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नवबौद्ध बनना: नौटंकी या फैशन #डॉ_विवेक_आर्य दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री राजेंद्र पाल गौतम का नाम चर्चा में है।  इनकी सभ...
29/10/2023

नवबौद्ध बनना: नौटंकी या फैशन
#डॉ_विवेक_आर्य
दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री राजेंद्र पाल गौतम का नाम चर्चा में है। इनकी सभा का कुछ लोगों को नवबौद्ध बनाते हुए वीडियो वायरल हुआ है। जिसमें हिन्दू बहिष्कार की प्रतिज्ञा लेते कुछ लोग दिख रहे है। बुद्ध मत स्वीकार करने वाला 99.9 %दलित वर्ग बुद्ध मत को एक फैशन के रूप में स्वीकार करता हैं। उसे महात्मा बुद्ध कि शिक्षाओं और मान्यताओं से कुछ भी लेना देना नहीं होता। उलटे उसका आचरण उससे विपरीत ही रहता हैं।
उदाहरण के लिए-
1.
मान्यता- महात्मा बुद्ध प्राणी हिंसा के विरुद्ध थे एवं मांसाहार को वर्जित मानते थे।
समीक्षा- नवबौद्ध जाधवपुर, हैदराबाद यूनिवर्सिटी आदि में बीफ फेस्टिवल बनाने है। 99.9% नवबौद्ध मांसाहारी है। बुद्ध मत के देश दुनिया के सबसे बड़े मांसाहारी हैं। इसे कहते है "नाम बड़े दर्शन छोटे"
2. मान्यता- महात्मा बुद्ध अहिंसा के पुजारी थे। वो किसी भी प्रकार कि वैचारिक हिंसा के विरुद्ध थे।
समीक्षा- किसी भी नवबौद्ध से मिलो। वह झल्लाता हुआ मानसिक अवसाद से पीड़ित व्यक्ति जैसा दिखेगा। जो सारा दिन ब्राह्मणवाद और मनुवाद के नाम पर सभी का विरोध करता दिखेगा। वह उनका भी विरोध करता दिखेगा जो जातिवाद को नहीं मानते। हर अच्छी बात का विरोध करना उसकी दैनिक दिनचर्या का भाग होगा। महात्मा बुद्ध शारीरिक, मानसिक, वैचारिक सभी प्रकार की हिंसा के विरोधी थे। नवबौद्ध ठीक विपरीत व्यवहार करते हैं।
3. मान्यता- महात्मा बुद्ध संघ अर्थात संगठन की बात करते थे। समाज को संगठित करना उनका उद्देश्य था।
समीक्षा- नवबौद्ध अलगावावादी कश्मीरी नेताओं का समर्थन कर देश और समाज को तोड़ने की नौटंकी करते दिखते हैं।
4. मान्यता- महात्मा बुद्ध धर्म (धम्म) में विश्वास रखते थे।
समीक्षा- नवबौद्ध देश के विरुद्ध षड़यंत्र करने वाले याकूब मेनन जैसे अधर्मी के समर्थन में खड़े होकर अपने आपको ढोंगी सिद्ध करते हैं।
5. मान्यता- महात्मा बुद्ध छल- कपट करने वाले को छल-कपट छोड़ने की शिक्षा देते थे।
समीक्षा- भारत में ईसाई मिशनरी छल-कपट कर निर्धन हिन्दुओं का धर्मान्तरण करती हैं। नवबौद्ध उनका विरोध करने के स्थान पर उनका साथ देते दिखते हैं।
6. मान्यता- महात्मा बुद्ध अत्याचारी व्यक्ति को अत्याचार छोड़ने की प्रेरणा देते थे।
समीक्षा- 1200 वर्षों से भारत भूमि इस्लामिक आक्रमणकारियों के अत्याचार सहती रही। हज़ारों बुद्ध विहार से लेकर नालंदा विश्वविद्यालय इस्लामिक
आक्रमणकारियों ने तहस-नहस कर दिए। नवबौद्ध उसी मानसिकता की पीठ थपथपाते दिखते हैं।
सन्देश- बनना भी है तो महात्मा बुद्ध कि मान्यताओं को जीवन में , व्यवहार में और आचरण में उतारो।
अन्यथा नवबौद्ध बनना तो केवल नौटंकी या फैशन जैसा हैं।

