'पावन' गुण प्रधान है, इसीलिये सर्वत्र (इनके सम्बन्ध में) 'पावन' गुण लिखते हैं, यथा –
*'बंदौ अवधपुरी अति पावनि ।'* (१/१६)
*'जद्यपि अवध सदैव सुहावनि । रामपुरी मंगलमय पावनि ॥'* (१/२९६)
*'राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदित अति पावनि ॥'* (१/३५)
*'पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि । त्रिविध ताप भव रोग नसावनि ॥'* (६/११९)
*'सुनु कपीस अंगद लंकेसा । पावन पुरी रुचिर यह देसा ॥'* (७/४) तथा
यहाँ *'पहुँचे दूत रामपुर पावन ।'* इसीलिये पुरी के दर्शनमात्र से पाप का नाश होता है। अथवा, यह श्रीरामजी का पुर है, इसीलिये यह भारी तीर्थ है; तीर्थ की प्रशंसा 'पावनता' से है, अतः 'पावन' कहा।
_*'हरषे नगर बिलोकि सुहावन'*_ – जब 'रामपुर' कहा तब *'पावन'* कहा और जब 'नगर' कहा तब उसे *'सुहावन'* कहा। क्योंकि नगर सुन्दर होने चाहिये और तीर्थ पावन होना चाहिये। तीर्थ का गुण पवित्रता है, नगर का गुण सुन्दरता है। तीर्थ पवित्र हों, पर यह जरूरी नहीं कि वे शोभायुक्त हों। तीर्थ खंडहर, जंगल पड़े रहने पर भी पावन हैं पर उनसे नगर सुहावना नहीं लगता। रामपुरी पावन और सुहावन दोनों है। श्रीअवध शान्त और श्रृंगार दोनों रसों से परिपूर्ण है। महात्मा लोगों से, शान्तरस से परिपूर्ण और राजधानी होने से श्रृंगाररस भरा है। पूर्वार्ध में *'पावन'* पद देकर शान्तरस और उत्तरार्ध में *'सुहावन'* पद देकर शृंगाररस से पूर्ण दिखाया। दूतों को हर्ष हुआ, ऐसा कहकर सूचित किया कि जनकपुर से यहाँ की शोभा में विशेषता है। जिस जनकपुर की -शोभा को देखकर देवता चकित हो जाते हैं। यथा – *'मन बिरंचि कर भूल', 'बिधिहि भयेउ आचरजु बिसेषी', 'निज निज लोक सबहिं लघु लागे', 'सो बिलोकि सुरनायक मोहा'*: वहाँ के निवासी श्रीअवधपुर को देखकर हर्षित हो रहे है। जैसे जनकपुर के सम्बन्ध में कहा है कि *'पुर रम्यता राम जब देखी । हरषे अनुज समेत बिसेषी ॥',* वैसे ही श्रीअवधपुरी के सम्बन्ध में कहा है कि *'पहुँचे दूत रामपुर पावन । हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥'*
यहाँ *'पहुँचे' 'हरषे' 'तिन्ह' 'लिए'* बहुवचन शब्द देकर दर्शाया है कि कई दूत भेजे गये। वाल्मीकीय से स्पष्ट है कि कई मन्त्री इस काम पर विश्वामित्रजी की आज्ञा तथा शतानन्दजी की सलाह से भेजे गये थे।
*भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई ।*
*दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई ॥२॥*
अर्थ – राजद्वार पर जाकर उन्होंने खबर भेजी, राजा दशरथजी ने सुनकर उन्हें बुला लिया।
👉 _*'दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई'*_ – खबर देनेवाले द्वारपाल ने किसी कामदार आदि से नहीं कहा, बल्कि राजसभा में जाकर सीधे महाराजजी से समाचार कहा, इसलिये *'दसरथ नृप सुनि'* कहा। इससे ऐसा लगता है कि दूतों ने ऐसा कहा था कि हमारे आगमन की खबर खास महाराजजी को देना। नहीं तो यह दरबार तो बहुत भारी हैं, बड़े-बड़े राजद्वार में प्रवेश नहीं पाते, *'सुरपति बसइ बाँह बल जाके । नरपति सकल रहहिं रुख ताके ॥'* (२/२५) तथा *'नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषे । लोकप करहिं प्रीति रुख राखे ॥'