25/08/2026
भाग ७७१
*श्रीरामचरितमानस*
*प्रथम सोपान*
*बाल-काण्ड*
*दोहा सं० २९०*
*(चौपाई सं० १ से ४ तक)*
*श्रीराम–बारात–प्रसंग प्रारम्भ*
*पहुँचे दूत राम पुर पावन ।*
*हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥१॥*
अर्थ – जनकजी के दूत श्रीरामचन्द्रजी की पवित्र पुरी अयोध्या में पहुँचे। सुंदर नगर देखकर वे हर्षित हुए।
👉 _*'पहुँचे दूत रामपुर...'*_ – यहाँ अयोध्याजी को *'रामपुर'* कहने का भाव यह है कि –
(१) पिछले दोहों में श्रीजनकपुर की शोभा का वर्णन कर अन्त में कहा था कि *'बसइ नगर जेहि लच्छि....'* अर्थात् श्रीजनकपुर की शोभा जो कही गयी है, वह श्रीजानकीजी के सम्बन्ध से है; अंश-अंशी से अभेद है। इसीलिये यहाँ *'रामपुर'* शब्द देकर सूचित करते हैं कि श्रीअयोध्याजी की शोभा श्रीरामजी के सम्बन्ध से है। इस तरह दोनों का जोड़ मिलाया। अथवा
(२) दूत श्रीरामजी के मंगल के लिये तथा मंगल समाचार लेकर आये हैं, अतः *'रामपुर'* नाम दिया। आगे (श्रीरामजी के वन-गवन से पूर्व) श्रीदशरथजी के अमंगल के लिये जब सरस्वतीजी आयीं, तब दशरथजी के सम्बन्ध से 'दशरथपुर' कहा है। (यथा – *'हरषि हृदय दसरथ पुर आई । जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई ॥'* (२/१२/८) अथवा
(३) उपदेश के लिये 'रामपुर' कहा। अर्थात् जो कोई रामचरित (कहता, सुनता या) धारण करता है वह 'रामपुर' में पहुँच जाता है। ये दूत श्रीरामचरित की पत्रिका लिये हुए हैं, इसीलिये इनका 'रामपुर' में पहुँचना कहा। अथवा
(४) दूत श्रीरघुनाथजी से ही परिचित हैं, उनकी शोभा, वीरता आदि उनके हृदय में गड़ी हुई है, इसीलिये *'रामपुर'* नाम दिया।
👉 *'पावन'* – श्रीअयोध्याजी में अनन्त गुण हैं पर 'पावन' गुण प्रधान है, इसीलिये सर्वत्र (इनके सम्बन्ध में) 'पावन' गुण लिखते हैं, यथा –
*'बंदौ अवधपुरी अति पावनि ।'* (१/१६)
*'जद्यपि अवध सदैव सुहावनि । रामपुरी मंगलमय पावनि ॥'* (१/२९६)
*'राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदित अति पावनि ॥'* (१/३५)
*'पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि । त्रिविध ताप भव रोग नसावनि ॥'* (६/११९)
*'सुनु कपीस अंगद लंकेसा । पावन पुरी रुचिर यह देसा ॥'* (७/४) तथा
यहाँ *'पहुँचे दूत रामपुर पावन ।'* इसीलिये पुरी के दर्शनमात्र से पाप का नाश होता है। अथवा, यह श्रीरामजी का पुर है, इसीलिये यह भारी तीर्थ है; तीर्थ की प्रशंसा 'पावनता' से है, अतः 'पावन' कहा।
_*'हरषे नगर बिलोकि सुहावन'*_ – जब 'रामपुर' कहा तब *'पावन'* कहा और जब 'नगर' कहा तब उसे *'सुहावन'* कहा। क्योंकि नगर सुन्दर होने चाहिये और तीर्थ पावन होना चाहिये। तीर्थ का गुण पवित्रता है, नगर का गुण सुन्दरता है। तीर्थ पवित्र हों, पर यह जरूरी नहीं कि वे शोभायुक्त हों। तीर्थ खंडहर, जंगल पड़े रहने पर भी पावन हैं पर उनसे नगर सुहावना नहीं लगता। रामपुरी पावन और सुहावन दोनों है। श्रीअवध शान्त और श्रृंगार दोनों रसों से परिपूर्ण है। महात्मा लोगों से, शान्तरस से परिपूर्ण और राजधानी होने से श्रृंगाररस भरा है। पूर्वार्ध में *'पावन'* पद देकर शान्तरस और उत्तरार्ध में *'सुहावन'* पद देकर शृंगाररस से पूर्ण दिखाया। दूतों को हर्ष हुआ, ऐसा कहकर सूचित किया कि जनकपुर से यहाँ की शोभा में विशेषता है। जिस जनकपुर की -शोभा को देखकर देवता चकित हो जाते हैं। यथा – *'मन बिरंचि कर भूल', 'बिधिहि भयेउ आचरजु बिसेषी', 'निज निज लोक सबहिं लघु लागे', 'सो बिलोकि सुरनायक मोहा'*: वहाँ के निवासी श्रीअवधपुर को देखकर हर्षित हो रहे है। जैसे जनकपुर के सम्बन्ध में कहा है कि *'पुर रम्यता राम जब देखी । हरषे अनुज समेत बिसेषी ॥',* वैसे ही श्रीअवधपुरी के सम्बन्ध में कहा है कि *'पहुँचे दूत रामपुर पावन । हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥'*
यहाँ *'पहुँचे' 'हरषे' 'तिन्ह' 'लिए'* बहुवचन शब्द देकर दर्शाया है कि कई दूत भेजे गये। वाल्मीकीय से स्पष्ट है कि कई मन्त्री इस काम पर विश्वामित्रजी की आज्ञा तथा शतानन्दजी की सलाह से भेजे गये थे।
*भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई ।*
*दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई ॥२॥*
अर्थ – राजद्वार पर जाकर उन्होंने खबर भेजी, राजा दशरथजी ने सुनकर उन्हें बुला लिया।
👉 _*'दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई'*_ – खबर देनेवाले द्वारपाल ने किसी कामदार आदि से नहीं कहा, बल्कि राजसभा में जाकर सीधे महाराजजी से समाचार कहा, इसलिये *'दसरथ नृप सुनि'* कहा। इससे ऐसा लगता है कि दूतों ने ऐसा कहा था कि हमारे आगमन की खबर खास महाराजजी को देना। नहीं तो यह दरबार तो बहुत भारी हैं, बड़े-बड़े राजद्वार में प्रवेश नहीं पाते, *'सुरपति बसइ बाँह बल जाके । नरपति सकल रहहिं रुख ताके ॥'* (२/२५) तथा *'नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषे । लोकप करहिं प्रीति रुख राखे ॥'* (२/२) भला उस महान् दरबार में दूतों के आने का समाचार सीधे राजा से? दूसरा भाव यह भी हो सकता है कि उन्होंने कहा हो कि हम जनकपुर से महर्षि विश्वामित्र एवं महाराज जनकजी के भेजे हुए पत्रिका (श्रीरामजी का समाचार) लेकर आये हैं। विश्वामित्रजी का ही नाम सुनकर भी (श्रीरामजी का समाचार लाये होंगे यह समझकर) द्वारपाल ने राजा से ही सीधे जाकर कहा हो यह सम्भव है, क्योंकि इससे राजा को बड़ा आनन्द होगा। चौपाई का यह चरण बुलाने की शीघ्रता दरसा रहा है। खबर सुनते ही राजा ने बुला लिया, विलम्ब न किया।
*करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही ।*
*मुदित महीप आपु उठि लीन्ही ॥३॥*
अर्थ – दूतों ने प्रणाम करके चिट्ठी दी। प्रसन्न होकर राजा ने स्वयं उठकर उसे लिया।
👉 _*'करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही'*_ – यहाँ पत्रिका का देनामात्र कहते हैं। कुछ हाल नहीं कहा गया। इससे दर्शाया है कि अपना नाम, ग्राम इत्यादि पहले ही द्वारपालों द्वारा कहला भेजा था, अब सामने आने पर प्रणाम करके पत्रिका दे दी। (कुछ महानुभावों ने गीतावली के आधार पर यहाँ गुरु शतानन्दजी महाराज का पत्रिका लेकर आना लिखा है।)
👉 _*'मुदित'*_ – क्योंकि श्रीराम-लक्ष्मणजी का कोई समाचार अब तक नहीं मिला था। इसीलिये पत्रिका देख आनन्दित हुए।
👉 _*'आपु उठि लीन्ही'*_ – भाव यह है कि राजाओ के प्रायः मन्त्री, कामदार आदि चिट्ठी लेते हैं और राजा को सुनाते हैं, किसी खास और भारी चिट्ठी को ही राजा स्वयं लेते हैं। राजा यहाँ वात्सल्य में ऐसे पगे हुए हैं कि इतना भी विलम्ब न सह सके कि मन्त्री इत्यादि चिट्ठी लेकर उनको पहुँचाते। वे श्रीराम-लक्ष्मणजी के प्रेम में ऐसे पगे हैं, उनकी खबर पाने के लिये ऐसे लालायित और उत्कण्ठित हैं कि उन्होंने स्वयं उठकर पत्रिका ली। राज्य-मर्यादा का उल्लंघन कर ही तो दिया! प्रेम की जय! पं० रामकुमारजी लिखते हैं कि 'श्रीजनकजी को आदर देने के निमित्त दशरथजी स्वयं ही उठे।'
*बारि बिलोचन बाँचत पाती ।*
*पुलक गात आई भरि छाती ॥४॥*
अर्थ – चिट्ठी बाँचते समय उनके नेत्रों में जल (प्रेम और आनंद के आँसू) छा गया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आयी।
👉 _*'बारि बिलोचन बाँचत पाती'*_ – इन चौपाइयों में श्रीदशरथजी महाराज के प्रेम की उत्कृष्ट दशा दर्शित की है। 'बाँचत' क्रिया से सूचित होता है कि पूरी चिट्ठी नहीं पढ़ पाये कि *'छाती भर आई'* अर्थात् प्रेम से विह्वल हो गये, हृदय में प्रेम नहीं समाता, कण्ठ गद्गद हो गया। यह प्रेम की दशा है।
🙏 यहाँ वक्ताओं को उपदेश है कि वे पुस्तक (श्रीरामचरितमानस, श्रीरामायणजी) का ऐसा आदर करें, जैसा राजा ने पत्रिका का आदर किया – *'मुदित महीप आयु उठि लीन्ही ।'* वक्ता ऐसा *'बाँचे'* जैसे राजा *'बाँचते'* है – *'बारि बिलोचन बाँचत पाती । पुलक गात आई भरि छाती ॥'* जैसे प्रेमयुक्त हो श्रीरामचरित *'बाँचने'* से राजा के हृदय में श्रीराम-लक्ष्मण आ गये। जैसा आगे के चरण में कहते हैं, वैसे ही प्रेमी वक्ता के हृदय में श्रीराम-लक्ष्मणजी का साक्षात्कार होगा। रामचरित्र की माधुरी और आकर्षकता ही ऐसी है कि कलियुग में भी प्रेमी पाठकों की ऐसी ही दशा हो जाती है, तब श्रीदशरथजी की यह दशा हुई, कौनसी बड़ी बात है?
*श्रीराम – जय राम – जय जय राम*