संन्यासी या ठग(स्वर्गीय सीता राम गोयल की पुस्तक कैथोलिक आश्रम: संन्यासी या ठग” से)देश के कई हिस्सों में कैथोलिक आश्रमों ...
25/10/2023

संन्यासी या ठग
(स्वर्गीय सीता राम गोयल की पुस्तक कैथोलिक आश्रम: संन्यासी या ठग” से)
देश के कई हिस्सों में कैथोलिक आश्रमों का उदय एक अलग विकास नहीं है। ये संस्थाएँ एक श्रृंखला की कड़ियाँ हैं जिन्हें “आश्रम आंदोलन” के रूप में जाना जाता है, और जो ईसाई धर्म के विभिन्न संप्रदाय संगीत में प्रचार कर रहे हैं। प्रोटेस्टेंट और सीरियाई रूढ़िवादी ने समान प्रतिष्ठान विकसित किए हैं। कुल मिलाकर इन संस्थाओं को ईसाई आश्रम कहा जाता है। विख्यात ईसाई लेखकों द्वारा इस विषय पर कई पुस्तकें और कई लेख पहले ही समर्पित किए जा चुके हैं। ईसाई मिशन के रणनीतिकारों का दावा है, आध्यात्मिक मुक्ति के लिए एकमात्र सच्चे नुस्खे के पास है और उसकी घोषणा करता है। यह भारत में मौजूद है, वे कहते हैं, लगभग ईसाई युग की शुरुआत के बाद से। पिछले चार सौ वर्षों के दौरान, इसे हर संभव तरीके से बढ़ावा दिया गया है
डॉ बड़े के अनुसार, “कि चर्च भारत में पंद्रह सौ से अधिक वर्षों से मौजूद है और अधिकांश भाग के लिए सब कुछ इसके पक्ष में है, और फिर भी इस समय में सौ में से मुश्किल से दो लोग ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए हैं। स्थिति, वास्तव में, इस आंकड़े से भी बदतर है, क्योंकि ईसाइयों का विशाल बहुमत बहुत कम छोटे क्षेत्रों में केंद्रित है और भारत के बड़े हिस्से में लोग आज भी अछूते रहते हैं, सिवाय एक बहुत ही सामान्य तरीके से। ईसाई मत। इससे भी आगे जाना और यह कहना आवश्यक है कि भारतीय जनता के विशाल बहुमत के लिए ईसाई धर्म अभी भी पश्चिम से आयातित एक विदेशी धर्म के रूप में प्रकट होता है और भारत की आत्मा अपने प्राचीन धर्म से दृढ़ता से जुड़ी हुई है। यह केवल अज्ञानता की बात नहीं है। यह अतीत में सच हो सकता है, लेकिन हाल के दिनों में हिंदू धर्म का एक उल्लेखनीय पुनरुत्थान हुआ है, जो कमोबेश ईसाई धर्म का विरोध करता है, और शिक्षित हिंदू अपने धर्म को निश्चित रूप से ईसाई धर्म से श्रेष्ठ मानता है ”।
ईसाई धर्म को एक स्वदेशी धर्म के रूप में प्रस्तुत करना होगा। ईसाई धर्मशास्त्र को हिंदू दर्शन की श्रेणियों के माध्यम से बताना होगा; ईसाई पूजा हिंदू पूजा की सामग्री के साथ और तरीके से की जानी चाहिए; ईसाई संस्कारों को हिंदू संस्कारों की तरह ध्वनि करना है; ईसाई चर्चों को हिंदू मंदिरों की वास्तुकला की नकल करनी होगी; ईसाई भजनों को हिंदू संगीत पर सेट करना होगा; ईसाई विषयों और व्यक्तित्वों को हिंदू चित्रकला की शैलियों में प्रस्तुत किया जाना है; ईसाई मिशनरियों को हिंदू संन्यासियों की तरह कपड़े पहनना और रहना पड़ता है; ईसाई मिशन स्टेशनों को हिंदू आश्रमों की तरह दिखना है। और इसी तरह, स्वदेशीकरण का साहित्य ईसाई विचार, संगठन और गतिविधि के सभी पहलुओं में जाता है और यह पता लगाने की कोशिश करता है कि उन्हें हिंदू रूपों में कितनी दूर और किस तरह से प्रच्छन्न किया जा सकता है। पूर्णता तब होगी जब ईसाई धर्म में परिवर्तित होकर पूरे विश्वास के साथ घोषणा करेंगे कि वे हिंदू ईसाई हैं।
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हिंदुओं को इस भ्रमजाल से बचना होगा।