* (२/२) भला उस महान् दरबार में दूतों के आने का समाचार सीधे राजा से? दूसरा भाव यह भी हो सकता है कि उन्होंने कहा हो कि हम जनकपुर से महर्षि विश्वामित्र एवं महाराज जनकजी के भेजे हुए पत्रिका (श्रीरामजी का समाचार) लेकर आये हैं। विश्वामित्रजी का ही नाम सुनकर भी (श्रीरामजी का समाचार लाये होंगे यह समझकर) द्वारपाल ने राजा से ही सीधे जाकर कहा हो यह सम्भव है, क्योंकि इससे राजा को बड़ा आनन्द होगा। चौपाई का यह चरण बुलाने की शीघ्रता दरसा रहा है। खबर सुनते ही राजा ने बुला लिया, विलम्ब न किया।
*करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही ।*
*मुदित महीप आपु उठि लीन्ही ॥३॥*
अर्थ – दूतों ने प्रणाम करके चिट्ठी दी। प्रसन्न होकर राजा ने स्वयं उठकर उसे लिया।
👉 _*'करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही'*_ – यहाँ पत्रिका का देनामात्र कहते हैं। कुछ हाल नहीं कहा गया। इससे दर्शाया है कि अपना नाम, ग्राम इत्यादि पहले ही द्वारपालों द्वारा कहला भेजा था, अब सामने आने पर प्रणाम करके पत्रिका दे दी। (कुछ महानुभावों ने गीतावली के आधार पर यहाँ गुरु शतानन्दजी महाराज का पत्रिका लेकर आना लिखा है।)
👉 _*'मुदित'*_ – क्योंकि श्रीराम-लक्ष्मणजी का कोई समाचार अब तक नहीं मिला था। इसीलिये पत्रिका देख आनन्दित हुए।
👉 _*'आपु उठि लीन्ही'*_ – भाव यह है कि राजाओ के प्रायः मन्त्री, कामदार आदि चिट्ठी लेते हैं और राजा को सुनाते हैं, किसी खास और भारी चिट्ठी को ही राजा स्वयं लेते हैं। राजा यहाँ वात्सल्य में ऐसे पगे हुए हैं कि इतना भी विलम्ब न सह सके कि मन्त्री इत्यादि चिट्ठी लेकर उनको पहुँचाते। वे श्रीराम-लक्ष्मणजी के प्रेम में ऐसे पगे हैं, उनकी खबर पाने के लिये ऐसे लालायित और उत्कण्ठित हैं कि उन्होंने स्वयं उठकर पत्रिका ली। राज्य-मर्यादा का उल्लंघन कर ही तो दिया! प्रेम की जय! पं० रामकुमारजी लिखते हैं कि 'श्रीजनकजी को आदर देने के निमित्त दशरथजी स्वयं ही उठे।'
*बारि बिलोचन बाँचत पाती ।*
*पुलक गात आई भरि छाती ॥४॥*
अर्थ – चिट्ठी बाँचते समय उनके नेत्रों में जल (प्रेम और आनंद के आँसू) छा गया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आयी।
👉 _*'बारि बिलोचन बाँचत पाती'*_ – इन चौपाइयों में श्रीदशरथजी महाराज के प्रेम की उत्कृष्ट दशा दर्शित की है। 'बाँचत' क्रिया से सूचित होता है कि पूरी चिट्ठी नहीं पढ़ पाये कि *'छाती भर आई'* अर्थात् प्रेम से विह्वल हो गये, हृदय में प्रेम नहीं समाता, कण्ठ गद्गद हो गया। यह प्रेम की दशा है।
🙏 यहाँ वक्ताओं को उपदेश है कि वे पुस्तक (श्रीरामचरितमानस, श्रीरामायणजी) का ऐसा आदर करें, जैसा राजा ने पत्रिका का आदर किया – *'मुदित महीप आयु उठि लीन्ही ।'* वक्ता ऐसा *'बाँचे'* जैसे राजा *'बाँचते'* है – *'बारि बिलोचन बाँचत पाती । पुलक गात आई भरि छाती ॥'* जैसे प्रेमयुक्त हो श्रीरामचरित *'बाँचने'* से राजा के हृदय में श्रीराम-लक्ष्मण आ गये। जैसा आगे के चरण में कहते हैं, वैसे ही प्रेमी वक्ता के हृदय में श्रीराम-लक्ष्मणजी का साक्षात्कार होगा। रामचरित्र की माधुरी और आकर्षकता ही ऐसी है कि कलियुग में भी प्रेमी पाठकों की ऐसी ही दशा हो जाती है, तब श्रीदशरथजी की यह दशा हुई, कौनसी बड़ी बात है?
*श्रीराम – जय राम – जय जय राम*

