दुर्गा पूजा
"दुर्गा पूजा""दशहरा"जिसे" दुर्गोंत्स्व "अथवा" शरदोत्सव भी कहा जाता है । दक्षिण एशिया में मनाया जाने वाला एक वार्षिक पर्व है जिसमे देवी दुर्गा की पूजा की जाती है । दुर्गा शक्ति की देवी कही जाती है। दुर्गा पूजा का पर्व बुराई पर भलाई की विजय के रूप में भी माना जाता है । दुर्गा पूजा के शुभ अवसर पर 10 दिनो का धार्मिक आयोजन किया जाता है। विशेष रूप से महा साप्तमी , महा अष्टमी , महा नवमी
और दशमी को होती है।
मुंगेर की दुर्गा पूजा बाकी स्थानों में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा बिलकुल जुदा है । मुंगेर दुर्गा पूजा का प्रमुख आर्कषण बड़ी दुर्गा महारानी जी है । माँ की तस्वीर अगर आप अहमदाबाद, दिल्ली, चेन्नई, आसाम या विशारवापटनम् के किसी भी दुकान में देख ले तो कोई आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि मां सिर्फ मुंगेर में ही नही पूरे भारत पूज्य है।
मुंगेर की दुर्गा पूजा अगर देखा जाये तो मुंगेर में 200 से अधिक प्रतिमाएँ बनती है सिर्फ शादीपुर में ही 5 प्रतिमाएं बनती है। हर प्रतिमा सोने चाँदी के जेवरों से लदी रहती है । कइयों के अस्त्र-शस्र भी सोने चाँदी के होते है।
मुंगेर की दुर्गा पूजा में परंपरा का निर्वाह किया जाता है। मुंगेर में बनने वाली सभी दुर्गा काली प्रतिमाएं हर साल एक जैसी बनती है। बड़ी माँ की प्रतिमा ४०० साल से बनती आ रही है। कई मूर्तिकार बदले पर माँ का स्वरूप में रत्ती भर का परिवर्तन नही हुआ । हर वर्ष परम्परानुसार ३२ कहार के कंधो के कंधों पर माँ की शोभा यात्रा निकती है।और विसर्जन होता है। विसर्जन शोभा यात्रा रात भर शहर भ्रमण के पश्चात सभी दुर्गा सुबह 4 से 5 के बीच बाटा चौक पहुंचती है और महाआरती का आयोजन किया जाता है। सभी प्रतिमाएं एक नम्बर ट्रफिक पहुंचती है जहाँ से कतारबद्ध होकर सोझी घाट की और प्रस्थान करती है। बड़ा महावीर स्थान में सभी प्रतिमा की आरती होती है। हर प्रतिमा के आगे एक अखाड़ा होता है जो अस्त्र-शस्त्र एवं पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं। मुंगेर मे दुर्गा पूजा पर 12 दिनो का मेला होता है ।