25/10/2023

जिन्होंने अपना धर्म निभाया उनके पास 57 देश है और जिन्होंने भाईचारा निभाया
वह आज अपने ही देश में
अपना अस्तित्व बचाने में लगे हैं

15/10/2023
15/10/2023

24/09/2023

जीव दया पर महावीर का इतना जोर है। वह सिर्फ अहिंसा के कारण नहीं। उसके कारण बहुत गहरे आध्यात्मिक हैं। वह जो तुम्हारे पास चलता हुआ कीड़ा है, वह तुम ही हो । कभी तुम भी वही थे। कभी तुम भी वैसे ही सरक रहे थे, एक छिपकली की तरह, एक चींटी की तरह, एक बिच्छू की तरह तुम्हारा जीवन था। आज तुम भूल गये हो, तुम आगे निकल आये हो। लेकिन जो आगे निकल जाये और पीछे वालों को भूल जाये, उस आदमी के भीतर कोई करुणा, कोई प्रेम, कोई मनुष्यत्व नहीं है।

पेरियार और डाक्टर भीमराव अम्बेडकर (पेरियार के जन्म दिन 17 सितम्बर पर विशेष रूप से प्रकाशित)पेरियार और अम्बेडकर एक चुम्बक...
18/09/2023

पेरियार और डाक्टर भीमराव अम्बेडकर
(पेरियार के जन्म दिन 17 सितम्बर पर विशेष रूप से प्रकाशित)
पेरियार और अम्बेडकर एक चुम्बक के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव की तरह हैं जिन्हे कभी भी एक साथ नहीं रखा जा सकता। वे अम्बेडकरवादी जिन्होंने ना तो आदरणीय अम्बेडकर जी को पढ़ा है और ना ही कभी विचार किया है जबरदस्ती उनके के साथ पेरियार को जोड़ रहे हैं. अम्बेडकर जी प्रखर देशभक्त थे.
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डॉ अम्बेडकर के नाम लेवा यह संगठन भूल गया कि पेरियार ने 1947 में डॉ अम्बेडकर पर देश हित की बात करने एवं द्रविड़स्तान को समर्थन न देने के कारण तीखे स्वरों में हमला बोला था। पेरियार को लगा था कि डॉ अम्बेडकर जातिवाद के विरुद्ध संघर्ष कर रहे है। इसलिए उसका साथ देंगे मगर डॉ अम्बेडकर महान राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने पेरियार की सभी मान्यताओं को अपनी लेखनी से निष्काषित कर दिया।
1. डॉ अम्बेडकर अपनी पुस्तक "शुद्र कौन" में आर्यों के विदेशी होने की बात का खंडन करते हुए लिखते है कि
नाक के परिमाण के वैज्ञानिक आधार पर ब्राह्मणों और अछूतों की एक जाति है। इस आधार पर सभी ब्राह्मण आर्य है और सभी अछूत भी आर्य है। अगर सभी ब्राह्मण द्रविड़ है तो सभी अछूत भी द्रविड़ है।
इस प्रकार से डॉ अम्बेडकर ने नाक की संरचना के आधार पर आर्य-द्रविड़ विभाजन को सिरे से निष्काषित कर दिया। परन्तु पेरियार सभी उत्तर भारतियों को विदेशी बताता है.
2. जहाँ पेरियार संस्कृत भाषा से नफरत करते थे, वही डॉ अम्बेडकर संस्कृत भाषा को पूरे देश की मातृभाषा के रूप में प्रचलित करना चाहते थे। डॉ अम्बेडकर मानते थे कि संस्कृत के ज्ञान के लाभ से प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ज्ञान को जाना जा सकता है। इसलिए संस्कृत का ज्ञान अति आवश्यक है।
3. पेरियार द्रविड़स्तान के नाम पर दक्षिण भारत को एक अलग देश के रूप में विकसित करना चाहते थे। जबकि डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण भारत को एक छत्र राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे जो संस्कृति के माध्यम से एक सूत्र में पिरोया हुआ हो।