.    *श्री राधा लीलामृतम् - भाग ४४*बस बस , यहीं नौका को लगा दो ..... और  देखती हैं  कि कन्हैया इधर उधर ही होंगें...........
25/08/2026

. *श्री राधा लीलामृतम् - भाग ४४*

बस बस , यहीं नौका को लगा दो ..... और देखती हैं कि कन्हैया इधर उधर ही होंगें........ शीघ्र ही श्रीराधा रानी उतरीं, उनके पीछे सखियाँ वृन्दावन में उतरीं ....... और वन में खोजनें के लिये चल पडीं ......."उधर होंगे"........ ललिता ! देख तो उधर से धूल उड़ रही है ...शायद उधर होंगें ........ देख ! वहाँ मोर नाच रहे हैं मेरे श्याम उधर ही होंगे।

सखियाँ इधर उधर दौड़ रही हैं ......... श्रीराधा रानी भी ......पर नही, नही मिले श्याम ........... उदासी घनी हो गयी ......... मन में दुःख हो रहा है .......... "ओह ! प्यारे को आज मैं देख नही पाई"...........आज का दिन कितना खराब गया ।

तभी ......ललिता चिल्लाई ........... लाडिली ! यमुना में जल बढ़ गया है ....... और हमारी नौका बह गयी।

सखियों के सामनें ही नौका बह गयी ................ओह !

आज तो दिन ही खराब था ................इंदुलेखा नें कहा ।

हाँ ....सही कह रही हो........"जिस दिन श्याम न दीखें .....वो दिन तो सच में ही खराब ही है ....... श्रीराधा रानी के नेत्र सजल हो उठे।

अरे ! लाडिली ! ये तो सही बात है .......पर अब जाएँगी कैसे बरसानें ?

और अगर ये बात बृषभान बाबा को पता चल गयी कि आप और हम यहाँ फंस गए हैं ....तो वो कल से आपको कहीं भी जानें आनें नही देंगें ।

ये बात सुनते ही....... श्रीराधा रानी और दुःखी हो गयीं........कि कल से हम नही आ पाएंगीं .....और कल भी श्याम सुन्दर को नही देख पाएंगीं !

ललिते ! कुछ कर ......कोई नौका कहीं से आरही हो या जा रही हो ......उसे मोल हम ज्यादा देंगीं, पर हमें ले जाए ..... जल्दी .......... नही तो कल हम नही आ पाएंगी ...... श्रीराधा रानी ललिता सखी से कहनें लगीं ।

देख रही हूँ ........ शाम भी ढलनें वाली है ........ मुझे ही डाँट पड़ेगी कीर्ति मैया की ..................सब सखियाँ यमुना में कोई नौका वाला मिले यही देखनें लगी थीं ..................

तभी -

***************************

*"ये जग नैया हमार, नैया में हम हैं और हम में किनार"*

बड़े प्यार से गाता हुआ......मस्ती में झूमता हुआ...... एक सुन्दर सा किशोर ...... सिर में गमछा बाँधे ..... हाथ में पतवार चलाते हुए नौका को लेकर चला आ रहा था।

ओ ! केवट ! केवट ! सुन ! सारी सखियाँ चिल्ला पडीं ।

पर ये किसी की सुन ही नही रहा .... बस अपनी ही मस्ती में नौका चलाये जा रहा है ...............

*"करें बिन पैसा पार, नैया में हम हैं और हम में किनार"*

गानें में ही इतना मस्त है .....कि उसे किसी की आवाज ही सुनाई नही दे रही ................।

केवट ! ओ केवट ! इस आवाज को सुना उसनें .......

*क्यों की ये आवाज श्रीराधा रानी नें लगाई थी ।*

हाँ .....क्या हमें कह रही हो ? जोर से चिल्लाया ।

हाँ ....तुम्ही से कह रही हैं ........ पहले इधर तो आओ !

ये बात भी श्रीराधा रानी नें कही थी......... लो आगये .......

चार पतवार जोर से क्या मारी ............. नौका आगयी ।

हाँ अब कहो ................पतवार को लेकर खड़ा हो गया ...... त्रिभंगी झाँकी है इसकी ........ साँवरा है ..............

