19/04/2026
*प्रिय मित्रों, भाइयों, परिवार के सभी सदस्यों और इस संसार के सभी लोगों के नाम,*
आज मैं एक पत्र लिख रहा हूँ। कागज़ पर नहीं, अपने दिल से।
14 साल की उम्र में जब मैं घर से निकला था, तब समझ नहीं थी। लगा कोई छीनकर ले गया। पर आज 36 साल की उम्र में समझ आया — *ले जाने वाले वो थे, जिन्हें हम परमात्मा कहते हैं।*
मैं आपको बताना चाहता हूँ, पूरे होश-ओ-हवास में, कि *परमात्मा सत्य है।*
वो किताबों की बात नहीं है। वो मंदिर-मस्जिद तक सीमित नहीं है।
*वो हमेशा साथ रहता है।*
जब मुंबई की बारिश में मेरी छत टपकती थी, वो साथ था।
जब पहली तनख्वाह आई और मिठाई खिलाने वाला कोई नहीं था, वो साथ था।
जब हारकर टूटा, जब जीतकर घमंड आया — दोनों वक्त वो कंधे पर हाथ रखे खड़ा था।
*वो हमेशा सभी जगह रहता है।*
बस की खिड़की में, ढाबे की चाय में, ड्राइवर के टेप वाले भजन में, और माँ के फोन पर आए 'बेटा खाना खाया?' में — हर जगह वही था।
मेरा जीवन का सफर 22 साल का रहा। घर से निकाला गया 14 की उम्र में, और आज 36 की उम्र में वही मुझे उंगली पकड़कर वापस घर छोड़ने आ रहे हैं।
*शायद संसार का सफर इतना ही था मेरे लिए।* मंज़िल से निकालकर मंज़िल तक वापस लाना।
इसलिए आज मुंबई से चित्रकूट धाम बस से लौटते हुए, मैं सिर्फ घर नहीं जा रहा...
*मैं गवाही दे रहा हूँ।*
कि वो है। वो था। वो रहेगा।
आप सबसे बस इतना कहना है — कभी अकेले मत समझना खुद को। जो आपको ले गया है, वही वापस लाएगा भी। वक्त लगेगा, पर लाएगा
*"14 साल की उम्र थी जब वो मुझे उंगली पकड़कर घर से ले गए थे।*
*मैं रोया था, ज़िद की थी... पर वो मुस्कुराए और बोले - 'चल बेटा, दुनिया दिखाता हूँ'।*
फिर 22 साल का सफर शुरू हुआ।
मुंबई की तंग गलियों में जब मैं अकेला पड़ा, वो साथ थे।
जब नौकरी नहीं लगी और जेब खाली थी, तब भी वो साथ थे।
रात को जब नींद नहीं आती थी, वो चुपके से बातें करते थे — 'सो जा बेटा, मैं जाग रहा हूँ'।
हर मोड़ पर, हर ठोकर पर, हर जीत पर... वो साये की तरह साथ चले।
लोगों ने पूछा 'अकेले कैसे कर लिया?'
मैं हंसा। अकेला कब था? वो तो हर सांस में थे।
*आज मैं 36 साल का हूँ।*
और आज वही, जिन्होंने 14 की उम्र में घर से निकाला था, आज उसी हाथ को पकड़कर वापस घर ले जा रहे हैं।
कहते हैं — 'चल बेटा, अब बहुत दुनिया देख ली। घर चल, माँ इंतज़ार कर रही है'।
*मुंबई से चित्रकूट धाम* — बस चल रही है, पर सारथी वो हैं।
12 नहीं, 22 साल का वनवास था मेरा। और वनवासी मैं नहीं, वो थे... जो मेरे लिए घर छोड़कर मेरे साथ भटकते रहे।
*आज सफर पूरा हुआ।*
*मैं नहीं लौट रहा... वो मुझे लौटा रहे हैं।*