4. डॉ अम्बेडकर आर्यों को विदेशी होना नहीं मानते थे जबकि पेरियार आर्यों को विदेशी मानते थे।
5. डॉ अम्बेडकर रंग के आधार पर ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण का विभाजन गलत मानते थे जबकि पेरियार उसे सही मानते थे।
6. डॉ अम्बेडकर मुसलमानों द्वारा पिछले 1200 वर्षों में किये गए अत्याचारों और धर्म परिवर्तन के कटु आलोचक थे। उन्होंने पाकिस्तान बनने पर सभी दलित हिंदुओं को भारत आने का निवेदन किया था। क्योंकि उनका मानना था कि इस्लाम मुस्लिम-गैर मुस्लिम और फिरकापरस्ती के चलते सामाजिक समानता देने में नाकाम है। 1921 में हुए मोपला दंगों की डॉ अम्बेडकर ने कटु आलोचना करी थी जबकि पेरियार वोट साधने की रणनीति के चलते मौन रहे थे।
7. डॉ अम्बेडकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र सभी को आर्य मानते थे जबकि पेरियार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को आर्य और शुद्र को अनार्य मानते थे।
8. डॉ अम्बेडकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते थे जबकि पेरियार स्वहित को सर्वोपरि मानते थे।
9. डॉ अम्बेडकर नास्तिक कम्युनिस्टों को नापसन्द करते थे क्योंकि उन्हें वह राष्ट्रद्रोही और अंग्रेजों का पिटठू मानते थे जबकि पेरियार कम्युनिस्टों को अपना सहयोगी मानते थे क्योंकि वे उन्हीं के समान देश विरोधी राय रखते थे।
10. डॉ अम्बेडकर के लिए भारतीय संस्कृति और इतिहास पर गर्व था जबकि पेरियार को इनसे सख्त नफरत थी।
11. डॉ अम्बेडकर ईसाईयों द्वारा साम,दाम, दंड और भेद के नीति से विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर धर्मान्तरण करने के कटु आलोचक थे। यहाँ तक कि उन्हें ईसाई बनने का प्रलोभन दिया गया तो उन्होंने उसे सिरे से नकार दिया। क्योंकि उनका मानना था कि ईसाई धर्मान्तरण राष्ट्रहरण के समान है। इसके ठीक विपरीत पेरियार ईसाई मिशनरियों द्वारा गड़े गए हवाई किलों के आधार पर अपनी घटिया राजनीती चमकाने पर लगे हुए थे। पेरियार ने कभी ईसाईयों के धर्मान्तरण का विरोध नहीं किया।
इस प्रकार से डॉ अम्बेडकर और पेरियार विपरीत छोर थे जिनके विचारों में कोई समानता न थी। फिर भी भानुमति का यह कुम्बा जबरदस्ती एक राष्ट्रवादी नेता डॉ अम्बेडकर को एक समाज को तोड़ने की कुंठित मानसिकता से जोड़ने वाले पेरियार के साथ नत्थी कर उनका अपमान नहीं तो क्या कर रहे है।
निष्पक्ष पाठक विशेष रूप से अम्बेडकरवादी चिंतन अवश्य करे।

01/09/2023

ईश्वर
केवल वहीं पर नहीं है,
जहां आप उसकी स्तुति प्रार्थना' करते हैं।
ईश्वर वहां भी तो है, जहां आप 'अपराध' करते हैं।
यह भी सदा स्मरण रखना चाहिए।
|| ओ३म् ||

03/08/2023

#अकबर जेहाद में व्यस्त हैं
#एंथनी धर्मांतरण में व्यस्त हैं
#अमर बेचारा टमाटर ढूंढ रहा है कंहा सस्ते मिलेंगे😂🤔

29/06/2023

अब्दुल- हैलो सलमा ट्रेन के टॉयलेट में लिखा ये नंबर तुम्हारा ही है क्या?
उधर से आवाज आई
थैंक यू फॉर सपोर्टिंग UCC

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