अच्छा ......सुन केवट ! हमें बरसानें जाना है ....... हमें पहुँचा दे ।

ललिता सखी नें कहा ........पर ये बड़ा विचित्र केवट है .......देख ही नही रहा .... ललिता सखी को ...... ये तो अपलक श्रीराधा रानी को ही देख रहा है।

ओ ! मल्लाह के ! सुन तो ............. इधर देख इधर !

ललिता सखी नें थोडा डाँटा ।

देखो ! हमारे पास समय नही है ....... रात होंने वाली है .......... इसलिये हमें जाना है ......... हम तो इनके लिये आये थे .....ये कहते हुए फिर श्रीराधा रानी को देखनें लगा।

हे केवट महाराज ! हमें पार लगा दो"........ललिता नें थोड़ी चतुराई से काम निकालना चाहा ।

हाँ ....ऐसे बोलोगी .......तो हम सोच भी सकते हैं .........केवट थोडा भाव खा रहा है ।

अब बातें न बनाओ .........हम को बैठा लो ........और पार ले चलो ।

ललिता नें प्रार्थना की मुद्रा ही अपनाई .........।

हूँ ..............केवट उछलता हुआ नौका से नीचे उतरा ...........

बैठो ! श्रीराधा रानी को देखते हुए सखियों से बोला ।

सब सखियाँ जैसे ही चढ़नें लगीं नौका में..........

रुको ! रुको ! जोर से चिल्लाया केवट ।

अब क्या हुआ ? हमनें क्या अपराध कर दिया ?

देखो ! मेरी नाव कितनी सुन्दर और साफ़ है .......और तुम लोगों के पैर !

कितनें गन्दे हैं .............पहले धो लो ................फिर बैठो ।

ठीक है ..............हम यमुना में पैर धोकर ही बैठेगीं ............

सब सखियाँ धोनें लगीं अपनें अपनें पैर ..............

ऐसे नही होगा ...............तुम्हारे धोनें से नही होगा .......मल मल के मैं ही धोऊंगा ..............केवट की जिद्द है ।

ये क्या बात हुयी ? सखियाँ बोलीं।

बस मेरी बात माननी पड़ेगी ..... नही तो हम गए ......... केवट नाव में बैठनें लगा।

अच्छा ! अच्छा ! रुको .......... लो धोलो हमारे पैर ........

सखियों नें कहा ।

कठौता ले आया केवट....... और ऊपर से जल डालते हुए सखियों के पैर धो दिए ..........अब बैठ जाओ ..............

चलो स्वामिनी जू ! सखियों नें श्रीराधा रानी से कहा ।

ना .........इनके पाँव भी तो धोऊंगा मैं ...... केवट नें श्रीजी को देखा ।

श्रीजी कुछ चौंकी .....................

बैठ गया केवट.......और श्रीजी के चरणों को मल मल के धोंने लगा ।

अब मैं बैठूँ नौका में ! ........... मधुर वाणी में फिर श्रीजी बोलीं ।

आहा ! कितनी मीठी बोलती हैं ये ......पर आप स्वयं बैठेंगी तो मिट्टी फिर लग जायेगी और मेरी नाव फिर गन्दी हो जायेगी .........

तो ? मुस्कुराती हुयीं श्रीराधा रानी नें पूछा ...........

मैं आपको गोद में उठाकर ले जाता हूँ .............केवट मुस्कुराया।

नही , आपको ये कैसे छू सकता है श्रीजी ? सखियों नें मना किया ।

छूनें दे ..........श्रीराधा रानी आज ये क्या कह रही थीं ।

देखा ! तुम्हारी स्वामिनी तुमसे समझदार हैं ......ये कहते हुए श्रीराधा रानी को केवट नें अपनी गोद में उठा लिया ....और नौका में बिठा दिया ।

अब तो चलाओ नौका ! .......... सखियों नें फिर विनती की ।

श्रीराधा रानी को देखते हुये नौका चलानें लगा था वो अलबेला केवट।

देखो श्रीजी ! इसके मन में कपट भरा है ......देखो ! कैसे आपकी ओर ही देखे जा रहा है........आप मत देखो इस की ओर ।

ललिता सखी नें श्रीराधा रानी से कहा।

अब हमारी नौका नही चलेगी ............. केवट नें यमुना की बीच धार में रोक दिया नाव को ............

अरे ! अब क्या हुआ ? सखियाँ परेशान हो गयीं थीं केवट से ।

हमें भूख लगी है ..........तुम्हारी मटकियों में क्या है ? और देखो ! जब हमें भूख लगती है ना .....तब हमसे कोई काम नही होता !

पतवार छोड़ दिया ये कहते हुए ।

दे दो सारा दही इसे सखी ! ............ इसी के भाग्य में था हमारा ये माखन ............ श्रीराधा रानी नें सबको कहा ।

हाँ .....लाओ !
...और .सारा दही माखन देखते ही देखते खा गया वो केवट तो ।

डकार ली ...........आहा ! सखी अब हमें नींद आरही है .......... क्यों की हम जब कुछ खा लेते हैं ना ......तब हम से कुछ काम नही होता ।

अरे ! तू पागल है क्या ! सखियाँ चिल्लाईं ...........

पर देखते ही देखते वो केवट तो गिरा श्रीराधा रानी के चरणों में ......

पर जैसे ही गिरा ........तो उसकी फेंट दीख गयी श्रीराधारानी को ।

अरे ! इसकी फेंट में क्या है ?

ललिता उठीं और फेंट में से..............अरे ! ये तो बाँसुरी है।

पर ये तो हमारे कृष्ण की बाँसुरी है ! ललिता सखी नें कहा ।

तब मुस्कुराते हुए श्रीराधा के चरणों को चूमते हुए कृष्ण उठ खड़े हुए ।

ओह ! तो तुम हो केवट महाराज ! सखियों नें बाँसुरी से ही पिटाई करनी शुरू कर दी .......पागल हो क्या ! बाँसुरी टूट जायेगी .......... कन्हैया चिल्लाये .....और सामनें देखा तो.......श्रीजी खड़ी मुस्कुरा रही थीं ।

आगे बढ़े ......और अपनें बाहों का हार अपनी आल्हादिनी के गले में डाल दिया .............सारी सखियाँ आनन्दित हो उठीं थीं।

बरसाना कब आगया किसी को पता भी न चला था ।

*हे वज्रनाभ ! ये है अद्भुत प्रेम की लीला ये अनादि काल से ब्रह्म और आल्हादिनी में चल ही रही है और चलती रहेगी।*

*ये प्रेम लीला है ........यही है .....जो सत्य है .......बाकी सब झूठ है ।*

*प्रेम सत्य है ......प्रेम ही सत्य है ..........महर्षि बार बार बोल रहे थे ।*

"रे प्रेम सुन चुके हैं तेरी अकथ कहानी "

क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

भाग ७७०                *श्रीरामचरितमानस*                        *प्रथम सोपान*                          *बाल-काण्ड*      ...
24/08/2026

भाग ७७०
*श्रीरामचरितमानस*
*प्रथम सोपान*
*बाल-काण्ड*
*दोहा सं० २८९*
*(चौपाई सं० ६ से ८ एवं दोहा)*
*मण्डप-रचना*
*(भाग – ५)*

*जनक भवन कै सोभा जैसी ।*
*गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी ॥६॥*
अर्थ – जनकजी के महल की जैसी शोभा है, वैसी ही शोभा नगर के प्रत्येक घर की दिखाई देती है।
👉 _*'जनक-भवन के सोभा'*_ – मण्डप बनने से श्रीजनकजी के भवन की शोभा अधिक हुई, इससे पाया गया कि घर-घर ऐसे ही मण्डप बने हैं।
👉 _*'गृह गृह प्रति पुर देखिय तैसी'*_ कहने का भाव यह है कि जनकभवन की शोभा के साथ-ही-साथ सभी के भवनों की शोभा तैयार हो गयी, जैसी राजमहल की शोभा, वैसी ही घर-घर की शोभा। जब जनकपुर सँवारा गया तब वहाँ भी मणियों के मण्डप घर-घर बने, इसीलिये जनकभवन की ऐसी शोभा सभी के घर में दिखायी पड़ी।
पूर्व राजा ने महाजनों को जो आज्ञा दी थी कि *'नगर सँवारहु चारिहुँ पासा ॥'* (२८७/४) उसी को यहाँ चरितार्थ किया गया है। आज्ञानुसार सब नगर सजाया गया।
श्रीजनकमहाराज के मण्डप को दूलह-दुलहिनि सहित कहा है, जो मण्डप घर-घर बने उन्हें व्यर्थ नहीं समझना चाहिये; क्योंकि किसी-किसी रामायण में ऐसा उल्लेख है कि जितने भी कुमार (चारों भाइयों के अतिरिक्त) श्रीअयोध्याजी से बारात में गये थे, उन सभी का विवाह जनकपुर में हुआ। इस बात को गोस्वामीजी ने *'गृह गृह प्रति...'* में गुप्त रूप से दरसा दिया है।
*जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी ।*
*तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी ॥७॥*
अर्थ – उस समय जिसने ही तिरहुत (मिथिलापुरी, जनकपुर) को देखा, उसे चौदह भुवन तुच्छ जान पड़े।
👉 _*'जेहि तेरहुति...'*_ – *'जिसने ही देखा, उसे'* इस वाक्य में शंका होती है कि किसने चौदहों भुवन देखे हैं जिसे वे लोक तुच्छ लगे ?' समाधान यह है कि विवाह समय ब्रह्मा-विष्णु-महेश और इन्द्र आदि समस्त लोकपाल वहाँ उपस्थित हुए थे। इन्होंने चौदहों लोक देखे हैं, इन सभी को लघु लगे। इन्द्र को लघु लगना तो आगे उनके मोह से भी स्पष्ट है – *'सो बिलोकि सुरनायक मोहा ॥* सब देवता भी देखकर मोहित हुए है, यथा – *'देखि जनकपुर सुर अनुरागे । निज-निज लोक सबहिं लघु लागे ॥'* (१/३१४/४)
*जो संपदा नीच गृह सोहा ।*
*सो बिलोकि सुरनायक मोहा ॥८॥*
अर्थ – जनकपुर में नीच के घर भी उस समय जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर इन्द्र भी मोहित हो जाता था।
।। दोहा ।।
*बसइ नगर जेहिं लच्छि करि, कपट नारि बर बेषु ।*
*तेहि पुर कै सोभा कहत, सकुचहिं सारद सेषु ॥२८९॥*
अर्थ – जिस नगर में साक्षात्‌ लक्ष्मीजी कपट से स्त्री का सुंदर वेष बनाकर बसती हैं, उस पुर की शोभा का वर्णन करने में सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं।
👉 उपरोक्त चौपाई सं० ८ में जो कहा गया है कि *'जो संपदा नीच गृह सोहा । सो बिलोकि सुरनायक मोहा ॥'* इससे ऐसा लगता है कि ऐश्वर्य का वर्णन कुछ ज्यादा ही कर दिया है, उसकी निवृत्ति के लिये दोहे में उसका समाधान कर दिया है कि यहाँ अत्युक्ति नहीं है, क्योंकि *'बसै नगर जेहि लच्छि'*।' अर्थात् इन्द्र के यहाँ तो लक्ष्मी के कटाक्षमात्र का विलास है [यथा – *'जासु कृपा कटाच्छ सुर चाहत चितव न सोइ ।'* (७/२४)] जबकि यहाँ तो साक्षात् श्रीलक्ष्मीजी वास कर रही हैं तब इन्द्र से अधिक होने में कौनसा आश्चर्य है? जैसे सब देवताओं ने अवतार लेकर श्रीरामजी की सेवा की है वैसे ही सब देवताओं की शक्तियों ने अवतार लेकर श्रीजानकीजी की सेवा की है, साक्षात् लक्ष्मी ने 'नारी' का वेष बनाया है। यथा – *'सची सारदा रमा भवानी । जे सुरतिय सुचि सहज सयानी ॥, कपट नारि बर बेष बनाई । मिलीं सकल रनिवासहिं जाई ॥'* (१/३१८)
👉 _*'लच्छि'*_ – यहाँ लक्ष्मी या लच्छमी ऐसा स्पष्ट नाम न देकर *'लच्छि'* शब्द देने का भाव यह है कि लक्ष्मीजी कपट वेष बनाकर गुप्त हैं, अपने को छिपाये हुए हैं, प्रकट नहीं हैं, इसीलिये गोस्वामीजी ने भी प्रत्यक्ष 'लक्ष्मी' शब्द न रखकर *'लच्छि'* यह गुप्त शब्द रखा।
👉 _*'करि'*_ – लोग जो संसार में जन्म लेते हैं, वह कर्मवश होता है। यहाँ *'करि'* शब्द देकर कर्मवश अवतार का निषेध किया है। भाव यह है कि इनका अवतार कर्मवश नहीं है, ये स्वतः आयी हैं, स्वयं ही श्रेष्ठ नारि-वेष बनाकर पुर में निवास कर रही हैं।
👉 _*'कपट बेष'*_ का भाव यह है कि मानुषी रूप बनाये हुए हैं, कोई पहचान नहीं सकता कि ये लक्ष्मी हैं। माधुर्य के भीतर ऐश्वर्य छिपाये हैं, अतः *'कपट'* कहा।
यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यहांँ अंशी-अंश-अभेद (अर्थात् अंशी और अशं में भेद नहीं है) से श्रीजानकीजी को लक्ष्मी कहा है, नहीं तो श्रीसीताजी तो *'उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता'* हैं (७/२४), उनके अंश से अगणित लक्ष्मियाँ उत्पन्न होती हैं, यथा – *'जासु अंस उपजहिं गुनखानी । अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी ॥'* (१/१४८) और उनके विषय में तो सब वक्ताओं के वचन हैं कि *'कहिअ रमा सम किमि बैदेही । '* (१/२४७) मयंककार कहते हैं कि मानस में विस्तृत कथा परात्पर ब्रह्म श्रीसीतारामजी की है जो मनु-शतरूपा के समीप प्रकट हुए थे। जनकपुर में वे ही सीता प्रकट हुई हैं जिनके अंश से *'अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी'* उत्पन्न होती हैं, तब यहाँ *'लच्छि'* से लक्ष्मीजी का अर्थ ग्रहण करना असंगत है। लक्ष और वाच्य कारणतत्त्व और कार्यतत्त्व को कहते हैं। श्रीजानकीजी लक्षरूपा हैं और महालक्ष्मी इत्यादि वाच्यस्वरूपा हैं। अर्थ यह हुआ कि 'जिस नगर में लक्षस्वरूप स्वयं जानकीजी ऐश्वर्यता को गूढ़ भाव से माधुर्यता में छिपाकर प्राकृत स्त्रीरूप से निवास करती हैं।' प्रज्ञानानन्द स्वामीजी लिखते हैं कि मयंककार के मत से मैं सहमत हूँ पर उन्होंने प्रमाण नहीं दिया है। '
👉 _*'सारद सेषु'*_ – शारदा स्वर्ग की वक्ता हैं और शेषजी पाताल के वक्ता हैं। मर्त्यलोक में कोई वक्ता नहीं है जिनकी गणना वक्ताओं में हो सके; अतएव दो ही कहे गये हैं।
*श्रीराम – जय राम – जय जय राम*

.          *श्रीकृष्ण लीलामृतम् - भाग ३०*                *आई मारन पूतना*भैया !  चिन्ता क्यों करते हो तुम्हारी बहन किस दि...
24/08/2026

. *श्रीकृष्ण लीलामृतम् - भाग ३०*
*आई मारन पूतना*

भैया ! चिन्ता क्यों करते हो तुम्हारी बहन किस दिन काम आएगी !

बृज में जन्म लिया है तुम्हारे काल नें ? मैं मार दूंगी उसे .....मैं भी तो राक्षसी हूँ......समस्त राक्षस विद्याओं की ज्ञाता ।

कंस नें अपनी बहन को बुलवाया था मथुरा में ।

ये सगी बहन नही है .........पर इसमें जो राक्षसी शक्तियाँ थीं उससे प्रभावित होकर ही कंस नें इसे अपनी बहन बना लिया था ।

एक तीर से कई निशानें साधे थे कंस नें.........पूतना को मथुरा में क्या लाया कंस .........इसके साथ, इसके अन्य राक्षस भाई भी आगये थे ..... वकासुर, अघासुर तृणावर्त......... ये सब पूतना के भाई थे ......और सबके सब आसुरी शक्तियों से सम्पन्न थे........ इसलिये तो पूतना को कंस अपनी बहन बनाकर मथुरा में ले आया था।

तुम मेरे काल को मारोगी कैसे ? कंस नें पूतना की ओर देखकर पूछा ।

भैया ! मैं अपनें स्तनों में काल कूट विष लगाकर जाऊँगी........ और बृज के गाँवों में जहाँ जहाँ बालकों नें अभी जन्म लिया है ..... उन सब बालकों को दूध पिलाऊंगी और बालक मर जाएगा...... अट्टहास करनें लगी पूतना...... भैया ! इस बहन के होते हुये तुम्हे चिन्ता क्यों ?

तो कैसे जाओगी ? किसी यान से ? या आकाश में उड़ते हुए ?

कंस नें पूछा ।

भैया ! बड़े भोले हो तुम ........मैं कह चुकी हूँ ना ......मैं राक्षसी हूँ........ और राक्षसी विद्याओं में पारंगत हूँ.........मैं जल में चल सकती हूँ........अग्नि में खेल सकती हूँ........नभ चारिणी हूँ मैं।

पर ......कंस रुक गया बोलते हुये.........पर पूतना ! तुम इतनी भयानक हो........कि तुम्हे अपनें घर में कोई प्रवेश करनें ही नही देगा .......और प्रवेश मिल भी जाए ........तो उसके शिशु को तुम दूध पिलाओ ये कौन माँ चाहेगी.........तुम तो महाभयानक हो ।

पूतना हँसी.......उसकी हँसी भी सामान्य को भयभीत करनें वाली थी ।

कुछ ही क्षण में पूतना वहाँ से चली गयी.....ये सब एकाएक हुआ था ।

*************************************************

निरपराध शिशु बहुत मारे गए होंगें ना ? उद्धव ! पूतना नें बृज के बहुत शिशु मारे .......ओह ! इन सद्योजातः शिशु का अपराध क्या था ?

बेचारे वे शिशु ! विदुर जी नें उद्धव से कहा ।

उद्धव, विदुर जी के मुखमण्डल की ओर चकित भाव से देखनें लगे थे ।

तात ! ये प्रश्न आपका है ?

विदुर जी बोले .......नही .....ये प्रश्न मेरा नही है ....पर सामान्य जन तो यही सोचेगा ना ?

तात ! यह प्रश्न उन्हीं के मन में उठेगा .....जो जन्म को तो श्रेष्ठ, उत्तम, और आवश्यक मानते हैं...... पर मृत्यु को निम्न , निकृष्ट और अनावश्यक समझते हैं.......... तात ! क्या जन्म और मृत्यु एक लीला मात्र नही है उस लीलाधारी की...... फिर इस बात को इतनी गम्भीरता से क्या लेना ?

माली जानें कि उसे अपना बगीचा कैसे सजाना है !

किस पौधे को रखना है ........और पौधे के पास में उगे व्यर्थ के घास को उखाड़कर फेंकना है ........... ये माली पर छोड़ दो ना।

ये संसार हमनें नही बनाना ....ये कन्हैया नें ही बनाया है .......वही इस संसार रूपी वन का माली है.......... "वनमाली" जानें ...........

उद्धव नें कहा ।

********************************************

तुम कौन हो ?

कंस नें उस सुन्दरी को देख, चौंक कर पूछा था ।

एक हाथ लम्बे घूँघट से उसका मुख ऐसा दीख रहा था ....जैसे चन्द्रमा ।

उसकी बेणी कमर तक लटक रही थी...... बेणी में फूल लगे थे ..... मालती, जूही, माधवी, मल्लिका आदि के फूलों की मालायें गुँथी थीं।

रेशमी वस्त्र झीना था ....जिसमें से उसका यौवन छन छनकर गिर रहा था.......कमर इतनी पतली थी कि वह लताओं की तरह हिलती दिखाई देती....नितम्ब स्थूल थे.....वह उसके सौन्दर्य को और निखार रहा था ।

तुम कौन हो ? कंस पहचान नही पाया ।

मैं पूतना ! भैया ! आप भी धोखा खा गए तो मुझे कौन पहचानेंगा ।

पूतना ! तू ? इतनी सुन्दर बन गयी ?

अब तुझे कौन रोक सकता है ........ अच्छे घर की लग रही है......... तू जिस घर में जायेगी वो अपनें आपको धन्य मानेगा ...... तेरा सौन्दर्य ही ऐसा है .........

कंस की बातें सुनकर पूतना बहुत प्रसन्न हुयी थी ...........

वो उड़ चली .......कंस देखता रहा .........कंस को विश्वास हो गया था कि अब उसका 'काल" बचेगा नही ......जहाँ भी छुपा होगा ये पूतना उसे खोज निकालेगी ।

पूतना इधर उधर जानें की सोच रही थी कि .......गोकुल की धूम उसे दिखाई दी .....नाचते गाते लोग दिखाई दिए ...."बधाई हो ...बधाई हो"...... के शब्द गूँज रहे थे नभ में .........

ये कोई विशेष बालक है ......क्यों न इसे ही देखा जाये ......ऐसा विचार कर पूतना गोकुल में ही उतर गयी....और चारों ओर देखने लगी थी ।

क्रमशः
*जय जय श्री राधे कृष्ण*

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